आदिकाल की चित्रकला | Ancient Art

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(गुहाओं, कंदराओं, शिलाश्रयों की चित्रकला) (३०,००० ई० पू० से ५० ई० तक)

चित्रकला का उद्गम | Origin of Painting

चित्रकला का इतिहास उतना ही पुराना कहा जा सकता है, जितना मानव का इतिहास। मनुष्य ने जिस समय प्रकृति की गोद में नेत्रोन्मीलन किया उस समय से ही उसने निर्माण के तारतम्य से अपने जीवन को सुखी तथा समृद्ध बनाने की चेष्टा की और इस निर्माण कार्य के फलस्वरूप उसने ऐसी कृतियों का सृजन किया जो उसके जीवन को सुखद और सुचारु बना सकें।

इसी समय से मनुष्य की ललित भावना भी जाग उठी और उसने अपनी मूक भावनाओं को अनगढ़ पत्थरों के यन्त्रों तथा तूलिका से बनी टेढ़ी-मेढ़ी रेखा-कृतियों के रूप में गुहाओं (गुफाओं) और चट्टानों की भित्तियों पर अंकित कर दिया।

उसके जीवन की कोमलतम भावनायें तथा संघर्षमय जीवन की सजीव झाँकियाँ आदि मानव की कला कृतियों के रूप में आज भी सुरक्षित हैं।

आदिकाल से आज तक मनुष्य रेखा तथा आकार, तक्षण तथा कर्षण के द्वारा अपनी भावनाओं को व्यक्त करता चला आ रहा है।

मानव ने रेखा और आकार के माध्यम से अपनी प्रगति, आत्मा और युग का सदैव स्वागत तथा चित्रांकन किया है। इन असंख्य चित्राकृतियों के आधार पर चित्रकला की आज एक निश्चित परिभाषा निर्धारित हो चुकी है।

चित्रकला की परिभाषा | Definition of Art

"किसी समतल धरातल जैसे भित्ति, काष्ठ-फलक आदि पर रंग तथा रेखाओं की सहायता से लम्बाई, चौड़ाई, गोलाई तथा ऊँचाई को अंकित कर किसी रूप का आभास कराना चित्रकला है।"

मानव की उत्पत्ति और विकास-क्रम | Origin and Evolution of Human

चित्रकला के इतिहास का अध्ययन करने से पूर्व मानव का विकास-क्रम भी देखना आवश्यक है। इस अध्ययन से आदिमानव की कलाकृतियों के काल-क्रम का अनुमान लगाया जा सकता है।

जीव-वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी पर सर्वप्रथम एक कोष्ठक जीव ही थे और उनसे ही मनुष्य का विकास हुआ जीव का यह विकास क्रम चार भागों में विभाजित किया जा सकता है, जो इस प्रकार है

  • एज़ोईक कल्प
  • पैलोज़ोइक कल्प
  • मेसोज़ोईक कल्प
  • सिनोज़ोइक कल्प

(१) एज़ोईक युग या कल्प

इस युग में पृथ्वी पर एक कोष्ठक जैव ही था। यह जैव आज से लगभग एक अरब पचास करोड़ वर्ष पूर्व पृथ्वी पर विकसित हुआ।

(२) पैलोजोईक युग या कल्प

इस युग में जीव सर्वप्रथम अकशेरुकी (Invertebrates) प्राणियों जैसे सिवार, स्पन्ज या जैली मछली तथा रेंगने वाले जीवधारियों, पक्षियों तथा विशालकाय वृक्षों और जंगलों के रूप में विकसित हुआ।

(३) मेसोजोईक युग या कल्प

इस युग में कशेरुकी जीवों का विकास हुआ जिन्हें (Reptiles ) सरीसृप माना जाता है।

(४) सिनोजोइक युग या कल्प

इस युग में आज जैसे जीव का विकास हुआ जिससे विभिन्न प्रकार के स्तनधारी उत्पन्न हुए। इन स्तनधारी जीवों के विकास के साथ मनुष्य का विकास भी हुआ। मनुष्य की उत्पत्ति आज से लगभग २०,००,००० वर्ष पूर्व मानी जाती है।

इस समय मनुष्य अनुमानतः वनमानुषाकार रहा होगा। इसी वनमानुषाकार अवस्था से मानव ने आज जैसे मनुष्य का रूप लिया है और यही सृष्टि के विकास का चरमोत्कर्ष और अंतिम चरण है।

भारतवर्ष का आदि रूप

भूगर्भ वेत्ताओं की खोजों के आधार पर भारत के उपद्वीप का रूप आज जैसा न था, बल्कि केवल दक्षिणी भारत कई द्वीपों का एक समूह था जो भूगर्भवेत्ताओं के द्वारा ‘गोंडवाना’ के नाम से पुकारा गया है।

यह प्रायद्वीप दक्षिणी अफ्रीका, आस्ट्रेलिया तथा दक्षिणी अमेरिका तक फैला हुआ था। इन सब द्वीपों से प्राप्त अश्मीभूत वनस्पति और पशुओं के अवशेषों या फासिलस में साम्य से भी ऐसा ही ज्ञान प्राप्त होता है।

आदिकाल के मानव की चित्रकला | Ancient Human Art or Painting

भारत की आदिकालीन चित्रकला का अध्ययन करने के लिए हम इस काल को तीन भागों में विभाजित कर सकते है

