मिस्र की कला | Ancient Egyptian civilization

यूरोपीय कला के इतिहास को जानने के लिए ई. स. 3000 पूर्व की मिस्र एवं पश्चिमी एशियाई प्रदेशों की कलाओं को जानना आवश्यक है क्योंकि यूरोपीय कला इन प्रदेशों की कलाओं से प्रभावित होकर आगे विकसित हुई। इस काल के पूर्व ही कुछ कला वस्तुएँ मिस्र, मेसोपोटामिया व ईरान में पायी गयी हैं जिनमें काफी समानताएँ दृष्टिगोचर हैं, किन्तु वे सब प्रागैतिहासिक काल की हैं।

मिस्र व मेसोपोटामिया के इतिहास का आरम्भ लगभग 5000 वर्ष पूर्व हुआ। प्राप्त प्रमाणों के अनुसार ई. स. 3000 वर्ष पूर्व के करीब मिस्र में स्थायी समाज व्यवस्था का व्यापक रूप से उदय हुआ जिसमें शासन, धर्म, हस्तशिल्प आदि सभ्यता के भिन्न तत्त्वों के बीज बोये गये।

नव पाषाणकालीन मानव के आदिम स्वरूप के जीवनयापन के पश्चात् यह एक क्रान्तिकारी कदम था यद्यपि बहुत सी धारणाएँ विशेषतया धर्म व शासन से सम्बन्धी पूर्ववर्ती आदिम कल्पनाओं से ही उत्क्रांत हुई थी क्योंकि प्राचीन मानव-जगत में कला का उपयोग अधिकतर धर्म, पूर्वज-पूजा, राजभक्ति व मृतात्माओं की सन्तुष्टि के कार्यों के लिए किया जाता था।

उद्देश्यों की सफलता के लिए पूर्ववर्ती कलाओं की रूपांकन व अभिव्यक्ति सम्बन्धी कल्पनाओं का अनुसरण करने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं थी।

नव पाषाणकाल के अन्त से (ई. स. 3000 पूर्व) लेकर शास्त्रीय ग्रीक कला के आरम्भ तक (ई.सं. 500 पूर्व के करीब) भूमध्यसागरीय प्रदेशों की कलाओं पर नवपाषाणकालीन कला की आलंकारिता व वस्तुनिरपेक्षत्व का प्रभाव बना रहा।

मिस्र मेसोपोटामिया, ईरान, क्रीट, ग्रीस, साइप्रस वगैरह प्रदेशों की तत्कालीन कलाओं में कुछ समानताएँ भी प्रतीत होती हैं। इस काल-खण्ड में, इस भू-भाग में पूर्व पाषाणकालीन प्राणीचित्रों का नैसर्गिकतावाद, जो तब तक पूर्णतया लुप्त नहीं हुआ था व निकटवर्ती अतीत नवपाषाणकालीन ज्यामितीय शैली के बीच कला दोलायमान रही।

यद्यपि प्रत्यक्ष वस्तुओं का चित्रण होता था, उनके नैसर्गिक आकारों में सारतत्त्वीय मूलभूत रूप में चित्रित करने की अदम्य आदिम प्रेरणा के अनुकूल परिवर्तन किया जाता था। जापान व चीन जैसे सुदूर के देशों की समकालीन कला का रूपान्तर ऐसी ही अवस्था में से गुजर कर हुआ।

उस काल के प्राणीचित्रों की नैसर्गिकता व मानवाकृतियों का पूर्वनियोजित मौलिक आकारों में अंकन उस कला के प्रागैतिहासिक कला से सम्बन्ध का महत्त्वपूर्ण प्रमाण है। सैनिक शक्ति व धर्मप्रसार से भूमध्यसागरीय प्राचीन संस्कृतियों के विकास को गति प्राप्त हुई।

सदियों की लड़ाइयों के फलस्वरूप छोटी-छोटी आदिम टोलियों का स्थान बड़े समाजों ने ले लिया। ये समाज अपने रिवाजों व नीति-नियमों को ईश्वर निर्मित मानते थे व अपनी विजय का श्रेय आदिम देवताओं को देते थे जिनको वे सर्वशक्तिमान व अजेय मानते थे ।

देवताओं के प्रतिनिधि माने गये पुरोहितों का प्रभुत्व बढ़ते ही असहिष्णुता व दंडनीति के तंत्र का उदय हुआ। सांस्कृतिक एकात्मकता का विचार बलवान होकर धार्मिक तथा प्रादेशिक शासक सत्ता अनियंत्रित रूप में एक ही परिवार में केन्द्रित हुई।

"जीवन का आरम्भ अज्ञात के भय के साथ होता है, व यदि सोच समझकर, विवेक के साथ जीया जाये तो अन्त कृतज्ञता व आत्मसंयम में होता है।" 

कुर्ट लांगे का यह विधान न केवल व्यक्ति पर अपितु महान् मानव सभ्यताओं को भी लागू होता है, जिसका मिस्र की प्राचीन सभ्यता जो विश्व के अन्य देशों के लिए प्रेरणादायक व मार्गदर्शक रही है, जीता-जागता उदाहरण है। ऐसी महान् सभ्यताएँ अधिकतर नदी कांठों पर विकसित होकर समृद्ध हुई।

सुमेर, चीन व मिस्र की सभ्यताओं की महानता इस बात में है कि किसी परोक्ष प्रभाव के बिना विकसित होकर वे उत्कर्ष के शिखर तक पहुँची व अन्य अविकसित मानव जातियों के लिए आदर्शवत् सिद्ध हुई।

मिस्र की सभ्यता की प्रभावोत्पादकता व सुनियोजित स्पष्ट जीवन-दर्शन के कारण ही भविष्य की मानव जातियों के लिए उसके महत्त्व एवं मार्गदर्शन का मूल्यांकन विद्वानों द्वारा भी या तो अतिशयोक्त रूप में या अपर्याप्त किया गया है। हेगेल ने मिस्र के लोगों के विचार दर्शन, निष्ठा व निश्चय बुद्धि की बहुत प्रशंसा की है। ग्रीक सभ्यता के प्रारम्भ से 2000 वर्ष पूर्व ही मिस्र के निवासी बौद्धिक ज्ञान की सूक्ष्मता से परिचित हो गये थे।

करीब 50 वर्ष पूर्व जब यूरोपीय सुशिक्षित व्यक्ति ग्रीक कला को अभिजात्य व आदर्श कला मानता था, तब मिस्र, असिरिया व अन्य पश्चिम एशियाई प्रदेशों की कलाकृति को केवल पुरातत्त्वीय अध्ययन व संग्रहालयीन महत्त्व की वस्तु के रूप में देखता था।

