बॅरोक कला | Baroque Art | Baroque art and architecture

क्रमबद्धता चित्रकला के विकास का एक अपरिहार्य तत्त्व है व किसी भी शैली का, उसके क्रान्तिकारी होने के बावजूद, पूर्ण स्वतंत्र व अप्रभावित रूप से जन्म, विकास या ह्रास हुआ है ऐसा इतिहास में देखने को नहीं मिलता, यद्यपि किसी कालखण्ड में चित्रकला विकास के चरमोत्कर्ष पर पहुँची हुई तो किसी में हसित अवस्था में दृष्टिगोचर होती है; किसी कालखण्ड में उसमें अवरित परिवर्तन होते हुए दिखायी पड़ते हैं तो किसी में उसके विकास में गतिरोध पैदा हुआ दिखायी देता है।

बॅरोक कला या सत्रहवीं सदी-जो यूरोपीय चित्रकला की महान् सदी मानी जाती है— को पुनरुत्थान (या पुनर्जागरण) काल से पृथक् नहीं किया जा सकता। 

पन्द्रहवीं सदी के आरम्भ में फ्लोरेंस में जिन कला सम्बन्धी नये विचारों ने जन्म लिया उन्हीं विचारों ने ही आगामी सौ वर्षों में संशोधित होकर अधिक सुदृढ़ रूप अपनाया। 

इटली में हुए पुनरुत्थान ने शेष यूरोप को सामाजिक एवं धार्मिक मूल्य तथा जीवन के प्रति नया दृष्टिकोण प्रदान किया। राष्ट्रीयत्व की भावना प्रबल होती गयी व सत्रहवीं सदी की राजनीतिक एवं अन्य गतिविधियों में उसने प्रमुख प्रेरणा का कार्य किया। 

मूलभूत समानताओं के बावजूद इटली, स्पेन, फ्रांस, इंग्लैण्ड, हालैण्ड आदि देशों की कलाओं में प्रादेशिक विशेषताओं का उद्भव हुआ। समर्थ राजतंत्र के कारण सुसंगठित ग्राम जीवन तथा नगर जीवन उपलब्ध हुआ। 

वैज्ञानिक प्रगति होकर अर्थव्यवस्था में कृषि जीवन के साथ उद्योगों का महत्त्व बढ़ गया। सोलहवीं सदी के अन्त तक पुनरुत्थान काल के महान कलाकारों एवं रीतिवादी कलाकारों मृत्यु हो चुकी थी। 

पुनरुत्थानकालीन कला शैली में काफी अन्तर पड़ा। परन्तु जो कुछ भी परिवर्तन हुए उनका मूल स्रोत पुनरुत्थानकालीन कला ही था।

रीतिवाद की सुविचारित विकेन्द्रता ने कला को जनसाधारण की अनुभूति से बहिष्कृत किया था। सर्जनशील प्रतिभा को उत्तरकालीन रीतिवाद के नियमित दमन से मुक्त करना आवश्यक हो गया था। 

कला में पुनः जीवन संचार कराने के लिए आत्मिक एवं ऐन्द्रिय अनुभूतियों के बीच की दीवार को तोड़ना, कला व प्रकृति के बीच सुसंवादित्व का निर्माण करना आवश्यक था। 

दृश्य भौतिक जगत की आत्मिक अनुभूति को व्यक्त करने की कला को सामर्थ्य का विश्वास करके यह कार्य बॅरोक कलाकारों ने किया। 

उनकी नयी शैली ने कला को परम्परागत रूढ़ियों से बंधमुक्त करके मानवीय भावनाओं की परिवाहक बनाया। 

जे.बी. घुबो का कथन “चित्रकला का सर्वप्रथम कार्य है दर्शकों को आनन्दविभोर करना”. बॅरोक कला पर समुचित रूप से लागू होता है। 

यही प्रमुख कारण है जिससे बरीक कला को समृद्धि व गौरव प्राप्त होकर यूरोप के सांस्कृतिक इतिहास में कला, संगीत, विज्ञान व दर्शन के विचार से सत्रहवीं सदी एक महान् सदी मानी गयी है।

ऐसा होते हुए ‘बॅरोक’ शब्द का प्रयोग आरम्भ में निन्दात्मक दृष्टि से किया गया। प्रतीत होता है कि यह शब्द पोर्तुगीज शब्द ‘बारोको’ का अपभ्रंश रूप है जिसका अर्थ है। 

विकृत या भोंडा मोती बॅरोक शब्द का विशेष प्रचलन 18वीं सदी में होने लगा व 1977 में प्रकाशित हुए फ्रान्चेस्को मिलित्सिआ के शब्द कोश में ‘बॅरोक’ शब्द की परिभाषा को है ‘अत्यधिक बेतुका’। 1888 में हाइरिश वोल्फलिन ने ‘पुनरुत्थान व बॅरोक’ नाम की पुस्तक प्रकाशित करके ‘बॅरोक’ शब्द का निन्दात्मक भावार्थ दूर करने का प्रयत्न किया। 

उन्होंने पुनरुत्थान की कला व बॅरोक कला का तुलनात्मक अध्ययन करके उनमें निम्न भेद बताये हैं— (1) रेखात्मकता व रंग प्राधान्य, (2) समतलत्व व गहराई, (3) बद्ध आकार व मुक्त आकार, (4) स्पष्टता व अस्पष्टता, (5) विविधता व एकता। 

पूर्णतया सुनिश्चित न होते हुए भी इस विश्लेषण से बॅरोक कला के प्रति दृष्टिकोण को बदलने में वोल्फलिन काफी सफल हुए। 

जर्में बाजैं जैसे आधुनिक इतिहासकार बॅरोक कला के अन्तर्गत भी आपस में भिन्न तत्त्वों का दर्शन करते हैं व अविभाज्य बॅरोक कला शैली की कल्पना को तर्कसंगत नहीं मानते अत: इस शैली के अध्ययन में कलाकार की व्यक्तिगत विशेषताओं व कलाकृति के निजी रूप प्रभाव को प्रमुख स्थान देकर सर्व साधारण विशेषताओं का विचार तदनुषंगी एवं संदर्भ रूप में करना होगा। 

इसमें कोई सन्देह नहीं है कि किसी समय व स्थान पर कलाकार विचार व योजनापूर्वक नव निर्मिति के प्रयत्न करते हैं तो कभी नवनिर्मित कला बाह्य तत्त्वों से अप्रभावित हुए बिना नहीं रहती। 

अतः कला के इतिहास में अंतिम रूप से कुछ प्रतिपादित करना या निष्कर्ष निकालना दुष्कर है अप्रतिष्ठिासूचक अर्थ में ‘बॅरोक’ शब्द का प्रयोग अप्रचलित हो गया है व अब इसके प्रमुखतया दो अभिप्राय होते हैं; पहले अभिप्राय से यूरोपीय कला की उस धारा की ओर संकेत किया जाता है जिसने प्राचीन शास्त्रीय कला का अनुसरण समाप्त किया, दूसरे अभिप्राय से नवनिर्मित कला के नये दृष्टिकोणों की ओर संकेत किया जाता है जिनके बारे में भिन्न विद्वानों ने अपने-अपने मत व्यक्त किए हैं। 

एक मत के अनुसार पुनरुत्थान की कला का लक्ष्य सन्तुलन व स्थायित्व था, जबकि बॅरोक कला का लक्ष्य कर्णवत संयोजन व गतित्व था। पुनरुत्थान की कला तत्त्वतः रेखात्मक थी जबकि छाया प्रकाश की सहायता से घनत्व दर्शन बॅरोक कला का प्रमुख उद्देश्य था । 

वेर्नेर वाइस्वाक, एमिल माले व लुई रो बॅरोक कला को कौंसिल आफ ट्रेन्ट द्वारा आरम्भित धर्म-प्रति-सुधारआन्दोलन का परिणाम व जेसुइट कला से अभिन्न मानते हैं। 

इसके विपरीत कुछ विद्वान बॅरोक कला को जेसुइट कला से अभिन्न मानना तर्कसंगत नहीं समझते। वी.एल. तापीय जैसे अर्वाचीन विद्वान विचारकों के मतानुसार केवल एकमात्र जेसुइट धर्म सम्प्रदाय के प्रोत्साहन के फलस्वरूप इतने विविध दर्शनों से युक्त, बहुरंगी कला का उद्भव नहीं हो सकता था।

वास्तव में, बॅरोक कला को प्रोत्साहित करके मार्गदर्शन करने वाली तीन प्रेरणाएँ थीं जिनमें केथोलिक चर्च प्रमुख थी जिसने कला को धर्मप्रसार का एवं प्रार्थना उपासना को आकर्षक बनाने का साधन माना था। 

दूसरी प्रेरणा थी सामाजिक विकास व वैज्ञानिक प्रगति जिसके कारण कलाकारों के दृष्टिकोण में काफी परिवर्तन आ गया था। 

बरोक कला को प्रत्यक्ष रूप से प्रोत्साहित करने वाली तीसरी प्रेरणा थी सुदृढ़ व समर्थ राजतंत्र जो अब ईसाई धर्म के आधिपत्य से पर्याप्त मात्रा में स्वतंत्र हो गया था।

अब जेसुइटधर्मी निश्चित रूप से समझ चुके थे कि प्रोटेस्टंट आन्दोलन को रोका नहीं जा सकता था उन्होंने कॅथोलिक पंथ के प्रचार के हेतु धार्मिक कला को मानवतावादी व सजीव बना कर उपासकों को आकृष्ट करने का कार्यक्रम आरम्भ किया। 

इसके अन्तर्गत उन्होंने स्वाभाविक मानवीय भावनाओं को जागृत करने का कला का सामर्थ्य एवं उसके अंतर्निहित ऐंद्रिय आकार सौन्दर्य के मनोवैज्ञानिक प्रभाव को तत्काल पहचाना व प्रोत्साहित किया। 

इसके फलस्वरूप जिस नयी बलशाली, गतिपूर्ण व मनोहारी कला शैली का उदय हुआ वही बॅरोक कला के नाम से विख्यात हुई तथा कॅथोलिक चर्च के धार्मिक कार्यक्रमों में काफी सहायक सिद्ध हुई। 

सोलहवीं सदी में ही कला रीतिवाद की संकीर्णता से मुक्त हुई थी व अब वह रीतिवादी कला के समान अल्पसंख्यक शिष्ट वर्ग के लिए मात्र न रहकर अधिक लोकाभिमुख हुई।

सोहलवीं व सत्रहवीं सदियाँ आविष्कारों का कालखण्ड थीं, व इन आविष्कारों का लक्ष्य था – भूगोल के अन्तर्गत नये प्रदेश, आत्मा के अन्तर्गत परमात्मा व समाज के अन्तर्गत समृद्धि । 

स्पेन, पोर्तुगाल व फ्रांस जैसे कॅथोलिक पंथीय देशों के औपनिवेशिक विस्तार से धर्म-प्रसार के लिए नया अवसर प्राप्त होकर बॅरोक कला में उदारता आ गयी। 

इंग्लैण्ड व हालैण्ड जैसे गैर कॅथोलिक देशों के औपनिवेशिक विस्तार से वे देश समृद्ध हुए। प्रादेशिक विस्तार के साथ ही विचारों की संकीर्णता कम होने लगी। 

नये लोगों की जीवन शैलियाँ तथा उनकी भाषाओं, संस्कृतियों व रीति-रिवाजों का अध्ययन शुरू हुआ। वैज्ञानिक विकास में विशेषतया गणित, खगोलशास्त्र जैसे विषयों से सम्बन्धित अध्ययन में गति आ गयी। मानव में आत्मविश्वास बढ़ा व जीवन-दर्शन में मानवतावादी दृष्टिकोण का महत्त्व बढ़ता गया। 

अन्तरिक्ष के अनन्त व आश्चर्यजनक विशालत्व से परिचय होने से प्रकृति के वैज्ञानिक अध्ययन के प्रति रुचि बढ़ी। गॅलिलियो व न्यूटन जैसे असाधारण प्रतिभा के विज्ञानियों के सिद्धान्तों से विज्ञान में जो क्रान्तिकारी परिवर्तन का आरम्भ हुआ उसने विश्व की वर्तमान आश्चर्यजनक शिल्प वैज्ञानिक संरचना की नींव डाली। 

इन सभी बातों का सोलहवीं व सत्रहवीं सदियों की कला पर अभूतपूर्व प्रभाव पड़ा। निसर्ग व मानव के अन्योन्याश्रय के ज्ञान से कला के बाह्य रूप में परिवर्तन आ गया व वह अधिक नैसर्गिक वन गयी। 

पुनरुत्थान काल में मानवाकृतियों को ही सर्वस्व मान कर उनको सुस्पष्ट व श्रेष्ठ चित्रित किया जाता था व पृष्ठभूमि का निसर्ग चित्रण अस्पष्ट व नाम मात्र होता था। 

बॅरोक कला में अब ऐसे भी चित्र देखने को मिलने लगे जिनमें निसर्ग को प्रमुख महत्त्व देकर, उनको अनन्त अवकाश की गहराई में चित्रित किया हो व जिनमें मानवता का पुट देने के उद्देश्य से छोटी व अस्पार मानवाकृतियाँ हो। 

लिओनादों के चित्र ‘मोना लिसा’ व ज्योजिओने के चित्र ‘वन विहार’ की तुलना पुस ( Nicolas Poussin / निकोलस पुसिन ), क्लोद लोर व राइस्टाल के दृश्य चित्रों से करने पर यह बात स्पष्ट हो जाती है। 

निकोलस पौसिन, लैंडस्केप विथ अ काम, 1650-1651, जे. पॉल गेटी म्यूज़ियम, लॉस एंजिल्स, सीए, यूएसए।
निकोलस पौसिन, लैंडस्केप विथ अ काम, 1650-1651, जे. पॉल गेटी म्यूज़ियम, लॉस एंजिल्स, सीए, यूएसए/ Nicolas Poussin, Landscape with a Calm, 1650-1651, J. Paul Getty Museum, Los Angeles, CA, USA.

रेम्ब्रांट ने अंधकारयुक्त अवकाश की अथाह गहराई कुशलता व अभिव्यंजनापूर्ण संवेदनाओं के साथ की है। इसी कुशलता का उत्कर्ष हमें डच चित्रकारों द्वारा चित्रित खिड़कियों में से दिखायी देने वाले बाह्य अवकाश व गृहांतर्गत अवकाश में देखने को मिलता है। 

संक्षेप में बरीक कला के साथ चित्रों में अवकाश का महत्त्व बढ़ गया। अवकाश का महत्त्व बढ़ते हो संयोजन-पद्धति में क्रान्तिकारी परिवर्तन हुए। 

चित्रण करते समय प्रत्येक वस्तु व आकृति का स्वतंत्र रूप से विचार करने के बजाय चित्रकार चित्र के सम्पूर्ण प्रभाव में उसका क्या स्थान है इसका विचार करके संयोजन की ओर ध्यान देने लगा। 

किसी विशाल भित्ति चित्र के एक अंश के समान दिखने के बजाय अब चित्र स्वयं पूर्ण एवं सीमित दृश्य के समान दिखने लगा। चित्र में गति व विकिरण का विचार आवश्यक होकर संयोजन में कर्णवत मूल रेखाओं का प्रादुर्भाव हुआ।

बॅरोक कला के विकास में राजतंत्र व मध्यमवर्ग से काफी आश्रय मिला। पन्द्रहवीं व सोलहवीं सदियों में इंग्लैण्ड, स्पेन व फ्रांस में राजवंशीय सत्ताएँ प्रस्थापित हुईं जिनको सामर्थ्यवान बनाने में सामन्तवर्ग से परेशान मध्यम वर्ग- जो व्यापार व व्यवसाय के लिए शान्ति व सुव्यवस्था चाहता था-सहायक हुआ। 

नवार्जित आश्रय का कलाभिव्यक्ति पर प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था । मध्यम वर्ग के आश्रय के कारण कला के सौन्दर्यात्मक पक्ष में तर्कशील शास्त्रीयता व नैसर्गिकता का प्रभुत्व बढ़ा – जिसका पुसँ , ल नें व ला तुर की कला उदाहरण हैं- यद्यपि बलिष्ठ राजतंत्रीय देशों में अभिजातवर्गीय व धार्मिक तत्त्वों से सम्मिश्रित कला का प्रादुर्भाव अधिक रहा- जिसका रुबेन्स की कला उत्कृष्ट उदाहरण है। 

हालैण्ड में, जहाँ मध्यमवर्ग सामर्थ्यशाली था, कला में नैसर्गिकता पर अत्यधिक बल दिया गया व चित्रों के विषयों में भी अधिकतर मध्यम वर्ग के जीवन एवं बाह्य दृश्यों को प्रमुख स्थान मिला।

रोम में जन्मी बॅरोक कला का मुख्यतया रोम ही केन्द्र स्थान रहा। सत्रहवीं सदी के यूरोप में कला के अधिक अध्ययन के हेतु रोम जाना काफी प्रचलित हुआ था। 

सत्रहवी सदी के लगभग सभी ख्यातनाम चित्रकार उनके आश्रयदाता राजा द्वारा या कला अकादमी द्वारा अधिक अध्ययन के लिए रोम हो आये थे जहाँ चित्रकार काराच्चि व दोमेनिकिनो के अलावा रेफिल व माइकिलेंजेलो की कृतियों से अध्ययन किया जा सकता था। 

इसी कारण रुबेन्स, वुए. क्लोद लोरेँ, पुसँ ( निकोलस पुसिन), वेलास्केस आदि यूरोप के भिन्न देशों के कलाकारों की कृतियाँ भी वहाँ देखने को मिलती थीं व भिन्न प्रतिभा के कलाकारों को अपनी अभिरुचि के अनुसार अध्ययन सामग्री वहाँ उपलब्ध थी। 