  • प्रागैतिहासिक काल
  • वैदिक काल
  • पूर्व-बौद्ध काल

प्रागैतिहासिक काल | Prehistoric Age

मनुष्य ने पृथ्वी पर जन्म लेने के पश्चात् अपनी असहाय स्थिति को देखा। प्रकृति की महान शक्तियों के सम्मुख उसकी नगण्य चेतना जाग्रत हुई और उसने उदर की क्षुधा शान्त करने के लिए, शरीर को शीत, ताप और वर्षा से सुरक्षित रखने के लिए तथा भयंकर पशुओं से अपनी सुरक्षा करने हेतु नाना सुरक्षात्मक प्रयत्न किये।

उसने इस काल (छः लाख वर्ष ई० पू०) में पाषाण के औज़ार तथा हथियार बनाये जिनसे वह आखेट करके उदरक्षुधा की पूर्ति तथा अपने शरीर की सुरक्षा कर सके।

हजारों वर्ष बाद इसी विकास-क्रम में आगे चलकर उसने सुरक्षा के लिये गुहाओं की शरण ली। उसने अपने जीवन की कोमल भावनाओं में आखेट की गति और पशुओं की मनोहारी छवि का अनुभव किया, जिसको उसने रंगों से सनी तुलिका तथा टांकी या नुकीले पत्थर से गुफाओं तथा चट्टानों की कठोर भित्तियों या समतल शिलाओं पर उकेर कर रख दिया।

इस प्रकार उसने अपने जीवन के मधुर तथा विषादमय क्षणों को अमर बना दिया। उसने पर्वतों की गुहाओं तथा कंदराओं को अपना निवास बनाया और अनगढ़ प्रस्तर खण्डों को काटकर उसने आखेट के लिये उपयोगी हथियार बनाये इन कंदराओं को गर्म और प्रकाशित करने के लिये उसने पशु की चर्बी तथा लकड़ी को जलाया।

उसने इन गुफाओं के भीतर धूमिल प्रकाश में अपने जीवन की सरस तथा सरल अभिव्यक्ति तूलिका के माध्यम से गुफाओं की खुरदुरी दीवारों तथा फर्श पर चित्र बनाकर अंकित कर दी। इस समय मनुष्य ने विशेष रूप से पाषाण, लकड़ी तथा मिट्टी का ही प्रयोग किया, इस कारण इस काल को विद्वानों ने ‘पाषाण युग’ के नाम से पुकारा है।

मानव की प्रगति के आधार पर पाषाण युग को तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है

  • (१) पूर्व पाषाण युग या पुरा प्रस्तर युग (Paleolithic Age or Mesolithic Age)- ३०,००० ई० पू० से २५,००० ई० पू० तक
  • (२) मध्य-पाषाण युग का मध्य प्रस्तर युग (Middle Stone Age or Mesolithic Age) – २५,००० ई० पू० से १०,००० ई० पू० तक।
  • (३) उत्तर-पाषाण युग या नव प्रस्तर युग (Neolithic Age ) – १०,००० ई० पू० से ५,००० ई० पू० या ३००० ई० पू० तक।

(१) पूर्व पाषाण युग

इस युग के अवशेष विशेष रूप से औज़ारों तथा हथियारों आदि के रूप में मिलते हैं, जिनमें असंयत गढ़न है तथा आकार भद्दे हैं। यह प्राचीन अवशेष प्रायः पशुओं की अश्मीभूत अस्थियों के साथ प्राप्त हुए हैं।

इस युग के अवशेष भारतवर्ष में बहुत कम प्राप्त हुए हैं और जो भी उदाहरण उपलब्ध हैं, वो अधिकांश दक्षिणी भारत के क्षेत्रों से प्राप्त हुए हैं। भूगर्भ शास्त्रियों के अनुसार दक्षिणी भारत ही देश का सबसे प्राचीन भाग है। इस समय का मनुष्य क्वर्टी ज़ाइट (Quartizite) मनुष्य के नाम से पुकारा गया है।

बहुत से वज़ाइट यंत्र मद्रास सिटी (चेन्नई), गुंटूर जिले के अंगोला और कुडापा नामक स्थानों में प्राप्त हुए हैं। इस युग को विद्वानों ने तीस हजार से पच्चीस हजार वर्ष ईसा पूर्व का माना है।

भारत में पूर्व पाषाण युग की चित्रकला के उदाहरण अभी प्राप्त नहीं हुए हैं। पूर्व पाषाण युग का मानव दक्षिणी भारत में मद्रास सिटी (चेन्नई) के पास, चिंगलेपुत, अंगोला तथा कुडापा क्षेत्र तक सीमित रहा।

(२) मध्य पाषाण युग

इस समय की बहुत कम सामग्री प्राप्त हो सकी है। इस समय के ने ‘पुरा पाषाण युग या पूर्व पाषाण युग के मानव के समान प्रस्तर का ही प्रयोग किया।

(३) उत्तर पाषाण युग

इस युग के अवशेष भी बहुत कम प्राप्त हुए हैं। जो उदाहरण प्राप्त हैं उनमें से अधिकतर बेलारी के आस-पास प्राप्त हुए हैं।

इस युग का पत्थर का गढ़ा हुआ एक गोल यंत्र नर्मदा नदी की घाटी से भी प्राप्त हुआ है और इसके साथ नर्मदा घाटी में दरियाई घोड़े तथा अन्य पशुओं की अश्मीभूत हड्डियों प्राप्त हुई हैं।

इसी प्रकार का एक प्राचीन यंत्र गोदावरी नदी की घाटी से भी प्राप्त हुआ है। बुंदेलखण्ड, आसाम (असम) तथा नागपुर की पहाड़ियों, मिर्जापुर, गाजीपुर तथा विन्ध्यांचल की कैमूर पर्वत श्रेणियों में प्राचीन कला के अवशेष प्राप्त हुए हैं।

