राजवंशों द्वारा संरक्षित चित्रकला | Art Preserved by Dynasties

भारतीय राजवंशों के संरक्षण में पल्लवित चित्रकला को बुद्ध के काल (५०० ई० पू०) से आरम्भ हुआ मानना उचित है रामायण, महाभारत, बौद्ध तथा जैन साहित्य तथा पुराणों में चित्रकला विषयक सामग्री का व्यापक भंडार भरा पड़ा है। प्राचीन राजवंशों के काल में अनेक राज्यों में ‘सरस्वती-भवन’ और चित्रशालाएँ या नाट्यशालाएँ संरक्षित होती थीं। राज दरबारों, अन्तःपुरों तथा राज कर्मचारियों में चित्रकला के लिए निष्ठा पायी जाती थी।

बुद्ध से अशोक तक (५००-२३२ ई० पू० )

बुद्ध के समय में अनेक गणतंत्र राज्यों के इतिहास का परिचय मिलता है। कपिलवस्तु के शाक्य, सुंभगिरि के मग्ग, अलकप्प के बुली, केशयुत के कालाम, रामगांव के कोलिय, पावा के मल्ल, कुशीनारा के मल्ल, पिप्पलिवन के मौर्य, मिथिला के विदेह और वैशाली के लिच्छवी गणतंत्रीय राज्य थे। 

गौतम बुद्ध का जन्म शाक्यकुल में हुआ था। उनके समय में कौशाम्बी (वत्स), अवन्ति, कोशल तथा मगध शक्ति सम्पन्न राज्य थे।

मगध के राजवंश की स्थापना बृहद्रथ ने की। इस वंश का अन्त छठी शताब्दी ई० में हुआ जबकि मगध पर हर्यक वंश का विम्बिसार (५४३-४१६ ई० पू०) राज्य कर रहा था। हर्यक वंश के पश्चात् मगध पर शिशुनाग वंश का अधिकार हो गया और उसके बाद ४०० ई० पूर्व में महापद्म नाम का एक सैनिक मगध के सिंहासन पर नन्दवंश को प्रतिष्थापित करने में सफल हुआ।

मौर्यवंश 

चन्द्रगुप्त मौर्य के उपरान्त मौर्यवंश के शासन का उदय हुआ (३७४-१९० ई० पू०) मौर्यवंश में चन्द्रगुप्त मौर्य (३२१-२६७ ई० पू०) और अशोक (२७२-२३२ ई० पूर्व) का नाम मुख्य है। अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार से विश्व ख्याति प्राप्त की। अशोक के समय में स्थापत्य एवं शिल्प का विकास हुआ।

शुंग सातवाहन (१८७-७५ २० ५०)

दूसरी शताब्दी ई० पू० के आरंभ में मौर्य साम्राज्य की शक्ति समाप्त होने लगी और यवनों के आक्रमण ने मौर्य साम्राज्य को निर्बल कर दिया। इसी समय में शुंगवंश के अधिष्ठाता पुष्यमित्र ने मौर्यवंश का अंत करके शुंगवंश की विजय पताका फहराई।

मौर्य सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म के प्रचार के लिये कला (स्थापत्य तथा शिल्प) का माध्यम अपनाया था। शुंगों के काल में वह परम्परा प्रचलित रही इसके साक्षी शुंगकालीन अर्ध-चित्र हैं। अजंता की शुंगकालीन गुफाओं में उस समय की चित्रकला की उन्नत व्यवस्था का ज्ञान होता है।

हिन्दू युनानी युग (२०६-१७५ ई० पू०)

भारत की उत्तरी पश्चिमी सीमा पर सिंध, पंजाब तथा गांधार के क्षेत्रों पर २०६-१७५ ई० पूर्व तक दिमित्रय, युकेतिक और मिनेडर नामक यूनानी शासकों ने राज्य किया इन शासकों ने भारतीय यूनानी कला, साहित्य एवं संस्कृति को प्रोत्साहन प्रदान किया।

कुषाण वंश (प्रथम शताब्दी ई० पू० )

कुषाण राजवंश का संस्थापक कडफिसेस हुआ। उसने प्रथम शताब्दी ई० पूर्व तक राज्य किया। फिर कनिष्क शासक बना (५० ई० पू० सिंहासन पर बैठा। वह धार्मिक विद्वत्यप्रेमी तथा कलानुरागी शासक था उसने कनिष्कपुर नगर बसाया और बोद्ध-विहारों का निर्माण कराया। 

उसने धार्मिक सुधार किये जिसके फलस्वरूप हीनयान सम्प्रदाय के विरोध में महायान बौद्ध सम्प्रदाय का उदय हुआ। उसके काल में हिन्दू-यूनानी कला अर्थात् ‘गांधार शैली’ का प्रचलन हुआ और यह शैली भारतीय रूप धारण करने लगी। 

कुषाणों के पश्चात् सातवाहनों ने १००-२७५ ई० पू० तक दक्षिण में सत्ता प्राप्त की। इस युग में नवीन कला शैलियों का जन्म हुआ।

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