भारतीय आधुनिक काल की चित्रकला | Indian Modern Painting

Table of Contents

(स्वतंत्रता- पूर्व, स्वतंत्रता- पश्चात् के चित्र, नूतन प्रवृतियाँ (१८०० ई० से आज तक)

दिल्ली तथा लखनऊ की चित्रण शैलियाँ

१७६० ई० में मुगल साम्राज्य के पतन के साथ ही उत्तरी भारत की चित्रकला में सर्वत्र अवनति के चिन्ह दृष्टिगोचर होने लगे। दिल्ली तथा लखनऊ में कुछ चित्रकार अभी भी चित्रकला का व्यवसाय चलाये हुए थे परन्तु इनकी कृतियाँ प्राचीन कृतियों की हेय अनुकृतियाँ थीं। 

दिल्ली के चित्रकारों ने शीघ्र ही लघु शबीह चित्रों का अंकन प्रारम्भ कर दिया और यह शैली उस समय अधिक प्रचलित हो गई। कुछ मुस्लिम चित्रकारों के परिवार इस प्रकार के शबीह चित्रों का निर्माण करते रहे। इन चित्रकारों ने विशेष रूप से मुगल सम्राटों की शबीहों का अंकन किया। 

इन चित्रों में अलंकरण योजना और चित्र में अंकित व्यक्ति का सादृश्य निम्न कोटि का था। ये चित्रकार मुगल शैली के चित्रकारों के वंशज थे और अभी इनके रेखांकन में मुगल कला की कुछ विशेषताएँ विद्यमान थीं। 

इन चित्रकारों ने प्राचीन ढंग की सामग्री का चित्र निर्माण में प्रयोग किया और उन्होंने मध्यकालीन ढंग के कागज़ तथा रंगों का अधिक प्रयोग किया। यह चित्र प्रायः बड़े-बड़े घरानों में स्त्रियाँ ले जाकर बेचा करती थीं और इस प्रकार चित्रकार बाजारू ढंग से काम करने लगे। 

इन शबीह चित्रों पर गलत नाम भी लिख दिये जाते थे जिससे कि वे सुगमता से बिक जाएँ। इसी समय दिल्ली में हाथी दाँत पर कुछ शबीह चित्र बनाये गए जो कारीगरी तथा भावना में उत्तम हैं। इस प्रकार दिल्ली कलम दम तोड़ने लगी और चित्रकार दूसरे कामों में लगने लगे।

अट्ठारहवीं शताब्दी के अन्त में और उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में लखनऊ में एक भिन्न प्रकार की चित्रण शैली प्रचलित हो गई जो रूमी कलम के नाम से प्रसिद्ध है। इस स्कूल ने प्राचीन कला-शैली की कुछ उत्तम विशेषताओं का प्रतिपादन किया परन्तु इस नवीन शैली पर यूरोपियन कला का भद्दा प्रभाव था। 

इस स्कूल का प्रमुख विषय शबीह चित्रण था और बहुधा छवि चित्रों में व्यक्ति की वास्तावेक सादृश्यपूर्ण आकृति का सफल अंकन हुआ है। चित्र में अन्य साज-सामान के चित्रण में अवध की अपनी अनोखी रुचि दिखाई पड़ती है। इसी समय राजस्थानी कला का भी अधोपतन हो रहा था।

राजस्थान तथा पंजाब की शैलियाँ

राजस्थान के प्रमुख नगरों जैसे जयपुर, उदयपुर, नाथद्वारा, किशनगढ़ तथा बूंदी आदि नगरों में चित्रकार बाजारू ढंग से धार्मिक चित्र या व्यक्ति चित्र बना रहे थे ये लघु चित्र विधान तथा शैली में मध्यकालीन परम्परा के अधिक द्योतक थे। 

परन्तु फिर भी पंजाब के पहाड़ी प्रदेशों में मध्यकालीन जीवन पद्धति जीवित रहने के कारण उन्नीसवीं शताब्दी तक हिन्दू भावना से परिपूर्ण कुछ उत्तम चित्रों का निर्माण होता रहा। पंजाब में लाहौर तथा अमृतसर नगरों में उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में सिक्ख चित्रकारों की कृतियों अधिक लोकप्रियता को प्राप्त हुईं। 

इन सिक्ख चित्रकारों की कृतियों में पूर्व और पश्चिम की कला का अपूर्व समावेश है। कपूरसिंह नामक एक चित्रकार ने अनेक लघुचित्रों का निर्माण किया। इन चित्रों में रेखांकन की कुशलता और गति दर्शनीय है।

पटना शैली

उथल-पुथल के इस अनिश्चित वातावरण में दिल्ली से कुछ मुगल शैली के चित्रकारों के परिवार आश्रय की खोज में भटकते हुए पटना (बिहार) तथा कलकत्ता (बंगाल) में जा बसे यहाँ पर इन चित्रकार परिवारों ने एक विशिष्ट शैली को जन्म दिया, जो पटना या कम्पनी शैली के नाम से प्रसिद्ध है। 

दिल्ली सल्तनत की ओरंगजेब काल में अवस्था बिगड़ने पर अनेक कलाकार दिल्ली छोड़कर नवाव मुर्शिदाबाद के आश्रय में पहुँच गए। नवाब मुर्शिदाबाद ने इन कलाकारों को लगभग चालीस वर्ष तक अच्छा संरक्षण दिया परन्तु अफगान, मराठा, रुहेला और जाट आक्रमणों के कारण तथा विशेष रूप से कम्पनी के झगड़ों आदि के कारण नवाब की स्थिति खराब हो गई। 

इन चालीस वर्षों तक मुर्शिदाबाद कला का केन्द्र बना रहा परन्तु १७५०-१७६० ई० के मध्य कलाकारों को पुनः आश्रय की खोज में भटकना पड़ा। ये चित्रकार मुर्शिदाबाद छोड़कर इस समय पटना होते हुए कलकत्ता जा बसे, इस प्रकार पटना में भी दिल्ली-कलम पहुँची। इसी समय दूसरे कलाकार परिवार भी वहाँ जाकर बस गए।

पटना व्यापारिक केन्द्र था और अंग्रेज़ी सरकार के अनेक कार्यालय पटना में थे। इस प्रकार अंग्रेज़ों का यहाँ रहना स्वाभाविक था ये अंग्रेज अधिकारी इन भारतीय चित्रकारों से अपने लघु व्यक्तिचित्र बनवाते थे और विशेष रूप से भारतीय पशु-पक्षी तथा प्रकृति के चित्रों की मांग करते थे इस प्रकर के अनेक चित्र कमिश्नर टेलर तथा दूसरे अंग्रेज़ अधिकारियों ने बनवाये और इंग्लैंड भेजे, इसलिए इस शैली को कम्पनी शैली या जान कम्पनी शैली के नाम से पुकारते हैं। इस प्रकार के अनेकों चित्र पटना संग्रहालय तथा विदेशी कला दीर्घाओं में सुरक्षित हैं।

पटना शैली के दो चित्रकारों को वाराणसी के महाराजा ईश्वरीनारायण सिंह (१८३५-१८०६ ई०) ने संरक्षण दिया। ये कलाकार लालचंद और उसका भतीजा गोपालचंद थे। कहा जाता है कि ये दोनों काशी के चित्रकार दल्लूलाल के शिष्य थे। ये दोनों चित्रकार पटना शैली में व्यक्ति चित्र बनाने में निपुण थे।

पटना शैली या कम्पनी शैली के अधिकांश चित्र राजा, रईसों जागीरदारों या अंग्रेजों के आदेश पर बनाये गए। इसी समय चित्रकारों ने अबरक (अभ्रक) के पन्नों पर अतिलघु चित्रों का निर्माण आरम्भ किया।

उन्नीसवीं शताब्दी को पटना शैली के उत्थान का समय माना जाता है। इस समय में पटना शैली के चित्रकारों में सेवकराम का नाम प्रमुख हे लाला ईश्वरी प्रसाद (कलकत्ता आर्ट स्कूल के भूतपूर्व उपाध्यक्ष) के पितामह शिवलाल भी पटना के वंश परम्परागत चित्रकार थे। 

इनके अतिरिक्त हुलासलाल, जयराम दास, झूमकलाल, फकीरचंद आदि चित्रकारों का कार्यकाल १८३०-१६५० ई० के मध्य माना गया है। इस समय पटना के चित्रकारों ने फिरका – चित्रों के अतिरिक्त कागज़ तथा हाथी दांत फलकों पर भी चित्र बनाये। 

पटना शैली के चित्रकारों ने हाथी, घोड़े आदि जानवरों तथा सवारियों आदि के चित्र भी अंकित किये। पटना शैली के चित्रों में जनसाधारण जैसे ‘मछली बेचने वाली’, ‘टोकरी सुनने वाले’, ‘चक्की वाले’, ‘लोहार’, ‘दर्जी’, ‘सेविका’ आदि को भी चित्रित किया गया।

पटना शैली के चित्रों में रेखांकन की यथार्थता है, तथापि भावना की कमी है, परन्तु आकृति की सीमारेखाएँ बहुत संतोषजनक बनायी गई हैं। 

कुछ समय तक पटना शैली के चित्रकारों को ईस्ट इंडिया कम्पनी के यूरोपियन व्यवसाइयों और एंगलो इंडियन्स का संरक्षण प्राप्त होता रहा। इन संरक्षकों ने भारतीय तथा यूरोपियन मिश्रित शैली के शबीह चित्रों की मांग की। इन चित्रों में मानव आकृतियों को बहुत कोमलता से चिकना, गठनयुक्त और बारीकी से बनाने की चेष्टा की गई है। 

इन चित्रों में दिल्ली-कलम की कारीगरी पर्याप्त समय तक बनी रही, परन्तु रंग भद्दे हैं। सामान्यतः भूरे, गंदे हरे, गुलाबी तथा काले (स्याही) रंगों का चित्रों में प्रयोग किया गया है। इस प्रकार के अनेकों चित्र प्राप्त हैं जो ‘जान कम्पनी’ काल की कला के द्योतक हैं।

दक्षिणी भारत के राज्यों की कला मुगल साम्राज्य के पतन के साथ ही उत्तरी भारत की राजनैतिक अवस्था विशृंखलित होने लगी, परन्तु दक्षिणी भारत के अनेक राज्य स्थिर रूप में कला विकास में योगदान प्रदान कर रहे थे। दक्षिणी भारत में चित्रकला का उत्तरी भारत की अपेक्षा भिन्न रूप में विकास हुआ। 

दक्षिण में सोलहवीं शताब्दी से ही फारसी चित्रण शैली प्रचलित थी। सम्भवतः फारसी चित्रकला को तुर्कमान शासकों ने अपने-अपने मुसलमान राज्यों में आश्रय प्रदान किया। 

इस शैली के आरम्भिक चित्र उदाहरणों में तैमूरिया कला का प्रभाव परिलक्षित होता है परन्तु कालान्तर में स्थानीय अपभ्रंश तथा राजस्थानी कला के संयोग से इस शैली का रूप परिवर्तित हो गया और यह शैली बहुत कुछ मुगल शैली के समान दृष्टिगोचर होने लगी, परन्तु फिर भी इस चित्रकला में कुछ नगण्य सी अपनी निजी विशेषताएँ स्थायी रूप से प्रचलित रहीं, जिनके फलस्वरूप इस शैली का विकास उत्तरी भारत की चित्रकला से सर्वथा भिन्न रहा। 

मुगल साम्राज्य के पतन से चित्रकारों के अनेक परिवार दक्षिण में भी आश्रय की खोज में पहुँचे। इन चित्रकारों ने सम्भवतः दक्षिणी शैलियों को वल तथा शक्ति प्रदान की। 

दौलताबाद तथा औरंगाबाद के चित्रकारों की कृतियाँ उत्तरी भारत के चित्रकारों की कृतियों की तुलना में छोटी हैं और उनमें वह जीवन तथा गति नहीं है और चित्रों के विषय प्रायः ऐतिहासिक हैं जो समकालीन दक्षिण के शासकों से सम्बन्धित हैं। इन चित्रकारों के वंशज आज भी हैदराबाद तथा निकोण्डा में परम्परागत रूप से कारीगरी आदि के काम करते हैं।

भारत के सुदूर दक्षिणी क्षेत्रों में चित्रकला भिन्न रूप में ही जीवित रही, परन्तु चित्रों की परम्परा तथा शैली उसको उत्तरी भारत की कला से निबद्ध कर देती है। तारानाथ ने दक्षिण की चित्रकला का संक्षिप्त इतिहास प्रस्तुत किया है। लामा तारानाथ ने दक्षिण के तीन कलाकारों जय, पराजय तथा विजय का उल्लेख दिया है। इन चित्रकारों के अनेक अनुयायी थे। दक्षिण की चित्रकला का विकास दो भिन्न-भिन्न संस्थाओं- तंजोर तथा मैसूर में हुआ।

तंजौर शैली-तंजोर के चित्रकारों की शाखा के विषय में ऐसा अनुमान किया जाता है कि यहाँ चित्रकार राजस्थानी राज्यों से आये इन चित्रकारों को राजा सारभोजी ने अट्ठारहवीं शताब्दी के अंत में आश्रय प्रदान किया। 

ये चित्रकार हिन्दू थे अतः इस बात की पुष्टि होती है कि राजस्थानी राज्यों की अवस्था खराब होने पर आश्रय की खोज में भटकते हुए ये चित्रकार सुदूर दक्षिण के हिन्दू राज्यों में आकर बस गए। 

इस प्रकार तंजौर में राजस्थानी चित्रकला पहुँच गई और राजकीय संरक्षण प्राप्त कर यह कला-शैली पुनः एक स्थानीय शैली के रूप में प्रस्फुटित होने लगी। 

आरम्भ में इस शैली के चित्रकार बहुत कम थे परन्तु कालान्तर में इनकी संख्या बहुत अधिक हो गई और तंजौर के अंतिम राजा शिवाजी (१८३३-५५ ई०) के राज्यकाल में चित्रकारों के अठ्ठारह परिवार थे जो हाथी दांत तथा काष्ठफलक पर चित्रकृतियाँ बनाते थे। काष्ठफलकों पर ये चित्रकार जल रंगों के द्वारा चित्र बनाते थे। 

इन चित्रों में सोने के पत्र अतिरिक्त बहुमूल्य हीरे तथा जवाहरात भी लगाये जाते थे। इन चित्रकारों ने मानवाकार व्यक्ति चित्र तैल रंगों में बनाये। ये चित्र आज तंजौर के राजमहल तथा पहूकोट्टा के प्राचीन राजमहल में सुरक्षित हैं।

१८५५ ई० में शिवाजी की मृत्यु से इस राजवंश का अंत हो गया और इस राज-वंश के साथ ही चित्रकारों का राजकीय संरक्षण भी समाप्त हो गया। अतः चित्रकारों को दूसरे उद्योग धन्धों में लगना पड़ा जिससे कि वह अपनी आजीविका का निर्वाह कर सकें। 

कुछ चित्रकार सुनारगीरी का कार्य करने लगे तो कुछ सोला टोपी या कसीदाकारी आदि के काम में लग गए। अनेक वंश परम्परागत चित्रकार अभी भी अपना व्यवसाय चलाते रहे और इनकी बाज़ारू कृतियाँ जनता में प्रचलित रही इन चित्रों के विषय धार्मिक थे अतः स्थानीय हिन्दू जनता में थे कृतियाँ बहुत लोकप्रिय बन गई। 

इन चित्रों में कसात्मक विशेषताएँ बहुत कम है और सोने के रंग तथा पिसे हुए जवाहरातों का चित्रों में प्रयोग किया गया है, परन्तु चित्रों में कारीगरी बहुत उत्तम कोटि की है। आरम्भ में तंजोर शैली में प्रमुख रूप से हाथी दांत के फलकों पर शबीह चित्र बनाये गए जो बहुधा छः इंच लम्बे आकार के थे।

मैसूर शैली

दक्षिण के एक दूसरे हिन्दू राज्य मैसूर में एक मित्र प्रकार की कला शैली का विकास हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में मैसूर की चित्रकला राजा कृष्णराज के संरक्षण में अत्यधिक उन्नति को प्राप्त हुई। 

राजा कृष्ण राज के संरक्षण से पूर्व ही मैसूर शैली लगभग एक सौ वर्ष से प्रचलित थी और विकासोन्मुख हो रही थी। राजा कृष्णराज के शासन काल में दरबारी कलाकारों ने अधिक ख्याति प्राप्त की। 

राजा ने चित्रकारों को अत्यधिक प्रोत्साहन प्रदान किया। इस प्रकार के प्रमाण हैं कि राजा स्वयं एक मनोनीत विषय पर अनेक चित्रकारों को तुलनात्मक ढंग से चित्रांकन करने के लिए बहुत अधिक प्रेरणा देता था। 

तंजौर के चित्रकारों के समान मैसूर के चित्रकारों ने भी हाथी दाँत के फलकों पर अनेक शबीह चित्र बनाये जिनका संग्रह मैसूर के राजमहल में प्रदर्शित किया गया है। १८६८ ई० में राजा कृष्णराज के निधन के साथ ही चित्रकार भी इधर-उधर चले गए और यह शैली समाप्त हो गई।

विदेशी कला का आगमन उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में भारतवर्ष में चित्रकला का अधपतन हो गया और चित्रकला की कलात्मक विशेषताओं का लोप हो गया। चित्रकार पुरानी लकीरें पीटते रह गए और सृजनात्मक सत्ता का पूर्णतया लोप हो गया। 

इस प्रकार की चित्रकला की बुझती लो बाज़ारू कृतियों की धूमिल टिमटिमाइट बनकर उत्तरोत्तर घटती गई। अट्ठारहवीं शताब्दी के अंत में और उन्नीसवीं के आरम्भ में लगभग पचास से अधिक अंग्रेज़ी चित्रकार भारतवर्ष में आये, इनमें से कई चित्रकार अपने व्यवसाय में बहुत दक्ष थे। 

विशेष रूप से ये विदेशी चित्रकार राजाओं और रईसों के व्यक्तिचित्र तैल रंगों से बड़े आकार (आदम कद, मानवाकार) में बनाकर धन कमाने की लालसा से भारत आये थे इनके चित्रों की मांग देश के धनी वर्ग, राजाओं, नवाबों, जागीरदारों तथा जमींदारों आदि में इतनी बढ़ी कि भारतवर्ष की रूढ़िवादी परम्परागत चित्रकला की बाज़ारू शैली भी समाप्त हो गई। भारतीय चित्रकला का भविष्य अनिश्चित सा दिखाई पड़ने लगा। 

1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता युद्ध में भारतीय पराजय के बाद अंग्रेज़ी राज्य और सत्ता ने सम्पूर्ण भारत की आस्था और विश्वास को ऐसी ठेस पहुचाई कि देश की चित्रकला के विषय में सोचना कठिन था। देश में विदेशी सत्ता और शासन आ जाने के साथ विदेशी शिक्षा और मशीनें भी भारत में आने लगीं।

देश में अनेक विदेशी चित्रकारों के आने से और तैलचित्रों की उत्तरोत्तर बढ़ती मांग के कारण उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम भाग में एक नवीन कलाधारा का प्रवाह प्रस्फुटित हुआ जो अधिक स्थायी न था। 

यह धारा पाश्चात्य कला की थी, और इससे प्रेरित अनेक भारतीय चित्रकारों ने दक्षिण भारत में सर्वप्रथम पाश्चात्य चित्रकला में दक्षता प्रदर्शित की। इन चित्रकारों में राजा रविवर्मा का नाम अग्रगण्य है। राजा रविवर्मा ने यूरोपियन कला पद्धति के अनुरूप भारत की चित्रकला की धारा को नव-ज्योति प्रदान करने की चेष्टा की।

राजा रविवर्मा 

१८४८ ई० में राजा रविवर्मा का जन्म ट्रावनकोर नामक स्थान में हुआ और उनका १६०५ ई० में स्वर्गवास हुआ। राजा रविवर्मा ने अपनी अल्प आयु के लगभग तीस वर्ष भारतीय चित्रकला के प्रसार और प्रचार हेतु समर्पित कर दिए। 

राजा रविवर्मा ने थियोडोर जेनसन तथा अन्य यूरोपियन चित्रकारों से, जो दक्षिण भारत भ्रमण के लिए आते थे, कला दीक्षा ली। राजा रविवर्मा ट्रावनकोर के राजा राजवर्मा के सम्बन्धी थे, अतः राजा और राज-परिवार के सदस्यों ने रविवर्मा की सहायता की राजा रविवर्मा की कृतियों ने सम्पूर्ण देश में अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त की। 

राजा रविवर्मा ने व्यक्ति-चित्रों, दृश्य-चित्रों, धार्मिक तथा पौराणिक हिन्दू कथानकों पर आधारित चित्रों का निर्माण किया। उनकी चार बहुमूल्य कृतियाँ बैंक्वेटिंग हाल मद्रास में आज सुरक्षित हैं। 

राजा रविवर्मा ने पाश्चात्य प्रणाली पर यथार्थ शैली में भारतीय धार्मिक कथाएँ चित्रित की जिनको जनता ने अत्यधिक श्रद्धा और आदर से सराहा और ये चित्र छपकर सस्ते हो जाने के कारण जनता में बहुत प्रचलित हुए। राजा रविवर्मा ने अपने चित्रों के प्रकाशनार्थ बम्बई (मुम्बई) में लीथोग्राफ प्रेस खोला और उसी के द्वारा रविवर्मा के चित्र सारे देश में प्रचलित हो गए। 

उनके द्वारा अंकित पौराणिक चित्रों का विशेष आदर हुआ। आज भी रविवर्मा प्रेस चित्र प्रकाशन करता है। राजा रविवर्मा ने अपने समसामयिक महाल के चित्रकार अलेग्री नायडू से चित्रकला की शिक्षा ली थी। 

उस समय तैल चित्रण में नायडू का नाम बहुत प्रसिद्ध था। नायडू के लिए ट्रावनकोर के महाराजा स्वती त्रियूमल ने १८२० ई० से १८४७ ई० तक संरक्षण प्रदान किया। भारत में नायडू को उस समय यूरोपियन पद्धति का सर्वश्रेष्ठ चित्रकार समझा जाता था।

