भारतीय चित्रकला की प्रमुख गुफाएँ | अजन्ता,बाघ,जोगीमारा,बादामी,सित्तन्नवासल,सिगिरिया,एलोरा,एलिफेण्टा

 

भारतीय चित्रकला की प्रमुख गुफाएँ

अजन्ता की गुफाएँ

अजन्ता की गुफाएं महाराष्ट्र प्रान्त के औरंगाबाद से लगभग 102 किमी दूर स्थित हैं।  1819 ई० में यूरोप के लोगों को सर्वप्रथम इन गुफाओं का ज्ञान हुआ। अजन्ता में छोटी-बड़ी 50 गुफाएं है ये गुफाएँ दो प्रकार की हैं-

1. चत्य गुफाएँ तथा 
2. बिहार मुखाएँ।

चैत्यगुफा को स्तूप गुफा भी कहते हैं। यह गुफा पूजा-अर्चना का स्थान होती थी तथा विहार गुफा भिक्षुओं का निवास स्थान होती थी। अजन्ता में कलाकारों ने भित्ति चित्रण के लिए जिस पद्धति का प्रयोग किया वह टेम्परा पद्धति के अन्तर्गत आती है। 

अजन्ता में गिने-चुने रंगों का प्रयोग हुआ है जिन रंगो का प्रयोग हुआ यह प्रकृति से प्राप्त वस्तुओं से तैयार किये जाते थे तथा अधिकांश मिट्टी के रंग ही प्रयोग में लाए गए। 

अजन्ता में अलंकारिक आलेखनों की अधिकता है। गौतम बुद्ध के जन्म-जन्मान्तर की कथाएँ तथा जातक कथाएँ इन गुफाओं के चित्रों के मुख्य विषय है।

बाघ की गुफाएँ

1818 ई० में सर्वप्रथम बाघ को गुफाओं का परिचय ‘डेंजरफील्ड’ ने बम्बई से प्रकाशित किया। बाघ की गुफाओं का नाम निकट में स्थित गाँव ‘बाघ’ के नाम पर पड़ा है। यहाँ पर कुल 9 गुफाएँ हैं। 

पहली गुफा को ‘गृह’, दूसरी को पांडवों की गुफा‘, तीसरी को ‘हाथीखाना’, चौथी को ‘रंगमहल’ तथा पाँचवी को ‘पाठशाला’ कहा गया है।छठी, सातवीं, आठवीं तथा नयीं गुफाओं की छतें गिर जाने के कारण इनके विषय में बहुत कम ज्ञान प्राप्त हुआ है। 

बाघ की गुफाओं में दो तरह की शैलियाँ देखने को मिलती हैं जिनमें एक शैली में काले सफेद तथा लाल रंग से चित्र बनाए गए हैं। दूसरी शैली में कई रंगों द्वारा चित्र बनाए गए हैं।  

बाघ के कलाकारों ने चित्रों के संयोजन पर बल दिया है। बाघ के भित्ति चित्रों में मनोरम लताएँ, बगीचे एवं पशु-पक्षियों का अंकन किया गया है।

बाघ के कुशल चित्रकारों ने अपनी तूलिका से बौद्ध धर्म कथाओं का चित्रण अजन्ता के समान सफलतापूर्वक किया है।

जोगीमारा की गुफाएँ

यह गुफा सरगुजा रियासत में रायगढ़ की पहाड़ियों में ‘अमरनाथ’ नामक स्थान पर स्थित है। जोगीमारा गुफा की छत पर सात चित्र चित्रित है। इस गुफा के बारे में कहा जाता है कि यह गुफा वरुण देवता का मन्दिर थी।

जोगीमारा गुफा के समीप सीताबोंगा नामक गुफा है, जो नाट्यशाला थी यहाँ सभी चित्र भित्ति चित्रण शैली पर आधारित हैं। यहाँ सफेद, पीले, लाल और काले रंगों का प्रयोग हुआ है। ‘राव कृष्ण दास’ ने इस गुफा के चित्रों का विषय जैन धर्म से सम्बन्धित माना है।

बादामी की गुफाएँ

यह गुफाएँ बीजापुर जिले के अन्तर्गत आईहोल के निकट महाराष्ट्र प्रान्त में स्थित हैं। चालुक्य वंश के राजा पुलकेशिन प्रथम के वंश की देख-रेख में बादामी गुफाओं का कार्य सम्पन्न हुआ।

‘बादामी’ की गुफा में केवल चार चित्र माने जाते हैं। एक गुफा जैन धर्म से सम्बन्धित है। यहाँ प्राप्त चित्रों में एक चित्र विरहणी नायिका का है जो खम्बे का सहारा लिए आकाश की ओर निहारती अंकित की गई है।

आकाश में उड़ते हुए विद्याधर तथा शिव के विवाह के दृश्य भी यहाँ पर अंकित हैं। बादामी गुफा के चित्र ब्राह्मण मन्दिरों के सबसे पहले चित्र उदाहरण माने जा सकते हैं।