पूर्व पाषाण युग का मानव कुडापा तथा मद्रास सिटी (चेन्नई) के क्षेत्र तक सीमित रहा परन्तु उत्तर-पाषाण युग का मानव सारे भारतवर्ष में फैल गया और बेलारी उसका प्रधान केन्द्र बना रहा।

इस समय मानव की यंत्र निर्माण करने की उद्योगशालाएँ दक्षिणी भारत में प्राप्त हुई हैं। इस काल में मनुष्य पत्थरों के यंत्रों पर पालिश करता था और चाक पर बने मिट्टी के बर्तनों का प्रयोग करता था।

कुछ स्थानों पर हिरोजी के टुकड़े, सिल और पत्थर प्राप्त हुए हैं जिन पर हिरोजी को पीसा जाता था। इससे प्रमाणित है कि हिरौंजी का रंग के रूप में प्रयोग किया जाता था।

बेलारी तथा कई अन्य स्थानों में पत्थर पर रेखाओं को खोदकर चित्र बनाये गए हैं। उत्तर-पाषाण युग के मानव ने सर्वप्रथम चित्रकला का प्रयोग किया और आज भी उसकी चित्रकला के उदाहरण विभिन्न स्थानों में सुरक्षित हैं।

भारतवर्ष में उत्तर-पाषाण युग की चित्रकला के उदाहरण

भारत में उत्तर-पाषाण युग की चित्रकला के अनेक स्थानों पर रोचक उदाहरण प्राप्त हुए हैं। इन उदाहरणों से आदिकाल की चित्रकला के विकास क्रम का ही ज्ञान नहीं होता बल्कि आदिमानव के जीवन पर भी यथेष्ठ मात्रा में प्रकाश पड़ता है।

इस युग की चित्रकला के प्रमुख उदाहरण वेलारी, बाईनाड-एडकल’, होशंगाबाद, सिंहनपुर,बुंदेलखण्ड तथा बघेलखण्ड (विन्ध्याचल), मिर्ज़ापुर, रायगढ़, हरनीहरन, बिल्लासरंगम, बुढ़ार, परगना आदि स्थानों में प्राप्त होते हैं।

बिल्लासरंगम

यह गुफा मद्रास राज्य (तमिलनाडु) में स्थित है। अनुमानतः इस गुफा का समय उत्तर-पाषाण युग का आरंभिक चरण है। यहाँ पर कुछ हड्डियों के हथियार प्राप्त हुए हैं। यहाँ पर जादू के प्रचलन के प्रतीक चिन्ह या चित्र अंकित किये गए हैं। स्व० रांगेय राघव ने इस गुफा को नियोलिथिक युग का माना है।’

बेलारी

सर्वप्रथम एफ० फांसेट ने बेलारी के निकट प्राप्त प्रागैतिहासिक चित्राकृतियों का विवरण १८६२ ई० में प्रकाशित किया। पुनः १६०१ ई० में उन्होंने बाईनाड एडकल गुफा-चित्रों का परिचय प्रकाशित किया। दक्षिणी भारत में बेलारी उत्तर-पाषाण युग के मानव का प्रमुख केन्द्र था। यहाँ पर एक गुफा में एक शिकार का दृश्य तथा जादू के विश्वास के अनेक प्रचलित चिन्ह अंकित किये गए हैं। इन चिन्हों में एक छः कोणों का सितारा (षटकोण) उल्लेखनीय है। इन गुफाओं की चित्रकला स्पेन की कोगुल गुफा की आदिम-चित्रकला के समान ही है।

बाईनाड के एडकल

यह स्थान दक्षिणी भारत में स्थित है। यहाँ पर बेलारी के समान ही जादू के विश्वास के अनेक चिन्ह अंकित किये गए हैं। इन चिन्हों में स्वास्तिक चिन्ह, सूर्य के चिन्ह और चौखुटे खाने (चतुष्कोण) लाल और काले रंग से चित्रित किये गए हैं। यह चिन्ह जादू-टोने के प्रतीक हैं। यहाँ पर मनुष्य को सिर पर कुछ पहने हुए चित्रित किया गया है, जो स्पेन के समान है।

हरनीहरन

१८८३ ई० में कार्लाइल ने इस क्षेत्र के गुफा चित्रों का विवरण जनरल आफ एशियाटिक सोसायटी- बंगाल में दिया। मिर्ज़ापुर क्षेत्र में विजयगढ़ दुर्ग के समीप हरनीहरना एक गांव है। यहाँ पर हरनीहरन गुफा में कुछ चित्र प्राप्त हुए हैं। यहाँ पर एक गैंडे का आखेट करते हुए शिकारियों का रोचक चित्र प्राप्त हुआ है। इसी प्रकार के कुछ आखेट चित्र विजयगढ़ के दुर्ग के समीप घोडमगर गुफा तथा परगना में भी प्राप्त हुए हैं। यह चित्र तथा गुफाएँ उत्तर-पाषाण युग की हैं परन्तु कॉकवर्न महोदय ने हरनीहरन गुफा के चित्रों को बहुत परवर्ती मानकर उनका समय ईसवी शताब्दी तक माना है। इन गुफाओं में जादू-टोने के प्रचलन के चिन्ह अंकित किये गए हैं और यहाँ प्राचीन हथियार तथा अन्य यंत्र भी प्राप्त हुए हैं। हरनीहरन गुफा के चित्रों में आखेटकों की प्रहार करती हुई मुद्राएँ तथा पशु के सींगों के ऊपर उछले निरस्त्र आखेटकों की नाटकीय स्थिति का रोचक चित्रण है।