राजा रविवर्मा को ट्रावनकोर के महाराजा और बड़ौदा के गायकवाड़ तथा अन्य धनाड्य व्यक्तियों का संरक्षण प्राप्त हुआ। 

इस समय से गायकवाड़ के संरक्षण में रविवर्मा ने अपना ध्यान विशेष रूप से हिन्दू धर्म की कथाओं तथा पौराणिक प्रसंगों के चित्रण में लगाया। राजा रविवर्मा के इन चित्रों में काव्यगत भावना और उन्नत कल्पना नहीं है और इनको केवल रंगमंच की अनुकृति या धारणा माना जा सकता है। 

इन चित्रों का विषय तो पूर्णतया भारतीय था, परन्तु शैली और संविधान पूर्णतया पाश्चात्य था, क्योंकि इन चित्रों की रचना जीवित व्यक्तियों को चित्र की विभिन्न आकृतियों (पात्रों) के स्थान पर नाटक जैसे रंगमंच पर व्यवस्थित करके उनसे की गई है। 

इन जीवित व्यक्तियों या माडलों से चित्रों का यथार्थ पद्धति में छाया प्रकाश की पूर्णता, शारीरिक गठन, माँस-पेशियों की सुडौलता तथा नाटकीयता का पूर्ण ध्यान रखते हुए अनुकरण पद्धति पर अंकन किया गया है। 

इन चित्रों में शारीरिक बनावट सुंदर है और माँस-पेशियों की सुडौलता पर विशेष ध्यान दिया गया है। परन्तु इन चित्रों में धार्मिक भावना का प्रादुर्भाव न हो सका और ये चित्र साधारण स्थूल जगत की झाँकी मात्र बनकर रह गए।

राजा रविवर्मा के चित्रों की आनंद कुमारस्वामी ने कटु आलोचना की है। उन्होंने लिखा है कि ‘रविवर्मा के चित्र नाटकीय हैं। रविवर्मा के चित्रों का तत्कालीन रंगमंच से स्पष्ट सम्बन्ध था और इसके अनेक कारण थे। 

रविवर्मा ने स्वयं कहा था कि-‘उन्होंने प्राचीन पौराणिक वेश-भूषाओं की खोज की थी और इसके लिए वे उत्तर भारत में राम तथा कृष्ण के पावन तीर्थधामों का पर्यटन करने भी गये। 

परन्तु अधिक सफलता न देख उन्होंने तत्कालीन लोक जीवन तथा उस समय की प्रचलित नाटक मण्डलियों (पारसी नाटक कम्पनियों) से प्रेरणा ग्रहण की और उसी के आधार पर उन्होंने देवी-देवताओं के पौराणिक रूप को चित्रों में प्रस्तुत किया। 

राजा रविवर्मा ने चित्रकला के इस नवजागरण में अकेले ही व्यक्तिगत रूप से प्रयास किया। परन्तु कालान्तर में जो कला जागरण की चेतना दिखाई पड़ी, उसमें सामूहिक जनभावना स्वाधीनता संघर्ष और राष्ट्रीय जागरण के आंदोलन की अखिल भारतीय चेतना निहित थी।

इसी समय में राजा रविवर्मा के समसामयिक चित्रकारों में रामास्वामी नायडू को बहुत प्रसिद्धि प्राप्त हुई। रामास्वामी ने भी बड़े आकार के तैल चित्रों का निर्माण किया। भारतीय चित्रकला का व्यवसाय समाप्त हो रहा था और चित्रकार अपने व्यवसाय को छोड़कर दूसरे क्षेत्रों में लगते जा रहे थे। 

दूसरी ओर विदेशी शासक अपनी संस्कृति को पैठाने के लिए कला प्रशिक्षण हेतु आर्ट स्कूलों की स्थापना कर रहे थे। इन आर्ट स्कूलों में भारतीय विद्यार्थियों को पाश्चात्य शैली पर चित्रकला का अभ्यास कराया जाता था। 

यूरोप के केसिंग्टन स्कूल की शिक्षा पद्धति इन स्कूलों में प्रचलित थी। यहाँ पर विद्यार्थी स्टिल लाइफ (पदार्थ चित्रण), पोरट्रेट (मुखाकृति चित्रण) तथा लैंडस्केप (दृश्य चित्रण) का चित्रण कार्य यथार्थ शैली में करते थे, परन्तु उनके कार्य में कोई प्रगति नहीं हो रही थी, और उनके लिए छाया तथा प्रकाश का प्रभाव समझना एक समस्या थी। अतः इन आर्ट स्कूलों में भारतीय छात्रों का व्यर्थ ही समय नष्ट हो रहा था। 

इसी समय कलकत्ता, बम्बई (मुम्बई), लाहोर और मद्रास में आर्ट स्कूलों की स्थापना हो चुकी थी इन स्कूलों में साधारण स्तर के यूरोपियन अध्यापकों के द्वारा कला शिक्षा प्रदान की जाती थी। 

इन सरकारी आर्ट स्कूलों के विद्यार्थियों ने किसी भी ऐसी उच्च कृति का सृजन नहीं किया जिसे महान कहा जा सके। १९०२-१९०३ ई० में दिल्ली में इन स्कूलों के विद्यार्थियों के अनेक तेल तथा जल रंगों से बने चित्रों की प्रदर्शनी की गई परन्तु इन चित्रों में कोई भी कलात्मक उपलब्धि नहीं थी। 

ये चित्र यूरोपियन शैली के अनुकरण पर बनाये गए थे। इस प्रदर्शनी के चित्रों के विषय में कलकत्ता आर्ट स्कूल के भूतपूर्व प्रिंसिपल परसी ब्राउन ने सर जार्ज बाट द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘इंडियन आर्ट एट दिल्ली’ में अपनी सम्मति इस प्रकार प्रकट की- “ये चित्र अत्यन्त भद्दे और कर्कश थे, इनका रेखांकन त्रुटिपूर्ण था और शैली तथा रंग की दृष्टि से ये चित्र अकुशल कलाकारों की कृतियों जैसे थे।”

बीसवीं शताब्दी के प्रथम चरण में अंग्रेज शासकों ने विक्टोरियाकालीन विदेशी चित्रकला का भारत में बीजारोपण करने की अथक चेष्टा की, परन्तु यह कला वृक्ष विकसित न हो सका। इस समय भारतीय चित्रकला का पूर्णतः हास हो चुका था और शासक वर्ग के द्वारा अंग्रेज़ी संस्कृति तथा कला रोपने के प्रयत्न हो रहे थे। 

आनंद कुमार स्वामी ने अपने देश की कला विलुप्ति के लिए ‘अधिकांश तथाकथित अंग्रेजी शिक्षा के द्वारा उत्पन्न रुचियों के परिणाम को कला विलुप्ति के लिए उत्तरदायी बताया है, यूरोपियन कला का अनुसरण हमारे देश की कला को जीवन प्रदान न कर सका।’ 

प्रायः ऐसा देखा गया है कि दो संस्कृतियों के संसर्ग में दोनों में ही आदान-प्रदान होता है और दोनों संस्कृतियाँ एक-दूसरे से परस्पर कुछ ग्रहण करती हैं और कला प्रतिभा एक नवीन पथ प्रशस्त करती है। 

उस समय देश की अवस्था ऐसी थी कि एक ओर अंग्रेज़ शासक प्रभुता के हठ में थे, और दूसरी ओर भारतवासी दासता, दरिद्रता और हीनता से उत्पन्न उदासीनता में रहने के कारण सांस्कृतिक आदान-प्रदान करने के लिए उन्मुख न हुए और उनमें स्वाधीनता प्राप्ति तथा राष्ट्रीयता की भावना जाग रही थी। 

इस प्रकार कला एक कुंठित अवस्था की द्योतक मात्र ही रह गई। यह स्तब्धता की स्थिति राजनीति, समाज, शिक्षा, कला तथा विश्वास सभी क्षेत्रों में थी। इस प्रकार की स्थिति बहुत समय तक नहीं चल सकती थी। यदि संस्कृति का समन्वय सम्भव न था तो विद्रोह निश्चित था। भारतीय कला ने इस भावना के नवजागरण का रूप ग्रहण किया और पुनः कला-विकास की नवीन आशाओं का सूत्रपात हुआ।

कला का पुनरुत्थान

ई० बी० हैवेल-हैवेल सन् १८८४ ई० में सर्वप्रथम मद्रास कला विद्यालय के प्राचार्य बने । १८६६ ई० में उन्होंने संसार का ध्यान भारतीय कला की ओर आकर्षित किया। 

भारतीय कला और संस्कृति के जागरण की ओर जब भारतीय जनता का ध्यान आकर्षित हो रहा था, उसी समय कलकत्ता आर्ट स्कूल के प्रिंसिपल के रूप में हैवेल आये। ई० वी० हैवेल के सहयोग से बंगाल में एक नवीन कला आंदोलन आरम्भ हुआ। 

हेवेल ने बंगाली विद्यार्थियों को केवल विदेशी-रीतियों पर कला सिखाने की त्रुटि को समझा और उन्होंने भारतीय जीवन और आदर्श से पूर्ण मुगल तथा राजपूत कला की ओर ध्यान दिया। 

हैवेल ने यूरोपियन चित्रों की नकल बनवाने की प्रथा को उचित न समझा। किन्तु इस प्रकार अंग्रेज़ प्रिंसिपल के द्वारा भारतीय कला पर जोर देने की बात को बंगाल की जनता ने रहस्यपूर्ण माना और बंगाल की जनता ने उनके इस आंदोलन के प्रति एक क्षोभ और प्रतिक्रिया प्रदर्शित की। 

अनेक बंगला पत्र-पत्रिकाओं में इस आशय के लेख प्रकाशित हुए कि अंग्रेज़ अपनी कला भारतीय को नहीं सिखाना चाहते। इस प्रकार बंगाल की जनता में इस नवीन शिक्षण पद्धति के प्रति अत्यन्त रोष फैला।

इसी समय में हेवेल ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से यूरोपियन चित्रों के संग्रह के स्थान पर उत्कृष्ट भारतीय चित्रों के संग्रह को तैयार करवाने की अनुमति प्राप्त की। संयोगवश हैवेल की भेंट प्रसिद्ध टैगोर परिवार के चित्रकार अवनीन्द्रनाथ टैगोर से हुई और उन्होंने टैगोर की सहायता से भारतीय चित्रकला की कक्षाएं कलकत्ता आर्ट स्कूल में प्रारम्भ की और टैगोर को इन कक्षाओं का अध्यक्ष बना दिया गया। 

यहाँ पर ही अवनीन्द्रनाथ ने हैवेल महोदय की देख-रेख में भारतीय शैली में स्वयं भी अनेक प्रयोग किए और ‘बुद्ध जन्म’, ‘युद्ध तथा सुजाता’, ‘ताजमहल का निर्माण’, ‘शाहजहाँ की मृत्यु’ आदि सफल चित्रों का निर्माण किया। अवनीन्द्रनाथ टैगोर अवनीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म १८७१ ई० में जोरासांकू गाँव के ठाकुर परिवार में जन्माष्टमी के दिन हुआ। 

अवनीन्द्रनाथ ठाकुर ने भारतीय चित्रकला की परम्परा के टूटे धागे जोड़ना आरम्भ किये। उन्होंने हेवेल की सूझबूझ के अनुसार भारतीय कला के उत्थान के लिए देश की प्राचीन चित्रकला को आधारशिला मानकर आगे बढ़ाने का प्रयास किया। 

उन्होंने अपने चित्रों में भारतीय आध्यात्मवाद, काव्य-सौष्ठव तथा पूर्वी देशों की विचारधारा को प्रतिध्वनित करने की चेष्टा की इस प्रकार आधुनिक भारतीय चित्रकला के पुनः जागरण का आंदोलन कलकत्ता आर्ट स्कूल के प्रिंसिपल हैवेल महोदय के सतत् प्रयत्नों से आरम्भ हुआ और अवनीन्द्रनाथ ठाकुर इस आंदोलन के कर्णधार बने कुमारस्वामी ने आधुनिक कला के विषय में उल्लेख देते हुए इस प्रकार लिखा है कि- ‘कलकत्ता के भारतीय चित्रकारों के आधुनिक स्कूल का कार्य पुनः राष्ट्रीय जागृति का एक पक्ष है।’

अवनीन्द्रनाथ ने अपने प्रारम्भिक वर्षों में पुरोपियन शैली के तेल चित्र बनाने का अभ्यास किया था और उन्होंने अपने युवाकाल में इटेलियन चित्रकार गिलहार्डी से विधिवत तेल चित्रण की शिक्षा ग्रहण की थी। 

कालान्तर में उन्होंने हेवल के सहयोग से समझा कि स्वदेशी परम्परा के आधार पर ही कला-जागरण को अग्रसर करना उचित होगा और भविष्य में इस जागृति के अनेक कला आदर्श स्थापित होने की संभावना है। 

इस निश्चय से ही उन्होंने उत्साह और लगन के साथ हैवेल के विचारों को कार्यान्वित करने का प्रयास किया और वे जनता के समक्ष आए। हैवेल का विश्वास- ‘भारतीय कला जीवंत एवं मौलिक है’ ने अवनीन्द्र बाबू को बल प्रदान किया। इस प्रकार हैवेल ने जिन सिद्धान्तों को प्रस्तुत किया उनको टैगोर के द्वारा प्रयोगात्मक रूप मिला। 

उन दिनों जनता के हृदय में इस प्रकार की एकमात्र अवस्था घर कर गई थी कि यूरोप से ही केवल कला प्रेरणा प्राप्त हो सकती है। अतः कला अभ्यासियों ने और बंगला समाचार-पत्रों ने इस कला उत्थान के कार्यक्रम का विरोध किया। परन्तु इन प्रतिक्रियाओं से टैगोर तथा हैवेल को बल मिला।

अवनीन्द्रनाथ ने लगभग १८६१ ई० में चित्रकला का नियमित अभ्यास किया। रवीन्द्रनाथ टैगोर के निमंत्रण पर उन्होंने शांतिनिकेतन में १६२० ई० से कला भवन में अध्यक्ष पद संभाला और १६४१ ई० में अपने चाचा ‘विश्व कवि रवीन्द्रनाथ के महापुराण’ का चित्रण करने के पश्चात्उ न्होंने अपनी तूलिका को त्याग दिया। 

किसी भी महान चित्रकार के लिए यह सम्भव नहीं कि वह जीवनभर एक ही लीक पर चलता रहे, फिर अवनीन्द्रनाथ जैसे कलाकार के लिए, जो नवीन प्रयोगों के लिए जागरूक थे, यह कब सम्भव था कि वे एक ही पथ पर चलते रहते। 

उनकी कृतियों में शैली की इतनी विविधता है कि कभी-कभी उनको एक ही चित्रकार की कृति मानने में संशय सा प्रतीत होता है जिस प्रकार उन्होंने भिन्न-भिन्न माध्यमों से चित्रों का निर्माण किया उसी प्रकार उनके चित्रों की विषय-सामग्री में भी विविधता है। उन्होंने शबीहें, प्राकृतिक दृश्य, जन-जीवन, लोक पर्व तथा इतिहास और पुराण की अनेक कथाओं का अंकन किया है। 

उनके बनाये ‘उमर खैय्याम’, ‘मेघदूत’ तथा ‘अलिफलेला’ के चित्रों में शैली का पर्याप्त अंतर है। ‘भारतमाता’, ‘तिष्यरक्षिता का हुम झड’, ‘गणेश जननी’, ‘महापुराण’ आदि उनकी प्रसिद्ध है। रचनाएँ हैं। उनकी कृतियों में असंदिग्ध रूप से जापानी, चीनी, फारसी, यूरोपीय और तदुपरान्त भारतीय चित्रकला का सम्मिश्रण है, परन्तु सर्वोपरि उनके समन्वयवादी व्यक्तित्व की छाप है। 

स्टेला क्रेमरिश ने इस प्रकार लिखा है कि अवनीन्द्रनाथ ठाकुर की कला उनके व्यक्तिगत अधिकार पर आधारित है। अवनीन्द्रनाथ की शैली की बंगाल में कटु आलोचना हुई और यह कहा गया कि उनके चित्रों में चीनी रेखा तथा जापानी ‘वाश टेकनीक का अनुकरण

बंगाल स्कूल का प्रचार

राजा रविवर्मा के कला विकास सम्बन्धी आंदोलन के पश्चात् आधुनिक चित्रकला के जिस नवीन आंदोलन का सूत्रपात हुआ उसके प्रवर्तक स्व० हेवेल, डॉ० आनंद कुमारस्वामी, स्व० रामानंद चटर्जी, स्व० अर्धेन्दु कुमार गांगुली, स्व० अवनीन्द्रनाथ ठाकुर थे। 

आधुनिक चित्रकला के जन्म की एक कहानी ‘बंगाल स्कूल’ के उपरोक्त आंदोलन से आरम्भ हो भारतीय स्वतंत्रता के साथ पूर्णता समाप्त हो गई। 

इस पुनः जागरण और कला उत्थान के आंदोलन को अग्रसर करने में अवनीन्द्रनाथ का योगदान कलाकार के रूप में ही नहीं बल्कि एक शिक्षक तथा प्रचारक के रूप में भी है। 

हेवेल तथा अवनीन्द्र नाथ ने अपने प्रयत्नों से विद्यार्थियों का एक छोटा दल बना लिया जिसमें उल्लेखनीय चित्रकार स्वर्गीय सुरेन्द्रनाथ गांगुली, एस० एन० गुप्ता, स्व० नन्दलाल वसु, हकीम मुहम्मद खान, के० बेकटप्पा (मैसूर), शलेन्द्र डे, समी-उज़ जमा, स्व० असित कुमार हाल्दर (लखनऊ), समरेन्द्रनाथ (पंजाब), उकील (दिल्ली), देवी प्रसाद राय चौधरी (मद्रास), पुलिन बिहारी दत्त (बम्बई) तथा स्व० वीरेश्वर सेन (लखनऊ) आदि थे। 

इस नवीन स्कूल को ‘ओरियन्टल आर्ट सोसायटी’, जिसकी स्थापना स्व० गगनेन्द्रनाथ टैगोर ने १६०७ ई० में की थी, ने बहुत प्रोत्साहन प्रदान किया। इस सोसायटी के प्रथम सभापति सम्मानीय किचनेर और सर जान बुहरोफी थे। सम्मानीय मि० जस्टिस होल्मवुड, श्रीमती एन० विलन्ट, स्काट ओ० केमर, ओ० सी० गांगुली, परसी ब्राउन, थार्नटोन तथा जे०पी० मूलर इस सोसाइटी के सदस्य थे, जिन्होंने इस आंदोलन को चलाया और प्रसार में सहयोग दिया। 

इसी प्रकार अंग्रेज़ी सरकार के द्वारा प्रचार हेतु एक अन्य समिति ‘इंडियन सोसायटी’ लंदन में स्थापित की गई। इन सोसायटियों के सहयोग से इस दल की प्रदर्शनी भारत तथा अन्य स्थानों में आयोजित की गई।

साधन 

अवनीन्द्रनाथ ने प्राचीन चित्र परम्परा और तकनीकी साधनों को प्राप्त करने के लिए परम्परागत चित्रकारों को बुलाया। सर्वप्रथम उनकी भेंट पटना के चित्रकार लाना ईश्वरी प्रसाद से हुई। वे कांगड़ा शैली के एक वंश परम्परागत चित्रकार थे। इनके प्रशिक्षण से इस नवीन स्कूल के चित्रकारों ने कला की प्राचीन विशेषताओं को जाना।

भारतीय कला के अध्ययन हेतु यह दल अजन्ता, बाघ तथा अन्य कला तीथों में भ्रमण करने गया जिससे इस दल के चित्रकारों ने अपने देश की कला का स्वरूप पहचाना। इन चित्रकारों ने अनेक प्राचीन चित्रों की अनुकृतियाँ भी बनायीं।

इसी समय में अवनीन्वनाथ मे भित्तिचित्रण की तकनीकी के प्रयोग करने के लिए जयपुर से व्यवसायी भित्तिचितेरों को बुलाकर भित्तिचित्रों के प्रयोग भी किये जिनके परिणामस्वरूप आज भी कलकत्ता आर्ट स्कूल में दीवारों पर ‘कच और देवयानी’ के चित्र दिखाई पड़ते हैं। 

इस स्कूल के कलाकारों ने विभिन्न शैलियों में चित्र बनाये अवनीन्द्रनाथ ने स्वयं चीनी कला की रेखा, जापान की रंग बहाने की पद्धति (बाश टेकनीक) से प्रेरणा ग्रहण की और उनकी आरम्भिक कृतियों में यह विदेशी प्रभाव अधिक बलवती है। 

१९०१-०२ के लगभग अवनीन्द्रनाथ जापानी कलाकारों मोकाहमा तेकवान और हिसिया के सम्पर्क में आये और इस सम्पर्क का उन्होंने पूरा लाभ उठाया।

प्रसार 

बंगाल से इस प्रकार एक नवीन कला- जागरण की लहर तो फैली परन्तु इसकी कदाचित कल्पना नहीं की जा सकती थी कि आगामी वर्षों में इसका विस्तार होगा। इस नवीन जागरण के साथ ही भारतीयता और नितान्त भारतीयता पर अधिक बल दिया जाने लगा जो सदैव आलोचना का एक विषय रहा है। 

परन्तु ज्यों-ज्यों देश में कला विद्यालयों की स्थापना होती गई और कला शिक्षकों की माँग होती गई त्यों-त्यों इस स्कूल का प्रसार होता गया। इस स्कूल को अंग्रेज़ी सरकार ने भी विशेष प्रोत्साहन और संरक्षण प्रदान किया। 