आधुनिक कला के अन्तर्गत हुए आन्दोलनों के परिणामस्वरूप एवं कला के मूलतत्त्वों के चिकित्सा बुद्धि से किये अध्ययनों के फलस्वरूप इस परिस्थिति में परिवर्तन हुआ व मिस्र की कला की मौलिक सौन्दर्य विशेषताओं से हम परिचित हुए। मिस्र की कला के किन श्रेष्ठ गुणों के कारण उसने क्रीट, ग्रीस वगैरह आसपास के प्रदेशों के कलाकारों को प्रभावित किया यह ज्ञात हुआ, यद्यपि मिस्र के प्राचीन लोगों के सम्बन्ध में अभी बहुत-सी जानकारी उपलब्ध नहीं है।

ई. स. 4000 वर्ष के करीब आरम्भ हुई मिस्र, फिलीस्तीन, सीरिया, मेसोपोटामिया आदि प्रदेशों की समृद्धि के कारण जेम्स हेनरी ने इन प्रदेशों को मिलाकर ‘उपजाऊ अर्द्ध ‘चन्द्र’ यह नाम दिया था।

यहाँ विभिन्न प्रागैतिहासिक जातियाँ विकास के ऐसे चरण पर थी जिससे भविष्य की मिस्र, असिरिया व मेसोपोटामिया की सभ्यताओं का पूर्वाभास मिलता है। यहाँ आरम्भिक ग्राम निवासी कृषक समाजों ने 20 सदियों की कालावधि में क्रमशः प्रगति करके नगरों को बसाया, शासन की नवीन प्रणालियों को अपनाया, धार्मिक निष्ठाओं व आचरण के नियमों को सुनिर्धारित रूप दिया व लिपि का आविष्कार किया।

इसके अतिरिक्त वास्तुकला, मूर्तिकला एवं विज्ञान में काफी उन्नति की। एक तरह से इस कालखण्ड में मानव की प्रच्छन्न विशेष शक्तियाँ सचेत होकर कार्यान्वित हो गयी। इन प्रदेशों में भी मिस्र व मेसोपोटामिया का योगदान ऐतिहासिक महत्त्व का है। यहाँ की कला का धर्म से इतना अविच्छेद्य सम्बन्ध है कि यहाँ के लोगों की धर्म सम्बन्धी कल्पनाओं के ज्ञान के बिना उनकी कला का यथातथ्य अध्ययन असम्भव है।

मिस्र की धर्म कल्पना के अनुसार पृथ्वी व आकाश सृष्टि के मूल तत्त्व हैं व परमेश्वर अपने दो सहायक देवताओं के द्वारा (आतुम-रा) उनका निर्माता है। मिस्र के लोग अपने राजा फेरो को ईश्वर प्रदत्त सर्वशक्तिमान शासक मानते थे अर्थात् उनकी पक्की निष्ठा थी कि उनका राजा राष्ट्र के नेता, वीर पुरुष तथा ईश्वर के पुत्र के लिये यथोचित सभी गुणों से सदैव सम्पन्न होता है।

मिस्र के लोग मानव के अमरत्व व मरणोपरान्त जीवन का विश्वास करते थे। उपर्युक्त धर्मकल्पनाओं के कारण राजा की मृत्यु के पश्चात् उसके शव के साथ उसके मरणोपरान्त जीवन के लिये उपयुक्त सामग्री कब्र में रखी जाती थी। कुछ समय बाद साधारण प्रतिष्ठित व्यक्ति के मरणोपरान्त भी ऐसी जीवनोपयोगी सामग्री उसकी कब्र में रखने की प्रथा शुरू हुई। समय के साथ मृत व्यक्तियों के अधिष्ठाता के रूप में ओसिरिस देवता की कल्पना की गयी।

ई.स. 2500 पूर्व के करीब, जो मिस्र के पाँचवें राजवंश की समाप्ति का काल था, पिरामिड निर्माण व धर्मग्रन्थों का उदय हुआ व ओसिरिस सम्प्रदाय में प्रकृति पूजा का महत्त्व बढ़ा। ओसिरिस की भगिनी व पत्नी आइसिस देवी की वंशवृद्धि व समृद्धि की अधिष्ठात्री के रूप में उपासना होने लगी।

दोनों का पुत्र होरस के साथ इस देवतात्रयी की पूजनविधि का मिस्र के धार्मिक जीवन में महत्त्व बढ़ा। इसके अलावा अन्य विरोधी सम्प्रदायों का भी उदय हुआ। किन्तु प्राचीन धार्मिक निष्ठाएँ व संस्कार विधि नष्ट नहीं हुए थे व प्राचीन देवताओं का पूजन भी होता रहा। प्राचीन राजशासन काल में सूर्यदेवता हेलिओपोलिस (रा) की उपासना सामान्य थी तो मध्य राज शासनकाल में थीब्ज नगर के आमेन देवता की पूजा अधिक प्रचलित हुई।

प्रमुख देवताओं के अलावा उपदेवताओं तथा प्राकृतिक व पौराणिक शक्तियों की उपासना को भी मिस्र के धार्मिक जीवन में गौण स्थान था। मिस्री लोग देवताओं की दयालुता का विश्वास करते थे एवं उनकी निष्ठा थी कि ये देवता प्रकृति का नियंत्रण करते हैं व मरणोपरान्त जीवन प्रदान करते हैं। अतः देवता पूजन के पीछे उनका प्रमुख उद्देश्य मरणोपरान्त जीवन का निश्चित प्रबन्ध करना था न कि उग्र देवताओं को प्रसन्न करने का विचार ।

राजवंशीय शासन के पूर्व की मिस्त्री कला

उपजाऊ जमीन व शिकार की विपुलता के कारण नवपाषाणकाल में नील नदी के किनारे कुछ कृषक मानवजातियाँ बस गयीं। इस कालखण्ड के मिस्र के स्मारकीय अवशेष विशेष उपलब्ध नहीं हैं किन्तु जो कुछ अवशिष्ट हैं उनसे काफी जानकारी प्राप्त होती है।

अधिकतर वर्णनात्मक चित्र हैं जिनमें से बहुत से पत्थर या हाथीदांत पर खोदाई करके बनाये गए हैं। एक गदा के शीर्ष पर ऊपरी मिस्र के राजा बिच्छु का स्कारपियन की विजय व नहर के उद्घाटन का दृश्य खोदा हुआ है। ई.स. पूर्व चौथी व पाँचवीं सहस्त्राब्दी के प्राप्त अवशेषों से राजवंशीय शासन पूर्व के उन लोगों के रहन-सहन के बारे में काफी जानकारी मिलती है।

