भारतीय आधुनिक काल की चित्रकला | Indian Modern Painting

(स्वतंत्रता- पूर्व, स्वतंत्रता- पश्चात् के चित्र, नूतन प्रवृतियाँ (१८०० ई० से आज तक)

दिल्ली तथा लखनऊ की चित्रण शैलियाँ-१७६० ई० में मुगल साम्राज्य के पतन के साथ ही उत्तरी भारत की चित्रकला में सर्वत्र अवनति के चिन्ह दृष्टिगोचर होने लगे। दिल्ली तथा लखनऊ में कुछ चित्रकार अभी भी चित्रकला का व्यवसाय चलाये हुए थे परन्तु इनकी कृतियाँ प्राचीन कृतियों की हेय अनुकृतियाँ थीं। 

दिल्ली के चित्रकारों ने शीघ्र ही लघु शबीह चित्रों का अंकन प्रारम्भ कर दिया और यह शैली उस समय अधिक प्रचलित हो गई। कुछ मुस्लिम चित्रकारों के परिवार इस प्रकार के शबीह चित्रों का निर्माण करते रहे। इन चित्रकारों ने विशेष रूप से मुगल सम्राटों की शबीहों का अंकन किया। 

इन चित्रों में अलंकरण योजना और चित्र में अंकित व्यक्ति का सादृश्य निम्न कोटि का था। ये चित्रकार मुगल शैली के चित्रकारों के वंशज थे और अभी इनके रेखांकन में मुगल कला की कुछ विशेषताएँ विद्यमान थीं। 

इन चित्रकारों ने प्राचीन ढंग की सामग्री का चित्र निर्माण में प्रयोग किया और उन्होंने मध्यकालीन ढंग के कागज़ तथा रंगों का अधिक प्रयोग किया। यह चित्र प्रायः बड़े-बड़े घरानों में स्त्रियाँ ले जाकर बेचा करती थीं और इस प्रकार चित्रकार बाजारू ढंग से काम करने लगे। 

इन शबीह चित्रों पर गलत नाम भी लिख दिये जाते थे जिससे कि वे सुगमता से बिक जाएँ। इसी समय दिल्ली में हाथी दाँत पर कुछ शबीह चित्र बनाये गए जो कारीगरी तथा भावना में उत्तम हैं। इस प्रकार दिल्ली कलम दम तोड़ने लगी और चित्रकार दूसरे कामों में लगने लगे।

अट्ठारहवीं शताब्दी के अन्त में और उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में लखनऊ में एक भिन्न प्रकार की चित्रण शैली प्रचलित हो गई जो रूमी कलम के नाम से प्रसिद्ध है। इस स्कूल ने प्राचीन कला-शैली की कुछ उत्तम विशेषताओं का प्रतिपादन किया परन्तु इस नवीन शैली पर यूरोपियन कला का भद्दा प्रभाव था। 

इस स्कूल का प्रमुख विषय शबीह चित्रण था और बहुधा छवि चित्रों में व्यक्ति की वास्तावेक सादृश्यपूर्ण आकृति का सफल अंकन हुआ है। चित्र में अन्य साज-सामान के चित्रण में अवध की अपनी अनोखी रुचि दिखाई पड़ती है। इसी समय राजस्थानी कला का भी अधोपतन हो रहा था।

राजस्थान तथा पंजाब की शैलियाँ

राजस्थान के प्रमुख नगरों जैसे जयपुर, उदयपुर, नाथद्वारा, किशनगढ़ तथा बूंदी आदि नगरों में चित्रकार बाजारू ढंग से धार्मिक चित्र या व्यक्ति चित्र बना रहे थे ये लघु चित्र विधान तथा शैली में मध्यकालीन परम्परा के अधिक द्योतक थे। 

परन्तु फिर भी पंजाब के पहाड़ी प्रदेशों में मध्यकालीन जीवन पद्धति जीवित रहने के कारण उन्नीसवीं शताब्दी तक हिन्दू भावना से परिपूर्ण कुछ उत्तम चित्रों का निर्माण होता रहा। पंजाब में लाहौर तथा अमृतसर नगरों में उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में सिक्ख चित्रकारों की कृतियों अधिक लोकप्रियता को प्राप्त हुईं। 

इन सिक्ख चित्रकारों की कृतियों में पूर्व और पश्चिम की कला का अपूर्व समावेश है। कपूरसिंह नामक एक चित्रकार ने अनेक लघुचित्रों का निर्माण किया। इन चित्रों में रेखांकन की कुशलता और गति दर्शनीय है।

पटना शैली

उथल-पुथल के इस अनिश्चित वातावरण में दिल्ली से कुछ मुगल शैली के चित्रकारों के परिवार आश्रय की खोज में भटकते हुए पटना (बिहार) तथा कलकत्ता (बंगाल) में जा बसे यहाँ पर इन चित्रकार परिवारों ने एक विशिष्ट शैली को जन्म दिया, जो पटना या कम्पनी शैली के नाम से प्रसिद्ध है। 

दिल्ली सल्तनत की ओरंगजेब काल में अवस्था बिगड़ने पर अनेक कलाकार दिल्ली छोड़कर नवाव मुर्शिदाबाद के आश्रय में पहुँच गए। नवाब मुर्शिदाबाद ने इन कलाकारों को लगभग चालीस वर्ष तक अच्छा संरक्षण दिया परन्तु अफगान, मराठा, रुहेला और जाट आक्रमणों के कारण तथा विशेष रूप से कम्पनी के झगड़ों आदि के कारण नवाब की स्थिति खराब हो गई। 

इन चालीस वर्षों तक मुर्शिदाबाद कला का केन्द्र बना रहा परन्तु १७५०-१७६० ई० के मध्य कलाकारों को पुनः आश्रय की खोज में भटकना पड़ा। ये चित्रकार मुर्शिदाबाद छोड़कर इस समय पटना होते हुए कलकत्ता जा बसे, इस प्रकार पटना में भी दिल्ली-कलम पहुँची। इसी समय दूसरे कलाकार परिवार भी वहाँ जाकर बस गए।

पटना व्यापारिक केन्द्र था और अंग्रेज़ी सरकार के अनेक कार्यालय पटना में थे। इस प्रकार अंग्रेज़ों का यहाँ रहना स्वाभाविक था ये अंग्रेज अधिकारी इन भारतीय चित्रकारों से अपने लघु व्यक्तिचित्र बनवाते थे और विशेष रूप से भारतीय पशु-पक्षी तथा प्रकृति के चित्रों की मांग करते थे इस प्रकर के अनेक चित्र कमिश्नर टेलर तथा दूसरे अंग्रेज़ अधिकारियों ने बनवाये और इंग्लैंड भेजे, इसलिए इस शैली को कम्पनी शैली या जान कम्पनी शैली के नाम से पुकारते हैं। इस प्रकार के अनेकों चित्र पटना संग्रहालय तथा विदेशी कला दीर्घाओं में सुरक्षित हैं।

पटना शैली के दो चित्रकारों को वाराणसी के महाराजा ईश्वरीनारायण सिंह (१८३५-१८०६ ई०) ने संरक्षण दिया। ये कलाकार लालचंद और उसका भतीजा गोपालचंद थे। कहा जाता है कि ये दोनों काशी के चित्रकार दल्लूलाल के शिष्य थे। ये दोनों चित्रकार पटना शैली में व्यक्ति चित्र बनाने में निपुण थे।

पटना शैली या कम्पनी शैली के अधिकांश चित्र राजा, रईसों जागीरदारों या अंग्रेजों के आदेश पर बनाये गए। इसी समय चित्रकारों ने अबरक (अभ्रक) के पन्नों पर अतिलघु चित्रों का निर्माण आरम्भ किया।