अंग्रेज़ी सरकार ने बंगाल स्कूल के कई चित्रकारों को प्रिंसिपल या शिक्षक नियुक्त करके विभिन्न प्रान्तों के आर्ट स्कूलों में भेजा जहाँ-जहाँ बंगाल स्कूल के चित्रकार पहुँचे वहाँ-वहाँ अपना कार्यक्षेत्र बनाते गए परन्तु शीघ्र ही इनकी कला कुछ सीमाओं में जकड़ने लगी और लोक पीटने की परम्परा दिखाई पड़ने लगी। 

बंगाल स्कूल के जो चित्रकार इधर-उधर गये उनमें कुछ चित्रकारों के नाम उल्लेखनीय हैं स्वर्गीय नंदलाल वसु शांति निकेतन में कला विभाग के अध्यक्ष रहे। स्वर्गीय असित कुमार हाल्दर और सोमेंद्रनाथ गुप्त ने क्रमशः लखनऊ और लाहौर के सरकारी आर्ट स्कूलों में अध्यक्ष पद को ग्रहण किया। 

वेंकटप्पा मैसूर और शैलेन्द्रनाथ हे जरपुर कला विद्यालयों में स्थापित हुए। इसी प्रकार देवी प्रसाद राय चौधरी मद्रास के सरकारी आर्ट स्कूलों में अध्यक्ष बने। स्वर्गीय शारदाचरण उकील ने दिल्ली में शिक्षण आरम्भ कर दिया और क्षितेन्द्र मजूमदार इलाहाबाद विश्वविद्यालय की रुचिकता’ में चित्रकला का प्रशिक्षण करते रहे। 

इस प्रकार अनेक अन्य चित्रकार भी प्रसार कार्य करते रहे। इन चित्रकारों ने विभिन्न प्रान्तों में जाकर कुछ समय तक कला जागृति को आगे बढ़ाने की चेष्टा की परन्तु बंगाल स्कूल की निर्बलताओं के कारण और समय की परिवर्तनशीलता के कारण यह स्कूल अधिक समय तक जीवित न रह सका और तीसरी संतति के आते आते दम तोड़कर समाप्त हो गया अवनीन्द्रनाथ को १६५१ ई० में अपने स्वर्गवास से पहले ही इस आंदोलन की दुर्दशा देखनी पड़ी।

रविशंकर रावल का आंदोलन- बंगाल शैली के चित्रकार गुजरात में नहीं पहुँच सके। गुजरात में एक प्रतिभावान चित्रकार और शिक्षक श्री रविशंकर रावल ने इस युग जन-जागरण के की कला को अपनी- -सूझबूझ और कला कुशलता से एक नवीन रूप प्रदान किया। श्री रावल ने अपना दल अलग संगठित किया और उन्होंने भारतीय कला की मूल विशेषताओं को अपनी कला में बाँधने का प्रयास किया है।

बम्बई की कला भारतीय पाश्चात्य रूप- बंगाल स्कूल की कला का बम्बई में किंचित भी प्रभाव नहीं पड़ा। बम्बई में पश्चिमी शैली की प्रधानता बनी रही परन्तु फिर भी बम्बई ने भारतीय कला परम्परा को प्राप्त करने के लिए अजन्ता की कला को एक अधिक शक्तिशाली युगीन चेतना के आधार पर नवजीवन प्रदान करने की चेष्टा की, यद्यपि इस प्रयास में पूर्व और पश्चिम की कला का सम्मिश्रण था, परन्तु यह प्रयास अपनी दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयोग था पूर्व और पश्चिम के कला सिद्धान्तों का सम्मिश्रण और चिंतन बम्बई की एक अपनी विशेषता रही है बम्बई स्कूल के प्रचार तथा प्रसार साधनों की कमी के कारण कुछ समय तक बम्बई का यह कला आंदोलन बंगाल स्कूल के प्रभाव से दबा रहा, परन्तु शीघ्र ही बम्बई स्कूल की कृतियों ने बंगाल स्कूल को चुनौती दी। 

इस समय से आज तक बम्बई स्कूल चित्रकला का एक शक्तिशाली केन्द्र बना हुआ है। बम्बई स्कूल के योगदान का हम आगे संक्षिप्त विवेचन करेंगे।

बंगाल स्कूल के चित्रों की विशेषताएँ

आनंद कुमारस्वामी ने बंगाल के आधुनिक स्कूल के कलाकारों की कला की समालोचना करते हुए इस प्रकार का उल्लेख दिया था – “कलकत्ता के भारतीय चित्रकारों के आधुनिक स्कूल का कार्य राष्ट्रीय पुनः जागृति का एक पक्ष है, जबकि उन्नीसवीं शताब्दी के समाज सुधारकों की यह इच्छा थी कि वह भारत को इंग्लैंड बना दें, तब बाद के कार्यकर्ता समाज में एक ऐसी अवस्था वापस लाने या बनाने का प्रयत्न कर रहे थे, जिससे भारतीय संस्कृति में अभिव्यक्त और लागू आदशों का अधिक गहराई से मनन किया जा सके।” 

आनंद कुमारस्वामी ने आगे इस स्कूल की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए इस प्रकार विचार व्यक्त किये” यद्यपि श्री टैगोर और उनके शिष्यों ने भव्य शैली को पूर्णतया प्राप्त नहीं किया है, परन्तु उन्होंने निश्चित ही भारतीय कला की आत्मा को पुनर्जीवन प्रदान किया है, और इसके अतिरिक्त जैसे कि प्रत्येक सच्चे कलाकार की जिज्ञासा होती है कि उसकी कृति में भिन्न प्रकार का निजी सौन्दर्य हो, यह भावना इनकी कृतियों में दिखाई पड़ती है।”

बीसवीं शताब्दी के साथ ही स्वतंत्रता आंदोलन के बीज पनपने लगे थे और इस शताब्दी के प्रथम चतुर्थ भाग में महात्मा गाँधी के स्वतंत्रता आंदोलन की चिंगारी फूट पड़ी। सम्पूर्ण देश में स्वदेश प्रेम और मातृ-भक्ति की भावना के साथ ‘वंदे मातरम्’ की ध्वनि प्रतिध्वनित होने लगी। 

ऐसे समय में बंगाल के कला आंदोलन पर राष्ट्रीय जागृति का प्रभाव स्वाभाविक था। चित्रकार भी देश-प्रेम और स्वतंत्रता की भावना से परिपूरित हो गया था, अतः चित्रकारों ने भारत की प्राचीन गौरवमयी गाथाओं, धार्मिक कथाओं, ऐतिहासिक प्रसंगों, साहित्यिक संसर्गों तथा जन जीवन की झांकियों से अपने चित्र विषयों का चयन किया। 

इस प्रकार चित्रकार ने अपनी देश-प्रेम की भावनाओं और अतीत की भव्य झांकी को अंकित कर पुनः एक ‘सुजला-सुफला मलयम शीतलाम्’ भारती के स्वतंत्र रूप की कामना की।

बंगाल स्कूल के कलाकारों की कृतियों में विदेशी कला

प्रभाव के रूप में जापानी ‘वाश पद्धति के अतिरिक्त पाश्चात्य शैली का यथार्थ रेखांकन और चीनी आलेखन का निश्चित रूप से सम्मिश्रण है। वैसे इस स्कूल की कृतियों में पर्याप्त परिमार्जन, रंगों की कोमलता और भारतीय वस्तुओं के प्रति प्रेम परिलक्षित होता है। 

डॉ० आनंद कुमारस्वामी के अनुसार – “इस स्कूल की कृतियाँ अजन्ता, मुगल तथा राजपूत चित्रों से प्रेरणा लेकर भी स्पष्ट रूप से निर्बल है।”

बंगाल स्कूल के चित्रों की तकनीकी

वाश चित्र बंगाल स्कूल की विशेषता है इस स्कूल के चित्रकारों ने अपने चित्र में ब्रितानी जल रंगों (Water Colours) तथा ब्रितानी व्हाटमैन या स्वेत क्रार्ट्रिज कागज़ का प्रयोग किया है, परन्तु चित्रण विधि में भारतीय, चीनी, जापानी तथा पाश्चात्य प्रणालियों का अनुसरण किया गया है। 

चित्रकार चित्र बनाने के लिए सर्वप्रथम कागज़ पर चित्र की आकृतियों को लाल रंग की रेखाओं से अंकित करता था फिर चित्र को पानी में भिगोकर समतल बोर्ड या पटरे पर सुखाकर चित्र की सीमारेखाओं को स्थायी बना लेता था। 

इस प्रकार सीमारेखा के स्थायीकरण के पश्चात् चित्रकार चित्र के अनेक भागों में रंग भर जाता था और फिर कागज़ को पुनः पानी में डुबोकर सपाट पटरे पर सुखाकर चित्र के रंगों को स्थायी कर लेता था, जिससे कि ऊपर से रंग की सपाट वाश लगाने पर यह रंग कागज़ से न छूट जाएँ। इस क्रिया के पश्चात् इच्छित वातावरण उत्पन्न करने के लिए एक या अनेक रंगों को सम्पूर्ण चित्र के ऊपर पारदर्शी ढंग से बहा दिया जाता था या वाश लगा दी जाती थी इससे सम्पूर्ण चित्र में चिकनापन, धुंधलापन और रंग का एक-सा सपाट प्रभाव आ जाता था। 

परन्तु चित्र में मे रंगत (टोन) आ जाती थी। इसके पश्चात् चित्र की आकृतियों को उभारने के लिए रेखांकन को पुनः कत्थई या किसी अन्य रंग से उभार दिया जाता था साथ ही चित्र के किसी-किसी भाग को पारदर्शी, या सफेद मिश्रित अपारदर्शी (ओपेक) रंग के प्रयोग से आवश्यकतानुसार उभार दिया जाता था। 

साधारणतया अपनी निर्बलता को छुपाने के लिए चित्रकार चित्र के निर्बल या कमजोर भागों को गहरे रंग की बाश के प्रभाव से दबा देता था। आकृतियों में डोल लाने के लिए छाया तथा प्रकाश का भी आवश्यकतानुसार प्रयोग किया गया है।

बंगाल स्कूल की दासोजनक प्रवृत्तियाँ

बंगाल स्कूल के कलाकारों ने कल्पना को अधिक महत्त्व दिया और वे यथार्थता से दूर चले गए। उनकी कृतियों में काल्पनिकता के आधिक्य के कारण आकृतियों की अत्यधिक विकृति होने लगी चित्रकार अनुपातडीन बड़े-बड़े नेत्र पतली लम्बी उंगलियों, छरहरे बदन लम्बी नासिका में अतिशयोक्ति का प्रयोग करने लगे और इस विकृति का चरम उत्कर्ष कल्यान सेन की कृतियों में दिखाई पड़ता है। 

इस प्रकार शीघ्र इस स्कूल की कलाकृतियों में रूढ़िवादिता तथा हास-चिन्ह स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगे और यह कला शैली लगभग एक चौथाई शताब्दी के पश्चात् ही दम तोड़ने लगी और भारतीय चित्रकला में यूरोपियन सम्पर्क के फलस्वरूप नवीन प्रवृत्तियों प्रस्फुटित होने लगीं।

बम्बई स्कूल का योगदान

उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में बम्बई में भारतीय कला के उत्थान के लिए अनेक प्रयत्न किये गए। यद्यपि यह प्रयास पाश्चात्य दृष्टिकोण पर अधिक निर्भर थे और उस समय बंगाल स्कूल की कला के समर्थकों ने इन प्रयासों की आलोचना की, परन्तु आज यह भारत-यूरोपियन मिश्रित कला का समर्थक केन्द्र भारतीय चित्रकला को एक ठोस प्रगति की ओर अग्रसर कर चुका है और समस्त भारतीय चित्रकार कला प्रेरणा हेतु बम्बई की ओर देख रहे हैं।

सर जे० जे० स्कूल आफ आर्ट, बम्बई में जब प्रीफिक्स महोदय प्रिंसिपल के पद पर नियुक्त होकर आए तो उन्होंने अजन्ता के चित्रों के अध्ययन तथा चित्रों की अनुकृतियों को तैयार करने का विस्तृत कार्यक्रम बनाया। 

उन्होंने अपने शिष्यों सहित उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में अजन्ता की प्रतिकृतियाँ तैयार करने का कार्य आरम्भ कर दिया था जिसका अजन्ता के साथ उल्लेख किया जा चुका है। प्रीफिस महोदय ने लगभग तेरह वर्ष तक अजन्ता के चित्रों का गहन अध्ययन किया, परन्तु उनका यह शोध अध्ययन आर्थिक कारणों से आगे न बढ़ सका।

बम्बई के चित्रकारों ने नवीन शताब्दी (बीसवी शताब्दी) के प्रथम चतुर्थ भाग में पाश्चात्य तथा भारतीय शैली के सम्मिश्रण का प्रयास आरम्भ कर दिया। 

सर जे० जे० स्कूल आफ आर्ट, बम्बई के नवीन प्रिंसिपल ग्लेडस्टोन सालोमन की अध्यक्षता में घुरन्दर तथा लालकलां ने इस दिशा में कई महत्त्वपूर्ण प्रयोग किये जो सफल और उल्लेखनीय कहे जा सकते हैं। इन कृतियों में सृजनात्मक शक्ति और सच्ची अनुभूति है। 

ग्लेडस्टोन सालोमन के प्रयासों को स्व० श्री जगन्नाय अहिवासी जैसे कुशल भारतीय चित्रकारों से अधिक बढ़ावा प्राप्त हुआ। श्री अहिवासी सर जे० जे० स्कूल आफ आर्ट, बम्बई में इंडियन कक्षा आर्ट (भारतीय कला की कक्षा) के अध्यापक के रूप में महत्वपूर्ण कार्य करते रहे और वहाँ से अवकाश ग्रहण कर बनारस विश्वविद्यालय वाराणसी में कला विभाग के अध्यक्ष के रूप में कार्य करते रहे हैं।

स्व० श्री अहिवासी की देखरेख में बम्बई के कला अभ्यासी छात्रों ने प्राचीन भारतीय कला शैलियों जैसे अजन्ता, राजपूत तथा कांगड़ा आदि शैलियों का विशेष रूपसे अध्ययन किया और उनकी देखरेख में इन चित्रकारों ने इन शैलियों को अपनी कला का आधार बनाया। 

भारतीय कला के विकासोन्मुख रूप के साथ बम्बई आर्ट स्कूल ने पाश्चात्य शैली का भी अति उत्तम रूप विकसित किया। 

अनेक चित्रकारों ने यथार्थ शैली में पाश्चात्य ढंग से दृश्य-चित्रण, पदार्थ-चित्रण, व्यक्ति-चित्रण (पोरट्रेट), इतरेखांकन (स्केचिंग) तथा स्मृति-चित्रण में प्रगति की। इस स्कूल के चित्रकारों ने टेम्परा तथा तैल चित्रण की पाश्चात्य पद्धति पर अधिक बल दिया और सर्वोत्कृष्ट कृतियाँ प्रस्तुत कीं।

नूतन प्रवृत्तियाँ

यद्यपि आधुनिक युग के अन्तर्गत अवनीन्द्रनाथ तथा नन्दलाल बसु दोनों ही व्यक्ति आ जाते हैं, फिर भी वे एक विगत परम्परागत कला के समर्थक या उद्धारक ही कहे जा सकते हैं, वास्तव में यह परम्परागत कला या एकेडमीवाद की जो नवीन पाश्चात्य धारा चली वह कला के आदर्श रूप और पाश्चात्यपन की प्रभावशाली समस्याओं को नहीं सुलझा सकी। 

इस आंदोलन में दो विरोधी प्रवृत्तियाँ प्रवाहित हो रही थीं इस कारण कलाकार कभी एक ओर झुक जाते थे और कभी दूसरी ओर इस आंदोलन की नीरसता तथा निर्बलता ने युवा कलाकारों को एक अन्य दिशा की ओर अग्रसर होने के लिए विवश किया। नवोदित चित्रकारों ने जन-रुचि की अवहेलना न कर कला को जनसुलभ और सामान्य बनाने का प्रयत्न किया। 

कला क्षेत्र में विडम्बना की यह स्थिति रवीन्द्रनाथ ठाकुर की चित्र-कृतियों के समय तक ज्यों की त्यों बनी रही। इसी समय यामिनीराय भी एक आधुनिक चित्रकार के रूप में प्रतिक्रियावादी बनकर कला जागरण के क्षेत्र में आये वामिनीराय ने लोककला के आधार पर भारतीय कला को नवीन जीवन प्रदान करने की नूतन चेष्टा की।

इस नवीन प्रतिक्रिया के फलस्वरूप कलाकारों को ऐकेडेमीवाद से हटकर अपनी नूतन प्रवृत्तियों को दिखाने का अवसर प्राप्त हुआ। 

लोक-साहित्य, लोक-कला, सरल भक्ति सम्प्रदाय, कृषकों तथा नाविकों के घरों की कला तथा गीतों, कबीर, दादू तथा अन्य लोकप्रिय रहस्यवादी संतों की वाणी ने कलाकारों में सरल और सुलभ आकृतियों के निर्माण की चेतना को प्रोत्साहन दिया। 

१६४० ई० तक मान्यताएँ बदल गई और नूतनवादी कलाकृतियों की प्रदर्शनियाँ कलकत्ता में मान्यता प्राप्त करने लगीं।

यामिनीराय  

यामिनीराय का जन्म ग्राम वेतियातोर जिला बांकुड़ा (पश्चिमी बंगाल) में १८८७ ई० में हुआ। यामिनीराय सोलह वर्ष की अवस्था में कलकत्ता आये और उन्होंने गवर्नमेंट आर्ट स्कूल से कला का प्रशिक्षण समाप्त कर आरम्भ में पाश्चात्य शैली में चित्र बनाये। उनको शबीहकार के रूप में ख्याति प्राप्त हुई, परन्तु बाद में उन पर बंगाल स्कूल का प्रभाव भी पड़ा।

उनकी स्वच्छन्द अभिरुचि को तत्कालीन कला-धारा से संतोष प्राप्त नहीं हुआ और मौलिक सृजन के प्रति उनकी इच्छा अधिक बलवती हुई। १६२१ ई० में लगभग चौतिस वर्ष की अवस्था में उनका ध्यान बंगाल की लोक कला और गया (बिहार) के पट-चित्रण की ओर गया। 

यामिनीराय लोक कला से प्रेरणा ग्रहण करने के लिए सतत् प्रयत्नशील रहे। वह बंगाल के अनेक गाँवों में गए जहाँ वह कुम्हारों, बुनकरों, गुड़ियाँ तथा खिलौने बनाने वालों आदि की कृतियों को देखते, समझते और रेखांकित करते रहे। 

इस ग्रामीण लोक कला के अध्ययन से उनको इस बात का ज्ञान हुआ कि इन परम्परागत ग्रामीण कलाकारों ने अनायास ही रंगों, आकारों तथा छन्द के रहस्य को पा लिया है। यामिनी ने लोककला के अभिप्रायों तथा प्रतीकों को ग्रहण कर अपनी नवीन चित्रात्मक सुव्यवस्था में संजोया इन कृतियों की नवीनता से उनको मानसिक संतोष भी प्राप्त हुआ। 

आर्थिक संकट होते हुए भी वह अपने जीवन संघर्ष के साथ नवीन प्रयोग चलाते रहे, परन्तु बहुत समय तक कला क्षेत्र में उनको मान्यता न प्राप्त हो सकी। धीरे-धीरे युग परिवर्तन के साथ उनकी कला के सरलतम रूप को कला आलोचकों ने पहचाना और सराहा। 

१९२६ ई० से १९३६ ई० के मध्य यामिनी बाबू मेयो कला विद्यालय लाहौर में सहायक निदेशक के पद पर कार्य करते रहे। उसके पश्चात् वे लगभग दो वर्ष तक फोरमैन क्रिश्चियन कॉलेज में प्रधान पद पर रहे। १६३८-४७ ई० के मध्य उन्होंने लाहौर के सिटी स्कूल आफ फाइन आर्ट्स के निदेशक पद पर कार्य किया। 

स्वतंत्रता प्राप्ति के साथ भारत-विभाजन के समय वे दिल्ली आ गए, वहाँ उन्होंने शिल्प-चक्र संस्था की स्थापना की। यामिनीराय ने अपनी कला प्रेरणा के विषय में स्वयं लिखा है कि- “मैं बाल-कला से प्रेरित हूँ ।

उन्होंने टेम्परा रंगों के द्वारा कपड़े, कागज तथा पठ्ठे पर नवीन प्रयोग किये हैं। उनके चित्रों में अधिकांश सपाट रंग, सरल आकार और चमकदार वर्ण विधान को अपनाया गया है। अधिकांश चित्रों की रेखाएँ मोटी परन्तु अत्यधिक बलवती हैं। 

यामिनीराय के चित्रों की एकल प्रदर्शनी ए० सी० ए० गैलरी न्यूयार्क में १६५० ई० में आयोजित की गई। इस प्रदर्शनी में पट्टे, कपड़े, कागज़ तथा चटाई पर बने चित्र थे। इस एकल प्रदर्शनी को बहुत अधिक सफलता प्राप्त हुई परन्तु १६५४ ई० से यामिनीराय ने काष्ठ मूर्ति निर्माण में अधिक रुचि प्रदर्शित करना आरम्भ कर दिया था। 

उनकी कलाकृतियों में ‘ईसामसीह’, ‘श्रृंगार’, ‘नर्तकी’ तथा ‘मृदंग वादक’ आदि उत्तम चित्र कृतियाँ हैं। १९५५ ई० में रायबाबू को ‘पद्मविभूषण’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। इस महान चित्रकार का ८८ वर्ष की आयु में २४ अप्रैल १६७२ ई० में कलकत्ता में स्वर्गवास हो गया। उनको भारत का पिकासो कहा जाता है।

रवीन्द्रनाथ ठाकुर

कवी रवीन्द्रनाथ का जन्म जोरसांको (कलकत्ता) में १८६१ ई० में हुआ और विश्व कवि का सम्मान प्राप्त कर वे १६४१ ई० में स्वर्ग सिधारे। कवीन्द्र रवीन्द्रनाथ टैगोर ने जब पचास वर्ष की काव्य साधना के पश्चात् चित्रकला का अभ्यास लगभग १६२४ ई० में गंभीरता से आरम्भ कर दिया, तो उन्होंने एक नवीन पाश्चात्य विचारधारा के आधार पर रचना आरम्भ की जो कल्पना और मानसिक तत्व के आधार पर ही आधारित थी। 

