मुगलकाल की चित्रकला | Mughal School Painting

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मुगलकाल (दरबारी चित्रकला) (१५५० ई० से १८५७ ईसवी तक )

आदि स्रोत-ईरानी फारसी मुगल कला का आदि स्रोत या जन्मस्थान समरकन्द और हिरात था। पन्द्रहवीं शताब्दी में तैमूरवंश के संरक्षण में फारस की कला उत्कर्ष को प्राप्त हुई। तैमूर का भारतवर्ष से सम्बन्ध, साधारणतया कला की दृष्टि से नहीं माना जाता है, बल्कि संहारक के रूप में माना जाता है। 

उसने भारतवर्ष पर १३६८ ई० में आक्रमण किया और लूटमार, विध्वंस तथा बर्बरता का प्रदर्शन किया। तैमूर के तातार सैनिकों ने लूटमार की और उन्होंने भवनों को गिरा दिया तथा स्थान-स्थान पर आग लगायी गई और अत्याचार किये गए। 

परन्तु दूसरी ओर देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि तैमूरवंश बर्बर न था, उसमें पूर्णता सभ्य और कलाप्रिय शासकों का जन्म हुआ। इस वंश के समान फारस में अन्य कोई ऐसा सभ्य और सुसंस्कृत वंश नहीं हुआ। इस वंश के शासकों ने चित्रकला को विशेष प्रोत्साहन प्रदान किया और एक दरवारी चित्रकला का विकास हुआ।।

महान संहारक और विजेता तैमूर का पुत्र शाहरुख स्वयं एक कवि था और उसने अपने दरबार में कवियों और चित्रकारों को आश्रय प्रदान किया। उसने एक राजदूत संघ चीन भेजा। इस दूतसंघ में एक चित्रकार भी था।

पन्द्रहवीं शताब्दी के अन्त में खुरांसा के सुल्तान हुसैन के संरक्षण में बिहज़ाद जैसा नामी चित्रकार था। विहज़ाद ईरानी शैली का अपने समय का सबसे उत्तम चित्रकार था। इसी कारण विहज़ाद को ‘पूर्व का रैफेल’ कहकर पुकारा गया है।” 

बिहज़ाद पहले तैमूरवंशीय सुल्तान हुसेन वेगरा (मिर्जा) का दरवारी चित्रकार था, परन्तु उसकी मृत्यु के पश्चात् सुल्तान शाह इस्माईल के संरक्षण में चला गया। बाबर ने भी आगे चलकर ‘बाबरनामा’ या अपनी आत्मकथा में उसका वर्णन दिया है। 

बावर के वर्णन से ऐसा प्रतीत होता है कि सम्राट बाबर ने विश्ज़ाद के चित्रों का अध्ययन किया था विजाय स्कूल के उत्तराधिकारियों ने उसकी ईरानी शैली को अधिक उन्नत किया और फारस के विभिन्न शासकों ने चित्रकला तथा चित्रकारी को संरक्षण प्रदान किया। 

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि फारस में सोलहवीं शताब्दी तक एक उच्च फारसी ईरानी कलाशैली विकसित हो चुकी थी जो मुगल शासकों के साथ भारतवर्ष में आई। अब हमें यह देखना है कि भारत में यह फारसी ईरानी कलाशैली किस प्रकार आई और उसका भारतीय एवं मौलिक मुगल रूप किस प्रकार निखरा ।

ईरानी शैली 

इस्लाम धर्म के उदय के साथ ईरान में जो कला-शैली प्रचलित हुई, उसमें भारतीय चित्रकला की गहरी छाप थी। इस्लाम में मानव आकृतियाँ या जीवधारियों की आकृतियाँ चित्रित करना धर्म निषिद्ध था अतः इस्लामी चित्रकला में आलंकारिक आलेखनों या ज्यामितीय तरहों का रूप निखरकर आया प्रारम्भ में इस्लामी चित्रकार जीवधारियों की आकृतियों के चित्रण के प्रति उदासीन रहे परन्तु शनैः-शनैः धार्मिक कट्टरता शिथिल पड़ने लगी और पुष्प-पत्तियों, पशु-पक्षियों तथा मानवाकृतियों का भी अंकन प्रचलित हो गया।

तैमूर का पुत्र शाहरुख महान कला प्रेमी हुआ। उसने हिरात नगर को राजधानी बनाया और हिरात कला का केन्द्र बन गया। पन्द्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में इस हिरात कलम या शैली का प्रसिद्ध चित्रकार विहज़ाद हुआ। इस ईरानी या हिरात शैली का विहज़ाद तथा उसके शिष्यों ने विकास किया। यह शैली भारत में बाबर तथा हुमायूँ के काल में पहुँची।

ईरानी कला की विशेषताएँ

1. रेखांकन

ईरानी कला पर अजन्ता की भारतीय रेखांकन शैली तथा चीनी कला की छाप पड़ चुकी थी दूसरी ओर इस शैली पर इस्लामी नक्काशी की सूक्ष्म कला का प्रभाव भी था। ईरानी शैली रेखा पर आधारित थी। इस शैली में रेखाएं भारतीय गोलाई-युक्त नहीं हैं बल्कि सपाटेवार कोण युक्त है। ईरानी कला में महीन या बारीक रेखाओं का प्रयोग है।

2. आलंकारिक विधान

ईरानी शैली के चित्रों में भावाभिव्यक्ति की अपेक्षा आलंकारिकता अधिक है। वस्त्रों की बनावट तथा फहरान में यथार्थता नहीं है अपितु आलंकारिक सौन्दर्य है। चित्रों में ईरानी वृक्षों को आलंकारिक योजना में प्रस्तुत किया गया है। प्रकृति को घुमावदार रेखाओं द्वारा चित्रित किया गया है।

३. वर्ण-विधान

ईरानी चित्रों में सपाट रंग लगाये गए हैं। ईरानी चित्रकार आकृति को उभारने और गोलाई प्रदान करने के लिये छाया प्रकाश का प्रयोग नहीं करते थे और केवल सपाट रेखांकन का प्रयोग ही करते थे। रंग अत्यधिक चटकीले तथा अमिश्रित होते थे। पृष्ठभूमि अधिकांश हल्के रंग से रंगी जाती थी।

४. कोमलता 

ईरानी शैली में मानवाकृतियाँ बड़ी कोमल या नाजुक बनायी गई हैं। आकृतियों की गरदन पतली, सुराहीनुमा ही चित्रित की गई हैं और लम्बी, पतली लचकदार भुजाओं (वाहों वाली स्त्रियाँ अंकित की गई है। ईरानी चित्रों में स्त्री की कोमलता की उपमा लता के रूप में दर्शायी गई है और पुरुष की उपमा प्रायः ‘सरों’ के वृक्ष से दर्शायी गई है। 

5. उद्यान चित्रण  

ईरानी चित्रों में उद्यान के चित्रण की सुमधुर कल्पना दिखाई पड़ती है। 

६. ज्यामितीय योजना

ईरानी चित्रों में प्रकृति, मानवाकृतियों तथा भवनों आदि के चित्रण में यथार्थता नहीं है अपितु ज्यामितीय योजना को अपनाया गया है।

७. हाशिये

ईरानी चित्रों के चारों ओर हाशिये बनाने की प्रथा प्रचलित थी। चित्रों के हाशिये आलंकारिक अभिप्रायों, आखेट दृश्यों, पशु-पक्षियों तथा पुष्प-पत्तियों से अलंकृत किये गए हैं। इन हाशियों में सुनहरी रंग का प्रयोग मनोरम है।

८. भवन

ईरानी चित्रों में भवन मेहरावदार, जालियों युक्त तथा फूल-पत्तों की नक्काशी के काम से अलंकृत बनाये गए हैं। भवनों की दीवारों में एक-एक ईंट तथा पच्चीकारी आदि को बड़ी बारीकी से दर्शाया गया है। इन भवनों में नीले, हरे एवं श्वेत आदि शीतल वर्णों का अधिक प्रयोग है। आकृतियों को इन भवनों में उभारने के लिये प्रायः इनके वस्त्रादि गहरे रंग से रंगे जाते थे और पृष्ठभूमि हल्के रंग से रंगी जाती थी।

६. आकृतियाँ 

ईरानी शैली में मानवाकृतियों के चेहरे प्रायः गोल तथा पौने दो चश्म बनाये गए हैं, जिनमें छोटी आँखें, पतली-लम्बी नाक तथा पतले अधर वाले छोटे मुख-विवर का चित्रण किया गया है। चेहरे गोलाईयुक्त हैं और उनमें गठनशीलता का अभाव है, अतः फूले-फूले कपोल तथा गोल चिवुक दिखाई पड़ती है। चेहरे एक ही वक्राकार से बनाये हैं।

१०. वस्त्र 

ईरानी शैली में आकृतियों को प्रायः लम्वा लवादा या चोगा, पगड़ी तथा कुलहदार साफा पहने हुए चिंत्रित किया गया है।

११. आकृति भेद 

स्त्री तथा पुरुष आकृतियों में रूप का अंतर दर्शाने के लिये केशविन्यास, बालों तथा दाड़ी मूछों आदि से पृथकता दर्शायी गई है अन्यथा उनकी शारीरिक रचना में भेद नहीं दर्शाया गया है।

१२. लेख

ईरानी शैली के चित्रों में चित्रकारों के नाम तथा चित्र के विषय से सम्बन्धित विवरण तथा कविता आदि भी लेखांकित कर दी जाती थी यह लेख चित्रित आकाश में या अन्य किसी भाग में एक आयताकार सफेद पट्टी बनाकर उसके ऊपर अंकित कर दिये जाते थे।

१३. संयोजन

ईरानी चित्रों में सरल वर्णात्मक शैली के संयोजन चित्रित किये गए हैं। प्राकृतिक दृश्यों में दो स्थलों को पृथक करने के लिए नालियाँ, क्यारियाँ तथा टीले या चट्टानें अंकित की गई हैं और भवनों के अनेक भागों को दीवारों से विभाजित करके दर्शाया गया है।

१४. प्रकृति

प्रकृति को स्वतंत्र रूप से चित्रित नहीं किया गया है। प्रकृति को पृष्ठभूमि में आलंकारिक रूप में चित्रित किया गया है।

बावर तथा हुमायूँ के काल में जो ईरानी शैली अपने मूल या अपरिवर्तित रूप में प्रचलित थी, अकबर के शासन काल में उस शैली से एक नवीन कलाशैली का जन्म हुआ जिसे ‘मुगल-कला’ कहते हैं।

भारत में मुगलों का प्रवेश

सर्वप्रथम यावर भारतवर्ष में मुगल साम्राज्य के संस्थापक के रूप में आया। उसने अपनी सैन्य कुशलता तथा तोपखाने के कारण भारत की शासन सत्ता को अपने हाथ में ले लिया। बावर का नाम जहीरउद्दीन मोहम्मद था और उसके पिता का नाम उमरशेख था उमरशेख फरगना प्रान्त का शासक था। 