स्थूल दृष्टिक्षेप से हम यूरोप के भिन्न देशों में निम्न प्रमुख बॅरोक चित्रकारों की गणना कर सकते हैं।

इटली में ग्विदो रेनी व ला फ्रान्को ने काराच्चि की परम्परा में काम किया। उसके पश्चात् अलौकिक प्रतिभा के धनी चित्रकार कारावद्ज्यो व तदनन्तर ग्वेचिंनो कावालिनो, फेति, ज्योर्दानो आदि बॅरोक चित्रकारों ने कला निर्मिति की।

फ्रांस में वुए, पुस ( निकोलस पुसिन) , लोरें व ल व्यू रे रेफील व काराच्चि का अनुसरण किया किन्तु हनें बन्धु व जार्ज द ला तुर ने कारावाद्ज्यो की शैली को अधिक उपयुक्त माना। 

फिलिप शाम्पेन्य व अन्य यथार्थवादी चित्रकारों ने डच कला को आदर्श मान कर उसका अनुसरण किया। फ्लैन्डर्स में रुबेन्स, योर्डान्स व वॅन डाइक ने कॅथोलिक पंथ से सम्बन्धित विषयों के चित्र बनाये।

हालैण्ड में, जहाँ प्राटेस्टंट पंथ अधिक प्रबल था, यथार्थ जीवन को काफी चित्रित किया गया जिसका दर्शन हमें फ्रांस हाल्स के व्यक्ति चित्रों, वर्मेर के गृहांतर्भागों के दृश्यों राइस्डाल के प्रकृति दृश्यों में होता है। 

इनेक अलावा हालैण्ड में रेम्ब्रांट जैसे विश्वविख्यात चित्रकार हुए जिन्होंने व्यक्तिचित्र, आत्मचित्र, धार्मिक चित्र, प्रकृति चित्र, एचिंग जैसी बहुविध कलानिर्मिति की।

स्पेन में रिबेरा, थुर्बारान, म्युरिलोवोलास्केस ने विशेष ख्याति अर्जित की। इस प्रकार बॅरोक कला समूचे यूरोप में बहुत प्रभावशाली हुई। 

रेम्ब्रांट वैन रिजन, सेल्फ-पोर्ट्रेट विथ टू सर्कल्स, 1665-1668, केनवुड हाउस, लंदन, यूके
रेम्ब्रांट वैन रिजन, सेल्फ-पोर्ट्रेट विथ टू सर्कल्स, 1665-1668, केनवुड हाउस, लंदन, यूके

इटाली की बॅरोक कला

इटाली के आनिवाले काराच्चि (1560-1609) व माइकिलेंजेलो कारावाद्ज्यो (1573- 1610) को बॅरोक चित्रकला के प्रणेता मानते हैं। उन दोनों के एक-दूसरे से अच्छे सम्बन्ध धे व दोनों इस विचार पर सहमत थे कि रीतिवाद की उलझन से इटाली की कला को करने के लिए ठोस कदम उठाना जरूरी है। 

किन्तु दोनों की कला शैलियों में कोई समानता मुक्त नहीं थी बल्कि उनकी अंकन पद्धति की भिन्नता एवं चित्रण की व्यक्तिगत विशेषताओं को देखते हुए विश्वास करना मुश्किल होता है कि वे दोनों एक ही शहर में कार्य करने वाले समकालीन चित्रकार थे।

1595 में रोम के कार्डिनल ओदो आर्दो फार्नेस ने आनिवाले काराच्चि को अपने महल की पहली मंजिल की वीथिका की साज-सज्जा करने के लिए बोलोन्या से बुलाया। 

इस कार्य में उनके भाई आगोस्तिनो व शिष्यों ने उनको सहयोग दिया। उनके द्वारा बनाये फ्रेस्को चित्रों के विषय थे प्राचीन देवताओं की प्रणय कथाएँ। 

चित्रण की आलंकारिकता पर कुछ सीमा तक रीतिवादी विशेषताओं की स्पष्ट छाप होते हुए उनमें नवीन सौन्दर्य तत्त्वों का प्रकटीकरण था। इन फ्रेस्को चित्रों में सत्रहवीं सदी की आरम्भकालीन चित्रकला के बीज प्रतीत होते हैं। 

इनके चित्रण में जैसा माइकिलेंजेलो के सिस्टीन प्रार्थनालय के छत चित्रों है। स्पष्टतया वास्तुशिल्पीय वातावरण के अन्तर्गत चित्रित काराच्चि की आकृतियों के का अनुसरण है वैसा प्राचीन शास्त्रीय कला की स्पष्टता के प्रभावोत्पादन का भी प्रयत्न मानवीय आकर्षण से दर्शक नाटकीय घटना में तद्रूप होता है। 

मानवीयता का तत्त्व कला के क्षेत्र में नया आविष्कार था इसमें कोई सन्देह नहीं है। वासारी के अनुसार रीतिवादी कलाकारों का प्रमुख उद्देश्य था ‘प्रतिभा का प्रदर्शन’ और उसी वजह से उनकी कला मिथ्याभिमान व अर्थहीन परम्परा विरोध के तत्त्व प्रबल थे। 

किन्तु काराच्चि ने महान प्राचीन परम्परा व अर्वाचीन आविष्कारों के प्रमुख कला तत्त्वों का प्रकृति के अध्ययन से समन्वय में था। उनकी विवस्त्र आकृतियों में शास्त्रीय कला के ठोसघन व सुबद्धता के तत्त्वों किया के अतिरिक्त आश्चर्यजनक नैसर्गिकता भी है जिसका इटाली के रीतिवादी कलाकारों की कृतियों में अभाव है। 

यह विचार उनके प्रकृति चित्रण पर भी लागू है। उनके ‘इजिप्त में पलायन’ जैसे प्रकृति दृश्य प्रधान चित्रों में उन्होंने प्राकृतिक दृश्यों के संयोजन की कल्पना को स्पष्टतया वेरोनोस व तिशेन के पृष्ठ भूम्यंतर्गत प्रकृति चित्रण से अपनाया है किन्तु उन्होंने उन दृश्यों को प्रकृति के प्रत्यक्ष अध्ययन से वास्तविक बनाया है। 

‘कुमारी मेरी का ईसा की मृत्यु पर विलाप’ यह चित्र आनिवाले के सबसे अच्छे व प्रतिनिधि चित्रों में से है। इससे पहले उन्होंने कोरेजो व वेनिशियन शैली का बहुत गहरा अध्ययन किया था। रोम में व रेफील की कला का अध्ययन कर चुके थे। 

चित्र में अवकाश का स्वाभाविक दर्शन है व आकारों में स्थायित्व है। आदर्श होते हुए मानवाकृतियाँ यथोचित भावनाओं से हृदयग्राही बन गयी हैं। सौम्य प्रकाश का प्रभाव स्वाभाविक है व मानवाकृतियों के आकर्षक अकन से मृत्यु की भयानकता इतनी तीव्र नहीं जान पड़ती। 

श्रेष्ठतम कलाकृतियों में से नहीं होते हुए भी चित्र निस्संदेह काफी प्रभावशाली बन गया है। यदि आनिवाले अपनी कला को तिपायी-चित्रण तक ही सीमित रखते तो अधिक अच्छा होता क्योंकि उनकी प्रतिभा भित्ति चित्रण के लिए इतनी अनुकूल नहीं थी व यह बात कार्डिनल के महल में बनाये गये उनके फ्रेस्को चित्रों से स्पष्ट हो जाती है।

कारावाद्द्भ्यो माइकिलेंजेलो अमेरिंगी दा ( 1573-1610 ) – जिस समय आनिवाले काराच्चि रोम में फार्नेस के महल के छत चित्रण में व्यस्त थे, कारावाद्ज्यो में अपने जन्म स्थान कारावाद्ज्यो से रोम आकर कला सर्जन आरम्भ किया। 

रोम आने के पहले उन्होंने मिलान में एक साधारण चित्रकार सिमोने पेतेर्सानो से नौसिखिया के रूप में कला की आरम्भिक तांत्रिक शिक्षा प्राप्त की थी। 

उनके रोम में किये कला कार्य में मुख्यतया रूपक कथाओं पर आधारित छोटे चित्र हैं जिसका उफ्फिजी संग्रहालय में रखा हुआ ‘बाकॅस’ उदाहरण है। 

इसमें निर्जीव वस्तुओं का चित्रण प्रभुत्वपूर्ण है। वाकॅस की आकृति का अंकन कुछ कठोर होते हुए भी दर्शन में आकर्षक है। परन्तु पृष्ठभूमि के चित्रण में योजना का अभाव है। 

आकृति की कोमल बाह्य रेखा व स्त्री सुलभ सर्वांग सुन्दरता कारावाद्यो की कला की विशेषताएँ थीं जिसके उनके चित्र ‘वीणा वादक’ व ‘विजयी प्रेम’ उदाहरण हैं। 

कारावाद्ज्यो के व्यक्तिगत चरित्र व उनकी कला में आत्यंतिक विरोधभास दिखाय देता है। उग्र प्रकृति के कारण उनका सम्पूर्ण जीवन दूसरों से या अधिकारियों से लड़ा झगड़े में बीता। कई बार उनको कारागृह भेजा गया जहाँ से प्राय: उनके किसी साथी चित्रका या अन्य ग्रभावशाली व्यक्ति के प्रयत्नों से उनको मुक्ति मिलती रही। 

1606 में उन्होंने किस झगड़े में एक व्यक्ति की हत्या की व स्वयं भी जख्मी हुए। वहाँ से भाग कर वे नेपल गये व वहाँ उन्होंने गिरजाघरों में चित्रण कार्य आरम्भ किया। 

अगले वर्ष के आरम्भ में उन्ही माल्टा में व्यक्ति चित्र व वेदिका चित्र बनाये। उसके बाद सेन्ट एंजेलो में सजा भोगते सम कारागृह से भाग कर वे सिसली गये जहाँ उन्होंने सिराकूस, मेसिना व पालेमों के गिरजाघ के लिए वेदिका चित्र बनाये। 

अगले वर्ष वे फिर नेपल्स लौटे। वहाँ हमले में वे इतने व तरह घायल हुए कि उसको मृत्यु की खबर रोम पहुँची। 1610 में वे जहाज से रोम के लिए रवाना हुए किन्तु भूल से फिर पकड़े गये व अपनी सब सम्पत्ति खो बैठे। 

निर्धन अवस्था में मलेरिया से पीड़ित होकर उनकी रास्ते में एक छोटे ग्राम में मृत्यु हुई। इस प्रकार के उनके असाधारण जीवनक्रम को देखने पर आश्चर्य होता है कि ऐसे व्यक्ति से धार्मिक विषयों के श्रेष्ठतम चित्रों की निर्मिति कैसे हुई। 

उनके चरित्र के घृणास्पद पक्ष को प्रकाशित करने वाले कुछ प्रमाण उनकी कलाकृतियों में जरूर मिलते हैं किन्तु उनमें ऐसे भी प्रमाण मिलते हैं जिनसे उनके स्वभाव की कोमलता, सहानुभूति व सच्ची धर्मनिष्ठा का भी परिचय होता है। 

स्वभावांतर्गत परस्पर विरोधी तत्त्वों के कारण उनकी कला में भी दर्शक नाटकीय अतिशयोक्ति को अनुभव करते हैं। घनत्वांकन व यथार्थ दर्शन उनकी शैली की मूलगामी विशेषताएँ हैं। 

अनलंकृत यथार्थ एवं आदर्शवाद की उपेक्षा के तत्त्व उनके आरम्भिक चित्र ‘संत मॅथ्यू की अन्त:प्रेरणा’ में स्पष्ट दिखायी देते हैं। यह चित्र अब नष्ट हो गया है। 

इस चित्र में संत मॅथ्यू को एक गठीले शरीर के किसान के समान चित्रित किया है व किताब पर रखे हुए उनके हाथ का पीछे से देवदूत संचालन कर रहा है। 

यह चित्र रोम के एक गिरजाघर के लिए बनाया था किन्तु चित्र की आदर्शहीन यथार्थता को देखकर धर्माधिकारियों ने आपत्ति की व उनको धर्माधिकारियों के निर्देशन के अनुसार फिर दूसरा चित्र बनाना पड़ा।

कारावाद्ज्यो प्रायः विषय वस्तुओं को अवलोकन के ऐसे समतल पर चित्रित करते जो जमीन के समानान्तर हो, जिससे दर्शक को दृश्य समीप के धरातल पर घटित हो रहा है जैसा यथातथ्य दिखायी देता है व उसके प्रति आत्मीयता का अनुभव करता है। 

सत्रहवीं सदी में बहुत लोकप्रिय हुए उनके चित्र ‘ईसा का दफन’ में उन्होंने इसी तरह के दृष्टिकोण को अपनाया है। अवकाश को महत्त्व न देने की उनकी प्रवृत्ति के कारण उनके चित्रों की पृष्ठभूमि में प्राकृतिक दृश्य का प्रायः अभाव रहता है। 

बाद में उन्होंने ‘लाजारस का उत्थान, ‘संत जॉन का शिरच्छेदन’ आदि कुछ चित्रों में अवकाश का कुछ सीमित प्रभाव चित्रित किया है इसमें कोई सन्देह नहीं है किन्तु उसके लिए उन्होंने पृष्ठभूमि में भवनों का चित्रण किया है जिससे चित्र में विशेष गहराई नजर नहीं आती। 

उन्होंने घनत्वांकन का जो क्रान्तिकारी प्रयोग आरम्भ किया व जिसके कारण वे विशेष ख्यातनाम हुए उसका ‘संत मॅथ्यू को आह्वान’ बहुत प्रभावी उदाहरण है। 

चित्रांतर्गत नाटकीय प्रकाश नैसर्गिक प्रकाश से पूर्णतया भिन्न व अलौकिक आभायुक्त है। ये सब प्रयोग यथार्थ अंकन, धरातल के समानान्तर समतल पर दृश्य की योजना, अग्रभूमि में विषयवस्तु का संयोजन, पृष्ठभूमि में गहराई का अभाव, नाटकीय प्रकाश का प्रभाव, विषय को अधिक मानवतापूर्ण बनाने व दर्शकों की दृश्य के प्रति आत्मीयता जागृत कराने के उद्देश्यों से किये गये थे व इसमें कारावाद्द्भ्यो कल्पनातीत सफल हुए। 

यही उनकी सबसे महान् उपलब्धि व बॅरोक कला को देन थी। ‘संत मॅथ्यू का आत्म बलिदान’, ‘संत पौल का मन परिवर्तन’, ‘कुमारी मेरी की मृत्यु’ उनके अन्य प्रसिद्ध चित्र हैं।

आनिबाले काराच्चि व कारावाद्ज्यो दोनों की कला ने सत्रहवीं सदी की कला का प्रभावशाली मार्गदर्शन किया। कारावाद्ज्यो की कोई चित्रशाला या शिष्य नहीं थे परन्तु उनको रोम में ख्याति प्राप्त होते ही उनका अनुकरण करने वालों संख्या बढ़ती गयी। 

उनकी शैली का प्रसार फ्रांस, जर्मनी, हालैण्ड तक हुआ। उनके अनुकरण करने वाले उनके व्यक्तिगत दृष्टिकोण की अपेक्षा उनकी शैली के घनत्वांकन, संयोजन जैसे आकर्षक तत्त्वों से प्रभावित थे। 

उन्हीं तत्त्वों का अनुसरण किया गया व कहीं उन तत्त्वों को धीरे-धीरे मोड़ देकर क्रियान्वित किया गया। ई.स. 1620 के पश्चात् कारावाद्ज्यो की शैली का प्रभाव कम होता गया।

आनिवाले काराच्चि ने बोलोन्या में कला संस्था स्थापित करके प्रशिक्षुओं का मार्गदर्शन किया व रोम में कई अच्छे चित्रकार उनके अनुयायी थे जिनको उन्होंने शिष्य या सहायक के रूप में स्वीकार कर चित्रकला में प्रशिक्षित किया। 

इटली की बॅरोक कला का विकास इन्हीं चित्रकारों द्वारा अग्रिम बीस-पच्चीस वर्षों में किया गया।

दोमेनिकिनो

दोमेनिकिनो (1518-1641) आरम्भ में लुदोविको काराच्चि के सहायक थे। 1602 में रोम जाकर उन्होंने फार्नेस के महल के छत चित्रण में आनिवाले काराच्चि की सहायता की। 

अग्रिम 20 वर्षों में उन्होंने जो चित्रण किया उसमें आरम्भिक काल के चित्र आनिवाले से भी अधिक शास्त्रीयतापूर्ण हैं किन्तु उत्तरकाल के चित्रों में अधिक गतित्व है। 

यह बात उनके चित्र ‘संत अँड्रयू को प्राणदंड’ (1608-10) व उसी शीर्षक का अन्य चित्र जो 1622- 28 में उन्होंने बनाया उनकी तुलना करने से स्पष्ट हो जाती है।

दोमेनिकिनो के प्रतिस्पर्धा के रूप में ‘ज्योवान्नि लाफ्रान्को’ (1582-1647 ) ख्यातनाम हुए। वे शीघ्र ही अग्रगामी चित्रकार हुए व स्वतंत्र रूप से किये उनके कलासर्जन में रंगांकन प्रभुत्व व मौलिकता के गुण हैं।