उन्नीसवीं शताब्दी को पटना शैली के उत्थान का समय माना जाता है। इस समय में पटना शैली के चित्रकारों में सेवकराम का नाम प्रमुख हे लाला ईश्वरी प्रसाद (कलकत्ता आर्ट स्कूल के भूतपूर्व उपाध्यक्ष) के पितामह शिवलाल भी पटना के वंश परम्परागत चित्रकार थे। 

इनके अतिरिक्त हुलासलाल, जयराम दास, झूमकलाल, फकीरचंद आदि चित्रकारों का कार्यकाल १८३०-१६५० ई० के मध्य माना गया है। इस समय पटना के चित्रकारों ने फिरका – चित्रों के अतिरिक्त कागज़ तथा हाथी दांत फलकों पर भी चित्र बनाये। 

पटना शैली के चित्रकारों ने हाथी, घोड़े आदि जानवरों तथा सवारियों आदि के चित्र भी अंकित किये। पटना शैली के चित्रों में जनसाधारण जैसे ‘मछली बेचने वाली’, ‘टोकरी सुनने वाले’, ‘चक्की वाले’, ‘लोहार’, ‘दर्जी’, ‘सेविका’ आदि को भी चित्रित किया गया।

पटना शैली के चित्रों में रेखांकन की यथार्थता है, तथापि भावना की कमी है, परन्तु आकृति की सीमारेखाएँ बहुत संतोषजनक बनायी गई हैं। 

कुछ समय तक पटना शैली के चित्रकारों को ईस्ट इंडिया कम्पनी के यूरोपियन व्यवसाइयों और एंगलो इंडियन्स का संरक्षण प्राप्त होता रहा। इन संरक्षकों ने भारतीय तथा यूरोपियन मिश्रित शैली के शबीह चित्रों की मांग की। इन चित्रों में मानव आकृतियों को बहुत कोमलता से चिकना, गठनयुक्त और बारीकी से बनाने की चेष्टा की गई है। 

इन चित्रों में दिल्ली-कलम की कारीगरी पर्याप्त समय तक बनी रही, परन्तु रंग भद्दे हैं। सामान्यतः भूरे, गंदे हरे, गुलाबी तथा काले (स्याही) रंगों का चित्रों में प्रयोग किया गया है। इस प्रकार के अनेकों चित्र प्राप्त हैं जो ‘जान कम्पनी’ काल की कला के द्योतक हैं।

दक्षिणी भारत के राज्यों की कला मुगल साम्राज्य के पतन के साथ ही उत्तरी भारत की राजनैतिक अवस्था विशृंखलित होने लगी, परन्तु दक्षिणी भारत के अनेक राज्य स्थिर रूप में कला विकास में योगदान प्रदान कर रहे थे। दक्षिणी भारत में चित्रकला का उत्तरी भारत की अपेक्षा भिन्न रूप में विकास हुआ। 

दक्षिण में सोलहवीं शताब्दी से ही फारसी चित्रण शैली प्रचलित थी। सम्भवतः फारसी चित्रकला को तुर्कमान शासकों ने अपने-अपने मुसलमान राज्यों में आश्रय प्रदान किया। 

इस शैली के आरम्भिक चित्र उदाहरणों में तैमूरिया कला का प्रभाव परिलक्षित होता है परन्तु कालान्तर में स्थानीय अपभ्रंश तथा राजस्थानी कला के संयोग से इस शैली का रूप परिवर्तित हो गया और यह शैली बहुत कुछ मुगल शैली के समान दृष्टिगोचर होने लगी, परन्तु फिर भी इस चित्रकला में कुछ नगण्य सी अपनी निजी विशेषताएँ स्थायी रूप से प्रचलित रहीं, जिनके फलस्वरूप इस शैली का विकास उत्तरी भारत की चित्रकला से सर्वथा भिन्न रहा। 

मुगल साम्राज्य के पतन से चित्रकारों के अनेक परिवार दक्षिण में भी आश्रय की खोज में पहुँचे। इन चित्रकारों ने सम्भवतः दक्षिणी शैलियों को वल तथा शक्ति प्रदान की। 

दौलताबाद तथा औरंगाबाद के चित्रकारों की कृतियाँ उत्तरी भारत के चित्रकारों की कृतियों की तुलना में छोटी हैं और उनमें वह जीवन तथा गति नहीं है और चित्रों के विषय प्रायः ऐतिहासिक हैं जो समकालीन दक्षिण के शासकों से सम्बन्धित हैं। इन चित्रकारों के वंशज आज भी हैदराबाद तथा निकोण्डा में परम्परागत रूप से कारीगरी आदि के काम करते हैं।

भारत के सुदूर दक्षिणी क्षेत्रों में चित्रकला भिन्न रूप में ही जीवित रही, परन्तु चित्रों की परम्परा तथा शैली उसको उत्तरी भारत की कला से निबद्ध कर देती है। तारानाथ ने दक्षिण की चित्रकला का संक्षिप्त इतिहास प्रस्तुत किया है। लामा तारानाथ ने दक्षिण के तीन कलाकारों जय, पराजय तथा विजय का उल्लेख दिया है। इन चित्रकारों के अनेक अनुयायी थे। दक्षिण की चित्रकला का विकास दो भिन्न-भिन्न संस्थाओं- तंजोर तथा मैसूर में हुआ।

तंजौर शैली-तंजोर के चित्रकारों की शाखा के विषय में ऐसा अनुमान किया जाता है कि यहाँ चित्रकार राजस्थानी राज्यों से आये इन चित्रकारों को राजा सारभोजी ने अट्ठारहवीं शताब्दी के अंत में आश्रय प्रदान किया। 

ये चित्रकार हिन्दू थे अतः इस बात की पुष्टि होती है कि राजस्थानी राज्यों की अवस्था खराब होने पर आश्रय की खोज में भटकते हुए ये चित्रकार सुदूर दक्षिण के हिन्दू राज्यों में आकर बस गए। 

इस प्रकार तंजौर में राजस्थानी चित्रकला पहुँच गई और राजकीय संरक्षण प्राप्त कर यह कला-शैली पुनः एक स्थानीय शैली के रूप में प्रस्फुटित होने लगी। 

आरम्भ में इस शैली के चित्रकार बहुत कम थे परन्तु कालान्तर में इनकी संख्या बहुत अधिक हो गई और तंजौर के अंतिम राजा शिवाजी (१८३३-५५ ई०) के राज्यकाल में चित्रकारों के अठ्ठारह परिवार थे जो हाथी दांत तथा काष्ठफलक पर चित्रकृतियाँ बनाते थे। काष्ठफलकों पर ये चित्रकार जल रंगों के द्वारा चित्र बनाते थे। 

इन चित्रों में सोने के पत्र अतिरिक्त बहुमूल्य हीरे तथा जवाहरात भी लगाये जाते थे। इन चित्रकारों ने मानवाकार व्यक्ति चित्र तैल रंगों में बनाये। ये चित्र आज तंजौर के राजमहल तथा पहूकोट्टा के प्राचीन राजमहल में सुरक्षित हैं।

१८५५ ई० में शिवाजी की मृत्यु से इस राजवंश का अंत हो गया और इस राज-वंश के साथ ही चित्रकारों का राजकीय संरक्षण भी समाप्त हो गया। अतः चित्रकारों को दूसरे उद्योग धन्धों में लगना पड़ा जिससे कि वह अपनी आजीविका का निर्वाह कर सकें। 

कुछ चित्रकार सुनारगीरी का कार्य करने लगे तो कुछ सोला टोपी या कसीदाकारी आदि के काम में लग गए। अनेक वंश परम्परागत चित्रकार अभी भी अपना व्यवसाय चलाते रहे और इनकी बाज़ारू कृतियाँ जनता में प्रचलित रही इन चित्रों के विषय धार्मिक थे अतः स्थानीय हिन्दू जनता में थे कृतियाँ बहुत लोकप्रिय बन गई। 