बाबर ग्यारह वर्ष की आयु में पैतृक रूप से इस छोटे से फरगना राज्य का उत्तराधिकारी बना। जब वह १५११ ई० में २८ वर्ष का हुआ तो उसको समरकंद का यह राज्य छोड़कर भागना पड़ा परन्तु इससे सात वर्ष पूर्व ही वह काबुल पर अधिकार स्थापित कर चुका था। 

१५०५ ई० में बाबर ने गजनी पर भी अधिकार स्थापित कर लिया था और उसने सिंधु पर हमला किया परन्तु १५१६ ई० तक वह सिन्धु को पार न कर सका। १५२४ ई० में दौलत खाँ और आलम खाँ, जो दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी के चाचा थे, ने बाबर को लाहौर पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित किया, परन्तु उसको इस बार पुनः सैन्य संगठन करने के लिए काबुल लौटना पड़ा और १५२५ ईसवी में ही बावर को सफलता प्राप्त हो सकी। 

पानीपत के महान युद्ध के पश्चात् बाबर को अप्रैल मास १५२६ ईसवी में विजय प्राप्त हुई और वह दिल्ली का शासक बन गया। इस प्रकार बावर के द्वारा ही भारत में मुगल साम्राज्य की नींव पड़ी और इस वंश की मुगल संस्कृति तथा सभ्यता का भारत में सूत्रपात हुआ। बाबर पैतृक सम्बन्ध में तैमूर, से मातृ सम्बन्ध में चंगेज वंश से सम्बन्धित था। 

बाबर की माता मही चंगेजवंशीय मंगोल जाति की महिला थीं. इस वंश का नाम इस महिला के मंगोलवंशीय होने के कारण ही, इस महिला के नाम पर ‘मुगल-वंश’ पड़ा।

मुगलों का कला प्रेम

मुगल शासकों ने भारतवर्ष में राज्य विस्तार के साथ ही सुव्यवस्था स्थापित की और देश में शान्ति तथा समृद्धि बढ़ने लगी। मुगल सम्राटों को अपने वंशजों के समान ही चित्रकला, उद्यान तथा भवन निर्माण में अधिक रुचि थी। 

मुगल शहजादों तथा सामन्तों की अपनी-अपनी चित्रशालाएँ होती थीं। बादशाह तथा शहजादे (युवराज) स्वयं भी चित्रकला का अभ्यास करते थे। 

सम्राट प्रायः उच्च पदाधिकारियों, सभासदों तथा सामन्तों को अपने शबीहचित्र भेंट स्वरूप प्रदान करता था। मुगल साम्राज्य तथा शासकों के साथ-साथ मुगल कला का उत्तरोत्तर विकास हुआ और राजकुमारों, दरबारियों तथा सरदारों ने इस चित्रकला को पर्याप्त संरक्षण प्रदान किया, किन्तु औरंगजेब की कहर धार्मिक नीति के कारण मुगल साम्राज्य का ही पतन नहीं हुआ वरन् चित्रकला का वातावरण भी समाप्त हो गया। 

बाबर का कला प्रेम-बाबर ने भारत का राज्य सिंहासन १५२६ ई० में प्राप्त किया और १५३० ई० में उसकी मृत्यु हो गई। जहाँ एक ओर वह नीति कुशल शासक या और योद्धा था वहीं दूसरी ओर वह एक अच्छा लेखक तथा कवि भी था। 

उसने स्वयं अपनी आत्मकथा ‘तुके बावरी’ या ‘बाबरनामा’ नामक पुस्तक तुर्की भाषा में लिखी। इस आत्मकथा में उसने अपना जीता-जागता चित्र खींचा है। उसने विहज़ाद नामक चित्रकार का रोचक वर्णन किया है, जिससे उसकी चित्रकला के प्रति रुचि और विषय की जानकारी दिखाई पड़ती है। 

उसने एक स्थान पर लिखा है कि-चित्रकारों या शिल्पकारों में विहज़ाद का नाम प्रमुख है। वह एक कुशल चित्रकार था परन्तु दाड़ी रहित युवा चेहरे ठीक नहीं बनाता था। वावर ने एक अन्य चित्रकार शाहमुज़फ्फर के विषय में इस प्रकार लिखा है कि-‘एक अन्य चित्रकार शाहमुजफ्फर था। 

वह चित्रों में सादृश्य बहुत सुंदरता से ले आता था, परन्तु वह अधिक जीवित न रहा और उसकी उस समय मृत्यु हो गई जब वह ख्याति प्राप्त करने लगा था। इन लेखों से ऐसा प्रतीत होता है कि बाबर की चित्रकला में स्वयं बहुत रुचि थी और उसने ईरान के इन चित्रकारों की कृतियाँ भी देखी थीं वावर ने समरकंद की मस्जिद का वर्णन किया है जिसमें उसने यह भी उल्लेख दिया है कि वह चीनी तस्वीरों से सजी थी।

हुमायूँ – बाबर के पश्चात् हुमायूँ १५३० ई० में सिंहासन पर बैठा परन्तु उसका सारा जीवन लड़ाइयों में ही व्यतीत हुआ। बंगाल के शेरशाह तथा गुजरात के बहादुरशाह के कारण उसको भारत छोड़कर भागना पड़ा और उसको भारत के सिहासन को छोड़कर देश-विदेश की खाक छाननी पड़ी। 

हुमायूँ ने अपने भाई कामरों से सहायता प्राप्त करनी चाही परन्तु यह काबुल लोट गया और उसने पंजाब शेरशाह के लिए छोड़ दिया। तब हुमायूँ ने मारवाड़ के राजा मालदेव का आश्रय ग्रहण किया और सिंध के सरदारों से भी उसने सहायता प्राप्त की। 

जब वह अमरकोट के निकट सिन्ध के सरदारों से सहायता प्राप्त करने के लिए इधर-उधर भटक रहा था तो उसके पुत्र मोहम्मद जलालउद्दीन अकबर का जन्म २३ नवम्बर १५४२ ईसवी में हुआ। इसके पश्चात वह खानदेश होता हुआ १५४७ ई० में ईरान और फिर फारस के शाह की शरण में पहुँचा। 

यहाँ १५५५ ईसवी के आरंभ में हुमायूँ के शिया मत ग्रहण करने के पश्चात् उसको पूर्ण सहायता प्राप्त हुई और उसने पुनः अपना खोया हुआ दिल्ली का राज्य बैरम खाँ जैसे योग्य सेनापति की सहायता से प्राप्त कर लिया। परन्तु १५५७ ईसवी में उसकी मृत्यु हो गई और वह केवल कुछ मास ही शासन कर सका।

हुमायूँ का कला प्रेम-हुमायूँ को अपने पिता के समान साहित्य तथा कला से प्रेम था।’ हुमायूँ अपनी कलाप्रियता तथा उदारता का अपने अल्प शासनकाल में युद्धों में उलझा रहने के कारण प्रदर्शन न कर सका परन्तु फिर भी जब वह वनवास काल में इधर-उधर भटक रहा था तब भी वह अपने साथ सचित्र पुस्तकें रखता था, जिससे उसका चित्रकला और साहित्य के प्रति गहरा प्रेम प्रकट होता है। 

एक बार जब वह सिन्ध और खानदेश की ओर से ईरान जा रहा था तो उसके साथ चित्रकार भी थे। इस यात्रा में एक दिन जब वह खेमे में बैठा था तो एक सुंदर कबूतर यहाँ आ गया। हुमायूँ ने उसको पकड़कर उसके पंख काटे और चित्रकारों से तस्वीर बनवाकर उसको छोड़ दिया।

१५४७ ई० में हुमायूँ जब शास्तसमास्य के दरबार में सहायता के लिए ईरान पहुंचा तो उसका दो महान ईरानी चित्रकारों-मीर सैय्यदअली ‘जुदाई’ और ख्वाजा अब्दुस्समद ‘शीराजी’ से परिचय हुआ था। ये दोनों चित्रकार शाहतहमास्प के दरबार में थे। 

हुमायूँ ने इन चित्रकारों से अपने साथ भारत चलने को कहा परन्तु उस समय ये चित्रकार हुमायूँ के साथ न आये। कुछ मास के पश्चात जब कन्धार तथा काबुल पर १५४७ ई० में हुमायूँ का अधिकार स्थापित हो गया तो ये दोनों चित्रकार उसकी सेवा में आ गये और हुमायूँ ने उनको दरबारी चित्रकार नियुक्त कर लिया और इनकी अध्यक्षता में स्वयं हुमायूँ तथा बालक अकबर ने चित्रकला का अभ्यास किया। 

अमीर हम्जा कहानी में मोहम्मद के चाचा अमीर हमज़ा की देश-देशान्तर विजय को आश्चर्यजनक साहसिक कहानी का वर्णन था। इस कथा का चित्रण सम्भवतः हुमायूँ के संरक्षण में किशोर अकबर के चरित्र निर्माण के लिए आरंभ हुआ। 

ये चित्र पूर्णतया फारसी शैली में तैयार किये गए परन्तु परवर्तीकाल में इनमें भारतीय पोषकों हिन्दू मूर्तियों, भारतीय ग्राम्य दृश्यों तथा जीवन का समावेश भी हो गया। 

” ये चित्र सूती कपड़े पर बनाये गए, जिनका आकार ६८४५२ सेंटीमीटर था।’ इन चित्रों में से अनेक अभी भी साउथ केसिंगटन म्यूजियम तथा ब्रिटिश म्यूजियम में सुरक्षित हैं।” 

अकबर १५५७ ई० में अकबर अपने पिता हुमायूँ की मृत्यु के पश्चात लगभग तेरह वर्ष की आयु में सिंहासन पर बैठा सिंहासन पर बैठते ही उसको कई लड़ाइयों लड़नी पड़ी और १५७० ई० के पश्चात ही उसको सांस्कृतिक उत्थान में योग देने का अवसर प्राप्त हुआ अकबर ने ‘दीनइलाही’ धर्म चलाकर अपनी धार्मिक उदारता का परिचय दिया। 

उसने मुसलमानों के धार्मिक कट्टरपन को नहीं माना और चित्रकला जो मुसलमान धर्म में निषिद्ध थी की उन्नति के लिए सतत् प्रयत्न किये उसने स्वयं अम्बर या अम्बेर (आमेर) के राजा बिहारीमल की पुत्री राजकुमारी जोधाबाई से विवाह किया और उसको धार्मिक स्वतंत्रता दी। 

इस साम्राज्ञी के लिए अन्तःपुर में वैष्णवधर्म के उपदेश देने की स्वतंत्रता थी। इस राजपूत रानी का पुत्र सलीम ही सिंहासन का उत्तराधिकारी बना। इस प्रकार से अकबर ने संधि की नीति को अपनाया और जहाँ उसने राजपूतों की संस्कृति पहनाचे आदि से बहुत कुछ लिया, यहाँ दूसरी ओर उसने उनके जीवन को बहुत कुछ प्रभावित भी किया। अकबर के कई विश्वसनीय और सहायक हिन्दू थे। 

