मध्यकालीन चित्रकला

ऐतिहासिक भूमिका 

आर्यावर्त के साथ-साथ दक्षिण पथ पर भी मौर्यों का साम्राज्य था। मौर्यों के बाद दक्षिण में सातवाहन वाकाटक राजवंशों का क्रमशः शासन रहा.

तत्पश्चात दक्षिण में कदंब पल्लव राष्ट्रकूट और चालुक्य आदि प्रमुख राजवंशों की सत्ता स्थापित हो रही थी यह सभी राजवंश कला प्रेमी व साहित्य सेवी रहे हैं उनके सम आश्रय मैं भारतीय संस्कृति अप्रत्याशित रूप से फली फूली.

उत्तर भारत में भी विशाल गुप्त साम्राज्य के अवसान के बाद मौखरी,  गुर्जर, प्रतिहार, चौहान, नेहड़वाल, चंदेल, पाल आदि राजवंशों का शासन रहा, जहां बाद में मुस्लिम आक्रांता ने अपनी सल्तनत स्थापित की.

दक्षिण की भांति ही उत्तर भारत के हिंदू शासकों ने भी मंदिर संस्कृति का विकास क्रम बनाए रखा. भारत में मध्यकाल वाला यह सांस्कृतिक वैभव वाकाटक-गुप्त काल के स्वर्ण युग में पोषित एवं स्थापित सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर चरम विकास व पतन के मध्य तरंगित होता रहा. 

मध्यकाल को कलात्मक विकास के आधार पर दो भागों में विभाजित कर सकते हैं- 


  • पूर्व मध्यकाल 650-1000  
  • उत्तर मध्यकाल 1000-1550

पूर्व मध्यकाल 650-1000 

बादामी गुफा (चालुक्य चित्रकला) 

चालुक्य वंश (छठी से आठवीं सती की ईसवी) में पुलकेशिन प्रथम (533-556) एक महत्वपूर्ण शासक था उसने वतापीपुर (बदामी) को राजधानी बनाया वर्तमान में यह स्थान कर्नाटक राज्य के बीजापुर जिले में है बाद में राजधानी पट्टाडक्कल में बनाई यही उसने बादामी के समीप आईहोल में कुछ गुफाओं का निर्माण प्रारंभ कराया.

उसके बाद उसका पुत्र कीर्ति वर्मा के (566 597) शासक बना लेकिन कीर्ति वर्मा के मरने के बाद राज्य का उत्तराधिकारी उसका छोटा भाई मंगलेश बन गया लेकिन उसके नाबालिक भतीजे पुलकेशिन द्वितीय ने युद्ध में मंगलेश को मार दिया और इस प्रकार अपने उत्तराधिकार की रक्षा की.पुलकेशिन द्वितीय का शासन काल प्राय: 608 से 642 के मध्य रहा उसने पल्लव शक्ति को कम कर दिया.

बादामी गुफा के चित्र मंगलेश या पुलकेशिन द्वितीय के शासनकाल में चित्रित हुए बताए जाते हैं बदामी गुफा का बाहरी आवरण अत्यंत सादा है लेकिन अंदर की ओर कलात्मक शिल्प व चित्र बने हुए हैं यहां एक गुफा में चालुक्य राज मंगलेश्वर का 578 का एक शिलालेख है इस शिलालेख के आधार पर गुफा का समय 578 निश्चित किया जाता है लेकिन चित्रों की रचना शिलालेख के कुछ समय बाद ही प्रतीत होती है. 

इसका समय सातवीं सदी के प्रथम दशक का माना जा सकता है यहां पर चार गुफाएं हैं इनमें तीन ब्राह्मण धर्म से संबंधित है तथा चौथी जैन धर्म से. ब्राह्मण गुफाओं का सर्वप्रथम उदाहरण यहां पर ही मिलता है ब्राह्मण गुफाओं में चित्रों का कार्य अजंता शैली से मिलता जुलता है. 