इन चित्रों में कसात्मक विशेषताएँ बहुत कम है और सोने के रंग तथा पिसे हुए जवाहरातों का चित्रों में प्रयोग किया गया है, परन्तु चित्रों में कारीगरी बहुत उत्तम कोटि की है। आरम्भ में तंजोर शैली में प्रमुख रूप से हाथी दांत के फलकों पर शबीह चित्र बनाये गए जो बहुधा छः इंच लम्बे आकार के थे।

मैसूर शैली

दक्षिण के एक दूसरे हिन्दू राज्य मैसूर में एक मित्र प्रकार की कला शैली का विकास हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में मैसूर की चित्रकला राजा कृष्णराज के संरक्षण में अत्यधिक उन्नति को प्राप्त हुई। 

राजा कृष्ण राज के संरक्षण से पूर्व ही मैसूर शैली लगभग एक सौ वर्ष से प्रचलित थी और विकासोन्मुख हो रही थी। राजा कृष्णराज के शासन काल में दरबारी कलाकारों ने अधिक ख्याति प्राप्त की। 

राजा ने चित्रकारों को अत्यधिक प्रोत्साहन प्रदान किया। इस प्रकार के प्रमाण हैं कि राजा स्वयं एक मनोनीत विषय पर अनेक चित्रकारों को तुलनात्मक ढंग से चित्रांकन करने के लिए बहुत अधिक प्रेरणा देता था। 

तंजौर के चित्रकारों के समान मैसूर के चित्रकारों ने भी हाथी दाँत के फलकों पर अनेक शबीह चित्र बनाये जिनका संग्रह मैसूर के राजमहल में प्रदर्शित किया गया है। १८६८ ई० में राजा कृष्णराज के निधन के साथ ही चित्रकार भी इधर-उधर चले गए और यह शैली समाप्त हो गई।

विदेशी कला का आगमन उपरोक्त विवरण से यह स्पष्ट है कि उन्नीसवीं शताब्दी के अंत में भारतवर्ष में चित्रकला का अधपतन हो गया और चित्रकला की कलात्मक विशेषताओं का लोप हो गया। चित्रकार पुरानी लकीरें पीटते रह गए और सृजनात्मक सत्ता का पूर्णतया लोप हो गया। 

इस प्रकार की चित्रकला की बुझती लो बाज़ारू कृतियों की धूमिल टिमटिमाइट बनकर उत्तरोत्तर घटती गई। अट्ठारहवीं शताब्दी के अंत में और उन्नीसवीं के आरम्भ में लगभग पचास से अधिक अंग्रेज़ी चित्रकार भारतवर्ष में आये, इनमें से कई चित्रकार अपने व्यवसाय में बहुत दक्ष थे। 

विशेष रूप से ये विदेशी चित्रकार राजाओं और रईसों के व्यक्तिचित्र तैल रंगों से बड़े आकार (आदम कद, मानवाकार) में बनाकर धन कमाने की लालसा से भारत आये थे इनके चित्रों की मांग देश के धनी वर्ग, राजाओं, नवाबों, जागीरदारों तथा जमींदारों आदि में इतनी बढ़ी कि भारतवर्ष की रूढ़िवादी परम्परागत चित्रकला की बाज़ारू शैली भी समाप्त हो गई। भारतीय चित्रकला का भविष्य अनिश्चित सा दिखाई पड़ने लगा। 

1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता युद्ध में भारतीय पराजय के बाद अंग्रेज़ी राज्य और सत्ता ने सम्पूर्ण भारत की आस्था और विश्वास को ऐसी ठेस पहुचाई कि देश की चित्रकला के विषय में सोचना कठिन था। देश में विदेशी सत्ता और शासन आ जाने के साथ विदेशी शिक्षा और मशीनें भी भारत में आने लगीं।

देश में अनेक विदेशी चित्रकारों के आने से और तैलचित्रों की उत्तरोत्तर बढ़ती मांग के कारण उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम भाग में एक नवीन कलाधारा का प्रवाह प्रस्फुटित हुआ जो अधिक स्थायी न था। 

यह धारा पाश्चात्य कला की थी, और इससे प्रेरित अनेक भारतीय चित्रकारों ने दक्षिण भारत में सर्वप्रथम पाश्चात्य चित्रकला में दक्षता प्रदर्शित की। इन चित्रकारों में राजा रविवर्मा का नाम अग्रगण्य है। राजा रविवर्मा ने यूरोपियन कला पद्धति के अनुरूप भारत की चित्रकला की धारा को नव-ज्योति प्रदान करने की चेष्टा की।

राजा रविवर्मा 

१८४८ ई० में राजा रविवर्मा का जन्म ट्रावनकोर नामक स्थान में हुआ और उनका १६०५ ई० में स्वर्गवास हुआ। राजा रविवर्मा ने अपनी अल्प आयु के लगभग तीस वर्ष भारतीय चित्रकला के प्रसार और प्रचार हेतु समर्पित कर दिए। 

राजा रविवर्मा ने थियोडोर जेनसन तथा अन्य यूरोपियन चित्रकारों से, जो दक्षिण भारत भ्रमण के लिए आते थे, कला दीक्षा ली। राजा रविवर्मा ट्रावनकोर के राजा राजवर्मा के सम्बन्धी थे, अतः राजा और राज-परिवार के सदस्यों ने रविवर्मा की सहायता की राजा रविवर्मा की कृतियों ने सम्पूर्ण देश में अत्यधिक लोकप्रियता प्राप्त की। 

राजा रविवर्मा ने व्यक्ति-चित्रों, दृश्य-चित्रों, धार्मिक तथा पौराणिक हिन्दू कथानकों पर आधारित चित्रों का निर्माण किया। उनकी चार बहुमूल्य कृतियाँ बैंक्वेटिंग हाल मद्रास में आज सुरक्षित हैं। 

राजा रविवर्मा ने पाश्चात्य प्रणाली पर यथार्थ शैली में भारतीय धार्मिक कथाएँ चित्रित की जिनको जनता ने अत्यधिक श्रद्धा और आदर से सराहा और ये चित्र छपकर सस्ते हो जाने के कारण जनता में बहुत प्रचलित हुए। राजा रविवर्मा ने अपने चित्रों के प्रकाशनार्थ बम्बई (मुम्बई) में लीथोग्राफ प्रेस खोला और उसी के द्वारा रविवर्मा के चित्र सारे देश में प्रचलित हो गए। 

उनके द्वारा अंकित पौराणिक चित्रों का विशेष आदर हुआ। आज भी रविवर्मा प्रेस चित्र प्रकाशन करता है। राजा रविवर्मा ने अपने समसामयिक महाल के चित्रकार अलेग्री नायडू से चित्रकला की शिक्षा ली थी। 

उस समय तैल चित्रण में नायडू का नाम बहुत प्रसिद्ध था। नायडू के लिए ट्रावनकोर के महाराजा स्वती त्रियूमल ने १८२० ई० से १८४७ ई० तक संरक्षण प्रदान किया। भारत में नायडू को उस समय यूरोपियन पद्धति का सर्वश्रेष्ठ चित्रकार समझा जाता था।

राजा रविवर्मा को ट्रावनकोर के महाराजा और बड़ौदा के गायकवाड़ तथा अन्य धनाड्य व्यक्तियों का संरक्षण प्राप्त हुआ। 

इस समय से गायकवाड़ के संरक्षण में रविवर्मा ने अपना ध्यान विशेष रूप से हिन्दू धर्म की कथाओं तथा पौराणिक प्रसंगों के चित्रण में लगाया। राजा रविवर्मा के इन चित्रों में काव्यगत भावना और उन्नत कल्पना नहीं है और इनको केवल रंगमंच की अनुकृति या धारणा माना जा सकता है। 

इन चित्रों का विषय तो पूर्णतया भारतीय था, परन्तु शैली और संविधान पूर्णतया पाश्चात्य था, क्योंकि इन चित्रों की रचना जीवित व्यक्तियों को चित्र की विभिन्न आकृतियों (पात्रों) के स्थान पर नाटक जैसे रंगमंच पर व्यवस्थित करके उनसे की गई है। 