जयपुर के राजा भगवानदास और राजा मानसिंह ने अकबर की ओर से राजपूतों से भयानक युद्ध किये। अकबर के दरबार में ‘नवरत्न’ अर्थात् नो उच्चकोटि के विद्वान या महान व्यक्ति थे। इन नवरत्नों में अब्बुल फज़ल, फैजी, तानसेन, बीरबल, अब्दुलरहीम खानखाना, टोडरमल, राजा मानसिंह, बिहारीमल तथा भगवान दास थे। 

इन नवरत्नों में अधिकांश हिन्दू व्यक्ति थे। अकबर के दरबार में अधिकांश चित्रकार कायस्थ, चितेरा, खाती तथा कहार जाति के थे। अकबर ने साहित्यकारों, दार्शनिकों, संगीतकारों तथा कलाकारों आदि में विशेष रुचि दिखाई जिसके फलस्वरूप अकबर के समय में प्रत्येक कला को प्रोत्साहन प्राप्त हुआ।

सम्राट अकबर- १५५६ ई० (मुगल शैली)

अकबर का कला प्रेम

अकबर के शासनकाल तक उत्तरी भारत में एक विशाल और समृद्ध साम्राज्य स्थापित हो चुका था। इस समय भारत पुनः प्रगति के लिए तत्पर हो चुका था। ऐसे शान्त और सुखद वातावरण में ललित कलाओं का विकास होता है अतः चित्रकला भी मुगल दरबार के राजसी वैभव और राज्य विस्तार के साथ विकसित हुई। 

मुगल दरबार का वैभव भिन्न-भिन्न कलाकारों, साहित्यकारों, संगीतकारों तथा राजपूत सरदारों को आकर्षित कर रहा था। सम्राट अकबर की कलाप्रियता के कारण कलाकारों एवं विद्वानों को दरबार में समादर और सुखद आश्रय भी प्राप्त हो रहा था। अकबर की चित्रशाला में लगभग छः गुजराती चित्रकार थे। 

इससे स्पष्ट है कि उत्तम आश्रय प्राप्त करने के लिए कुशल चित्रकार मुगल दरबार की ओर आकर्षित हो रहे थे। अकबर ने भवन- कला तथा चित्रकला को विशेष महत्त्व प्रदान किया और उसने अपनी उदारता से इनको एक नवीन रूप प्रदान किया।

वास्तव में अकबर की रुचि युवाकाल से ही चित्रकला की ओर थी। पहले बताया जा चुका है कि अकबर ने भवन कला तथा चित्रकला का अभ्यास किया था। 

जहाँगीर के आत्मचरित्र ‘तुके जहाँगीरी’ से भी इस बात की पुनः पुष्टि होती है जहाँगीर ने एक रोचक घटना का वर्णन करते हुए लिखा है कि अकबर की ताजपोशी के समय (सिंहासन पर आसीन होने के समय जब हेमू ने विद्रोह किया, और अन्त में उसको पराजित कर जब बंदी बनाकर अकबर के सम्मुख लाया गया तो अब्दुलरहीम खानखाना के पिता बेरमखां ने सम्राट से प्रार्थना की कि इस काफिर को मारकर गिजा (धर्मयुद्ध का यश) को प्राप्त करें। 

इस पर अकबर ने कहा कि-” में तो इसे पहले ही टुकड़े-टुकड़े कर चुका हूँ। जब में काबुल में ख्वाजा अब्दुस्समद ‘शारीकलम’ से चित्रकारी सीखता था तो एक दिन मेरी तुलिका (कलम) से एक ऐसा चित्र बन गया जिसके अंग अस्त-व्यस्त या कटे-फटे थे। पास बैठे एक व्यक्ति ने जब पूछा कि यह किसकी सूरत है तो मेरे मुँह से अकस्मात उत्तर ‘हेमू’ निकल पड़ा।”

अकबर के समय में चित्रकारों का स्थान

अकबर ने चित्रकारों तथा चित्रकला में अत्यधिक रुचि दिखाई। अब्बुल फजल ने ‘आइने अकबरी’ में लिखा है कि बादशाह स्वयं अपनी शबीह या अपना मुखाकृतिचित्र बनवाने के लिये बैठता था और उसने अपने दरबारियों के चित्र भी बनवाये। 

अकबर ने एक बार स्वयं यह भी कहा था कि ऐसे बहुत से व्यक्ति हैं जो चित्रकला से घृणा करते हैं परन्तु ऐसे व्यक्ति मेरे स्नेह-भाजन नहीं हैं। धार्मिक नियमों के अंधविश्वासी चित्रकला के घातक शत्रु हैं परन्तु अब उनके नेत्र सत्य का अनुभव करते हैं।’ 

आईने अकबरी के लेखक अब्दुल फजल ने यह भी विवरण दिया है कि अकबर ने सौ से अधिक चित्रकारों की नियुक्ति की, जो फतेहपुर सीकरी के एक विशेष भवन में कार्य करते थे।” 

यह कार्य १५७० ई० से १५८५ ई० तक इस चित्रशाला में सुचारु रूप से चलता रहा। चित्रशाला के निरीक्षक चित्रकारों के इस भवन का सप्ताह में एक बार निरीक्षण करते थे। ये निरीक्षक चित्रकारों की कृतियाँ सम्राट के सम्मुख प्रस्तुत करते थे सम्राट चित्रकारों की कार्यकुशलता के अनुसार उनको इनाम देता था और उनका वेतन बढ़ा दिया जाता था।” 

इस चित्रशाला के अध्यक्ष उस्ताद मीर सैय्यद अली तथा ख्वाजा अब्दुस्समद थे। चित्रकारों के लिए दरबार में उच्च पद दिये जाते थे और चित्रकार मनसबदार हुआ करते थे । उच्चकोटि के चित्रकारों को ५०० मनसबदारी तक के ओहदे प्रदान किये जाते थे। 

अब्दुस्समद की ५०० मनसबदारी के पद पर नियुक्ति हुई परन्तु उसका पद छोटा होते हुए भी दरबार में उसकी कला के कारण उसका विशेष सम्मान था। १५७३ ई० में जब अकबर ने गिने-चुने २७ सरदारों के साथ अहमदाबाद पर तूफानी आक्रमण किया तो उसके दल में तीन चित्रकार थे। 

अकबर ने यह धावा राजस्थान पार करके गर्मी के मौसम में साणीयों (ऊँटनियों) पर यात्रा करके किया था और ६०० मील की यात्रा ११ दिन में तय की थी। इस सरनाल के युद्ध में तीन चित्रकार (१) साँवलदास, (२) जगन्नाय तथा (३) तारानाथ साथ गये थे। साँयलदास ने इस युद्ध का मार्मिक चित्र बनाया था। 

अकबर ने अपने चित्रकारों को प्रोत्साहन प्रदान करने के लिए उच्च पद तथा इनाम ही नहीं बल्कि उपाधियाँ भी प्रदान की और उसने अनेक चित्रकारों को ‘नादिर उलमुल्क’ (देश का आश्चर्य) तथा हुमायूंनसाठी (राज्य का शुभ या मंगलमय) की उपाधियों से विभूषित किया।

अकबर के दरबारी चित्रकार

‘वाकायत-ऐ-बाबरी’ की अकबरकालीन प्रति में उन्नीस उच्चकोटि के हिन्दू और तीन उच्चकोटि के मुसलमान चित्रकारों का उल्लेख है, परन्तु ‘आईने अकबरी’ में तेरह उच्चकोटि के हिन्दू और चार मुसलमान चित्रकारों का वर्णन है।” 

अकबर के समय में भिन्न-भिन्न देशों से चित्रकार मुगल दरबार की ओर आकर्षित होकर आ रहे थे आइने अकवरी के अनुसार इस समय के कलाकारों में कलमाक के फर्रुख, अब्दुस्समद (शीराजी) तथा तक्रेज के भीरसेय्यद अली से यह स्पष्ट है कि विभिन्न कलाकार ‘सुदूर देशों’ से मुगल दरबार में राज-आश्रय ग्रहण करने के लिए आ रहे थे। जहाँगीर के समय में समरकन्द से भी चित्रकार आये। 

अकबर के समय में हिन्दू तथा मुसलमान चित्रकारों में कोई भेदभाव न था क्योंकि ‘आईने अकबरी’ में अब्बुलफज़ल ने लिखा है कि ‘यह सत्य है कि हिन्दुओं के चित्र हमारी चित्रकला को मात करते हैं। 

वास्तव में सम्पूर्ण संसार में उनके जैसे चित्रकार बहुत कम मिलते हैं आइने अकबरी के अनुसार, अकबर की चित्रशाला के चित्रकार कायस्थ, चितेरा, सिलावट तथा खाती जाति के थे। 

इस समय के तेरह हिन्दू चित्रकारों के नाम प्राप्त हैं, जिनमें दसवन्त, बसावन, केशव लाल, मुकुंद, मधु, जगन, महेश, तारा, सांवल, खेमकरन, हरवंश तथा राम थे। ‘दसवन्त’ कहार जाति का था। वह पालकी उठाया करता था और दीवार पर लिखाई भी करता था। 

एक बार सम्राट अकबर ने उसको दीवार पर लिखते हुए देखा तो उसको सम्राट ने अपनी सेवा में रख लिया। आगे चलकर दसवंत एक कुशल चित्रकार सिद्ध हुआ। मिस्किन भी अकबर के दरबार में एक निपुण पक्षी – चित्रकार था। ‘बसावन’ चित्र की पृष्ठिका बनाने के काम में निपुण था। 

अब्बुल फजल ने लिखा है कि, “कई ऐसे चित्रकार तैयार हो गये हैं जो विहज़ाद और यूरोप के चित्रकारों से टक्कर लेते हैं। अकबर के दरबार में जब कोई अतिथि आता तो उसको वह अपनी चित्रशाला भी दिखाता था जहाँगीर ने अपने आत्मचरित्र में लिखा है कि, ‘वह अब्दुस्समद को बड़े सम्मान से रखता था, अकबर ने उसको १५५७ ई० में अपनी टकसाल का अधिकारी बना दिया। जगन्नाथ, धरमदास, नन्द ग्वालियरी, भीम गुजराती तथा शंकर भी इस समय के अच्छे चित्रकार थे।’

अकबर के काल के प्रमुख चित्रकार

अकबर के काल में जिन कलाकारों ने कला विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया उनमें चार कलाकारों के नाम प्रमुख हैं। ये चित्रकार १. मीर सैय्यद अली, २. ख्वाजा अब्दुस्समद शीराजी, ३. दसवंत तथा ४ बसावन थे। इन चित्रकारों ने ही मुगल शैली को जन्म दिया।