टैगोर अपने काव्य-कौशल के आधार पर १६१३ ई० में ‘नोविल पुरस्कार’ ही नहीं प्राप्त कर चुके थे वरन् पाश्चात्य कला जगत की प्रभाववादी विचारधारा और कलाकृतियों और नवीन प्रवृत्तियों से भी भलीभाँति परिचित हो चुके थे। 

अंततः उन्होंने पाश्चात्य कलाकारों के समान ही बाह्य रूप और यथार्थ अनुकरण की सीमा को तोड़कर भावना को पहचाना। उन्होंने अपने अचेतन जगत से प्राप्त रंग, रेखाओं तथा आकारों में अपनी अभिव्यक्ति की। रंग के धब्बों तथा पांडुलिपियों में कांट-छांट के चिन्हों के संयोजन में उनको अपनी आत्मा की लय तथा छन्द प्राप्त हुआ। 

पांडुलिपियों और स्याही के धब्बों में इस कवि को अपने अचेतन जगत की सुसुप्त भावनाएं दिखाई दीं फिर क्या था कवि चित्रकार बन गया। रवीन्द्र बाबू ने अपने चित्रों की आकृतियों को कल्पना के आधार पर बनाया है यथार्थ नहीं। उनके शब्दों में कला में सत्य का अस्तित्व तब ही निहित रहता है जब वह हमको यह कहने के लिए बाध्य कर देता है कि ‘मैं देखता हूँ’।” 

टैगोर की चित्राकृतियों को ‘पागल व्यक्ति की कला’ कहकर पुकारा गया, परन्तु उन्होंने इस वाक्य का उत्तर इस प्रकार दिया- “मेरे चित्रों का जन्म (सृजन) किसी शिल्प-कुशल अनुशासन या परम्परा में नहीं हुआ है और वे जान-बूझकर की गई किसी वस्तु की अभिव्यक्ति का प्रयास नहीं हैं। 

टैगोर का यह कथन सत्य है, क्योंकि उनकी कृतियों में रंग, रेखा और आकारों की अकलात्मक, सहज और अनगढ़ व्यवस्था है और उनकी रचनाओं में केवल बौद्धिक प्रयास अधिक है। अमर कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने १९२० ई० में शान्ति निकेतन के प्रांगण में ‘कला भवन’ (आर्ट स्कूल) की स्थापना की। 

१९३० ई० में उन्होंने अपने चित्रों की एकल प्रदर्शनी पेरिस में आयोजित की। ‘कला भवन’ की स्थापना के पश्चात् अवनीन्द्रनाथ ने शान्ति निकेतन में कला भवन का अध्यक्ष पद ग्रहण कर लिया और अंतिम दिनों तक वे वहाँ कार्य करते रहे।

इस प्रकार बंगाल स्कूल के पतन के साथ भारतीय चित्रकला में पुनः जीवन फेंकने के नवीन प्रयास हुए जिनमें पाश्चात्य विचारधारा और बौद्धिकता की छाप थी। इसी समय में पाश्चात्य कला की विशेष मर्मज्ञा एक चित्रकर्त्री कुमारी अमृता शेरगिल की कला ने भारतीय कला को एक नवीन मोड़ और वल प्रदान किया।

अमृता शेरगिल

अमृता शेरगिल का जन्म १९१३ ई० में हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट में हुआ। १६३४ ई० के अन्त में पेरिस की चित्रशालाओं तथा अकादमियों में चित्रकला का प्रशिक्षण प्राप्त कर अमृता भारत आई और शिमला में अपने माता-पिता के निवास स्थान में उन्होंने अपनी चित्रशाला स्थापित की। इस समय उनकी आयु लगभग इक्कीस वर्ष थी।

अमृता शेरगिल लाहौर के एक धनी सिक्ख, उमराव सिंह की पुत्री थीं। उनकी माता हंगेरियन थीं। आरम्भ से ही उन्हें चित्रकला में रुचि थी। अतः वे लगभग ग्यारह वर्ष की आयु में ही अपनी माता के साथ इटली गई और फ्लोरेंस की चित्रशाला में उन्होंने कला-दीक्षा ग्रहण की। यहाँ पर यथार्थवादी पद्धति पर कला अभ्यास कर वह कुछ समय के लिए भारत आर्थी परन्तु पुनः पेरिस चली गई। 

पेरिस में उन्होंने पियर बेया तथा प्रोफेसर लूसिया सीमों की चित्रशालाओं में कला अभ्यास किया। सर्वप्रथम १६३० ई० में इनके चित्रों का प्रदर्शन प्रांदसलों में आयोजित एक प्रदर्शनी में किया गया। इस प्रदर्शनी में ‘घड़’ (जिसमें एक नग्न महिला का पाश्वं छाया तथा प्रकाश में अद्भुत ढंग से चित्रित है) तथा ‘युवतियों’ नामक चित्र प्रदर्शित करके अमृता फ्रांस में प्रसिद्ध हो गई। 

उनके ये चित्र ‘माडेल पद्धति’ या ‘ऐकेडेमिक शैली’ पर आधारित थे। १९३४ ई० में जब अमृता भारत आयीं तो उन्हें ‘भारतीय लड़कियाँ’ नामक चित्र पर नई दिल्ली की आल इंडिया फाईन आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट्स सोसाइटी’ की प्रदर्शनी में स्वर्ण पदक प्राप्त हुआ। 

१९३६-३७ ई० के मध्य उन्होंने समस्त भारत का पर्यटन किया और सर्वप्रथम उन्होंने अजन्ता के विशाल और भव्य भित्तिचित्रों को देखा और भारतीय कला तथा जीवन से प्रभावित हुई। अमृता की कला ने यहाँ से ही एक नवीन मोड़ लिया और उन्होंने अजन्ता तथा पहाड़ी चित्रों की सरल और सपाट कोमल रंगों की प्रतीकात्मक शक्ति को समझा। 

उन्होंने बसोहली शैली के पहाड़ी चित्रों की सरल योजना से विशेष प्रेरणा ली परन्तु उनके चित्र बड़ी कैनवास पर तैल रंगों में बने हैं।

अमृता की कला पर दृष्टिपात करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि उनके चित्रों में भारतीय विषयों की नवीनता, तकनीकी नवलता, रेखा की लय, छन्द और अमिश्रित रंगों की सबल दाष्टिक चेतना है। सतत् प्रयोगों और चिंतन के पश्चात् अमृता ने अपनी प्रतिभापूर्ण कला से मार्ग प्रशस्त किया। 

उनके चित्रों में ‘वधू का शृंगार’, ‘गणेश पूजा’, ‘त्रावणकोर के बालक’, ‘स्त्रिय’ तथा ‘नील वसना’ उनकी विलक्षण प्रतिभा के ज्वलंत प्रमाण हैं। उनके अनेक चित्रों का संग्रह राष्ट्रीय नूतन कला दीर्घा (गैलरी) नई दिल्ली में सुरक्षित है।

उनके चित्रों में रंग विधान की नवीनता, चमक और रंगों के अत्यधिक बल या विविध रंगतें भारतीय चित्रकला के लिए एक नवीन अध्याय हैं। उनके चित्रों में लाल तथा पीले रंगों का सशक्त और आत्म-अभिव्यंजक प्रयोग है। उन्होंने स्वयं कहा था- “रंगों को मैं पूजती हूँ।” 

उनके चित्रों में तूलिका स्पर्शो के प्रवाह के साथ-साथ धरातल को भरने के लिए बड़े-बड़े धरातल खण्डों का प्रयोग है, अमृता की महत्त्वाकांक्षा को यथार्थवाद का आग्रह अनन्त सीमा तक प्रभावित कर चुका था। वे कभी भी अपनी कला साधना में अतीत के स्वर्णिम स्वप्नों और कल्पना की उड़ान में नहीं भटकीं। 

आरम्भ में उन्होंने भारत की जर्जर ग्रामीण दुखी जनता को अंकित किया और उन्होंने अपने मौलिक रागात्मक तत्व को खोजा अमृता ने अत्यन्त स्थूल और अत्यन्त दृश्यात्मक कला के प्रति प्रतिक्रिया दिखाकर अपनी कला का वह नवीन मार्ग चुना जो आज भी भारतीय कला अभ्यासी नवयुवकों के लिए प्रेरणाप्रद है। 

१६३८ ई० में वे पुनः बुडापेस्ट गर्यो और वहाँ उन्होंने डॉ० विक्टरईगान से विवाह किया और उसी वर्ष वे भारत लौट आयीं। परन्तु वे अपने वैवाहिक जीवन का सुख प्राप्त न कर सकीं और अट्ठाईस वर्ष की आयु पर १६४१ ई० में उनका देहान्त हो गया। 

उनके चित्रों में विषाद स्पष्ट दिखाई पड़ता है-‘भिखमंगे’, ‘ग्रामीण’ तथा अपने ‘निजी चित्र’ सभी में उनकी विषादमय भावना दिखाई पड़ती है।

यामिनीराय तथा अमृता शेरगिल के ठोस प्रयोगों से क्षयशील बंगाल स्कूल को गहरी ठेस पहुँची और अन्ततः यह स्कूल दम तोड़ता गया इनकी नवीन जागृति और सतत् प्रयासों ने भारतीय कला को नवजीवन प्रदान किया। अतः इन कलाकारों के प्रयासों को ‘रिवाइवललिस्ट मूवमेंट’ या ‘पुनर्जीवन आंदोलन’ के नाम से पुकारा जाता है।

गगनेन्द्रनाथ ठाकुर

इन प्रगतिशील कलाकारों के अतिरिक्त ठाकुर परिवार के ही एक अन्य सदस्य कंवि रवीन्द्र के अग्रज गगनेन्द्रनाथ ठाकुर ने डॉ० स्टैला क्रेमरिश के प्रभाव में आकर १६२३ ई० के लगभग अनेक घनवादी प्रयोग आरम्भ कर दिये। उन्होंने धनवादी तथा स्वप्निल शैली आदि अनेक शैलियों में चित्र बनाये। 

इन चित्रों में काले फाखतई तथा हल्के भूरे रंग का प्रयोग है। उनके चित्रों में पाश्चात्य प्रभाव अधिक है और समसामयिक यूरोपियन कला की छाप है। उनके चित्रों में ‘स्वप्निल देश’ उनकी प्रतिभा का परिचायक है। प्रायः उनके चित्रों में हास्य और मौज की तरंग है।

नन्दलाल बसु

नन्दलाल बसु का जन्म ३ सितम्बर १८८३ ई० में मुंगेर जिले के हवेली खड़गपुर में हुआ था। कालेज की शिक्षा को स्वेच्छा से त्यागकर वे गवर्नमेंट आर्ट स्कूल में भर्ती हो गए। इस प्रकार वे आचार्य अवनीन्द्रनाथ ठाकुर के सम्पर्क में आये और उनके शिष्यों में उनको सर्वोत्कृष्ट स्थान प्राप्त हुआ। 

उनको १६१७ ई० में रवीन्द्रनाथ टैगोर के द्वारा स्थापित ‘विचित्रा’ नामक शिल्प-कलाकेन्द्र तथा ‘ओरिएण्टल स्कूल ऑफ आर्ट्स’ का प्राचार्य नियुक्त किया गया। उनकी कला प्रतिभा देखकर १६२२ ई० में गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर ने उनको शान्ति निकेतन में कला विभाग के अध्यक्ष पद पर निमंत्रित कर लिया। 

नन्दलाल बसु ने अजन्ता, बाघ आदि गुफाओं के भित्तिचित्रों की प्रतिलिपियाँ तैयार कीं, जिससे उनकी ख्याति फैल गई। १६२४ ई० में वे चीन गये जहाँ उन्होंने चीनी कला का अध्ययन किया। 

इसी समय उनको कांग्रेस अधिवेशन के पंडाल सजाने के लिए भी आमंत्रित किया गया। बसु ने विषय तथा तकनीकी की दृष्टि से भारतीय परम्परा की सीमा में बंधकर ही अपने प्रयोग किये। उनके प्रमुख चित्रों में शिव का विषपान’, ‘सत्ती’, ‘दुर्गा’, ‘बुद्ध और मेष’, ‘अर्जुन’, ‘युधिष्ठिर की स्वर्ग यात्रा’, ‘स्वप्न’, ‘वीणावादनी’, ‘गाँधी जी की डांडीयात्रा’, ‘संथाल-संथालिन’, ‘उमा की तपस्या’, ‘विरहणी’, ‘मेघ’, ‘उमा’ आदि हैं। 

‘रूपावली’ तथा ‘शिल्पकला’ उनकी कला विषयक पुस्तकें हैं। उन्होंने जीवन के अंतिम वर्षों में जिन कृतियों का निर्माण किया उनमें असाधारण रेखांकन दिखाई पड़ता है। उनके चित्रों में रेखा, चित्र की आकृति का प्राण बन गई है। 

आलोचकों ने उनकी कृतियों के विषय में इस प्रकार कहा है कि ‘उनकी कृतियाँ कला के इतिहास में एक क्षण हैं, सादा प्रवाहमान निरन्तर गतिशील धारा नहीं है।’ उनकी कृतियों में आधुनिक अभिव्यक्ति का सामना करने की क्षमता नहीं है। 

नन्दलाल बसु को राष्ट्रीय सम्मान ‘पद्मविभषूण’ से विभूषित किया गया। १६५३ ई० में उन्होंने शान्ति निकेतन के कला विभाग से निवृत्ति प्राप्त की किन्तु फिर भी चित्र बनाते रहे और १६६७ ई० में उनका निधन हो गया।

असित कुमार हाल्दर

स्व० असित कुमार हाल्दर से कला जगत पूर्णतया परिचित है। वे आचार्य अवनीन्द्रनाथ ठाकुर के प्रमुख शिष्यों में से थे और स्व० नन्दलाल बसु, क्षितीन्द्र मजूमदार और शैलेन्द्र डे के गुरु भाई थे। वे गवर्नमेंट स्कूल ऑफ आर्ट-लखनऊ के प्राचार्य रहे। 

प्रयाग (इलाहाबाद) में नगरपालिका संग्रहालय में उनकी अनेक कृतियाँ सुरक्षित हैं। उन्होंने अजन्ता, बाघ तथा जोगीमारा के चित्रों की अनुकृतियाँ (१६१०-१६१४ ई० के बीच) तैयार कीं। ‘उमरखय्याम’ चित्रावली में शैली की मौलिकता है। 

उन्होंने भारतीय कला की परम्परा से हटकर चलने का प्रयास भी किया परन्तु परम्परा में रंगे कलाकार को सफलता न मिली। उन्होंने लकड़ी, रेशम, हार्डबोर्ड आदि पर बराबर प्रयोग किये। उनके चित्रों में आकृति की सरलता तथा रेखा का प्रवाह दर्शनीय है। 

उनके चित्रों में ‘कुणाल’, ‘अकबर एक महान निर्माता’ तथा ‘रहस्य’ आदि उल्लेखनीय हैं। हाल्दर बाबू कलाकार होने के अतिरिक्त एक बंगला गीतकार थे। मेघदूत का बंगला अनुवाद और उनके दृष्टान्तचित्र उनकी उल्लेखनीय रचनाएँ हैं।

देवी प्रसाद राय चौधरी

देवी प्रसाद राय आचार्य अवनीन्द्रनाथ के योग्य शिष्य माने जाते हैं। चित्र की अपेक्षा मूर्ति के क्षेत्र में उनको अधिक सम्मान प्राप्त है। 

वे मद्रास स्कूल ऑफ आर्ट के प्रिंसिपल के रूप में कार्य करते रहे। उन्होंने बंजारों, मछुआरों तथा पहाड़ी जीवन से सम्बन्धित अनेकों चित्र बनाये। उन्होंने पाश्चात्य कला के सम्मिश्रण से अपनी शैली को प्रशस्त किया । १६५८ ई० में उनको राष्ट्रीय उपाधि ‘पद्मभूषण’ से सम्मानित किया गया।

मन्थन का युग, भविष्य की सीमाएँ और भारतीय स्वतंत्रता के पश्चात् की चित्रकला

यामिनीराय और अमृता शेरगिल की प्रगतिशील कृतियों ने भारतीय चित्रकला के क्षेत्र में हलचल पैदा कर दी और अब हम एक मंथन और चिंतन के युग में पहुँच चुके हैं। 

इस युग की कला में रूढ़िवादी परम्परा या रसाभिव्यक्ति को वह स्थान प्राप्त नहीं है जो बौद्धिकता या तर्क को है। 

१६४० ई० तक भारत में नवीन विचारधारा स्वछन्द रूप से प्रवाहित होने लगी और अनेक चित्रकारों ने पाश्चात्य देशों की नवीन प्रवृत्तियों को लेकर यथार्थवादी, यथा- यथार्थवादी (स्वप्निल शैली) घनवादी, रचनावादी, प्रभाववादी, अभिव्यंजनावादी, सूक्ष्मवादी (अस्फुट) तथा प्रगतिवादी प्रवृत्ति को अपनी कृतियों में दर्शाया है। 

इन चित्रकारों ने इस बात को समझा कि यूरोप की ऐकेडमी शैली के अतिरिक्त अनेक चित्र शैलियाँ हैं जिनकी चित्रण पद्धति अधिक बलवती है और भारतीय चित्रकारों को अपने परम्परागत अतीत की कला से लिपटा रहना भ्रान्तिपूर्ण हैं। इन चित्रकारों ने वर्तमान में अपनी आस्था प्रदर्शित की और वर्तमान के आकर्षक रूप को पहचाना। 

कला वह सरिता है जो सदैव अपने मार्ग को बदलती रहती है और युग, जाति, देश रूपी तटों का प्रतिविम्ब उस पर पड़ता रहता है। कला वैज्ञानिक साधनों की उपलब्धि है और विकास के साथ सदैव ही परिवर्तनशील और विकासोन्मुख होती रहती है।

ब्राकुये, साब्रे, स्त्राविंस्की और पिकासो का पेरिस हमारे समय का प्रधान अन्तर्राष्ट्रीय कला-केन्द्र है और कलाकारों की प्रेरणा का स्रोत है। भारतवर्ष के आधुनिक कलाकारों के केन्द्र मुख्यतया कलकत्ता, बम्बई तथा दिल्ली हैं और इन कलाकारों को इन केन्द्रों के आधार पर तीन वर्गों में रखा जा सकता है। 

यद्यपि यह सीमा भौगोलिक ही होगी और कलात्मक दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं है, क्योंकि इन नूतनवादी कलाकारों ने अपनी निजी और मौलिक सत्ता को कलासृजन में सर्वोपरि आधार माना है।

कलकत्ता ग्रुप

कलकत्ता के नवोदित प्रगतिशील कलाकारों ने अपने लिए ‘कलकत्ता ग्रुप’ के नाम से पुकारा है। इस दल के कलाकार युग की वैज्ञानिक उपलब्धि और प्रगति के प्रति जागरूक रहे। यह कलाकार अब भारत के अनेक भागों में फैल गए हैं। 

इस ग्रुप का आरम्भ १६४३ ई० में अकाल पीड़ित बंगाल में हुआ अतः इस दल के कलाकार मानववादी हैं। इन चित्रकारों में रथीन मैत्र, गोपाल घोष, सुनील माधव सेन, प्राणकृष्ण पाल, गोवर्धन आशु, कमलादास गुप्ता आदि चित्रकार हैं। 

गोवर्धनसेन, हेमंत मिश्रा तथा पारितोष सेन का कलकत्ता ग्रुप के कलाकारों में प्रमुख नाम है। इन चित्रकारों ने प्रभाववादी शैली के आधार पर चित्र रचनाएँ की हैं या लोककला को इन चित्रकारों ने अपनी कला का आधार माना है। इन चित्रकारों ने लोककला के प्रतीकों और उसकी सरलता से बहुत कुछ ग्रहण किया है।

नूतनवादी प्रवृत्तियाँ 

स्वतंत्रता के पश्चात् मनीषी डे, शैलोज मुखर्जी तथा सुधीर रंजन खास्तगीर ने परम्परागत कला का उद्धार करने के लिए प्रयत्न किये। उन्होंने लोककला से प्राचीन कला की विशेषताओं को ग्रहण करने का प्रयास किया और प्रभाववादी प्रवृतियों को अपनाया।

बम्बई तथा दिल्ली के प्रगतिशील कलाकार

कला के नवीन विकास में बम्बई तथा दिल्ली दल के कलाकारों का विशेष महत्त्व है। बम्बई दल के कलाकारों में अनेक स्वयं कुशल प्रयोगशील चित्रकार हैं और किसी नाम विशेष का बंधन स्वीकार नहीं करते। 

इन चित्रकारों में बेंद्रे, माली, रावल, छावड़ा, अलमेलकर, सातवलेकर और अरुणबोस हैं। इन चित्रकारों के अतिरिक्त कुछ ऐसे प्रभावशाली चित्रकार हैं जो अपने लिए ‘प्रोग्रेसिव ग्रुप’ के नाम से पुकारते हैं। 

इन चित्रकारों में हुसैन, फ्रांसिस सूजा, आरा, रजा, गोडे, हैव्बर, अकबर पदमसी, लक्ष्मण पई आदि हैं। इन चित्रकारों ने अपनी कृतियों में व्यवस्था, आकार और रंग योजना को ही प्रधानता दी है और किसी पुरानी शैली या कला आंदोलन का समर्थन नहीं किया है।

