मध्यकाल की चित्रकला | पोथियों की चित्रकला | मध्यकाल के राजवंश | पूर्व मध्यकाल की चित्रकला | उत्तर मध्यकाल की चित्रकला | पाल शैली जैन शैली | राजस्थानी शैलियों का उदय | Medieval Painting | Medieval Dynasties | Early Medieval Painting | Post Medieval Painting | Pala style Jain style | Rise of Rajasthani Styles

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(पोथियों की चित्रकला) (७०० ई० से १६०० ईसवी तक )

भारतवर्ष में प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व से ही भित्तिचित्र कला का एक संस्थान स्थापित होने लगा था। इस कला-शैली में उत्तरोत्तर उच्चकोटि के शिल्प की वृद्धि होती गई, परन्तु कुछ शताब्दियों के पश्चात् इसकी प्रगति मंद पड़ने लगी। 

आठवीं शताब्दी के प्रारंभ में इस शैली की विशेषताएँ अधपतन का रूप धारण करने लगीं और इस कला-शैली के उच्चतम विकास की जो आशा की जाती थी वह अपूर्ण रह गई। सातवीं शताब्दी से बौद्ध धर्म में हास और पतन के चिन्ह दिखाई पड़ने लगे, जिनका प्रभाव देश की कला तथा साहित्यिक रचनाओं पर भी पड़ा। 

लगभग एक हज़ार वर्ष तक विदेशी यवन आक्रान्ताओं ने देश में अशान्ति और अव्यवस्था उत्पन्न कर सुखद वातावरण को नष्ट कर दिया जिससे भारतीय लोगों को कला विकास का उचित अवसर ही नहीं मिल सका। दूसरी ओर हिन्दू धर्म पुनः शक्ति को प्राप्त होने लगा था। 

इन सब कारणों से कला-विकास की स्वच्छन्द धारा शिथिल पड़ने लगी। लगभग एक हजार वर्ष पश्चात् ही पुनः कलाकृतियों के उत्तम उदाहरण प्राप्त होते हैं। इस एक हज़ार वर्ष की मध्यकालीन अवधि की कला के उदाहरण बहुत कम उपलब्ध हैं और इनकी कला – शैली बहुत निम्नकोटि की है।

भारत में मध्यकाल की लगभग एक हज़ार वर्ष की अवधि के अंतराल में चित्रकला की प्रगति शिथिल होने के अनेक कारण हैं। यह देखकर आश्चर्य होता है कि चित्रकला को छोड़कर अन्य कलाएँ विकसित हुयीं जबकि चित्रकला नितान्त शिथिल पड़ गई। 

आठवीं तथा नवीं शताब्दी से हमारे देश पर मुसलमानों के निरन्तर आक्रमण होने लगे थे और स्थानीय राजनैतिक शक्तियाँ पूर्ण रूप से सैन्य-संगठन और सुरक्षा की समस्याओं के समाधान में उलझी रहीं। नवनित राज्यों के रूप बदलते जा रहे थे, शासक, प्रशासक और संविधान उलटते जा रहे थे, देश की

दशा अत्यन्त छिन्न-भिन्न हो गई थी ऐसी अवस्था में किसी भी महान कलाकृति का निर्माण असम्भव था। दूसरी ओर सातवीं शताब्दी से ही धार्मिक क्षेत्र में एक नवीन क्रांति और परिवर्तन की लहर दौड़ रही थी हिन्दू भगवत् धर्म पुनः समाज में सबल हो रहा था हिन्दू धर्म का नवीन और परिमार्जित रूप जनता में अति लोकप्रिय होता जा रहा था, इसके साथ ही कलपूर्वक करता से इस्लाम का प्रचार तथा प्रसार आरंभ हो रहा था। 

इस कारण मध्यकालीन राजनैतिक और धार्मिक समस्याओं पर विचार करने से स्पष्ट हो जाता है कि कलाकारों की शक्तियाँ राजनैतिक और धार्मिक क्षेत्रों में भी अवश्य लग गई होगी।

यदि यह मान लिया जाय कि अजन्ता के भिक्षु कलाकार, जिन्होंने सातवीं शताब्दी तक सुंदर चित्र बनाये और जिनकी कला शैली प्रचलित परम्परा बन गई थी, समाप्त हो गए होंगे संभव नहीं, क्योंकि यह शैली धार्मिक प्रतिक्रिया के पश्चात् भी परम्परा के रूप में प्रचलित रही। बौद्ध धर्म का स्थान हिन्दू धर्म ने ग्रहण किया। 

यह नवीन हिन्दू धर्म कला के अन्य क्षेत्रों जैसे भवन, मूर्ति तथा वास्तुकला के क्षेत्रों में बौद्ध धर्म से अधिक कलापूर्ण था। उदाहरणार्थ भवन तथा मूर्तिकला की हिन्दू काल में विशेष उन्नति हुई। इस समय के भव्य मंदिर तथा उच्चकोटि के शिल्प से युक्त मूर्तियों कला उन्नति की साक्षी हैं। दृश्य-कलाओं के क्षेत्र में आठवीं शताब्दी से दसवीं शताब्दी के बीच का समय भारतीय कला सिद्धान्तों और आदर्शों के चिन्तन और मनन का काल था। 

इस समय हिन्दू धर्म कलाकृतियों और कलाकारों को प्रतिष्ठित और नियंत्रित करने वाली एकमात्र शक्ति था। हिन्दू धर्म में चित्र के स्थान पर मूर्ति का विशेष महत्त्व था। मूर्ति के लिये मंदिर की आवश्यकता थी इसी कारण चित्र का स्थान मूर्ति, भवन तथा वास्तु ने लिया। ये ही कारण हैं कि इस समय में चित्रकला की उन्नति न होते हुए भी अन्य कलाओं का विकास हुआ। 

एलीफेन्टा, ऐलोरा तथा बोल्वुदुर की मूर्तिकला में हिन्दूकला के उत्तम उदाहरण सुरक्षित हैं, शिल्पियों ने विशालकाय मूर्तियाँ तथा प्रस्तर- तक्षण के नमूने प्रस्तुत किये। 

इन भव्य उदाहरणों के चिन्ह आज बहुत कम प्राप्त हैं क्योंकि उत्तर भारत में गुप्त शासकों के बाद उनके साम्राज्य की सीमा पर ही मुसलमानों के साम्राज्य स्थापित होने लगे और उन्होंने इस भाग के हिन्दू भवनों तथा मंदिरों आदि को नष्ट कर दिया। 

इस समय की चित्रकला के उदाहरण बहुत कम प्राप्त हुए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि चित्रकला का पूर्व विकसित माध्यम पुनः हिन्दू धर्म के जागरण से मूर्ति के रूप में प्रस्फुटित हो पड़ा।

इस समय की चित्रकला के उदाहरण न प्राप्त होने का एक कारण यवन विध्वंसों के अतिरिक्त यह भी हो सकता है कि भारतवर्ष की विनाशकारी जलवायु ने इस समय की कलाकृतियों से सुसज्जित भवनों को नष्ट कर दिया हो। 

यदि यह सोचा जाय कि हिन्दू धर्म के अनुयाइयों ने इन चित्रों को नष्ट किया, तो व्यर्थ है, क्योंकि धर्म की सहिष्णुता के कारण यह सोचना संगत नहीं कि हिन्दू धर्म में किसी धर्म की शिक्षा, उपदेश, कला या साहित्य के प्रति कोई प्रतिक्रिया का भाव या विद्रोह था। अतः यही निश्चित है कि यवनों के द्वारा कराये गए भवनों के विध्वंसों तथा अग्निकांडों से कलाकृतियों को भारी क्षति पहुंची। 

मुसलमानों ने भवनों तथा मूर्तियों के साथ ही इस समय के चित्रपटों, चित्रित पोथियों अथवा चित्रफलकों या भित्तिचित्रों को भी नष्ट कर दिया इतिहास में मुसलमानों की ऐसी अभद्रता के अनेक प्रमाण उपलब्ध हैं। 

एक बात और भी है कि सभी कलाओं में सामान्यता प्रगति समान स्तर पर नहीं होती क्योंकि बौद्ध धर्म के साथ अजन्ता में भित्ति चित्रण की कला का उच्चतम विकास हुआ जबकि उसकी सहकला मूर्तिकला एक सौ वर्ष तक पूर्णतः को प्राप्त नहीं हुई। 

इन दोनों कलाओं का प्रत्येक देश में घनिष्ठ सम्बन्ध दिखाई पड़ता है वैसे चित्रकला मूर्तिकला की अपेक्षा अधिक सरल है और प्रत्येक देश में प्रायः चित्रकला के पश्चात ही मूर्तिकला का विकास होता दिखाई पड़ता है। मध्यकाल में भित्तिचित्रण की कला समाप्त होने लगी और जो चित्र बनाये गए वे अधिकांश लघु पोथीचित्र या पटचित्र हैं। 

सम्भवतः मुसलमान विजेताओं या आक्रान्ताओं के द्वारा भित्तिचित्र नष्ट कराये जाने के डर से चित्र ऐसे लघु रूप में बनाये जाने लगे जो आपत्तिकाल में सुविधा से सुरक्षा हेतु साथ में ले जाये जा सकें और विनाश से बच सकें। इसी कारण अनुमानतः पटचित्र या तालपत्रों पर बने चित्र इस समय में प्रचलित हुए जो भित्तिचित्रों की तुलना में अधिक स्थायी न थे।

वृहत्तर भारत की चित्रकला – मध्यकालीन भारत की चित्रकला का अनुमान लगाने के लिए बृहत्तर भारत की चित्रकला का अध्ययन अधिक लाभकारी होगा, क्योंकि इस प्रकार के कला उदाहरणों से तत्कालीन भारतीय चित्रकला का अनुमान लगाया जा सकता है बौद्ध धर्म प्रचारकों तथा भिक्षुओं को अपने धार्मिक उपदेशों तथा सिद्धान्तों के प्रचार हेतु चित्रकला का उत्तम साधन मिला। 

अतः जब वे दूसरे देशों में धर्म-प्रचारार्थ गये तो अपने साथ चित्रपट भी लेते गये। इन पटचित्रों पर भगवान तथागत के उपदेश तथा उनकी जीवन कथाएँ चित्रित रहती थीं। 

जनसाधारण को प्रभावित करने में तथा धर्म प्रचार में इन कलाकृतियों का विशेष स्थान था भारत के समीपवर्ती देशों जैसे खुत्तन, तुखिस्तान, तिब्बत, चीन, लंका, स्याम, कम्बोडिया, वर्मा, नेपाल, अफगानिस्तान, कोरिया तथा जापान में बौद्ध धर्म तथा दर्शन के प्रचार के साथ भारतीय कला इन देशों में पहुँची। 

बौद्ध-कला तथा धर्म के अत्यधिक प्रसार का कारण वह भी था कि जिन देशों की संस्कृति या विचारधारा को अपने बौद्ध आचार्यों ने उच्च आदर्श दिये वहाँ उन्होंने उन देशों की संस्कृति तथा विचारधारा से कुछ अपनाया भी इसी कारण इन देशों की भवन, मूर्ति, वास्तु वा चित्रकला का भी भारतीय कला से सन्निकट सम्बन्ध प्रतीत होता है।

‘पगान’ के प्राचीन मंदिरों में जातक कथाओं के चित्र प्राप्त हुए हैं और ‘बरमा’ के मंदिर में तंत्र-मंत्र पर आधारित अनेक तांत्रिक चित्र भी मिले हैं। धरमा के चित्रों में शक्तिशाली तीव्र रेखाएँ तथा अस्वाभाविक पाल शैली के ढंग की भंगिमाएँ हैं। श्रीलंका की सिगिरिया गुफा तथा अनुरखपुर के चित्रों पर भारतीय कला का स्पष्ट प्रभाव है।

‘मीरान’ के भवन अवशेषों में पश्चिम एशिया निवासी रोमन चित्रकार ‘तित’ के द्वारा बनाई अनेक कृतियाँ प्राप्त हुई है, जिसमें ‘बेरसान्तर जातक’ (चित्र पर अंकित लिपि के आधार पर समय चौथी शताब्दी) चित्र उल्लेखनीय है। 

इस चित्र पर गान्धार शैली का प्रभाव है। ‘दंदाउइलीक’ से प्राप्त भित्तिचित्रों और चित्रपटों के अवशेष सातवीं तथा आ शताब्दी के हैं। इन चित्रों की शैली भारतीय-चीनी प्रभाव से युक्त है। ‘दंदाउइलीक’ में प्राप्त एक स्त्री आकृति का एक महत्त्वपूर्ण चित्र है। 

इसके चेहरे, हाथों और आभूषणों आदि की लिखाई में भारतीयता है। इस आकृति के साथ एक बालक है और पृष्ठभूमि में बुद्ध तथा बौद्ध स्थविर अंकित किये गए हैं।