विन्ध्याचल की कैमूर श्रेणी की चित्रकला

विन्ध्याचल की पहाड़ियों की खुदाई में उत्तर-पाषाण युग के मनुष्य के बनाये चित्र प्राप्त हुए हैं। इन पहाड़ियों में चित्रित चट्टानों तथा गुफाओं के आस-पास पत्थर की चट्टानों या शिलाओं पर हिरोजी के घिसे हुए पत्थर प्राप्त हुए हैं जो आदिमानव ने चित्र बनाने के लिए रंग के रूप में प्रयोग किये थे।

इन स्थानों पर प्रागैतिहासिक मनुष्य ने पूर्ण रूप से अपनी चित्रशालायें स्थापित कर ली थीं, जिनमें वह रंग को पत्थर की शिला के ऊपर घिसकर बनाता था और रंग बनाकर चित्र का निर्माण करता था।

यहाँ पर जानवरों के पुट्ठों की हड्डी भी मिली है जिसको यह रंग बनाने की प्लेट या तस्तरी के रूप में प्रयोग करता था। विन्ध्याचल पर्वतमाला के अन्तर्गत अनेक क्षेत्रों में आदिमानव अपने केन्द्र बनाकर रहने लगा।

इस प्रकार उत्तर-पाषाण युग की चित्रकला के प्रमाण विन्ध्या तथा कैमूर पर्वतमाला में अनेक स्थानों पर सुरक्षित हैं। इसमें प्रमुख चित्र- उदाहरण रायगढ़, मिर्ज़ापुर, पचमढ़ी होशंगाबाद, ग्वालियर, वांदा आदि क्षेत्रों में प्राप्त हुए हैं।

सिंहनपुर

सिंहनपुर के चित्रों की खोज १६१० ई० में डब्ल्यू० ऐण्डर्सन ने की, तत्पश्चात् पर्सी ब्राउन ने १६१७ ई० में और अमरनाथ दत्त ने १६१३ ई० में इन चित्रों का परिचय दिया।

सिंहनपुर नामक ग्राम मध्य प्रदेश की रायगढ़ रियासत में मांढ नदी के पूर्वी किनारे पर स्थित है। सिंहनपुर ग्राम में ५० चित्रित शिलाश्रय तथा गुफाएं मिली हैं ये गुफाएँ एक रेतीली चट्टान में स्थित हैं।

इनके द्वार पर कंगारू के असंयत चित्र बने हैं। सिंहनपुर के पास एक सुरंगनुमा गुफा में अधिक पशुओं का अंकन किया गया है जिसमें घोड़ा, बारहसिंगा, हिरन, साही, महिष या अरना भैंसा, साँड, सूंड उठाये हाथी तथा खरगोश आदि जानवरों का सजीव अंकन है।

यहाँ पर एक गुफा में दीवार पर जंगली साँड को पकड़ते हुए और वर्ती से छेदते हुए आखेटकों का एक बड़ा मार्मिक दृश्य चित्रित किया गया है।

इस चित्र में कुछ आखेटक चारों ओर से हिंस्र पशु को घेर रहे हैं और कुछ प्रबल पशु की खीस से वायु में उछल गये हैं और कुछ पृथ्वी पर गिर पड़े हैं। इस चित्र में पशु तथा आखेटकों की भयंकरता तथा गति का मार्मिक अंकन किया गया है।

उसी दीवार पर एक दूसरा चित्र अंकित किया गया है जिसमें एक घायल भैंसा बुरी तरह तीरों से विंधा हुआ दम तोड़ रहा है, उसके चारों ओर भालों आदि से सुज्जित शिकारियों का दल है।

इस चित्र में प्राण त्यागते हुए भैंसे को आदिम चित्रकार ने बड़ी सफलता से सरल तथा साधारण आकारों में बाँध दिया है। इन चट्टानों के निचले भाग में बहुत से पत्थर के औज़ार तथा हथियार प्राप्त हुए हैं, जिससे इन गुफाओं को उत्तर-पाषाण युग का मानने में कोई संदेह नहीं रह जाता।

इन चित्रों को देखकर स्पष्ट हो जाता है कि प्रागैतिहासिक मनुष्य में चित्रण के लिए एक प्रकृति प्रदत्त प्रेरणा थी। उसने इन चित्रों में प्रभावशाली ढंग से गेरुये रंग की तूलिका के द्वारा अपने कौतूहलपूर्ण विचारों को पिरोया है। ऐण्डर्सन तथा पर्सी ब्राउन महोदय के पश्चात् गॉर्डन द्वारा सिंहनपुर का विवरण विशद शब्दों में प्रस्तुत किया गया।

इसी क्षेत्र में कवरा पर्वत, करमागढ़, खैरपुर तथा बोतालदा में अनेक शिलाश्रय तथा गुफाएँ प्राप्त हुई हैं, जिनमें गुहावासी मानव के चित्र प्राप्त हुए हैं। यहाँ पर क्षेपांकन (Stencil) पद्धति में चित्र बनाये गए हैं।

इन चित्रों को गॉर्डन ने पर्याप्त परवर्ती माना है परन्तु जादू के विश्वास के प्रचलन के प्रतीक चिन्हों का यहाँ पर चित्रण किया गया है जिससे यह प्राचीन सिद्ध होते हैं।

मिर्ज़ापुर

विन्ध्याचल की कैमूर श्रृंखलाओं में स्थित मिर्ज़ापुर जिले (उत्तर प्रदेश) में एक सौ से अधिक चित्रित गुफायें तथा शिलाश्रय प्राप्त हुए हैं।

उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग में कैमूर पर्वत शृंखला के अन्तर्गत मिर्जापुर जिले में कोहबर, महरिया, भल्डरिया, विजयगढ़ः छातों, विड़म लिखनिया -१, लिखनिया -२, लौहरी, खोड़हवा, रौंप, कंडाकोट, सोरहोघाट, घोड़मंगर, पभोसा (चुनार) आदि स्थान आदिम मनुष्य के प्रमुख केन्द्र थे।

मिर्ज़ापुर क्षेत्र में एक सौ से अधिक शिलाश्रय तथा गुफाएँ इन्हीं स्थानों पर प्राप्त हुई हैं, जिनमें गुहाबासी मानव की चित्रकला के प्रमाण सुरक्षित हैं।

मिर्ज़ापुर क्षेत्र के अन्तर्गत सहवाइयापथरी, मोहरापथरी, बागापथरी, लकडटपथरी नामक पहाड़ियों में भी आदिम चित्रों के उदाहरण प्राप्त होने के उल्लेख प्रकाशित हुए हैं।

लिखनिया – १ में हाथियों के पकड़ने के दृश्यों को बड़ी सुंदरता से चित्रित किया गया है। लिखनिया – २ में पशु आखेट के दृश्यों के साथ-साथ नर्तन-वादन में मस्त व्यक्तियों के समूह भी अंकित किये गए हैं।

यह चित्र गुफा की छतों तथा भित्तियों पर बनाये गए हैं। एक अन्य स्थान पर लम्बी चोंच वाले पक्षी की आकृति भी बनाई गई है। विजयगढ़ गुफा में तीन आदमियों को लाल, पीले तथा सफेद रंग से बनाया गया है। इसके अतिरिक्त विजयगढ़ गुफा में सुअर, गैंडा, बारहसिंगा तथा हिरन आदि पशुओं का चित्रण किया गया है।

मिर्ज़ापुर क्षेत्र में स्थित गुफाओं के चित्रों में अधिक स्वाभाविकता और यथार्थता से चित्रित पशुओं में गैंडा, सांवर, हिरन, सुअर तथा बारहसिंगा है। यह चित्र स्पेन की कोगुल गुफा के चित्रों से आकार, चित्रण शैली तथा रेखांकन पद्धति में पर्याप्त समान दृष्टिगोचर होते हैं।

यहाँ पर एक सांबर के पकड़ने का दृश्य तथा दूसरा गैंडे के आखेट का दृश्य मार्मिक ढंग से अंकित किया गया है। एक दृश्य में सुअर का आखेट और दूसरे दृश्य में एक हिरन का आखेट अंकित किया गया है।

इन्हीं आखेट दृश्यों के साथ एक पशु पर कुत्तों का आक्रमण भी अंकित किया गया है। यहाँ एक स्थान पर सुसज्जित द्वार पर एक चोंचदार पुरुष बैठा बनाया गया है जिससे प्रतीत होता है कि यह गुफा एक तंत्र-मंत्र शाला है।

इस क्षेत्र में अधिकांश चित्र गेरू, हिरौंजी या कोयले से बनाये गए हैं। इन चित्रों से भारतवर्ष की आदिम चित्रकला का इतिहास ही प्राप्त नहीं होता बल्कि पूर्वी देशों की प्राचीन सभ्यता के विकास पर भी प्रकाश पड़ता है।

रोप तथा घोड़मगर गुफा में कॉकबर्न महोदय ने गैंडे के आखेट दृश्य अंकित पाये थे। घोड़मंगर गुफा में मगर तथा घोड़े के चित्र अंकित हैं।

भल्डरिया में शिलाश्रयों तथा गुफाओं में कॉकबर्न ने (१८८३ ई० में) अनेकानेक पशु-आखेट चित्र अंकित पाए । मिर्ज़ापुर के प्रसिद्ध पिकनिक स्पॉट (स्थल) विंढम में भी प्रागैतिहासिक चित्रकारी से युक्त शिलाश्रय प्राप्त हुआ है। मिर्जापुर क्षेत्र की परवर्ती चित्रकारी का समय ५,००० ई० पू० के अन्तर्गत माना जा सकता है।

मनिकापुर

मनिकापुर और उसके निकटवर्ती क्षेत्र में खुले स्थान में गेरु से बने हुए कुछ चित्र प्राप्त हुए हैं। एक चित्र में पहियेरहित गाड़ी और तीन घोड़ों का अंकन है।

पचमढ़ी

पचमढ़ी क्षेत्र के चित्रों को प्रकाश में लाने का श्रेय डी० एच० गार्डन नामक विद्वान को है। १६३६ ई० में उन्होंने पचमढ़ी के चित्रों के सम्बन्ध में रेखाचित्रों तथा फलक चित्रों सहिते एक विशद लेख प्रकाशित किया।

पचमढ़ी भोपाल (मध्यप्रदेश की राजधानी) से लगभग सत्तर किलोमीटर की दूरी पर मध्य प्रदेश राज्य में ही स्थित है। यहाँ गुहावासी मानव की चित्रकारी के अनेक उदाहरण प्राप्त हुए हैं।

इस क्षेत्र की चित्राकृतियों के विवरण लेखन का श्रेय डी० एच० गार्डन महोदय को प्राप्त है। यहाँ पर उन्होंने पन्द्रह से अधिक शिलाश्रयों एवं गुफाओं की खोजबीन की है।

यहाँ पर महादेव पर्वत के चारों ओर अवस्थित छोरोकोदीप, महादेव बाजार सोनभवा, जम्बूदीप, निम्बुभोज, बनियाबेरी, मारोदेव, तामिया और झालई आदि स्थानों में अनेक चित्रित शिलाश्रय तथा गुफाएँ प्राप्त हुई हैं।

