मुगल शैली | अकबर के काल में कला का विकास

मुगल शैली

मुगल शैली परिचय

भारत में मुगल सल्तनत बाबर के साथ कायम हुई। धीरे-धीरे उसके पाँव जम जाने के पश्चात् चित्रकला के क्षेत्र में एक नई परम्परा और शैली का प्रादुर्भाव हुआ,बाबर स्वयं कलाकारों का पारखी शासक था।

बाबर अपने साथ शाहनामा नाम की एक सचिन पांधी लाया था जो लगभग दो सौ वर्षों तक भारत के विभिन्न शाही पुस्तकालयों में सुरक्षित रही, परन्तु अंग्रेजों के शासनकाल में लंदन की रॉयल एशियाटिक सोसायटी में पहुँच गई।

हुमायूँ को कला-प्रेम भले ही विरासत में मिला था परन्तु राजनीति की कठोर परिस्थितियों के कारण वह अपने शासनकाल में कभी चैन की साँस न ले सका।

हुमायूँ युद्ध में जाते समय भी चित्रकला की सुन्दर पुस्तकें अपने साथ रखता था और जब भी समय मिलता उनसे अपने कला-प्रेम की संतुष्टि करता था।

दिल्ली में गद्दी सम्हालने पर उसने ख्वाजा अब्दुस्समद और मीर सैयद अली नामक दो ईरानी चित्रकारों को बुलाकर अपने दरबार में नियुक्त कर लिया।

इन्हीं दो चित्रकारों की अध्यक्षता में स्वयं हुमायूँ तथा बालक अकबर ने चित्रकारी की प्रारम्भिक शिक्षा ली। हुमायूँ के संरक्षण में महत्वपूर्ण पुस्तक ‘दास्तान-ए अमीरहम्ज़ा’ का निर्माण प्रारम्भ हुआ था। परन्तु इसकी पूर्णता अकबर के शासन काल में हुई।

अकबर के काल में कला का विकास (1556-1605 ई०)

अकबर के शासनकाल में शिक्षा, संस्कृति व कला के क्षेत्र में अभूतपूर्व विकास हुआ। 14 फरवरी सन् 1556 में मात्र तेरह वर्ष की आयु में अकबर गद्दी पर बैठा।

अकबर ने सब धर्मों का समन्वय करके दीन-ए-इलाही धर्म की नीति अपना कर धार्मिक उदारता का परिचय दिया। के समय में शिक्षा, संस्कृति व कला के क्षेत्र में अनूतपूर्व उन्नति हुई।

अकबर की चित्रशाला में अधिकांश हिन्दू चित्रकार थे। उसने सौ से अधिक चित्रकारों की नियुक्ति की थी जो फतेहपुर सीकरी के एक भवन में कार्य करते थे।

मीर सैयद अली और ख्वाजा अब्दुस्समद ने ईरानी शैली को भारतीय शैली में ढालकर मुगल शैली की नींव रखी। अकबर के दरबार में चित्रकारों को उच्च स्थान दिया जाता था उन्हें दरबारी मनसबदार बनाया जाता था और

पाँच सौ मनसबदारी तक के ओहदे प्रदान किये जाते थे। अकबर कालीन चित्रों में चमकदार रंगों का प्रयोग हुआ है जो मीनाकारी के रंगों के समान दमकते हैं।

इस समय के चित्रों की रेखाओं में स्वाभाविक गति एवं कोमलता है।

अकबर कालीन ग्रन्थचित्रों के मध्य भाग में सुलिपि के लिए पट्टियाँ बनाकर स्थान छोड़ा गया है जो ईरानी प्रभाव है।

इस शैली के चित्रों में भारतीय चित्रकारों एवं उनकी पुष्ट

परम्परा का प्रभाव एवं बादशाह का भारतीय प्रेम स्पष्ट रूप से दिखायी पड़ता है। जिससे इस काल की चित्रकला को ठेठ भारतीय रूप प्राप्त हुआ।

इस समय हाशियों में भी बेलबूटे बना कर सजावट की जाती थी। 

अकबर कालीन प्रमुख चित्रकार

मीर सैयद अली

यह कुशल सफवी शैली का फारसी चित्रकार था. तंब्रेज में जन्म हुआ, पिता का नाम मीर मंसूर था। मुगल शैली को मौलिकता प्रदान करने में इसका योगदान था ‘जुदाई’ उपनाम से कविता करता । अमीर हम्जा के आधार पर अनेक चित्र बनाये।

ख्वाजा अब्दुस्समद शीराजी

कुशल चित्रकार और लिपिकार, दक्षिणी ईरान के तबेज में शीराज का निवासी था। अकबर की इस पर विशेष कृपा दृष्टि थी 1576 ई० में इसे फतेहपुर सीकरी की चित्रशाला का अध्यक्ष बनाया गया। इसके पश्चात् 1584 ई० में इसे मुल्तान का दीवान बनाया गया।

Leave a Comment