इन जीवित व्यक्तियों या माडलों से चित्रों का यथार्थ पद्धति में छाया प्रकाश की पूर्णता, शारीरिक गठन, माँस-पेशियों की सुडौलता तथा नाटकीयता का पूर्ण ध्यान रखते हुए अनुकरण पद्धति पर अंकन किया गया है। 

इन चित्रों में शारीरिक बनावट सुंदर है और माँस-पेशियों की सुडौलता पर विशेष ध्यान दिया गया है। परन्तु इन चित्रों में धार्मिक भावना का प्रादुर्भाव न हो सका और ये चित्र साधारण स्थूल जगत की झाँकी मात्र बनकर रह गए।

राजा रविवर्मा के चित्रों की आनंद कुमारस्वामी ने कटु आलोचना की है। उन्होंने लिखा है कि ‘रविवर्मा के चित्र नाटकीय हैं। रविवर्मा के चित्रों का तत्कालीन रंगमंच से स्पष्ट सम्बन्ध था और इसके अनेक कारण थे। 

रविवर्मा ने स्वयं कहा था कि-‘उन्होंने प्राचीन पौराणिक वेश-भूषाओं की खोज की थी और इसके लिए वे उत्तर भारत में राम तथा कृष्ण के पावन तीर्थधामों का पर्यटन करने भी गये। 

परन्तु अधिक सफलता न देख उन्होंने तत्कालीन लोक जीवन तथा उस समय की प्रचलित नाटक मण्डलियों (पारसी नाटक कम्पनियों) से प्रेरणा ग्रहण की और उसी के आधार पर उन्होंने देवी-देवताओं के पौराणिक रूप को चित्रों में प्रस्तुत किया। 

राजा रविवर्मा ने चित्रकला के इस नवजागरण में अकेले ही व्यक्तिगत रूप से प्रयास किया। परन्तु कालान्तर में जो कला जागरण की चेतना दिखाई पड़ी, उसमें सामूहिक जनभावना स्वाधीनता संघर्ष और राष्ट्रीय जागरण के आंदोलन की अखिल भारतीय चेतना निहित थी।

इसी समय में राजा रविवर्मा के समसामयिक चित्रकारों में रामास्वामी नायडू को बहुत प्रसिद्धि प्राप्त हुई। रामास्वामी ने भी बड़े आकार के तैल चित्रों का निर्माण किया। भारतीय चित्रकला का व्यवसाय समाप्त हो रहा था और चित्रकार अपने व्यवसाय को छोड़कर दूसरे क्षेत्रों में लगते जा रहे थे। 

दूसरी ओर विदेशी शासक अपनी संस्कृति को पैठाने के लिए कला प्रशिक्षण हेतु आर्ट स्कूलों की स्थापना कर रहे थे। इन आर्ट स्कूलों में भारतीय विद्यार्थियों को पाश्चात्य शैली पर चित्रकला का अभ्यास कराया जाता था। 

यूरोप के केसिंग्टन स्कूल की शिक्षा पद्धति इन स्कूलों में प्रचलित थी। यहाँ पर विद्यार्थी स्टिल लाइफ (पदार्थ चित्रण), पोरट्रेट (मुखाकृति चित्रण) तथा लैंडस्केप (दृश्य चित्रण) का चित्रण कार्य यथार्थ शैली में करते थे, परन्तु उनके कार्य में कोई प्रगति नहीं हो रही थी, और उनके लिए छाया तथा प्रकाश का प्रभाव समझना एक समस्या थी। अतः इन आर्ट स्कूलों में भारतीय छात्रों का व्यर्थ ही समय नष्ट हो रहा था। 

इसी समय कलकत्ता, बम्बई (मुम्बई), लाहोर और मद्रास में आर्ट स्कूलों की स्थापना हो चुकी थी इन स्कूलों में साधारण स्तर के यूरोपियन अध्यापकों के द्वारा कला शिक्षा प्रदान की जाती थी। 

इन सरकारी आर्ट स्कूलों के विद्यार्थियों ने किसी भी ऐसी उच्च कृति का सृजन नहीं किया जिसे महान कहा जा सके। १९०२-१९०३ ई० में दिल्ली में इन स्कूलों के विद्यार्थियों के अनेक तेल तथा जल रंगों से बने चित्रों की प्रदर्शनी की गई परन्तु इन चित्रों में कोई भी कलात्मक उपलब्धि नहीं थी। 

ये चित्र यूरोपियन शैली के अनुकरण पर बनाये गए थे। इस प्रदर्शनी के चित्रों के विषय में कलकत्ता आर्ट स्कूल के भूतपूर्व प्रिंसिपल परसी ब्राउन ने सर जार्ज बाट द्वारा सम्पादित पुस्तक ‘इंडियन आर्ट एट दिल्ली’ में अपनी सम्मति इस प्रकार प्रकट की- “ये चित्र अत्यन्त भद्दे और कर्कश थे, इनका रेखांकन त्रुटिपूर्ण था और शैली तथा रंग की दृष्टि से ये चित्र अकुशल कलाकारों की कृतियों जैसे थे।”

बीसवीं शताब्दी के प्रथम चरण में अंग्रेज शासकों ने विक्टोरियाकालीन विदेशी चित्रकला का भारत में बीजारोपण करने की अथक चेष्टा की, परन्तु यह कला वृक्ष विकसित न हो सका। इस समय भारतीय चित्रकला का पूर्णतः हास हो चुका था और शासक वर्ग के द्वारा अंग्रेज़ी संस्कृति तथा कला रोपने के प्रयत्न हो रहे थे। 

आनंद कुमार स्वामी ने अपने देश की कला विलुप्ति के लिए ‘अधिकांश तथाकथित अंग्रेजी शिक्षा के द्वारा उत्पन्न रुचियों के परिणाम को कला विलुप्ति के लिए उत्तरदायी बताया है, यूरोपियन कला का अनुसरण हमारे देश की कला को जीवन प्रदान न कर सका।’ 

प्रायः ऐसा देखा गया है कि दो संस्कृतियों के संसर्ग में दोनों में ही आदान-प्रदान होता है और दोनों संस्कृतियाँ एक-दूसरे से परस्पर कुछ ग्रहण करती हैं और कला प्रतिभा एक नवीन पथ प्रशस्त करती है। 

उस समय देश की अवस्था ऐसी थी कि एक ओर अंग्रेज़ शासक प्रभुता के हठ में थे, और दूसरी ओर भारतवासी दासता, दरिद्रता और हीनता से उत्पन्न उदासीनता में रहने के कारण सांस्कृतिक आदान-प्रदान करने के लिए उन्मुख न हुए और उनमें स्वाधीनता प्राप्ति तथा राष्ट्रीयता की भावना जाग रही थी। 

इस प्रकार कला एक कुंठित अवस्था की द्योतक मात्र ही रह गई। यह स्तब्धता की स्थिति राजनीति, समाज, शिक्षा, कला तथा विश्वास सभी क्षेत्रों में थी। इस प्रकार की स्थिति बहुत समय तक नहीं चल सकती थी। यदि संस्कृति का समन्वय सम्भव न था तो विद्रोह निश्चित था। भारतीय कला ने इस भावना के नवजागरण का रूप ग्रहण किया और पुनः कला-विकास की नवीन आशाओं का सूत्रपात हुआ।

कला का पुनरुत्थान

ई० बी० हैवेल-हैवेल सन् १८८४ ई० में सर्वप्रथम मद्रास कला विद्यालय के प्राचार्य बने । १८६६ ई० में उन्होंने संसार का ध्यान भारतीय कला की ओर आकर्षित किया। 

भारतीय कला और संस्कृति के जागरण की ओर जब भारतीय जनता का ध्यान आकर्षित हो रहा था, उसी समय कलकत्ता आर्ट स्कूल के प्रिंसिपल के रूप में हैवेल आये। ई० वी० हैवेल के सहयोग से बंगाल में एक नवीन कला आंदोलन आरम्भ हुआ। 