पचमढ़ी के शिलाचित्रों में पशु तथा आखेट चित्रों के अतिरिक्त सशस्त्र युद्धदृश्यों के चित्र तथा नर्त्तन-वादन के कार्यक्रमों के चित्र भी मिलते हैं। यहाँ पर ‘बाजारकेव’ में एक विशालकाय बकरी का चित्र है।

इस क्षेत्र में मौडादेव गुफा की छत में ‘शेर के आखेट’ का एक दृश्य अंकित है। इस क्षेत्र में इमली खोह में सांबर के आखेट का दृश्य है। इस क्षेत्र में चट्टानों पर पशु की पंक्तियों के अंकन के साथ-साथ दैनिक जीवन के चित्र भी ऑकित किये गए हैं-जैसे अनेकानेक चित्रों में गायों को चराते हुए चरवाहे और शहद इकट्ठा करते हुए मनुष्य दिखाये गए हैं।

विषय, आकार और प्रकार के आधार पर पचमढ़ी क्षेत्र के अधिकांश चित्र पर्याप्त परवर्ती प्रतीत होते हैं गार्डन ने यह चित्र भारत की निषाद जाति की उन्नतकालीन संस्कृति के परिचायक माने हैं और उनहोंने इन चित्रों का समय ईसवी शताब्दी से बहुत परवर्ती माना है।

होशंगाबाद

होशंगाबाद नगर (मध्य प्रदेश) पचमढ़ी से पैंतालीस मील दूर नर्मदा नदी पर स्थित है। इस नगर से इटारसी जाने वाले मोटर मार्ग पर ढाई-तीन मील की दूरी पर आदमगढ़ पहाड़ी है।

इसी पहाड़ी में एक दर्जन से अधिक शिलाश्रय हैं जिनमें हाथी, महिष, घोड़े, सांवर, जिराफ समूह, अस्त्ररोही अश्वारोही, चार धनुरधारी आदि क्षेपांकन (Stencil) पद्धति से बनाये गए हैं।

यहाँ पर विभिन्न शैलियों में किये गए चित्रण-प्रयोगों के पाँच-छः स्तर हैं जो अनेकानेक कालों के द्योतक हैं। इस क्षेत्र में पुरातत्व विभाग की ओर से उत्खनन किया गया है जिससे पाषाण युगों से सम्बद्ध आदिम मानव के निवास के चिन्ह प्रकाश में आने की अधिक संभावना है।

आदमगढ़ की एक गुफा में एक हाथी पर चढ़े आखेटकों को जंगली भैंसे का आखेट करते हुए चित्रित किया गया है। यहाँ पर कुछ आखेटक घोड़ों पर सवार चित्रित हैं और कुछ पैदल दौड़ रहे हैं (देखिये छाया फलक-२) डॉ० जगदीश गुप्त ने इस क्षेत्र में बुदनी तथा रहेली का नाम भी प्रागैतिहासिक चित्रकला के लिए प्रस्तुत किया है।

यहाँ पर एक शिलाश्रय पर एक मोर का विशाल चित्र अंकित है और एक स्थान पर वनदेवी का चित्र अंकित है।

भोपाल क्षेत्र

भोपाल क्षेत्र में धरमपुरी, गुफामंदिर, शिमलाहिल, बरखेड़ा, सांची, सेक्रेटरियट, उदयगिरि आदि स्थानों में आदिम-चित्रकला के उदाहरण प्राप्त हुए हैं। धरमपुरी नामक स्थान पर एक शिलाश्रय में गेरुए रंग से अंकित हिरन के आखेट का रहस्यमय चित्रण है। इस चित्र में शिकारी का शरीर पैरों तक पत्तियों से ढके होने के कारण भ्रमवश हिरन उनके समीप आ गया अंकित किया गया है।

बांदा

बांदा क्षेत्र में सरहत, मलवा, कुरियाकुंड, अमवां, उल्दन, चित्रकूट आदि स्थानों में शिलाश्रय तथा चित्रित गुफाएँ प्राप्त हुई हैं।

ग्वालियर क्षेत्र

ग्वालियर, शिवपुरी तथा फतेहपुर सीकरी के आस-पास भी आदिम-चित्रकला के चिन्ह प्राप्त हुए हैं।

बिहार

बिहार क्षेत्र में चक्रधरपुर नामक ग्राम में आदिम-चित्रकला के कुछ उदाहरण प्राप्त हुए हैं। एक चित्र में एक आदमी लेटा है और कुछ आदमी उसके पास बैठे हैं। यही के चित्रों का समय श्रीमती अल्विन तथा असित कुमार हाल्दार ने २,००० ई० पूर्व माना है।

मन्दसौर

मन्दसौर जिले में मोरी गाँव में गुफा चित्र प्राप्त हुए हैं। यहाँ ३० खोहे हैं जिनमें सूर्य, कमल तथा स्वास्तिक चिन्ह बने हैं।

भीमबेटका

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से लगभग ४० कि०मी० दक्षिण में भीमबेटका नामक एक पहाड़ी में लगभग ६०० प्राचीन गुफाएँ प्राप्त हुई हैं। इन गुफाओं में प्रस्तर सामग्री भी प्राप्त हुई है जो ३०,००० ई० पूर्व से १०,००० ई० पूर्व की है।

यहाँ पर लगभग २७५ गुफाओं में चित्रों के अवशेष प्राप्त हुए हैं। यहाँ पर बने चित्रों का समय लगभग १०,००० ई० पूर्व से १,००० ई० पूर्व तक का माना गया है।

भीमबेटका होशंगाबाद से भोपाल की ओर जाने वाली रेल लाईन पर वरखेड़ा तथा उब्बेदुल्लागंज स्टेशनों के मध्य में स्थित है। यह स्थान मियपुरसु (भीमपुरा ) नामक आदिवासी गांव से दो कि०मी० की दूरी पर स्थित है।