मीर सैय्यद अली

मीर सैय्यद अली ‘जुदाई’ अकबर के दरबार का मीर मुसव्विर (मुख्य चित्रकार था) वह सफवी शैली या फारसी-ईरानी शैली का कुशल चित्रकार था। उसका जन्म सोलहवीं शताब्दी में फारस के तब्रेज नामक नगर में हुआ था। 

उसके पिता सुल्तानिया के शाह के दरबार में मीर मुसब्बर (प्रधान चित्रकार) थे अतः किशोर अवस्था में ही मीर सैय्यद अली ने चित्रकला तथा लिपि लेखन कला-सुलेखन लिपि या खतेतोहरा का उत्तम अभ्यास कर लिया था। 

काजी अहमद नामक लेखक ने १५९६-९७ ई० में रचित अपने ग्रंथ में लिपिकारों की नामावली में मीर सैय्यद अली का नाम दिया है। अकबर के दरबार के प्रसिद्ध लेखक अब्दुलफजल ने अपने ग्रंथ ‘आईने अकबरी’ में इसके पिता का नाम मीर मंसूर बताया है। 

१५४७ ई० में हुमायूँ जब शाहतहमास्प के दरबार में फारस (ईरान) पहुँचा तो उसकी भेंट यहाँ पर मीर सैय्यद अली से हुई और उसने मीर सैय्यद अली को अपने साथ भारत आने के लिए निमंत्रित किया परन्तु सैय्यद अली उस समय निर्वासित राजकुमार हुमायूँ के साथ नहीं आया। 

परन्तु जब इसी वर्ष हुमायूँ ने अपने भाइयों को पराजित करके काबुल तथा कन्धार पर अपना अधिकार कर लिया तो मीर सैय्यद अली तथा ख्वाजा अब्दुस्समद कुछ समय पश्चात् हुमायूँ के संरक्षण में काबुल आ गये। ये कलाकार निश्चित रूप से १५५० ई० तक काबुल आ गये थे। 

इन चित्रकारों ने काबुल में अमीर हम्जा की दास्तान पर आधारित चित्रों का निर्माण आरंभ कर दिया था जो अकबर के समय में पूर्ण हुआ। इस कार्य में अनेक हिन्दू तथा मुसलमान चित्रकारों की सेवाएँ भी ग्रहण की गई थीं।

मीर सैय्यद अली के बहुत कम चित्र ही आज प्राप्त हैं। इन चित्रों से उसकी प्रभावशाली सरल कला शैली का परिचय प्राप्त होता है और ये चित्र तब्रेज की ईरानी शैली के हैं। उसके चित्रों में आकृतियों आदि की व्यवस्था संयोजन संतुलित और सुनियोजित है। 

इसके चित्रों में वातावरण आकर्षक और प्रकृति की सुचना आलंकारिक है तथापि उसने बारीकी और सूक्ष्म चित्रण से आकृतियों आदि में वास्तविकता लाने की चेष्टा की है। उसने अपने चित्रों में दैनिक लोक जीवन से सम्बन्धित विषयों का अंकन किया है। 

उसने राजसी दरबारी जीवन की अपेक्षा नगर एवं ग्रामीण दृश्यों का चित्रण अधिक किया है। उसकी मानवाकृतियों की रचना विहजाद शैली की है और आकृतियाँ लम्बी पतली तथा लता के समान लचकदार हैं। उसकी आकृतियों में गरदन लम्बी-पतली सुराहीदार और चेहरे लम्बे बनाये गए हैं।

जब वह अकबर की दरवारी चित्रशाला में मीर मुसव्विर नियुक्त हुआ तो उसकी देखरेख में गुजराती तथा राजस्थानी चित्रकार काम करते थे। वह इन स्थानीय चित्रकारों से प्रभावित हुआ था। उसके प्रमुख चित्रों में गाय का वध करते जाक’, ‘लेला के सम्मुख जंजीरों में बंधा मजनूं, ‘बहराम तथा गड़रिया’, ‘मजनूं का जन्म’, ‘जामीकृत हफ्त ओरंग चित्रावली’ तथा ‘पिता मंसूर का व्यक्ति चित्र’ है। हम्जा नामा के प्रारंभिक चित्रों पर उसकी शैली का प्रभाव माना जाता है इसी कारण मीर सैय्यद अली को मुगल कला शैली का ‘जन्मदाता’ भी माना जाता है।

ख्वाजा अब्दुस्समद ‘शीराजी’

मीर सैय्यद अली के समान ख्वाजा अब्दुस्समद शीराजी’ भी अकबर के दरबार का मीर मुसव्विर था। वह भारत में मुगल शैली की चित्रकला के जन्मदाताओं में मीर सैय्यद अली के समान ही एक था। आइने अकबरी में उसके सम्बन्ध में पर्याप्त उल्लेख प्राप्त होता है। 

आइने अकवरी के अनुसार उसकी मधुर एवं कोमल चित्रशैली के कारण उसको ‘शीरीकलम’ की उपाधि प्रदान की गई थी। उसका जन्म ईरान के प्रसिद्ध नगर शीराज में हुआ था। शीराज ईरान में अपनी कला और कलाकारों के लिये प्रसिद्ध था और शीराज़ नगर दूर-दूर तक एक कला केन्द्र के रूप में सुविख्यात था। ख्वाजा अब्दुस्समद का पिता फारस के राज्यपाल के दरबार में मंत्री था। 

१५४५ ई० में जब हुमायूँ फारस की राजधानी तक्रेज नगरी में था तो ख्वाजा अब्दुस्समद उसके पास गया और उसने परिचय प्राप्त किया। हुमायूँ ने उसे अपने साथ भारत चलने के लिये निमंत्रित किया लेकिन उस समय वह उसके साथ नहीं आया १५४७ ई० में हुमायूँ की काबुल विजय के पश्चात् १५४६ ई० में वह हुमायूँ के आश्रय में काबुल दरबार में पहुँच गया तैमूरनामा के अनुसार यहाँ पर स्वयं हुमायूँ तथा किशोर शहजादे (युवराज) अकबर ने उससे चित्रकला की शिक्षा ग्रहण की। 

१५५६ ई० में अकबर ने अपने सिंहासनारोहण के पश्चात् ख्वाजा अब्दुस्समद को विशेष सम्मान दिया। इस समय से उसकी कलाशैली में उत्तरोत्तर परिमार्जन, निखार और विकास आया। इसकी कृतियों में बाह्य रूपों के साथ-साथ आन्तरिक भावना तथा आत्मा मुखरित होने लगी। 

वह अकवर की चित्रशाला का प्रधान कलाशिक्षक अर्थात उस्ताद मुसव्विर भी था और उसके शिष्य उत्तम कलाकार सिद्ध हुए। उसके शिष्यों में दसवन्त उत्तम चित्रकार था। पर्सी ब्राउन की यह धारणा है कि हुमायूँ के संरक्षण में अब्दुस्समद ने मीर सैय्यद अली की दास्ताने अमीर हम्जा के चित्रों का निर्माण किया था।

अकबर अब्दुस्समद को केवल एक श्रेष्ठ चित्रकार ही नहीं समझता था अपितु उसका दरबार में उच्च सम्मान था। अपने पिता हुमायूँ का समकालीन तथा सहायक होने के कारण अकबर उसको आदर और सम्मान से रखता था। यद्यपि वह अकबर के दरबार में चार सौ मनसबदारी के पद पर नियुक्त किया गया था परन्तु उसका दरबार में सम्मान बहुत अधिक था। 

उसके पुत्र शरीफ को अकबर ने अपने पुत्र युवराज (शहजादा) सलीम का मदरसे के लिये साथी (खानज़द) बना दिया था। १५७६ ई० में अकबर ने अब्दुस्समद को फतेहपुर सीकरी स्थित अपनी टकसाल का अधिकारी बना दिया और सन् १५८४ ई० में उसको मुल्तान के सूबे का दीवान बना दिया था। अनुमानतः अब्दुस्समद का निधन १५८५ ई० के लगभग हुआ। वह दीन-ए-इलाही का अनुयायी था।

अब्दुस्समद अपनी सुलिपि के लिये बहुत प्रसिद्ध था लेकिन चित्रकार के रूप में उसका अधिक महत्त्वपूर्ण योगदान है। उसने जो आरम्भिक चित्र बनाये हैं उनकी शैली तब्रेज सफबी शैली हे अमीर हम्जा चित्रावली के निर्माण के लिये अकबर ने जो पचास चित्रकार नियुक्त किये थे उनका निर्देशन पहले मीर सैय्यद अली ने और बाद में ख्वाजा अब्दुस्समद ‘शीराजी’ ने किया था।

दसवन्त

अब्बुलफज़ल ने आइने अकबरी में दसवन्त का जो विवरण प्रस्तुत किया है उससे ज्ञात होता है कि वह कहार का लड़का था। आरंभ में वह अकबर की फतेहपुर सीकरी स्थित दरबारी चित्रशाला में सेवक था और चित्रशाला के काम में दिलचस्पी के कारण दीवारों पर लिखाई का काम या बेलबूटे की लिखाई या चित्र बनाने का काम करता था। 

एक दिन उसको लिखाई करते देखकर सम्राट अकबर की कृपा-दृष्टि उस पर पड़ी और सम्राट ने उसकी कला प्रतिभा को देखकर भली-भाँति जाँच लिया और उसने दसवन्त को ख्वाजा अब्दुस्समद की देख-रेख में चित्रकला के अभ्यास के लिए सौंप दिया। 

दसवन्त कुछ समय में कला शिक्षा ग्रहण करके एक अद्वितीय चित्रकार के रूप में विकसित हो गया। दसवन्त के जीवन के सम्बन्ध में अधिक विवरण प्राप्त नहीं हैं। अब्बुलफज़ल के अनुसार वह पागल हो गया था और उसने आत्महत्या कर ली थी।

अनुमानतः दसवन्त ने अमीर हम्ज़ा चित्रावली के भी कुछ चित्र बनाये हैं। उसने जो अन्य चित्र बनाये है उनमें से कुछ पर ही उसका नाम अंकित है तैमूरनामा के एक चित्र की अनुकृति तथा रज़्मनामा के अनेक चित्रों पर उसका नाम अंकित है। उसके द्वारा बनाया हुआ एक चित्र राष्ट्रीय संग्रहालय-नईदिल्ली में भी है जिस पर उसके हस्ताक्षर अंकित हैं। 

जयपुर के रज़्मनामा वाली प्रति से उसकी श्रेष्ठ शैली का अनुमान लगाया जा सकता है। इस रज्मनामा के २१ चित्रों पर दसवन्त का नाम अंकित है जिनका रचना काल १५८४ ई० में अनुमानित है। उसके साथ काम करने वाले चित्रकारों में मिस्कीन, सरवन तथा केतु का नाम विशेष है।