हेवेल ने बंगाली विद्यार्थियों को केवल विदेशी-रीतियों पर कला सिखाने की त्रुटि को समझा और उन्होंने भारतीय जीवन और आदर्श से पूर्ण मुगल तथा राजपूत कला की ओर ध्यान दिया। 

हैवेल ने यूरोपियन चित्रों की नकल बनवाने की प्रथा को उचित न समझा। किन्तु इस प्रकार अंग्रेज़ प्रिंसिपल के द्वारा भारतीय कला पर जोर देने की बात को बंगाल की जनता ने रहस्यपूर्ण माना और बंगाल की जनता ने उनके इस आंदोलन के प्रति एक क्षोभ और प्रतिक्रिया प्रदर्शित की। 

अनेक बंगला पत्र-पत्रिकाओं में इस आशय के लेख प्रकाशित हुए कि अंग्रेज़ अपनी कला भारतीय को नहीं सिखाना चाहते। इस प्रकार बंगाल की जनता में इस नवीन शिक्षण पद्धति के प्रति अत्यन्त रोष फैला।

इसी समय में हेवेल ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों से यूरोपियन चित्रों के संग्रह के स्थान पर उत्कृष्ट भारतीय चित्रों के संग्रह को तैयार करवाने की अनुमति प्राप्त की। संयोगवश हैवेल की भेंट प्रसिद्ध टैगोर परिवार के चित्रकार अवनीन्द्रनाथ टैगोर से हुई और उन्होंने टैगोर की सहायता से भारतीय चित्रकला की कक्षाएं कलकत्ता आर्ट स्कूल में प्रारम्भ की और टैगोर को इन कक्षाओं का अध्यक्ष बना दिया गया। 

यहाँ पर ही अवनीन्द्रनाथ ने हैवेल महोदय की देख-रेख में भारतीय शैली में स्वयं भी अनेक प्रयोग किए और ‘बुद्ध जन्म’, ‘युद्ध तथा सुजाता’, ‘ताजमहल का निर्माण’, ‘शाहजहाँ की मृत्यु’ आदि सफल चित्रों का निर्माण किया। अवनीन्द्रनाथ टैगोर अवनीन्द्रनाथ टैगोर का जन्म १८७१ ई० में जोरासांकू गाँव के ठाकुर परिवार में जन्माष्टमी के दिन हुआ। 

अवनीन्द्रनाथ ठाकुर ने भारतीय चित्रकला की परम्परा के टूटे धागे जोड़ना आरम्भ किये। उन्होंने हेवेल की सूझबूझ के अनुसार भारतीय कला के उत्थान के लिए देश की प्राचीन चित्रकला को आधारशिला मानकर आगे बढ़ाने का प्रयास किया। 

उन्होंने अपने चित्रों में भारतीय आध्यात्मवाद, काव्य-सौष्ठव तथा पूर्वी देशों की विचारधारा को प्रतिध्वनित करने की चेष्टा की इस प्रकार आधुनिक भारतीय चित्रकला के पुनः जागरण का आंदोलन कलकत्ता आर्ट स्कूल के प्रिंसिपल हैवेल महोदय के सतत् प्रयत्नों से आरम्भ हुआ और अवनीन्द्रनाथ ठाकुर इस आंदोलन के कर्णधार बने कुमारस्वामी ने आधुनिक कला के विषय में उल्लेख देते हुए इस प्रकार लिखा है कि- ‘कलकत्ता के भारतीय चित्रकारों के आधुनिक स्कूल का कार्य पुनः राष्ट्रीय जागृति का एक पक्ष है।’

अवनीन्द्रनाथ ने अपने प्रारम्भिक वर्षों में पुरोपियन शैली के तेल चित्र बनाने का अभ्यास किया था और उन्होंने अपने युवाकाल में इटेलियन चित्रकार गिलहार्डी से विधिवत तेल चित्रण की शिक्षा ग्रहण की थी। 

कालान्तर में उन्होंने हेवल के सहयोग से समझा कि स्वदेशी परम्परा के आधार पर ही कला-जागरण को अग्रसर करना उचित होगा और भविष्य में इस जागृति के अनेक कला आदर्श स्थापित होने की संभावना है। 

इस निश्चय से ही उन्होंने उत्साह और लगन के साथ हैवेल के विचारों को कार्यान्वित करने का प्रयास किया और वे जनता के समक्ष आए। हैवेल का विश्वास- ‘भारतीय कला जीवंत एवं मौलिक है’ ने अवनीन्द्र बाबू को बल प्रदान किया। इस प्रकार हैवेल ने जिन सिद्धान्तों को प्रस्तुत किया उनको टैगोर के द्वारा प्रयोगात्मक रूप मिला। 

उन दिनों जनता के हृदय में इस प्रकार की एकमात्र अवस्था घर कर गई थी कि यूरोप से ही केवल कला प्रेरणा प्राप्त हो सकती है। अतः कला अभ्यासियों ने और बंगला समाचार-पत्रों ने इस कला उत्थान के कार्यक्रम का विरोध किया। परन्तु इन प्रतिक्रियाओं से टैगोर तथा हैवेल को बल मिला।

अवनीन्द्रनाथ ने लगभग १८६१ ई० में चित्रकला का नियमित अभ्यास किया। रवीन्द्रनाथ टैगोर के निमंत्रण पर उन्होंने शांतिनिकेतन में १६२० ई० से कला भवन में अध्यक्ष पद संभाला और १६४१ ई० में अपने चाचा ‘विश्व कवि रवीन्द्रनाथ के महापुराण’ का चित्रण करने के पश्चात्उ न्होंने अपनी तूलिका को त्याग दिया। 

किसी भी महान चित्रकार के लिए यह सम्भव नहीं कि वह जीवनभर एक ही लीक पर चलता रहे, फिर अवनीन्द्रनाथ जैसे कलाकार के लिए, जो नवीन प्रयोगों के लिए जागरूक थे, यह कब सम्भव था कि वे एक ही पथ पर चलते रहते। 

उनकी कृतियों में शैली की इतनी विविधता है कि कभी-कभी उनको एक ही चित्रकार की कृति मानने में संशय सा प्रतीत होता है जिस प्रकार उन्होंने भिन्न-भिन्न माध्यमों से चित्रों का निर्माण किया उसी प्रकार उनके चित्रों की विषय-सामग्री में भी विविधता है। उन्होंने शबीहें, प्राकृतिक दृश्य, जन-जीवन, लोक पर्व तथा इतिहास और पुराण की अनेक कथाओं का अंकन किया है। 

उनके बनाये ‘उमर खैय्याम’, ‘मेघदूत’ तथा ‘अलिफलेला’ के चित्रों में शैली का पर्याप्त अंतर है। ‘भारतमाता’, ‘तिष्यरक्षिता का हुम झड’, ‘गणेश जननी’, ‘महापुराण’ आदि उनकी प्रसिद्ध है। रचनाएँ हैं। उनकी कृतियों में असंदिग्ध रूप से जापानी, चीनी, फारसी, यूरोपीय और तदुपरान्त भारतीय चित्रकला का सम्मिश्रण है, परन्तु सर्वोपरि उनके समन्वयवादी व्यक्तित्व की छाप है। 

स्टेला क्रेमरिश ने इस प्रकार लिखा है कि अवनीन्द्रनाथ ठाकुर की कला उनके व्यक्तिगत अधिकार पर आधारित है। अवनीन्द्रनाथ की शैली की बंगाल में कटु आलोचना हुई और यह कहा गया कि उनके चित्रों में चीनी रेखा तथा जापानी ‘वाश टेकनीक का अनुकरण