दोमेनिकिनो के समकालीन चित्रकारों में एक विख्यात चित्रकार थे ग्विदो रेनी जो ग्विदो नाम से भी प्रसिद्ध थे (1575-1642), जिनको दोमेनिकिनो अपने से श्रेष्ठ मानते थे। 

बोलोन्या में काराच्चि के निर्देशन में कार्य करने के पश्चात् वे रोम चले गये। कारावाद्द्भ्यो से नाटकीय प्रकाश प्रभाव को अपनाने के बाद उन्होंने दोमेनिकिनो से भिन्न शैली को विकसित किया। 

उनके फ्रेस्को चित्र ‘संत अँड्रयू का बलिदान’ व ‘आरोरा’ उनकी व्यक्तिगत शैली के उत्कृष्ट उदाहरण हैं, जिनमें सर्वव्यापी लय व गतित्व के अन्तर्गत प्रत्येक आकृति गौण प्रतीत होती है यद्यपि प्रत्येक आकृति का अंकन सूक्ष्म अध्ययन व बारीकियों के साथ किया है। 

यह बॅरोक शैली की एक विशेषता है। 1622 में बोलोन्या वापस आने के बाद के उनके चित्रों में बॅरोक शैली के गतित्व, नाटकीय प्रकाश व यथार्थता के गुणों से शास्त्रीय आदर्श सौन्दर्य को अधिक महत्त्व दिया गया है। 

इन चित्रों में आकर्षक रंग योजना है व कहीं भी कोई आकृति टूटी हुई या सार्वभौम लय से विभक्त नहीं दिखायी देती ।

विदो रेनी की मृत्यु के बाद इटली में बॅरोक शैली का प्रसार करने का कार्य ग्वेर्चिनो (1591-1666) ने किया। 

ये लुदोविको काराच्चि के शिष्य थे। वेनिस के चित्रकारों के समान आकर्षक रंग संगति व सतह की बुनावट उनको विशेष प्रिय थीं एवं वे छाया प्रकाश में तीव्र विरोध रखते थे। 

1621 में रोम आने से पहले उन्होंने कई वेदिका चित्र बनाये जो उनके गुरु काराच्चि की शैली के अनुसार थे किन्तु इतने सामर्थ्यपूर्ण व सजीव बन गये थे जैसे काराच्चि द्वारा बनाये जाना असम्भव था। ‘कौए द्वारा एलिजा को भोजन खिलाना’ उनके आरम्भिक काल का प्रतिनिधि चित्र है। 

भवन लुदोविसी की छत पर बनाया फ्रेस्को चित्र उनकी सबसे सुन्दर कृति है। छत पर बनाये होते हुए ऐसे लगता है कि भवन के बाहर का दृश्य दिखायी दे रहा है। 

रंगों की चमक, ताजगी, छटाओं का समूचित प्रयोग तथा मुक्त हस्त चित्रण आदि गुणों से परिपूर्ण इस चित्र का प्रभाव अद्भुत है। दिन व रात के प्रतीक रूप में बनायी आकृतियाँ मानो सोत्साह भवन में प्रवेश कर रही हैं। 

चित्रित अवकाश ने भवन को प्राकृतिक आकाश की गहराई व विशालता प्रदान की है। (चित्र 61) उसी काल में बनाया उनका वेदिकाचित्र ‘संत पेत्रोनिला का दफन’ उनकी एक अन्य श्रेष्ठ कृति है।

ओराजियो जेन्तिलेस्की (1596-1669) ने कारावाद्ज्यो की यथार्थता को अपनाकर इसे धार्मिक चित्र बनाये किन्तु उनमें कारावाद्ज्यो जितना छाया प्रकाश का विरोध नहीं बहुत है व अधिक ठंडे रंगों का प्रयोग है। 

‘इजिप्त में पलायन’ व ‘दो महिलाएँ’ ये चित्र उनकी शैली के प्रतिनिधि चित्र माने जा सकते हैं जिनमें निर्भीक यथार्थ चित्रण है। 

बर्नादो कावालिनी (1622-54) कारावाद्ज्यो के अनुयायी थे किन्तु लालित्य व रमणीयता के प्रति अधिक रुचि होने के कारण उनके चित्रों में वह कारावाद्ज्यो की स्वाभाविकता नहीं है।

इटाली की बॅरोक कला की कृतियों में बहुत से छत पर बनाये फ्रेस्को चित्र हैं जो प्राकृतिक आकाश का आभास निर्माण करते हैं। 

धार्मिक भावनाओं को ओत-प्रोत करने के विचार से हो या अलंकरण के उद्देश्य से हो इस तरह का आकाश का दृष्टिभ्रमोत्पादक चित्रण बॅरोक कला की विशेषता था।

इटाली की बॅरोक शैली पिएत्रो दा कोर्तोना (1590-1669) की कला में चरमोत्कर्ष तक पहुँची। वास्तुकार के रूप में वे बर्निनी के समान श्रेष्ठ नहीं थे किन्तु साज-सज्जा के लिए वे बहुत ख्यातनाम थे। 

कोर्तोना के आरम्भिक काल के सांता विवियाना के गिरजाघर में बनाये फ्रेस्को चित्रों पर प्राचीन शास्त्रीय शैली का प्रभाव है, फिर भी अंकन पद्धति दोमेनिकिनो से अधिक मुक्त व व्यापक है एवं संयोजन में अधिक सामर्थ्य है। 

बर्निनी के सम्पर्क से उनकी कला के विकास में सहायता मिली। उनके चित्र ‘सेबाइन्स का अपहरण’ (1629) अधिक सजीव है व उसकी आकृतियों में मूर्तियों का ठोसपन है। 

पालाज्जो बार्बेरिनी की छत पर बनाये चित्र उनकी सर्वश्रेष्ठ कृति हैं व उसमें अवकाश व वातावरण का यथार्थ प्रभाव कोर्तोना के सबसे श्रेष्ठ अनुयायी थे ल्युका ज्योर्दानो (1632-1705 ) जिन्होंने कोर्तोना के समान विशाल भित्ति चित्र बनाये। 

उनके आरम्भिक कार्य पर कारावाद्ज्यो व रिवेरा का प्रभाव था। इसके अलावा वेनिस के चित्रकारों की सुन्दर रंग संगति को भी उन्होंने अपनाया।

स्पेन की बॅरोक कला

इटाली की बॅरोक कला से प्रभावित होते हुए स्पेन में विकसित बॅरोक कला में प्रादेशिक सांस्कृतिक विशेषताओं के कारण कुछ ऐसे अभिज्ञेय व तौलनीय तत्त्व हैं जिनसे उसकी पृथक् पहचान सरल हो जाती है। स्पेन की बॅरोक कला के प्रथम चित्रकार थे

फ्रांथिस्को रिबाल्टा जिनके चित्रों में छाया प्रकाश के तीव्र विरोध के जरिये आकृतियों को मूर्तिसमान घनत्व प्रदान किया है। रिबाल्टा सोलहवीं सदी के वेनिस के चित्रकार सेवास्ति आनी दि पिआम्बो से प्रभावित थे व उन्होंने पिआम्बो के चित्रों की नकलें भी की थीं। 

घनत्वांकन के विचार से रिवाल्टा की कला कारावाद्ज्यो की कला से काफी समरूप है यद्यपि कारावादस्यां की भावाकुलता की जगह उसमें सात्त्विक निष्ठा का दर्शन होता है। 

रिबाल्टा केवल प्रादेशिक ख्याति अर्जित कर सके जबकि होसे डि रिबेरा (1591-1652) जिन्होंने शायद इटली जाने से पहले रिबाल्टा से आरम्भिक शिक्षा प्राप्त की होगी, अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति के चित्रकार हुए। 

रिबेरा के आरम्भिक जीवन काल की बहुत कम जानकारी प्राप्त हुई है। 1619 के पश्चात् वे इटली में प्रथम लोम्बार्दी गये। बाद में वहीं से पार्मा व उसके बाद रोम गये जहाँ ये सबसे अधिक कारावाद्ज्यो की कला से प्रभावित हुए। 1616 में वे नेपल्स में बस गये व अन्त तक वहीं कार्य करते रहे। उन्होंने कई सम्मान प्राप्त किये। 

1626 में वे रोम की सेंट ल्यूक अकादमी के सदस्य बने व लगातार नेपल्स में नियुक्त स्पेन के वाइसराय के दरबारी चित्रकार रहे। कारावाद्ज्यो के तीव्र छाया प्रकाश व यथार्थ का अनुसरण होते हुए रिवेरा की शैली में मौलिक अंकन पद्धति का अंतर्भाव है। 

रंगों की ठोस परतों से उन्होंने आकृतियों को उभारा है व तूलिका संचालन के द्वारा चित्र-क्षेत्र को हल्की व आकर्षक बुनावट प्रदान की है। रिबेरा की कला का सबसे बड़ा विरोधाभास है पूर्ण यथार्थ आकारों द्वारा निर्मित पारमार्थिक भाव या गहरी मानव भावनाओं का दर्शन। 

उनके मठवासी व हुतात्मा हूबहू ग्रामीण किसानों के समान गठीले शरीर के मानव जैसे चित्रित किए हुए होते हुए भी पारमार्थिक आनन्द में मग्न दिखायी देते हैं। 

रिबेरो ने कारावाद्ज्यो के घनत्वांकन को रूपांतरित करके न केवल जगमगाया बल्कि उसको अन्धकारपूर्ण अवकाश की गहरी गूढ़ता व प्रशांति के गुणों से सचेत बनाया जो गुण कारावाद्ज्यो के चित्रों में किंचित् ही दिखायी देते हैं। 

इन गुणों का विकास बहुत ही सरलता व सादगी के साथ चित्र ‘गडेरियों की आराधना’, ‘पश्चातप्त मॅग्दालीन’ व ‘संत बार्थोलोम्यू का आत्म-बलिदान’ में किया हुआ है (चित्र 15)। ‘पवित्र त्रयी’ यह चित्र अलौकिकता से ओत-प्रोत है। 

रिबेरा की कला ने न केवल नेपल्स के कलाकारों को प्रभावित किया बल्कि स्पेन में भी उनकी कला की प्रशंसा हुई व उनको अनुयायी मिले। शिष्यों व अनुयायियों में से ज्योर्दानो की कला गुणों की दृष्टि से उनके सबसे निकटवर्ती है। 

उस समय की बॅरोक चित्रकला में सबसे अधिक धार्मिक चित्रण स्पेन के जिन चित्रकारों ने किया उनमें फ्रान्थिस्को डि थुबरान सर्वश्रेष्ठ हैं (1598- 1664)। थुर्वारान की कलानिर्मिति अधिकतर पंथनिष्ठ मठाधिपतियों के आश्रय में हुई। 

उन पर मिग्वेल डि मॉरिनास जैसे निवृत्तिवादी लेखकों के विचारों का प्रभाव था। इन धर्मांदोलन विरोधियों का पक्का विश्वास था कि एकनिष्ठ भक्त की आत्मा व ईश्वरीय वाणी में संवाद सम्भव है। 

इस प्रकार के धार्मिक या अन्य बाह्य उद्देश्य से प्रेरित कलाकार की कृतियों में हम उन्मुक्त तूलिका संचालन या अंकन पद्धति के प्रभुत्व का प्रदर्शन जैसे व्यक्तिवादी गुणों की अपेक्षा नहीं कर सकते व ऐसे चित्रकार शायद ही कलाकृति के रंग सौन्दर्य या अन्य इन्द्रिय ग्राह्य तत्त्वों के विकास की ओर विशेष अधिक ध्यान देते। 

थुर्बारान के कलात्मक व्यक्तित्व पर भी निवृत्तिवादी विचारों का प्रभाव-सा प्रतीत होता है। वस्त्रों के पोत या वस्तुओं के यथार्थ रूप को गौण स्थान देकर उन्होंने वातावरण की गम्भीर सात्विकता की ओर अधिक ध्यान दिया है। 

वस्तुचित्रण में भी उन्होंने वस्तुओं को दिव्य श्रेष्ठत्व प्रदान करने के प्रयत्न किये हैं। अवकाश में गहराई का आभास या मानवाकृतियों में गतित्व निर्माण करने के लिए वे प्रयत्नशील नहीं रहे। 

कई चित्रों में उन्होंने मानवाकृतियों को समतल गहरे रंग की पृष्ठभूमि पर चित्रित किया जिससे वे स्पष्ट रूप से उभरती हैं। उनके चित्र ‘संत बेनेडिक्ट का दिव्य ”दर्शन’ में ऊपरी हिस्से में चित्रित स्वर्ग के दृश्य में दिव्यत्व की झलक है परन्तु पृष्ठभूमि के वास्तुचित्रण में यथार्थता का अभाव है। 

उनकी रंग योजना की सादगी 15वीं सदी की डच कला के अध्ययन से प्राप्त की गयी हो सकती है जिसकी कृतियों से वे स्पेन के संग्रहालयों में परिचित हुए थे। 

जब उन पर सेविल, माड्रिड, ग्वादालुपे व अन्य बड़े शहरों में चित्रण करने का कार्य सौंपा गया था तब वे अपने जीवनकाल में काफी ख्याति प्राप्त कर चुके थे। 

उनकी मृत्यु के उपरान्त कला क्षेत्र को उनका विस्मरण हुआ। किन्तु 20वीं सदी में उनकी कला की महानता की फिर से पहचान होकर, स्पेन के श्रेष्ठ चित्रकारों में उनकी गणना होने लगी।

वेलास्केस | Diego Velazquez

डिएगो वेलाज़क्वेज़, द रोकेबी वीनस, 1647-1651, नेशनल गैलरी, लंदन, यूके
डिएगो वेलाज़क्वेज़, द रोकेबी वीनस, 1647-1651, नेशनल गैलरी, लंदन, यूके

वेलास्केस (1599-1660) की कला ने न केवल स्पेन के बल्कि समूचे यूरोपीय कला के इतिहास में उनको एक विशेष महत्त्वपूर्ण स्थान दिलाया है। निस्संदेह उनके मौलिक कला व्यक्तित्व से प्रकट हुई असाधारण कलानिर्मिति की तुलना किसी अन्य कलाकार की कला से नहीं की जा सकती।

वेलास्केस का जन्म सेविल में हुआ। फ्रांथिस्को हेरेरा के कार्यकक्ष में तक आरम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे कुशल चित्रकार फ्रान्सिस्को पाचेको के कार्य कुछ समय कक्ष में नौसिखिया हो गये। पाचेको के संग्रह में यूरोपीय चित्रकारों के उत्कृष्ट रेखाचित्र व छाप चित्र थे जिनके अध्ययन से वेलास्केस को भिन्न यूरोपीय शैलियों का ज्ञान हुआ। 

कारावाद्ज्यो की कला ने वेलास्केस को सबसे अधिक प्रभावित किया। 1618-1619 में विद्यार्थी अवस्था में चित्रित की गयी उनकी कृतियाँ ‘अण्डे तलते हुए महिला’, व ‘मेरी मार्था के घर में ईसा’ घरेलू दृश्य चित्र जैसे उत्कृष्ट यथार्थवादी चित्र हैं। 

इन चित्रों में वेलास्केस ने कारावाद्ज्यो के छाया प्रकाश के तीव्र विरोध को सौम्य रूप दिया है जिससे दृश्य अधिक वास्तविक दिखायी देते हैं। मानवाकृतियों व आसपास के वातावरण में प्रशान्ति व विचारशील गाम्भीर्य है जो थुर्वारान की कला का स्मरण दिलाते हैं। 

1619 में बनाया उनका चित्र ‘पानी ढोने वाला’ शांतिपूर्ण वातावरण की दृष्टि से और अधिक मनोहर बन गया है। केन्द्र स्थान में चित्रित कांच के प्याले में स्वच्छ पारदर्शक पानी है और पानी वाले व लड़के के हाथों से संलग्न प्याले द्वारा दोनों में आत्मीयता का भाव पैदा किया है। 

अग्रभूमि में रखे हुए तेज प्रकाशित पानी के घड़े को पानी वाले का बायां हाथ स्नेह से दुलार रहा है। नियंत्रित सादगी के साथ व्यक्त की गयी ओत-प्रोत भावनाओं के सूक्ष्म दर्शन से यह चित्र घरेलू दृश्यों के चित्रों में एक पृथक स्थान रखता है। 

सेविल के निवास के अंतिम वर्षों में वेलास्केस ने कई धार्मिक चित्र बनाये जिनमें शैली का स्पष्ट परिवर्तन है। ‘निष्कलंक धारणा’ व ‘पेटमास में संत जॉन’ इन चित्रों में पहले के यथार्थवादी चित्रों के गहरे एवं भूरे रंगों की जगह अब हल्के विरोधयुक्त जामुनी, नीले व गुलाबी रंगों की कोमल झलकों से युक्त रमणीय प्रभाव को, अधिक निर्भीक तूलिका संचालन के साथ अंकित किया है।”

1623 में वेलास्केस माड्रिड गये जहाँ उनके राजा फिलिप चतुर्थ के व्यक्ति चित्र की बहुत प्रशंसा होकर उनकी राजदरबार में नियुक्ति हुई। 

वहाँ का वातावरण उनकी कला के लिए पोषक रहा व उनको राजमहल में संगृहीत इटली के महान चित्रकारों की चुनी हुई कृतियों का अध्ययन करने का अवसर प्राप्त हुआ। 

अग्रिम छह वर्षों में बनाये उनके व्यक्ति चित्रों पर तिशेन द्वारा बनाये स्पेन के राजघराने के व्यक्ति चित्रों का प्रभाव है। किन्तु इसी काल के उनके चित्र ‘शराबी’ पर कारावाद्ज्यो, तिशेन रिबेरा व रुबेन्स का सम्मिश्रित प्रभाव प्रतीत होता है। 

