अजंता की मुख्य गुफाओं के चित्र | प्रमुख गुहा मन्दिरों में उपलब्ध चित्र

अजंता की मुख्य गुफाओं के चित्र


गुफा नं० 9, 10-1, 2-16, 17 के प्रमुख चित्र


अजन्ता में चैत्य और बिहार दोनों प्रकार की 30 गुफायें हैं। इनमें गुफा संख्या 1, 2, 6, 7, 9, 10, 11,15, 16, 17, 19, 20, 21 व 22 में चित्र बने थे। आज केवल गुफा संख्या 1, 2, 9, 10, 16 व 17 चित्रों से मुख्य रूप से सुसज्जित है तथा यहीं अधिकांश चित्र सुरक्षित है। 


गुफा संख्या 9 के चित्र 


यह एक चैत्य गुफा है। यह ईसा से लगभग 100 वर्ष पूर्व निर्मित छुटी थी। इस गुफा में स्तूप पूजा वाला चित्र प्रसिद्ध है। लगभग 16 व्यक्तियों का एक समूह स्तूप की ओर बढ़ता अंकित किया गया है। सभी व्यक्ति लट्टूदार पगड़ी, बेलनाकार तांटक, फलकहार, केयूर, कटक, सकच्छ धोती एवं पटकों से सुसज्जित हैं। 


दायीं ओर के भाग में शंख, शहनाई, झांझ और मृदंग बजाते हुये वादक चित्रित हैं। यह चित्र किसी राजा द्वारा चैत्य को बनवाकर किसी संघ को भेंट देने के समारोह की घटना को प्रदर्शित करता है। 


इसी गुफा में भीतरी भाग पर बायीं ओर खिड़की के ऊपर पर्वत कन्दरा पर एक वृक्ष की छाँव में दो नाग-पुरूष बैठे हुये चित्रित किये गये हैं। इसी गुफा में पशुओं को खदेड़ते हुये चरवाहे अंकित किये गये हैं। 


गुफा संख्या 10 के चित्र 


यह भी एक चैत्य गुफा है। इस गुफा में सामजातक व छदन्त जातक के चित्र आते हैं जो गुफा को दाहिनो भित्ति पर बने हैं। बायाँ भित्ति पर बोधि वृक्ष व स्तूप की उपासना हेतु जाते राजा तथा उनका दल बना है। इस चित्र में दो स्त्रियों ने अस्थि मंजूषा उठा रखी है, एक स्त्री पवित्र जल का कलश उठाये हुये है। 


इनके चेहरे पर अधीरता का भाव है। सामजातक वाले चित्र की कहानी श्रवणकुमार की कहानी से मिलती है, लेकिन यहाँ वृद्ध माता-पिता का विलाप सुनकर एक देवी ने साम को पुनर्जीवित कर दिया। इसी गुफा के स्तम्भों पर बाद वाले काल की बुद्ध की समभंगी आकृतियाँ बनी हैं। 


गुफा संख्या 16 के चित्र 


यह गुफा विहार चित्रों से भरपूर है। इसका निर्माण 475 ई० से 500 ई० के मध्य वाकाटक राजा हरिषेण के मन्त्री वाराह ने करवाया। इस विहार गुफा में बुद्ध के जीवन के और जातक कथाओं से सम्बन्धित चित्र बने हैं। 


बुद्ध के जीवन से सम्बन्धित चित्रों में मायादेवी का स्वप्न, असित मुनि से वार्तालाप, गौतम का विद्याभ्यास, वैराग्य के निमित्तों का दर्शन, सुजाता को खीर, धर्मोपदेश, नन्द की दीक्षा आदि प्रमुखता के साथ चित्रित हैं।


गुफा संख्या 17 के चित्र 


यह भी विहार गुफा है। इस गुफा में गुफा संख्या 16 की अपेक्षा कहीं अधिक चित्र बने हैं। इस गुफा में बुद्ध जीवन से सम्बन्धित चित्र को अपेक्षा जातक कथाओं पर अधिक चित्र बने हैं। 


इस गुफा में विलासी का वैराग्य, पागल हाथी पर अंकुश, महाकपि का त्याग, हंसों की घबराहट, बेसन्तर का दान, कृतघ्न पर करुणा, नरभक्षी सौदास, सत्भमिंग जातक, मच्छ जातक, मातृ भक्त हस्ति, बन्दर और भैंसा, राक्षसियों का रूप जाल, मांसाहारी की शिक्षा, हंसाजातक, यशोधरा को भिक्षा, शिकारियों का अंग-भंग, मृग जातक, सिंहलावदान, भगवान बुद्ध के जीवन के अनेक चित्र तथा अलंकरण बने हैं। 


इस गुफा का निर्माण भी वाकाटक वंश के राजा हरिसेन के एक श्रद्धालु मण्डलाधीश ने करवाया था।


गुफा संख्या 1 के चित्र

यह गुफा मन्दिर 475-500 ई० के मध्य बना। इस गुफा में बोधिसत्वों के अनेक चित्र मिलते हैं। 


इस गुफा के प्रसिद्ध चित्रों में पद्मपाणि बोधिसत्व, मारविजय, शिवि जातक, नागराजा शंखपाल, श्रावस्ती का चमत्कार, महाजनक का वैराग्य, चीटियों के पहाड़ पर सौंप को तपस्या, चालुक्य राजा पुलकेशियन द्वितीय के दरबार में ईरानी राजदूत, बैलों की लड़ाई तथा छतों में कमल व हंसों के अलंकरण व प्रेमी युगलों के अप्रतिम चित्र हैं।


इस गुफा में पद्मपाणि बोधिसत्व वाला चित्र बड़ा ही मर्मस्पर्शी और कलात्मक है। बोधिसत्व की विशाल आकृति के चारों ओर अनेक आकृतियाँ बनी हैं। यशोधरा, बन्दर व वृक्ष आदि का बड़ा सुन्दर अंकन किया है।


गुफा संख्या 2 के प्रसिद्ध चित्र


इस गुफा का निर्माण 500-550 ई० के मध्य हुआ। इस गुफा के प्रमुख चित्रों में हंस जातक, विदुर पंडित की कथा सुनहरे मृग का धर्मोपदेश, दया याचना व बुद्ध जन्म है। इस गुफा में हंस जातक वाले चित्र में इस के रूप में बोधिसत्व बनारस के राजा व रानी को उपदेश दे रहे हैं। 


इस गुफा का दया याचना वाला चित्र सर्वोत्कृष्ट रहा है यह चित्र शांतिवादी जातक का ही एक भाग है। क्षाँतिवादी का अर्थ होता है क्षमा का उपेदश देने वाला इस गुफा के एक अन्य चित्र में एक वृद्ध भिक्षु डंडे के सहारे खड़ा दिखाया गया है जिसकी आँखों में अथाह असहाता अभिव्यक्त हो रही है। उसका खुला दाहिना हाथ रिक्तता के भाव को प्रदर्शित कर रहा है। विद्वानों ने इसे सर्वनाश की सूचना देने वाले किसी राजदूत का चित्र माना है।



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