बंगाल स्कूल का प्रचार

राजा रविवर्मा के कला विकास सम्बन्धी आंदोलन के पश्चात् आधुनिक चित्रकला के जिस नवीन आंदोलन का सूत्रपात हुआ उसके प्रवर्तक स्व० हेवेल, डॉ० आनंद कुमारस्वामी, स्व० रामानंद चटर्जी, स्व० अर्धेन्दु कुमार गांगुली, स्व० अवनीन्द्रनाथ ठाकुर थे। 

आधुनिक चित्रकला के जन्म की एक कहानी ‘बंगाल स्कूल’ के उपरोक्त आंदोलन से आरम्भ हो भारतीय स्वतंत्रता के साथ पूर्णता समाप्त हो गई। 

इस पुनः जागरण और कला उत्थान के आंदोलन को अग्रसर करने में अवनीन्द्रनाथ का योगदान कलाकार के रूप में ही नहीं बल्कि एक शिक्षक तथा प्रचारक के रूप में भी है। 

हेवेल तथा अवनीन्द्र नाथ ने अपने प्रयत्नों से विद्यार्थियों का एक छोटा दल बना लिया जिसमें उल्लेखनीय चित्रकार स्वर्गीय सुरेन्द्रनाथ गांगुली, एस० एन० गुप्ता, स्व० नन्दलाल वसु, हकीम मुहम्मद खान, के० बेकटप्पा (मैसूर), शलेन्द्र डे, समी-उज़ जमा, स्व० असित कुमार हाल्दर (लखनऊ), समरेन्द्रनाथ (पंजाब), उकील (दिल्ली), देवी प्रसाद राय चौधरी (मद्रास), पुलिन बिहारी दत्त (बम्बई) तथा स्व० वीरेश्वर सेन (लखनऊ) आदि थे। 

इस नवीन स्कूल को ‘ओरियन्टल आर्ट सोसायटी’, जिसकी स्थापना स्व० गगनेन्द्रनाथ टैगोर ने १६०७ ई० में की थी, ने बहुत प्रोत्साहन प्रदान किया। इस सोसायटी के प्रथम सभापति सम्मानीय किचनेर और सर जान बुहरोफी थे। सम्मानीय मि० जस्टिस होल्मवुड, श्रीमती एन० विलन्ट, स्काट ओ० केमर, ओ० सी० गांगुली, परसी ब्राउन, थार्नटोन तथा जे०पी० मूलर इस सोसाइटी के सदस्य थे, जिन्होंने इस आंदोलन को चलाया और प्रसार में सहयोग दिया। 

इसी प्रकार अंग्रेज़ी सरकार के द्वारा प्रचार हेतु एक अन्य समिति ‘इंडियन सोसायटी’ लंदन में स्थापित की गई। इन सोसायटियों के सहयोग से इस दल की प्रदर्शनी भारत तथा अन्य स्थानों में आयोजित की गई।

साधन 

अवनीन्द्रनाथ ने प्राचीन चित्र परम्परा और तकनीकी साधनों को प्राप्त करने के लिए परम्परागत चित्रकारों को बुलाया। सर्वप्रथम उनकी भेंट पटना के चित्रकार लाना ईश्वरी प्रसाद से हुई। वे कांगड़ा शैली के एक वंश परम्परागत चित्रकार थे। इनके प्रशिक्षण से इस नवीन स्कूल के चित्रकारों ने कला की प्राचीन विशेषताओं को जाना।

भारतीय कला के अध्ययन हेतु यह दल अजन्ता, बाघ तथा अन्य कला तीथों में भ्रमण करने गया जिससे इस दल के चित्रकारों ने अपने देश की कला का स्वरूप पहचाना। इन चित्रकारों ने अनेक प्राचीन चित्रों की अनुकृतियाँ भी बनायीं।

इसी समय में अवनीन्वनाथ मे भित्तिचित्रण की तकनीकी के प्रयोग करने के लिए जयपुर से व्यवसायी भित्तिचितेरों को बुलाकर भित्तिचित्रों के प्रयोग भी किये जिनके परिणामस्वरूप आज भी कलकत्ता आर्ट स्कूल में दीवारों पर ‘कच और देवयानी’ के चित्र दिखाई पड़ते हैं। 

इस स्कूल के कलाकारों ने विभिन्न शैलियों में चित्र बनाये अवनीन्द्रनाथ ने स्वयं चीनी कला की रेखा, जापान की रंग बहाने की पद्धति (बाश टेकनीक) से प्रेरणा ग्रहण की और उनकी आरम्भिक कृतियों में यह विदेशी प्रभाव अधिक बलवती है। 

१९०१-०२ के लगभग अवनीन्द्रनाथ जापानी कलाकारों मोकाहमा तेकवान और हिसिया के सम्पर्क में आये और इस सम्पर्क का उन्होंने पूरा लाभ उठाया।

प्रसार 

बंगाल से इस प्रकार एक नवीन कला- जागरण की लहर तो फैली परन्तु इसकी कदाचित कल्पना नहीं की जा सकती थी कि आगामी वर्षों में इसका विस्तार होगा। इस नवीन जागरण के साथ ही भारतीयता और नितान्त भारतीयता पर अधिक बल दिया जाने लगा जो सदैव आलोचना का एक विषय रहा है। 

परन्तु ज्यों-ज्यों देश में कला विद्यालयों की स्थापना होती गई और कला शिक्षकों की माँग होती गई त्यों-त्यों इस स्कूल का प्रसार होता गया। इस स्कूल को अंग्रेज़ी सरकार ने भी विशेष प्रोत्साहन और संरक्षण प्रदान किया। 

अंग्रेज़ी सरकार ने बंगाल स्कूल के कई चित्रकारों को प्रिंसिपल या शिक्षक नियुक्त करके विभिन्न प्रान्तों के आर्ट स्कूलों में भेजा जहाँ-जहाँ बंगाल स्कूल के चित्रकार पहुँचे वहाँ-वहाँ अपना कार्यक्षेत्र बनाते गए परन्तु शीघ्र ही इनकी कला कुछ सीमाओं में जकड़ने लगी और लोक पीटने की परम्परा दिखाई पड़ने लगी। 

बंगाल स्कूल के जो चित्रकार इधर-उधर गये उनमें कुछ चित्रकारों के नाम उल्लेखनीय हैं स्वर्गीय नंदलाल वसु शांति निकेतन में कला विभाग के अध्यक्ष रहे। स्वर्गीय असित कुमार हाल्दर और सोमेंद्रनाथ गुप्त ने क्रमशः लखनऊ और लाहौर के सरकारी आर्ट स्कूलों में अध्यक्ष पद को ग्रहण किया। 

वेंकटप्पा मैसूर और शैलेन्द्रनाथ हे जरपुर कला विद्यालयों में स्थापित हुए। इसी प्रकार देवी प्रसाद राय चौधरी मद्रास के सरकारी आर्ट स्कूलों में अध्यक्ष बने। स्वर्गीय शारदाचरण उकील ने दिल्ली में शिक्षण आरम्भ कर दिया और क्षितेन्द्र मजूमदार इलाहाबाद विश्वविद्यालय की रुचिकता’ में चित्रकला का प्रशिक्षण करते रहे। 

इस प्रकार अनेक अन्य चित्रकार भी प्रसार कार्य करते रहे। इन चित्रकारों ने विभिन्न प्रान्तों में जाकर कुछ समय तक कला जागृति को आगे बढ़ाने की चेष्टा की परन्तु बंगाल स्कूल की निर्बलताओं के कारण और समय की परिवर्तनशीलता के कारण यह स्कूल अधिक समय तक जीवित न रह सका और तीसरी संतति के आते आते दम तोड़कर समाप्त हो गया अवनीन्द्रनाथ को १६५१ ई० में अपने स्वर्गवास से पहले ही इस आंदोलन की दुर्दशा देखनी पड़ी।