दसवन्त ने भारतीय वातावरण का कुशलता से चित्रण किया है। उसने भारतीय देवी-देवताओं का चित्रण सुंदरता से किया है। यह देव आकृतियाँ चित्र के अधिकांश भाग पर अपना महत्त्व तथा प्रभुत्व स्थापित किये हुए प्रतीत होती हैं। उसने भयंकर राक्षसी आकृतियाँ बड़ी आतंकपूर्ण और विचित्र बनाई है उसने पौराणिक कथानकों के चित्रण में विशेष रुचि दर्शाई है। 

उसकी आकृतियों के चित्रण में परिप्रेक्ष्य तथा दूरी का आभास होता है उसके चित्रों में केन्द्रीय आकृति के उचित संयोजन से संतुलन स्थापित किया गया है। उसके चित्रों में हिन्दू परम्पराओं की प्रबलता के साथ-साथ यूरोपीय कला तथा आकृति निर्माण का प्रभाव भी है।

बसावन

अकबर के दरबारी चित्रकारों में बसावन एक कुशल चित्रकार था और उसको दरबार में अपनी कला प्रतिभा दर्शाने के कारण उचित महत्त्व तथा सम्मान प्राप्त था। उसने लगभग एक सौ से अधिक सुंदर तथा उत्कृष्ट चित्रों की रचना की। परन्तु खेद है कि उसके जीवन के सम्बन्ध में विशेष जानकारी नहीं प्राप्त होती । 

वह हिन्दू था अतः उसने हिन्दू जीवन की अपने चित्रों में झाँकी प्रस्तुत की है। उसने मीर सैय्यद अली तथा ख्वाजा अब्दुस्समद की देख-रेख में मुगल शैली की शिक्षा ग्रहण की अब्दुलफजल ने आइने अकबरी में दसवन्त के परिचय के पश्चात् बसावन का उल्लेख करते हुए बसावन की बड़ी तारीफ की है। 

इन दोनों चित्रकारों ने तैमूरनामा तथा रज़्मनामा के चित्रों का निर्माण किया है। बसावन का पुत्र मनोहर जहाँगीर के दरबार में मुगलशैली का प्रसिद्ध चित्रकार था ।

बसावन के चित्रों में वहारिस्ताने जामी पर आधारित एक चित्र में शेख अबू-उल-कस्साब को एक दरवेश (संत) के दर्शन करते हुए अंकित किया गया है। यह दोनों व्यक्ति बातचीत करते हुए एक मण्डप में चित्रित किये गए हैं। दरवेश शेख की बात को सुनते हुए अपनी सुई में धागा डालते हुए दर्शाया गया है। 

मण्डप के विवरण सुंदरता से अंकित हैं और मण्डप के अंकन में यूरोपीय परिप्रेक्ष्य का प्रयोग नहीं है। अप्रभूमि में गठीले सने वाला एक पुराना भारी घना वृक्ष चित्रित है इन दोनों व्यक्तियों की मुखाकृतियों को बारीकी (सूक्ष्मता) से लिखा गया है और उनमें चरित्र चित्रण की यथार्थता झलकती है। 

आकृतियों की मुद्राएँ तथा भंगिमाएँ भावपूर्ण तथा स्वाभाविक हैं। उसकी आकृतियों में वस्त्रों की बनावट पर यूरोपीय कला का प्रभाव है और आकृतियों में गठनशीलता तथा छाया-प्रकाश का प्रयोग उत्तम है उसने लगभग ४० वर्ष तक चित्र निर्माण किया और बड़ी संख्या में चित्र बनाये। उसके साथी सहायक कलाकारों में भीम गुजराती तथा मिरिकन चित्रकार थे।

अभ्युलफज़ल के अनुसार बसावन ने चित्र में पृष्ठभूमि निर्माण, मुखाकृतियों की चारित्रिक विशेषताओं का चित्रण तथा रंगों का सम्मिश्रण यथा रूप किया है।

अकबर के काल में कला सामग्री

‘आइने अकबरी’ में अब्दुलफज़ल ने लिखा है कि-‘चित्र बनाने की सामग्री में बहुत उन्नति हुई और रंग बनाने की पद्धति भी सुधर गई है, जिससे चित्रों की तैयारी में सुविधा हो गई। अकबर के समय में उत्तम प्रकार के रंग और कागज़ का निर्माण भी होने लगा था। 

पहले कागज़ ईरान से मंगवाया जाता था और चित्रकार (१) ईरानी तथा (२) इस्फानी कागज़ चित्र बनाने के लिए पसंद करते थे। सियालकोट (पंजाब) में कागज़ बनाने का एक मुगल कारखाना स्थापित किया गया और इस स्थान के नाम पर यहाँ का बना (३) ‘सियालकोटी-कागज़’ प्रसिद्ध हो गया। 

अकबर के समय में चित्रों के लिए उपयुक्त आकार का कागज़ कठिनाई से प्राप्त होता था। अतः चित्रकार छोटे-छोटे कागज़ों को बड़ी सावधानी से जोड़ते थे।” अब्दुलफजल लिखता है- धीरे-धीरे अनेक प्रकार के कागज़ प्रचलित होने लगे थे और उनका उत्पादन होने लगा। (१) सन से बने ‘सनी कागज’ (२) रेशम से बने ‘रेशमी’ या ‘हरीरी कागज’ (३) बॉस से बने ‘बाँसी कागज’ तथा (४) टाट से बने ‘तुलोट कागज़’ का प्रचलन भी हो गया। 

दौलताबाद में भी कागज का बड़ा उद्योग विकसित हो गया था। परन्तु सुदूर दक्षिण तक कालान्तर में भी हिन्दुस्तान (उत्तर भारत) से कागज़ मंगाया जाता रहा दक्षिण में सियालकोट के बने कागज मुगली कागज के नाम प्रसिद्ध थे और चित्रकार इन कागज़ों को पसंद करते थे। 

मैसूर के चित्रकार स्थानीय कागज़ (खरदी कागज) का प्रयोग करते थे। ये सब कागज सफेद नहीं बल्कि हल्के भूरे रंग के थे। इस समय अनेक कागज़ प्रचलित थे, इनमें निम्न कागज़ लोकप्रिय थे- 

  • (१) दौलताबादी कागज़, 
  • (२) खटाई कागज़ (चीन के खटा नगर में बना कागज), 
  • (३) आदिल शाही, 
  • (४) सुल्तानी (समरकंद का कागज), 
  • (५) निजामशाही, 
  • (६) गौनी (तब्रेज में बनने वाला पीला कागज), 
  • (७) नुखयार पानी लगा कागज़, (सियालकोटी कागज)।

चित्रकार की तूलिका को ‘कलम’ कहते थे और चित्रकार को कलम करतार कहते थे। तूलिकाएँ गिलहरी, ऊँट, बकरे, भैंसे अथवा बिल्ली के बालों से बनाई जाती थीं।

अकबर का अमीरहम्ज़ा की कहानी के प्रति प्रेम और मुगल शैली का जन्म

मतीरउलउमरा के अनुसार" अकबर अमीरहम्जा की कहानी का बहुत शौकीन था इस विषद् कहानी में ३६० कहानियाँ थीं। यह इन कहानियों में इतनी अधिक दिलचस्पी लेता था कि अन्तःपुर में वह इन कहानियों को एक कथावाचक के समान सुनाया करता था। उसने इस दास्तान की आश्चर्यजनक एवं रोचक घटनाओं को आरम्भ से अन्त तक चित्रित कराया।"" उसने इस विशाल कथा को १२ खण्डों में विभाजित कराया। 

प्रत्येक खण्ड में एक सौ जुज (folios) थे और प्रत्येक जुज एक जिरा (zira) लम्बा था। प्रत्येक जुज़ में दो चित्र थे और प्रत्येक चित्र के सम्मुख भाग पर काज़वीन (मुंशी) ख्वाजा अताउल्ला के सुंदर लेख में विवरण लिखा हुआ था तंज निवासी नादिर उल मुल्क हुमायूँनशाही सैय्यदअली जुदाई की देखरेख में पहले बिहज़ाद के समान तूलिका या कलम वाले चित्रकार इस पुस्तक के तैयार करने के लिए नियुक्त किये गए और बाद में शीराज़ के ख्वाजा अब्दुस्समद की देख-रेख में यह कार्य चलता रहा। 

अब्बुलफज़ल के अनुसार किसी ने भी इस पुस्तक के समान दूसरा जवाहर नहीं देखा होगा और न किसी राजा के पास इसके बराबर कोई मूल्यवान वस्तु थी। इस समय यह पुस्तक ‘शाही पुस्तकालय’ में है। उपरोक्त पचास सहायक चित्रकारों में अधिकांश भारतीय तथा अन्य फारसी चित्रकार रहे होंगे। 

इन कृतियों में कुछ ही अंशों में फारसी प्रभाव है और किसी सीमा तक भवन, पहनाया, वृक्ष आदि भारतीय हैं। इन चित्रों पर यूरोपीय प्रभाव स्पष्ट दिखाई पड़ता है। एक ही चित्र में फारसी या ईरानी, भारतीय तथा यूरोपियन प्रभाव दिखाई पड़ता है, यही मुगल शैली है। ये चित्र मुगल शैली के आरम्भिक उदाहरण हैं। 

इन चित्रों में हुमायूँ के समय की फारसी शैली का प्रभाव अभी भी अधिक दिखाई पड़ता रहा। परन्तु बाद में अकबर ने भारतीय जीवन का समावेश किया और १५७० ई० के पश्चात् अकबर ने शान्ति से चित्रकला को अत्यधिक समय और संरक्षण प्रदान किया। 

आइने अकबरी में अब्बुलफजल लिखता है कि सम्राट ने अपने यौवन काल के आरम्भ से ही चित्रकला के लिए बहुत रुचि प्रदर्शित की और श्रीमंत (अकबर) ने उसको मनोरंजन और ज्ञान का साधन माना।” अकबर ने फारसी ही नहीं बल्कि हिन्दू महाकाव्यों- ‘महाभारत’, ‘रामायण’, ‘योगवशिष्ठ रामायण’ आदि ग्रंथों के आधार पर भी चित्र बनवाये और उनका फारसी भाषा में अनुवाद कराया। इसी समय महाकवि केशव की ‘रसिकप्रिया’ पर अतुलनीय चित्र बनाये गए।

अकबर की चित्रशाला में हिन्दू तथा मुसलमान कारीगर, चित्रकार तथा मुंशी कंधे से कंधा मिलाकर काम करते थे। इस प्रकार हिन्दुओं की भारतीय चित्रकला तथा मुसलमानी तिमरुदी या फारसी ईरानी कला का पूर्ण सम्मिश्रण होता चला गया। 