इतिहासकारों ने इस काल का विभाजन पाँच अवस्थाओं में किया है व उनकी अन्तिम अवस्था गर्जियन काल-खण्ड कहलाती है जो सबसे महत्त्वपूर्ण है व उससे ई.स. 3100 पूर्व के करीब मिस्र में स्थापित फेरो के राज्य की आरम्भिक परिस्थिति पर प्रकाश डाला जाता है।

मिस्र में उपलब्ध सबसे प्राचीन लेख राजकीय स्मारकों पर है और वह राजशासन के आरम्भ के स्मरण के रूप में अंकित किया है। अतः हम कह सकते हैं कि लेखनकला का आरम्भ मिस्र के इतिहास के आरम्भ होने के साथ हुआ। गेवल-एल-अराक में प्राप्त हाथी दांत का चाकू जिसकी मूठ पर खेल के दृश्य उत्कीर्ण किये हुए हैं, व पत्थर की अनेक पट्टिकाएँ जिन पर मानवाकृतियों और जानवरों के चित्र खोदे गए हैं, मिस्र में पायी गयी हैं।

पत्थर की पट्टिकाओं में ‘शिकारियों की पट्टिका’ जिस पर शेर के शिकार के दृश्य अंकित हैं व ‘नारमेर पट्टिका’ जिस पर राजा की विजय और ऊपरी व निचले मिस्र के विलीनीकरण के दृश्य अंकित हैं, विशेष प्रसिद्ध हैं। पहले राजवंश का दक्षिणी मिस्र के राजा नारमेर (ई.स. 3100 पूर्व) ने उत्तरी मिस्र पर आक्रमण करके सम्पूर्ण मिस्र का एकीकरण किया। इस महत्त्वपूर्ण घटना को पट्टिका पर चित्रित किया गया है। इस पट्टिका का उपयोग श्रृंगार प्रसाधन सामग्री रखने के लिये किया जाता था। ऊपरी हिस्सों में गायों के सींगों से सुशोभित देवी हाथोर के दो शीर्षों के बीच राजा का नाम उत्कीर्ण किया है।

एक तरफ दक्षिणी मिस्र की पद्धति का सफेद लम्बा मुकुट पहने हुए राजा झुके हुए बन्दी के ऊपर गदा घुमाते हुए अंकित हैं तो उसके निचले हिस्से में मारे हुए शत्रु सैनिक अव्यवस्थित फैले हुए दिखाये गए हैं। पट्टिका की दूसरी तरफ ऊपरी मिस्र की पद्धति का लाल मुकुट पहने हुए राजा को मारे हुए शत्रु सैनिकों का निरीक्षण करते हुए दिखाया है। निचले हिस्से में राजा को बैल के प्रतीक के अन्तर्गत शत्रु के किलों पर हमलावर मुद्रा में दिखाया है।

पट्टिका के मध्य में जिस हिस्से में श्रृंगार साधन रखा जाता था साँप के समान लम्बी गर्दनों को लेकर एक-दूसरे के गले लगाते हुए दो काल्पनिक प्राणियों को उत्कीर्ण किया गया है। उपर्युक्त उत्कीर्णनों से मिस्र की प्रारम्भावस्था की कला पर काफी प्रकाश पड़ता है। पाषाणकालीन गुफाचित्रों के समान आकृतियाँ अस्त-व्यस्त बिखरी हुई नहीं हैं। उनका यथास्थान उद्देश्यपूर्ण संयोजन व समूहीकरण किया है।

सभी उत्कीर्णन असाधारण कौशल के परिचायक हैं। प्राणियों व मानवों की आकृतियों द्वारा कलाकारों ने अपना रेखांकन प्रभुत्व प्रकट किया है। वस्तुनिरपेक्षत्व एवं अलंकरण के सिद्धान्तों के अनुकूल रूपान्तर करके आकृतियों को सरलीकृत एवं निर्धारित रूप में अंकित किया है।

अतः प्रागैतिहासिक कला में इस कालखण्ड की मिस्री कला स्पष्ट रूप से भिन्न व उन्नत है। इन उत्कीर्णनों की महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इनमें और भविष्य की मिस्री कला कुछ में समानताएँ, विशेषतया नैसर्गिक आकारों के रूप में, प्रतीत होती हैं। उत्कीर्णनों के चित्र कथा-चित्रण के स्वरूप के हैं जबकि उत्तरकालीन मिस्रीकला में धार्मिक अभिव्यक्ति व शास्त्रीय रूप पर बल दिया गया है।

उपर्युक्त उत्कीर्णनों के अलावा राजवंशीय शासन काल के पूर्व की चित्रकला के दो अवशेष मिले हैं जिनमें एक है हिराकोनोपोलिस के भित्ति चित्र व दूसरा है गेबेलिन में प्राप्त वस्त्र का टुकड़ा जो सबसे प्राचीन वस्त्रावशेष माना जाता है। गेबेल एल अराक के उत्कीर्णन को तथा नारमेर की पट्टिका की शैली विशेषताओं को हम इन भित्तिचित्रों में पुनश्च देख लेते हैं।

अग्रभूमि की आकृतियों का समूहीकरण किया है एवं अभिप्रायों के द्वारा संयोजित किया है। आकृतियों के सुस्थापन के लिए नारमेर पट्टिका के समान भूमि रेखा का प्रयोग किया है। मिस्र की कला के विकास के पूर्वकाल के ये चित्र अध्ययन के विचार से महत्त्वपूर्ण व दिलचस्प हैं।

फेरो के आरम्भिक राजवंशीय शासनकाल की कला

(ई.स. 3100 पूर्व से ई.स. 2258 पूर्व तक) जर्मनी के प्रसिद्ध इतिहासकार हाइन्रिश शोफेर ने स्पष्ट शब्दों में लिखा है कि यदि हम मिस्री कला की यथातथ्य व्याख्या करना चाहते हैं तो यह आवश्यक हो जाता है कि पहले हम मिस्र के प्राचीन लोगों के आध्यात्मिक जीवन का मर्म समझकर उनके विचारों को अनुभव करें।