भारत की राजधानी दिल्ली में भी जैसा स्वाभाविक है चित्रकारों का एक नूतनवादी दल विकसित हो चुका है। यह दल किसी वर्ग विशेष के अन्तर्गत नहीं आता। यहाँ के अग्रगण्य चित्रकारों में कुलकर्णी, भावेश सान्याल, कंवलकृष्ण, सतीश गुजराल, शांति दुबे, सुल्तान अली, शैलोज मुखर्जी, वीरेन डे, दिनकर कौशिक, बड़ी, के०सी० आर्यन, अविनाश चन्द्र, स्वामी नाथन, कृष्णा खत्रा हैं। नूतनवादी भारतीय चित्रकारों में गायताडे, वीरन डे, जी०आर० संतोष, के०सी० पन्नीकर, भूपेन, सुंदरम्, विकास भट्टाचार्य, जगमोहन चोपड़ा, गुलाम शेख, मनुपारिख, ए० रायना, त्रिलोक कौल, पम्मीलाल, एस० नन्द गोपाल, गणेश पिपाठे, लक्ष्मण पै०, हरे कृष्ण लाल, जयराम पटेल, विभवदास गुप्त, प्रदोषदास गुप्त, प्रफुल्ला, वी० प्रभा, दीपक बैनर्जी, अनुपम सूद, जयंत, पारिख, होरे, अम्बादास आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इसी संदर्भ में आगे कुछ नूतनवादी चित्रकारों का परिचय वर्णमाला क्रम के अनुसार दिया जा रहा है।

अविनाश 

‘यदि आकृतिमूलक कला के दाष्टिक आनंद और अमूर्त कला के मानसिक आनंद का एक साथ भोग करना हो तो अविनाश के चित्र देखना सर्वोचित रहेगा।’ (सारिका फरवरी १६६८ ई०) प्रचार और विज्ञापन की दुनिया से दूर रहने के कारण उन्हें अधिक ख्याति नहीं मिली है। 

कला को वह जीवन से अलग चीज नहीं मानते हैं। उनका विचार है कि- चित्रकार रंग तथा रूप के माध्यम से मानसिक अनुगूंजों की जो अभिव्यक्ति करता है, वही कलात्मक, दाष्टिक – अभिव्यक्ति है।

डॉ० अविनाश का जन्म १६३४ ई० में बरेली (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उनके पिता अग्रज तथा अनुज कवि तथा लेखक होने के कारण उनको काव्य के प्रति रुचि तथा लेखन शक्ति संस्कार से ही मिली। 

कालेज के दिनों में वे चित्रकला विभाग के अध्यक्ष प्रो० हरिशचन्द्र राय के सम्पर्क में आये और शीघ्र लैंडस्केप में उन्हें प्रशंसनीय सफलता मिली। ‘वट-वृक्ष’, ‘रानीखेत के खेत’, ‘बनारस घाट की नौकाएँ’, ‘पुष्पित कचनार’ उनके प्रतिनिधि लैंडस्केप हैं १६५७ ई० से १६६० ई० के बीच कला अध्ययन के लिए वे बम्बई गये।

उनके अन्य टेम्परा तथा तैल चित्रों में ‘लय’, ‘फलवाली’, ‘गढ़वाली नृत्य’, ‘रिंक’, ‘शवयात्रा’ आदि सुंदर चित्र हैं। उन्होंने वाश शैली तथा तथा प्रभाववादी दृष्टि के पश्चात् १६६० में अस्फुट कला को अपनाया है और उनके मोमिया चित्र उत्तम हैं। जिनमें ‘हिचकोले’, ‘चन्द्रयात्रा’ तथा ‘संघर्ष’ उत्तम हैं। 

उन्हें ‘पहाड़ी जोड़े’ तथा ‘मकबरा’ नामक चित्रों पर शिक्षा विभाग उत्तर-प्रदेश सम्मानित कर चुका है। इस समय मूर्त एवं अमूर्त कला के प्रयोगों में लगे हुए हैं। सप्रति डॉ० अविनाश वर्मा डी०ए०वी० कालेज, देहरादून के चित्रकला विभाग (ड्राइंग एवं पेन्टिंग विभाग) के अध्यक्ष पद से अवकाश प्राप्त कर चुके हैं। उनके चित्र तथा लेख ‘धर्मयुग’, ‘सारिका’, ‘तूलिका’ तथा ‘जगत’ आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं।

उनके टेम्परा तथा तैल रंगों से बने चित्रों में तूलिका स्पर्शो की लयात्मकता और ज्यामितिय आकारों का गठन दर्शनीय हैं। उनके चित्र अमेरिका, कनाडा तथा भारत के अनेक नगरों जैसे, शिमला, मद्रास, अलीगढ़, लखनऊ, दिल्ली, भोपाल, जयपुर, बम्बई, देहरादून आदि में पहुँच चुके हैं। 

अनादि अधिकारी

अनादि अधिकारी बम्बई क्षेत्र के प्रतिभावान कलाकारों में गिने जाते हैं। उसकी कला में अत्यधिक अनुशासन, सच्चाई और लगन हैं। आपने कम चित्रों की रचना की है परन्तु उनका स्तर उच्च है। आप सौम्य प्रकृति के हैं एवं एकान्त और शांतिमय जीवन के पक्षपाती हैं। आप अपने एकान्त जीवन को कैनवास पर मूर्तिमान करना चाहते हैं।

अब्दुलरहीम अप्पाभाई अलमेलकर

अलमेलकर बम्बई के प्रतिष्ठित कलाकारों में से एक हैं। उन्होंने यामिनीराय तथा अमृता शेरगिल की कलात्मक मान्यताओं को अपनी सूझ-बूझ के आधार पर आगे बढ़ाया है। 

उन्होंने परम्परा से प्रेरणा ग्रहण कर वर्तमान का समर्थन किया है। उनकी कला में राजपूत कला और मेडन मंडन शैली का समन्वय है और पाश्चात्य कला का समर्थन नहीं किया। उनके चित्र रेखा प्रधान हैं उनकी रेखाओं में बल और गति के साथ आलंकारिकता की क्षमता है। 

उनकी कृतियों में ‘राख से पुनर्जन्म’, ‘पक्षी तथा आदिवासी महिला’ उल्लेखनीय चित्र हैं। उन्होंने जनजातियों के जीवन से सम्बन्धित चित्र प्रस्तुत किये हैं, जो उत्तम हैं।

अकबर पदमसी 

अकबर पदमसी का जन्म १६२६ ई० में हुआ। उन्होंने बम्बई स्कूल ऑफ आर्ट्स से कला शिक्षा ग्रहण की १६५० ई० में वे रजा के साथ पेरिस गये और वही उन्होंने विश्व की महान कला शैलियों तथा कृतियों का तुलनात्मक अध्ययन किया। उनके चित्रों की देश-विदेश में अनेक बार प्रदर्शनियों आयोजित हो चुकी है। 

अकबर पदमसी के अनुसार- ‘चित्र देखने के लिए होता है, उसका दृष्टिआकर्षण ही उसकी सफलता है।’ विदेश से लौटने पर १६५४ ई० में पदमसी की कृतियों को भारत में यथोचित मान्यता प्राप्त हुई। 

इस प्रदर्शनी के चित्रों पर अश्लीलता का दोष लगाकर प्रदर्शनी और चित्रकार दोनों को बम्बई के सत्ताधारियों ने बंद कर दिया। परन्तु न्यायालय पदमसी के पक्ष में आया और पदमसी का छुटकारा हुआ। पदमसी के चित्रों में प्रायः रंग काले, भूरे, सफेद, गुलाबी तथा ग्रे हैं। उनकी आकृतियों में कुछ अपनी मौलिक विशेषता है जिसके द्वारा भावाभिव्यक्ति की गई है।

आर० पी० श्रीवास्तव डॉ० आर० पी० श्रीवास्तव गवर्नमेंट कालेज फार वीमन पटियाला में फाइन आर्ट डिपार्टमेंट के अध्यक्ष के पद से अवकाश ग्रहण कर चुके हैं। उन्होंने यथार्थवादी शैली के पश्चात, प्रयोगवादी कलाकार के रूप में सशक्त कृतियाँ प्रस्तुत की हैं। 

उनके चित्र तथा लेख अनेक पत्र-पत्रिकाओं में सम्मानित हो चुके हैं। उन्होंने अनेक सेमिनार्स तथा चित्रकार कार्यशालाओं का आयोजन किया है और पटियाला क्षेत्र की कला को अग्रसर किया है। उनके तैल चित्र पंजाब तथा पंजाब के बाहर बहुत प्रशंसा प्राप्त कर चुके हैं।

आशिष बरन मिश्रा

आशिष बाईन वर्ग एलेन स्कूल, मसूरी के कला विभाग के अध्यक्ष है। उन्होंने चित्रकला से एम०ए० की उपाधि ग्रहण करने के उपरान्त मसुरी में अनेक चित्र प्रदर्शनियाँ आयोजित की हैं। उनके चित्रों में गढ़वाल, के दुर्गम क्षेत्रों के जीवन की झलक दिखाई पड़ती है। उनके अनेक चित्र उत्तर प्रदेश में प्रकाशित हो चुके हैं और अनेक चित्र अमेरिका तथा अन्य देशों में सम्मानित हो चुके हैं। वे प्रयोगशील युवा चित्रकार एवं मूर्तिकार हैं।

उषा मंत्री 

उषा मंत्री ने लोक-कला की परम्परा पर अपनी कला-शैली का विकास किया। अमृता शेरगिल के पश्चात् उनका स्थान माना जाता है। उषा के चित्रों में नारी जीवन का विषाद, करुणा और ममता है। उनके चित्रों में ‘दर्द की अंगड़ाइयाँ’ हृदयस्पर्शी चित्र हैं।

एन० खन्ना

जन्म १६४० ई०, शिक्षा राजकीय कला एवं शिल्प महाविद्यालय, लखनऊ। भारत की अनेक महत्त्वपूर्ण प्रदर्शनियों में चित्रों का प्रदर्शन होता रहा है। अनेक एकल प्रदर्शनियों का आयोजन हो चुका है। वे उत्तर प्रदेश राज्य ललित कला अकादमी के सचिव के पद से अवकाश प्राप्त कर चुके हैं।

के० एच० आरा

आरा के चित्रों की अनेक प्रदर्शनियाँ देश-विदेशों में आयोजित हो चुकी हैं। आरा ने विशेष रूप से प्राकृतिक विषयों से सम्बद्ध चित्रों को बड़ी मौलिकता से बनाया है उनकी कृतियों में फूल फल फारसी लघुचित्रों की याद दिलाते हैं। 

इन चित्रों के फल-फूलों में रंग तो हैं पर सुगंध का आभास नहीं होता है। आरा के चित्रों की १६६६ ई० में जहाँगीर आर्ट गैलरी- बम्बई में प्रदर्शनी आयोजित की गई जो पर्याप्त सफल मानी गई। इस प्रदर्शनी में प्रदर्शित ५० नग्न चित्रों को लेकर विरोधी दल ने बम्बई प्रशासन से प्रदर्शनी बंद करने की मांग की। परन्तु उनके चित्रों को सराहा गया है और प्रदर्शनी ज्यों की त्यों चलती रही।

के० के० हेब्बर के० के० हेब्बर सतत् अपनी शैली के निजीपन को प्राप्त करने के लिए प्रयत्नशील रहे। उन्होंने अमृता से प्रेरणा ली और आगे चलकर वे जार्जकीट की चित्रशैली और फ्रॉस की विविध शैलियों से प्रभावित हुए। उन्होंने रंगों के मनोवैज्ञानिक पक्ष को लेकर चित्रों का रंग विधान प्रस्तुत किया है।

उनके चित्रों के विषय कृषक, मज़दूर मछली वाले, फल-फूल बेचने वाले और श्रमिक लोग हैं। उनकी रेखाकृतियाँ लयपूर्ण हैं और नाटकीय गति से सजीव बन पड़ी हैं।

हेब्बर के चित्रों में रंगयोजना मौलिक और रुचिकर है। उन्होंने राजपूत शैली के चित्रों के रंगों की लाक्षणिकता तथा चटकपन के महत्त्व को पहचाना है और उन्होंने अपने चित्रों में लाल, पीले तथा नीले रंग का अधिक प्रयोग किया है। 

१६६० ई० में उनके चित्रों की आल इंडिया फाइन आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट सोसायटी नई दिल्ली की कला दीर्घा में प्रदर्शनी आयोजित की गई। इस प्रदर्शनी में उन्होंने नये दृष्टिकोणों से परिपूरित चित्र प्रदर्शित किये। उनके तेल चित्र सराहनीय हैं। ‘व्रज’ तथा ‘श्रीनगर’ उनकी उत्तम कृतियाँ हैं।

के० एस० कुलकर्णी

के० एस० कुलकर्णी का जन्म पूना के समीप स्थित बेलगांव में १६१८ ई० में हुआ। १९४० ई० में वे बम्बई के सर जे० जे० स्कूल ऑफ आर्ट्स में आये। सर जे० जे० स्कूल से डिप्लोमा प्राप्त करने के पश्चात् सरकार ने उनको दो वर्ष की छात्रवृत्ति प्रदान की। 

यूरोप, अमेरिका तथा एशिया के अनेक देशों का वे बार-बार भ्रमण कर चुके हैं। १६५०-५१ ई० में अमेरिका में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय कला-सम्मेलन में वे भारतीय प्रतिनिधि के रूप में सम्मिलित हुए। 

१६५५ ई० में राष्ट्रीय ललित कला अकादमी का पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। उन्होंने कांग्रेस अविधेशनों के पंडाल सुसज्जित करने में भी ख्याति पाई है। 

कुलकर्णी के चित्रों का आधार ग्रामीण कला तथा जीवन है। उनके चित्रों का संग्रह देश और विदेश के अनेक चित्र संग्रहालयों में सुरक्षित है। उनके चित्रों में ‘कथावाचक’ तथा ‘श्रृंगार’ उत्तम कृतियाँ हैं।

गोपाल कृष्ण 

(जन्म १६४१ ई०) गोपाल कृष्ण ने एम० ए० (अंग्रेज़ी) की उपाधि बरेली कालेज से प्राप्त कर कला प्रेम के कारण कला शिक्षा राजकीय कला एवं शिल्प महाविद्यालय लखनऊ से ग्रहण की भारत की महत्त्वपूर्ण प्रदर्शनियों में उनके चित्रों का प्रदर्शन हो चुका है और अनेकों पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं। 

१६५७ ई० में उत्तर प्रदेश राज्य ललित कला अकादमी तथा १९७१ ई० में उत्तर प्रदेश कलाकार संघ द्वारा उनको पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। वे इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी, कानपुर में ह्यूमेनिटीज़ विभाग में कला अध्यापन का कार्य करने के पश्चात् पूना चले गए।

गोपाल कहते हैं कि “मैं अधिकतर प्राकृतिक वातावरण से प्रभावित होकर जल रंगों अथवा तैल रंगों में दृश्य अंकित किया करता था, बाद में जब में कानपुर में रहने लगा तो मेरे ऊपर औद्योगिक नगर की प्रतिक्रियाएँ गहराई से असर करने लगीं। 

मेरे इधर के चित्रों में यही प्रतिक्रिया घनीभूत होकर अभिव्यक्ति पाने लगी है। इस प्रतिक्रिया का रूप भावना प्रधान अधिक है इसलिए इन्हें अमूर्त रूपों में ही सफलतापूर्वक व्यक्त किया जा सकता है।” बरेली ग्रुप के वे उदीयमान युवा कलाकार हैं।

गोपाल मधुकर 

राजकीय कला विद्यालय लखनऊ से मूर्तिकला में पोस्ट डिप्लोमा प्राप्त कर बैजनाथ (कांगड़ा) में कला प्रशिक्षक रहे। संप्रति वे बारहसैनी कालेज, अलीगढ़ में चित्रकला विभाग के अध्यक्ष पद से अवकाश ग्रहण कर चुके हैं। उनका चित्र तथा मूर्तिकला दोनों पर समान अधिकार है उनके चित्रों में ‘दहेज़’, ‘चीन और भारत’, ‘मृत्यु और शान्ति’ आदि उल्लेखनीय हैं। 

उनके चित्रों की एकल प्रदर्शनी आल इंडिया फाइन आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट्स सोसायटी की कला दीर्घा में आयोजित हो चुकी है। उनके चित्रों में मूर्ति का ठोसपन और टेक्सचर की मौलिकता दिखाई पड़ती है। डॉ० मधुकर ने कोलाज चित्र भी बनाये हैं जो उत्तम हैं। वे सदैव ही नवीन प्रयोगों की ओर जागरूक रहते हैं और सदैव नई शैली में चित्र रचना करते हैं।

छाया आर्य 

१६५९ ई० में छाया ने सर जे० जे० स्कूल, बम्बई से डिप्लोमा ग्रहण किया और दो वर्ष अध्ययन के लिए सरकार से छात्रवृत्ति पाई। इसी समय अपने विवाह के “श्चात् उन्हें अपने पति के साथ इंग्लैंड जाने का अवसर प्राप्त हुआ जहाँ उन्होंने पिकासो के चित्रों की प्रदर्शनी देख उससे प्रेरणा ली। उनकी कला पाश्चात्य तथा भारतीय कला का संयोग है।

छैल बिहारी बरतरिया

इनका जन्म बरेली में हुआ। कला अध्ययन हेतु वे बम्बई के सर जे० जे० स्कूल, बम्बई (मुम्बई) गये। यहाँ पर उनको ‘पिक्टोरियल कम्पोजीशन में विशेष पुरस्कार प्राप्त हुए और उनको सर जे० जे० स्कूल के श्रेष्ठतम छात्रों में गिना गया।

उनकी कला प्रतिभा के कारण उनको स्वर्णपदक तथा अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए। उनके चित्रों की प्रशंसा बम्बई की अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई ये डी०ए०वी० कालेज, कानपुर के कला विभाग के अध्यक्ष पद पर लगभग ४० वर्ष कार्यरत रहे। 

स्वास्थ्य बिगड़ जाने पर भी वे सदैव चित्र की परिकल्पना में लगे रहते हैं उनके कम्पोजीशन्स (चित्रों) में रंगों की कोमलता, रेखा की बारीकी सराहनीय है। 

पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने नूतनवादी दृष्टिकोण दर्शाया और अमूर्त चित्र विधान लेकर सफल चित्रों का संयोजन किया तैल रंगों तथा टेम्परा रंगों पर उन्हें असाधारण अधिकार था। डी०ए०वी० कालेज से सेवानिवृत्त होने के कुछ ही समय पश्चात् उनका निधन हो गया। कानपुर की कला को उन्होंने नई दिशा और अनेक प्रगतिशील कलाकार दिये।

ज्योतिष भट्टाचार्य

कलकत्ता आर्ट स्कूल में कला शिक्षा प्राप्त कर वे इटली की कला का अध्ययन करने के लिए विदेश गए। उनकी कृतियों में यथार्थवाद, प्रभाववाद और अंत में सूक्ष्म या अमूर्त कला का उत्तम रूप प्रस्फुटित हुआ है। ग्राफिक्स के आज वे सुप्रसिद्ध कलाकार हैं। उनको १६५६ ई० और १६६१ ई० में क्रमशः राष्ट्रपति से रजत पदक और स्वर्ण पदक प्राप्त हुए हैं।

जार्ज कीट

उनका जन्म लंका में हुआ, परन्तु वे अपनी कला शैली के कारण भारतीय कला के क्षेत्र में सम्मानित हैं। जार्ज कीट ने भारतीय कला तथा संस्कृति का अध्ययन ही नहीं किया है वरन् उनको आत्मसात कर लिया है। उनका रंग विधान, रेखाएँ, संयोजन भारतीय होते हुए भी उनकी मौलिकता दर्शनीय है। 

उनकी कला पर पिकासो, सेजां, गोगा तीनों की कला का प्रभाव माना जाता है। उन्होंने ज्यामितीय ढंग से आकृतियों को रेखाओं में बद्ध किया है। उन्होंने सम्पूर्ण चित्रविन्यास को ज्यामितीय रेखाओं, त्रिभुजों आदि से विभक्त कर इच्छित रूपों को प्राप्त किया है उनके कृष्ण लीला सम्बन्धी चित्र उल्लेखनीय हैं।

प्राण नाथ मांगों

प्राण नाथ मांगों पंजाब के निवासी हैं। उन्होंने पंजाब के रंगीन, उत्साहपूर्ण जीवन को समीप से देखा है उनकी शैली में लोक कला का अद्भुत सम्मिश्रण है। उनके चित्र प्रभाववादी धारणा पर आधारित हैं। सम्प्रति वे आल इंडिया हेन्डीक्राफ्ट बोर्ड, दिल्ली में आलेखन विभाग के निर्देशक हैं।

पी० टी० रेड्डी 

पी० टी० रेड्डी ने बम्बई के सर जे० जे० स्कूल ऑफ आर्ट में कला डिप्लोमा प्राप्त कर निरंतर कला साधना की है। अपनी कला साधना के २५ वर्षों के पश्चात् उनकी कृतियों में स्पष्ट उभार आ गया है। उनके चित्रों में लोकशैली तथा टेक्स्चर प्रणाली का अद्भुत सम्मिश्रण है। उनके चित्रों में ‘तीन सखी’, ‘संगीत’, ‘नृत्य करती हुई युवती’, ‘विश्राम’ आदि उल्लेखनीय हैं।

परमानंद चोयल 

वे महाराज भूपाल कालेज, उदयपुर में चित्रकला विभाग के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत हो चुके हैं। उन्होंने सर जे० जे० स्कूल, मुम्बई से कला शिक्षा प्राप्त कर इंग्लैंड में कला का उच्च अध्ययन किया। 

उन्हें इस अध्ययन के लिए जापान सरकार ने भेजा था। उन्होंने तैल रंगों में सुंदर लैंडस्केप बनाये हैं उनकी डिस्टार्शन शैली की कृतियाँ उत्तम हैं। उनके रंग चमकदार हैं और टेक्सचर का उनमें मुख्य प्रयोग है।

प्रफुल्लचन्द्र जोशी (प्रफुल्ला)  

श्रीमती प्रफुल्लचन्द्र जोशी का नाम आधुनिक महिला चित्रकारों में विशिष्ट है उनको १६५४ ई० में ‘रागिनी टोड़ी’ नामक चित्र पर बम्बई आर्ट सोसायटी से पुरस्कार मिल चुका है। इसी प्रकार ‘दरबारी कांगड़ा’ पर भी उनको सर जे० जे० स्कूल ने स्वर्ण पदक प्रदान किया।