अकबर की चित्रशाला में बहुत से भारतीय चित्रकारों को फारसी चित्रकला सिखाई गई और इस आदान-प्रदान से गुजराती, राजस्थानी और अजन्ता की भित्तिचित्र परम्परा का ईरानी या फारसी शैली पर प्रभाव पड़ा और यह भारतीय ईरानी या भारतीय तिमरुदी या भारतीय- फारसी शैली मुगल शैली में परणित हो गई। 

इसमें भारतीय प्रकृति और मुगल दरबार की अपनी निजी विशेषताएँ दिखाई पड़ती हैं, और किसी प्रकार भी इसको फारसी शैली की भारतीय शाखा नहीं मानना चाहिए, (देखिए छायाफलक संख्या-३) मुगल कला की उपलब्धियों फारसी शैली से आगे बढ़ गई और उसका अपना मौलिक इतिहास, विकास-क्रम और महत्त्व है और उसमें भारतीय भावना और वातावरण है।

अकबर के समय में तैयार की गई ‘बाबरनामा’ की एक सचित्र प्रति ‘राष्ट्रीय संग्रहालय’ नई दिल्ली में सुरक्षित है। इस प्रति के जुज़ ११६ में चौबीस चित्र हैं, जिन पर खेम का लेख – है, इससे ज्ञात होता है कि यह प्रति अकबर के शासन काल के बयालीसवें वर्ष अर्थात् १५६८ ई० में तैयार की गई इस प्रति में कुल १८३ चित्र है और इस प्रति में निम्न ४e चित्रकारों के नाम मिलते हैं, जिन्होंने इस प्रति में चित्र बनाये है

(१) अनन्त, (२) असी, (३) असी कहाँर, (४) इब्राहीम कहाँर, (५) केशव कहाँर, (६) खेम कहाँर, (७) खेमकरन, (८) गोविंद, (६) जगन्नाथ, (१०) जमशेद, (११) जमाल, (१२) तुलसी, (१३) दोलत (१४) दोलत खानजादा (१५) धनराज, (१६) धशू, (१७) धर्मदास, (१८) नकी खानजादा, (१६) नन्द कलन, (२०) नन्द कुंवर, (२१) नरसिंह, (२२) नाना, (२३) पयाग, (२४) पारस, (२५) प्रेम (२६) फात्, (२७) फर्रुख चेला, (२८) वेदी, (२६) बनवारी खुर्द, (३०) भगवान, (३१) भवानी, (३२) भाग्य, (३३) भीम गुजराती, (३४) भूरा, (३५) मनरा, (३६) मंसूर, (३७) महेश, (३८) माधो, (३६) मिस्किन, (४०) मोहम्मद कश्मीरी (४१) लक्ष्मण, (४२) लौंग, (४३) शंकर, (४४) 1 शिवदास, (४५) सरबण, (४६) सूरदास, (४७) हज़ारा तथा (४८) हुसैन। 

कई चित्रों पर चित्रकारों का नाम नहीं है। इसी प्रति पर शाहजहाँ के हस्ताक्षर हैं, जिससे यह स्पष्ट है कि यह प्रति शाही पुस्तकालय की होगी। इस प्रति के चित्रों में आकृतियों की बनावट तथा एक चश्म चेहरे फारसी शैली के हैं, परन्तु सपाट रंग का प्रयोग और लाल रंग की अधिकता भारतीय शैली की है इन चित्रों में पहनावा अकबर कालीन है।

धीरे-धीरे मुगल शैली में प्रचलित फारसी विषय जैसे ‘शीरी-फरहाद’, ‘लैला-मजनूं’ तथा फारसी कवि निज़ामी के काव्य का स्थान भारतीय काव्य तथा कथाओं ने ग्रहण कर लिया। ऐसे प्रमाण मिलते हैं कि युवराज दानियाल (१५७२-१६०४ ई०) ने कहा था कि “फरहाद तथा शीरी की प्रेम गाथा पुरानी हो चुकी है यदि हम उसको पढ़ते हैं तो उसको हमारे निजी दर्शन और श्रवण के अनुरूप होना चाहिए।” (सूज-ऊ-जुदाज नाउई) इस वाक्य से उस समय की मुगल- सभ्यता की पूर्ण झाँकी मिल जाती है।

जहाँगीर 

चित्रकला के जिस संस्थान का बीजारोपण अकबर ने किया था वास्तव में वह जहाँगीर (१६०५-१६२७ ईसवी राज्यकाल) के समय में पूर्ण यौवन और विकास को प्राप्त हुआ। जहाँगीर उदार, ‘हयईए’ प्रेमी, लेखक, चित्रकार और योग्य न्यायप्रिय शासक था। उसने अपनी आत्मकथा ‘तुजके जहाँगीरी’ लिखी है जो एक उच्चकोटि की स्मृतिकथा है। जहाँगीर की चित्रकला के प्रति रुचि-उसने अपने युवाकाल में ही चित्रशाला को

संरक्षण दिया और अपने चित्रकार नियुक्त किये थे। उसकी चित्रशाला में अनेक चित्रकार वही थे जो अकबर की चित्रशाला में कार्य कर चुके थे सम्राट ने स्वयं अपनी आत्मकथा में कई चित्रकारों तथा चित्रों का उल्लेख किया है। 

साथ ही सम्राट ने अपने चित्रकला के प्रति प्रेम और ज्ञान का बड़े सुंदर शब्दों में वर्णन किया है जो इस प्रकार है- मेरी चित्र के प्रति रुचि और उसकी जाँच करने का अभ्यास इस सीमा तक पहुँच गया है कि जब किसी मृत या जीवित कलाकार की कृति बिना बताये मेरे सम्मुख लायी जाती है तो मैं कुछ ही क्षणों में बता देता हूँ कि यह अमुक-अमुक व्यक्ति का कार्य है। 

यदि एक चित्र में कई शबीहाँ हों और प्रत्येक चेहरा भिन्न चित्रकार का बनाया हुआ हो तो मैं पहचान सकता हूँ कि कौन सा चेहरा उनमें से किसका बनाया हुआ है। यदि एक चेहरे में ही किसी दूसरे आदमी ने आँख और भृकुटी बनाई है, तो में यह पहचान सकता हूँ कि वास्तविक चेहरा किसका बनाया हुआ है और आँख और भौहें किसने बनाई हैं।’ इससे जहाँगीर का चित्रकला विषयक ज्ञान सुस्पष्ट है।

जहाँगीर को यूरोपीय चित्रों में भी पर्याप्त रुचि थी और उसने कई धार्मिक तथा जीवन सम्बन्धी यूरोपीय चित्र उपलब्ध कर लिये थे एक बार एक अंग्रेज राजदूत सर टामस रो जहाँगीर के दरबार में आया तो उसने जहाँगीर के लिए कुछ चित्र दिखाये जिनमें से एक चित्र जहाँगीर को बहुत पसंद आया, जो उसने सर टामस रो से एक रात के लिए ले लिया। 

दूसरे दिन सम्राट ने सर टामस रो के सम्मुख उस चित्र की पाँच प्रतियाँ प्रस्तुत कर दीं और ‘रो’ को यह पहचानना कठिन हो गया था कि उनमें से कौन सी उसकी मूल तस्वीर है। इस पर सम्राट ने कहा-‘हम चित्रकला में उतने निर्बल नहीं हैं, जितना तुम हमको समझते हो।’ जहाँगीर को अपने चित्रकारों पर बहुत अभिमान था। 

अकबर के समान जहाँगीर ने चित्रकारों की सुविधाजनक स्थिति को और अधिक महत्त्व दिया, इसी कारण अनेक कलाकार उसके दरबार में आये।

‘तुज़के जहाँगीरी’ में जहाँगीर ने एक स्थल पर कश्मीर में बनवायी एक चित्रदीर्घा या गैलरी का वर्णन दिया है, उसके अनुसार यह दीर्घा कुशल चित्रकारों के हाथों से अलंकृत थी। सबसे अधिक सम्माननीय स्थान पर हुमायूँ की छवि थी और मेरे पिता का चित्र मेरे भाई शाह अब्बास के सम्मुख था। 

उनके बाद मिर्जा कामरा, मिर्जा मोहम्मद हकीम, शाह मुराद और सुल्तान दानियाल की छवियाँ थीं दूसरी मंजिल पर अमीरों और विशेष सेवकों की छवियाँ थीं। बाह्य कक्ष की दीवारों पर कश्मीर के रास्ते के कई स्थलों के दृश्य जिस क्रम से मैंने देखे थे उसी क्रम से चित्रित किये गए थे।’ 

इस प्रकार की दीर्घा तथा चित्रों का समय १६२० ई० अनुमानित है। इसी प्रकार का एक सुंदर शाहीमहल (चश्मेनूर) जहाँगीर ने अजमेर में बनवाया था, जिसके सुंदर चित्रों से अलंकृत होने का उल्लेख मिलता है।

जहाँगीर के समय के चित्रकार और उनकी स्थिति-जहाँगीर के समय में चित्रकारों की स्थिति बहुत अच्छी थी। चित्रकार मनसबदार होते थे और उनके कार्य करने के लिए उत्तम चित्रशालाएं भी थीं, जिनमें भारतीय तथा फारसी या हिन्दू तथा मुसलमान चित्रकार कार्य करते थे। 

बादशाह स्वयं चित्रकारों का कार्य देखता था और जिन चित्रकारों का कार्य उत्तम होता था, उनको वह इनाम देता था और उस चित्रकार का वह वेतन भी बढ़ा देता था। उसने अपने दरवारी चित्रकार फार्रुख वेग (कुलमाक) के एक चित्र पर प्रसन्न होकर उसको दो हज़ार रुपये का इनाम दिया था। 

इसी प्रकार मंसूर के एक बेलगाड़ी के चित्र से प्रभावित होकर बादशाह ने उसको एक सहस्र मुद्राएँ पुरस्कार स्वरूप प्रदान की थीं। जहाँगीर अब्बुल हसन को अपने समय का सबसे अच्छा चित्रकार मानता था। अब्बुल हसन आकारिज़ा का पुत्र था और उसको सम्राट ने ‘नादिर उज्ज़मा’ (युग शिरोमणि) की उपाधि से विभूषित किया था। 

अब्दुल हसन के अतिरिक्त उस्ताद मंसूर जिसको ‘नादिर उल असर’ की उपाधि प्रदान की गई थी, पशु-पक्षियों के चित्रण तथा रेखांकन में अपनी संतति का अद्वितीय कलाकार था। छवि अंकन के लिए विशनदास बेजोड़ चित्रकार था।

जहाँगीर के दरबार में चित्रकार की सुनिश्चित स्थिति देखकर विभिन्न फारसी चित्रकार उसकी शरण में आये। इन चित्रकारों में कुलमाक का सुप्रसिद्ध चित्रकार फार्रुखवेग, हिरात का आकारिजा और उसका पुत्र अब्बुल हसन, स्मार्क का मोहम्मद नादिर तथा मोहम्मद मुराद ऐसे ही चित्रकार थे, जो जहाँगीर के दरबार में सुदूर देशों से आये इसी प्रकार भारतीय चित्रकार भी जहाँगीर के दरबार में आ रहे थे। 