उन्होंने स्वयं इसी पद्धति को अपनाकर मिस्र की कला पर ग्रंथ लिखा जिसको विद्वानों ने बहुत प्रशंसा की है। किन्तु कुछ अन्य इतिहासकारों ने इस पद्धति से असन्तोष व्यक्त किया है। उनके विचार से कला का अध्ययन सौन्दर्यात्मक अनुभूति तक सीमित रखने से ही किसी भी कला की श्रेष्ठता का उचित मूल्यांकन किया जा सकता है अन्यथा नहीं।

सांस्कृतिक पृष्ठभूमि का विचार कला के अध्ययन से असम्बद्ध है। सच तो यह है कि प्रत्येक पद्धति में कुछ त्रुटियाँ रहती हैं, इसका विचार करके अभ्यासक को अपने प्रधान उद्देश्य के अनुकूल पद्धति को अपनाना उचित रहता है। जैसे कि फ्रँकफोर्ट का मत है— सर्वांगीण अध्ययन के लिए दोनों पद्धतियों का समन्वय करना आवश्यक है। उदाहरण के लिए ऐसी समन्वित अध्ययन पद्धति से ही मिस्त्री कला में यथार्थ परिप्रेक्ष्य के अभाव के कारणों पर प्रकाश डाला जा सकता है।

आरम्भ से ही मिस्र के कलाकार के सामने ऐसा कोई कला निर्मिति का प्रमुख उद्देश्य कभी नहीं रहा जो धर्म से सम्बद्ध नहीं था यह भी एक अन्य महत्त्वपूर्ण बात है कि मिस्र के लोगों ने धर्म व राजनीतिक विचार में ऐसा भेद नहीं माना। उनके सार्वजनिक व व्यक्तिगत जीवन के हर पहलू पर धर्म का प्रावल्य रहा।

वे धार्मिक सत्ता व नागरिक प्रशासन में कोई अन्तर नहीं मान सकते थे। वे राजा को ईश्वरीय आदेश के अनुसार सर्वशक्तिमान मानते थे। कट्टर रूढ़िवादी होने के कारण उन्होंने पुरानी धर्मकल्पनाओं व प्रथाओं का त्याग नहीं किया बल्कि परिवर्धित करके, उनको अधिक जटिल बनाया।

पूज्य गूढ़ धर्म कल्पनाओं की सूक्ष्मताओं को बोधगम्य दृश्य रूप में प्रकट करना, व्यक्ति व महत्त्वपूर्ण घटनाओं को चिरस्थायी स्मारकों के रूप में अंकित करना व धर्म विधियों के लिये अनुकूल पार्श्वभूमि की निर्मिति करना, मिस्री कला का जन्मजात कार्य था।

प्रागैतिहासिक लघु मूर्तियों के समान मिस्री मूर्तियाँ साम्प्रदायिक महत्त्व की वस्तुएँ थीं। सम्प्रदाय के उद्देश्य के अनुसार ये मूर्तियाँ व्यक्तियों के स्मारकों के रूप में बनायी जाती थीं। आरम्भ में केवल राजा व रानी की मूर्तियाँ बनाई जाती थीं व उनके द्वारा राजा-रानी के अमरत्व को लोगों के मन में बिठाया जाता था। बाद में इसी प्रकार की मूर्तियाँ राजपरिवार के अन्य सदस्यों व उससे सम्बद्ध व्यक्तियों की भी किन्तु क्रमशः गौण स्थान देकर बनायी गयी।

अतः मिस्री कलाकार का कार्य कब्र से सम्बन्धित था व लोगों की इस निष्ठा को वह जगाये रखता था कि आदमी अमर है। उसकी मूर्ति का परिरक्षित शव का महत्त्व था। अमरत्व की कल्पना के अनुसार मूर्ति को मानव के शाश्वत नैसर्गिक रूप से अनुप्राणित करना अनिवार्य था। मानव के क्षणभंगुर रूप का मूर्ति में दर्शन अमरत्व की मूलभूत कल्पना के विपरीत था ।

इस विचार की सूक्ष्मता को ध्यान में रखते हुए मिस्री कलाकारों ने बहुत ही कुशलता के साथ ऐसी उदात्त रूप की मानव मूर्तियों की निर्मिति की है जिसको देखकर दर्शक के मन में मानव के चिरंतन अस्तित्व का विश्वास हो जाता है व मानव जीवन की क्षणिकता का उसको आभास तक नहीं होता।

इसके अतिरिक्त मूर्तिकारों ने मूर्तियों में व्यक्तिगत शारीरिक लक्षण-विशेषताओं का भी अन्तर्भाव किया है जिसको हम व्यक्तिगत स्वभाव या मनः स्थिति कह नहीं सकते। अतः शब्दश: सादृश्य नहीं होते हुए मूर्तियाँ प्रखर व्यक्तित्व लिये हुए हैं व उनमें व्यक्ति की पहचान है। वास्तविक सादृश्य को गौण स्थान इसलिए भी था कि मूर्ति पर नाम विशेष को अंकित करके मूर्तिगत व्यक्ति का परिचय सरलता से किया जा सकता था।

राजा मिकिरिनस व उसकी रानी की एक ही पत्थर में एक साथ बनायी अपने ढंग की खड़ी मूर्तियाँ मिस्री कला में काफी प्राचीन हैं व उनका अनुसरण करके कम प्रतिष्ठा के व्यक्तियों की सपत्नीक मूर्तियाँ बनाने का रिवाज प्रचलित हुआ।

राजा की आकृति मुट्ठियाँ कसे हुए, सरल रेखाओं से बद्ध बायां कदम आगे रखे हुए स्थिर दृष्टि लिये हुए कठोर व सीधी खड़ी अंकित की है। इसके विपरीत रानी की आकृति सौम्य वृत्तीय रेखाओं से बद्ध प्यार से राजा की कमर को पकड़े हुए स्नेहपूर्ण मुद्रा में अंकित की है।

राजा-रानियों की मूर्तियों से प्रतिष्ठित अमीर वर्ग के व्यक्तियों की मूर्तियाँ अधिक व्यक्तित्व लिये व सौम्य बनायी गयी हैं। राहोटेप व उसकी पत्नी नोफ्रेट की चौकोर आसन पर बैठी हुई प्रसिद्ध मूर्तियाँ चूना पत्थर की बनायी गयी हैं व रंगीन मूर्तियों का एक सर्वांग सुन्दर उदाहरण हैं। दोनों की आँखें स्फटिकों को जड़ा के बनायी हैं।