‘कूचा क्षेत्र’ में अनेक गुफाओं में भारतीय शैली की चित्रकारी प्राप्त होती है। यहाँ पर गुफाओं में ब्रह्मा तथा इन्द्र, शिव तथा पार्वती को नन्दी के साथ अंकित किया गया है। 

एक स्थान पर राजपूत या राजस्थानी कला जैसा विषय लिया गया है और बादलों से वर्षा की बूंद ग्रहण करता चातक अंकित किया गया है। यहाँ पर भित्तिचित्र, काष्ठफलक चित्र, पटचित्र आदि प्राप्त हुए हैं जिन पर भारतीय ईरानी शैली का प्रभाव है।

कलिंग या तेलंगाना की मोन जाति मोलमीन से उत्तर में ‘थाटन’ नामक क्षेत्र में जाकर बस गई थी। यह जाति बौद्ध धर्म की अनुयायी थी। पाँचवीं ईसवी शताब्दी के पश्चात तिब्बत की ‘प्यू’ जाति भी ‘मध्य वरमा’ में पहुँची। इस जाति के लोगों ने सौ मठों का निर्माण कराया जिन पर चाँदी तथा सोने की पच्चीकारी उत्तम है। 

उस समय के पात्रों पर उत्कीर्ण लेखों से ज्ञात होता है कि उस समय वहाँ कोई विक्रमवंशीय भारतीय राजा राज्य करता था।

‘प्रोम’ नामक प्राचीन स्थान के उत्खनन के पश्चात् पाँचवीं तथा छठी शताब्दी की कलाकृतियों के उदाहरण प्राप्त हुए हैं। इन उदाहरणों में बुद्ध की एक प्रतिमा तथा सोने-चाँदी की अनेक पिटारियाँ उपलब्ध हुईं। जिन पर संस्कृत भाषा के लेख अंकित हैं।

ग्यारहवीं शताब्दी के मध्य बरमियों ने बरमा पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया और राजा अनोराता ने ‘पगान’ में अपनी राजधानी स्थापित कर ली। इस शासक ने बौद्ध मठों के निर्माण का कार्य आरंभ कराया पगान के एक प्राचीन मंदिर में आज भी विष्णु प्रतिमा प्रतिष्ठित है। पगान के अधिकांश भवन बौद्ध शैली के हैं। 

यहाँ पर ऐसे उल्लेख मिलते हैं कि धर्म प्रचार के लिये पाँच सहस्त्र स्तूपों का निर्माण किया गया परन्तु इनके अवशेष मात्र ही आज प्राप्त हैं। यहाँ का श्वेत आनंद मंदिर अनोराता के पुत्र वियानसात ने ग्यारहवीं शताब्दी में बनवाया था। थियानसात की माता भारतीय थी। उसने बिहार के बौद्धगया मंदिर का पुनरुद्धार कराया था। 

श्याम के अन्तर्गत बैंकाक में एक ३८० फुट ऊँचा विशाल स्तूप है जो उत्तरी भारत के स्तूपों के समान है। उत्तरी श्याम के लेम्पून नामक स्थान में प्राप्त पाँच मंजिला मंदिर है। यहाँ पर स्तूप के दोनों ओर बुद्ध की खड़ी मुद्रा में सात मूर्तियाँ विद्यमान हैं।

चीन में भारतीय कला के प्रभाव की पहली लहर तिब्बत तथा नेपाल होती हुई पहुँची। दूसरी ओर खोत्तन तथा तुर्किस्तान में प्राप्त कला उदाहरणों में ऐसा प्रतीत होता है कि इस क्षेत्र में हेलेनिस्टक, भारतीय, ईरानी तथा चीनी संस्कृतियों का आदान-प्रदान होता था। अतः चीन में दूसरा भारतीय प्रभाव इस ओर से पहुँचा। 

तत्कालीन उन्नत संस्कृतियाँ इस क्षेत्र पर अपना प्रभाव इस कारण भी जमा रही थीं कि यह क्षेत्र ग्रीक, फारसी, ईरानी, चीनी तथा भारतीय व्यापारियों के काफिलों के आने-जाने का प्रधान मार्ग और व्यापार केन्द्र था। 

इन काफिलों के साथ एशिया में दूर-दूर तक पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक भारतीय धर्म प्रचारक गये तुषित (पेकिंग) के एक बिहार में पाँच सौ अर्हतों की मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। जिनमें बुद्ध के अनेकों रूप- अवलोकेश्वर, मंजुश्री आदि रूपों की सुंदर मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं। 

चीनी सम्राट यांगती (६०५-६१७ ई०) के राजदरबार में खुत्तान के एक चित्रकार तथा उसके चित्रकार पुत्र को राजाश्रय प्राप्त था। ये दोनों भारतीय शैली के चित्र बनाते थे। कोरिया तथा चीन में इन्हीं चित्रकारों ने बौद्धकला का प्रसार किया।

जापान के ‘होरऊजी मंदिर की दीवारों पर अजन्ता शैली की चित्रकारी आज भी सुरक्षित है। सेरयुजी मंदिर में प्राप्त बुद्ध प्रतिमाओं पर गांधार शैली का प्रभाव स्पष्ट दिखायी पड़ता है। ‘अंकोर’ का संसार प्रसिद्ध मंदिर बौद्ध शिल्प की दृष्टि से एक उत्तम कलाकृति है। 

‘चम्पा’ में राजा चन्द्र वर्मा (हिन्दू) तथा ‘कम्बोज ‘ (कम्बोडिया) में अनेक शासकों ने वैष्णव तथा शैव मंदिर बनवाये कम्बोज में अधिकांश बड़े-बड़े शेव तथा वैष्णव मंदिर दसवीं से बारहवीं शताब्दी तक बनाये गए। इन मंदिरों में ‘प्रस्तर शिलों’ पर रामायण की कथाओं को काटकर उभारा गया है। 

इसी प्रकार ‘बोरुबुदुर’ (जावा) के मंदिरों की भित्तियों पर रामायण के चिन्ह प्राप्त हैं। मलाया तथा जावा में बौद्ध शैली की अनेक कलाकृतियाँ सुरक्षित हैं। ‘मलाया’ में नालंदा शैली के आधार पर बुद्ध की धातु मूर्तियों का निर्माण किया गया। इसी प्रकार यहाँ पर भारतीय पल्लव शैली की विष्णु मूर्तियाँ बनायी गई। 

जाया में आठवीं शताब्दी के मध्य शैलेन्द्र वंश के शासकों ने बोरुवुदुर का मध्यस्तूप बनवाया और बुद्ध की १२० प्रतिमाएँ बनावायी गईं। इसके अतिरिक्त चारों ओर की बीधिकाओं को अलंकृत करने के लिए १३०० मूर्तियाँ बनायी गई।

१८६३ ई० में दो विद्वानों ४० ओरलस्टीन तथा लेकाक ने मध्य एशिया में भारतीय कला के उदाहरण उपलब्ध किये और उन्होंने ईरान, दनदन-अहिलिक आदि क्षेत्रों में जो कला सामग्री प्राप्त की उससे भारतीय कलाओं का महत्त्व बढ़ा। 

१६०३ ईसवीं में उत्तर पश्चिमी सीमान्त प्रदेश और बलुचिस्तान में पुरातत्व की खोज के लिए डॉ० स्टीन को निमंत्रित किया गया था। इस समय उन्होंने अफगानिस्तान में वामियाँ की भग्न अवशेष गुफाओं से चौथी शताब्दी के भारतीय शैली के चित्र प्राप्त किये।

इन कलाकृतियों पर भारतीय कला प्रभाव के अतिरिक्त, ईरानी तथा चीनी प्रभाव सुस्पष्ट है। बाभियाँ के उत्तर में फन्दुकिस्तान में भी बौद्ध मठों की खोज का श्रेय डॉ० स्टीन को प्राप्त है। इन मठों में भारत के गुप्त तथा पाल राजाओं के आदेशों पर चित्र बनाये गए।

डॉ० स्टीन ने बड़ी सावधानी से खुत्तन के चारों ओर (मध्य एशिया) के भवनों की भित्तियों से भित्तिचित्रों को लगभग २ इंच मोटी पलास्तर की तह के साथ उतार लिया और पलस्तर के इन चित्र खण्डों को अल्मोनियम के फ्रेमों में कसकर इनकी सुरक्षा हेतु इन्हें यहाँ से हटा लिया। 

ये विशाल चित्र अब डायरेक्टर जनरल ऑफ आरकेलाजीकल सर्वे ऑफ इंडिया नई दिल्ली के संरक्षण में हैं और इनको सेंट्रल एशिया एन्टीक्वीटीज़ म्युजियम जनपथ नई दिल्ली के एक विशाल कक्ष की दीवारों पर कला आलोचकों तथा जनता के अवलोकन हेतु पुनः पुरानी अवस्था तथा योजना में संजोया गया है। 

इन मानवाकार से भी बड़ी आकृतियों वाले भित्तिचित्रों की रेखा, आकृति-रचना तथा रंग योजना पर अजन्ता की भारतीय कला का गहरा प्रभाव है। लेकाक तथा स्टीन के द्वारा खोजे गए दनदन-अहिलिक के भित्तिचित्र, जो आठवीं शताब्दी के हैं, ऐसे प्रतीत होते हैं कि अजन्ता के किसी कुशल चित्रकार ने अंकित किये हैं।

चियुटजू में लेकाक ने आठवीं शताब्दी के कुछ चित्रित झंडे खुदाई में प्राप्त किये हैं जो तिब्बत के मंदिरों के धानका नामी झंडों से मिलते-जुलते हैं। थानका चित्रों की परम्परा निःसन्देह बहुत प्राचीन है और तिब्बत के कई प्राचीन मंदिरों में इस प्रकार के झंडे प्राप्त हुए हैं। 

इन प्राचीन थानका चित्रों के कुछ उदाहरण निश्चय ही सत्रहवीं शताब्दी के पूर्व के हैं। ग्यारहवीं शताब्दी के एक चीनी आलोचक टेंगचुन के एक उल्लेख से ऐसा प्रतीत होता है कि यह चित्र भारत में भी बनते थे। विशेष रूप से बंगाल स्थित नालंदा मठ में बौद्ध भिक्षु या पुजारियों के द्वारा बुद्ध तथा बोधिसत्व के चित्र पश्चिमी देशों से मँगाये हुए पट पर बनाये जाते थे। 

ग्यारहवीं शताब्दी में मगध, तिब्बत, नेपाल आदि देशों का आपस में गहरा सम्पर्क था, इस कारण यह सम्भव हो सकता है कि इन तीनों की कला में एक ही प्रकार की कलात्मक अभिव्यञ्जना हुई हो। अफगानिस्तान में कुछ ऐसे चित्रित काष्ठफलक तथा हाथीदाँत के फलक प्राप्त हुए हैं जिन पर बोधिसत्व की आकृतियाँ उत्तकीर्णित हैं।

तिब्बत में चैत्य भवनों की बड़ी-बड़ी भित्तियों को बुद्ध की जीवन कथाओं से अलंकृत किया गया। इन चित्रावलियों पर बौद्ध दर्शन तथा कला का पूर्णरूपेण प्रभाव था। 

तिब्बत के कुछ भित्तिचित्र बहुत प्राचीन है और इनकी शैली में अजन्ता का अत्यधिक अनुकरण हैं है तिब्बत के थानका नामी झंडों के चित्र भी अपनी शैलीगत विशेषताओं के कारण प्राचीन भारतीय कला संस्थानों की याद दिलाते हैं। 

परसी ब्राउन महोदय का मत है कि यह चित्र भित्तिचित्र भी कहे जा सकते है क्योंकि धरातल मितिथि की प्रणाली पर बनाया गया है परन्तु फिर भी चित्र कपड़े पर बने टेम्परा चित्र हैं। पूर्व मध्यकाल – ७०० ईसवी से १००० ईसवी तक उत्तर- मध्यकाल – १००० ईसवी से १५५० ईसवी तक । 

मध्यकाल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि (६०६ ई० से १५२६ ई० तक) हूण जाति के आक्रमणों से गुप्तवंश नष्ट हो गया और देश में छोटे राज्य स्थापित होने लगे। अंत में लगभग एक शताब्दी पश्चात् थानेश्वर के राजा हर्षवर्धन (६०६-६४७ ई०) ने सारे उत्तरी भारत पर विजय प्राप्त करके एक शक्तिशाली राज्य की स्थापना की उसने कन्नोज को अपनी राजधानी बनाया। 

मालवा तथा सौराष्ट्र पर उसने विजय प्राप्त की। वह हिन्दू मत का अनुयाई था। उसने भव्य देव मंदिर बनवाये। उसके समय में नालंदा नगर ( विहार प्रान्त में) शिक्षा का महान केन्द्र था।

राजपूत काल में हर्ष के पश्चात भारतवर्ष में अराजकता फैल गई और राजपूतों ने छोटे-छोटे राज्य उत्तरी भारत में स्थापित कर लिये। ये राज्य लगभग पाँच सौ वर्ष तक रहे फिर एक-एक करके मुसलमान शासकों ने उन्हें जीत लिया। 

राजपूत विष्णु, दुर्गा तथा शिव के उपासक थे अतः उन्होंने देवताओं के विशाल मंदिर बनवाये। मुसलमान आक्रमण के समय भारत में निम्न राजपूत राज्य प्रसिद्ध थे.