प्रकाश चन्द्र बरुआ  

प्रकाश का जन्म १५ अगस्त १६२६ ई० को हुआ। मेरठ कालेज से बी० ए० डिग्री प्राप्त करने तक वे एक सफल अभिनयकार के रूप में प्रसिद्ध हो चुके थे। चित्रकला का प्रेम उन्हें सदैव रहा और वे कलाकारों के सदैव संसर्ग में रहे। उन्होंने मिट्टी के पात्रों की चित्रकारी, दृश्य चित्रण तथा अलंकार सम्बन्धी कला को विशेष रूप से अपनाया है। 

बाद में उन्होंने दृश्य चित्रों पर विशेष बल दिया, जिनमें रंगों का स्वच्छ प्रयोग है और टैक्सचर आकर्षक है। १६७२ ई० में उन्होंने अपने चित्रों की प्रदर्शनी आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट्स सोसायटी की कला दीर्घा दिल्ली में आयोजित की ये जे०बी० जैन कालेज, सहारनपुर में कला विभाग के अध्यक्ष पद पर कार्यरत रहे और २५ नवम्बर १६८३ ई० को उनका स्वर्गवास हो गया।

बंकिम चन्द्र बनर्जी  

आप हज़ारी प्रसाद द्विवेदी (शान्ति निकेतन) के प्रिय शिष्य हैं और दूसरी ओर कला आचार्य नन्दलाल बसु कला भवन (शान्ति निकेतन) के शिष्य हैं। आपने भारतीय हिन्दी साहित्य और कला के गौरवमयी रूप को पहचाना है और आचार्य नन्दलाल बसु की कला परम्परा के आप वरिष्ठ कलाकार हैं। 

आपने भागलपुर में कला केन्द्र की स्थापना करके भारतीय चित्रकला की महान सेवा की है। आपने भागलपुर विश्व विद्यालय में ललित कला एवं शिल्प संकाय के अध्यक्ष के रूप में महान कार्य करके भारतीय कला को आगे बढ़ाने के जो प्रयास किये हैं वह स्मरणीय हैं। 

आपने गुरुदेव से प्रेरणा ली और भागलपुर से आपने भारतीय कला प्रसार एवं प्रचार किया है। आप कला समीक्षक एवं लेखक भी हैं। आपने बिहार के जनजीवन का बहुत मार्मिक चित्रण किया है।

विजय भारद्वाज 

कु० विजय ने सरल तथा सुंदर वर्ण विधानयुक्त शैली अपनाई है। उनके चित्र मसूरी आदि स्थानों में प्रदर्शित हो चुके हैं। संप्रति ये महारानी भाग्यवती देवी कालेज, बिजनौर में चित्रकला विभाग की अध्यक्षा हैं और उन्होंने बिजनौर में कला जागरण लाने में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। आगे उनसे बहुत आशा की जाती है।

भावेश सान्याल  

भावेश सान्याल चित्रकार और मूर्तिकार दोनों ही रूपों में प्रख्याति प्राप्त कर चुके हैं। आपके चित्रों में लोक कला की सरलता, प्रभाववादी आकृतियाँ, चित्राकर्षक रंग विधान और अजन्ता शैली का सपाटपन है उनके चित्र ‘स्नान’ और ‘संगीतज्ञ’ उनकी तकनीकी और शैलीगत विशेषताओं के प्रतीक हैं आपके चित्रों में गंभीरता है।

भगवती प्रसाद कम्बोज

आगरा विश्वविद्यालय से एम०ए० चित्रकला की उपाधि ग्रहण करने के पश्चात् आप आगरा कालेज, आगरा के चित्रकला विभाग में प्रवक्ता पद पर नियुक्त हो गए और अनेक वर्षों तक इस पद पर कार्यरत रहे और १६८६ ई० में अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त हो गए। आपने यथार्थवादी कलाकार के रूप में सफल प्रयोग किये हैं और अनेक राष्ट्रीय प्रदर्शनियों में आपके चित्रों को सम्मान मिला है।

मगन सिंह  

चित्रकला विभाग, आगरा कालेज, आगरा में मगन सिंह आर्य भी आगरा विश्वविद्यालय से एम० ए० करने के पश्चात् भगवती काम्बोज के पश्चात् प्रवक्ता नियुक्त होकर पहुँच गए और १६८६ ई० से वे इस विभाग के अध्यक्ष बने हैं। 

आपने यथार्थवादी शैली अपनाई है और मुखाकृति चित्रण में विशेष दक्षता दर्शाई है-उनके चित्र राष्ट्रीय प्रदर्शनियों में सम्मानित हो चुके हैं। उन्होंने वर्ण, तान एवं पोत का अपने चित्रों में बहुत कलात्मक ढंग से प्रयोग किया है।

चित्रा सिंह 

डॉ० श्रीमती चित्रा सिंह संप्रति चित्रकला विभाग, आगरा कालेज आगरा की अध्यक्षा हैं वे प्रगतिशील महिला चित्रकार हैं। उनके तैल चित्र प्रयोगशील कला के उदाहरण हैं। अनेक प्रदर्शनियों में चित्र सम्मानित हो चुके हैं। इताली भ्रमण (१६८८ ई०) के पश्चात् से उनका रचनात्मक दृष्टिकोण बहुत बदल गया है।

मदनलाल नागर  

मदनलाल नागर का जन्म ४ जून १६२३ ई० को लखनऊ में हुआ। उनकी स्कूली शिक्षा की प्रगति नवीं कक्षा से आगे न बढ़ सकी। मदन के अग्रज विख्यात लेखक अमृतलाल नागर ने उनको लखनऊ के सरकारी आर्ट स्कूल में भर्ती करा दिया जहाँ उनको असित कुमार हाल्दर जैसे चित्रकार का निर्देशन प्राप्त हुआ। 

१६४६ ई० में इस स्कूल की शिक्षा समाप्त कर मदन ने देश के विभिन्न भागों का भ्रमण किया। १६४६ ई० में लखनऊ और १६५१ ई० में मसूरी में आयोजित अखिल भारतीय प्रदर्शनियों में उनके चित्र प्रदर्शित किये गए। १६५० ई० में उन्होंने अपने चित्रों की प्रथम एकल प्रदर्शनी लखनऊ में आयोजित की, तब से वे अनेक एकल चित्र प्रदर्शनियाँ आयोजित कर चुके हैं। 

१६७२ ई० की प्रदर्शनी में उत्तर प्रदेश राज्य ललित कला अकादमी ने उनकी एक नूतनवादी कृति पर उनको पुरस्कृत किया है। उन्होंने अनेकों शैलियों में प्रयोग किये। उनकी कृतियों में मनुष्य का ‘मायाजाल’ उत्तम है। १६६३ ई० में उनको राष्ट्रीय ललित कला अकादमी से ‘निराला पुराना शहर’ नामक चित्र पर पुरस्कार मिला।

माधव सातवलेकर

माधव सातवलेकर बम्बई क्षेत्र के प्रसिद्ध कलाकार हैं। उनकी कृतियों में पाश्चात्य तथा भारतीय कला का मौलिक ढंग से संयोग किया गया है। 

कोमल छाया और प्रकाश से निबद्ध उनकी आकृति सीमा रेखाओं में गहराई के साथ चित्र के धरातल में बैठ गई है। बुद्ध सम्बन्धी चित्र उनके विशेष चित्रों में माने जाते हैं। इसी प्रकार रामायण की कथा ‘स्वर्ण मृग’ आदि चित्र सुंदर हैं।

मनीषी डे

मनीषी डे ने भारतीय कला के उत्थान के सतत् प्रयत्न किये हैं। उनकी कृतियों में भारतीय रेखा और आकृतियों की सरलता दर्शनीय है। वे लोककला से प्रभावित हैं। उनके चित्रों में रेखा सौष्ठव, रंग विधान उत्तम और आकर्षक है। उनके चित्रों में ‘संथाल वधु’ और ‘दीपावली’ आदि उल्लेखनीय हैं। उनके रेखाचित्र शक्तिशाली रेखाओं से निबद्ध हैं।

मकबूल अंसारी

डॉ० मकबूल अंसारी कानपुर के प्रगतिशील कलाकारों में महत्त्वपूर्ण थे। उन्होंने यथार्थ, प्रभाववादी तथा अस्फुट शैलियों में सफल चित्रों की रचना की है। उनके अस्फुट चित्र प्रयोगों में रंग, पोत तथा आकार का सुखद तालमेल दिखाई पड़ता है। 

वे स्वयं प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर पर चित्र प्रदर्शनियों का आयोजन करते रहे। १६८६ ई० में उन्होंने महादेवी वर्मा की रचनाओं पर आधारित अनेक राष्ट्रीय चित्रकारों द्वारा रचित चित्रों की प्रदर्शनी का दिल्ली में आयोजन किया। 

उत्तर प्रदेश के चित्रकारों में उनका महत्त्वपूर्ण स्थान है। वे डी० ए० वी० कालेज, कानपुर के चित्रकला विभाग में वरिष्ठ प्रवक्ता पद पर कार्यरत रहते हुए इस संसार से विदा हो गए।

मकबूल फिदाहुसैन 

मकबूल फिदाहुसैन का जन्म १६१६ ई० में हुआ। इंदौर आर्ट स्कूल से शिक्षा प्राप्त कर वे बम्बई में चलचित्र कलाकार के रूप में अनेक वर्षों तक कार्य करते रहे। १६३५ ई० के पश्चात् उन्होंने कला क्षेत्र में पर्दापण किया। आज वे सतत् नवीन प्रयोगों के लिए अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कलाकारों में से एक हैं। 

उनकी आरम्भिक कला का आधार जैन चित्र थे परन्तु आज उनका दृष्टिकोण पूर्ण सूक्ष्मवादी बन चुका है। उनको जापान में प्रदर्शित चित्रों पर अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हो चुका है। उनकी कृतियाँ देश-विदेश में सराही गई हैं।

उनके चित्रों की सफल प्रदर्शनियाँ हैदराबाद तथा जहाँगीर आर्ट गैलरी बम्बई में आयोजित हो चुकी हैं। वे कई बार यूरोप के अनेक देशों का कला अध्ययन हेतु भ्रमण कर चुके हैं। 

यूरोप से लौटने के पश्चात् लगभग १६७० ई० में उन्होंने त्रिवेणी कला संगम दिल्ली में एक डिमांस्ट्रेशन (चित्र निर्माण प्रदर्शन) आयोजित किया जिसमें उन्होंने अचेतन जगत के आधार पर चित्र रचना कर दिल्ली के नागरिकों को विस्मय विमुग्ध कर दिया। उनके चित्रों मे ‘ढुलकिया’, ‘वैलगाड़ी’, ‘घोड़े’, ‘वापसी’ आदि उत्तम कृतियाँ हैं। उनके चित्र आज संसार की अनेक प्रसिद्ध कला दीर्घाओं में पहुँच चुके हैं।

मोइन सामंत

मोहन सामंत को कुलकर्णी, हुसैन, रजा, गुजराल जैसे अग्रगण्य चित्रकारों की श्रेणी में गिना जाता है। उन्होंने अपनी कला का विकास भारतीय लघुचित्रों तथा पाश्चात्य शैलियों के आधार पर किया है। वे सदा परिवर्तन की ओर उन्मुख रहे हैं। उन्होंने स्थायी रूप से अमेरिका की नागरिकता स्वीकार कर ली और वे अमेरिका चले गए।

मनोज कुमार वर्मा

(जन्म ८ जुलाई १६७० ई०) मनोज का जन्म बरेली में एक कवि, लेखक तथा कलाकार परिवार में हुआ। बचपन से ही कला में मनोज ने रुचि दर्शाई। एम०ए० चित्रकला की उपाधि १६६३ में ग्रहण करके उन्होंने बरेली, लखनऊ तथा अन्य नगरों में आयोजित चित्रकला प्रदर्शनियों में भाग लिया और उनके चित्र पुरस्कृत हो चुके हैं। टैगोर प्रदर्शनी में उनको पुरस्कार मिला।

दिनकर कौशिक 

दिनकर कौशिक का जन्म २५ जून १६१८ ई० को धारवाड़ (मैसूर राज्य) में हुआ। उन्होंने शान्ति-निकेतन के कला भवन में अपनी कला दीक्षा ग्रहण की। १६५७ ई० में उनकी ख्याति फैलने लगी। इन्होंने अनेक देशों का भ्रमण किया और समसामयिक कला का अध्ययन किया है। 

१६५५ ई० में इटली सरकार की ओर से कला-अध्ययन के लिए वे रोम गये। वे इटली, इंग्लैंड तथा फ्रांस का पूर्णरूपेण भ्रमण कर चुके हैं। उनके चित्रों की एक प्रदर्शनी सर्वप्रथम शिल्पीचक्र दिल्ली के तत्वावधान में १६५२ ई० में आयोजित की गई। १६५७ ई० में उनके चित्र यूरोप के अनेक नगरों में प्रदर्शित किये गए।

उनके चित्रों को अनेक बार अंतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनियों में प्रदर्शित किया जा चुका है। वे यूरोप की प्रभाववादी कला से प्रभावित हैं और शान्तिनिकेतन की भारतीय परम्परा उनकी मौलिकता का आधार है।

अनेक वर्षों तक दिल्ली के बहुधंधि विद्यालय में ललित कला का अध्यापन करने के पश्चात वे लखनऊ आर्ट स्कूल के प्रिंसिपल पद पर कार्य करते रहे और अब वहाँ से सेवानिवृत्ति प्राप्त कर चुके हैं।

नारायण श्रीधर बेन्द्रे  

नारायण श्रीधर बेन्द्रे का जन्म २१ अगस्त १९१० ई० को इंदौर में हुआ। उन्होंने कुछ समय तक स्टेट स्कूल ऑफ आर्ट, इंदौर में डी०डी० देवलालीकर से चित्र शिक्षा प्राप्त की और बाद में बम्बई आर्ट स्कूल से राजकीय डिप्लोमा प्राप्त किया। उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय ख्याति अर्जित की है। 

वे दो बार आर्ट सोसायटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष रहे। १६७२ ई० से वे ललितकला अकादमी के उपाध्यक्ष पद पर रहे। बेन्द्रे एशिया तथा यूरोप के अनेक देशों में कला के अध्ययन के लिए भारत सरकार के द्वारा विदेश भेजे गये या विदेशी सरकारों के बुलाने पर वे वहाँ भ्रमण कर चुके हैं। 

कश्मीर की मनोरम प्रकृति और राजस्थानी नगरों की सुंदरता ने उनको सदैव आकर्षित किया है। वे सदेव अनेक शैलियों में प्रयोगशील रहे हैं। १६५८ ई० में उन्होंने चीन तथा इटली का दौरा किया। इसी समय वे चीनी कलाकारों की तूलिका से प्रभावित हुए। 

विश्व के सभी प्रमुख देशों में उनके चित्रों की प्रदर्शनियाँ हो चुकी हैं। उनके चित्रों में जलरंगों जैसी ताजगी और चमक है। काले रंग का उन्होंने संतुलन के साथ खुलकर प्रयोग किया है। नीले, पीले, नारंगी तथा बैंगनी विरोधी रंगों के प्रयोग में उनको दक्षता प्राप्त है। 

उनके अनुसार कलाकार ‘दृश्य-अदृश्य पदार्थों’ और भावनाओं से सम्बन्धित अनेक ग्रंथियों को सुलझाता है और उन्हें अपनी कल्पना तथा शैली के द्वारा सहज ग्राह्य बनाता है। वे बड़ौदा विश्वविद्यालय के कला विभाग के अध्यक्ष के पद पर अनेक वर्षों तक कार्य कर सेवानिवृत्ति प्राप्त कर, वे बम्बई में ‘ग्राफिक्स’ कार्य के लिए स्थापित हो गए थे और कला की सेवा करते उनका निधन हुआ।

उनके चित्रों में ‘दार्जिलिंग के चाय बागान में ‘युवती’, ‘ज्येष्ठ की दोपहर’ तथा ‘अमरनाथ और कश्मीर के दृश्य’ उल्लेखनीय हैं।

रामकंबर

डॉ० राम कंवर कानपुर के प्रतिष्ठित कलाकारों में से एक हैं। ये एकांत प्रिय कर्मठ कलाकार हैं। उन्होंने तैल रंगों के माध्यम से बड़े आकार में कैन्चस चित्रों का निर्माण किया है। उनके चित्रों में आकारों का सरलपन, रंगों का संगत अथवा विरोधी प्रयोग उनकी भावनाओं को अभिव्यक्त करने में बहुत सहायक सिद्ध हुआ है। 

उनके चित्रों की. अनेक एकल प्रदर्शनियाँ बम्बई एवं अन्य नगरों में आयोजित हो चुकी हैं। उनके चित्रों में ‘मेला’ राजस्थानी मरुस्थल की रंगीन भीड़-भाड़ का प्रतीक है। उनके चित्र प्रमुख चित्र संग्रहों में पहुँच चुके हैं। वे डी०ए०वी० कालेज, कानपुर में चित्रकला विभाग के अध्यक्ष पद पर कार्यरत रहते हुए १६६७ ई० में सेवानिवृत्त हो गए।

रामगोपाल विजय वर्गीय

विजय वर्गीय स्वभाव से ही कवि तथा कलाकार दोनों ही हैं। वे भारतीय कला परम्परा के पोषक कलाकार हैं। उनके चित्रों में लावण्ययुक्त रूप, आकर्षक रेखांकन, कोमल रंगों का विधान दर्शनीय है। उनके ‘शकुन्तला’ तथा ‘मेघदूत’ सम्बन्धी चित्र सुंदर हैं।

रणवीर सिंह विष्ट

रणवीर सिंह विष्ट उत्तर प्रदेश के उन नवोदित कलाकारों में प्रमुख हैं जिन्होंने नई आस्था और नवीन कला प्रवृत्तियों को दिखाया है वे लखनऊ से आर्ट स्कूल से अपना कला प्रशिक्षण समाप्त कर देश भ्रमण के लिए निकल पड़े, फिर लखनऊ आर्ट स्कूल में अध्यापक बने और फिर इसी आर्ट स्कूल में प्रिंसिपल बने ये । 

फाविज़्म की ओर अग्रसर हुए और सतत प्रयोग करते रहे और राष्ट्रीय ललितकला अकादमी ने उन्हें नूतनवादी कलाकारों में सम्मानित किया है। १९८६ ई० में वे आर्ट कालेज से सेवानिवृत्त हो गए हैं।

विष्ट के चित्रों में तकनीकी नवीनता और थीम्स (विषय) की मौलिकता है। उनके चित्रों की अनेक प्रदर्शनियाँ नैनीताल, लखनऊ, इलाहाबाद, दिल्ली आदि नगरों में हो चुकी हैं। 

उनके चित्रों में ‘नल पर भीड़’, ‘भगवान बुद्ध’, ‘लाल पृष्ठभूमि पर वृक्ष’, ‘चेहरे’, ‘श्रम’ आदि उल्लेखनीय हैं। १६६५ ई० में आपको राष्ट्रीय ललित कला अकादमी ने पुरस्कृत करके सम्मानित किया है । १६६८ ई० में उनका स्वर्गवास हो गया।

रामकुमार  

रामकुमार गोआ के निवासी हैं। १६२४ ई० में उनका जन्म हुआ। उन्होंने बम्बई के सर जे० जे० स्कूल ऑफ आर्ट से शिक्षा ग्रहण की। रामकुमार एक कलाकार ही नहीं बल्कि कला समीक्षक भी हैं ये प्रयोगवादी कलाकार हैं और अंतर्राष्ट्रीय कला क्षेत्र में स्थान पा चुके हैं। 

उन्होंने देश-विदेश की कला का अध्ययन किया है। वे अपनी रागात्मक अनुभूतियों को कैनवास पर अपने अंतर में उत्पन्न बिम्ब के आधार पर उतारते हैं। वे पेरिस आदि यूरोप के अनेक नगरों का भ्रमण कर चुके हैं।

उनके अनेक चित्र भावलोक से सम्बन्धित हैं परन्तु वे परम्परागत पौराणिक प्रतीकों पर आधारित हैं। उनके चित्रों में रंगयोजन और रूप सज्जा का निजी महत्व है। उनको राष्ट्रीय ललित कला अकादमी से पुरस्कृत किया जा चुका है। वे बम्बई (मुम्बई) के सर जे० जे० स्कूल ऑफ आर्ट में अध्यापक पद पर कार्यरत रहे।

रघुवंशकुमार भटनागर  

रघुवंशकुमार का जन्म १६३६ ई० में हुआ। उन्होंने दिल्ली के पोलीटेक्निक से कला अध्ययन समाप्त कर अपनी चित्र प्रदर्शनियों में प्रशंसा पायी। उनकी कृतियाँ अन्तर्राष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भारत की ओर से जापान आदि देशों में प्रदर्शित की जा चुकी हैं। वे यूरोप की यात्रा कर चुके हैं और उन्होंने ग्राफिक्स तथा अमूर्त चित्रकला के लिए अपना स्थान बना लिया है। उन्हें राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हो चुकी है और अकादमी पुरस्कार मिल चुके हैं।

वीरेन-वीरेन का जन्म १ अगस्त १६३६ ई० को अमृतसर में हुआ १९५७ ई० में वे कोलम्बो गये, वहाँ वे बौद्धकला से प्रभावित हुए। वीरेन कुछ समय बम्बई के सर जे० जे० स्कूल आफ आर्ट में भी कला का अध्ययन करते रहे। परन्तु संतोष न पाकर वे रंगों तथा आकारों, बिम्बों तथा दृश्यों के अपने प्रयोग करने लगे। 

वीरेन आज अमूर्त कला के क्षेत्र में उदीयमान चित्रकार हैं। उन्हें ‘भिक्षुओं’, ‘घुमक्कड़ों’ तथा जानवरों से विशेष प्रेम हैं। उनके चित्रों में अनुभूति प्रायः अस्पष्ट, धुंधली और व्यंग्यात्मक रूप में रहती है।