गतित्व व हास्योल्लास के जो नये तत्त्व वेलास्केस के इस चित्र में हैं वे प्राय: उन्होंने रुबेन्स से अपनाये होंगे क्योंकि इसी समय रुबेन्स स्पेन आये थे व उन्होंने आठ महिनों तक वेलास्केस के कार्य कक्ष का उनके साथ उपयोग किया था। 

रुबेन्स का माड्रिड में आगमन राजनीतिक कारण से हुआ था किन्तु वहाँ आते ही उन्होंने बहुत से चित्र बनाने का निश्चय करके राजघराने के सदस्यों के व्यक्ति चित्र बनाये व तिशेन व रेफिल के चित्रों की अनुकृतियाँ कीं । 

रुबेन्स के व्यक्तित्व, उनकी चित्रित आकृतियों के ऐंद्रिय आकर्षण की परिपक्वता व मनोहारिता एवं रुबेन्स की अंकन पद्धति की विविधता से वेलास्केस प्रभावित हुए। 

रुबेन्स की सलाह से ही शायद वेलास्केस 1629 में इटली गये, जहाँ उन्होंने तिंतोरेत्तो, ग्वेर्चिनो, माइकिलेंजेलो, रेफिल व रिबेरा के चित्रों का एक साल तक अध्ययन किया। 

इस अध्ययन से उनकी अंकन पद्धति अधिक कुशलतापूर्ण व निर्भीक हुईं तथा उनको छाया-प्रकाश व अवकाश के प्रभाव के चित्रांतर्गत महत्त्व का ज्ञान हुआ। 

1634 में बनाये उनके व्यक्ति चित्र ‘घोड़े पर सवार ओलिवारेस’ में न केवल तिशेन जैसी कुशलता है बल्कि उसमें वस्त्रों पर अंकित प्रकाश अधिक सतेज दिखायी देता है। 

इनके प्रसिद्ध चित्र ‘ब्रेडा का आत्म-समर्पण’ (1635) के भव्यता व उत्कृष्टता के गुण वेरोनीस के अध्ययन से प्राप्त हुए हो सकते हैं। किन्तु उनके चित्र ‘फिलिप चतुर्थ’ व ‘बालक बाल्यासार कार्लोस ‘ उनकी कला की मौलिकता व परिपक्वता के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। 

1636 से 1648 तक राजा से सौंपे गये राजनीतिक कार्यों में व्यस्त होने से वे विशेष चित्रण नहीं कर पाये किन्तु इस काल में भी उन्होंने ‘ईसाप’ व ‘मंगल’ के चित्र एवं दरबारी बौनों व मजाकियों के चित्र बनाये जिनमें बाह्य रूप के यथार्थ दर्शन के अतिरिक्त मानव भावनाओं की परिणामकारक अभिव्यक्ति है। 

1649-51 में राजा के लिए चित्र व मूर्तियाँ खरीदने के लिए वे इटली में रहे। वहाँ उन्होंने कई उत्कृष्ट चित्र बनाये जिनमें ‘पोप इनोसंट दशम’ का व्यक्ति चित्र है जिसकी बॅरोक कालखण्ड के श्रेष्ठतम व्यक्ति चित्रों में गणना की जाती है। 

इस चित्र में अप्रतिम अंकन कौशल के अतिरिक्त तुनक मिजाज, अहंमन्य व चंचल स्वभाव पोप के व्यक्तित्व की प्रभावी अभिव्यक्ति है। इस चित्र की तुलना में रोम में मेदिची बगीचे के के बनाये दो प्रकृति चित्र कोमल मनोहारिता की दृष्टि से विरोधपूर्ण हैं। 

सौम्य रमणीय रूपरंग व प्रसन्न मन्दगति रेखा से अंकित आकृति लावण्य से युक्त उनका चित्र ‘वीनस व कामदेव’ संसार की श्रेष्ठ कलाकृतियों में से है। 

माड्रिड लौटने के बाद राजकीय कार्यों में व्यस्त रहने के कारण अपनी आयु के अंतिम 9-10 वर्षों में वे केवल दर्जन के करीब चित्र बना पाये किन्तु उस काल में उनकी कुछ श्रेष्ठ कृतियों का निर्माण हुआ जिनमें उनका चित्र ‘राजकुमारी व दासियाँ’ सर्वश्रेष्ठ माना गया है। 

इस चित्र में राजमहल के एक भव्य कक्ष में बालिका राजकन्या मार्गारिटा को किश्ती में रखी हुई शीशी में कुछ चीज को प्रस्तुत करते हुए व अभिवादन करते हुए दासियों को चित्रित किया है। 

दासियों की मुद्राओं में स्नेह व स्वाभाविकता है व कहीं भी छाया चित्रों में प्रायः दिखायी देने वाली औपचारिकता नहीं है। एक बच्चे ने बैठे हुए कुत्ते पर पाँव रखा है, पृष्ठभूमि में दो व्यक्ति बातचीत में व्यस्त है, कंचुकी ने पर्दा उठाया है व स्वयं चित्रकार चित्र बना रहा है। 

राजमहल में सर्वसाधारण दैनंदिन प्रसंग का यह बहुत ही स्वाभाविक चित्रण है। इस प्रसंग पर प्यार भरी नजरों से देखते हुए राजा व रानी के धुंधले प्रतिबिम्बों को टंगे हुए शीशे में चित्रित करके चित्रकार ने समूचे वातावरण को पारिवारिक आत्मीयता से ओतप्रोत कर दिया है। 

इस प्रकार के गैर महत्त्व के घरेलू प्रसंग का चित्रण करना उस समय एक अनोखी बात थी। पारिवारिक कोमल भावनाओं के हृदय स्पर्शी दर्शन के अतिरिक्त इस चित्र में गृहांतर्गत सौम्य प्रकाश व उसके पृष्ठभूमि में होते गये क्रमिक परिवर्तन को बहुत ही कुशलता से अंकित किया है जैसा अब तक किसी चित्रकार ने नहीं किया था। 

प्रकाश के प्रभाव की दृष्टि से यह चित्र डच गृहांतर्भागों के चित्रों की श्रेणी में आता है। कुशल संयोजन, आकर्षक सौम्य रंग संगति, छाया व प्रकाश के क्षेत्रों में भिन्न रंगों की छटाओं का मधुर संचालन, आकृतियों का कहीं स्पष्ट तथा कहीं कोमल अस्पष्ट किन्तु सही रेखाओं द्वारा यथोचित अंकन आदि कलात्मक गुणों से यह चित्र अप्रतिम है। 

उनका एक अन्य चित्र ‘कातने वालियां’ जिसमें दीवार पर्दों के कारखाने में स्त्रियों को सूत कातते हुए एवं बुनते हुए चित्रित किया है, गृहांतर्गत दृश्यों के चित्रों के वर्ग में आता है और परिणाम के विचार से उतना ही स्वाभाविक व श्रेष्ठ बन गया है। 

अंतिम वर्षों के वेलास्केस के राजघराने के शिशुओं के चित्र वात्सल्य व मानवीय आकर्षण से परिपूर्ण हैं। वेलास्केस ने धार्मिक विषयों पर बहुत कम चित्र बनाये व वे उनके सर्जन कार्य में विशेष रुचि नहीं रखते थे यद्यपि उनके चित्र ‘ईसा का क्रूसारोपण’ व ‘कुमारी मेरी का अभिषेक’ सुनियंत्रित भावाभिव्यक्ति के उत्कृष्ट उदाहरण हैं।

वेलास्केस के विपरीत, स्पेन के चित्रकार म्युरिलो ने (1618-82) अधिकतर धार्मिक विषयों के चित्र बनाये। उनका जन्म सेविल में हुआ व उन्होंने आजीवन वहीं व्यवसाय किया। 

1640 से 45 तक के उनके आरम्भिक काल में उनकी कलानिर्मिति में मुख्य रूप से थुर्वारान व रिबेरा का अनुसरण है। सेविल के फ्रान्सिस्कन मठ में बनाये संत फ्रान्सिस के जीवन पर आधारित नके 11 चित्रों से उनको ख्याति प्राप्त हुई। 

इन चित्रों का दृश्य रूप नाटकीय व समकालीन जैसा है। घनत्वांकन से उभारित आकृतियों में स्वाभाविक मुद्राभिनय व भावोत्कटता है। 

उत्तर काल में बनाये निर्धन बच्चों व फूलवालियों के चित्रों के भाव दर्शन में कुछ कृत्रिमता आ गयी है, परन्तु भिन्न सौम्य रंगों की छटाओं की विविधता, कोमल तूलिका संचालन एवं उष्म वातावरणीय प्रभाव के गुणों से चित्र आकर्षक बन गये हैं। 

उनके प्रसिद्ध चित्र ‘काना का विवाहोत्सव’ के संयोजन व रंग लालित्य को वेरोनीस के अध्ययन का परिणाम माना जा सकता है। 

बॅरोक कालखण्ड के स्पेन के उपर्युक्त श्रेष्ठ चित्रकारों के अतिरिक्त कानो, पेरेडा, वाल्डेस लील ये चित्रकार भी काफी ख्यातनाम थे।

फ्रेंच बॅरोक कला

फ्रांस में बॅरोक कला का प्रसार कुछ देर से व कुछ परिवर्तित रूप उसमें शास्त्रीय कला के तत्त्वों पर अधिक बल दिया गया।

चित्रकार ल वालान्तं, कारावाद्ज्यो ( Caravaggio, Bacchus )के सबसे पहले फ्रेंच अनुयायी थे किन्तु उन्होंने अपना सम्पूर्ण कार्यकाल रोम में बिताया व उनकी कला का फ्रेंच कला पर शायद ही कुछ प्रभाव पड़ा होगा। 

Caravaggio, Bacchus, 1595, Uffizi गैलरी, फ्लोरेंस, इटली
Caravaggio, Bacchus, 1595, Uffizi गैलरी, फ्लोरेंस, इटली

फ्रेंच कला को बेरोक शैली की ओर मोड़ देने का कार्य मुख्यतया कुछ द्वितीय श्रेणी के फ्रेंच चित्रकारों ने किया जिनमें क्लोद विन्यो नाम के एक चित्रकार थे। 

विन्यो 1616-24 तक रोम में रहे जहाँ वे कारवाद्ज्यो के यथार्थवाद से परिचित हुए किन्तु उनकी कला पर सबसे अधिक प्रभाव आडाम एल्शायमेर व उनके डच शिष्य पीटर लास्टमन का हुआ। 

सिमों वुए की कला ने फ्रेंच कला के विकास को सुनिश्चित रूप से मार्गदर्शन किया। समीपवर्ती एशियाई देश व इटली की यात्रा करके वे 1627 में वापस फ्रांस आ गये। 

अन्त तक उन्होंने पेरिस में रहकर चित्रकारी की व वहाँ के प्रमुख चित्रकारों में उनकी गणना हुई। पेरिस के गिरजाघरों व मठों के लिए वुए ने कई वेदिका चित्र बनाये जो बॅरोक शैली से मिलते-जुलते हैं। 

उन पर मुख्यतया रोमन चित्रकार लाफ्रान्को व ग्वेर्चिनो का प्रभाव है यद्यपि उन्होंने वीनस के चित्रकारों का अनुसरण करके चमकीले रंगों का प्रयोग किया है। में हुआ और

बॅरोक शैली से प्रभावित अन्य फ्रेंच चित्रकारों में से जार्ज द ला तुर विशेष प्रसिद्ध हैं व उनकी कृतियाँ धार्मिकता व कृत्रिम प्रकाश के प्रभाव के विचार से विशेष अभ्यसनीय हैं। 

वे शायद कभी रोम की यात्रा करके कारावाद्ज्यो के शिष्य ल वालान्तँ या बार्तोलोमियो मानफ्रेदी के सम्पर्क में आ गये होंगे। किन्तु उनके 1630 के करीब बनाये चित्र कारावाद्ज्यो के डच अनुयायी हान्थार्स्ट व टब्यूर्गन की चित्र शैली से अधिक मिलते-जुलते हैं। 

मोमबत्ती के प्रकाश से युक्त उनके धार्मिक चित्र ‘बढ़ई संत जोसेफ’, ‘संत सेबास्टियन’ व ‘जन्मोत्सव’ कारावाद्ज्यो के समान यथार्थतापूर्ण होते हुए उनमें मौलिक विचारशीलता व वातावरणीय गाम्भीर्य है। 

पृष्ठभूमि में बारीकियों का अभाव है व विस्तृत क्षेत्रों की योजना से सरलीकरण करके दृश्यों को धार्मिकता से ओत-प्रोत बनाया है जो प्रभाव समाकलीन डच या इटली के चित्रकारों की कला से भी स्पेन के चित्रकार धुर्बारान की कला में अधिक पाया जाता है ।

चित्रकार लुई ल नें व उनके भाई आंत्वान व मात्यु की कला पर भी समकालीन डच व इटली की कला का असर है। तीनों का जन्म लीओं में हुआ व 1630 के करीब तीनों पेरिस में चित्रकारी करते थे। 

उनमें से लुई ल नें सम्भवतः रोम की यात्रा कर चुके थे व वहाँ उन्होंने चित्रकार काम्बोच्चिओ के किसानों व समाज के सामान्य स्तर के लोगों के दैनंदिन जीवन के चित्र देखे होंगे। 

1640 के करीब किसानों के जीवन के चित्रों के लिए लुई ल नें ख्यातनाम हुए। उनके चित्रों में फटे-पुराने कपड़े पहने हुए किसान परिवारों का बहुत ही सहानुभूतिपूर्ण चित्रण है। 

प्रकाश व वातावरण का यथार्थ प्रभाव अंकित करने में वे विशेष निपुण थे। स्थायी भाव पर विशेष बल देने से उनके संयोजन शान्तिपूर्ण परन्तु कुछ गतिहीन से प्रतीत होते हैं। आकृतियाँ यथार्थवादी होते हुए उनमें कुछ शास्त्रीयता की झलक है। 

उनका प्रसिद्ध चित्र ‘लोहार की दुकान’ पौराणिक विषय के ‘रोमन अग्नि देवता’ के चित्रों का स्मरण दिलाता है यद्यपि इस चित्र का प्रसंग समकालीन किसान जीवन से चुना गया है। 

इस चित्र की तुलना वेलास्केस के प्रसिद्ध चित्र ‘अग्नि देवता की भट्टी’ से करना बोधप्रद होगा। वेलास्केस के स्वाभाविक व गतिपूर्ण अंकन में कथनात्मक सामर्थ्य है जिसका ल में के चित्र में अभाव हैं, किन्तु ल नें के चित्रान्तर्गत प्रकाश का प्रभाव व विस्तृत प्रकाश क्षेत्र की कुशल योजना से आकृतियों को सुगठित करने का संयोजन कौशल विशेष सराहनीय है।

एक अन्य फ्रेंच बॅरोक चित्रकार थे फिलिप द शाम्पेन्य जिनका जन्म ब्रसल्स में हुआ था व जिनकी कला पर रुबेन्स का काफी प्रभाव था जिसका ‘मजूसियों की आराधना’ स्पष्ट उदाहरण है। 

उनके आरम्भकालीन ‘कार्डिनल रिशल्यू’ जैसे व्यक्ति चित्र वॅन डाइक के व्यक्ति चित्रों से मिलते-जुलते हैं। डच कला से प्रभावित होते हुए शाम्पेन्य के व्यक्ति चित्र स्पष्टता, भाव गम्भीरता व चिकना तूलिका संचालन आदि गुणों से विशेषतापूर्ण हैं। श्रेष्ठ चित्रकार होने पर भी समकालीन फ्रेंच चित्रकार पुगेँ के सामने वे अपनी योग्यता के अनुरूप ख्याति प्राप्त नहीं कर पाये।

बॅरोक शैली द्वारा शास्त्रीयतापूर्ण चित्रण करके पुसँ ने (1594-1665) न केवल फ्रांस में बल्कि समूचे यूरोप में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त किया। 

नामंदी के अपने गाँव को छोड़कर पुस, अध्ययन के लिए प्रथम रूओं व उसके पश्चात् पेरिस गये जहाँ वे 1612 से 1624 तक रहे। इस कालावधि के अन्त में उन्होंने चित्रकार द्युशेन के साथ ल्युक्सेम्बुर महल के अलंकरण का कार्य किया। 

1624 में रोम जाने के बाद वे दोमेनिकिनो की कला से बहुत प्रभावित हुए। उनके चित्र ‘डेविड की विजय’ की पृष्ठभूमि की आकृतियों का संयोजन दोमेनिकिनो के चित्र ‘संत अँड्रयू का शिरच्छेदन’ के आकृति संयोजन से मिलता-जुलता है। 

पुसँ ने अपने रोम के निवास काल में अन्य श्रेष्ठ चित्रकारों की कला के अध्ययन से काफी लाभ उठाया। रेफील के संयोजन कौशल व वेरोनीस की सुसंगतिपूर्ण रंग योजना ने उनका काफी मार्गदर्शन किया। 

उनके वेदिका चित्र ‘संत एरास्मस का आत्म बलिदान’ व ‘संत जेम्स को कुमारी मेरी का दर्शन’ में आगामी महान बॅरोक शैली के पूर्व चिह्न दृष्टिगोचर हैं। 

इन चित्रों के स्पष्ट घनत्वांकन और पृष्ठभूमि की आकृति योजना प्रमाणित करते हैं कि पुसँ ग्वेर्चिनो की कला से प्रभावित थे। किन्तु पुगेँ की कला को स्थायी मार्गदर्शन प्राचीन मूर्तिकला से हुआ।