मध्यकाल के राजवंश

(१) तोमर वंश

दिल्ली में संचार या तोमर राज्य वंश के शासकों में अंगपाल द्वितीय प्रसिद्ध हुआ । उसने दिल्ली का राज्य दोहते पृथ्वीराज चौहान (अजमेर के शासक) को दे दिया था।

(२) चौहान वंश

अजमेर में चौहान वंश राज्य करता था। इस वंश में पृथ्वीराज महान राजा हुआ उसने मुहम्मद गौरी को तरावड़ी की लड़ाई में हराया परन्तु ११६२ ई० में गौरी ने उसको कैद करके मरवा दिया।

(३) राठौर वंश 

कन्नौज में राठौर वंश शासक था। इस वंश के जयवन्द राठौर की पुत्री संयुक्ता को पृथ्वीराज स्वयंवर से उठा ले गया। गोरी ने जयचंद को ११९४ ई० में हराया। (४) पाल वंश-बिहार और बंगाल में पाल वंश और नेपाल में सेन वंश का बारहवीं शताब्दी ईसवी में मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने अंत कर दिया।

(५) परमार वंश

मालया में परमार वंश में राजा भोज (१०१८ से १०६० ई०) प्रसिद्ध कला-प्रेमी तथा कला मर्मज्ञ राजा हुआ वह प्रसिद्ध विद्वान था।

(६) चन्देल वंश

बुन्देलखण्ड के चन्देल राज्य को १२०३ ई० में कुतुबुद्दीन ऐबक ने मुस्लिम राज्य में मिला लिया।

(७) सिसोदिया वंश 

मेवाड़ के सिसोदिया वंश में राणा सांगा तथा महाराणा प्रताप महान योद्धा हुए। उन्होंने मुगलों से लड़ाइयाँ लड़ीं।

महमूद गजनवी (६६७-१०३० ई०) ने भारत पर सत्रह बार आक्रमण किये और उसने जयपाल (पंजाब का राज्यपाल) तथा राजा आनंदपाल को हराया। उसने नगरकोट (कांगड़ा दुर्ग) १००६ ई० में जीता और लूट में चाँदी का बना एक ३० गज वर्गाकार माप का मकान ले गया। 

उसने मथुरा, कन्नौज, लाहौर तथा सोमनाथ पर आक्रमण कर लूटमार की। १२०६ ई० से १५२६ ई० तक भारत में निम्न ‘पठान’ या ‘सुल्तान राजवंश’ स्थापित हुए जिनसे राजनैतिक अशान्ति, अस्थिरता तथा हलचल बनी रही

  • (१) गुलाम वंश (१२०५-१२६० ई०), 
  • (२) खिलजी वंश (१२९०-१३२० ई०), 
  • (३) तुगलक वंश (१३२०-१४१४ ई०), 
  • (४) सैय्यद वंश (१४१४- १४५० ई०), 
  • (५) लोदी वंश (१४५०-१५२६ ई०)

इस काल में मुसलमान भवन शैली में भवन बनाये गए।

पूर्व मध्यकाल की चित्रकला ( ७०० ई० से १००० ई० तक)

भारतवर्ष में पूर्व मध्यकाल की चित्रकला के उदाहरण बहुत कम प्राप्त होते हैं। इस समय की अनेक साहित्यिक रचनाओं में चित्रकला का उल्लेख आया है। दसवीं शताब्दी से ग्यारहवीं शताब्दी के मध्य कुछ भित्तिचित्र बनाये जाते रहे जिनके उदाहरण एलोरा के कैलाशनाथ मंदिर या बेरुल की गुफाओं में प्राप्त हैं।

पूर्व मध्यकाल के भित्तिचित्र (७०० ई० से १००० ई० तक)

एलोरा-एलोरा की गुफाओं को बेरुल के नाम से भी पुकारा जाता है। एलोरा के मंदिर अजन्ता से लगभग ८२ किलोमीटर या ५० मील की दूरी पर हैदराबाद राज्य में स्थित हैं। यह स्थान औरंगाबाद रेलवे स्टेशन से २६ किलोमीटर (लगभग १६ मील) की दूरी पर स्थित है। 

यहाँ पर एक सम्पूर्ण पहाड़ी को काटकर मंदिरों के रूप में परिणित कर दिया गया है। एलोरा या एलूरा का प्राचीन नाम एलापुर है, यह स्थान आरम्भिक राष्ट्रकूट राजाओं की राजधानी था। 

कालान्तर में एलोरा (एलापुर) में राजाकृष्ण देवराय ने सर्वप्रथम एलोरा के कैलाशनाथ मंदिरों का निर्माण कार्य एक पहाड़ी को कटवाकर आरम्भ कराया था। इन गुफाओं का शिल्प रीतिबद्ध है। ये गुफाएँ एक लम्बी गहरी वालू चट्टान के उत्तरी दक्षिणी पठार की ओर काटकर बनायी गई हैं। 

इन गुफाओं में दाहिनी ओर की दक्षिण की बारह गुफाएँ बौद्ध धर्म से सम्बन्धित है, मध्य की सत्रह गुफाएँ ब्राह्मण धर्म से तथा उत्तर की पाँच गुफाएँ जैन धर्म से सम्बन्धित हैं। इन गुफाओं के निकट दो गुफाएँ और हैं। 

बौद्ध गुफाओं का समय अनुमानतः ५५० ई०-६५० ईसवी है। ये गुफाएँ चित्रित थीं परन्तु अब भित्तियों पर चित्र अवशेष नहीं रहे हैं। कैलाशनाथ मंदिर के एक ओर चौदहवीं गुफा रावण की खाई है तथा इक्कीसवीं गुफा रामेश्वर में मूर्तिकला के उत्कृष्ट उदाहरण सुरक्षित हैं। 

कैलाशनाथ मंदिर की योजना तथा शैली में पट्टादकाल स्थित वीरूपक्ष शैली का अनुकरण है इस गुफा की छतों तथा दीवारों पर चित्रों के अनेक अवशेष सुरक्षित हैं जो सफाई के पश्चात ही स्पष्ट हो रहे हैं। कैलाशनाथ मंदिर की छत्तों पर तथा पश्चिमी अर्द्धमण्डप में अधिकांश चित्र प्राप्त हैं। 

इन गुफाओं में से लकेश्वर, इन्द्रसभा तथा गणेशलेण गुफाओं में चित्र अभी पर्याप्त सुरक्षित हैं। यहाँ पर चित्रों की दो या तीन तहें हैं आरम्भिक चित्रों की तह ७५० ई० से ८०० ई० के समय की है। 

यहाँ पर चित्रों में गरुड़ पर आसीन वैष्णवी, सिंह पर बैठी देवी तथा सिंहवाहनी के चित्र या अधिकांश अप्सराओं विद्याधर, देवताओं तथा गन्धर्वो के चित्र हैं। इन दिव्य आत्माओं को बादलों के मध्य अंकित किया गया है। 

एलोरा के उत्तरी छोर पर जो पाँच जैन गुफाएँ हैं, उनमें सबसे प्रसिद्ध बत्तीसवीं गुफा है जो ‘इन्द्रसभा’ के नाम से पुकारी जाती है। यह गुफा नवीं शताब्दी में काटकर बनायी गई ।। 

उत्तरी भारत के ललितपुर जिले के अन्तर्गत मदनपुर नामक स्थान में भित्तिचित्र प्राप्त हुए हैं। दसवीं से बारहवीं शताब्दी के मध्य में राजा भोज के भतीजे उदयादित्य ने भी एलोरा में भित्तिचित्र बनवाये।

शैली-इन चित्रों की शैली अजन्ता के समान है किन्तु इस शैली में पत्तन के चिन्ह स्पष्ट दिखाई पड़ते हैं। एलोरा की आकृतियों की लिखाई निर्बल है और आकृतियों के अंग-प्रत्यंग में कठोरता तथा जकड़न दिखाई पड़ती है। 

अधिकांश आकृतियों के चेहरे समाचरम, लम्बी नुकीली परले गाल से बाहर निकली नाक और बड़ी-बड़ी आँखें बनायी गई है। आँखें भी चेहरे की सीमा रेखा से बाहर निकली बनायी गई है। आकृतियों में अतिश्योक्तिपूर्ण नाटकीयता है।

पल्लव राजवंशकालीन भित्तिचित्र केलाशनाथ और कांचीपुरम के वैकुण्ड पीरूमल मंदिरों में आठवीं शताब्दी के चित्र-खण्ड रह गये हैं। इन चित्रों के अतिरिक्त पल्लय कलाकारों की ठोस कला शैली का अन्य दो स्थानों पर परिचय प्राप्त होता है। 

पल्लव शैली के चित्रों में आरम्भिक चित्र ‘तलगिरीश्वर मंदिर की दीवारों पर पन्नामालाई में सुरक्षित हैं। यह मंदिर राजा नरसिंह वर्मन द्वितीय ने बनवाया जिसका राज्यकाल लगभग ६६५ ई० से ७२२ ई० था। इस प्रतिभा सम्पन्न शासक ने ७२० ई० में चीन के लिये एक राजदूत भेजा था। उसने राजसिंह (राजाओं का सिंह) की उपाधि धारण की। 

उसका राज्यकाल शान्तिपूर्ण था। उसने भवन निर्माण में अत्यधिक प्रेम प्रदर्शित किया जिसका उदाहरण मामलपुरम के मंदिरों में स्पष्ट दिखाई पड़ता है। पल्लव चित्र शैली के दूसरे उदाहरण पन्नामालाई में सबसे अच्छे रूप में सुरक्षित है। 

इन चित्र अवशेषों में एक स्त्री की आकृति सुंदर है, जिसमें दक्षिण की सुडौल, छरछरे शरीर वाली स्त्री की आदर्श परिकल्पना की गई है। दक्षिणी कलाकारों के द्वारा रचित भित्तिचित्रों में तरल रंगों के क्रमिक तान या बल दर्शनीय हैं जिनके कारण चित्रों में कोमलता आ गई है। पल्लव चित्रमाला के सित्तन्नवासल के चित्र श्रेष्ठ हैं। जिनका उल्लेख किया जा चुका है।

घोल राजवंशकालीन भित्तिचित्र  

राजराजा प्रथम (६८५-१०१६ ई०) के शासक बनते ही चोल राजवंश दक्षिण भारत में शक्ति सम्पन्न हो गया। चोल राज्य के अन्तर्गत छः मंदिरों में परवर्तीकाल के भित्तिचित्र अभी सुरक्षित हैं। राज-राजेश्वर मंदिर में खंडित भित्तिचित्रों के नीचे पुराने चित्रों के चिन्ह मिले हैं। इन चित्रों की सफाई तथा सुरक्षा का कार्य चल रहा है।’

पल्लव तथा चोल राजाओं के समय की कला उत्तरी भारत की अजन्ता की परम्परा से प्रभावित एवं प्रेरित है। राजराजा प्रथम के समकालीन वृहदीश्वर मंदिर (तंजीर) के अर्द्धमण्डपों तथा दीवारों पर अंकित चित्रावलियों की शैली अजन्ता से सम्बन्धित है, परन्तु इन चित्रों में दक्षिणी प्रभाव अधिक है। तंजौर का वृहदीश्वर मंदिर चोल सम्राट राजराजा ने १००० ई० में निर्मित कराया था।

वृहदीश्वर मंदिर में एक अति महत्त्वपूर्ण चित्र प्राप्त है जिसमें शंकर दो अप्सराओं का नृत्य देख रहे हैं। इस चित्र में विष्णु का अंकन भी किया गया है। गंधर्व तथा गण वाद्ययंत्रों से संगीत उत्पन्न कर रहे हैं। नृत्यरत आकृतियों की भंगिमाएँ लयपूर्ण हैं। यहाँ पर एक घुड़सवार का चित्र भी अंकित है। 

नटराज के रूप में शिव का अंकन इस मंदिर की एक विशेषता है। राजराजा को अपनी रानियों तथा सेवकों के साथ चित्रित किया गया है। इस मंदिर के पर्याप्त चित्र सत्रहवीं शताब्दी में नायकों के शासनकाल में नष्ट कर दिये गए।