इन चित्रकारों में गोवर्धन, मनोहर, दौलत तथा उस्ताद मंसूर थे। उस्ताद मंसूर भारतीय मुसलमान था। जहाँगीर के दरबार में इन चित्रकारों के अतिरिक्त अकबर की चित्रशाला के चित्रकार भी उसी प्रकार कार्य करते थे। मनोहर को पशु-चित्रण में, उस्ताद मंसूर और मिस्किन को पक्षी चित्रण में उच्च स्थान प्राप्त था।

बादशाह प्रायः चित्रकार को यात्राओं और उत्सवों आदि के अवसर पर अपने साथ रखता था। जब वह शिकार आदि के लिए जाता था तो चित्रकार भी उसके साथ जाते थे। 

बादशाह इन अवसरों की घटनाओं पर चित्रकारों से चित्र बनवाया करता था। एक चित्र उदाहरण जिसमें शेर के शिकार का दृश्य है, से इस बात की पुष्टि होती है (इस चित्र का विवरण आगे दिया जाएगा. इस शिकार चित्र की आकृतियों की कल्पना नहीं की जा सकती और चित्रकार ने इस घटना को देखा होगा। 

अकबर को लड़ाइयों के दृश्यों के चित्र बनवाने में अधिक रुचि थी परन्तु जहाँगीर को शान्ति के प्रसंगों से सम्बन्धित चित्र बनवाने में अधिक रुचि थी।

जहाँगीर ने विदेशी चित्रकारों को बुलाकर अपने युवाकाल में ही फारसी कला को अधिक प्रोत्साहित किया था। इस प्रकार के चित्र उदाहरणों में एक ‘कलीलवयदिमनाह’ की प्रति है जो १६१० ई० में बनकर तैयार हुई थी और अब ब्रिटिश म्युजियम में सुरक्षित है। इन चित्रों से ऐसा प्रतीत होता है कि इस समय तक फारसी कलाकार मुगल शैली को पूर्णतया ग्रहण और आत्मसात नहीं कर सके थे।

शाहजहाँ

जहाँगीर की मृत्यु के पश्चात् शाहजादा खुर्रम शाहजहाँ के नाम से १६२८ ई० में सिंहासन पर बैठा और उसने १६५८ ई० तक राज्य किया। वह कट्टर सुन्नी मुसलमान था, इस कारण हिन्दू धर्म के प्रति उसकी भीति अनुदार थी। 

शाहजहाँ की विशेष रुचि भवन की ओर थी, अतः उसने भवन निर्माण तथा वास्तुकला के विकास में अत्यधिक योगदान दिया। शाहजहाँ द्वारा निर्मित भवनों में मोती मस्जिद जामा मस्जिद, लाल किला तथा दीवाने खास और दीवाने-आम कलापूर्ण होने के कारण महत्त्वपूर्ण हैं। 

उसके समय की वास्तुकला का भव्यतम उदाहरण ताजमहल है जो आज भी संसार के सात आश्चयों में से एक है। उसने अपनी प्रिय बेगम मुमताज़ महल की स्मृति में इस कलानिधि का निर्माण कराया और इस प्रेम स्मारक के लिए लगभग चार लाख पौंड स्टरलिंग का व्यय किया १६५० ई० में शाहजहाँ के पुत्र औरंगजेब ने उसे नज़रबंद कर दिया और आगरे के किले में उसकी १६६६ ई० में मृत्यु हो गई।

शाहजहाँ के समय के चित्रकार तथा उनकी स्थिति शाहजहाँ को अपने पूर्वजों के समान भवन निर्माण कराने में बहुत रुचि थी और उसका यह भवन प्रेम उनसे भी आगे बढ़ गया। इस कारण शाहजहाँ के राज्यकाल में चित्रकला उपेक्षित सी रह गई। यद्यपि चित्रकारों तथा चित्रों की संख्या उतनी ही रही. परन्तु इन चित्रों में पहले जैसी सजीवता और स्वच्छन्दता नहीं रही।

जहाँगीर की चित्रशाला के चित्रकार शाहजहाँ के दरबार में उसी प्रकार कार्य करते रहे, इनके अतिरिक्त उसने कुछ नवीन चित्रकारों की भी नियुक्ति की। गोवर्धन, मोहम्मद नादिर, विचित्तर, चित्रमन आदि उसके दरबार के प्रमुख चित्रकारों में गिने जाते थे। 

शाहजहाँ के समय में मुगल चित्रशाला और चित्रकारों की स्थिति प्रायः उसी प्रकार चलती रही जिस प्रकार की स्थिति जहाँगीर के दरबार में थी परन्तु शाहजहाँ के भवन प्रेम तथा कट्टरपन के कारण चित्रकला को यथेष्ठ प्रोत्साहन नहीं मिला और चित्रकारों की कृतियों में धीरे-धीरे दरवारी अदब-कायदे और बाह्य तड़क-भड़क ही रह गई।

दारा शिकोह (१६१५-१६५६ ई० ) – शाहजहाँ की तुलना में उसका ज्येष्ठ पुत्र शाहजादा दारा शिकोह चित्रकला का परमप्रेमी सिद्ध हुआ। दारा आध्यात्मिक रुचि का व्यक्ति था हिन्दू विद्वानों और चित्रकारों के प्रति उसे प्रेम था। दारा का चालीस चित्रों का मुरक्का या चित्राधार (एलबम ) जो अब इंडिया आफिस लाइब्रेरी, लंदन में सुरक्षित है, उसके अगाध कलाप्रेम का परिचायक है। 

दारा द्वारा अपनी प्रिय पत्नी नादिरा बेगम को उपहार में दिया हुआ एक चित्राधार भी इस मुरक्के में संगृहीत है यह मुरक्का उसने नादिरा बेगम को १६४१ – १६४२ ईसवी में भेंट किया था।*

औरंगजेब  

१६५८ ईसवी में शाहजहाँ को बंदी बनाकर उसका चतुर्थ पुत्र औरंगजेब आलमगीर के नाम से राजसिंहासन पर बैठा औरंगजेब कट्टर सुन्नी मुसलमान था। उसने हिन्दुओं को उच्च पदों से हटा दिया और जजिया फिर से लगा दिया। 

राजपूत राजा मुगल साम्राज्य के विरोधी हो गए और उन्होंने विद्रोह आरम्भ कर दिया। इस प्रकार जो शान्तिपूर्ण कलात्मक वातावरण उसके पूर्वजों ने बनाया था, समाप्त हो गया और कलाकार, विद्वान, हिन्दू सामंत तथा सरदार आदि सभी मुगल दरबार छोड़कर इधर-उधर भागने लगे।

चित्रकारों की स्थिति

औरंगज़ेब ने कला और कलाकारों के वातावरण को उसी प्रकार समाप्त कर दिया जिस प्रकार साकी और रिंद (सुरा पिलाने वाले और सुरा पीने वाले) की महफिल में कोई मोमिन (पवित्र व्यक्ति) बाधा बन जाता है। उसने चित्रकला को धर्मनिषिद्ध घोषित कर दिया और दरबार में चित्रकला का कोई भी स्थान न रहा। कलाकारों को नवीन आश्रय और संरक्षण प्राप्त करने के लिये छोटे-छोटे राज्यों की ओर भागना पड़ा। अधिकांश चित्रकार पहाड़ी राज्यों की ओर चले गये।

प्रायः मुगल सम्राट ही नहीं बल्कि अमीरउमरा भी अपने निजी चित्रकार नियुक्त करते थे। अतः दरवारी संरक्षण समाप्त हो जाने पर भी कुछ चित्रकार सम्भवतः इन अमीरों के संरक्षण में कार्य करते रहे औरंगज़ेब चित्रकला का कट्टर विरोधी था परन्तु फिर भी उसके युवावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक के चित्र मिलते हैं। 

यद्यपि आलमगीर चित्रकला का विरोधी था तो भी उसने अनुमानतः राजनीतिक उद्देश्य या आनंद के लिए चित्र बनवाये, ऐसे भी कुछ प्रमाण मिलते हैं कि जब उसने ग्वालियर के किले में कुछ राजबंदियों को बंदी बनाकर रखा, जिनमें उसका ज्येष्ठ पुत्र मुहम्मद सुल्तान भी था तो कहा जाता है कि वह उनको केवल एक प्याला पोस्त की खीर ही खाने को देता था ऐसा कहा जाता है कि इन भूखे राजबंदियों के शारीरिक परिवर्तनों को देखने के लिए या उसने अपने ज्येष्ठ पुत्र मुहम्मद सुल्तान की ममता के कारण समय-समय पर उनके चित्र बनवाये। 

इस प्रकार चित्रकला के जिस वृक्ष का बीजारोपण अकबर महान ने किया था और सम्राट जहाँगीर ने जिसको सींचा, उसको औरंगज़ेब ने समूल नष्ट कर दिया।

औरंगजेब से परवर्ती मुगल कला

१७०७ ई० में औरंगजेब की मृत्यु के पश्चात् मुगल साम्राज्य की अवस्था बहुत निर्बल हो गई। औरंगज़ेब के समय से मुगल साम्राज्य के साथ ही चित्रकला का पतन होता चला गया। यद्यपि शाहआलम प्रथम (१७०७-१७१२ ई०), जहाँदारशाह (१७१२ ई०) फर्रुखसियर (१७१३-१७१६ ई०), रफीउदोला (१७१९ ई०) तथा मुहम्मदशाह (१७१६-१७४८ ई०) के समय तक मुगल शैली में कुछ पहले जैसी विशेषताएँ दिखाई देती रहीं परन्तु अन्तःपुर के दृश्य या दरबार के नैतिक अधपतन के दृश्य भी चित्रकारों की तुलिका के विषय बन गए थे। 

अधिकांश संगीत गोष्ठियों, मुजरों, मद्यपान दृश्यों तथा काम-क्रीड़ाओं के चित्र ही बनाए जाने लगे। इसी समय राजस्थानी चित्रकला ने मुगल शैली की कुछ विशेषताएँ ग्रहण कीं और दूसरी ओर राजस्थानी शैली का परवर्ती मुगल कला पर गहरा प्रभाव पड़ा। 

इस प्रकार दोनों शैलियों की परम्परा का मिश्रण हो गया और दोनों शैलियाँ घुल मिल गईं। कभी-कभी इन सम्मिश्रित शैली के चित्रों को किसी एक शैली के अन्तर्गत रखना कठिन हो जाता है।

मुगल दरबार का जो जीर्ण-शीर्ण वैभव रह गया था वह अहमदशाह (१७४८-१७५४ ई०), आलमगीर द्वितीय (१७५४-१७५६ ई०), शाहआलम द्वितीय (१७५६-१८०६ ई०), अकबर द्वितीय (१८०६-१८३७ ई०), बहादुरशाह द्वितीय (ज़फर) (१८३७-१८५७ ई०) के समय तक पूर्णरूपेण समाप्त हो गया। 