उपर्युक्त मृतक मूर्तियों में मिस्र की कला की विशेषताओं एवं कलाकारों के सौन्दर्य के प्रति निराले दृष्किोण के चिह्न स्पष्टतया दिखायी देते हैं। अभ्यासकों के विचार से मिस्र की कला व संस्कृति का उत्पन्न स्वरूप अत्यधिक मात्रा में वहाँ के निवासियों एवं कलाकारों के मनोविज्ञान पर हुए भौगोलिक वातावरण का परिणाम था।

आसपास के रेगिस्तानों से पृथक् किये जाने से बाह्य आक्रमणों की सम्भावना बहुत अल्प थी। विश्वसनीय ऋतुचक्र व नील नदी की बाढ़ अवस्था सम्बन्धी निश्चित पूर्व ज्ञान होने से लोगों में आकस्मिक प्रकृति कोप की आशंका नहीं थी। भूमि उपजाऊ थी व जलवायु मानव जीवन के लिए अनुकूल था।

इन सब कारणों से मिली लोगों को सुरक्षित स्थायी जीवन का लाभ हुआ था व नैसर्गिक मृत्यु की एकमेव क्षति की पूर्ति मानव के अमरत्व यानी मरणोपरान्त जीवन की कल्पना करके ही की जा सकती थी। अतः भूत, वर्तमान व भविष्य में व्याप्त चिरंतन जीवन के विचार से उनकी संस्कृति का हर पहलू प्रभावित था।

एक अन्य भौगोलिक कारण से मिस्री कला में दो सूक्ष्म रूप से भिन्न शैलियाँ पनपीं। आरम्भ में मिस्र की जनता में ऊपरी मिस्र व निचला मित्र ऐसी भिन्नता की भावना थी जिसमें विलीनीकरण के पश्चात् विशेष परिवर्तन नहीं हुआ। जलवायु एवं अर्थव्यवस्था की दृष्टि से दोनों में अन्तर था।

निचले मिस्र के निवासियों के कुछ भिन्न स्वभाव विशेष थे और उन्होंने कुछ सीमा तक अपने एशियाई पड़ोसियों की विचारधाराओं को ग्रहण किया था। वहाँ के कलाकारों का स्वभावतः नैसर्गिकतावाद की ओर झुकाव था, जबकि ऊपरी मिस्र के कलाकारों का कल्पना व सूक्ष्मता की ओर विशेष ध्यान था।

जिन मूलभूत गुण विशेषताओं के कारण मिस्री कला विश्वविख्यात हुई उसका श्रेय ऊपरी मिल के कलाकारों को देना उचित होगा। लगभग सभी इतिहासकार सहमत हैं कि आसपास के भौगोलिक दृश्य के कारण यहाँ के कलाकार वृत्तीय क्षितिज की कल्पना से अपरिचित रहे। खड़ी चट्टानों के बीच की घाटी में रहने वाले इन कलाकारों ने पार्श्व भूमि को नेपथ्य के समरूप एवं आकाश को छतरी या चंदोवा के समरूप माना।

अतः कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि उनकी कला में घनत्वाकार को प्राधान्य है एवं उसमें सरल रेखाओं से बद्ध उभारदार शिल्पकार्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध है। एक तरह से ये लोग अपने को एक विशाल घन या पिरामिड के भीतरी निवासी (अन्तर्निवासी) मानते थे।

मिली कला को प्रभावपूर्ण व श्रेष्ठ दर्जे का सूक्ष्म रूप जिस परिस्थिति में प्राप्त हुआ उसका उपर्युक्त स्थूल विवेचन मिस्री कलाकृति के अध्ययन व सौन्दर्य रसास्वादन में निस्सन्देह सहायक होगा एवं उसके आधार पर विश्व की कला के इतिहास में मिली कला का जो एक विशेष स्थान है उसके कारणों का सरलता से अन्वेषण किया जा सकेगा।

मिल के कलाकारों ने व्यक्तिगत ख्याति या प्रशंसा के लिये सर्जन कार्य नहीं किया, अतः इनमें से अधिकतर कलाकार गुमनाम हैं। वंशानुगत शिल्पियों की हैसियत से उन्होंने एक सामाजिक कर्तव्य के रूप में कला निर्मित की।

पहले दो राजवंशों के काल को ‘पुरातन काल’ माना गया है व नारमेर पट्टिका तथा कुछ अन्य कम महत्त्व की कृतियों को छोड़कर इस काल के कलावशेष उपलब्ध नहीं हैं। विलीनीकरण होने पर भी दूसरे राजवंश के अंत तक मिस्र के ऊपरी व निचले हिस्से में आपसी द्वेषभाव बना रहा।

खा सेखेम राजा के शासन में स्थायी शान्ति प्रस्थापित हुई। इस राजा की मृतक स्मारक के रूप में बनायी मूर्ति में मिस्री कला की घनत्व प्रधान आकार विशेषता के आरम्भिक तथा स्पष्ट चिह्न दृष्टिगोचर हैं। पुरातन काल में राजाओं के दफन की जगहों पर जो इमारतें बनाई जाती थीं वे दक्षिणी मिस्र में स्तूपाकार व निचले मिस्र में चौकोर व ईंटों की हुआ करती थीं जिनको मस्तबा कहते हैं। साधारणतया यही माना जाता है कि समतल छत व उतरती दीवारों वाले आरम्भकालीन मस्तबा को विकसित कर विशाल रूप में बाद में पिरामिड का निर्माण किया गया।

पिरामिड तथा मस्तवा के पृथक् कक्ष होते हैं। एक कक्ष परिरक्षित शव को रखने के लिये होता है। मस्तवा का मूर्तिकक्ष उसके भीतर होता है जबकि पिरामिड का मूर्तिकक्ष उसके बाहरी मन्दिर में होता है।

पिरामिड के मन्दिर में तथा मस्तबा के अन्तर्गत एक अन्य कक्ष या प्रार्थना गृह होता है जिसमें मृतक की आत्मा को आवश्यक सामग्री अर्पण की जाती थी एवं उसकी दीवारों पर चित्र तथा उभारदार शिल्प बनाये जाते थे। इनमें देवताओं को प्रसन्न किया जाता था व साथ ही मृतक के जीवन प्रसंगों को भी चित्रित किया जाता था, जिससे मृतक के मरणोपरान्त जीवन में सहायता हो सके।

तीसरे राजवंश के पहले राजा जोसेर द्वारा सक्कर में बनवाया ‘सोपान पिरामिड’ पिरामिड निर्माण के विकास का मध्यचरण माना जाता है। केआप्स, खेफरेन व मेन्केरेस के गिजानगर में बनवाये प्रसिद्ध पिरामिड चौथे राजवंश के फेरोओं के हैं। प्राचीन राजवंशीय शासन के तीसरे राजवंश के काल (लगभग ई.स. 2778 पूर्व से ई.स. 2662 पूर्व तक ) में पिरामिडों के निर्माण का उचित विकास आरम्भ हुआ किन्तु उसकी निजी विशेषताओं का पूर्ण स्वरूप चौथे राजवंश में प्रकट हुआ। इस काल में विशाल पिरामिडों का निर्माण हुआ।