1630 में पुसँ का विवाह हुआ व उसके पश्चात् 2/3 साल तक उन्होंने गिरजाघरों या राजमहलों के लिए चित्रण नहीं किया। इस काल की उनकी कृतियाँ आकार में छोटी हैं क्योंकि अब उन्होंने मध्यमवर्गीय सुशिक्षित कला प्रेमियों के लिए चित्रण शुरू किया था। 

‘कवि की अंत:प्रेरणा’ जैसे आगामी कुछ वर्षों के चित्र काव्यमय भावनाओं से भरे हुए हैं और कुछ रसिकों के विचार से ये चित्र पुसँ की सबसे श्रेष्ठ कलाकृतियाँ हैं। 

1633 के पश्चात् उन्होंने फिर से धार्मिक विषयों के चित्र बनाना आरम्भ किया जिनमें पूर्वविधान के बहुत से चित्र हैं। तिशेन की कला के अध्ययन ने उनको स्वच्छ व दीप्तिमान रंगों के प्रयोग व रंगीले वातावरण के निर्माण के लिए प्रेरित किया था व अब उसका प्रभाव अधिक स्पष्ट हो गया। 

पुस की कला के विकास के अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है कि आयु के 35वें वर्ष तक उनकी कला में जो रोमांसवादी उमंग, ऊष्म रंग संगति का प्रभाव, स्वच्छंद अंकन पद्धति एवं स्पष्ट तूलिका संचालन के गुण थे उनके स्थान पर नियंत्रित रेखांकन, कुछ ठंडी रंग संगति आदि शास्त्रीय गुणों का दर्शन बाद में बनाये चित्रों में होने लगा। 

सम्पूर्ण चित्र संयोजन अब बौद्धिक विश्लेषण के साथ व अभ्यासपूर्वक किया जाने लगा। मुखाकृति शास्त्रीय नियमों का पालन करते हुए आदर्श बनायी जाने लगीं व मानवाकृतियाँ मूर्तिशिल्प के समान ठोस बन गयीं। 

रंगों में शुष्क व कम चमकीले रंगों को प्राधान्य मिला। संक्षेप में कला के उत्तेजक व नैसर्गिकतावादी तत्त्वों का स्थान अमूर्त व विषय के दार्शनिक पक्ष के तत्त्वों को दिया गया। 

पुस पुरातन शास्त्रीय कला के निष्ठावान प्रशंसक थे व उन्होंने कारावादुज्यों की कला को दिशाहीन माना। इसके बावजूद वे मानवीय एवं प्राकृतिक सौन्दर्य के प्रेमी थे। 

इसीलिये उनकी कला शास्त्रशुद्ध होते हुए उसमें ऐन्द्रिय सौन्दर्य का आकर्षण है। उसमें शास्त्रीय कला की उदासीनता नहीं है बल्कि वह नैसर्गिक चैतन्य से सजीव लगती है।

आयु के 30वें साल में रोम जाने के बाद उन्होंने जीवन का अधिकतर काल इटली में ही बिताया किन्तु उनकी कला फ्रेंच कला से अधिक सामीप्य रखती है जिसका प्रमुख कारण है उसकी भावुकता । 

तुलनात्मक दृष्टि से उनके चित्र छोटे आकार के हैं। उन्होंने धार्मिक व पौराणिक विषयों को लेकर चित्र बनाये व एक आत्म चित्र को छोड़कर व्यक्तिचित्र नहीं बनाये। 

इटली में निवास होने पर भी उन्होंने फ्रेस्को चित्रण नहीं किया। पुसँ के द्वंद्वात्मक सर्जनशील व्यक्तित्व की विशेषता यह थी कि वे सौन्दर्य के प्रेमी थे किन्तु उसको उन्होंने संयम से नियंत्रित रखा। 

वे रंगों के प्रति आकृष्ट थे किन्तु उनको उन्होंने प्रमुख स्थान नहीं दिया। उनको सत्य प्रिय था किन्तु उसको उन्होंने आकस्मिक व क्षुद्र तत्त्वों से पृथक् रखा। 

उनकी शास्त्र निष्ठता के बावजूद उनके निम्न चित्रों को हम मौलिक एवं प्रतिनिधि मान सकते हैं, ‘संत मॅथ्यू व देवदूत’, ‘सेवाइन स्त्रियों का अपहरण’, ‘फोसियाँ की शव यात्रा’। 

शास्त्रशुद्ध रचना-सौन्दर्य के कारण पुसँ को सत्रहवीं सदी का सबसे श्रेष्ठ चित्रकार माना गया है। आधुनिक कला के जन्मदाता सेजान ने कहा था, “मैं पु का अनुसरण करना चाहता हूँ किन्तु निसर्ग के सानिध्य में।”

क्लोद जेले जो क्लोद लोरें (1600-82) नाम से विख्यात हैं, व्यावसायिक जीवन के प्रारम्भ में रोम चले गये व उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन वहीं बिताया। 

वे ऐतिहासिक प्रकृति चित्र बनाने में निपुण थे। उनके इस प्रकार के चित्रों में वृक्ष, झरना, पहाड़ी आदि प्राकृतिक अंगों को महल, मकान, भग्नावशेष, मंदिर आदि मानव निर्मित पुरातन वस्तुओं के साथ चित्रित करके काल्पनिक दृश्य का निर्माण किया जाता था। 

जब वे किसी ऐतिहासिक या पौराणिक विषय को लेकर चित्र बनाते तो अक्सर पृष्ठभूमि के प्राकृतिक अंगों को इतना महत्त्व देते कि वह प्रकृति चित्र के समान बन जाता। 

प्रकृति चित्रण के इतिहास में उनको अग्रगामी चित्रकारों में स्थान दिया गया है। प्रभाववादियों के समान उन्होंने दृश्य की बाह्य यथार्थता को महत्त्व नहीं दिया बल्कि उसमें अपनी कल्पना के अनुसार परिवर्तन करके उसको मनोहर व भावपूर्ण बनाया। 

अतः उनके चित्रों को यथार्थवादी के बजाय काल्पनिक प्राकृतिक चित्र कहना उचित होगा यद्यपि दर्शनीय प्रभाव में उनमें और यथार्थवादी प्रकृति चित्रों में कोई अन्तर नहीं जान पड़ता। 

उनके पारदर्शी जलरंगों में बनाये स्थूल प्रकृति रेखा चित्रों का प्रभाव परम्परागत शैली के चीनी प्रकृति-चित्रों के समान है। बेरोक शैली के अन्य फ्रेंच चित्रकारों में से वीजी लव्यं शार्ल लयं ब्लांशाद, ज्यां जवने, क्लोद विन्यो सेवास्तिओं बुर्दों ख्यातनाम थे।

डच बॅरोक कला

सत्रहवीं सदी में डच कला उत्कर्ष की चरम सीमा तक पहुँची थी व यह कालखण्ड इस कला का सुवर्ण युग माना गया है। इस काल की डच कला की कुछ हैं जिनसे वह अन्य देशों की कला से स्पष्टतया भिन्न दिखायी देती है। 

ऐसी विशेषताएँ सोलहवीं सदी में हॉलैण्ड पर स्पेन का शासन था। विदेशी शासन के दमनचक्र व धार्मिक असहिष्णुता के खिलाफ डच जनता ने आन्दोलन शुरू करके 1581 में देश की स्वतंत्रता को घोषित किया व सत्रहवीं सदी के आरम्भ में हालैण्ड स्वतंत्र हुआ। 

स्वतंत्र होने के बाद विदेशी व्यापार बढ़ा व देश सम्पन्न हुआ। सुख-समृद्धि, शान्ति व धार्मिक स्वातंत्र्य के साथ ही जनता में कलाभिरुचि व चित्रों की माँग बढ़ी। 

कुछ विद्वानों के अनुसार बदली हुई परिस्थिति डच कला के उत्कर्ष का एक कारण हो सकता है किन्तु केवल उसी से रेम्ब्रांट, बगैर, फ्रान्स हाल्स जैसे विश्वविख्यात चित्रकारों की कला की महानता का स्पष्टीकरण नहीं मिलता। 

रेम्ब्रांट के छाया प्रकाश के प्रभाव की अविश्वसनीय सच्चाई, फ्रांस हाल्स का प्रभुत्वपूर्ण निर्भीक तूलिका संचालन, वर्मेर का सूक्ष्मतर छटाओं का यथार्थ अंकन, राइस्डाल के प्रकृति-दृश्यों की स्वाभाविकता ये सब गुण उन महान कलाकारों की अद्भुत प्रतिभा का प्रकटीकरण है इसमें कोई सन्देह नहीं है।

स्पेन के चित्रकारों ने राजा व दरवार के अभिजात्य वर्ग के लिए चित्र बनाये जबकि डच चित्रकारों के चित्र मध्यम वर्ग की जनता के लिए थे। 

चित्रों के विषय भी जनता के दैनंदिन जीवन से सम्बन्धित हैं जो जनता को आकर्षित करके प्रसन्न कर सकते थे, जिनमें घरेलू प्रसंग, त्योहार, सराय व शराबखाने के दृश्य, फुरसत के क्षणों में संगीत, खेल, मद्य सेवन आदि में व्यस्त आदमियों के चित्र, व्यक्ति चित्र, प्रकृति दृश्य प्रमुख हैं। 

संक्षेप में, डच कला को हम सच्चे अर्थ में जनता की कला कह सकते हैं। चित्रण शैली भी ऐसी सरल व सादृश्यपूर्ण है कि चित्र आसानी से दर्शक के समझ में आकर उसको प्रभावित करने में नहीं चूकते। 

हर्षोल्लास व फुरसत के क्षणों का चित्रण पर्याप्त मात्रा में हुआ है। किन्तु उस समय हालैण्ड कृषि, व्यापार व उद्योग के क्षेत्रों में प्रमुख विकसित देशों में से एक होने पर भी डच कला में कार्य व्यस्तता के क्षणों के चित्रों का अभाव है। 

इसी तरह और डच चित्रकारों ने ध्यान नहीं दिया। उस काल में डच समुद्री यात्री विश्व के भिन्न रेस्त्रांट व उसके कुछ शिष्यों को छोड़कर, धर्म, पुराण व काव्य से सम्बन्धित विषयों की महाद्वीपों तक पहुँच चुके थे किन्तु डच कला में विदेश यात्रा या विदेश दृश्यों के चित्र नहीं मिलते। 

किन्तु विषयों की सीमितता होते हुए डच कलाकारों ने कला के मूलभूत गुणों की और ध्यान देकर उनको इतना विकसित किया है कि वे सच्चे कलाकार थे इसमें कोई सन्देह नहीं है। अवकाश की गहराई व हलकी छटाओं के अंकन के कौशल में वे बेजोड़ थे। चित्रण की क्रियाविधियों का उनको सम्पूर्ण ज्ञान था व डच तैल चित्र अभी भी अवस्था में हैं।

यूरोप के अन्य देशों के कलाकारों के समान विशेष अध्ययन के लिए इटली जाने की प्रथा डच कलाकारों में नहीं थी व बहुत ही कम कलाकार इटली हो कर आये थे। इटली रह कर आये कलाकारों में यूट्रेक्ट शहर के कुछ कलाकार थे जो सत्रहवीं सदी के आरम्भ में इटली गये थे। 

वे कारावाद्ज्यो से प्रभावित थे व उन्हीं का अनुसरण करके इन कलाकारों ने कलानिर्मिति की जो यूट्रेक्ट शैली के नाम से ज्ञात है। 

इनमें से हैन्ड्रिक टर्व्यूगेन (1585-1629) व गेरार्ड वान हान्धार्स्ट (1590-1656) विशेष प्रसिद्ध हैं। कारावाद्ज्यो के चित्र ‘संत मॅथ्यू को आह्वान’ का अनुसरण करके टर्व्यूगेन ने उसी विषय पर एक चित्र बनाया जिसने डच चित्रकारों को काफी प्रभावित किया।

जनसाधारण की कला होने के कारण यह स्वाभाविक था कि डच कला का आरम्भ व्यक्ति चित्रण से हो। आरम्भ में बहुसंख्य कलाकार व्यक्ति चित्रकार ही थे जिनको सम्पन व्यक्तियों व व्यापारियों से व्यक्ति चित्रण का कार्य मिलता था। 

कई व्यापारी नगर सुरक्षा दल के सदस्य हुआ करते थे व उनको दल के सदस्यों का सामूहिक रूप से व्यक्ति चित्र बनवाने का शौक था। 

इसके परिणामस्वरूप डच कला में सामूहिक व्यक्तिचित्रण का भी प्रचलन बढ़ता गया। विभिन्न निगमों के अधिकारी भी सामूहिक व्यक्ति चित्रों के शौकीन थे। हालैण्ड के व्यक्ति चित्रकारों में से फ्रान्स हाल्स (1580-1666 ) ने विश्व ख्याति प्राप्त की। 

उन्होंने व्यक्ति चित्रण के अलावा अन्य विषयों के चित्र नहीं बनाये। तत्कालीन रिवाज के अनुसार उनके चित्रित सभी व्यक्ति काले वस्त्र व सफेद कालर पहने हुए हैं। वे अक्सर कुलीन वर्ग के व्यवसायी नगरवासी हुआ करते थे। ऐसे समान पोशाक पहने हुए व्यक्तियों के चित्र बनाना नीरस काम था। 

उसमें कोई स्फूर्तिदायक बात नहीं थी। किन्तु हाल्स ने अपने अंकन कौशल से ऐसे सामान्य विषय के चित्रों में ऐसी जान डाली है कि दर्शक मुग्ध होता है। हाल्स के चित्रों में भौतिक सौन्दर्य का मनोहर विलास है; उन्होंने कहीं भी आलंकारिता या कल्पना का सहारा नहीं लिया है। 

असामान्य अंकन कौशल उनकी कला का सर्वोपरि गुण था व उन्होंने तूलिका के न्यूनतम किन्तु संवेदनशील प्रयोग से आदमियों के सजीव व उत्साह से भरे हुए व्यक्ति चित्र बनाये। वे बहुत कम रंगों का प्रयोग करते थे किन्तु उनके नगर सुरक्षा दलों के प्रीतिभोज के चित्रों में रंगों की चमक-दमक भी है। 

उनके आरम्भिक व्यक्ति चित्र सोच-समझ कर सच्चाई की ओर विशेष ध्यान देकर बनाये गये हैं, किन्तु वे कुछ कठोर प्रतीत होते हैं। अभ्यास के साथ उनकी अंकन पद्धति में निर्भीकता व स्वाभाविकता के गुण सम्मिलित हुए व व्यक्तिचित्र सजीव दिखायी देने लगे। 

हाल्स के चित्रों का सबसे बड़ा दोष यह है कि उनमें केवल सतही सौन्दर्य की ओर ध्यान दिया गया है व चित्र विषय के मनोवैज्ञानिक व्यक्तित्व की आन्तरिक गुण-विशेषताओं का उसमें दर्शन नहीं है। 

उनकी प्रतिभा की एक और विशेषता यह थी कि उन्होंने सामूहिक व्यक्ति चित्रों में चित्र के विभिन्न अंगों को योजनापूर्वक स्थापित करके उनमें सुसंवादित्व का निर्माण किया है। उनके विश्व प्रसिद्ध चित्रों में ‘हंसने वाला घुड़सवार’, ‘योंकर राम्प और उसकी प्रेयसी, हार्लेम के वृद्धाश्रम की महिला प्रशासक’ प्रमुख हैं । 

व्यक्ति चित्रों के अलावा, डच चित्रकारों ने नगरवासियों और देहातियों के फुरसत के क्षणों के यथार्थवादी दृश्य चित्र भी बनाये। देहाती लोगों के दैनंदिन जीवन को चित्रित करने में एड्रियन वान ओस्टाड (1610- 1685) माहिर थे व उनके चित्र ‘हाथापाई’, ‘बेला वादक’ व ‘शिक्षक’ उनकी निपुणता की परिचायक प्रसिद्ध कृतियाँ हैं। 

समाज के उच्च स्तर के लोगों के जीवन को चित्रित करने में रुचि रखने वाले कलाकारों ने अधिकतर ऐसे प्रसंगों को चुना है जिनमें महिलाएँ अपने दैनन्दिन काम में या वाद्य संगीत में मग्न हों या भद्र पुरुष मिलकर मद्य सेवन कर रहे हों। इन्होंने ऐसे प्रसंगों को भी चित्रित किया है जिनमें परिवार के सदस्यों को त्योहार मनाते हुए या हर्षोल्लास के साथ फुरसत के क्षणों को बिताते हुए दिखाया है। 

इन कलाकारों में से गाब्रिएल मेटसु (1630-67) की ‘संगीत का पाठ’, ‘संगीत प्रेमी’, ‘शिकारी की भेंट’, व यान स्टेन (1626-79) की ‘संत निकोलस की पूर्व संध्या’, (चित्र 13) ‘प्रेम विह्वल नौकरानी’ ये कृतियाँ उनकी कला की व्यक्तिगत विशेषताओं पर प्रकाश डालती हैं। 

उपर्युक्त चित्रकारों से भी, घरेलू विषयों के चित्रण में, गेरार्ड टर्बाख (1617-81) व पीटर डे होख (1629-84) ने विशेष दर्जे का स्थान प्राप्त किया। धूसर एवं गहरे रंगों की सूक्ष्म छटाओं का समुचित अंकन करके कमरे के अंधेरे हिस्से में हलकी रोशनी का प्रभाव दिखाने में एवं व्यक्तियों व वस्तुओं का सही जगह स्थापन करके, सौम्य प्रकाश के अन्तर्गत दृश्य का संयोजन करने में टर्बार्ख निपुण थे। 

