पाल चित्र शैली की विशेषताएँ | Paal Painting Style

 ‘पाल’ चित्रशैली

अजन्ता के चित्रों में चित्रकला ने स्वर्ण युग देखा उसके पश्चात चित्रकला की स्वछन्द धारा मन्द प्रतीत होने लगती है। हिन्दु नवजागरण के परिणामस्वरूप मन्दिरों के निर्माण की प्रवृत्ति अधिक दिखाई देती है। 

भारत के पूर्वी भागों में ग्रन्थ चित्रकला का सर्वप्रथम उदाहरण 10वीं-11वीं शताब्दी के पाल राजाओं के आश्रय में बने बौद्ध धर्म सम्बन्धी हस्तलिखित ग्रन्थ के रूपों में मिलता है। धर्मपाल, देवपाल व महिपाल बहुत प्रसिद्ध शासक हुये जिन्होंने अजन्ता के अनुकरण पर सचित्र बौद्ध ग्रन्थों का निर्माण कराया। 

धीमान और वित्तपाल इन सभी चित्रकारों ने ग्रन्थों के बीच में चित्रण किया। इस चित्रशैली की निम्नलिखित विशेषतायें हैं। लामा तारानाथ के अनुसार, “जहाँ-2 बौद्ध धर्म था अन्य क्षेत्रों की अपेक्षा कला का हास (पतन) कम हुआ था।

पाल चित्र शैली की विशेषताएँ

1. विषय वस्तु 

इस काल में प्रज्ञापारमिता, महामयूरी, गदाव्यूह, साधनमाला आदि ग्रन्थों में महायान बौद्ध देवी-देवताओं, जातक कथाओं तथा बौद्ध तीर्थस्थानों के चित्र बने हैं। चित्रों को शोभार्थ बनाया है तारा देवी व मंजू श्री देवता का अंकन बहुत बार हुआ है। ग्रन्थों को काष्ठ-पटलियों के मध्य रखकर सुरक्षित रखा जाता था। राष्ट्रीय संग्रहालय दिल्ली में 10वीं-11वीं शती की एक पटली पर वेस्सत्तर जातक का चित्र बना है। वेस्सन्तर जातक वाला चित्र अजन्ता में कई भित्तियों पर चित्रित हुआ है।

2. अन्तराल व रूप सम्बन्ध 

ताड़पत्रीय ग्रन्थों की माप प्राय: 22 इंच से 224 ) इंच है। चित्र स्थान को छोड़कर शेष भाग में काली स्याही से सुन्दर अक्षरों को लिखा जाता था। प्राय: ताड़पत्र पर दोनों ओर लम्बवत् तथा मध्य में क्षैतिज आलेख स्थान निश्चित किया जाता था संयोजन सरल समसन्तुलित बने हैं। मुख्य दैविक आकृति मध्य में बड़े आकार में बनाई गई है। इसके दोनों ओर उप-आकृतियों से अन्तराल को संयोजित किया है। रूप व आकारों की भीड़-भाड़ आलेख्य स्थान में नहीं है। मानवाकृतियों में अजन्तावाली लचक है। वृक्षों में प्राय: कदली व नारियल को बनाया गया है तथा अन्य ज्यामितीय व पुष्पों की सजावट अक्षरों वाले स्थानों के इधर-उधर की जाती थी। आकाश भी प्रायः चित्रित नहीं हुआ है। जिससे सम्पूर्ण तल पर आकृतियों को ही प्रमुखता मिल गई है। 

3. वर्ण विधान 

इन चित्रों में नीले, लाल, सफेद, पीले, हरे और काले रंग का प्रयोग मिलता है।

रायकृष्ण दास के अनुसार (लाल) सिन्दूरी, महावर, हिंगुल, हरताल, पियोडी; (नीला) लाजवर्दी, नील; (सफेद एवं काला) ये मूल रंग और इनके मिश्रण उत्पन्न हरे, गुलाबी, बैंगनी आदि रंगों का प्रयोग मिलता है। स्वर्ण रंग का प्रयोग नहीं है। 

जब तक भारत में इस शैली के चित्र बनाये गये तब तक हमें स्वर्ण रंग नहीं मिलता परन्तु नेपाल से प्राप्त होने वाले चित्रों में स्वर्ण व रजत रंग मिलता है।

इस प्रकार बौद्ध चित्रकला भित्तियों से पाल शैली के ताड़पत्रीय ग्रन्थों पर उत्तर गई। उसी रूप में वह नेपाल शैली में प्रवेश कर गई। लेकिन नेपाल में ध्वजाओं पर पुनः बड़े माप में यह चित्र शैली प्रकट हुई। यह चित्र शैली तिब्बत की ओर मुड़ गई जहाँ मन्दियों तथा चैत्यों की भित्तियों पर यह शैली उतरने लगी। 

नेपाल दरवार पुस्तकालय में रखे ग्रंथों-1174 ई० के पिगल माता और 1395 के नित्याहि नकातिलक से पता चलता है कि हिन्दू ग्रंथों में भी इसी बौद्ध चित्र शैली का अनुकरण किया गया है। 

पाल चित्र शैली के चित्र देश-विदेश के अनेक संग्रहालयों में मिलते हैं।

Leave a Comment