चित्रण विधि- तुंगभद्रा नदी के दक्षिण में भित्तिचित्रण की सेक्को-फ्रेस्को पद्धति। प्रचलित थी। डॉ० परमाशिवन के अनुसार “चूने तथा रेल की तह (आधार) पर चूने के पलास्तर की एक चिकनी तह लगाई जाती थी और उसको ओपा जाता था जिस पर रंग स्थायी रूप से जम जाते थे। “

तमिल साहित्य से ऐसा प्रतीत होता है कि प्राचीनकाल में उपरोक्त वर्णित भित्तिचित्रण पद्धति का ज्ञान ईसवी शताब्दी से प्रारम्भ हो गया था। यद्यपि इस पद्धति का दक्षिण क्षेत्र में भिन्न-भिन्न प्रकार से प्रयोग किया गया। 

इस प्रकार से तैयार किये गए धरातल पर लाल रंग से रेखांकन के पश्चात तरल रंग लगाये जाते थे। इस शैली में रंगों की कोमलता होते हुए भी रेखाएँ कर्कश, मुद्राएँ उग्रता लिए तथा आकृतियों की अंग-भंगिमाएँ, अकड़ – जकड़दार हैं।

पूर्व मध्यकाल के कलाविषयक साहित्यिक ग्रंथ

“विष्णु धर्मोत्तर पुराण – विष्णु धर्मोत्तर पुराण लगभग छठी शताब्दी या कुछ बाद का ग्रंथ है। इस ग्रंथ के अन्तर्गत ‘चित्रसूत्र’ नामक एक अध्याय की रचना की गई है। इस ‘चित्रसूत्र’ का सर्वप्रथम डॉ० स्टेला क्रमरिश फिर डॉ० आनंद कुमार स्वामी ने अंग्रेजी भाषा में अनुवाद किया। 

‘चित्रसूत्र’ के आरम्भिक भाग से विदित होता है कि चित्रकला के सम्बन्ध में पहले से ही अनेक ग्रंथों में विचार व्यक्त होने लगे थे और चर्चाएं होने लगी थीं। इसी ग्रंथ में एक कथा आती है जो इस प्रकार है- प्राचीनकाल में उर्वशी की रचना करते हुए नारायण मुनि ने लोक मंगल के लिए ‘चित्रसूत्र’ की रचना की। 

मुनि के निकट आई सुर-सुंदरियों को भ्रमित करने के लिए नारायण मुनि ने आम का रस लेकर पृथ्वी पर एक रूपसी स्त्री का चित्र अंकित किया था। चित्र में अंकित उस अत्यन्त रूपसी स्त्री के चित्र का दर्शन कर वे सभी सुर सुंदरियाँ लज्जित हो गईं। इस चित्र से नारायण ने विश्वकर्मा को चित्रकला सिखायी। 

इससे विश्वकर्मा ने सृष्टि का चित्र बनाया। इस प्रकार चित्रकला के लक्षणों से युक्त उस चित्राकृति को महामुनि ने विश्वकर्मा को समर्पित कर दिया जिससे चित्रसूत्र का श्रीगणेश हुआ।’

सम्पूर्ण ‘चित्रसूत्र’ नौ अध्यायों में विभक्त है जिनमें चित्र के आयाम, प्रमाण, सामान्य नियम, आकृति के लक्षण, रंग, रेखा, रूप, भाव, चित्र में गुण-दोष तथा चित्रों की सामग्री आदि के विषय में पर्याप्त चर्चा की गई है।

इस ग्रंथ के अनुसार चित्र रसोदायक और आनंददायक होना चाहिए और अनेक प्रकार के चित्रों में रस या स्थायी भाव के अनुकूल ही चित्र की धारणा होनी चाहिए। विष्णुधर्मोत्तरपुराण के ‘चित्रसूत्रम्’ नामक प्रकरण में पाँच प्रकार के रंग माने गए हैं। 

जो इस प्रकार हैं- 

  • (१) श्वेत
  • (२) पीत
  • (३) लाल
  • (४) कृष्ण
  • (५) नीला। 

इन पाँच रंगों से अनेक दूसरे रंग बनाने की विधियां भी बतायी गई है। इसी प्रकार भिन्न-भिन्न प्रमाण विधियों तथा नाप-जोख की रीतियों बतायी गई हैं। इस ग्रंथ में पाँच प्रकार के पुरुष तथा उनके माप तथा लक्षण बताये गए हैं। पुरुषों के पाँच भेद-मल्य, रुचक, हंस, भद्र, शशक बताये गए हैं। 

इस ग्रंथ में चार प्रकार के चित्र बताये गए हैं-सत्य, वैणिक, नागर तथा मिश्र । स्त्रियों के बालों के अनेक भेद-कुन्तल, दक्षिणवृत, तरंग, वारिधारा, जटासर बताये गए हैं। इसी प्रकार नेत्रों तथा अंग-भंगिमाओं के अनेक प्रकार भी बताये गए हैं। 

नेत्र-चपलाकृति, उत्पल, पत्रभा, मत्योदरा, पद्मपत्रनिभा, सनाकृति तथा अनेक अंग-भंगिमाएँ-रिजयगता, अनरिजू सविक्रीता सम, अर्द्ध-विलोचन, परोवगता, परिव्रता, परिच्छथगता, पराव्रतो तथा समानता बतायी गई है। इस ग्रंथ से ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय समाज में चित्रकला का पर्याप्त प्रचलन था और चित्रकला के सिद्धान्तों का पूर्ण विकास हो चुका था। 

इस ग्रंथ में मिति-संस्कार-मित्ति के लेप पदार्थ उसकी प्रयोग विधि, मुहूर्त, इष्टेव के ध्यान आदि के विषय में बताया गया है। इस काल के कई अन्य ग्रंथों में विष्णुधर्मोत्तर के समान ही सरल सूझ-बूझ पर आधारित चित्रकला विषयक अध्याय प्राप्त होते हैं। इन ग्रंथों के यह अध्याय ‘चित्रसूत्र’ पर ही आधारित हैं।

‘मानसार’ मानसार के उल्लेखों के आधार पर ऐसा प्रतीत होता है कि महाविश्वकर्मा अर्थात् ब्रह्मा के चार मुखों से विश्वकर्मा, त्वष्टा, मय तथा मनु की उत्पत्ति हुई। विश्वकर्मा तथा इन्द्र की पुत्री का विवाह हुआ और उनकी संतान को स्थापित कहा गया। 

स्थपित समस्त शास्त्रों में पारंगत थे। उनके अधीन वर्धकी और तक्षक कार्य करते थे। वर्धकी चित्रकर्म का ज्ञाता था। वर्धकी का नाम शिल्पाचायों में गिना जाता था। इस ग्रंथ की रचना पर्याप्त पूर्व काल में लगभग २०० ई० में हो चुकी थी जिसका परवर्ती संकलन मध्यकालीन है।

‘चित्रलक्षण’

इस ग्रंथ की रचना का काल छठी तथा सातवीं शताब्दी के मध्य माना जाता है। इस ग्रंथ का तिब्बती भाषा में अनुवाद प्राप्त है। इस ग्रंथ के प्रस्तावना लेख के अनुसार यह ग्रंथ विश्वकर्मा और राजा नग्नजित् (भयजित्) के द्वारा बताये चित्रकर्म के लक्षणों का संग्रह है। 

इस ग्रंथ के तीसरे अध्याय में चित्र रचना सम्बन्धी सिद्धान्तों का विवेचन किया गया है। इसमें पशु-पक्षी, स्त्री-पुरुष आदि के चित्रांकन की भिन्न-भिन्न विधियाँ तथा विभिन्न आकृतियों के अंगों तथा उपांगों के अनुपात में लम्बाई, चौड़ाई आदि का वर्णन किया गया है। 

उदाहरणार्थ- इस ग्रंथ में नेत्रों को आकार के आधार पर पाँच वर्गों में रखा गया है जो इस प्रकार हैं- 

  • ( १ ) धनुराकृति (भोगवृत्ति परिचायक), 
  • (२) उत्पलपत्राकृति (सामान्य स्वरूप की परिचायक ), 
  • (३) मत्सोदराकृति (प्रेमी तथा प्रेमिका या राजा के नेत्र), 
  • (४) पद्मपत्राकृति (भय तथा क्रन्दन के परिचायक नेत्र), तथा 
  • (५) कुटिल दृशाकृति- दोनों किनारों पर चौड़े परन्तु बीच में पतले (छल, क्रोध तथा मोह के सूचक नेत्र) इस ग्रंथ के अनुसार चित्रों को भाव प्रधान होना चाहिए।

‘समरांगण – सूत्र’  

राजा भोज (१०१०- १०५५ ई०) परमार वंश का महान विद्या प्रेमी तथा कलानुरागी शासक था। उसने ज्योतिष, काव्य, योग, राजनीति, धर्म, शिल्प, नाटक आदि से सम्बन्धित लगभग ३४ ग्रंथों की रचना की। इसी शासक ने शिल्पशास्त्र पर दो ग्रंथों ‘समरांगणसूत्रधार’ तथा ‘युक्तिकल्पतरु’ का निर्माण किया है। 

पहला ग्रंथ ही महत्त्वपूर्ण है, इसमें चित्रकर्म के विषय पर भी पर्याप्त चर्चा की गई है। यह ग्रंथ विष्णुधर्मोत्तर पुराण पर ही आधारित है इसमें दीवार ओपने की विधि आदि का पर्याप्त विवरण आया है।

इन ग्रंथों के अतिरिक्त ‘शिल्परत्न’, भवभूतिकृत- ‘उत्तर रामचरित्र’ (७०० ई०) तथा वाणभट्टकृत – ‘कादम्बरी’ (७०० ई०) ‘हर्ष चरित्र’ तथा ‘तिलक मंजरी’ में भी चित्र-कर्म तथा चित्रकारी की चर्चा की गई है। 

आचार्य दंडीकृत ‘दशकुमार चरित्र’ (७०० ई०) में इस प्रकार का प्रसंग आता है कि राजा उपहार वर्मा ने स्वयं अपना चित्र बनाया। इस प्रकार इन उल्लेखों से यह अनुमान लगाया जा सकता है कि चित्रकला का उस समय समाज में पर्याप्त ज्ञान था और भवनों या राजप्रसादों में भी चित्र बनाये जाते थे। 

परन्तु इस काल के चित्र- उदाहरण प्राप्त न होने के कारण यही सोचा जा सकता है कि संभवतः ये चित्र नष्ट हो गए हैं।

उत्तर मध्यकाल की चित्रकला (१००० ई० से १५५० ई० तक)

पूर्व मध्यकाल की चित्रकला के उदाहरणों से ऐसा जान पड़ता है कि चित्रकला की धारा मंद पड़ती जा रही थी, परन्तु फिर भी चित्रकला के सम्बन्ध में अनेक ग्रंथों में चित्रकर्म सम्बन्धी अध्याय संकलित किये गए। इससे विदित होता है कि चित्रकला सम्बन्धी रीति ग्रंथों की ओर लेखकों का ध्यान विशेष रूप से जा रहा था। 

उत्तर मध्यकालीन साहित्य में भी चित्रकला का यथेष्ट वर्णन मिलता है। इन वर्णनों से ऐसा प्रतीत होता है कि चित्रकला का समाज में अत्यधिक प्रचलन था और भवनों आदि में चित्रकारी की जाती थी। उत्तर मध्यकालीन ग्रंथों में चित्रकला का पर्याप्त प्रसंग प्राप्त होता है।

‘अभिलाषितार्थ चिन्तामणि’ (मानसोल्लास )

चालुक्यवंशीय राजा विक्रमादित्य द्वितीय के पुत्र सोमेश्वर ने ११२९ ई० में अभिलाषितार्थ चिन्तामणि’ (जिसका अपर नाम मानसोल्लास है) नामक विश्वकोष के रूप में ग्रंथ लिखा। इस ग्रंथ में चित्रकला सम्बन्धी सिद्धान्तों का समावेश किया गया है ‘मानसोल्लास की तृतीय विशांति के पहले अध्याय में चित्रकला की विवेचना की गई है। 

सोमेश्वर के चित्रविधान पर ‘विष्णुधर्मोत्तर पुराण के चित्रलक्षण का प्रभाव है। सोमेश्वर ने अपने लिए चित्र विद्या विरंचि कहा है। उसने चार प्रकार के चित्र माने हैं 

जो इस प्रकार हैं- 

  • (१) विद्ध
  • (२) अविद्ध 
  • (३) रस तथा 
  • (४) धूलि चित्र

‘सुरसुंदरीकहा’ (१०३८ ई० )