उनके प्रतिनिधि चित्रों में, ‘रमणी-भक्त’, ‘संगीत’, ‘पिसनहारे का परिवार’ ये कृतियाँ हैं। रेशमी कपड़े की चमक कुशलता से यथार्थ अंकित करने में टर्बार्ख बेजोड़ थे ।

घरेलू विषयों के अन्य डच चित्रकारों व पीटर डे होख में प्रमुख अन्तर यह है कि होख ने पृष्ठभूमि को उतना ही महत्त्व दिया जितना कि आदमियों को। गृहांतर्भाग का दृश्य हो या आंगन का वे अपना ध्यान छाया-प्रकाश में हो रहे सूक्ष्म परिवर्तन को अंकित करने पर केन्द्रित करते थे। 

इसी वजह से, उनके ‘युवा माता’, ‘ताश के खिलाड़ी’, ‘डच गृहांतर्भाग’ जैसे घर के भीतरी दृश्यों के चित्रों में कमरे का खिड़की दरवाजों के समीप का प्रकाशित हिस्सा और अन्दर का कम प्रकाशित हिस्सा इनमें छटाओं का तीव्र विरोध युक्त प्रयोग है जबकि ‘डच गृह का आंगन’ जैसे आंगन के अनेक चित्रों में हालैण्ड के वातावरण के सौम्य प्रकाश का प्रभाव हलके विरोधयुक्त छटाओं के प्रयोग से दिखाया है। 

रेम्ब्रांट या कारावाद्द्भ्यो के समान उन्होंने छाया-प्रकाश में तीव्र विरोध का प्रयोग नहीं किया बल्कि विषय वस्तुओं के नैसर्गिक रंगों की रक्षा करने पर ध्यान दिया; इसी वजह से उनके चित्रों में उत्कृष्ट रंग सौन्दर्य है।

वर्मेर के समान उनके गृहान्तर्भागों के दृश्यों का वातावरण रमणीय वा प्रकाश से परिपूर्ण होता है व उन्होंने ज्यामितीय पद्धति के संयोजन द्वारा पूरे दृश्य को एकत्व प्रदान किया है फिर भी विवरण, बारीकियाँ व मानव भावनाओं पर भी बल देने से होख । के चित्र अधिक यथार्थ व कथनात्मक बन गये हैं। 

उन्होंने कई दृश्यों के बीच में खुले दरवाजों। को चित्रित किया है जिससे घरेलू वातावरण में अधिक घनिष्ठता प्रतीत होती है और चित्रकार को भी अवकाश की गहराई व प्रकाश में हो रहे सूक्ष्म परिवर्तन को कुशलता से अंकित । करने का सुअवसर प्राप्त हो गया है। 

चित्र में वर्णनात्मक सामर्थ्य का होख द्वारा पूरा ख्याल रखा जाने पर भी चित्रांतर्गत प्रकाश के प्रभाव को देखते हुए मानना पड़ता है कि उनके चित्रों का केन्द्रीय विषय है प्रकाश, न कि चित्रित व्यक्ति या घरेलू दृश्य ।

गृहान्तर्भागों के दृश्यों के चित्र बनाने वाले डच चित्रकारों में याकोबस ब्रेल व एड्रियन बौवर भी थे जिनको गौण स्थान दिया गया है। एमान्युएल डेविट व गेरार्ड होकॉस्ट ने प्रोटेस्टेंट गिरजाघरों के अन्दरूनी विशाल दृश्यों के खिड़की-दरवाजों में से आने वाले एवं परावर्तित प्रकाश व छाया के क्रीड़न व यथार्थ परिप्रेक्ष्य के साथ एवं बीच-बीच में छोटी- छोटी उपासकों की आकृतियों को अंकित करके बहुत आकर्षक चित्र बनाये हैं।

अधिकतर डच कलाकार अपनी अभिरुचि के अनुसार किसी विशेष चित्र विषय को चुनकर उसी विषय पर ध्यान केन्द्रित करके चित्रण किया करते थे। प्रकृति चित्रकारों में भी कुछ कलाकार समुद्री व समुद्र किनारे के दृश्यों के विशेषज्ञ थे, तो कुछ कलाकार केवल देहाती इलाकों के दृश्य चित्र बनाते थे और कुछ कलाकारों ने सिर्फ शहरों के भवनों, चौराहों व स्मारकों के चित्र बनाये। 

उनमें ऐसे भी कलाकार थे जिन्होंने क्षितिज तक फैले हुए मैदान व बादलों से घिरे हुए आसमान के चित्र बनाये। विल्लेम वान डे वेल्ड, पिता व पुत्र दोनों सागर दृश्यों के चित्रकार थे। एर्ट वान डेर नेर के ‘चाँदनी रातों के दृश्य’ चित्र लोकप्रिय थे। 

ख्यातनाम चित्रकार हर्क्युलिस सेगर्स का – जिनको रेम्ब्रांट भी महान् प्रकृति चित्रकार मानते थे-काले बादलों से घिरे हुए आसमान के नीचे का पहाड़ी दृश्य चित्र प्रसिद्ध है। यान वान गोयेन (1596-1656) ने सौम्य व धूसर रंगों का प्रयोग करके नदी व नहर के किनारों व किनारों पर बनी हुई इमारतों व वहाँ के व्यस्त जनजीवन के दृश्यों को चित्रित किया; ‘मोंफुर्ट का किला’, ‘डाड्रेक्ट का दृश्य’ उनके प्रसिद्ध चित्रों में से हैं। 

बारीकियों से भी प्रकृति की भिन्न अवस्थाओं का वास्तविक चित्रण करने में वे अधिक रुचि रखते थे। आल्बेर्ट काइप (1620-91) एक प्रतिभा सम्पन्न प्रकृति चित्रकार थे व अपने चित्रों में वे जानवरों की आकृतियाँ बनाते थे। ‘देहात में गायें’, ‘दो चितकबरे घोड़े’ उनके प्रसिद्ध चित्र हैं। 

राइस्डाल के शिष्य माइन्डेट हाब्बेमा (1638-1709) प्रसन्न व शान्तिपूर्ण वातावरण के अन्तर्गत बनाये गाँवों, पनचक्कियों व तालाबों के प्रकृति चित्रों के लिए ख्यातनाम हैं, ‘मिडेलहार्निस का मार्ग’, (चित्र 66) ‘पनचक्की’, ‘ग्राम का प्रवेश द्वार’ उनके प्रसिद्ध चित्रों में से हैं। 

शहरी दृश्यों के प्रति बहुत कम डच चित्रकार आकृष्ट हुए। वर्मेर को छोड़कर किसी प्रतिभा सम्पन्न डच चित्रकार ने शहरी दृश्यों के चित्र नहीं बनाये। डच प्रकृति चित्रकारों में सबसे श्रेष्ठ थे याकोब वान राइस्डाल (1628-1682)। उनकी रंग संगति संयत थी और अन्य डच प्रकृति चित्रकारों के समान उन्होंने दृश्य में मानवाकृतियों को महत्त्व नहीं दिया व उनके कई चित्र मानवविहीन हैं। 

वे स्वयं गैर मिलनसार, एकान्तप्रिय व निराशावादी व्यक्ति थे व उनके चित्रित दृश्य भी उनकी इस वृत्ति को प्रतिमित करते हैं। 

चित्रकला के इतिहास में प्रकृति चित्रण का जन्म हुए अधिक कालावधि नहीं हुई थी व कलाकारों के सम्मुख यह समस्या थी कि जमीन, घने जंगल, धूप, पानी और आसमान को एक साथ, उनके वास्तविक रूप में किस तरह चित्रित किया जाये क्योंकि उनसे होने वाले नेत्रपटलीय प्रकाश प्रभाव में आपस में काफी विरोध होता है। इस समस्या का संतोषजनक हल चित्रकारों ने व उनमें भी सबसे अधिक राइस्डाल ने किया। उन्होंने प्रशान्त घने जंगलों, प्रपातों, वेगवती जलधाराओं, बंजर टीलों, गरजते समुद्र, करुण ध्वंसावशेषों व नगरों के दृश्यों को चित्रित किया है। 

डच प्रकृति-चित्रकारों ने प्रत्यक्ष स्थान पर जाकर चित्रण नहीं किया यद्यपि सेगर्स व रेम्ब्रांट के कुछ आरम्भकालीन प्रकृति चित्रों के मूल स्थानों का पता लगाया गया है। ‘हार्लेम का दृश्य’, ‘ज्यू कब्रिस्तान’, ‘धूप की लहर’, ‘दलदल’ राइस्डाल के प्रसिद्ध चित्रों में से हैं। इनमें भी ‘ज्यू कब्रिस्तान’ विशेष प्रसिद्ध है। 

प्रकृति की विभिन्न अवस्थाओं को प्रभावपूर्ण ढंग से व्यक्त करने पर राइस्डाल अत्यधिक ध्यान देते थे व इस चित्र में उन्होंने प्रकृति के रौद्र स्वरूप का सामर्थ्यशाली दर्शन कराया है। दृश्य निस्संदेह काल्पनिक प्रतीत होता है किन्तु इससे उसके प्रभाव में कोई कमी नहीं आती। बीहड़, परिव्यक्त, पहाड़ी इलाके पर आक्रमण करते हुए काले गर्जन मेघ, विध्वस्त प्राचीन भग्नावशेष, कब्रिस्तान के बीच से गुजरता हुआ जल-प्रवाह, बादलों के बीच में कहीं फूट कर दृश्य पेड़ के शुष्क तने व कब्रों पर गिरी हुईं कुछ प्रकाश किरणें और क्षितिज पर अस्पष्ट इन्द्रधनुष सब मिलकर नितान्त उदासी का भाव पैदा करते हैं; मानो सब कुछ नश्वर है- वायु, जल आदि प्राकृतिक शक्तियाँ और समय की गति मानव, मानव निर्मित वस्तुओं, पेड़-पौधों सबको मिट्टी में मिला देती हैं। 

शायद अपने जीवन की नश्वरता का विचार मन में आने के कारण ही राइस्डाल ने कब्रिस्तान के एक पत्थर पर अपना नाम भी लिखा है।

कुछ डच चित्रकारों ने केवल वस्तु-चित्रण पर ही ध्यान केन्द्रित किया। इनमें से विल्लेम क्लाज हेडा व यान डाविज हेम विशेष प्रसिद्ध थे। हेडा ने मुख्यतः धातु के बर्तन, कांच के गिलास व फलों के वस्तु चित्र बनाये तो हेम ने फूलों के। 

उनके वस्तु-चित्रण का प्रमुख ध्येय था वस्तुओं के भिन्न प्रकार के सतहों पर होने वाले प्रकाश के प्रभाव का यथार्थ अंकन व वस्तुओं के आकारों का चित्र क्षेत्र में समुचित संयोजन। वस्तु चित्रकार आब्राहाम वान बेयरेन व विल्लेम काफ ने भी काफी ख्याति अर्जित की। काफ का लुव्र संग्रहालय में रखा वस्तु चित्र बहुत प्रसिद्ध है। 

बॅरोक काल के सर्वोत्कृष्ट डच चित्रों की जो विशेषताएँ थीं— प्रकाश के प्रभाव व हल्की-गहरी व सूक्ष्मतर छटाओं का सही अंकन, अवकाश की गहराई का सम्यक दर्शन व रंगों की असाधारण ताजगी – उन सबका परिपक्व समुच्चय हमको यान वर्मेर (1632-75) की कला में देखने को मिलता है। 

रेम्ब्रांट के समान, उनकी विश्व के महान चित्रकारों में गणना की जाती है यद्यपि उनके चित्रों की संख्या अधिक नहीं है। वर्मेर ने आरम्भ में ‘मार्था और मेरी के घर में ईसा’, ‘डायना व परियाँ’ की रूपक कथा’, ‘धर्म की रूपक कथा’ जैसे रूपक चित्र बनाये। 

किन्तु कुछ समय में जैसे धार्मिक एवं पौराणिक विषयों के चित्र तथा समकालीन पृष्ठभूमि को लेकर ‘चित्रकला ही उन्होंने समकालीन डच चित्रकारों के समान गृहांतर्भागों के दृश्यों का चित्रण शुरू किया व उन सबको पीछे छोड़ गये। प्रकाश के यथार्थ प्रभाव व रंगों की सही छटाओं का अंकन करने का उनका कौशल अपवादात्मक था। 

वे मानो पूर्व निश्चय करके ही चित्रण करना आरम्भ करते कि अपनी तूलिका का पट पर होने वाला एक भी स्पर्श अपने अंतिम लक्ष्य से चूक न जाये। परिणामस्वरूप उनके चित्रित दृश्य स्वच्छ पारदर्शक व नैसर्गिक झिलमिलाहट युक्त प्रकाश से ओत-प्रोत हैं। वातावरणीय प्रभाव का विशेष ख्याल रखने से उनके चित्रों में कमरे की गहराई व विस्तार एवं भिन्न वस्तुओं के बीच की दूरी का आभास बहुत प्रभावपूर्ण हुआ है जितना अन्य डच चित्रों में नहीं दिखायी देता। 

इस उद्देश्य से वे प्रायः अग्रभूमि में वस्तु समूह का चित्रण करते जिससे पृष्ठभूमि दूर दिखायी देती। उनकी और एक विशेषता थी रंग-सौन्दर्य के प्रति अति संवेदनशीलत्व व इस वजह से उनकी रंग- संगतियों में दर्शकों को मुग्ध करने का ऐसा सामर्थ्य है जिसके लिए आधुनिक वस्तु निरपेक्ष चित्रकार जान देते हैं। 

यथार्थ चित्रण के अन्तर्गत वस्तु निरपेक्ष गुणों का विकास करना असाधारण प्रतिभा का कार्य है जो वर्मेर में थी। आकारों को घनत्व देने के लिए छटाओं का सूक्ष्म क्रमबद्ध अंकन करते समय वे बहुत छोटे निर्मल रंगों के बिन्दुओं का प्रयोग करते जिससे उनके चित्रों की सतहों में मीनाकारी की चमक आयी है फिर भी उनमें कहीं अस्पष्टता नहीं है। 

वर्मेर को सृष्टि में हर वस्तु चित्रण योग्य प्रतीत हुई व उन्होंने मानव शरीर, चेहरा, वस्त्र, दीवार, मेज, फर्श, गिलास, बरतन आदि जिस किसी का चित्रण किया, उसे तादात्म्य भाव से व समान रूप से उत्कृष्ट ढंग से किया। हर वस्तु से मानव देह की जैसी झलक फूट पड़ती है व कहीं भी भावहीन चित्रण नहीं है। 

उनके चित्रों को उल्लसित दृश्य-काव्य कह सकते हैं। उपर्युक्त गुणों का विचार करते हुए वर्मेर व रेम्ब्रांट में काफी असमानताएँ हैं। दोनों बॅरोक काल के सर्वश्रेष्ठ डच चित्रकार माने जाते हैं और उनकी कला से आधुनिक चित्रकारों को काफी प्रेरणा मिली- वर्मेर की कला से रचनात्मकता एवं वस्तु निरपेक्ष सौन्दर्य की दिशा में और रेम्ब्रांट की कला से अभिव्यंजना की दिशा में।

गाब्रियल मेट्स, ओस्टार्ड, यान स्टेन आदि बहुत से डच चित्रकारों के चित्र स्पष्टतः कहानी चित्र जैसे दिखते हैं। चित्र का कथनात्मक प्रभाव बढ़ाने के उद्देश्य से वे काफी सोच समझकर आदमियों की मुद्राओं, गतिविधियों व पृष्ठभूमि की बारीकियों का अंकन करते थे जिससे दर्शक महसूस करता है कि उसके सम्मुख कोई नाटकीय प्रसंग प्रस्तुत किया जा रहा है और वह उस दृष्टिकोण से घटना के बारे में सोचने लगता है; उदाहरणार्थ स्टेन का चित्र ‘संत निकोलस की पूर्व संध्या’ देखते ही दर्शक का ध्यान चित्रित व्यक्तियों की भिन्न मुद्राओं की ओर आकृष्ट होकर वह उसके पीछे की कहानी के बारे में कल्पना करने में डूब जाता है। 

इस दृष्टि से वर्मेर की कला का उद्देश्य बिल्कुल भिन्न था। उन्होंने विषय को चित्रण के लिए एक बहाना मात्र समझा व उसके कथनात्मक पहलू ओर विशेष ध्यान नहीं दिया। 

प्रकाश की वास्तविक चमक, अवकाश की गहराई व वस्तुओं की का घनत्व इन यथार्थवादी तत्त्वों के चरम विकास के अतिरिक्त वर्मेर की कला में चित्रक्षेत्र का विस्तृत सरलीकृत आकारों में विभाजन, कुशल संयोजन, रेखाओं की लयात्मकता, सतह की झिलमिलाहट भरी बुनावट व आकर्षक किन्तु सौम्य प्रसन्न रंग-संगति ये जो विशुद्ध कलात्मक गुण थे उन्हीं की वजह से वे बॅरोक काल के अन्य डच कलाकारों से भी, आधुनिक कला के अधिक समीप पहुँच गये हैं। 

संयोजन-कौशल व प्रकाश के प्रभाव की दृष्टि से वर्मेर के चित्र ‘कार्यकक्ष में चित्रकार’, ‘पत्र’ व ‘संगीत का पाठ’ विशेष अभ्यसनीय हैं; ‘नौकरानी दूध डालते हुए’ व ‘फीता बनाने वाली’ ये चित्र मनोहर रंग-संगति व झिलमिलाती सतह के उदाहरण हैं, यद्यपि उनके बहुसंख्यक चित्र उनकी कला की सभी विशेषताओं से न्यून अधिक मात्रा में परिपूर्ण हैं। 