यहाँ पर हिरण, बारहसिंगा, सुअर, रीछ, भैंसे आदि जंगली पशुओं के चित्र अंकित हैं। परवर्ती चित्रों में आखेटक, कृषक, ग्वाले आदि चित्रित किये गए हैं।

इन स्थानों के अतिरिक्त वेला स्टेशन जो पटना से आठ मील की दूरी पर स्थित है, की पहाड़ियों में सुदामा, लोमश, रामाश्रय, विश्व झोपड़ी तथा गोपी गुफाओं की चित्रकला भी प्रागैतिहासिक महत्त्व की मानी गई है।

भुवनेश्वर से पांच मील पश्चिम में स्थित उदयगिरि, खण्डगिरि और नीलगिरि की ६६ गुफाओं को चित्रों की दृष्टि से प्राचीन माना गया है। इसी प्रकार कश्मीर की सुप्रसिद्ध अमरनाथ गुफा में भी चित्रों के अवशेष मात्र रह गये हैं।

भारतवर्ष में जो चित्र प्राप्त हुए हैं उनमें से अधिकांश चित्रों का समय दस या बारह हजार वर्ष ईसा पूर्व से सात या आठ सौ वर्ष ईसा पूर्व अनुमान किया जाता है।

गॉर्डन महोदय ने इन चित्रों को बहुत परवर्ती काल का मानने का प्रयत्न किया है और उन्होंने पूर्वाग्रह के कारण इन चित्रों का समय आठवीं शताब्दी ईसापूर्व स्वीकार किया है, परन्तु यह बात ठीक नहीं प्रतीत होती है।

यह बात सत्य है कि इन क्षेत्रों में आदिम जातियाँ अभी भी निवास करती हैं और अब भी इस प्रकार के चित्र बनाती हैं, परन्तु अनेकानेक स्थानों पर खरोष्ट लिपि में लेख उत्कीर्णित रहने के कारण इनको हम परवर्तीकाल का नहीं मान सर ते खरोष्ट लिपि बहुत प्राचीन है, इसके अतिरिक्त जो पशु तथा शस्त्र वहाँ अंकित किये गए हैं वह भी पाषाण युग के है।

अतः गॉर्डन का मत ठीक नहीं है और यह चित्र प्राचीन हैं। व्रानिक महोदय ने संसार के प्रागैतिहासिक चित्रों की प्राचीनता का विवेचन करते हुए भारत में प्राप्त चित्रों को कालक्रम में अमेरिका तथा यूरोप के बाद रखा है।

प्रागैतिहासिक चित्रों का उद्देश्य

पाषाण युग के मनुष्यों ने अपने चारों ओर के वातावरण की स्मृति को बनाये रखने के लिए तथा अपनी विजय का इतिहास व्यक्त करने की भावना के वशीभूत होकर इन चित्राकृतियों का निर्माण किया गुहावासी मानव ने अपनी अमूर्त भावना को मूर्त रूप प्रदान करने की प्रवृत्ति के कारण जिसमें जादू टोना-टोटका आदि भी आ जाते हैं, अधिकांश चित्रों की रचना की। मूलतः ये ही मनोवृत्तियाँ सम्पूर्ण मानव जाति की उन्नति की प्रेरक हैं।

इन चित्रों में आदिमानव का दैनिक जीवन परिलक्षित होता है आखेट करने से पूर्व आदिम आखेटक पशु का चित्र बनाकर और उस पर कुछ जादू-टोना करके अपने आखेट की सफलता में विश्वास करता था।

उसका विश्वास था कि जिस पशु को वह चित्ररूप में अंकित करता था वह उसके वश में सरलता से आ जाता था। प्रायः ऐसे चित्र मिले हैं जिनमें तीरों, बछ या भालों से बिंधे पशु अंकित किये गए हैं।

कदाचित आखेट के लिए प्रस्थान से पूर्व आदिम-आखेटक अनेक आखेटक समूहों को चित्रित आहत पशु के चित्र के सहारे पशु के अनेक अंगों पर आक्रमण तथा प्रहार करने की शिक्षा देता या प्रदर्शन करता था।

इस समय पशु को मारकर खाना तथा उसके बाद उल्लास में नर्त्तन-गायन आदि करना मनुष्य की दिनचर्या थी, यही सब उत्तर-पाषाण युग के चित्रों में दिखाई पड़ता है।

गुहावासी मानव ने अपनी सफलता के लिए अदृश्य शक्तियों की पूजा-स्वास्तिक, षटकोण, अंकों तथा रेखाओं आदि अनेक प्रतीक चिन्हों के अंकन के रूपों को टोना-टोटका मानकर आरम्भ कर दी थी।

चित्रों का विषय

आदिम मनुष्य का दृष्टिकोण भयानक पशुओं की दौड़-भाग, उछल-कूद तथा वेदना के चित्रण या अपने दैनिक जीवन के कार्य-कलापों के अंकन तक ही सीमित रहा।

अतः उसने सांवर, बारहसिंगा, महिष, गैंडा, हाथी, घोड़ा, खरगोश, सुअर जैसे पशुओं का स्वाभाविकता के साथ अंकन किया है।

यह पशु उसने अपने आखेट में देखे थे और उसने उनका पीछा करते हुए उनमें दैत्य जैसी शक्ति का अनुभव किया था। इन पशुओं की गति और शक्ति पर उसने विजय प्राप्त की थी, इस कारण उसके प्रमुख चित्रण विषय के रूप में पशु जीवन का आना , स्वाभाविक था।