प्राक्रत मागधी भाषा की जैन कहानी ‘सुरसुंदरीकहा’, जिसका समय अनुमानतः १०३८ ई० है, में चित्रकला का वर्णन आया है जो इस प्रकार है- एक चित्रकार ने एक कक्ष के धरातल पर एक मोरपंख का चित्र अंकित कर दिया जिसे अम से उठाने वाले व्यक्ति के नख में चोट लग गई।’ इसी ग्रंथ में एक प्रेमी की एकान्त प्रेमासक्ति की दशा को अमर और कुमुदनी की एक अंकित चित्राकृति से दर्शाया गया है।

‘तरंगवती’ (११वीं, १२वीं शताब्दी)

तरंगवती नामक जैन कथा में भी प्रेम-प्रसंग के रूप में चित्रकला का उल्लेख किया गया है। ‘तरंगवती’ का नायक विदेश चला जाता है अतः नायिका तरंगवती नायक की खोज करने के लिए एक चित्र प्रदर्शनी का आयोजन करती है। इस प्रदर्शनी का आयोजन वह इस उद्देश्य से करती है कि उसका रूठा हुआ प्रवासी प्रेमी प्रदर्शनी के दर्शनार्थ वहाँ आ जाए।

‘कर्णसुंदरी’

‘कर्णसुंदरी’ विल्हण कवि (११वीं शताब्दी) की एक रचना है। इस नाटिका में कर्णाट की राजकुमारी मियनल्लदेवी की अनहिलनाद के कामदेव और त्रैलोक्यमल्ल के प्रति उनका चित्र देखकर प्रेमामुग्ध होने की दशा का वर्णन किया गया है।

‘त्रिमष्ठिशलाका रुपचरित’ श्वेताम्बरीष जैनों की पुस्तकों में त्रिषष्ठिशलाकापुरुषचरित का विशेष स्थान है। इस महाकाव्य की रचना जैनाचार्य हेमचन्द (१०८२-११७२ ई०) ने की थी इस महाकाव्य की कथा से ऐसा विदित होता है कि उस समय राज दरबारों में अनेक चित्रकारों का एक विशेष सभाभवन होता था, जो भित्तिचित्रों से सुसज्जित होता था।

‘कथा सरित सागर’

‘कथा सरित सागर’ कवि सोमदेव की प्रसिद्ध काव्य रचना है। सोमदेव को कश्मीर का निवासी माना जाता है और इस कवि का काल ग्यारहवीं शताब्दी माना जाता है। वास्तव में यह कथा गुणाढ्य की ‘वृहत्कथा’ का एक संस्करण है जो सबसे उत्तम है। इस ग्रंथ की अनेक कथाओं में चित्रकला का प्रसंग आया है। 

इन प्रसंगों से सुस्पष्ट है कि इस समय चित्रकला का समाज तथा जीवन से घनिष्ठ सम्बन्ध था। इस ग्रंथ की अनेक कथाओं से तत्कालीन समाज में चित्रकला का महत्त्वपूर्ण स्थान स्थापित होता है। एक कथा में उदयन के कुमार नरवाहनदत्त को मूर्ति, चित्र तथा संगीत कलाओं में निपुण बताया गया है। 

एक अन्य कथा में वासवदत्ता के घर की भित्ति पर पद्मावती के द्वारा अंकित सीता की आकृति का वर्णन है। इसी प्रकार एक अन्य कथा में ऐसा प्रसंग आया है कि चित्रकार कुमारदत्त के द्वारा राजा पृथ्वीरूप ने अपना एक चित्र राजकुमारी रूपलता के पास अपना अनुराग प्रकट करने के लिए भेजा था। 

इसी ग्रंथ में कात्यायनी नामक परिब्राजिका के चित्रविद्या में दक्ष होने का प्रसंग आया है। उसने राजकुमारी मंदारवती तथा राजकुमार सुंदरसेन के सजीव चित्र बनाये।

इसी ग्रंथ में राजा विक्रमादित्य के दरबार में नियुक्त चित्रकार के विषय में कहा गया है कि उसको सामन्तों जैसा स्थान प्राप्त था। इसी ग्रंथ में चित्र प्रतियोगिताओं और कुमारदत्त तथा रोलदेव जैसे नामी चित्रकारों का प्रसंग आया है।

‘बृहत्कथा मंजरी’ – ‘वृहत्कथा मंजरी’ भी वृहत्कथा का एक संस्करण है। इसकी रचना कश्मीर निवासी कवि क्षेमेन्द्र ने की थी। उसका कार्यकाल ११वीं शताब्दी माना जाता है। यह संस्करण इस कथा का संक्षिप्त रूप है और इसमें भी चित्रकला का पर्याप्त प्रसंग आया है।

‘नैषधचरित’

‘ नैषधचरित’ नामक महाकाव्य की रचना श्रीहर्ष नामक कवि ने बारहवीं शताब्दी के मध्य की थी। इस ग्रंथ में राजा नल के प्रमोद भवन की दीवारों पर बने जीते-जागते चित्रों का उल्लेख आया है। ये चित्र कल्पवल्ली के नाम से पुकारे गए हैं जो दीवारों तथा छतों पर चित्रित थे। 

इन कल्पवल्लियों में वस्त्र, आभूषण, पुष्प, फल, रत्न, मोती आदि के अभिप्राय चित्रित होने का प्रसंग आया है। नैषधचरित में व्रज गोपियों की लीला, अप्सराओं पर प्रेमासक्त, मुनियों के चित्रों आदि का वर्णन किया गया है।

‘पद्मपुराण’ 

‘पद्मपुराण’ का रचनाकाल १२००-१५०० ई० के मध्य माना जाता है। इस पुराण में इस प्रकार का एक प्रसंग आया है कि केरल राज्य के मंत्री की सुपुत्री ने तीथों के चित्रों की एक पुस्तिका राजकुमारी हेम-गौरांगी को दिखाई थी। इस पुस्तिका को देख राजकुमारी ने तीथों के भ्रमण तथा दर्शन का निश्चय किया। एक अन्य प्रसंग में भगवान शंकर के क्रीड़ा-गृह की भित्ति पर अंकित पालतू मोर और राजहंसों के उत्कृष्ट चित्रों का उल्लेख आया है।

‘प्रसन्नराघव’

‘प्रसन्नराघव नाटक’ १३वीं शताब्दी के जयदेव कवि की रचना है।

इसमें मैत्रेयी द्वारा अंकित राम-सीता के संयुक्त चित्र का वर्णन आया है। उपरोक्त ग्रंथों के आधार पर ऐसा अनुमान किया जा सकता है कि चित्रकला का समाज में व्यापक रूप से प्रचलन था परन्तु इस समय की ऐसी कोई विशाल, उत्तम चित्र-रचना उत्तरी भारत में प्राप्त नहीं होती जिससे चित्रकला का तत्कालीन समाज में महत्त्व स्थापित किया जा सके। 

इस समय साधारण स्तर के कुछ भित्तिचित्रों के उदाहरण प्राप्त होते हैं जो दक्षिणी भारत या गुजरात में बनाये गए थे। इन भित्तिचित्रों का यथा स्थान वर्णन किया जाएगा। इस समय में व्यापक रूप से प्रचलित नवोदित प्रगतिशील कला के जो उदाहरण प्राप्त हुए वे भित्तिचित्र नहीं हैं, बल्कि चित्रकला के ये उदाहरण पोथी चित्र या पुस्तक-चित्र है। 

इनमें से कुछ उदाहरण बंगाल में लिखी गई बौद्ध पोथियों (पाल शैली की पोथियों) में और कुछ मुख्यतः गुजरात या पश्चिमी भारत में लिखी गई जैन पोथियों (जैन या जैनेतर पोथियों) में प्राप्त हैं।

पाल शैली

पूर्व पीठिका सम्राट हर्ष के पश्चात् बंगाल की शासन व्यवस्था लगभग सौ वर्ष तक — विशृंखलित रही और ७३०-७४० ई० के मध्य बंगाल की जनता ने विद्रोह आरम्भ कर दिया। बंगाल की जनता ने गोपाल नामक एक व्यक्ति को अपना राजा चुन लिया और बंगाल में शान्ति स्थापित हो गई। 

जनता के द्वारा निर्वाचित राजा गोपाल ने दक्षिणी विहार तक अपना राज्य स्थापित कर लिया। राजा गोपाल बंगाल के पाल वंश का प्रथम शासक था। गोपाल के पश्चात् उसके उत्तराधिकारियों में राजा धर्मपाल और देवपाल ने साम्राज्य को और अधिक सुदृढ़ बनाया। इन्होंने राज्य की सीमा का विस्तार भी किया। 

यह राजा बौद्ध धर्म के अनुयायी थे परन्तु ग्यारहवीं शताब्दी में विजयसेन और नात्यदेव नामक राजाओं ने पश्चिमी बंगाल और मिथला में दो स्वतंत्र राज्य स्थापित कर लिये और पाल वंश की शक्ति को कम कर दिया। सेनवंशीय राजाओं ने उत्तरी भारत पर भी अपना प्रभुत्व जमा लिया। 

इस वंश के उत्तराधिकारी राजा सेन नाम से प्रसिद्ध हुए। इस वंश में राजा लक्ष्मनसेन प्रसिद्ध शासक हुआ। सेनवंश ब्राह्मण धर्म का अनुयायी था। अतः बौद्ध धर्म के लिए आघात पहुँचा। इस प्रकार पालवंशीय शासकों के शासन की सीमा में जो क्षेत्र शेष बचा वह मुंगेर तक था जो अब पाल राजाओं का सीमित राज्य शेष रह गया था, उसको भी ११९७ ई० में मुसलमानों के आक्रमण ने समाप्त कर दिया। मुंगेर बिहार में स्थित है।

पालवंश का अंतिम शक्तिशाली राजा रामपाल हुआ जिसका राज्यकाल १०८४ ई० से ११३० ई० के मध्य में माना जाता है। इस राजा ने तिरहुत और उत्तरी बिहार को जीता था, इ

प्रकार इन प्रदेशों में भी बौद्ध धर्म पहुंच गया था। पाल-पोथियाँ- बंगाल तथा बिहार में लिखी गई दसवीं शताब्दी एवं परवती काल की महायान बौद्ध धर्म से सम्बन्धित अनेक पोथियों में चित्र प्राप्त हुए हैं। ये सचित्र पोथियों, अच्छे तालपत्र या राजताल पर लिखी गई हैं। इन पोथियों की अनेक

प्रतियाँ नेपाल, बंगाल तथा बिहार के अन्तर्गत नालंदा विक्रमाशिला तथा भागलपुर में । हुई हैं। इन पोथियों के पत्रे तालपत्र से बनाये गए हैं। ये तालपत्र के पृष्ठ लगभग २२.५ इंच लम्बे तथा २.५ इंच चौड़े हैं। इन तालपत्रों से बने पृष्ठों पर देवनागरी लिपि में सुंदर और कटे-कटे छापे के समान अक्षरों में ये पोथियों लिखी गई हैं। 

कुछ पोथियों में काली पृष्ठभूमि पर लिखायी सफेद रंग से की गई है। इन पृष्ठों के बीच-बीच में आयाताकार या वर्गाकार स्थान रिक्त छोड़ दिये जाते थे जिनमें महायान देवी-देवताओं के चित्र बनाये जाते थे। ये वर्गाकार चित्र एक या दो इंच वर्गाकार के होते थे। 

इन पोथियों में महायान देवी-देवताओं तथा बुद्ध के चित्र बनाये जाते थे। इन पोथियों की जिल्द के लिए दोनों ओर पटरे लगाये जाते थे, जिन पर उसी प्रकार चित्र बनाये जाते थे। पटरों पर बुद्ध की जीवनी या जातक कथाओं को सुंदर अक्षरों में लिखा जाता था। लिपिकार बड़ी सावधानी से लिखाई करता था।

पाल शैली की सचित्र पोथियों इस प्रकार की सचित्र पाल पोथियों में ‘प्रज्ञापारमित’, “साधनमाला’, ” खा’, ‘गंधव्यूह’ तथा ‘करनदेवगुहा’ महायान बौद्ध पोथियाँ प्राप्त है।” इस प्रकार की सचित्र पालपोधियाँ दो दर्जन से भी कम प्राप्त हैं। तिब्बत के इतिहासकार लामा तारानाथ ने धीमान तथा वित्तपाल को पाल शैली या पाल चित्रकला का संस्थापक माना है।”

ये पोथियों विशेष रूप से बंगाल में लिखी गई। शीघ्र ही नेपाल तथा बिहार भी इस शैली के केन्द्र बन गए, परन्तु नेपाल के चित्रों की मुखाकृतियों में अत्यधिक मंगोल प्रभाव आ गया है, कदाचित यह नेपाल का अपना स्थानीय प्रभाव है।