रविशंकर रावल का आंदोलन- बंगाल शैली के चित्रकार गुजरात में नहीं पहुँच सके। गुजरात में एक प्रतिभावान चित्रकार और शिक्षक श्री रविशंकर रावल ने इस युग जन-जागरण के की कला को अपनी- -सूझबूझ और कला कुशलता से एक नवीन रूप प्रदान किया। श्री रावल ने अपना दल अलग संगठित किया और उन्होंने भारतीय कला की मूल विशेषताओं को अपनी कला में बाँधने का प्रयास किया है।

बम्बई की कला भारतीय पाश्चात्य रूप- बंगाल स्कूल की कला का बम्बई में किंचित भी प्रभाव नहीं पड़ा। बम्बई में पश्चिमी शैली की प्रधानता बनी रही परन्तु फिर भी बम्बई ने भारतीय कला परम्परा को प्राप्त करने के लिए अजन्ता की कला को एक अधिक शक्तिशाली युगीन चेतना के आधार पर नवजीवन प्रदान करने की चेष्टा की, यद्यपि इस प्रयास में पूर्व और पश्चिम की कला का सम्मिश्रण था, परन्तु यह प्रयास अपनी दिशा में एक महत्त्वपूर्ण प्रयोग था पूर्व और पश्चिम के कला सिद्धान्तों का सम्मिश्रण और चिंतन बम्बई की एक अपनी विशेषता रही है बम्बई स्कूल के प्रचार तथा प्रसार साधनों की कमी के कारण कुछ समय तक बम्बई का यह कला आंदोलन बंगाल स्कूल के प्रभाव से दबा रहा, परन्तु शीघ्र ही बम्बई स्कूल की कृतियों ने बंगाल स्कूल को चुनौती दी। 

इस समय से आज तक बम्बई स्कूल चित्रकला का एक शक्तिशाली केन्द्र बना हुआ है। बम्बई स्कूल के योगदान का हम आगे संक्षिप्त विवेचन करेंगे।

बंगाल स्कूल के चित्रों की विशेषताएँ

आनंद कुमारस्वामी ने बंगाल के आधुनिक स्कूल के कलाकारों की कला की समालोचना करते हुए इस प्रकार का उल्लेख दिया था – “कलकत्ता के भारतीय चित्रकारों के आधुनिक स्कूल का कार्य राष्ट्रीय पुनः जागृति का एक पक्ष है, जबकि उन्नीसवीं शताब्दी के समाज सुधारकों की यह इच्छा थी कि वह भारत को इंग्लैंड बना दें, तब बाद के कार्यकर्ता समाज में एक ऐसी अवस्था वापस लाने या बनाने का प्रयत्न कर रहे थे, जिससे भारतीय संस्कृति में अभिव्यक्त और लागू आदशों का अधिक गहराई से मनन किया जा सके।” 

आनंद कुमारस्वामी ने आगे इस स्कूल की विशेषताओं पर प्रकाश डालते हुए इस प्रकार विचार व्यक्त किये” यद्यपि श्री टैगोर और उनके शिष्यों ने भव्य शैली को पूर्णतया प्राप्त नहीं किया है, परन्तु उन्होंने निश्चित ही भारतीय कला की आत्मा को पुनर्जीवन प्रदान किया है, और इसके अतिरिक्त जैसे कि प्रत्येक सच्चे कलाकार की जिज्ञासा होती है कि उसकी कृति में भिन्न प्रकार का निजी सौन्दर्य हो, यह भावना इनकी कृतियों में दिखाई पड़ती है।”

बीसवीं शताब्दी के साथ ही स्वतंत्रता आंदोलन के बीज पनपने लगे थे और इस शताब्दी के प्रथम चतुर्थ भाग में महात्मा गाँधी के स्वतंत्रता आंदोलन की चिंगारी फूट पड़ी। सम्पूर्ण देश में स्वदेश प्रेम और मातृ-भक्ति की भावना के साथ ‘वंदे मातरम्’ की ध्वनि प्रतिध्वनित होने लगी। 

ऐसे समय में बंगाल के कला आंदोलन पर राष्ट्रीय जागृति का प्रभाव स्वाभाविक था। चित्रकार भी देश-प्रेम और स्वतंत्रता की भावना से परिपूरित हो गया था, अतः चित्रकारों ने भारत की प्राचीन गौरवमयी गाथाओं, धार्मिक कथाओं, ऐतिहासिक प्रसंगों, साहित्यिक संसर्गों तथा जन जीवन की झांकियों से अपने चित्र विषयों का चयन किया। 

इस प्रकार चित्रकार ने अपनी देश-प्रेम की भावनाओं और अतीत की भव्य झांकी को अंकित कर पुनः एक ‘सुजला-सुफला मलयम शीतलाम्’ भारती के स्वतंत्र रूप की कामना की।

बंगाल स्कूल के कलाकारों की कृतियों में विदेशी कला

प्रभाव के रूप में जापानी ‘वाश पद्धति के अतिरिक्त पाश्चात्य शैली का यथार्थ रेखांकन और चीनी आलेखन का निश्चित रूप से सम्मिश्रण है। वैसे इस स्कूल की कृतियों में पर्याप्त परिमार्जन, रंगों की कोमलता और भारतीय वस्तुओं के प्रति प्रेम परिलक्षित होता है। 

डॉ० आनंद कुमारस्वामी के अनुसार – “इस स्कूल की कृतियाँ अजन्ता, मुगल तथा राजपूत चित्रों से प्रेरणा लेकर भी स्पष्ट रूप से निर्बल है।”

बंगाल स्कूल के चित्रों की तकनीकी

वाश चित्र बंगाल स्कूल की विशेषता है इस स्कूल के चित्रकारों ने अपने चित्र में ब्रितानी जल रंगों (Water Colours) तथा ब्रितानी व्हाटमैन या स्वेत क्रार्ट्रिज कागज़ का प्रयोग किया है, परन्तु चित्रण विधि में भारतीय, चीनी, जापानी तथा पाश्चात्य प्रणालियों का अनुसरण किया गया है। 

चित्रकार चित्र बनाने के लिए सर्वप्रथम कागज़ पर चित्र की आकृतियों को लाल रंग की रेखाओं से अंकित करता था फिर चित्र को पानी में भिगोकर समतल बोर्ड या पटरे पर सुखाकर चित्र की सीमारेखाओं को स्थायी बना लेता था। 

इस प्रकार सीमारेखा के स्थायीकरण के पश्चात् चित्रकार चित्र के अनेक भागों में रंग भर जाता था और फिर कागज़ को पुनः पानी में डुबोकर सपाट पटरे पर सुखाकर चित्र के रंगों को स्थायी कर लेता था, जिससे कि ऊपर से रंग की सपाट वाश लगाने पर यह रंग कागज़ से न छूट जाएँ। इस क्रिया के पश्चात् इच्छित वातावरण उत्पन्न करने के लिए एक या अनेक रंगों को सम्पूर्ण चित्र के ऊपर पारदर्शी ढंग से बहा दिया जाता था या वाश लगा दी जाती थी इससे सम्पूर्ण चित्र में चिकनापन, धुंधलापन और रंग का एक-सा सपाट प्रभाव आ जाता था। 

परन्तु चित्र में मे रंगत (टोन) आ जाती थी। इसके पश्चात् चित्र की आकृतियों को उभारने के लिए रेखांकन को पुनः कत्थई या किसी अन्य रंग से उभार दिया जाता था साथ ही चित्र के किसी-किसी भाग को पारदर्शी, या सफेद मिश्रित अपारदर्शी (ओपेक) रंग के प्रयोग से आवश्यकतानुसार उभार दिया जाता था। 

साधारणतया अपनी निर्बलता को छुपाने के लिए चित्रकार चित्र के निर्बल या कमजोर भागों को गहरे रंग की बाश के प्रभाव से दबा देता था। आकृतियों में डोल लाने के लिए छाया तथा प्रकाश का भी आवश्यकतानुसार प्रयोग किया गया है।