यह रूपप्रद सिद्धान्तों का युग था जिसमें आरम्भिक व्यक्तिवाद एवं नैसर्गिकतावाद के सभी चिह्न समाप्त हो गये। आकार एवं रचना सम्बन्धी नियमों को निश्चित रूप दिया गया व उनका कलाकृतियों के निर्माण में कठोरता से पालन हुआ।

अधिकारारूढ़ व्यक्तियों का बौद्धिक प्रभाव सुदृढ़ होते ही मिस्र की कला को स्फटिकीय, सुनिर्धारित ठोस रूप प्राप्त हुआ। यह रूढिप्रिय परम्परा हजार वर्ष तक बराबर अविचलित चलती रही व उसमें परिवर्तन के लिये जरा-सा भी स्थान नहीं था। इस काल की गिजानगर के पिरामिड में रखी हुई राजा खेफरेन की मृतक मूर्ति मुद्रा, हस्तविन्यास व सम्मिति के विचार से भविष्य की मृतक राजमूर्तियों के लिये आदर्श एवं ईश्वरीय राजसत्ता का प्रतीक मानी जाती थी।

प्राचीन राजवंशीय काल में मूर्तियों के अलावा जो महत्त्वपूर्ण कला निर्मिति हुई उसमें उभारदार खोदकाम व चित्र हैं जिनसे मृत राजाओं के मन्दिरों के समान कुछ साधारण व्यक्तियों के मकबरों की दीवारों को अलंकृत किया गया है। इस तरह किसी के व्यक्तिगत मकबरे में बनाये गये उभारदार शिल्पों में तीसरे राजवंश के राजा के धर्मशास्त्री हेसि-रा के सक्कर स्थित मकबरे में लकड़ी के फलक पर किया खोदकाम आरम्भिक कलाकृतियों में से एक मशहूर कलाकृति है।

इसमें हेसि रा की बारीकियों के साथ उत्कीर्ण खड़ी आकृति उत्कृष्ट शिल्पकारिता का नमूना है। आकृति के सामने जीवन की घटनाओं के स्थान पर, बरतन आदि उसकी दैनिक जीव की वस्तुओं तथा जायदाद को अंकित किया है।

मैदूम के रानोफेर के मकबरे की दीवारों को जिन चित्रों से अलंकृत किया है वे चौथे राजवंश काल के हैं व उनमें अब मुखिया की आकृति के सामने उसकी जीवन की घटनाओं को अंकित किया है। उपर्युक्त दोनों स्थानों की कलाकृतियों में सक्कर के मकबरों में किये गये कार्य में विश्वविख्यात एवं पूर्ण विकसित उभारदार शिल्पकार्य के पूर्व चिह्न नजर आते हैं।

टाह- होटेप के मकबरे के शिल्पकार्य में परिवार के मुखिया की आकृति अन्य मानवाकृतियों की अपेक्षा अनुपात में अत्यधिक विशाल बनाई गई है व उसका प्रभाव पूरे दृश्य पर छाया हुआ है जिसमें उसके दैनिक जीवन के प्रसंगों व कार्यव्यवस्तता को शिल्पबद्ध किया है।

कहीं मजदूरों को काम करते हुए तो कहीं पशुओं की देखभाल करते हुए दिखाया है। कहीं मुंशी को सेवकों को साथ लेकर खेती की पैदावार तथा अन्य आमदनी को वसूल करते हुए दिखाया है, कहीं वादकों को गाते-बजाते तो कहीं कारीगरों को शिल्पकार्य करते हुए दिखाया है। नौका-विहार व शिकार के भी दृश्य हैं।

एक व्यक्ति मृतक को राजा की भेंट अर्पण करते हुए अंकित किया है किन्तु कहीं भी मृतक को इन क्रियाकलापों में सम्मिलित हुआ नहीं दिखाया है बल्कि उसको एकाग्रचित्त होकर अपने जीवन की सभी घटनाओं को तादात्म्य के साथ निरीक्षण करते हुए दिखाया है। श्रीमती फ्रँकफोर्ट के मतानुसार यह सब चित्रण उसके परिवार वियोग की अन्तर्वेदनाओं को शान्त करने के उद्देश्य से किया गया था।

राजा जोसेर के मकबरे से संलग्न भवन में किये गये उभारदार शिल्पकार्य में राजा जोसेर को धर्मानुष्ठानिक दौड़ में भाग लेते हुए दिखाया है। तीसरे राजवंश के उत्तर काल में जो उभारदार शिल्प निर्माण हुआ उसके विषय प्रमुखतया धार्मिक व प्रायः सूर्य देवता रा के सम्प्रदाय से सम्बन्धित हैं।

चौथे राजवंश में उभारदार शिल्प का अत्यल्प निर्माण हुआ, इसका कारण यह हो सकता है कि इस काल में जो आडम्बरहीन किन्तु भव्य ग्रेनाइट के मृतक मन्दिर तथा भारी भरकम, विशाल मूर्तियों की जो निर्मिति हो रही थी उसके सामने संरक्षकों को उभारदार शिल्प का कार्य क्षुद्र एवं प्रभावहीन प्रतीत हुआ किन्तु उसके पश्चात् फिर से उभारदार शिल्प का कार्य शुरू हुआ।

पाँचवें राजवंश में कुछ उत्कृष्ट उभारदार शिल्पकार्य हुआ जिसमें से साहुरे के मृतक मन्दिर में किया गया कार्य बहुत ही सुन्दर है व उसमें विविध विषयों को लेकर खोदकार्य किया है।

यहाँ के कार्य के अध्ययन से राजाओं के मृतक मन्दिरों में किये जाने वाले उभारदार शिल्पकार्य व निजी व्यक्ति के मकबरे में किये जाने वाले तत्सम शिल्पकार्य का अन्तर स्पष्ट होता है।

राजाओं से सम्बन्धित शिल्पकार्य को राजा के ईश्वरीय श्रेष्ठत्व व धर्माधिष्ठाता के स्थान को ध्यान में रखते हुए धार्मिक महत्त्व से ओत-प्रोत बनाया जाता था जबकि गैर राजकीय व्यक्ति के लिये बनाये गये शिल्प का केवल उस व्यक्ति के जीवन संस्मरण का ही महत्त्व होता था। राजा की जीवन घटनाओं पर किये गये शिल्पकार्य में राजा को भी उन घटनाओं में सक्रिय भाग लेते हुए दिखाया जाता था।