पाल शैली के चित्रों की विशेषताएँ

इस शैली के अधिकांश चित्र पोथियों में ही प्राप्त होते हैं और इनका आकार पर्याप्त लघु है। इन पुस्तक चित्रों के अतिरिक्त इस शैली के नेपाल तथा बंगाल में चित्रित परवर्तीकाल के पटचित्र भी प्राप्त हुए हैं, जिनमें अजन्ता के भित्तिचित्रण की यथोचित विशेषताएँ समाविष्ट हो गई थीं। 

इस शैली में अजन्ता की शैली का पुष्ट रूप नहीं है और अजन्ता-शैली की विकृति को प्राप्त अवस्था दिखाई पड़ती है। पोथियों के पृष्ठों के बीच-बीच में जो चित्र बनाये गए है उनमें लाल (सिंदूर, हिंगुल तथा महावर), नीला (लाजवर्दी या नील), सफेद (खड़िया या कासगर), काला (काजल) तथा मूल रंगों के मिश्रण से बनाये गए गुलाबी, बैंगनी तथा फाखतई आदि रंगों का प्रयोग भी किया गया है।

ये पोथियाँ उत्तम प्रकार के तालपत्रों को छाया में सुखाकर बनाये गए पत्रों पर तैयार की गई हैं। इन तालपत्रों की लम्बाई २२.२५ इंच तथा चौड़ाई २.२५ इंच है। यह चित्र महायान धर्म से सम्बन्धित हैं। भारत की चित्रकला धर्म प्रधान रही है, अतः इस शैली में भी केवल धर्म से सम्बन्धित युद्ध के चित्र मिलते हैं।

इन चित्रों की लिखाई निर्बल है यद्यपि इस शैली में अजन्ता शैली का रिक्थ विद्यमान है। आकृतियों की लिखाई में सवाचश्म चेहरों की अधिकता है और चेहरे प्रायः एक ही कैडे (प्रकार) के बनाये गए हैं। 

मानवाकृतियों की नाके लम्बी हैं जो परले गाल की सीमारेखा से आगे निकली बनायी गई हैं और आँखें बड़ी-बड़ी तथा पास-पास बनायी गई हैं। आकृतियों के हाथों तथा पैरों की मुद्राओं में अकड़ जकड़ है और लिखाई में निर्बलता है। 

अजन्ता की उत्तराधिकारणी होने के कारण इस शैली में हास के चिन्ह अपेक्षाकृत कम हैं। सम्भवतः यह शैली ही ‘नाग शैली’ है जिसका तारानाथ ने उल्लेख किया है।

चित्रों में आकृतियों की सीमारेखाएँ बनायी गई है और ऐसा प्रतीत होता है कि तूलिका के स्थान पर निव (कठोर लेखनी) का प्रयोग किया गया है, क्योंकि रेखाओं में कोमलता नहीं है और मोटाई बराबर है। 

इन रेखाओं में प्रवाह तो है परन्तु मोटाई में क्रमिक उतार-चढ़ाव नहीं है आँखें बड़ी-बड़ी (कर्णस्पर्शी) है और वक्र रेखाओं से बनायी गई हैं। आकृतियों के सिर चपटे हैं। चित्र की आकृतियों में सजीवता और स्वच्छन्दता का अभाव है। इन दृष्टान्त चित्रों में आलंकारिकता का पर्याप्त समावेश है।

जैन शैली

श्वेताम्बर जैन धर्म की अनेक सचित्र पोथियाँ ११०० ई० से १५०० ई० के मध्य विशेष रूप से लिखी गई। इस प्रकार की चित्रित पोथियों से भविष्य की कला शैली की एक आधारशिला तैयार होने लगी थी, इस कारण इस कलाधारा का ऐतिहासिक महत्त्व है। 

इस शैली के नाम के सम्बन्ध में अनेक विवाद हैं और इस शैली को जैन शैली, गुजरात शैली, पश्चिमी भारत शैली (पश्चिमी भारतीय शैली) तथा अपभ्रंश शैली के नामों से पुकारा गया है।

जैन शैली का उपयुक्त नाम-डॉ० आनन्द कुमार स्वामी ने १६४२ ई० में बर्लिन म्युजियम’ में सुरक्षित ‘कल्पसूत्र’ की एक सचित्र प्रति पाई। इस कल्पसूत्र’ की प्रति के चित्रों का परिचय प्रकाशित करके उन्होंने कला आलोचकों में गुजरात क्षेत्र से विकसित कला शैली के प्रति जिज्ञासा उत्पन्न की।

कालान्तर में उन्हें बालगोपाल- स्तुति’, ‘गीत-गोविंद’, ‘रतिरहस्य’ तथा ‘दुर्गासप्तशती’ आदि सचित्र ग्रंथ प्राप्त हुए जो इस शैली के थे। 

वे ग्रंथ ऐसे थे जिनका न तो गुजरात से कोई सम्बन्ध था और न जैन धर्म से ही कोई सम्बन्ध था। अतः डॉ० आनंद कुमार स्वामी ने इस शैली का नाम लामा तारानाथ के द्वारा दिये गए नाम ‘पश्चिमी भारत शैली’ का समर्थन करते हुए इस शैली का नवीन नाम ‘पश्चिम भारतीय शैली’ माना।

स्व० नान्हलाल चमनलाल मेहता ने १६२४ ई० में गुजरात शैली के नाम से इस शैली का विवेचन ‘रूपम्’ नामक पत्रिका में प्रकाशित किया। स्व० मेहता के इस निबन्ध का आधार गुजरात में प्राप्त ‘वसन्तविलास’ की संस्कृत-गुजराती मिश्रित एक काव्य-पत्री थी। 

कपड़े की इस पट्टी (चित्रित पट) का लिपिकाल १४५१ ई० है। इस लम्बे पत्रीनुमा पट पर ७६ चित्र अंकित हैं। ये चित्र जैन धर्म से सम्बन्धित हैं। स्व० मेहता ने इन चित्रों को ‘गुजरात शैली’ के नाम से पुकारा। उन्होंने १६२६ ई० में प्रकाशित अपनी पुस्तक ‘स्टडीज़ इन इंडियन पेंटिंग’ में इन चित्रों का उल्लेख दिया। 

उन्होंने इस सम्बन्ध में स्वतंत्र रूप में एक अध्याय ‘स्टडीज़ इन इंडियन पेंटिंग ऑफ गुजरात’, लिखकर प्रमाणित विवरण प्रस्तुत किये। इस चित्रित-पट में काव्य के आधार पर बसंत की शोभा को अत्यन्त सजीव ढंग से चित्रित किया गया है।

ग्यारहवीं शताब्दी से पन्द्रहवीं शताब्दी के मध्य पश्चिमी भारत में जिन सचित्र ग्रंथों को तैयार किया गया, उनका विषय यद्यपि जेनेत्तर भी था, परन्तु इन ग्रंथों का मुख्य विषय जैन धर्म था, इसलिए इन ग्रंथों के चित्रों की शैली का एक तीसरा नाम ‘जैन शैली’ प्रस्तुत किया गया। 

इस नाम से सहमत होकर परसी ब्राउन तथा अन्य लेखकों ने इसे इसी नाम से सम्बोधित किया है। इन चित्रों को यह नाम इसलिए भी प्रदान किया गया कि यह विश्वास किया जाता रहा कि ये चित्र जैन साधुओं के द्वारा बनाये गए हैं।

कालान्तर में इस शैली के अनेक सचित्र ग्रंथ, अहमदाबाद तथा गुजरात के बाहर मारवाड़, मालवा, पंजाब तथा पूर्वी भारत में जीनपुर (उत्तर प्रदेश), अवध (उत्तर प्रदेश). बंगाल, उड़ीसा, नेपाल के अतिरिक्त ब्रह्मा (बर्मा) तथा श्याम में भी प्राप्त हुए। इस शैली की जोनपुर में बनी कल्पसूत्र’ की एक चित्रित प्रति साराभाई ने प्राप्त की। 

जोनपुर (उत्तर प्रदेश) उत्तर भारत के पूर्व में स्थित है, अतः जो शैली पूर्वी भारत तक प्रचलित थी उसको “पश्चिमी भारतीय शैली’ के नाम से पुकारना ठीक नहीं और तारानाथ या डॉ० कुमार स्वामी का मत उपयुक्त नहीं है। कल्पसूत्र की इस प्रति का समय १४६५ ई० है और इस प्रति के लिपिकार पं० कर्णसिंह के पुत्र श्री देवीदास गोड़ कायस्थ हैं। 

गौड़ कायस्थों का निवास स्थान विशेष रूप से उत्तर प्रदेश का पूर्वी भाग, बंगाल तथा विहार था। वे गौड़ कायस्थ जो उत्तर प्रदेश की ओर आ गये थे, अब पुनः मुसलमानों के आगमन से पूर्वी भारत की ओर चले गये। जैसे बंगाल के पाल वंश के राजा देवपाल के लेखक कायस्थ थे, ऐसा उल्लेख मिलता है। 

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि यह शैली गुजरात या पश्चिम भारत तक ही सीमित नहीं रही और इसका प्रसार पूर्वी भारत तथा नेपाल में भी हुआ। इस प्रकार इस शैली के बारे में यह धारणा भी भ्रमपूर्ण सिद्ध हुई कि इसे एक सीमित क्षेत्र की कला मानकर ‘पश्चिम भारतीय शैली’ या ‘गुजरात शैली’ के नाम से पुकारा जाय। 

इसी प्रकार १६२९ ई० में श्री गांगुली ने ‘वाल गोपाल स्तुति’ के वैष्णव धर्म से सम्बन्धित चित्रों की सूचना दी जो इस शैली के थे। इसी प्रकार ‘बसन्तविलास’ और ‘चौरापंचशिखा’ आदि पोथियों के चित्र भी जैनेत्तर हैं। 

इस प्रकार यह शैली जैन धर्म के अतिरिक्त वैष्णव धर्म के ग्रंथों या जैनेत्तर ग्रंथों में भी प्रयुक्त हुई. अतः ‘जैन शैली’ नाम भी सार्थक सिद्ध प्रतीत नहीं होता। अतः इन सब कारणों को ध्यान में रखते हुए डॉ मोती चन्द्र तथा राय कृष्ण दास ने इस शैली को ‘अपभ्रंश शैली’ के नाम से पुकारना अधिक उपयुक्त समझा है। 

उनका मत है कि यह शैली अपने निजत्व को खो चुकी थी और एक महान शैली (अजन्ता शैली) के विकृत रूप को प्राप्त थी, इसलिए इस शैली के लिए अपभ्रंश शब्द ही एक ऐसा शब्द है जिसके द्वारा तत्कालीन विकृति को प्राप्त शैलियों या परिवर्तनशील कला-प्रवृत्तियों की अभिव्यंजना हो सकती है।

भारतीय साहित्य में यह काल प्राकृत भाषाओं की रचना का काल है। इस काल में डिंगल तथा पिंगल लोक भाषाओं (ग्रामीण भाषाओं) में वीर काव्य की रचना की गई। इस काल को साहित्य में वीर गाथा काल, चारण काल या अपभ्रंश काल के नाम से पुकारा गया है क्योंकि इस काल में मूल संस्कृत भाषा में रचनाएँ नहीं की गई और कालिदास की श्रृंगार काव्य परम्परा का रूप ही मिट गया। 

युद्ध की हाहाकार में राजपूत योद्धाओं ने अपने सौम्य और शान्त रूप को त्यागकर मुसलमानों से देश को बचाने के लिए महाकाल का स्मरण किया और ‘हर-हर महादेव’ का नारा लगाया। 

इन योद्धाओं ने केशरिये वानें पहन मुंड मालाएँ धारण की कनपट्टी दाढ़ियाँ तथा शेर जैसी मूछें धारण कर अपने निजी देव रूप से भ्रमित हो विकराल महाकाल रूप धारण किया और हर और प्राचीन मान्यताएँ परम्पराएँ भ्रष्ट हो गई। यही पतन कला और साहित्य में हुआ अतः इस अपभ्रंश शब्द से इस कला की समस्त ऐतिहासिक पृष्ठभूमि भी परिलक्षित हो जाती है।

इस ‘अपभ्रंश शैली’ या ‘ग्रामीण शैली’ या ‘ग्राम्या शैली‘ या तथाकथित ‘जैन-शैली’, ‘गुजराती शैली या पश्चिम भारतीय शैली’ के तीनों रूपों में चित्र उपलब्ध हैं- 

  • (१) ताड़ पत्रों पर बने पोथीचित्र, 
  • (२) कपड़े पर बने पट-चित्र (चित्रपट या चित्रित पट), 
  • (३) कागज़ पर वने पोथीचित्र या फुटकर चित्र इस प्रकार के चित्र आज भारत, अमेरिका, नेपाल तथा ब्रिटेन के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं। ‘अपभ्रंश शैली’ की सचित्र पोथियों की बड़ी संख्या जैन धर्म से सम्बन्धित है।