बादामी गुफा के चित्र

  1. शिव विवाह के कई प्रसंग यहां पर चित्रित किए गए हैं
  2. एक विरहणी का चित्र भावों की उत्पन्नता के लिए विशेष रूप से प्रसिद्ध है 
  3. इंद्रसभा में गायन और वादन का एक बहुत ही महत्वपूर्ण चित्र यहां पर चित्रित है यहां इंद्र एक सिंहासन पर बैठे हुए हैं तथा वहां पर उपस्थित नृत्यांगना जोकि इंद्र को आसक्त करने का प्रयास कर रही हैं.
  4. एक अन्य अन्य चित्र में कीर्तिवर्मा को अपने सेवकों या परिचारकों के साथ दिखाया गया है. 
  5. विद्याधर के उड़ते हुए युगलों के दृश्य भी अंकित हैं. 

इन चित्रों के अलावा कुछ चित्र ऐसे हैं जोकि कुछ-कुछ नष्ट हो चुके हैं परंतु लावन लावण्य की दृष्टि से बहुत ही सुंदर हैं प्रसिद्ध कला विद शिवराम मूर्ति ने बादामी के चित्रों की प्रशंसा करते हुए कहा है की-

बदामी में कुछ ही चित्रों के अवशेष होते हुए भी गए चित्रकार की निपुणता और हस्त कौशल के बहुत ही सुंदर और रावण ने में लावण्य मैं उदाहरण हैं

पनामालई और कांचीपुरम के भित्ति चित्र ( पल्लव कला )

चालूक्यों के जन्मजात शत्रु पल्लव राजा (600 से 888 ईसवी) भी बड़े कला प्रिय है उनके बनवाए हुए मंदिर और मूर्तियां विश्व में बहुत प्रसिद्ध है इस वंश के राजा महेंद्र वर्मन ने सर्वप्रथम तमिल प्रदेश में चट्टानों को कटवा कर मंदिरों का निर्माण करवाया.

महेंद्र वर्मन की अद्भुत कला प्रियता के लिए उन्हें विचित्र चित्त, चित्रकारपुल्ली,मत्तविलास, चैत्यकारी जैसी सम्मान पूर्ण उपाधियां दी गई. वास्तव में यह वास्तविक अभियंता, कवि, चित्रकार एवं एक स्नेही व्यक्तित्व वाला शासक था. महेंद्र वर्मन पहले जैन धर्म को मानते थे बाद में वे अपारस्वामी के प्रभाव में आने के बाद शैव धर्म को मानने लगे 

महेंद्र वर्मन ने मामंदुर की गुफाओं का जब निर्माण कराया तब उसमें भित्ति चित्र भी चित्रित कराएं लेकिन वहां पर अब किसी भी चित्र के अवशेष नहीं मिलते हैं.

महेंद्र वर्मन का प्रथम पुत्र नरसिंह वर्मन प्रथम भी अपने समकालीन पुलकेशिन और हर्ष के समान ही महान विजेता था नरसिंह वर्मन के समय में ही मामल्लपुरम या महाबलीपुरम के रथ मंदिर जो कि रथ की तरह दिखते हैं का निर्माण हुआ. 

नरसिंह वर्मन के उत्तराधिकारी राजा राज सिंह भी कला के बहुत बड़े आश्रय दाता थे उनके समय में कला की बहुत उन्नति हुई.

प्रोफ़ेसर दुब्रील ने पनामालई और कांचीपुरम के राजा राज सिंह के काल के पल्लव मंदिर मैं बने हुए भित्ति चित्र के अवशेषों की खोज की पनामालई में भित्ती या दीवार के सहारे पैर सटाकर निर्विकार चिंतन मुद्रा में खड़ी किसी देवी का चित्र प्राप्त हुआ है.

कांचीपुरम के कैलाश नाथ मंदिर मैं भित्ति चित्र में राज परिवार सोम स्कंध व शिव पार्वती के चित्र मिलते हैं प्रसिद्ध कला मर्मज्ञ व जानकार शिवराम मूर्ति ने कांचीपुरम के कैलाश नाथ मंदिर में शैव धर्म से संबंधित कुछ रेखा चित्रों की खोज की है.

यहां पर यह कहना बहुत ही आवश्यक है कि सित्तनवासल में बने हुए चित्र को अभी तक पल्लव राजा नरसिंह वर्मन के काल का माना जाता था परंतु नए शोधो के आधार पर वह पल्लव काल के ना होकर पांड्य राजा पल्लव भंजन मरवर्मन राज सिंह के बनवाये हुए है.

 

पांड्य राजवंश 

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