‘मोतियों का हार’, ‘पियानोवादक’, ‘पत्र पढ़ती हुई लड़की’, अन्य प्रसिद्ध चित्र हैं। वर्मेर के बनाये दो प्रकृति चित्र ‘डेल्फ्ट का दृश्य’ व ‘डेल्फ्ट का मार्ग’ उनकी अन्तिम कृतियाँ थीं व उनका रंगांकन इतना यथार्थ व उत्कृष्ट है कि उनके सामने अन्य डच प्रकृति चित्र कहीं भी नहीं ठहरते; उनकी सतहें लाख जैसी चमकीली हैं।

बर्मेर की जीवनी के बारे में बहुत कम जानकारी प्राप्त हुई है। उनकी आर्थिक स्थिति अस्थिर रही। आरम्भिक काल में वर्मेर ने यूटेक्ट चित्रकारों से बहुत कुछ शिक्षा प्राप्त की व उनके जरिये वे कारावाद्द्भ्यो की कला से परिचित हुए। 

उनकी कला पर आइक बन्धुओं का कुछ प्रभाव भी है। किन्तु उनकी मौलिक प्रतिभा को नहीं नकारा जा सकता। लगभग दो सदियों तक उपेक्षित रहने के पश्चात् आधुनिक कला के उदय के साथ बर्मेर की कला की महानता की पहचान हुई व उनको कला क्षेत्र में सम्मान का स्थान प्राप्त हुआ। सम्प्रति उनके केवल 37 चित्र उपलब्ध हैं।

हालैण्ड के सबसे ख्यातनाम चित्रकार रेम्ब्रांट हार्मेज वान राइन (1606-69) का जन्म लाइडन में एक चक्की वाले के परिवार में हुआ। रुचि नहीं होने के कारण महाविद्यालयीन शिक्षा को अधूरी छोड़कर वे एक स्थानीय चित्रकार के नौसिखिया हो गये। कुछ समय में ही और एक चित्रकार के साथ छह महीनों तक रह कर वे स्वतंत्र रूप से कार्य करने लगे। 

आयु के 21वें साल के करीब प्रसिद्धि प्राप्त होकर वे व्यवसाय के लिए राजधानी अॅमस्टरडॅम चले गये। धनी व्यक्तियों के बारीकियों के साथ स्पष्ट व आत्म गौरवपूर्ण व्यक्ति-चित्रण करने की उनकी आरम्भिक शैली से वे काफी लोकप्रिय हुए। 

उन्होंने सास्किया नाम की लड़की से विवाह किया, मकान खरीद लिया व मुक्त हस्त खर्च करते हुए जीवन का आनन्द लेने लगे। किन्तु उनके जीवन में व कला में काफी परिवर्तन होने वाला था। 1642 में उनकी प्रिय पत्नी सास्किया की मृत्यु हुई जो अपने पुत्र टायटस को पीछे छोड़ गयी। 

चित्र, अन्य कलाकृतियाँ व महंगी चीजें खरीदने में और सट्टेबाजी में रेम्ब्रांट ने काफी खर्च किया था। पत्नी की मृत्यु के कुछ समय पश्चात् उन्होंने हैन्ड्रिक स्टोफेल्स नाम की लड़की को घर में नौकरानी के रूप में प्रवेश देकर उससे अनैतिक सम्बन्ध रखे जिससे धार्मिक सम्प्रदाय के लोगों ने उनकी भर्त्सना की। उनकी आरम्भकालीन शैली में परिवर्तन आने लगा। 

वे निधड़क स्वतंत्र मौलिक चित्रण करने लगे व उनकी लोकप्रियता घटती गयी। अब आर्थिक विपन्नावस्था व प्रतिकूल परिस्थिति ने उनको घेर लिया। चित्र व एचिंग कार्य से होने वाले अनियमित विक्रय पर वे किसी तरह निर्वाह करते थे व 1660 से शहर की निर्धन बस्ती में रहते थे। 

उनके अन्तिम वर्षों में उनको दो महत्त्वपूर्ण कार्य मिले थे; एक था वस्त्र निर्माता संघ द्वारा उसके नियंत्रण समिति के सदस्यों का समूह चित्र जो ‘सिंडिक्स’ नाम से प्रसिद्ध है; दूसरा था अॅम्स्टरडॅम शहर की दीवार के लिए हालैण्ड के प्राचीन इतिहास में उल्लिखित दंतकथा ‘बटेवियन्स का षड्यंत्र’ का चित्र। 

दूसरा चित्र एक साल तक दीवार पर लगा रहा किन्तु बाद में उसको रेम्ब्रांट को वापिस करके उसकी जगह किसी अन्य चित्रकार की साधारण कृति लगायी गयी। इससे रेम्ब्रांट को कितना दुःख हुआ होगा इसका अनुमान लगाया में प्रिय पुत्र टायटस की मृत्यु से तो रेम्ब्रांट पूरी तरह टूट गये व 1669 में यह विश्व का जा सकता है। 

इसी वर्ष उनकी विश्वास पात्र हैन्ड्रिक स्टोफेल्स का देहान्त हुआ। 1668 महान् कलाकार संसार से सदा के लिए विदा हुआ।

रेम्ब्रांट असाधारण प्रतिभा के कलाकार थे किन्तु उनकी मौलिकता के प्रकट होने में समय लगा। उनकी आयु के चालीसवें वर्ष तक की कलाकृतियों को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है, पहले वर्ग में उनके व्यक्ति चित्र आते हैं जो उन्होंने कौशल व आत्मविश्वास के साथ बनाये हैं किन्तु उनसे उनकी मौलिक प्रतिभा का परिचय नहीं होता और उनमें समकालीन डच कलाकारों के समान प्रकाश का सूक्ष्म व प्रभावी अंकन भी नहीं है; दूसरे वर्ग में धार्मिक व पौराणिक विषयों के चित्र हैं जो उन्होंने सामान्य आडम्बरपूर्ण शैली में बनाये हैं। 

‘शरीर-रचना का पाठ’ व ‘जहाज निर्माता’ पहले वर्ग के उदाहरण हैं और सॅम्सन को अंधा करना व ‘प्रासेर्पाईन का बलात्कार’ दूसरे वर्ग के हैं। यदि रेम्ब्रांट की 1644 में मृत्यु होती तो उनकी कुशल कलाकारों में गणना होती किन्तु उनकी अद्वितीय प्रतिभा का ‘रात का पहरा’ चित्र के अतिरिक्त, कोई प्रमाण नहीं मिलता। 

1644 के पश्चात् रेम्ब्रांट की कला को एक नयी दिशा मिली और वे कुशल चित्रकार न रहकर आश्चर्यजनक उन्मुक्तता से कलासर्जन करने लगे; समय के साथ उनकी शैली सरल किन्तु प्रभावी यथार्थ से जुड़ी होते हुए भी कल्पनारम्य एवं आत्मिक हुई व कला जगत में वे द्रष्टा के रूप में अमर हुए।

रेम्ब्रांट की कला में हुए परिवर्तन का सरल विश्लेषण सम्भव नहीं है। प्रिय पत्नी की मृत्यु, हैन्ड्रिक स्टोफेल्स का जीवन में प्रवेश, ‘रात का पहरा’ चित्र को मिली क्षुद्र प्रतिक्रिया व आर्थिक दिवाला इनसे इसका स्पष्टीकरण देना रेम्ब्रांट की कला की महानता के प्रति अन्याय होगा, यद्यपि इसकी पूर्ण सम्भावना है कि उपर्युक्त कारणों ने परिवर्तन की प्रगति को तेज किया होगा। 

अब उनकी कला का स्वरूप अधिक जटिल हो गया; उसमें भौतिक सौन्दर्य के साथ आध्यात्मिक प्रवृत्ति व यथार्थता के साथ काल्पनिक रूप का द्वंद्वात्मक दर्शन होने लगा। अपनी आन्तरिक भावनाओं को दृश्य रूप में अभिव्यक्त करना उनकी कला का ध्येय बन गया। इसके साथ कला की प्रविधियों पर प्रभुत्व करने में उनकी दिलचस्पी बढ़ी। 

क्रान्तिकारी प्रणेताओं के समान उनको भी कलात्मक अंतर्विरोधों का सामना करना पड़ा व इसमें साधना के बल पर उन्होंने कला को अपने ध्येय के अनुसार सार्थक बनाया। 

उनके पूर्वकालीन यथार्थवादी विषयों के तथा पौराणिक या धार्मिक विषयों के चित्रों में बहुत कम सामंजस्य है, किन्तु बाद में यह अन्तर क्रमशः घटता गया व उत्तरकालीन भिन्न विषयों के चित्रों में वही अद्वितीय अभिव्यंजक एकता प्रतीत होती है। 

रेम्ब्रांट की कला का विश्लेषण सरल नहीं है, किन्तु उसकी दो विशेषताएँ स्पष्ट हैं। उन्होंने अन्य समकालीन डच चित्रकारों के समान, आसपास के जनजीवन का यथार्थ चित्रण करने के बजाय धार्मिक व पौराणिक विषयों के भी काल्पनिक पूर्वीय पार्श्वभूमि, पर चित्र बनाये। इसके अलावा उन्होंने – विशेषतः उत्तरायु के चित्रों में प्रकाश का हूबहू चित्रण करने के बजाय, उसमें आवश्यकतानुसार परिवर्तन या उसका केन्द्रीयकरण किया। 

वे यथार्थ चित्रण में निपुण थे, इसका प्रमाण उनके चित्र ‘स्नान के पश्चात् बाथशेवा’, ‘सिंडिक्स’ व बहुत से व्यक्ति चित्रों व आत्मचित्रों से मिलता है, किन्तु उन्होंने आत्मिक अभिव्यक्ति के लिए आवश्यक कल्पना का भी उपयोग किया है। उन्होंने प्राकृतिक दृश्यों का रोमानी चित्रण किया है। 

संक्षेप में, रेम्ब्रांट मुख्यतः धार्मिक प्रवृत्ति के अद्वितीय प्रतिभा के कलाकार थे; उनके धार्मिक चित्रों के उदाहरण हैं-‘एमॉस में तीर्थ यात्री’, ‘सॉल के सामने वीणा बजाते हुए डेविड’, ‘अपव्ययी पुत्र की घर वापसी’। ये बायबल के पूर्व विधान से काफी प्रभावित थे। उनका एचिंग कार्य व रंगाकन उच्च कोटि का है।

रेम्ब्रांट के बहुत से शिष्य थे। गोवर्ट पिलंक व फर्डिनांड बोल के व्यक्ति चित्रों व धार्मिक चित्रों में रेम्ब्रांट का यथातथ्य अनुकरण है। कारेल फाब्रिटियस (1620-54) ने अधिक समझदारी से कार्य किया है; ‘वृद्ध स्त्री’, ‘गोल्डफिंच’ व ‘आदमी का व्यक्ति चित्र’ उनके प्रसिद्ध चित्र हैं। निकोलास मास (1632-93) ने जनजीवन के यथार्थ दृश्यों का चित्रण किया। एर्ट वान गेल्डर ने (1645-1727) रेम्ब्रांट के समान बायबल के विषयों को लेकर काल्पनिक पार्श्व भूमि पर धार्मिक चित्र बनाये।

फ्लैंडर्स की बॅरोक कला

सोलहवीं सदी में फ्लैंडर्स की जनता ने स्पेन के विदेशी शासन से मुक्त होने के लिए विद्रोह किया किन्तु उसको सफलता नहीं मिली। विदेशी शासन व कॅथोलिक धर्म का आधिपत्य बने रहे किन्तु सत्रहवीं सदी में शान्ति व समृद्धि के फलस्वरूप सामाजिक सुस्थिरता के साथ कला का उत्थान हुआ। 

इस उत्थान के केन्द्र बिन्दु थे पीटर पॉल रुबेन्स (1577- 1640) जिनकी कला व व्यक्तित्व ने करीब सब समकालीन फ्लेमिश चित्रकारों को प्रभावित किया था। उनका जीवन सुखपूर्ण रहा। वे राजनयिक भी थे व उन्होंने चित्रकला व कूटनीति दोनों क्षेत्रों में सम्मान, कीर्ति व वैभव प्राप्त किया। वे व्यवहार कुशल सुशिक्षित व धार्मिक व्यक्ति थे। वे दरबारी अधिकारी के पुत्र थे व उन्होंने आरम्भिक शिक्षा अँटवर्प में प्राप्त की। 

दो स्थानीय चित्रकारों से शिक्षा प्राप्त करने के बाद वे आयु के 23वें साल में इटली गये जहाँ आठ साल तक मांतुआ के ड्यूक की सेवा में रहकर वेनिस, रोम आदि भिन्न स्थानों पर उन्होंने इटली की पुनरुत्थान काल व बॅरोक काल की कला का अध्ययन किया। 

वहाँ उन्होंने ख्याति प्राप्त कलाकारों के चित्रों की अनुकृतियाँ की एवं ग्रीक मूर्तियों से रेखाचित्र बनाये। उनसे पहले कई फ्लेमिश चित्रकार इटली हो आये थे व वहाँ की कला का अंधानुकरण करते हुए स्वतंत्र रूप से सर्जन करना भूल गये थे। 

किन्तु रुबेन्स महान प्रतिभा के कलाकार थे व इटली में किया अध्ययन उनकी प्रतिभा के लिए परिपोषक रहा। उनके चित्र केवल कड़ी मेहनत का फल नहीं हैं, उनमें ऐसा स्वाभाविक ऐंद्रिय आकर्षण व सजीवता है जो गुण अन्य चित्रकारों की कृतियों में नहीं देखने को मिलता। 

मानव शरीर की कोमल मांसलता, साटन के वस्त्रों की चमक, लयबद्ध रेखांकन, सौम्य मनोहर रंग-संगति व सम्पूर्ण चित्र का काव्यात्मक प्रभाव उनकी कला की विशेषताएँ थीं। शास्त्रीय कला से प्रभावित होते हुए रुबेन्स की कला में शास्त्रीय कला की कठोरता नहीं है; यह यथार्थवादी व जीवन्त है। 

किन्तु रुबेन्स की कला में शास्त्रीय कला की कठोरता नहीं है; वह यथार्थवादी व जीवन्त है। किन्तु रुबेन्स की कला का केवल यथार्थवादी दृष्टिकोण से समुचित रसग्रहण नहीं किया जा सकता। ब पहले वे कवि हृदय थे व मानव, पशुपक्षी, निसर्ग आदि चराचर से अपार प्रेम करते थे। 

काव्यमय स्वभाव के कारण उन्होंने ‘मारी द मेदिची का मार्साय पहुँचना’ जैसे यथार्थवादी विषय के चित्र में जलपरियों व कामदेव की आकृतियाँ सम्मिलित की हैं व ‘पृथ्वी व जलदेवता का मिलन’ जैसे रूपक चित्र बनाये हैं। 

रुबेन्स ने भिन्न विषयों को लेकर चित्रण किया जिसमें बाइबल की कथाएँ, साधु-सन्तों के जीवन की घटनाएँ, पौराणिक व ऐतिहासिक प्रसंग, देहाती जीवन, प्रकृति दृश्य व व्यक्ति चित्र हैं। उनकी विविध प्रकार के दर्शनों से समृद्ध, निरन्तर आविष्कारशील व बहुत ही सहजोत्स्फूर्त कला निर्मिति आश्चर्यजनक है। 

नैसर्गिक प्रतिभा के अतिरिक्त उन्होंने चित्रण की प्रविधियों पर परिश्रम से जो प्रभुत्व प्राप्त किया है उससे वे असंख्य चित्र बना सके। 1609 में जब वे अँटवर्प लौटे तब स्पेन के वाइसराय आर्चड्यूक फर्डिनांड ने उनको दरबारी चित्रकार नियुक्त किया। अब उन कार्यकक्ष फ्लैंडर्स का कला केन्द्र बन गया। 

बहुत से कुशल व्यवसायी चित्रकार उनके सहायक बने व वहाँ एक तरह से चित्रों की अत्यधिक माँग की पूर्ति करने के हेतु चित्रों का कारखाना खुल गया। 

रुबेन्स चित्र का प्रारम्भिक रूपांकन करते व उसके पश्चात् उनके सहायक उस पर कार्य करते; कोई जानवरों की आकृतियों पर कार्य करता, कोई वस्तु चित्रण करता तो कोई पृष्ठभूमि का दृश्य; अन्त में चित्र को परिष्कृत करने का कार्य रुबेन्स करते ।

आरम्भ काल के प्रसिद्ध चित्र ‘ईसा का क्रूसावरोहण’ में रुबेन्स ने अपनी प्रतिभा द्वारा पारम्परिक विषय को रूपान्तरित किया है; फिर भी उस पर उनके इटली में किये। अध्ययन का स्पष्ट प्रभाव है। अध्ययन से प्राप्त ज्ञान को आत्मसात् करके रुबेन्स ने चित्रित दृश्य को ऐसा रूप दिया है जो एक साथ करुण व प्रभावोत्पादक, नैसर्गिक व भव्य, ऐहिक व धार्मिक है। 

पीटर पॉल रूबेन्स, द गार्डन ऑफ लव, 1630-1631, म्यूजियो डेल प्राडो, मैड्रिड, स्पेन
पीटर पॉल रूबेन्स, द गार्डन ऑफ लव, 1630-1631, म्यूजियो डेल प्राडो, मैड्रिड, स्पेन