इस शैली का संविधान यदि देखा जाय तो यह शैली अजन्ता शैली का भ्रष्ट रूप प्रतीत होती है। यह शैली हास को प्राप्त है और पूर्व विकसित कला परम्परा में अप्रगतिशील होने के कारण पहली दृष्टि में अजन्ता शैली से भिन्न लगती है। 

यह शैली अपनी मूल विशेषताओं को खो चुकी थी, इस कारण इस शैली का नाम ‘अपभ्रंश शैली’ उपयुक्त है। अपभ्रंश नाम के अन्तर्गत पाल शैली, ऐलोरा के १०वीं तथा ११वीं शताब्दी के चित्र तथा जैन-शैली सभी को रखा जा सकता है।

अपभ्रंश शैली के चित्र 

इस शैली के चित्र वसन्तविलास (१४५१ ई०), ‘बालगोपालस्तुति’, ‘गीत-गोविंद’, ‘दुर्गासप्तशती’, ‘रतिरहस्य’, ‘कल्पसूत्र’ आदि पोथियों में प्राप्त है जिनका उल्लेख पहले दिया जा चुका है। ‘कल्पसूत्र’ की एक प्रति साराभाई मणिकलाल को जोनपुर में प्राप्त हुई थी। 

कल्पसूत्र की इस प्रति का लिपिकाल ई० है ‘कल्पसूत्र’ की दूसरी प्रति रॉयल एशियाटिक सोसायटी, बम्बई तथा तीसरी प्रति सेठ आनंद जी कल्याण जी के पास लोमड़ी में भी बतायी जाती है। इसका लिपिकाल १४१५ ई० माना जाता है। 

‘कल्पसूत्र’ की एक चौथी प्रति जौनपुर की है जो स्वर्णाक्षरों में तैयार की गई है और इस समय बड़ौदा के नरसिंह जी के पोल को ज्ञान मंदिर में सुरक्षित है। ‘कल्पसूत्र’ की यह प्रति सबसे उत्तम प्रति मानी जाती है। यह प्रति १४६७ ई० में जौनपुर के बादशाह हुसेनशाह के शासनकाल में तैयार की गई थी। 

‘कल्पसूत्र’ की एक अन्य प्रति अहमदाबाद में मुनि दयाविजय के संग्रह में सुरक्षित है। यह प्रति पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में तैयार की गई है और स्वर्णाक्षरों में लिखी गई है।

मारवाड़ तथा गुजरात नवीं शताब्दी से ही कला के केन्द्र बन गए थे और इस शैली का यहाँ पर ही जन्म हुआ। १४५१ ईसवी की लिखी ‘वसन्तविलास’ की सचित्र काव्य-पत्री (चित्रित पट), जिसका पहले उल्लेख किया जा चुका है, स्व० मेहता को १६२४ ई० में अहमदाबाद में प्राप्त हुई। 

यह चित्रित गुजरात के शासक अहमद शाह कुतुबउद्दीन के समय का है। ‘बसन्तविलास की यह प्रति जन्मपत्रीनुमा या कुन्डलीनुमा लम्बे कपड़े पर लिखी गई चित्रित पट्टी है। इस पट्टी की लम्बाई ४३६ इंच तथा चौड़ाई ६.२ इंच है और इस पत्री के बायीं ओर एक इंच चौड़ा हाशिया है और दाहिनी ओर ७५ इंच चौड़ा हाशिया है। 

‘बसन्तविलास’ में वसन्तागमन और विशेष रूप से फाल्गुन मास का वर्णन है। इस काव्य कथा में एक पति और पत्नी का प्रेम-प्रसंग अंकित हैं जो कालिदास को महान काव्य रचना ‘ऋतुसंहार’ पर आधारित है। इस लम्बी कपड़े की पट्टी या पत्री पर लिखाई के साथ-साथ चित्र भी बनाये गए हैं। 

चित्रों में मानवाकृतियों की लिखाई में शक्तिशाली रेखा का प्रयोग है। इन चित्रों में चित्रकार ने वर्णनात्मक शैली अपनाई है और चित्रों की रंग योजना सरल है। लाल, पीले तथा नीले रंग का प्रयोग है, पृष्ठभूमि साधारणतया पीली है। स्त्रियों को साड़ी पहने चित्रित किया गया है और उनकी चोली में कोहनी तक आस्तीने हैं। 

यह चोली नाभि या कमर तक उनके शरीर को ढके रहती है। ‘बसन्तविलास’ की प्रति मुसलमान शासकों के समय में गुजरात में लिखी गई। सम्प्रति यह पट्टी, फ्रायर आर्ट गैलरी’ वाशिंगटन में सुरक्षित है। 

इस समय की भवन कला पर मुसलमानी प्रभाव पड़ने लगा था और जोनपुर में हिन्दू तथा मुसलमान कला के सम्मिश्रण से सुंदर भवन बनाये गए किन्तु इस चित्रावली पर मुसलमानी प्रभाव नहीं है। इस समय तक इस्लाम धर्म के सांस्कृतिक केन्द्र ईरान की कलाकृतियों (चित्रों) को एशिया में प्रसिद्धि तथा मान्यता प्राप्त नहीं हुई थी।

श्वेताम्बर जैन धर्म से सम्बन्धित ताड़पत्रीय पोथियों में ‘निशीयपूर्णी’ ‘अंगसूत्र ‘दशवैकालिक लघुवृत्ति’, ‘त्रिपष्ठिशलाकापुरुषचरित’, ‘नेमिनाथचरित’, ‘कथासरितसागर’. ‘संग्रहणीयसूत्र’, ‘उत्तराध्यनसूत्र’, ‘श्रावकप्रतिक्रमणचुर्णी’ तथा ‘कल्पसूत्र’ है। 

इन सचित्र पोथियों का लिपिकाल १००० ई० से १५०० ई० के मध्य माना जाता है। ये पोथियाँ भारत में आज पाटन, बड़ोदा, खंभात, अहमदाबाद तथा जैसलमेर के निजी पुस्तकालयों या अमेरिका के बोस्टन स्थित संग्रहालयों में सुरक्षित हैं।

पाटन के ग्रंथ-भंडार में निशीचचूर्णी की एक प्रति सुरक्षित है जिसका लिपिकाल ११०० ई० है। इसमें अपभ्रंश कला के उदाहरण प्राप्त होते हैं। अंगसूत्र की तीन सचित्र प्रतियाँ तथा ‘दशवेकालिक’ लघुवृत्ति की एक सचित्र प्रति शान्तिनाथ भंडार खम्भात के संरक्षण में है। 

‘दशवैकालिक‘ की यह प्रति ११४३ ई० की है। बड़ौदा के समीप एक जैन पुस्तक भण्डार में ११६१ ई० के सात ग्रंथ प्राप्त हैं। इन ग्रंथों में सुंदर चित्र बने हुए हैं जिनमें सोलह विद्यादेवियों, सरस्वती, लक्ष्मी, अम्बिका, चक्रदेवी आदि के चित्र हैं। 

शान्तिनाथ भंडार में १२४१ ईसवी की ‘नेमिनाथ चरित’ की भी एक सचित्र प्रति सुरक्षित है। इन उदाहरणों के अतिरिक्त ‘कथा रत्नसागर’ की प्रति में भी चित्र प्राप्त हुए हैं। 

बोस्टन संग्रहालय में सुरक्षित १३६० ई० की लिखी ‘श्रावक प्रतिक्रमण चूर्णी’ की प्रति से भी चित्रकला का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त होता है पाटन के शान्तिनाथ भंडार में १४३३ ईसवी का कपड़े पर चित्रित एक चित्रपट था जो ‘पंचतीर्थपट’ (था पंचतीर्थीपट) के नाम से विख्यात था परन्तु अब यह चित्र अप्राप्य है। इसकी एक अनुकृति ‘इन्डियन आर्ट एण्ड लेटर्स’ में १६३२ ईसवी में प्रकाशित हुई है। “

बोस्टन संग्रहालय तथा गुजरात के श्री भोगीलाल जी के संग्रह में कागज़ पर लिखी हुई ‘बालगोपाल स्तुति और बड़ौदा के मंजुलाल मजूमदार के निजी पुस्तकालय में ‘दुर्गासप्तशती’ की पोथियाँ महत्त्वपूर्ण हैं। 

जोधपुर के किसी पुस्तकालय में ‘पाण्डवचरित’ नामक ग्रंथ की पन्द्रहवीं शताब्दी की लिखी गई एक प्रति बताई जाती है। इस शैली में जहाँ ‘मार्कण्डेय पुराण’ तथा ‘दुर्गासप्तशती’ जैसे वैष्णव ग्रंथों का निर्माण किया गया, वहीं ‘रतिरहस्य’ और ‘कामसूत्र’ पर आधारित कामशास्त्र से सम्बन्धित चित्र भी बनाये गए।

अपभ्रंश शैली के चित्रों की विशेषताएँ इस शैली में पूर्ववर्ती शैलियों की तुलना में हास और निर्बलता के चिन्ह अधिक हैं। कदाचित इस निर्बलता का कारण यह भी हो सकता है कि ये चित्रित जैन पोथियाँ धर्म अनुयायियों द्वारा जनता में बांटी जाती थीं। 

इस कारण इन पोथियों की अत्यधिक माँग थी जिसको पूरा करने के लिये जैन मुनि या आचार्य, चित्रकार तथा लिपिक शीघ्रता से कार्य करते थे और पोथियाँ लिखते थे। इस शीघ्रता के कारण यह आशा नहीं की जा सकती कि चित्र लिखाई की सावधानी, कारीगरी और वक्रीय रेखांकन की पूर्णता को प्राप्त कर पाते। 

चित्र की लिखाई में जल्दबाजी होने के कारण कमजोरी और कठोरता आ गई है और आकृतियों की लिखाई में सुमधुर गोलाई के स्थान पर तीक्ष्ण कोणात्मकता का प्रयोग किया गया है।

इन चित्रों में मानव आकृतियों के चेहरे सवाश्म है और एक ही ढंग के बने हैं। नाक अनुपात से अधिक लम्बी और नुकीली बनायी गई है जो परले गाल की सीमा रेखा से आगे निकल गई है। चेहरे सवाचश्म और एक ही आकार प्रकार (कैडे) के बनाये गए हैं। 

शियुक आम की गुठली के समान चपटी और छोटी है, और पास और बड़ी-बड़ी बनायी गई है और उनकी रचना दो चक्रों के द्वारा की गई है। पुतली बनाने के लिए इन चक्रों के मध्य एक बिन्दी लगा दी गई है जो अनुपात रहित और गोलाई रहित है। 

नेत्र चेहरे की सीमारेखा से बाहर रहने के कारण आँखों में उग्रता का भाव है और बाहर निकली दिखाई पड़ती है। उंगलियों का रेखांकन कठोर, निर्बल और अत्यधिक आलंकारिक तथा रुविवद्ध है। पेट का भाग बहुत बड़ा बनाया गया है और छाती उभरी हुई बनायी गई है। 

पशु-पक्षी तथा मानव आकृतियाँ रुई के गुड्डो या गुजरात की कठपुतलियों के समान प्रतीत होती है। बादल रुई के ढेर के समान दिखाई पड़ते हैं। चित्रों में अनेक आकृतियों की रेखाएं काले रंग से अंकित की गई हैं। आकृतियों में गोलाई लाने के लिये छाया का प्रयोग किया गया है। 

यह छाया बारीक काली रेखाओं से लगायी गई है। कुछ विद्वानों का विचार है कि ये रेखाएँ निब से बनायी गई हैं। परन्तु वास्तव में रेखाएँ तूलिका से ही बनायी गई हैं। कलाकार के हाथ में निर्बलता और कठोरता आ जाने के कारण रेखा में बारीकी और क्रमिक मोटापन तथा पतलापन नहीं है। 

ये रेखाएँ बराबर मोटाई की बनायी गई हैं। इसी कारण इन रेखाओं से निव से बनी रेखाओं का भ्रम होता है। इन रेखाओं की अकुशलता का किसी सीमा तक एक कारण यह भी हो सकता है कि ये चित्र भारत की भित्तिचित्रण पद्धति पर कार्य करने वाले कलाकार ही बना रहे थे। 

भित्ति पर चित्रकार को बड़े चित्र बनाने में रेखा की पूर्णता दिखाने में अपनी योग्यता दिखाने का अधिक अवसर था परन्तु जब भित्ति चित्रण परम्परा के वंशज चित्रकारों के हाथ में लघु चित्र का कार्य आया तो वह रेखा को अत्यधिक बारीक (महीन) नहीं बना सके और उनकी रेखा तालपत्रीय या कागजी लघुचित्रों के अनुकूल नहीं बन सकी। 