पशुओं के मांस से उसकी उदर-सुधा भी मिटती थी और उनकी खाल से वह अपने शरीर भी ढकता था सुअर, हाथी, गैंडा तथा बारहसिंगा आदि के डील-डोल और शक्ति से भी वह प्रभावित हुआ होगा।

अतः पशु और पशुओं के आखेट दृश्य तथा जादू के विश्वास के प्रतीक चिन्हों का चित्रण इस समय की कला का प्रधान विषय है। यही कारण है कि उसके द्वारा चित्रित दौड़ती, उछलती, गिरती और प्रहार करती हुई आखेटकों की तथा खींस मारते हिंस-पशुओं या आक्रमण करते हुए गतिशील पशुओं की आकृतियों में अत्याधिक सजीवता है।

इन चित्रों में मानव ने अपने भावों को सरलतम रूपों तथा ज्यामितीय आकारों में संजोया है। यह कृतियाँ आदिम मानव की बाल-सुलभ प्रकृति की उत्तम झाँकी हैं।

इन चित्रों में प्रागैतिहासिक युग के मनुष्य का सम्पूर्ण इतिहास संचित है। इन चित्रों की सीमा रेखायें सशक्त एवं गतिशील हैं, यद्यपि चित्र असंयत और सरल हैं।

प्रागैतिहासिक काल के चित्रों की विशेषताएँ तथा मूल प्रवृत्तियाँ

चित्रों का विधान

प्रागैतिहासिक काल के चित्रों के समस्त चित्र उदाहरण लाल, काले या पीले और सफेद रंगों से बने हैं। यह चित्र चट्टानों की दीवारों, गुफाओं के फर्शो, भित्तियों या छतों में बनाये गए हैं।

अनेक चित्र प्रस्तर शिलाओं पर भी अंकित किये गए हैं। यह चित्र चट्टानों की खुरदरी दीवारों पर लाल (गेरू या हिरौंजी), काले (कोयला, काजल या कालिख ) या सफेद (खड़िया) रंगों को पशु की चर्बी में मिलाकर बनाये गए हैं। इन चित्रों में रेखा या सीमारेखा की प्रधानता है, इस कारण इनको रेखा-चित्र मानना संगत है।

आकृति की सीमारेखा को अधिकांश किसी नुकीले पत्थर से खोदकर बनाया गया है जिससे वह वर्षा के जल से धुल न जाये और स्थायी बनी रहे। सामान्यतया दो-तीन रेखाओं के द्वारा मानव आकृतियों का निर्माण किया गया है और कभी-कभी चौखुटे धड़ से मनुष्य की आकृति बनाई गई हैं जिसमें कभी तिरछी और कभी पड़ी रेखायें भर दी गई हैं।

रंग तथा आकार

इन चित्रों में रंग का प्रयोग बाल-सुलभ प्रकृति के आधार पर किया गया है। आकृति को भरने के लिए धरातल पर रंगों को सपाट लगाया गया है। इन चित्रों में सुगमता से प्राप्त खनिज रंगों का प्रयोग किया गया है।

इन रंगों में प्रधानता गेरू, हिरौंजी, रामरज तथा खड़िया के रंगों का प्रयोग है। इन रंगों के अतिरिक्त रासायनिक रंगों में कोयला या काजल का प्रयोग किया गया है। अधिकांश आकृतियों के निर्माण में सीधी रेखा, चक्र और आयत आदि ज्यामितीय आकारों का प्रयोग है।

कई ज्यामितीय आकारों को सांकेतिक रूप में भी प्रयोग किया गया है, जिसमें स्वास्तिक, त्रिभुज, वृत्त, षटकोण तथा आयताकार है।

सम्भवतः इन आकारों से प्रकृति की विभिन्न शक्तियों या जादू-टोने के विश्वासों को व्यक्त किया गया है। अधिकांश चित्रों को रेखाओं के द्वारा बनाया गया है अन्यथा पूर्ण रूप से या पूरक

रूप में क्षेपांकन (Stencil) पद्धति का प्रयोग किया गया है। यद्यपि यह चित्र भद्दे, असंयत और कठोर हैं परन्तु इनमें गति तथा सजीवता है और तूलिका संचालन की शक्ति इनकी प्रमुख विशेषता है।

चित्रकार अपनी तूलिका किसी रेशेदार लकड़ी, बांस या नरकुल आदि के एक सिरे को कूटकर बनाता था। आदिम चित्रकार रंगों को पशुओं की चर्बी में मिलाने के लिये पशुओं के पुट्टे की हड्डी को प्याली के समान प्रयोग में लाते थे।

यद्यपि अधिकांश चित्रकारी के उदाहरण रेखा और सपाट रंगों के प्रयोग से बनाये गए है फिर भी कहीं-कहीं गोलाई का आभास होता है। इन चित्रों की सरलता, सुगमता तथा सूक्ष्म रेखांकन पद्धति आज के कलाकार के लिए एक महान प्रेरणा है।

मिर्ज़ापुर, सिंहनपुर, पचमढ़ी, होशंगाबाद आदि क्षेत्रों से प्राप्त इस काल के कृषि सम्बन्धी चित्र उदाहरणों में जीवन स्तर तथा युग परिवर्तन के चिन्ह दृष्टिगोचर होने लगते हैं परन्तु अभी तक यह निश्चित नहीं किया जा सका है कि परिवर्तन की वह अवस्था इस क्षेत्र में कब आई, परन्तु यह निश्चित है कि पाषाण युग के पश्चात् धातु युग का समारम्भ हुआ।

इस युग में मनुष्य ने लकड़ी तथा पत्थर के अतिरिक्त धातुओं का प्रयोग आरंभ कर दिया था।

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