प्राचीन राजवंशीय शासन काल की मिस्री कला की सबसे श्रेष्ठ व महत्त्वपूर्ण देन निस्संदेह ही उसके दीवारों पर अंकित उभारदार शिल्प हैं जिनमें से जैसे हम ऊपर देख चुके हैं, कुछ राजाओं के मृतक मंदिरों में हैं तो कुछ निजी व्यक्ति के मकबरों में हैं। इस उभारदार शिल्पकार्य में भी सक्कर के मकबरे में किया गया कार्य आश्चर्यजनक है। रेखाओं के बारीकियों के साथ किये स्पष्ट उत्कीर्णन तथा प्रभुत्वपूर्ण सुनिर्धारित रूपांकन की बराबरी भविष्य की मिस्री कला कर नहीं सकी।

चौथे राजवंश के पश्चात् विशाल पिरामिडों के निर्माण कार्य में लगे हुए असंख्य कारीगरों में से बहुत से कारीगर पिरामिडों के पूर्ण होने पर बेकार हुए व वे सामान्य अरसिक आश्रयदाताओं के लिए कार्य करने लगे। इसके परिणामस्वरूप छठे राजवंश तक कला का ह्रास होता गया। फिर भी राजाओं के संरक्षण में किये गये कला कार्य में पहला स्तर पर्याप्त मात्रा में बना रहा।

मध्य राजवंशीय शासन काल की मिस्त्री कला (लगभग ई.स. 2600 पूर्व से ई.स. 1680 पूर्व तक )

ई.स. पूर्व की तीसरी सहस्त्राब्दी में मिस्र एक समृद्ध व प्रबल राष्ट्र था। किन्तु छठे राजवंश के अन्त के साथ उसकी अवनति हुई व मिस्र में करीब अंधकार युग फैल गया जिसको थीब्ज के राजाओं ने दमन नियमन के तंत्र को अपना कर समाप्त किया व मिस्र में मध्य राजवंशीय शासन काल का आरम्भ हुआ।

ग्यारहवें राजवंश का राजा मेन्युहेटेप द्वितीय के शासन में मिस्र को स्थायी शान्ति का लाभ हुआ व धीरे-धीरे कला का पुनरुत्थान हुआ। अंधकार युग एवं पश्चात् के संक्रमणावस्था काल में मिस्र के सामाजिक जीवन तथा अर्थव्यवस्था में परिवर्तन होना स्वाभाविक था राजनीतिक उथल-पुथल के कारण व्यक्ति के पारिवारिक जीवन के स्थायित्व का विश्वास डांवाडोल हो गया था।

राजा के निर्विरोध अधिकारों के स्थान पर उसके ऐहिक उत्तरदायित्व के विचार ने जन्म लिया। अब जो राजाओं की मूर्तियाँ बनी उनके चेहरों पर ईश्वरीय उदात्तता की जगह चिंतनशीलत्व तो कहीं उदासी के भाव हैं। इसके अतिरिक्त धार्मिक परिवर्तनों ने भी मिस्र की कला के रूप को प्रभावित किया।

शुरू से चली आ रही सूर्य देवता रा की उपासना की जगह ओसिरेस देवता – जिसको स्वयं को मृत्यु के अधीन माना जाता था— की उपासना का महत्त्व बढ़ा था। मानव के इहलौकिक अमरत्व की कल्पना बदल गयी थी। परिणामस्वरूप प्राचीन रूढ़िबद्ध आकृतियों की जगह अधिक मानवता व व्यक्तित्व के लिए हुए मूर्तियाँ बनने लगी।

आकार में भी वे पहले से छोटी बनाई गयीं। उभारदार शिल्प व मूर्तियों के साथ भित्ति चित्रण को महत्त्व प्राप्त हुआ। मुख्य रूप से मेइर, बेनिहसन, एल बेरशेह, थीब्ज आदि स्थानों में उपलब्ध कलाकृतियों से मध्य राजवंशीय शासन काल की मिस्री कला की कल्पना की जा सकती है। अब युद्ध जैसे नवीन विषयों पर भी कलाकृतियाँ बनायी जाने लगीं।

नव- राजवंशीय शासन काल की कला (लगभग ई.स. 1580 पूर्व से ई.स. 1085 पूर्व तक )

ईसवी सन पूर्व की सत्रहवीं सदी में मिस्र पर विदेशी भ्रमणशील जाति ने आक्रमण किया व उनकी अश्वारोही सेना के सामने मिस्र की पैदल सेना की हार होकर निचले मिस्र पर विदेशी हिस्कोस राजाओं का शासन शुरू हुआ। कुछ समय विदेशी शासन के पश्चात् मिस्र के निवासियों ने रथारूढ़ सेना का आविष्कार किया व युद्ध के नये तरीकों को अपनाकर मिस्र को विदेशी शासन से मुक्त किया। उसके एकाध सदी के पश्चात् ही युद्ध के नये तरीकों से लाभ उठाकर मिस्र ने अपना साम्राज्य सूडान से लेकर युफ्रेटिस नदी तक फैला दिया।

अठारहवें राजवंश के फेरो शासक बहुत महत्त्वाकांक्षी व बलवान थे, जिनमें रानी हाट शेप्ट का शासन काल मिस्र के लिए बहुत ही समृद्धिप्रद रहा। उसने कलाकारों व साहित्यकारों को काफी प्रोत्साहन दिया। अठारहवें राजवंश के पूर्व काल की कला शास्त्र शुद्ध तथा उत्कर्ष के शिखर पर थी।

रा-सम्प्रदाय के स्थान पर आमेन देवता की उपासना को राजा की मान्यता प्राप्त हुई थी व मिस्र की नवीन राजधानी थीब्ज धर्म व कला का केन्द्र बन गयी थी। बाद में फेरो आखेनातोन ने प्रचलित धर्म का परित्याग किया किन्तु तुतानखामोन राजा के शासन काल में फिर से मिस्री कला को शास्त्र शुद्ध रूप प्राप्त हुआ।