कुछ लेखकों ने इन पोथीचित्रों को जैन साधुओं के द्वारा बनाया हुआ माना है परन्तु यह बात संगत नहीं। वास्तव में यह चित्र अधिकांश साधारण व्यवसायी चित्रकारों के द्वारा बनाये जाते थे, जिनको पारिश्रमिक बहुत कम मिलता था। इस प्रकार के दो चित्रकारों के आज नाम भी प्राप्त होते हैं जिससे प्रतीत होता है कि ये चित्र साधुओं ने नहीं बनाये।

अपभ्रंश शैली के चित्रों में अधिकांश चमकदार उष्ण रंगों का प्रयोग है। पृष्ठभूमि में बहुधा लाल रंग का सपाट प्रयोग किया गया है और फाप्तई, पीले, श्वेत, नीले रंगों का समावेश किया गया है। 

तीथांकरों के अनेक रूपों में भिन्न प्रकार के रंगों का प्रयोग है। महावीर की आकृति में पीला, पार्श्वनाथ की आकृति में नीला, नेमीनाथ की आकृति में काला और ऋषभनाथ की आकृति में स्वर्णिम वर्ण का प्रयोग है।

अपभ्रंश शैली में प्राकृतिक रूपों को भुला दिया गया है अतः स्वाभाविकता नष्ट हो गई है। प्रत्येक आकृति का रूढ़ि या परम्परा के आधार पर निर्माण किया गया है अत: चित्र निर्जीव तथा भई हैं।

उत्तर- मध्यकाल के भित्तिचित्र

विजयालय चोलेश्वर मंदिर प्राचीन परकोट राज्य के नृतमाली नामक स्थान में विजयालय-चोलेश्वर मंदिर, जो चोल काल की प्रसिद्ध कलानिधि है, में कुछ सजीव और आकर्षक स्त्री आकृतियों के चित्र भित्तियों पर अंकित किये गए ये आकृतियाँ मंदिर की दक्षिणी दीवार पर आज भी सुरक्षित हैं, जिनका समय वारहवीं शताब्दी अनुमानित है। 

यहाँ पर गन्धर्वराज, नृत्य करती हुई काली, दुर्गा और मुण्डों की माला लिए भैरव की आकृतियाँ भी चित्रित की गई हैं। यहाँ पर उत्तर की ओर भित्ति पर दो विशाल चित्र हैं। जिनमें शिव को नटराज के रूप में चित्रित किया गया है। 

इन चित्रों का रेखांकन सतर्कता से किया गया है, परन्तु इन चित्रों के रंग धुंधले और सपाट हैं और पन्द्रहवीं शताब्दी के पूर्व के नहीं हैं।

तिरपतिकुरम-तेरहवीं तथा चौदहवीं शताब्दी में तिरपतिकुरम (जिनकांची) में निर्मित वर्धमान मंदिर के संगीत मंडप पर चित्र बनाये गए थे, जो आज भी सुरक्षित है। इसी प्रकार अनेगुडी के उच्चयप्पा मठ में अंकित भित्तिचित्र दक्षिण की चित्रकला के उत्तम उदाहरण हैं। 

इस संगीत मंडप को बुक्काराय द्वितीय के मंत्री एवं सेनापति इरुगप्पा ने १३४७-८८ ई० में बनवाया था। उच्चयप्पा मठ का निर्माण अनुमानतः देवराज ने कराया था। इन मठों की भित्तिचित्रकारी की शैली को विजयनगर शैली के अन्तर्गत रखा गया है।

लेपाक्षी १३३६ ई० में हरिहर तथा मुक्काराय ने तुंगभद्रा नदी के दक्षिणी किनारे पर विजयनगर राज्य की स्थापना की थी। राजा आचुत्यादेव के समय (१५३०-१५४२ ई०) तक विशाल मंदिर लेपाक्षी में बनवाये गए। 

अब लेपाक्षी अनन्तपुर जिले का एक छोटा सा ग्राम है। इस मंदिर के मुख्य मंडप तथा प्रवेश मंडप में भित्तिचित्रों की एक विशाल चित्रमाला सुरक्षित है। लेपाक्षी के मंदिरों के निर्माण का समय अनुमानतः १५४० ई० है। इन चित्रों के बड़े-बड़े खण्ड नष्ट हो चुके हैं ये चित्र शेव धर्म से सम्बन्धित बताये जाते हैं।

एलोरा (बेसल )  

एलोरा की चित्रकारी का उल्लेख पहले दिया जा चुका है। एलोरा के कैलाशनाथ मंदिर तथा जैन मंदिरों की भित्तिचित्रकारी से मध्यकाल की भित्तिचित्रण कला तथा लघुचित्रण कला (पोथी चित्रकत्ता) का आरम्भ होता दिखाई पड़ता है। अधिकांश इस समय के भवनों में भव्यशिल्प सज्जा के कारण भित्तिचित्रों को प्रोत्साहन न प्राप्त हुआ। अतः गुजरात में भित्तिचित्रण परम्परा का हाथ होने लगा।

ग्यारहवीं शताब्दी वाले भान् के पादताडितकम नामक प्रहसन के एक अंश में सयामीला का एक प्रसंग जिसमें एक विदूषक प्रद्युम्न के एक भवन का चित्रण होता देखता है और इस प्रकार व्यंग्य करता है–‘लाटदेश (गुजरात) के चित्रकारों इन डिडियों और वानरों में विशेष अंतर नहीं। 

ये कुची और मसि की मल लिये इधर-उधर घूमा करते हैं और भित्तियों तथा उन पर अंकित चित्रों को चील-विलार खींचकर नष्ट करते रहते हैं।”” सोलंकी वंशीय कुमार पाल (११४३-११७४ ई०) के द्वारा बनवाये मंदिरों में भित्तिचित्रों के अवशेष रह गये हैं। १४३२ ई० में बीदर दुर्ग के रंगमहल के तीन कक्षों की भित्तियों पर चित्र बनाये गए थे जो अब नष्ट हो गये हैं।

चित्रकला का पुनरुत्थान-पन्द्रहवीं शताब्दी में चित्रकला का जागरण सा होता दिखाई पड़ता है। हिन्दू संस्कृति और धर्म के क्षेत्र में पुनः एक जागृति की लहर दौड़ रही थी। चित्रकला भी इस लहर से अछूती नहीं रही चित्रकला का उत्थान महाराणा कुम्भा के राज्यकाल में होता दिखाई पड़ता है। 

महाराणा कुम्भा ने अपने भवन को चित्रित कराया इसी प्रकार गदाशाह के भवन में भी उनके और उनकी पत्नी के चित्र अंकित किये गए।

गुजरात का शासक महमूद शाह वेगड़ा, जिसका राज्यकाल १४५६ ई० से १५११ ई० तक है, एक कला प्रेमी शासक था। उसने समस्त कलाओं को आश्रय तथा प्रोत्साहन प्रदान किया। उसने पुर्तगालियों से युद्ध किया परन्तु पुर्तगालियों के समुद्री बेड़े के सामने युद्ध में वह सफल न हो सका। 

१५३१ ई० में उसके वंशज उत्तराधिकारी बहादुरशाह ने मालवा जीत लिया और तीन वर्ष पश्चात उसने मेवाड़ के राणा से चित्तौड़ भी छीन लिया परन्तु गुजरात पर १५७३ ई० में मुगल सम्राट अकबर का शासन हो गया और १५६४ ई० में अकबर ने मालवा भी अपने राज्य में मिला लिया। 

महमूद शाह वेगड़ा कलाकारों का आश्रयदाता था। उसने अपनी राजधानी मांडू को कलाकारों का केन्द्र बनाया और उसने अपने मित्र राज्य कश्मीर से चित्रकार बुलाये। कश्मीर में उस समय परम दयालु सुल्तान जैनुल आबिदीन (१४२० १४७० ई०) की उदारता के कारण चित्रकला की विशेष उन्नति हो रही थी। 

यह कश्मीर शैली अजन्ता शैली की विशेषताओं से पूर्ण थी। सम्भव हो सकता है कि महाराणा कुम्भा ने भी कश्मीर से ही चित्रकारों को बुलाया हो। तारानाथ के उल्लेख में पहले बताया जा चुका है कि कश्मीर में मध्य भारत की चित्रकला पहुँच चुकी थी।” 

गुजरात तथा कश्मीर के मैत्री सम्बन्ध के कारण अवश्य ही कलाकार इधर-उधर आते-जाते रहे होंगे। इसके अतिरिक्त मांडू के सुल्तान ‘गयासुद्दीन खिलजी’ के लिये प्रस्तुत की गई ‘नयामत नामा’ पुस्तक के कुछ चित्रित पृष्ठ प्राप्त हुए हैं। 

इन चित्रों में कुछ ईरानी प्रभाव का आभास प्रतीत होता है जिसके फलस्वरूप चित्रों में अपभ्रंश शैली के सवाचश्म चेहरों के स्थान पर एकचश्मी चेहरे आए हैं वास्तव में यहीं से राजस्थानी चित्रकला अनेक क्षेत्रों में परिवर्तनशील होकर पुनरुत्थान को प्राप्त होने लगी और अप्रगतिशील चित्रकला प्रगतिशील बनकर अपना निजत्व धारण करने लगी।

राजस्थानी शैलियों का उदय

रागमाला चित्र तथा कृष्णलीला के स्तुति चित्र इसी समय में बनाये गए। इस प्रकार राजस्थानी शैली पन्द्रहवीं शताब्दी से आरंभ होती प्रतीत होती है, क्योंकि बोस्टन संग्रहालय ‘वाली ‘स्तुति-चित्रावली’ में एकचश्म चेहरे का प्रयोग है, साथ ही खुली हुई चोलियाँ बनायी गई हैं जो समसामयिक राजस्थानी ढंग की चोलियों के समान हैं। 

यह परिवर्तन इस बात का प्रमाण है कि इस समय से चित्रकला पुनः नवीन प्रवृत्तियाँ ग्रहण करके समसामयिक प्रभाव और विकासोन्मुखी चिन्हों के साथ उदित हुई। सोलहवीं शताब्दी के आते-आते हमको हित हरवंश, नानक, वल्लभाचार्य, कबीर, आदि की मुखाकृति छवियों प्राप्त होने लगती है। 

ये छवियाँ प्राचीन मुखाकृति चित्रों पर आधारित हो सकती है। इससे स्पष्ट है कि किसी ऐसी शैली का विकास निश्चित रूप से पहले ही हो चुका था जिसमें मुखाकृति या व्यक्ति चित्रण की शक्ति थी जैन, गुजराती या तथाकथित अपभ्रंश शैली की निर्बलता, रेखांकन की निश्चित रूढ़िवादी परम्परा और आकृति के नख-शिख चित्रण की अकुशलता के कारण इस प्रकार की शैली से उत्तम छवि चित्रों की आशा नहीं की जा सकती थी। 

अतः यह सोचना संभव है कि कश्मीरी कला के प्रभाव से अपभ्रंश शैली एक भिन्न रूप धारण कर गई। १५६२ ई० का बना रानी रूपमती का राजस्थानी शैली का चित्र इस बात का प्रमाण है कि

यह शैली पूर्णतया स्वस्थ हो चुकी थी। “कल्पसूत्र’ की प्रति के रागनियों वाले चित्रों में जो पोने दो चश्म और डेढ़ चश्म चेहरे आए हैं उनमें भी राजस्थानी प्रभाव है।

वास्तव में यह पुनरुत्थान गुजरात और दक्षिणी राजस्थान या मेवाड़ में हुआ प्रतीत होता है। अकबर के समय में गुजरात कलाकारों का केन्द्र था और अकबर की चित्रशाला में अनुमानतः छः चित्रकार गुजराती थे। 

इस प्रकार प्राचीन अपभ्रंश शैली कश्मीर तथा मेवाड़ की शैली से प्रभावित हुई और शीघ्र एक निजी रूप धारण कर गई जो राजस्थानी शैली थी। परन्तु इस शैली के आरम्भिक उदाहरण बहुत कम प्राप्त हुए हैं। इस शैली के अधिकांश उदाहरण अकवर के काल या कुछ बाद के हैं, जिनमें बहुत कुछ मुगल प्रभाव भी है। 

राजस्थानी शैली के अधिकांश उत्तम उदाहरण अठ्ठारहवीं शताब्दी के हैं। राजस्थानी या राजपूत राज्यों की चित्रकला के अध्ययन से पूर्व मुगल कला का अध्ययन आवश्यक है। क्योंकि मुगलों का उत्तरी भारत के एक विशाल क्षेत्र पर शासन स्थापित हो गया और मुगलों ने भारतीय संस्कृति पर गहरा प्रभाव डाला।

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