बद्रीनाथ आर्य 

(जन्म १९३६ ई०), बद्रीनाथ आर्य ने कला शिक्षा राजकीय कला एवं शिल्प महाविद्यालय, लखनऊ में प्राप्त की थे अनेक महत्त्वपूर्ण कला प्रदर्शनियों में चित्रों का प्रदर्शन कर चुके हैं।

उनका कहना है- “मैं अपनी भावना को भौतिक रूपों में नये प्रयोगों के आधार पर अभिव्यक्त कर सकूँ। तकनीक कोई भी हो सकती है क्योंकि वह कभी पुरानी नहीं होती। तकनीक वही होनी चाहिए जो आंतरिक भावना को अभिव्यक्त करने में पूरी तरह समर्थ हो। 

मुझे वाश तकनीक अपनी भावना की अभिव्यक्ति में अधिक उपयुक्त लगती है किन्तु मैं वाश चित्रों की परम्परा में बंधना कभी पसंद नहीं करता।”

वीरेन्द्र नारायण

जयपुर में उनकी प्रतिभा को कलाप्रेमी भली प्रकार पहचान चुके हैं। उनका जन्म बरेली (उ०प्र०) के एक सम्पन्न परिवार में हुआ । १६५० ई० से चित्रकला की ओर अग्रसर हुए और आगरा विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त कर लगभग १९५५ ई० में अध्ययन हेतु शान्ति निकेतन में कला भवन के छात्र बने। 

उनकी कला से उनके आचार्यगण बहुत प्रभावित रहे और उन्होंने शान्ति निकेतन से स्वर्ण पदक प्राप्त किया। इस समय आचार्य नन्दलाल बसु के वे निकट सम्पर्क में आये। 

वे राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर के चित्रकला विभाग के अध्यक्ष पद से १६६४ ई० में सेवानिवृत्त हो चुके हैं। उनके चित्रों की एकल प्रदर्शनी दिल्ली में आयोजित की गई जिसे पूर्ण सफलता प्राप्त हुई। उन्होंने जोधपुर तथा जयपुर में फ्रेस्को चित्र बनाने में ख्याति पाई है। 

अब वे भारतीय आकारों को लेकर नूतनवादी प्रयोगों में रत है। उन्होंने जयपुरी फ्रेस्कों में विशेष निपुणता प्राप्त की है और १६७४ ई० में उन्होंने भित्तिचित्रण का प्रशिक्षण देने के लिए जयपुर में कलाकार शिविर आयोजित किया। उनके वाटिक चित्र उनकी मौलिक खोजो तथा प्रयोग-शीलता के कारण निखर उठे हैं।

डा. राधाकृष्ण वशिष्ठ

(जन्म 1938 ई.) श्रीनाथ द्वारा क्षेत्र की कलात्मक पृष्ठभूमि को लेकर डा. राधाकृष्ण वशिष्ठ चित्रकला के क्षेत्र में विख्यात हुए। उन्होंने सुखाड़िया विश्वविद्यालय उदयपुर के चित्रकला विभाग से एम.ए. की उपाधि प्राप्त की और आगरा विश्वविद्यालय आगरा से चित्रकला में डी.लिट् की उपाधि प्राप्त की। 

राजस्थान की चित्रकला तथा वरिष्ठ चित्रकारों पर आपने शोधपूर्ण लेख तथा पुस्तकें लिखी और राजस्थान के चित्रकारों को संगठित भी किया। डा. राधाकृष्ण वशिष्ठ राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर में अनेक वर्षों तक सहप्राचार्य और फिर चित्रकला विभाग के अध् यक्ष के रूप में कार्यरत रहे। 

आपने राजस्थान की परम्परागत कला को आधार बनाकर उसमें नूतनवादी प्रयोग किये हैं। ‘उल्लास में नृत्य करती गोपियाँ’ उनका उत्तम चित्र है इसमें कृष्ण के साथ नृत्य करती गोपियाँ ही नहीं प्रकृति भी नत्यम्य हो गई है। 

आप प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप-राजस्थान जयपुर के चेयरमैन हैं और इस ग्रुप के चित्रकारों का परिचय आदि के लेखन का शोधपूर्ण कार्य भी कर रहे हैं। राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर से अवकाश प्राप्त कर अब उदयपुर में ही अपने निवास स्थान पर रहकर कला की महती सेवा कर रहे हैं।

सुधीर रंजन खास्तगीर

सुधीर रंजन खास्तगीर का जन्म भारत के समृद्ध नगर कलकत्ता में १४ सितम्बर १६०७ ई० को एक सम्पन्न परिवार में हुआ था बालकाल में ही हठी सुधीर रंजन कला आचायों की चर्चा का विषय बन गए। पिता की अनुमति के बिना ही खास्तगीर ने शान्ति निकेतन में बी०ए० के स्थान पर कलाभवन में प्रवेश ले लिया। 

स्व० रवीन्द्रनाथ टैगोर के नाटक तथा नृत्य मंडल में वे सदैव ही प्रमुख रहे। नन्दलाल वसु की कला- परम्परा में दीक्षित हो उन्होंने देश भ्रमण किया। इसी समय उनकी मनीषी डे, प्रभाष नियोगी, गोपाल घोष आदि कलाकारों से मित्रता हो गई। 

खास्तगीर पहले ग्वालियर के ‘सिंधिया स्कूल’ फिर देहरादून के ‘दून स्कूल’ में कला विभाग के अध्यक्ष रहे। अन्त में वे लखनऊ के गवर्नमेंट आर्ट स्कूल में प्रिंसिपल पद पर कार्य करते हुए सेवानिवृत्ति प्राप्त कर बोलपुर चले गए। खास्तगीर की प्रतिभा, मूर्तिकार तथा चित्रकार दोनों रूपों में प्रस्फुटित हुई है, परन्तु वे पहले मूर्तिकार हैं पीछे चित्रकार खास्तगीर ने अपने चित्रों में अंतर की ताल और लय को मुखरित कर दिया है। 

उनके रंग शोलों (चिंगारियों) के समान कैनवास पर धधकते दिखाई पड़ते हैं। उन्होंने अपने चित्रों में कभी टूटे तुलिका स्पर्शो और कभी लम्बे तुलिका स्पर्शो का प्रयोग किया है। 

उन्होंने चमकदार नीले, नारंगी, सिन्दूरी, पीले, गेरुआ तथा काले रंगों का प्रभाववादी कलाकार के रूप में खुलकर प्रयोग किया है रौंदा नामक यूरोपीयन मूर्तिकार का उन पर गहरा प्रभाव है परन्तु नन्द्रवायु की परम्परा उनकी रेखा में विद्यमान है १९५७ ई० में उनको भारत सरकार ने ‘पद्मश्री’ से विभूषित किया। 

खास्तगीर के अनेक चित्र देशी और विदेशी संग्रहों में हैं। उनके चित्रों में ‘अमलताश पर कौवे’, ‘प्रतीक्षा’, ‘गाँधी’, ‘गौतम चित्रावली’, ‘आत्मविस्मृति’, ‘दीपावली नृत्य’ आदि प्रमुख चित्र हैं।

सैयद हैदर रजा

हैदर रजा लगभग चालीस वर्षों से पेरिस में रह रहे हैं। उन्होंने स्थायी रूप से फ्रांस की नागरिकता ग्रहण कर ली है। १९५२ ई० में उनके चित्रों की फ्रांस में प्रदर्शनी आयोजित हुई तो कला-विशेषज्ञ जेकस लेसिन ने हैदर के चित्रों के बारे में इस प्रकार कहा था-“वे अद्भुत थीं, सूर्य किरणों से स्निग्ध हुए समयातीय दृश्यचित्र धरती से उपेक्षित नगरों के थे सैयद हैदर रजा ने इनमें रात और दिन की मित्रता को व्यक्त करने का प्रयास किया है। “

रजा के पिता मध्यप्रदेश के जंगलों के अधिकारी थे। इस प्रकार इन घने जंगलों से रजा का घरेलू सम्बन्ध था। वाल्यकाल में उन्होंने जंगलों की जटिलता, भयानकता तथा बीहड़पन को देखा था।

पेरिस जाने के बाद वे दो बार भारत आये हैं और उन्होंने अपने चित्रों की प्रदर्शनियाँ आयोजित की हैं। उनके चित्रों में आकार और रंगों का सूक्ष्मवादी ढंग से आयोजन किया गया है। उनको रंगवादी कलाकार कहना उपयुक्त होगा। उनकी कृतियों में जंगल की ‘अग्नि’ से सम्बन्धित चित्र विशेष प्रभावपूर्ण है।

रजा ही एक ऐसे चित्रकार हैं जिन्हें १६५६ ई० में कला क्षेत्र का प्रसिद्ध पुरस्कार ‘प्री द क्रतिक’ (क्रिटिक ऐवार्ड) प्राप्त हो चुका है। १६७६ ई० में वे पुनः भारत आये और उन्होंने कलकत्ता तथा बम्बई में प्रदर्शनियाँ आयोजित कीं।

सतीश गुजराल 

सतीश गुजराल का जन्म १६२५ ई० में हुआ। उन्होंने जी० डी० आर्ट्स कालेज, लाहौर और बाद में सर जे० जे० स्कूल ऑफ आर्ट, बम्बई (मुम्बई) में कला शिक्षा ग्रहण की। तदुपरान्त उन्होंने मेक्सिको से एडवांस पेंटिंग तथा म्युरल तकनीकी में डिप्लोमा प्राप्त किया। न्यूयार्क, मेक्सिको बम्बई तथा दिल्ली में उनके चित्रों की एकल प्रदर्शनियों को अत्यधिक सफलता तथा प्रशंसा प्राप्त हुई है।

गुजराल आज अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के कलाकार माने जाते हैं। यह ख्याति उन्होंने अपनी शैली के कारण अर्जित की है। उसकी आरम्भिक कृतियों में यथार्थ और अभिव्यंजनावाद की अतिवादिता है वे प्रभाववादी कला को आधार मानकर चले और मेक्सिको की कला से अत्यधिक प्रभावित हैं।

संप्रति ये म्यूरल के लिए अग्रगण्य कलाकार माने जाते हैं। चण्डीगढ़ तथा दिल्ली की अनेक सरकारी इमारतों को उन्होंने म्युरल चित्रों से अलंकृत किया है उनके तैल चित्रों में भी अमूर्तवादी कला का रूप उदित हुआ है।

उनके चित्रों की एक प्रदर्शनी १६५४ ई० में इंडिया हाउस में हुई। उनकी एक सफल प्रदर्शनी १९६१ ई० में न्यूयार्क में आयोजित हुई।

उनके चित्रों में गहरे, नीले, पीले, भूरे, लाल तथा काले रंगों का असाधारण ढंग से प्रयोग दिखाई पड़ता है। इनके आधुनिकतम चित्रों में रंग उनकी अमूर्त कला की भाषा बन गए हैं। उनकी आकृतियाँ प्रायः विशालकाय, भयानक तथा विकराल हैं। उनके चित्रों में ‘मेक्सिकन नारी’, ‘परिवार’, ‘कृष्ण मेनन’, ‘गालिब’ आदि उल्लेखनीय हैं। १६६६ ई० में उनको भारत सरकार ने पद्मविभूषण की उपाधि से सम्मानित किया है।

सतीश चन्द्र 

(जन्म १६४१) उनकी कला शिक्षा राजकीय कला एवं शिल्प महाविद्यालय, लखनऊ में हुई। अनेक महत्त्वपूर्ण कलाप्रदर्शनियों में उनके चित्रों का प्रदर्शन हो चुका है। उत्तर प्रदेश राज्य ललित कला अकादमी तथा उत्तर प्रदेश कलाकार संघ के द्वारा पुरस्कृत – हो चुके हैं। 

वे दस एकल प्रदर्शनियों का आयोजन कर चुके हैं, जिनमें उत्तर प्रदेश राज्य ललित कला अकादमी द्वारा १६६४ ई० तथा अमेरिका में १६६७ में आयोजित प्रदर्शनियाँ सम्मिलित हैं। आजकल वे राजकीय कला शिल्प महाविद्यालय, लखनऊ में कार्य कर रहे हैं।

सतीश का कहना है-“मुझे प्रकृति में जो कुछ भी अच्छा लगता है में उसी को चित्रित करता हूँ किन्तु प्रकृति को देखने का मेरा अपना दृष्टिकोण है।

सरन बिहारी लाल सक्सेना

डॉ० सरन विहारी लाल सक्सेना डी० लिट् ने आगरा विश्वविद्यालय से एम०ए० चित्रकला में उत्तीर्ण होकर के पश्चात् कानपुर को अपना कार्य क्षेत्र बनाया। कानपुर विश्वविद्यालय से आपने पीएच० डी० की और रुहेलखण्ड विश्वविद्यालय से डी० लिट् उपाधि प्राप्त की। 

आप डी०ए०बी० कालेज, कानपुर चित्रकला विभाग में प्रवक्ता रहे। यहाँ आपने अनेक चित्र प्रदर्शनियों में भाग लिया। आपने नवीन प्रयोग भी यहीं से प्रारम्भ किये और तैल चित्रण में यथा यथार्थवादी शैली का अनुकरण किया। 

१६६४ ई० से वे बरेली कालेज, बरेली में चित्रकला विभाग के अध्यक्ष पद पर कार्यरत रहे और १६६६ ई० में अवकाश प्राप्त कर चुके हैं। वे यथार्थवादी कला के समर्थक हैं और वे अपने चित्रों की प्रदर्शनियों आयोजित कर चुके हैं। कला सम्बन्धी शोधक्षेत्र में उनका महत्त्वपूर्ण योगदान है वे एक लेखक और समीक्षावादी चित्रकार हैं।

सुरेन्द्रबहादुर (सुमानव) 

सुमानव का जन्म बरेली में हुआ। कालेज शिक्षा के बाद ड्राफ्टमैन का कार्य किया, परन्तु कला रुचि के कारण वे नौकरी त्याग कर कला अध्ययन हेतु लखनऊ के आर्ट स्कूल चले गये। यहाँ डिप्लोमा कक्षा में उन्होंने प्रथम स्थान पाया। संप्रति वे सैनिक स्कूल, इलाहाबाद में कला प्रशिक्षक हैं। 

१६७२ ई० में उनको उत्तर प्रदेश अकादमी का पुरस्कार प्राप्त हुआ। वे अमूर्त अस्फुट कला की ओर अग्रसर हैं। वे बरेली ग्रुप के उदीयमान युवा कलाकार हैं।

शैलोज मुखर्जी

शैलोज का जन्म १६१० ई० में हुआ। शैलोज ने पूर्व और पश्चिम की कला का समन्वय स्थापित किया। उनके प्रारम्भिक चित्र राजपूत तथा मुगल शैली पर आधारित है परन्तु बाद के चित्रों में अभियंजनावादी या प्रभाववादी दृष्टिकोण अपनाया गया है। 

उनके चित्रों की १६४७ ई० और १९५६ ई० में पिकासो तथा रूसो के साथ प्रदर्शनी हुई थी उनके चित्रों में पनघट’, ‘कपड़े सुखाती स्त्री आदि सुंदर हैं। उन्होंने पोलीटेक्निक, दिल्ली तथा शारदा उकील स्कूल ऑफ आर्ट्स में अध्यापन कार्य किया। शैलोज मुखर्जी १६६० ई० में कला साधना करते हुए निधन को प्राप्त हो गए।

शान्ति दवे 

शान्ति दवे का जन्म १६३१ ई० में हुआ। उन्होंने बड़ौदा विश्वविद्यालय के कला विभाग में कला शिक्षा पाई। देश-विदेश की प्रदर्शनियों में उनके चित्र प्रशंसा प्राप्त कर चुके हैं। बड़ौदा क्षेत्र के कलाकारों में उनका महत्त्वपूर्ण स्थान है। वे अनेक प्रदर्शनियों में पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं।

१६५६ ई० से वे अमूर्तवादी कला की ओर उन्मुख हैं। उन्होंने अरूपता की ओर उन्मुख होते हुए चमकदार रंगों के पैटर्न, तूलिका की स्वछन्द गति को महत्त्व दिया है। 

१९६२ ई० के पश्चात् उन्होंने मोमिया चित्रों का निर्माण किया है और उसके वे सिद्धहस्त कलाकार माने जाते हैं। इस प्रकार का उनका चित्र ‘हिम पर प्रकाश’ है १६६३ ई० में उनके चित्रों की दिल्ली में एक प्रदर्शनी आयोजित हुई, जिससे उनको ख्याति मिली।

श्यावक्ष छावड़ा

श्यावक्ष छावड़ा ने देश-विदेश की कलाओं का अध्ययन किया है। अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के कलाकारों में से एक हैं। उन्होंने लोक जीवन तथा लोक नृत्यों के विषयों (धीम्स) के चित्रों पर विशेष ख्याति पाई। उनके चित्रों में रेखा की लय, गति, सरलता आकृतियों की मुद्राएँ सशक्त है। नृत्यरत आकृतियों, रंगमंच पर अभिनय करते हुए पात्रों के क्रिया-कलाप, समूह गान आदि छाबड़ा ने सफलता से व्यक्त किये हैं।

उन्होंने नित नवलता का स्वागत किया है। उन्होंने अमृताशेरगिल, सेजों गोगा, मातीस आदि से कला प्रेरणा ग्रहण की है। उनके चित्रों में लोक नृत्य सम्बन्धी चित्र उत्तम हैं। ‘श्रीलंका का कैन्डियन लोकनृत्य’ उनकी उत्तम कृति है।

शिवकुमार शर्मा  

शिवकुमार शर्मा का जन्म ५ अगस्त १६३५ ई० में हुआ। वे मेरठ कालेज, मेरठ के चित्रकला विभाग के अध्यक्ष पद से १९६४ में सेवानिवृत्त हो गए। उन्होंने नूतन कलाकार के समान प्रयोग किये हैं और उन्होंने धीप्लाई के रेशों के आधार पर अस्फुट चित्र नियोजन की प्रणाली को अपनाया है। वे उदीयमान चित्रकारों में से एक हैं।

यज्ञेश्वर कल्याणजी शुक्ल योश्वर शुक्ल का जन्म १९०७ ई० में हुआ। १६३४ ई० में उन्होंने सर जे० जे० स्कूल ऑफ आर्ट में प्रथम स्थान प्राप्त कर डिप्लोमा प्राप्त किया जिसके फलस्वरूप उन्हें ‘मेयोपदक प्राप्त हुआ। इसी वर्ष उन्हें पूना आर्ट्स सोसायटी से स्वर्णपदक प्राप्त हुआ। 

१६३६ ई० में एक सदस्य के रूप तथा आधुनिक भारतीय चित्रकार के रूप में ब्रिटिश कला प्रदर्शनी, लंदन में हिस्सा लिया। १६३८ ई० में वे कला अध्ययन के लिए रायल अकादमी ऑफ आदर्श रोम भी गये। १६४७ ई० को पेरिस तथा यूनेस्को में आयोजित चित्र प्रदर्शनी में उन्होंने भारत की ओर से प्रतिनिधित्व किया। 

इसी वर्ष सरकार ने उनको चीन भेजा। उनके चित्रों की अनेक प्रदर्शनियाँ- बड़ौदा संग्रहालय (१६४६ ई०), बम्बई (१६५० ई०), टोकियो (१६५७ ई०) आदि स्थानों में हो चुकी है। १९६५८ ई० में फाइन आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट सोसायटी, दिल्ली की ओर से आयोजित राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी में उनको प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ।

संप्रति यज्ञेश्वर शुक्ल सर जे० जे० स्कूल आफ आर्ट्स में कला विभाग के अध्यक्ष पद पर कार्य कर सेवानिवृत्त हो चुके हैं। उनके चित्र देश-विदेश में पहुँच चुके हैं।

हरिशचन्द्र राय 

उनका जन्म बरेली के एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। वे बाल्यकाल से ही चित्रकला में विशेष रुचि लेते रहे। उन्हें चित्र, मूर्ति संगीत, अभिनय, नृत्य तथा काव्य , का युवाकाल तक प्रेम दिन-प्रतिदिन बढ़ता गया। लगभग १६४३ ई० में वे लखनऊ आर्ट स्कूल में भर्ती हो गए जहाँ उन्हें स्व० असितकुमार हाल्दर का विशेष स्नेह प्राप्त हुआ। 

वे लखनऊ आर्ट स्कूल में सदैव प्रथम स्थान प्राप्त करते रहे। लखनऊ में कला तथा संगीत अध्ययन के पश्चात् वे बरेली में आ गये और उन्होंने बरेली कालेज में अनेक वर्षों तक कला प्रशिक्षण किया। १९५० ई० में उन्होंने अपने नेतृत्व में एक युवा कलाकारों का दल (बरेली ग्रुप) (बरेली स्कूल आफ आर्ट तथा बरेली आर्ट सर्किल) संगठित किया। 

इस दल के कलाकारों में ग्रामी (मेरठ), वीरेन्द्र (जयपुर), अविनाश (देहरादून पहले उल्लेख किया जा चुका है इस पुस्तक के लेखक), राजन (लखनऊ), गोपाल (कानपुर), नफीस न्याज़ी (बरेली), सुमानय (इलाहाबाद), श्याम (पटना), नरेन्द्र (दिल्ली), हरिहर (बरेली), रामस्वरूप (बरेली) आदि ने उच्च अध्ययन कर मौलिक शैलियाँ दिखाई हैं। कला के उच्च अध्यगन हेतु उन्होंने स्वयं सर जे० जे० स्कूल ऑफ आर्ट, बम्बई से बम्बई सरकार का चित्रकला में डिप्लोमा ग्रहण किया।

१६६२ ई० में वे कालेज ऑफ आर्ट्स नाहन (हि०प्र०) के प्रिंसिपल नियुक्त होकर एक नवीन संस्था की आधारशिला रखने गए। यह कालेज राज्य सरकार ने चम्बा फिर शिमला में स्थानान्तरित कर दिया और फिर शिक्षा विभाग से कला अध्ययन जोड़ दिया गया है। 