सित्तन्नवासल की गुफा

यह गुफा तमिलनाडु के तन्जीर के पास पदुकोटाई से उत्तर-पश्चिम की ओर कृष्णा नदी के तट पर सित्तन्नवासत में स्थित है। सित्तन्नवासत की गुफा पल्लव वंशी राजा महेन्द्र वर्मा तथा उसके पुत्र नरसिंह वर्मा द्वारा निर्मित हुई।

सितन्नवासल गुफा जैन मन्दिर है। यह मन्दिर चट्टान को काटकर बनायी गयी है। इस गुफा को सर्वप्रथम टी०ए० गोपीनाथ राव ने देखा ।

सित्तन्नवासल गुफा में नृत्य करती हुई नृत्यांगनाओं के अनेक चित्र उपलब्ध हैं जिनकी भाव भंगिमाएँ बहुत सजीव हैं। श्री एन०सी० मेहता ने यहाँ के चित्रों की प्रशंसा करते हुए कहा है कि इनमें हस्त मुद्राओं का प्रयोग अजन्ता की भाँति ही है।

सिगिरिया की गुफाएँ

श्रीलंका में सिगिरिया की गुफाओं का निर्माण राजा कश्यप प्रथम ने कराया था। ये गुफाएँ कोलम्बों से लगभग 100 मील की दूरी पर स्थित सिंह गिरि कस्बे के समीप है। सिगिरिया में 6 गुफाएं है किन्तु चित्र केवल चार गुफाओं में हैं, जिसमें विशेष चित्र केवल दो गुफाओं में बचे है। 

सिगिरिया के चित्रों में 21 स्त्रियों चित्रित की गई है जिनमें 17 एक कक्ष में और 4 दूसरे कक्ष में हैं। पहले कक्ष की आकृतियों बहुत बड़ी तथा दूसरे कक्ष की आकृतियों छोटी है।

सिगिरिया के चित्र अजन्ता के चित्रों से मिलते-जुलते है। बसों में प्रायः लाल, पीले, हरे तथा सफेद रंगों का प्रयोग मिलता है।

एलोरा की गुफाएं

यह गुफाएँ वरुनी नामक ग्राम के निकट हैं, जो ऐला नामक पहाड़ी को काट कर बनाई गई है। यहाँ पर जैन, बौद्ध तथा शैव तीनों की ही गुफाएँ हैं जिनमें 5 जैन धर्म से सम्बन्धित है। दस गुफाएं बौद्ध धर्म से सम्बन्धित तथा 17 शैव धर्म से सम्बन्धित है। एलोरा का मुख्य मण्डल 17 खम्बों पर आधारित है। सभी पर सुन्दर आलेख किया गया है। चित्रों में सुन्दर आकृतियों नटराज, रामायण तथा महाभारत के दृश्य विचित हैं।

जैन मन्दिर में इन्द्र सभा नामक चित्र है। परन्तु अब वह नष्ट हो गए हैं। आकृतियों का अलंकरण दो प्रकार का है। 

श्री ‘ब्राउन’ के अनुसार कैलाश मन्दिर एक ऐसा उदाहरण है जब मनुष्य का चित्र उसके हृदय व हाथ एक साथ मिलकर एक उच्च आदर्श की स्थापना हेतु कार्य करते हैं।

एलिफेण्टा की गुफा

यह गुफा बम्बई के निकट टापू पर स्थित है। यहाँ एक हाथी की विशाल मूर्ति है जिसके आधार पर इस गुफा का नामकरण किया गया।

एलिफेण्टा में फुल 9 मूर्तियाँ हैं, जो भगवान शंकर के विभिन्न रूपों को व्यक्त करती हैं। यहाँ एक मूर्ति पंचमुखी परमेश्वर की है। यह गुफा भगवान शिव को अर्पण की हुई प्रतीत होती है, जो शिव की हो भाति शान्त तथा अद्भुत है।

महत्त्वपूर्ण विन्दु

  • चित्रलक्षण, ऋग्वेद, महाभारत, रामायण, नाट्यशास्त्र आदि ग्रन्थों में कलाओं के सम्बन्ध में चर्चा की गई है। 

  • अजन्ता की गुफाएँ महाराष्ट्र प्रान्त के औरंगाबाद से करीब 102 किमी दूर स्थित हैं। 

  • अजन्ता के कलाकारों द्वारा जिस पद्धति का प्रयोग किया गया यह टेम्प्रा पद्धति के अन्तर्गत आती है। 

  • अजन्ता में कुल 30 गुफाएं हैं, जो दो प्रकार की हैं- 1. चैत्य गुफाएँ 2. बिहार गुफाएँ।

  • बाप की गुफाओं का परिचय 1818 ई० में प्रकाशित हुआ।  

  • जोगीमारा की गुफाएँ सरगुजा रियासत में ‘अमरनाथ’ नामक स्थान पर स्थित हैं। 

  • बादामी के चित्रों की खोज का श्रेय स्टेला कैमरिश को है।

  • बादामी के मुख्य-मण्डप की छत पर पैनलों के चार दृश्य बनाए गए हैं।

  • सिगिरिया की गुफाएँ कोलम्बो से लगभग 100 मील की दूरी पर हैं।

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