बंगाल स्कूल की दासोजनक प्रवृत्तियाँ

बंगाल स्कूल के कलाकारों ने कल्पना को अधिक महत्त्व दिया और वे यथार्थता से दूर चले गए। उनकी कृतियों में काल्पनिकता के आधिक्य के कारण आकृतियों की अत्यधिक विकृति होने लगी चित्रकार अनुपातडीन बड़े-बड़े नेत्र पतली लम्बी उंगलियों, छरहरे बदन लम्बी नासिका में अतिशयोक्ति का प्रयोग करने लगे और इस विकृति का चरम उत्कर्ष कल्यान सेन की कृतियों में दिखाई पड़ता है। 

इस प्रकार शीघ्र इस स्कूल की कलाकृतियों में रूढ़िवादिता तथा हास-चिन्ह स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगे और यह कला शैली लगभग एक चौथाई शताब्दी के पश्चात् ही दम तोड़ने लगी और भारतीय चित्रकला में यूरोपियन सम्पर्क के फलस्वरूप नवीन प्रवृत्तियों प्रस्फुटित होने लगीं।

बम्बई स्कूल का योगदान

उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में बम्बई में भारतीय कला के उत्थान के लिए अनेक प्रयत्न किये गए। यद्यपि यह प्रयास पाश्चात्य दृष्टिकोण पर अधिक निर्भर थे और उस समय बंगाल स्कूल की कला के समर्थकों ने इन प्रयासों की आलोचना की, परन्तु आज यह भारत-यूरोपियन मिश्रित कला का समर्थक केन्द्र भारतीय चित्रकला को एक ठोस प्रगति की ओर अग्रसर कर चुका है और समस्त भारतीय चित्रकार कला प्रेरणा हेतु बम्बई की ओर देख रहे हैं।

सर जे० जे० स्कूल आफ आर्ट, बम्बई में जब प्रीफिक्स महोदय प्रिंसिपल के पद पर नियुक्त होकर आए तो उन्होंने अजन्ता के चित्रों के अध्ययन तथा चित्रों की अनुकृतियों को तैयार करने का विस्तृत कार्यक्रम बनाया। 

उन्होंने अपने शिष्यों सहित उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम वर्षों में अजन्ता की प्रतिकृतियाँ तैयार करने का कार्य आरम्भ कर दिया था जिसका अजन्ता के साथ उल्लेख किया जा चुका है। प्रीफिस महोदय ने लगभग तेरह वर्ष तक अजन्ता के चित्रों का गहन अध्ययन किया, परन्तु उनका यह शोध अध्ययन आर्थिक कारणों से आगे न बढ़ सका।

बम्बई के चित्रकारों ने नवीन शताब्दी (बीसवी शताब्दी) के प्रथम चतुर्थ भाग में पाश्चात्य तथा भारतीय शैली के सम्मिश्रण का प्रयास आरम्भ कर दिया। 

सर जे० जे० स्कूल आफ आर्ट, बम्बई के नवीन प्रिंसिपल ग्लेडस्टोन सालोमन की अध्यक्षता में घुरन्दर तथा लालकलां ने इस दिशा में कई महत्त्वपूर्ण प्रयोग किये जो सफल और उल्लेखनीय कहे जा सकते हैं। इन कृतियों में सृजनात्मक शक्ति और सच्ची अनुभूति है। 

ग्लेडस्टोन सालोमन के प्रयासों को स्व० श्री जगन्नाय अहिवासी जैसे कुशल भारतीय चित्रकारों से अधिक बढ़ावा प्राप्त हुआ। श्री अहिवासी सर जे० जे० स्कूल आफ आर्ट, बम्बई में इंडियन कक्षा आर्ट (भारतीय कला की कक्षा) के अध्यापक के रूप में महत्वपूर्ण कार्य करते रहे और वहाँ से अवकाश ग्रहण कर बनारस विश्वविद्यालय वाराणसी में कला विभाग के अध्यक्ष के रूप में कार्य करते रहे हैं।

स्व० श्री अहिवासी की देखरेख में बम्बई के कला अभ्यासी छात्रों ने प्राचीन भारतीय कला शैलियों जैसे अजन्ता, राजपूत तथा कांगड़ा आदि शैलियों का विशेष रूपसे अध्ययन किया और उनकी देखरेख में इन चित्रकारों ने इन शैलियों को अपनी कला का आधार बनाया। 

भारतीय कला के विकासोन्मुख रूप के साथ बम्बई आर्ट स्कूल ने पाश्चात्य शैली का भी अति उत्तम रूप विकसित किया। 

अनेक चित्रकारों ने यथार्थ शैली में पाश्चात्य ढंग से दृश्य-चित्रण, पदार्थ-चित्रण, व्यक्ति-चित्रण (पोरट्रेट), इतरेखांकन (स्केचिंग) तथा स्मृति-चित्रण में प्रगति की। इस स्कूल के चित्रकारों ने टेम्परा तथा तैल चित्रण की पाश्चात्य पद्धति पर अधिक बल दिया और सर्वोत्कृष्ट कृतियाँ प्रस्तुत कीं।

नूतन प्रवृत्तियाँ

यद्यपि आधुनिक युग के अन्तर्गत अवनीन्द्रनाथ तथा नन्दलाल बसु दोनों ही व्यक्ति आ जाते हैं, फिर भी वे एक विगत परम्परागत कला के समर्थक या उद्धारक ही कहे जा सकते हैं, वास्तव में यह परम्परागत कला या एकेडमीवाद की जो नवीन पाश्चात्य धारा चली वह कला के आदर्श रूप और पाश्चात्यपन की प्रभावशाली समस्याओं को नहीं सुलझा सकी। 

इस आंदोलन में दो विरोधी प्रवृत्तियाँ प्रवाहित हो रही थीं इस कारण कलाकार कभी एक ओर झुक जाते थे और कभी दूसरी ओर इस आंदोलन की नीरसता तथा निर्बलता ने युवा कलाकारों को एक अन्य दिशा की ओर अग्रसर होने के लिए विवश किया। नवोदित चित्रकारों ने जन-रुचि की अवहेलना न कर कला को जनसुलभ और सामान्य बनाने का प्रयत्न किया। 

कला क्षेत्र में विडम्बना की यह स्थिति रवीन्द्रनाथ ठाकुर की चित्र-कृतियों के समय तक ज्यों की त्यों बनी रही। इसी समय यामिनीराय भी एक आधुनिक चित्रकार के रूप में प्रतिक्रियावादी बनकर कला जागरण के क्षेत्र में आये वामिनीराय ने लोककला के आधार पर भारतीय कला को नवीन जीवन प्रदान करने की नूतन चेष्टा की।

इस नवीन प्रतिक्रिया के फलस्वरूप कलाकारों को ऐकेडेमीवाद से हटकर अपनी नूतन प्रवृत्तियों को दिखाने का अवसर प्राप्त हुआ। 

लोक-साहित्य, लोक-कला, सरल भक्ति सम्प्रदाय, कृषकों तथा नाविकों के घरों की कला तथा गीतों, कबीर, दादू तथा अन्य लोकप्रिय रहस्यवादी संतों की वाणी ने कलाकारों में सरल और सुलभ आकृतियों के निर्माण की चेतना को प्रोत्साहन दिया। 

१६४० ई० तक मान्यताएँ बदल गई और नूतनवादी कलाकृतियों की प्रदर्शनियाँ कलकत्ता में मान्यता प्राप्त करने लगीं।

यामिनीराय  

यामिनीराय का जन्म ग्राम वेतियातोर जिला बांकुड़ा (पश्चिमी बंगाल) में १८८७ ई० में हुआ। यामिनीराय सोलह वर्ष की अवस्था में कलकत्ता आये और उन्होंने गवर्नमेंट आर्ट स्कूल से कला का प्रशिक्षण समाप्त कर आरम्भ में पाश्चात्य शैली में चित्र बनाये। उनको शबीहकार के रूप में ख्याति प्राप्त हुई, परन्तु बाद में उन पर बंगाल स्कूल का प्रभाव भी पड़ा।

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