उन्होंने चित्रण के प्रति अत्यधिक वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाया है। उनके चित्रों में रंगों की प्रांजलता, रेखा की बारीकी और कोमलता प्रशंसनीय है। उनके दृश्य चित्रों में प्रकृति की आत्मा मुखरित हो उठी है। उनके द्वारा बनाया गया बुलगानिन का द्रुत रेखाचित्र ( लाईफ स्केच) अंतर्राष्ट्रीय मेले में टेलीविज़न पर दिखाया गया है। 

वे स्वयं भारतीय शैली के कुशल चित्रकार है परन्तु आधुनिकता या नूतनता को बुरा नहीं मानते हैं उनके अनुसार सच्ची अनुभूति के लिए उपयुक्त शैली के द्वारा अभिव्यक्ति करना कला है।

उनके अनेक चित्रों में ‘सीस्टा’, ‘कवि’, ‘प्रलय’ तथा रानीखेत के लैंडस्केप्स उल्लेखनीय हैं। उनके चित्र अमेरिका, स्काटलैंड, इंग्लैंड आदि में पहुँच चुके हैं। भारत में कला संरक्षकों के पास उनकी कृतियाँ हैं। १६८० ई० के पश्चात उन्होंने शिमला में चित्रों की अनेक एकल प्रदर्शनियों आयोजित की हैं जो बहुत सफल हुई।

राजस्थान में पश्चिम क्षेत्रीय चित्रकारों ने उदयपुर को चित्रकला का प्रगतिशील केन्द्र बनाया है इन कलाकारों मे वरिष्ठ चित्रकार परमानन्द चोयल का स्थान उल्लेखनीय है जिन्होंने सुखाड़िया विश्वविद्यालय में अनेक वर्षों तक महत्वपूर्ण सेवायें प्रदान कीं और उन्होंने अनेक उच्चकोटि के चित्रकारों को सुखाड़िया विश्वविद्यालय के चित्रकला विभाग से उदित किया। 

उन्होंने भारतीय चित्रकला में योरोप की आधुनिक कला आन्दोलनों के नवीन प्रभावों के प्रयोग के साथ-साथ राजस्थान की चित्रकला के विस्तार एवं विकास की प्रक्रिया को भी बल प्रदान किया।

सुरेश शर्मा 

सुरेश शर्मा का जन्म हाड़ोती क्षेत्र में 1937 में हुआ। उन्होंने विश्वभारती- शान्ति निकेतन से 1962 ई. में कला में डिप्लोमा परीक्षा उत्तीर्ण की-1960 ई. में उनको पतझड़’ नामक चित्र पर राजस्थान ललित कला अकादमी जयपुर से पुरस्कृत किया गया। 

उन्होंने ‘ओप आर्ट’ से आगे बढ़कर, कम से कम किन्तु आकर्षक रंगों तथा सरलतम आकारों का प्रभावी प्रयोग करके अनेक कृतियों से प्रदेश में नवीन कलाधारा का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने सुखाड़िया विश्वविद्यालय उदयपुर के चित्रकला विभाग के अध्यक्ष पद पर तथा सहआचार्य पद पर कार्यरत रहकर महती सेवायें प्रदान की है।

लक्ष्मीलाल वर्मा  

(जन्म 1944 ई.) उन्होंने सुखाड़िया विश्वविद्यालय उदयपुर के चित्रकला विभाग में सह-आचार्य तथा विभाग अध्यक्ष पद पर अनेकों वर्ष तक परमानन्द चोयल तथा सुरेश शर्मा के साथ रहकर कला विभाग को महती सेवायें प्रदान की। 

अब वे अध्यक्ष पद से निवृत होकर शोधकार्य तथा चित्रण में रत हैं। उनके दृश्य चित्रों में प्रकृति की सजीव छटा देखने को मिलती है। उनके चित्रों में रंगों का सशक्त एवं प्रभावी प्रवाह दिखाई पड़ता है।

हेमन्त द्विवेदी 

(जन्म 1966 ई.) लक्ष्मी लाल वर्मा के उपरान्त युवा चित्रकार हेमन्त द्विवेदी सुखाड़िया विश्वविद्यालय में चित्रकला विभाग के अध्यक्ष पद पर कार्यरत हैं। डॉ.

हेमन्त द्विवेदी प्रयोगशील अधुनाबादी चित्रकार हैं उनका चित्र ‘नीला चेहरा’ उल्लेखनीय है। मदन सिंह राठौर – (जन्म 1968 ई.) डॉ. मदन सिंह राठौर संप्रति चित्रकला विभाग-सुखाड़िया विश्वविद्यालय में सह-प्राचार्य पद पर कार्यरत हैं और नूतनवादी सक्रिय चित्रकार हैं। उनके चित्रों में ज्यामितिय आकारों का प्रयोग दर्शनीय है।

धर्मवीर वशिष्ठ 

(जन्म 1969 ई.) डा. धर्मवीर वशिष्ठ सुखाड़िया विश्वविद्यालय उदयपुर के चित्रकला विभाग में सह-आचार्य पद पर कार्यरत हैं। उनके चित्रों में रंगों का स्वछन्द उन्मुक्त ढंग से प्रयोग दर्शनीय है। वे सरल ज्यामितिक आकारों में रंग डालकर भाव उदित करने में सफल हुए हैं। 

डॉ. धर्मवीर युवा चित्रकारों में अग्रगण्य हैं। उनके कम्प्यूटर चित्र उल्लेखनीय हैं। राजस्थान ललितकला अकादमी ने उन्हें नामित करके प्रदेश की ओर से 2006 ई. में चित्रकारों के शिमला शिविर – हिमाचल प्रदेश में भाग लेने के लिए भेजा वंशाक्रम से उन्हें कला की प्रेरणा और सूझबूझ प्राप्त हुई है वे नूतन प्रयोगशील चित्रकार है उनके पिता डॉ. राधाकृष्ण वशिष्ठ डी.लिट् (पूर्व अ यक्ष – चित्रकला विभाग राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर) के विख्यात चित्रकार और राजस्थान के कला समीक्षक और लेखक है। 

डॉ. धर्मवीर के चित्रों में लाल, नीले तथा पीले विरोधी रंगों का , संतुलित प्रयोग है या ब्राउन कलर उनकी कृतियों में देखा जा सकता है।

भावना वशिष्ठ

(जन्म 1973 ई.) डॉ. श्रीमती भावना वशिष्ठ डॉ. धर्मवीर की पत्नी हैं और डॉ. राधाकृष्ण वशिष्ठ डी. लिट् की पुत्रवधु हैं। घर में इस कलात्मक वातावरण में रहते हुए भावना ने सरल आकारों-वृत्तों, आयताकारों, अर्धवृत्ताकारों, त्रिभुजों से अपने भाई को चित्रों में सफलता से अभिव्यक्त किया है नारंगी, लाल तथा विरोधी नीले रंग से उनकी कृतियाँ सजीव बन पड़ी हैं। ये प्रयोगशील चित्रकत्री हैं और कम्प्यूटर से चित्र रचना करने में उदयपुर की मुख्य चित्रकत्री हैं।

सुश्री किरण मुर्डिया 

(जन्म 1951 ई.) किरण राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, नाथद्वारा के चित्रकला विभाग में प्राध्यापक पद पर कार्यरत हैं। किरण प्रयोगवादी चित्रकत्री हैं और सशक्त अमिश्रित रंगों का प्रयोग उनके चित्रों की विशेषता है। 

डॉ. बसन्त कश्यप 

(जन्म 1952 ई.) डॉ. वसन्त राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय नाथद्वारा के चित्रकला विभाग में प्राध्यापक के पद पर कार्यरत हैं। डॉ. वसन्त के चित्रों में राजस्थानी चित्रकला का नूतनवादी सरल रूप देखा जा सकता है। 

डॉ. विष्णु माली

(जन्म 1956 ई.) डॉ. विष्णुमाली राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, नाथद्वारा के चित्रकला विभाग में कार्यरत हैं और राजस्थान की मूर्तिकला पर महत्वपूर्ण शोधकार्य कर रहे हैं। ये अधुनावादी चित्रकार हैं और सरल सपाट आकारों और रंगों से बनी उनकी चित्रकृतियाँ दर्शक को मंत्रमुग्ध कर लेती हैं।

सुश्री डॉ. मीना बया

(जन्म 1963 ई.) डॉ. मीना बया चित्रकला विभाग, राजकीय कन्या महाविद्यालय नाथ द्वारा में कार्यरत रहकर अपने प्रयोगवादी चित्रों से राजस्थानी आधुनिक चित्रकला में अपना योगदान कर रही हैं।

उदयपुर में अनेक चित्रकार प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप से जुड़कर कार्य कर रहे हैं इन चित्रकारों में वरिष्ठ चित्रकार थी. जी. शर्मा (जन्म 1923 ई.) रेवाशंकर शर्मा (जन्म 1935 ई.). बशीर अहमद परवेज (जन्म 1936 ई. पूर्व व्याख्याता) अमर सिंह भाटी (जन्म 1938 स्वतंत्र चित्रकार); आनन्दी लाल शर्मा (जन्म 1943 ई.), रामचन्द्र शर्मा (जन्म- 1946 ई. -परम्परावादी थि.), हर्ष छाजेन्द्र (जन्म 1949 ई. परम्परावादी चि.), ललित शर्मा (जन्म-1953 ई. स्वतंत्र चि.), आर.के. शर्मा (जन्म 1954 ई. यथार्थवादी चि.) रघुनाथ शर्मा (जन्म 1955 ई.) प्राध्यापक प्रयोगवादी चि.). सरला शर्मा (जन्म 1955 ई. -नूतनवादी चि.), राजाराम व्यास (जन्म 1955 ई. व्याख्याता नूतनवादी थि.), छोटूलाल (जन्म 1957 ई.), देवेन्द्र दाहिमा (जन्म 1958 ई.), अब्बास अली बाटलीवाला – (जन्म-1958 ई. प्रयोगशील चि.) हैं। मोहन कृष्ण शर्मा (जन्म-1957 ई.), शान्ता शर्मा (जन्म 1961 ई. परम्परागत चि.), सरला मून्दड़ा – (जन्म-1959 ई. यथार्थवादी चि.), युगल किशोर शर्मा (जन्म-1959 ई. प्राध्यापक- रा.वि. नाथद्वारा नूतनवादी चि.), सुबोध रंजन शर्मा – (जन्म 1960 ई. नूतन चि.), कुमार अशोक – (जन्म 1961 ई. अधुनाबादी चि.) तथा अनिल शर्मा, राजाराम शर्मा, गोपाल लाल शर्मा, रबिन्द्र दाहिमा, दीपक भारद्वाज, डा. कहानी भामावत, जगदीश कुमावत, रोशन चौवीसा, लोकेश सोनी, सुश्री रितु टांक, दरषित भास्कर एवं हेमलता के नाम उल्लेखनीय हैं।

आधुनिक कला के विकास का नवीन अध्याय बम्बई तथा दिल्ली दल के कलाकारों से अधिक प्रगति को प्राप्त हुआ है। विगत वर्षों में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के कलाकार प्रोफेसर एन० एस० बेन्द्रे की अध्यक्षता में बड़ोदा विश्वविद्यालय के कला विभाग ने प्रगति को प्राप्त किया था। 

नवोदित कला प्रशिक्षण वाली संस्थाओं में राजकीय कला विद्यालय, शिमला (पहले यह विद्यालय १६६२ ई० में नाहन में स्थापित किया गया था) तथा राजकीय विद्यालय, चण्डीगढ़ ने कला क्षेत्र में नवीन प्रयोग आरम्भ कर दिए हैं। 

प्रिंसिपल हरिशचन्द्र राय जो स्वयं कुशल मूर्तिकार, चित्रकार, आलोचक तथा विचारक हैं, के निर्देशन में राजकीय कला विद्यालय, शिमला ने आश्चर्यजनक उन्नति की राजकीय कला विद्यालय चंडीगढ़ के प्रिंसिपल सुशील सरकार जो सुविख्यात चित्रकार हैं, के निर्देशन में अनेक युवा कलाकारों ने अपनी मौलिक प्रतिभा दिखाई।

सर्वप्रथम आगरा और फिर मेरठ, कानपुर, गढ़वाल, कुमायूँ, रुहेलखण्ड तथा राजस्थान और विक्रम विश्वविद्यालयों में चित्रकला विभागों की स्थापना के उपरान्त चित्रकला में स्नातकोत्तर कक्षाएँ अनेक विश्वविद्यालयों में प्रारम्भ कर दी गई हैं। 

उदयपुर विश्वविद्यालय के अन्तर्गत भूतपूर्व प्रोफेसर पी०एन० चोयल की अनोखी डिस्टार्शन पद्धति तथा कलात्मक सूझ-बूझ से वहाँ की कला में एक परिवर्तन आया है। हिन्दू विश्वविद्यालय बनारस में विख्यात चित्रकार के०एस० कुलकर्णी की अध्यक्षता में ललित कला विभाग की स्थापना हुई, रामचन्द्र शुक्ल के पश्चात् इस पद पर प्रो० पम्मी लाल कार्यरत रहे।

इन अग्रगण्य चित्रकारों के अतिरिक्त अनेक अन्य चित्रकारों ने ख्याति प्राप्त की है जिनमें रमेशचन्द्र साथी, योगी तथा बद्री (लखनऊ), डी०पी० डुलिया (गोरखपुर), अज़मतशाह (अलीगढ़), ने शैली को परम्परा के आधार पर विकसित किया है। 

अनेक प्रयोगशील कलाकारों में अवतार सिंह पंवार, विजेन, काजी, गायतोड़े, सलीम, कुक्कल, मुनीसिंह, कालकी, धीर, सरला, सूरजसदन, भावसार, ज्ञानेन्द्रकुमार, जवाहरलाल, सनतकुमार चटर्जी आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। कानपुर की महिला चित्रकारों में डॉ० श्रीमती शशी माथुर, डॉ० आई०बी० रूबेन के नाम उल्लेखनीय है।

अनेक नवोदित कलाकारों में नागदेव, बघेला, वामन ठाकरे, गंभीर (अमृतसर), कु० नीलकमल (जालंधर), हरिकृष्ण भारद्वाज (शिमला), कु० शिवकुमारी रावत (उज्जैन), श्रीमती प्रज्ञा रश्मि (देहरादून), विजयपाल सिंह (बदायूँ), आशीश्वरन (मसूरी), मगनसिंह आर्य (आगरा), प्रबोधनाथ (मेरठ), कु० विजय (बिजनौर), ज्योति स्वरूप (झाँसी सैनिक स्कूल), कुलभूषण (सहारनपुर) ने अपनी नूतनवादी प्रवृत्तियाँ दिखाई हैं। इन चित्रकारों के अतिरिक्त कृपाल सिंह शेखावत (जयपुर), शैल चोयल (उदयपुर), बी०सी० गई तथा उनकी पुत्री दीपिका गुई (अजमेर), एच०एस० काजी, श्रीमती मीनाक्षी जैन (जयपुर), रमेश गर्ग (चित्तौड़) आदि राजस्थान में प्रगतिशील कलाकारों के रूप में कार्य कर रहे हैं।

नवोदित चित्रकारों की नूतन प्रतिभाएँ चित्र जगत में दिनो दिन सामने आ रही है। ये प्रतिभाशाली चित्रकार मूलरूप से प्रयोगवादी माने जा सकते हैं। इनमें अब्बास बाटलीवाला (जन्म १९५० ई० जन्मस्थान-उदयपुर), अनिल, एन० नायक (जन्म १६५९ ई०), अनिल तारे (जन्म १९५५ ई० जन्मस्थान- पुणे), भगवान चहावन (जन्म १६५८ ई०), भीमसिंह (जन्म १६५१ ई० जन्मस्थान – हिसार), व्योमकेश मोहंती (जन्म १६५५ ई० जन्मस्थान-कटक), चन्द्रमणि विसवल (जन्म १९५१ ई० जन्मस्थान-कटक), देवेन्द्र बहादुर सेठ ‘देवेन’ (जन्म १६४४ ई० जन्मस्थान- बरेली – उ०प्र०), डी० हरहर (जन्म १६४० ई० जन्मस्थान-मध्यप्रदेश), दीनानाथ पाधे (जन्म १६४२ ई० जन्मस्थान-उड़ीसा), गोपाल लाल किरोड़ीवल (जन्म १६४२ ई० जन्मस्थान- कोटा), हरीश राउत (जन्म १६२५ ई०), हेमा जोशी, जगन्नाथ पंद्य (जन्म १९७० ई० जन्मस्थान- भुवनेश्वर), जेएस० खांडेराय (जन्म १९४० ई० जन्मस्थान- गुलबर्गा), ज्योत्सना एस० कदम (जन्म १६५७ ई० जन्मस्थान – महाराष्ट्र), काशीनाथ सालवे (जन्म १६४३ ई० जन्मस्थान- अहमदनगर), कृष्ण आहूजा (जन्म १६४३ ई०), माधवी पारेख (जन्म १९५२ ई० जन्मस्थान- अहमदाबाद), मकबूल अंसारी (जन्म १६३८ ई० जन्मस्थान- बहराईच), एम०जी० जोशी (जन्म १६४० ई०), एम०के० शर्मा, ‘सुमहेन्द्र’ (जन्म १६४३ ई०), मोनादेव कुमार पटेल (जन्म १६६८ ई० जन्मस्थान-गुजरात), एम० सनाथन (जन्म १६४३ ई० जन्मस्थान- केरल), नवीन ए० धागत (जन्म १६४६ ई० जन्मस्थान-गुजरात), प्रभाकर कोलती (जन्म १६४५ ई०), प्रभाकर पाटिल (जन्म १६५५ ई० जन्मस्थान – महाराष्ट्र), प्रफुल्ला धानुकर, प्रकाश अर्जुन राजश्रीके (जन्म १६५२ ई० जन्मस्थान महाराष्ट्र), पी० श्रीनिवासन (जन्म १९५२ ई० जन्मस्थान- तमिलनाडु), रजतकुमार घोष (जन्म १९५६ ई० जन्मस्थान- पटना), राजेन्द्र पटवारी (जन्म १९४३ ई० जन्मस्थान- श्रीनगर), रमेश वघेला (जन्म १९६० ई० जन्मस्थान – अहमदाबाद), राम के औते (जन्म १९३२ ई० जन्मस्थान – महाराष्ट्र), रवीन्द्र सालवे (जन्म १९५७ ई० जन्मस्थान – अहमदनगर), रवि मांडलिक (जन्म १६६० ई०), वाई० एस० रावत (जन्म १६५४ ई० जन्मस्थान- सौराष्ट्र), आर०बी० भास्करन (जन्म १६४२ ई० जन्मस्थान-मद्रास), ऋतु श्रीवास्तव (जन्म १६६६ ई० जन्मस्थान- दिल्ली), आर०पी० डवराल (जन्म १६५० ई०), सच्चिदा नागदेव (जन्म १६४० ई० जन्मस्थान- उज्जैन), सम अदाईकल स्वामी (जन्म १९५१), सतीश कुमार नायक (जन्म १६५५ ई०), सत्यप्रकाश (जन्म १९५५ ई० जन्माधान मेरठ उ०प्र०) एस०जी० वासुदेव (जन्म १६४५ ई० जन्मस्थान मैसूर), शेल घोयल (जन्मस्थान- कोटा), शामेन्द्र एन० सोनावने (जन्म १९५६ ई० जन्मस्थान महाराष्ट्र), शान्दाराम दगडूजी बागुल (जन्म १९५६ ई० जन्मस्थान- बम्बई), शोभा बरौटा, शुभा गोखले (जन्म १६५६ ई०). शिवा पाणीग्राही (जन्म १६४३ ई० जन्मस्थान-उड़ीसा), एम० सुलेखा (जन्म १६६४ ई० जन्मस्थान- केरला), स्वप्न कुमार दास (जन्म १६५५ ई० जन्मस्थान- कलकत्ता), तेज सिंह (जन्म १६३६ ई०), था० थाम्बी सिंह (जन्म १९३६ ई० जन्मस्थान- इम्फाल ), उमेश मिश्रा (जन्म १६४२ ई०), वासुदेव टी० कामय (जन्म १९५६ ई० जन्मस्थान-कर्नाटका), विनोद शाह (जन्म १९३४ ई० जन्मस्थान-गुजरात) तथा वाई० एन० वर्मा ‘योगी’ (जन्म १६३४ ई० जन्मस्थान – लखनऊ), श्रीमती सविता नागपाल (मेरठ) के नाम महत्त्वपूर्ण है।

इन चित्रकारों ने मूर्त अमूर्त परम्परागत तथा अमूर्त आकारों के माध्यम से भिन्न प्रकार की मौलिक रचनाओं को जन्म देने की विधियों को अपनाया है। इनकी कृतियों में एक नूतनवादी दृष्टिकोण है।

आधुनिक समस्या

आधुनिक कलाकारों के समक्ष रोटी और कपड़े का प्रश्न है अनेक कलाकारों को जनतांत्रिक समाज में ठीक आश्रय प्राप्त नहीं है सरकारी सहायता एक वर्ग विशेष और वयोवृद्ध संतति के कलाकारों तक सीमित है और छोटे तथा बड़े नगरों में नगरपालिका या प्रशासन के द्वारा कलाकारों को आर्थिक सहायता, चित्रशालाएं तथा चित्रदीर्घाएँ निःशुल्क दिलाने का प्रश्न है।

आज चित्रों का समाज में आर्थिक दृष्टि से उपयुक्त मूल्यांकन नहीं हो पाया है। अतः सरकार का दायित्व है कि युवा चित्रकारों की कृतियों को राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विक्री के लिए अच्छे साधन उपलब्ध कराये। देश की कला के विकास में युवा पीढ़ी का सदैव योगदान रहा है क्योंकि युवक ही नूतनवादी विचारधारा के जन्मदाता होते हैं अतएव युवा कलाकारों की स्थिति को सतत् रूप से सुदृढ़ बनाने की अत्यधिक आवश्यकता है।

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