अठारहवें राजवंश की मिस्री कला वहाँ की धार्मिक संघर्षमय परिस्थिति को स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करती है व रूढ़िबद्ध शास्त्र शुद्ध रूपांकन के प्रति निष्ठावान होते हुए उसमें अभिव्यक्ति की दृष्टि से जगह-जगह विरोधाभास प्रतीत होता है। इसके सबसे अभ्यसनीय उदाहरण हैं थीब्ज नगर के कब्रिस्तान में राजाओं के मकबरों में बनाये गये असंख्य चित्र व उभारदार शिल्प।

देल-एल-बाहरी के रानी हाटशेप्सुट के मकबरों में हलका उभार देकर बनाये उत्कीर्णनों में धार्मिक विषयों एवं रानी के जीवन के प्रसंगों को अंकित किया है व ये उत्कीर्णन इस वजह से विशेष महत्त्वपूर्ण हैं कि अठारहवें राजवंश काल के अन्य उत्कीर्णन बहुत कम उपलब्ध हैं।

थीब्ज नगर की पश्चिमी पहाड़ियों के मकबरों में संलग्न मंदिरों की दीवारों को अधिकतर रंगीन चित्रों से सजाया है। प्राचीन राजवंशीय शासनकाल के धार्मिक शिल्पों एवं चित्रों की सादगी तथा आडम्बर की अब विस्मृति हो गई थी व नये सामाजिक रहन-सहन के अनुकूल नवराजवंशीय शासनकाल के शिल्पी एवं चित्रकार विलासिता व रमणीयत्व की ओर अधिक ध्यान देकर अपनी कलाकृतियों को साधारण दर्शक की दृष्टि से अधिक आकर्षक बनाने के प्रयत्नों में जुटे हुए थे।

अतिथियों का आदर-सत्कार, दावत की धूमधाम, वादक-वृंद, श्रृंगार, नृत्य आदि भौतिक सुखद प्रसंगों को विशेष महत्त्व दिया गया। मछलीमारी, शिकार आदि फुरसत के क्षणों की मनोरंजक गतिविधियों का भी चित्रण किया गया है। मूर्तियों का धार्मिक महत्त्व नष्ट-सा होकर उनको मृत व्यक्तियों के औपचारिक स्मारकों के रूप में देखा जाने लगा।

प्राचीन शास्त्रीय कठोरता की जगह अब मूर्तियों पर सौम्यत्व व रमणीयता के भाव प्रतीत होने लगे जिसका रानी हाट- शेप्सुट की बैठी हुई मूर्ति उत्कृष्ट उदाहरण है। भित्ति चित्रण का विकास इस काल की मिस्त्री कला की एक अन्य विशेषता थी थीब्ज के मकबरों में बनाये भित्ति चित्रों से यह बात स्पष्ट हो जाती है।

शुरू के भित्ति चित्रों में बाह्य रेखाओं को सुस्पष्ट बनाकर उनके भीतरी हिस्सों में समतल रंगों को भर दिया जाता था। घनत्व, गति या संयोजन का शायद ही विचार किया जाता था। किन्तु बाद में जो भित्ति चित्रण हुआ उसमें इस बात के स्पष्ट चिह्न दिखायी देते हैं कि मिस्री कलाकार चित्रित मानवाकृतियों के रूप, गति, मुद्रा तथा समूहीकरण में रुचि लेने लगे थे।

पार्श्व भूमि में प्राकृतिक दृश्यों को अंकित करने की प्रवृत्ति बढ़ गई व उसके साथ एक या अधिक धरातल रेखाओं का प्रयोग प्रचलित हुआ। प्राकृतिक दृश्यों में बगीचों, तालाब, मंदिर तथा शिकार के दृश्यों एवं पार्श्वभूमि का देहात इनका विशेष रूप से चित्रण हुआ है। रूढ़िबद्ध एक चश्म मानवाकृतियों के साथ अब दर्शकाभिमुख आकृतियाँ भी चित्रित होने लगीं। कुछ चित्रों में चेहरों पर मानवीय भावनाओं को अभिव्यक्त करने के प्रयत्न भी किये गये।

अठारहवें राजवंश का राजा आखेनातोन हठीले स्वभाव का व्यक्ति था। उसके सुझावों के अनुसार कलाकारों को कार्य करना पड़ता था। उसने प्रचलित धर्म का परित्याग किया व अमरना शहर को राजधानी बनाया। उसका निश्चित मत था कि वास्तविक सत्य को अग्रिम महत्त्व दिया जाना चाहिए।

किन्तु अपने ही निर्देशों के अनुसार कार्य करने को विवश किए गए कलाकारों से न यथातथ्य नैसर्गिकतावादी कलाकृतियाँ बनी और न ही परम्परागत रूढ़िबद्ध शास्त्रीय ढंग की कलाकृतियाँ बनीं क्रमबद्ध हो रहा मिस्री कला का विकास रुक कर इस काल की कलाकृतियों पर कृत्रिम नैसर्गिकतावाद का पुट है।

इस काल की कलाकृतियों में राजा आखेनातोन व उसके परिवार का उभारदार शिल्प रानी नेफर्टिटि की रंगीन शीर्षमूर्ति, थीब्ज के नाख्त मकबरे के भित्ति चित्र विशेष प्रसिद्ध हैं। अमरना के उत्तरी राजमहल के भित्ति चित्रों में पशुपक्षियों की आकृतियाँ निरीक्षणपूर्वक बनायी हैं।

अठारहवें राजवंश के अंतिम चरण में यानी तुतानखामोन के शासन काल में फिर से प्राचीन शास्त्र शुद्ध कला को पूर्ववत् अपना सम्मान का स्थान प्राप्त होना आरम्भ हुआ। इस काल का तुतानखामोन का हीरे जड़ित सोने का सिंहासन एवं उसकी पीठ पर सिंहासनस्थ राजा की आकृति के साथ उत्कीर्ण किया हुआ दृश्य विश्वविख्यात कलाकृतियों में से है।

उन्नीसवें व बीसवें राजवंशों के शासनकाल में मिस्री कला नये परिवर्तनों को आत्मसात करके पुनश्च परम्परानिष्ठ बन गयी थी। अब राजाओं ने पहले से ही विशाल व आडम्बरपूर्ण कलाकृतियाँ बनवायीं परन्तु उनमें केवल पुनरावृत्ति का आभास होता है व मौलिक प्रतिभा का अभाव है।

इस काल का राजा रामेसेस द्वितीय द्वारा बनवाया आबू सिम्बेल का मंदिर व वहाँ की चार राजाओं की 40 फीट ऊँची आसनारूढ़ भव्य विश्व प्रसिद्ध मूर्तियाँ नवराजवंशीय शासनकालीन मिस्री कला का अंतिम उत्कर्ष बिन्दु है।

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