कर्णवत् दिशा में वक्र रेखाओं द्वारा ईसा व उनके शरीर व वस्त्र को नीचे उतारने वाले व्यक्तियों की आकृतियों को अंकित करने से अवरोहण में लयात्मक गति आ गयी है; तिरछी नाटकीय प्रकाशदीप्ति से ईसा की आकृति को विशिष्टता दी गयी है; ऊपरी हिस्से में चित्रित अस्पष्ट मानवाकृतियों से अवरोहण क्रिया का चित्रक्षेत्र के बाहर सम्बन्ध जुड़ जाने से समूचे दृश्य को दिव्य रूप प्राप्त हुआ है व ऐसा नहीं लगता कि यह कोई ऐहिक घटना है। 

प्रकाश का प्रभाव कारावाद्ज्यो के समान यथार्थवादी किन्तु भावुकतापूर्ण है तो ईसा के उभारदार मांसपेशियों का चित्रण माइकिलेंजेलो का स्मरण दिलाता है। मेरी मॅग्दालिन व उसकी सहचरी ईसा की शिष्याएँ जैसी नहीं बल्कि दरबारी स्त्रियाँ जैसी दीखती हँ व वह रुबेन्स की दरवारी कला का प्रभाव है। 

‘ईसा का क्रूसावरोहण’ जैसे रुबेन्स के चित्र जिनमें धार्मिक, ऐहिक, यथार्थ व भव्य तत्त्वों का संयुक्त रूप है प्रतिधर्म सुधारान्दोलन की माँग के अनुरूप थे व उन्हीं की वजह से रुबेन्स को बॅरोक काल की दरबारी कला में विशिष्ट स्थान प्राप्त हुआ। 

कॅथोलिक पंथ के गिरजाघर, राजा व आश्रयदाता ऐसे चित्र चाहते थे जो जनता को भौतिक सौन्दर्य से आकृष्ट कर सकें व उस पर मनोवैज्ञानिक धार्मिक प्रभाव डाल कर उसको कॅथोलिक पंथ के प्रति निष्ठावान बनाने में सहायक हों। सम्प्रति, बहुत से समीक्षक, रुबेन्स के धार्मिक विषयों के चित्रों को नापसन्द करते हैं। 

‘ईसा का क्रूसावरोहण’, ‘मजूसियों की आराधना’, ‘सन्त फ्रांसिस का अंतिम परम प्रसाद’ जैसे चित्रों के कलात्मक गुणों को वे मान लेते हैं किन्तु उनके विचार से इन चित्रों में अतिशयोक्ति, छिछलापन है व सच्चाई का अभाव है जो धार्मिकता के विपरीत है।

रुबेन्स को सौंपे गये अनेक चित्रण कार्यों में फ्रांस की रानी मारी व मेदिची के महल के लिए बनायी गयी चित्रमालिका महत्त्वपूर्ण थी जिसमें रूपक-चित्रण-शैली द्वारा रानी के जीवन की घटना के चित्र बनाये हैं। इससे फ्लेमिश कला का फ्रेंच कला पर काफी प्रभाव पड़ा व वहाँ के चित्रकार रुबेन्स के चित्रों का अध्ययन करने के लिए राजमहल आने लगे। 

रुबेन्स की कला की सभी विशेषताओं का उत्कर्ष ‘पेरिस का निर्णय’ जैसे चित्रों में देखने को मिलता है। पौराणिक प्रतीकों से कहानी को सूचित किया है, किन्तु चित्र का प्रमुख आकर्षण है तीनों देवियों के विवस्त्र कोमल शरीरों का हल्के झिलमिलाते हुए रंगों में चित्रण जो उन्होंने अपनी दूसरी पत्नी हेलन फुर्मेट के कार्य कक्ष में किये अध्ययन से किया है। 

नारी-शरीर की मृदुता व पुरुष-शरीर की बलिष्ठता के बीच का विरोध कुशलता से व्यक्त किया है। मनोहर रंगसंगति, विषयानुकूल संयोजन, लयबद्ध रेखांकन आदि कलात्मक गुणों से चित्र परिपूर्ण हैं। इसी तरह के अन्य पौराणिक विषयों के चित्रों में से ‘ल्युसियस की पुत्रियों का अपहरण’ विशेष प्रसिद्ध है। 

रुबेन्स के व्यक्ति चित्रों में से ‘इसाबेला ब्रँट के साथ आत्म चित्र’ व ‘हेलन फुमेंट’ का अर्ध-विवस्त्र खड़ा चित्र प्रसिद्ध हैं। उनके देहाती जीवन के चित्रों के उदाहरण हैं ‘लोकेन का खत’ व ‘जाड़े का दृश्य’। उन्होंने ‘आनिआस का भग्न जहाज’ जैसे रोमानी प्रकृति चित्र भी बनाये हैं। 

1628 में जब रुबेन्स माड्रिड गये थे तब उनका वेलास्केस से परिचय हुआ व वेलास्केस उनकी कला से प्रभावित हुए। रुबेन्स की कला ने न केवल समकालीन कला पर प्रभाव डाला बल्कि उसके मौलिक गुणों के कारण उसने उन्नीसवीं सदी तक भविष्य के कलाकारों का मार्गदर्शन किय। 

याकोब योर्डान्स ( 1593-1678), रुबेन्स के शिष्य थे व उन्होंने रुबेन्स से काफी शिक्षा अर्जित की किन्तु उनकी कला में स्वतंत्र प्रतिभा का भी परिचय मिलता है। उन्होंने धार्मिक, पौराणिक व घरेलू विषयों के चित्र एवं व्यक्ति चित्र बनाये जिसके उत्कृष्ट उदाहरण हैं ‘संत कैथेरिन का विवाह’, ‘उत्पादकता की रूपक कथा’, ‘चार सुसमाचार लेखक’, ‘उपहार धन का चमत्कार’। 

उन्होंने अपने घर को सजाने के लिए राशियों के बारह चित्र बनाये थे जो बाद में फ्रेंच सरकार ने खरीदे; ये भव्य व सरलीकृत चित्र बॅरोक अलंकरण शैली की श्रेष्ठ प्रतिनिधि कृतियाँ हैं। उनका अंकन कार्य अप्रतिम व आत्मविश्वासपूर्ण है एवं उनके चित्रों के संतुलित संयोजन, ठोस सामर्थ्यपूर्ण आकार व प्रशान्त वातावरण दर्शक को विमोहित करते हैं। 

रुबेन्स के समान, उनकी काव्यात्मकता में विशेष रुचि नहीं थी व उनका वास्तविकता की ओर झुकाव था; उनकी रंग-संगति भी रुबेन्स से अधिक चमकीली है व छाया-प्रकाश भी अधिक विरोधयुक्त है। (चित्र 67 )

आन्टोनी वॅन डाइक (1599-1641) ने कुछ समय तक रुबेन्स के साथ कार्य किया व उसके पश्चात् पाँच वर्ष तक इटली में रहे। 1632 में वे लंदन गये जहाँ इंग्लैण्ड के राजा चार्ल्स प्रथम ने उनको राजचित्रकार नियुक्त किया। उन्होंने धार्मिक विषय के चित्र एवं व्यक्ति चित्र बनाये। 

‘कांटे का मुकुट’ व ‘ईसा के शव पर शोक’ जैसे धार्मिक चित्र कलात्मक दृष्टि से उत्कृष्ट हैं किन्तु उनसे धार्मिक अनुभूति शायद ही हो पाती। ऐसे विषय के चित्रों में भी वे मानव शरीर व वस्त्रों के चित्रण पर ध्यान केन्द्रित करते व सम्पूर्ण चित्र को रमणीय बनाने की कोशिश करते। 

उनकी इस प्रवृत्ति के लिए राजा व अभिजात वर्ग का व्यक्तिचित्रण अनुकूल क्षेत्र था व उसी में वे बहुत ख्यातनाम हुए। ‘राजा चार्ल्स का घोड़े के साथ पूर्णाकृति चित्र’ (लुव्र), ‘परिवार के साथ आत्मचित्र’, ‘जेन गुडविन “मराया लुइस वान थुर्न’ (विएन्ना), उनके प्रसिद्ध व्यक्ति चित्रों में से हैं। 

वॅन डाइक को अभिजात वर्ग के मनोविज्ञान का खासा ज्ञान था व वे ऐसे सुरुचिपूर्ण व वैभवयुक्त व्यक्ति चित्र बनाते थे कि आश्रयदाता बहुत प्रसन्न हो जाते। उनके उत्तरायु में बनाये चित्रों में, जब वे सफलता के सर्वोच्च शिखर पर पहुँचे थे, उनके शिष्यों का सहकार्य स्पष्ट दिखाई देता है। 

फिर भी, उनके व्यक्ति चित्र ‘अँटवर्प के वाद्य संगीतकार लिबर्टी’ (पिनाकोटेक, म्युनिख ), (लेनाक्स के ड्यूक, जेम्स स्टुअर्ट’ (न्यूयॉर्क), ‘चित्रकार स्नाइडेर व पत्नी’ (कासेल) चित्रित व्यक्तियों की आंतरिक स्वभाव विशेषताओं को व्यक्त करने में सफल हुए हैं। वॅन डाइक द्वारा आयु के 19वें साल में बनाये चित्र ‘वृद्धा का व्यक्ति चित्र’ में (लिश्टेन्श्टाइन, विएन्ना) भी फ्रांस हाल्स के सदृश निर्भीकता व सीधे अंकन का प्रयोग है।

फ्लैंडर्स के अन्य व्यक्ति चित्रकारों में गम्भीर प्रकृति के व जोशपूर्ण शैली के चित्रकार कार्नेलिस डे वोस (1585-1651 ) व युस्टुस सुस्टेर्मान्स ( 1597-1681), जिन्होंने फ्लोरेन्स के मेदिची परिवार में दरबारी चित्रकार के रूप में कार्य किया था, हैं। सुस्टेमन्स के ‘मराया मॅग्दालिन’ व ‘पान्दोल्फो रिकासोलि’ (पित्ति संग्रहालय) ये व्यक्ति चित्र उनके उत्कृष्ट चित्रों में से हैं। 

सुस्टेर्मान्स के व्यक्ति चित्र कई बार वॅन डाइक की कला का स्मरण दिलाते हैं और उनके कुछ गहरी पृष्ठभूमि पर बनाये ऐसे व्यक्ति चित्र भी हैं जिनसे भविष्य के प्रभाववादी चित्रकार माने की आरम्भिक कलाकृतियों की पूर्व सूचना मिलती है।

फ्रान्स स्नाइडेर्स (1579-1657) ने रुबेन्स की कला शैली को इतना सफलतापूर्वक आत्मसात किया था कि रुबेन्स व योर्डान्स के अनेक चित्रों के जानवर एवं फल व फूलों के वस्तुचित्र उनके द्वारा बनवाये हैं। उन्होंने स्वतंत्र रूप से भी प्राणी चित्र एवं सब्जी व मछली के वस्तु चित्र बनाये हैं।

डाविड टेनियर्स कनिष्ठ (1610-1690) ने लम्बी अवधि तक ख्याति प्राप्त चित्रकार के रूप में कलानिर्मिति की। उनकी प्रसिद्ध चित्रकार क्र्यूगेल की पौत्री से शादी हुई थी, जिसके धर्मपिता रुबेन्स थे। वे देश के प्रशासक आर्चड्यूक लिओपोल्ड विल्यम द्वारा नियुक्त शासकीय चित्रकार थे व आर्चड्यूक के कला-संग्रह के संग्रहपाल थे। 

अपने लम्बे आयु काल में वे निरन्तर कला सर्जन करते रहे व उनकी कलाकृतियों के प्रमुख विषय थे ग्रामीण मधुशालाओं में शराब पीते हुए, धूम्रपान करते हुए व झगड़ते हुए किसान। और इन विषयों पर बनाये उनके असंख्य चित्रों के कारण उनको जो विशेष लोकप्रियता प्राप्त हुई वह लगभग तीन सदियों तक बनी रही। 

उसके पश्चात् उनकी लोकप्रियता कम हुई व यह भी निश्चित हुआ कि कलात्मकता के विचार से वे मध्यम दरजे के चित्रकार थे। किन्तु एड्रियन ब्रॉवेर (1605-1638), जिन्होंने भी उन्हीं विषयों को लेकर चित्रण किया, की कला निश्चित रूप से श्रेष्ठ दरजे की थी। उनकी कला सुसंगतिपूर्ण, रंग सौन्दर्य व अंकन पद्धति पर प्रभुत्व के विचार से श्रेष्ठ है। 

उनके चित्र ‘किसानों की पानगोष्ठी’ (ब्रसल्ज) व ‘झुटपुटे का दृश्य’ (लुव्र) में आधुनिक कला के सदृश स्वच्छंद व बलाघात के गुण हैं। यान सिबेरेख्ट्स (1627-1696) ही एक उस काल के फ्लेमिश कलाकार हैं जिन पर रुबेन्स की कला का प्रभाव नहीं है। 

उनके देहाती दृश्यों के चित्र ‘महल के निकट घाट’ (अँटवर्प), ‘बांगर का दृश्य’ (म्यूनिक) भूरे व ठंडे हरे रंगों से चित्रित हैं व उनमें आदिम कलाकारों के समान बारीकियों का ध्यान रखा गया है।

जर्मन कला का ह्रासकाल

सत्रहवीं सदी की जर्मन कला के ह्रास का कारण तीस वर्ष तक जारी युद्ध व परिणामस्वरूप उत्पन्न असुरक्षितता की परिस्थिति माना जाता है। किन्तु यह समझ में नहीं आता कि उसके पड़ोसी देश स्विट्जरलैंड की कला का भी उस समय ह्रास क्यों हुआ था जबकि वह युद्ध जनित परिस्थितियों से मुक्त व समृद्ध था। 

उस समय जर्मनी व आस्ट्रिया मैं रोटन्हामेर (1564-1623) और डच आब्राहम मिन्योन (1640-1679) जैसे कुछ चित्रकार थे जो इटालियन कला का अन्धानुकरण कर रहे थे किन्तु आडाम एल्शायमेर (1578-1610) के अलावा किसी ने कोई विशेष प्रशंसनीय कार्य नहीं किया। 

एल्शायमेर का जन्म फ्रान्कफुर्ट में हुआ और वे 1601 में रोम गये जहाँ उनकी मृत्यु हुई। रोम जाते समय वे वेनिस में भी रुके होंगे जो उनके चित्र ‘ईसा का बपतिस्मा’ (नेशनल गैलरी, लंदन) से प्रमाणित होता है क्योंकि उस चित्र की रंगसंगति व प्रकाश योजना वेनिस शैली से समानता रखती है। 

रोम में वे कारावाद्ज्यो व काराच्चि जैसे शास्त्रीय कलाकारों की कला की ओर आकर्षित हुए और वहीं उनका फ्लेमिश कलाकार रुबेन्स से परिचय हुआ। एल्शायमेर ने ताँबे की चादर पर लघुचित्र बनाये। उनकी अंकन पद्धति में सूक्ष्मता का दर्शन है किन्तु वह कठोर नहीं है। 

उनके चित्रों के विषय बाइबल व पौराणिक कथाओं से लिए हुए हैं और प्रकृति दृश्यों की पृष्ठभूमियों पर चित्रित हैं जिसके उदाहरण हैं ‘वन से निकलती हुई परी’ (बर्लिन), ‘मोजेस व जेथ्रो’ (कासेल), ‘दयालु समारी (लाइप्जिक)। 

एल्शायमेर के चित्रों में प्रकृति दृश्यों को दिए गए महत्त्व को देखकर उनको पुसँ व क्लोद लोरें के पूर्वगामी ऐतिहासिक प्रकृति दृश्यों के चित्रकार के रूप में माना जा सकता है। इंग्लैण्ड के व्यक्ति चित्रकार

सोलहवीं व सत्रहवीं सदी के इंग्लैण्ड के सबसे श्रेष्ठ व्यक्ति चित्रकार थे होल्बाइन व वॅन डाइक किन्तु वे दोनों विदेशी थे। इंग्लिश चित्रकारों में होल्बाइन व वॅन डाइक के अनुकरण करने वाले थे किन्तु उनके चित्र केवल दस्तावेजी महत्त्व के हैं और उनमें विशेष प्रतिभा का दर्शन नहीं है। 

फिर भी चित्रकार विल्यम डाब्सन (1610-1646) का ‘एन्डिमिओन पोर्टर’ एक अपवादात्मक कृति है जिसकी उस कालखण्ड की श्रेष्ठ कृतियों में गणना की जाती है। सर पीटर लेली (1618-1680) को इंग्लिश चित्रकार मानते हैं यद्यपि उनका जन्म हालैण्ड में हुआ था व आयु के 23वें साल तक वे वहीं रहे। 

डाब्सन के समान उन्होंने वॅन डाइक के लिए कार्य किया व वॅन डाइक की मृत्यु के पश्चात् उनका स्थान ग्रहण किया। लेली ने विलासी राजा चार्ल्स द्वितीय के दरबार के अनेक प्रतिष्ठित भद्रपुरुषों व महिलाओं के व्यक्ति चित्र बनाये। ‘लेडी बेलासिस’ व ‘काम्प्टेस ड ग्रामोंट’ (हैम्प्टन कोर्ट) ये व्यक्ति चित्र उनकी दरबारी शैली की प्रतिनिधि कृतियाँ हैं। 

लेली ने अपने आश्रयदाताओं व दर्शकों को प्रसन्न करने के उद्देश्य से व्यक्ति चित्र बनाये व उस उद्देश्य की पूर्ति में वे सफल भी हुए किन्तु उनकी कला में वॅन डाइक की श्रेष्ठता व अंकन पद्धति पर प्रभुत्व वैसा नहीं है।

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