शाह आलम नाममात्र का सम्राट था क्योंकि नादिरशाह, अहमदशाह अब्दाली, सूरजमल जाट, रुहेला तथा मराठा आक्रमणकारियों और लुटेरों ने दिल्ली को लूटकर मुगल राजकोष को खाली कर दिया और साथ में बहुत सी बहुमूल्य सामग्री जिसमें सम्भवतः चित्र तथा हस्तलिखित सचित्र पोथियाँ भी सम्मिलित थीं, विदेशी आक्रान्ता अपने साथ ले गये। 

ऐसी खराब अवस्था में भी नाममात्र के परवर्ती शासक औरंगज़ेब के पश्चात् शाहआलम तक विधिवत दिल्ली दरबार की चित्रशाला चलाते रहे इन खानदानी (वंश क्रमानुगत) परवर्ती चित्रकारों के पास प्राचीन चित्रों के चर्चे थे, जो उन्हें वंशानुगत परम्परा (विरासत) में मिले थे। 

इन चवों की सहायता से बाजारू चित्रकार नवीन चित्र बनाते रहे शाहआलमकालीन चित्रों पर बहुधा जाली राजसी मोहरें लगाकर भी चित्रकार संरक्षकों को धोखा देने लगे। यह भी सम्भव हो सकता है कि दिल्ली के मुगल पुस्तकालय तथा चित्र निकेतन की लूट के पश्चात् यह अनुकृतिचित्र शाहआलम के लिए बनाये गए हों और इसलिए उन पर शाही मोहरें लगाई गई हों। चित्रकारों की स्थिति खराब हो गई और उनको जीविकोपार्जन के लिए बाजारू बनना पड़ा।

रुहेला कलम

मुर्शिदाबाद, बरेली (रुहेलखण्ड), लखनऊ तथा हैदराबाद, जो पहले मुगल प्रान्तों की राजधानियाँ थीं, स्वतंत्र हो गईं और यहाँ पर परवर्ती मुगल शैली संरक्षकों की रुचि के आधार पर चलती रही। रुहेला शक्ति के उदय से अनेक चित्रकार बरेली जा बसे और रुहेला सरदार हाफिज रहमत खाँ के समय तक पोथीखाने (कुतुबखाने के लिए सचित्र पुस्तकें तैयार करते रहे। 

हेस्टिंग्ज तथा रुहेला सरदार हाफिज रहमत खाँ के बीच १७७४ ई० में मीरानपुर कटरा में घमासान युद्ध हुआ और रुहेलों की पराजय के पश्चात् रामपुर को छोड़कर शेष रुहेला राज्य अवध के साथ जोड़ दिया गया। अब रुहेला पोथियाँ बरेली के हेस्टिंग्ज़- रुहेला युद्ध के पश्चात् अंग्रेज़ी अधिकारियों ने लूटी और बरवाद की। 

कुछ पोथियाँ लखनऊ का नवाब आसफउद्दौला अपने साथ ले गया जहाँ वे पुनः अंग्रेज़ों ने बरबाद की (१८५८ ई०) और यहाँ से ये पोथियाँ ब्रिटिश संग्रहालय लंदन में पहुँच गई। 

बिटिश म्यूज़ियम में हाफिज रहमत खाँ की एक सचित्र पांडुलिपि प्राप्त है आजादी की लड़ाई लड़ने वाले बहादुर हाफिज रहमत खाँ के वंशजों के पास अभी भी इस शैली की चित्रित पोथियाँ हैं परन्तु उनकी कला प्रकाश में नहीं आ सकी है। 

बरेली के पुराने शहर में काज़ी परिवार के पास अभी भी ऐसी सचित्र पोथियाँ हैं। रुहेला शासन के पतन के पश्चात् रुहेला चित्रकार गढ़वाल राज्य में आ बसे या रामपुर में नवाब के संरक्षण में चित्र बनाते रहे। रामपुर का नवाब अंग्रेजों से मिल गया था। अतः अनेक चित्रकार कलकत्ता या पटना चले गए। 

बरेली का प्रसिद्ध चित्रकार बहाव तथा रामपुर का चित्रकार बब्बन कलकत्ता जा बसे। बहाव कलकत्ता के रंगमचों के लिए जंगल के दृश्य (या सेट्स) बनाने के लिए प्रसिद्ध हुआ।

बाबर तथा हुमायूँ के काल की चित्रकला 

भारतीय इतिहास में मुगल साम्राज्य एक नवीन पृष्ठ है और उसकी चित्रकला एक सुखद संयोग के रूप में दरबारी भव्यता और भोग-विलास का उल्लास अपने प्रकोड़ में संचित किये हुए हैं। न जाने कितने विदेशी और स्वदेशी चित्रकारों के महान परिश्रम और शिल्प साधना के परिणामस्वरूप मुगलकला का जन्म हुआ। 

आरम्भिक मुगल चित्रों की शैली परवर्ती कला से विशेष पृथकत्व लिये हुए है। आरम्भिक चित्र ईरानी फारसीपन लिए हैं और इनमें ईरानी शैली का अनुकरण किया गया है। इस प्रकार की शैली के चित्र-उदाहरण भारतवर्ष में बहुत कम उपलब्ध हैं। 

इन चित्रों में फारस की पन्द्रहवीं शताब्दी की तिमरुदी-शैली से बहुत समानता है। इस प्रकार के अधिकांश चित्र हुमायूँ के समय के हैं। भारत में आते हुए बाबर जिन पुस्तकों को अपने साथ लाया उनमें ‘शाहनामा’ की सचित्र प्रति भी थी। 

यह प्रति लगभग २०० वर्ष तक मुगल शाही कुतुबखाने में रही और बाद में अंग्रेजों के हाथ लग गई और लंदन पहुँची। आज यह प्रति एशियाटिक सोसायटी में सुरक्षित है। यह प्रति फारसी कला की निधि है। पहले कहा जा चुका है कि बाबर अपने अल्प शासन-काल में कलाप्रेम प्रदर्शित नहीं कर सका था।

१५५० ई० तक हुमायूँ का जब काबुल पर अधिकार हो चुका था तो दो विदेशी चित्रकार ख्वाजा अब्दुस्समद तथा मीर सैय्यद अली ईरान से हुमायूँ के संरक्षण में काबुल आ गये थे जिनका पहले उल्लेख किया जा चुका है। 

इन चित्रकारों ने हुमायूँ की आज्ञा पर ‘दास्ताने अमीर हम्ज़ा के चित्र बनाना प्रारम्भ कर दिये थे जो पूर्णतया फारसी शैली के थे। इस चित्रावली के लगभग १४०० चित्र बाद में अकबर के समय में बनाये गए इस प्रकार हम्ज़ा चित्रावली अकबर के समय में बनकर पूर्ण हुई। 

इस चित्रावली में आरम्भिक चित्र-शैली को बनाये रखने की चेष्टा की गई। इस प्रकार के आरम्भिक चित्रों के चेहरों की बनावट, प्रकृति तथा पहनावा ईरानी फारसी ढंग का है और रेखा में चीनी प्रभाव दिखाई पड़ता है। इस शैली के उदाहरण बहुत कम प्राप्त हैं। ये चित्र लंदन तथा वियना आदि के संग्रहालयों में ही प्राप्त हैं।

प्रारम्भिक चित्रों पर ईरानी शैली का प्रभाव

आरम्भिक मुगल शैली के चित्र ईरानी- फारसी चित्रों के समान हैं और मोजाइक चित्रों के समान चमकदार हैं। अधिकांश चित्रों में चमकदार लाल, नीले तथा हरे रंगों का प्रयोग किया गया है और चेहरे की सीमा रेखा एक चक्र के द्वारा बनायी गई है। 

आकृतियों में वह सजीवता नहीं है जो परवर्ती चित्रों में दिखाई पड़ती है। कपड़ों की बनावट सरल और सपाट है उनमें शिकन या फहरहन का आभास नहीं मिलता और हाशिये बेलबूटों के द्वारा सजाये गए हैं। आकृतियों की अंग-भंगिमाएँ तथा हस्तमुद्राएँ निर्बल हैं। 

चित्रों की सीमा रेखाएँ कोणदार चीनी ढंग की हैं। यह चित्र यथार्थ न होकर आलंकारिक हैं, परन्तु पृष्ठभूमि में दरारदार सूखे पर्वतों तथा वृक्षों इत्यादि को आलंकारिक विधान में बनाया गया है। वृक्षों को अधिकांश पत्रों से आच्छादित बनाया गया है। 

इन चित्रों में क्षितिज रेखा को बहुत ऊपर बनाया गया है, जिससे चित्र में अत्यधिक स्थानान्तर या दूरी का बोध होता है। चित्रों की पृष्ठभूमि तथा आकृतियों के वस्त्रों आदि में सोने के रंग का बड़ी सुंदरता से प्रयोग किया गया है। सोने के रंग को उभार देने के लिए चित्रों की सीमारेखाएं काले रंग से बनायी गई हैं। कपड़ों, पर्दों, कालीनों तथा भवनों आदि में पेचीदा (जटिल) (डिजाइन) बनाये गए हैं।

फारसी शैली के चित्रों में दार्क्टिक परिप्रेक्ष्य का प्रयोग नहीं दिखायी पड़ता है और न ही चित्रों में गठनशीलता तथा गोलाई लाने के लिए छाया का प्रयोग किया गया है। ये चित्र सपाट रंगों तथा रेखा के प्रयोग से बनाये गए हैं परन्तु चित्रों का संयोजन तथा योजनाएँ प्रभावशाली और सुंदर हैं।

अकबरकालीन चित्र

अकबर ने १५६६ ई० में फतेहपुर सीकरी के भवनों में अलंकरण कार्य प्रारंभ करा दिया। इन महलों में भित्तिचित्र भी बनाये गए। ये चित्र बल्लुआ पत्थर की दीवारों पर सफेद अस्तर लगाकर कागजी चित्रों की पद्धति पर बनाये गए प्रतीत होते हैं। 

अधिकांश चित्र फारसी शैली के हैं, परन्तु रंग भारतीय हैं। चित्रों में चीनी प्रभाव भी स्पष्ट दिखाई पड़ता है और अजगर तथा बादल आदि चीनी शैली में बनाये गए हैं। अकबर के समय में चित्रकला का अत्यधिक विकास हुआ और अनेक प्रकार के चित्र बनाये गए हैं जिसमें कागजी पुस्तक चित्रों या पोथी चित्रों तथा शबीह चित्रों की अधिकता थी। उसके समय के चित्रों को चार वर्गों के अन्तर्गत रखा जा सकता है।

(१) अभारतीय काव्य या कथाओं या फारसी कथाओं के चित्र

हम्जानामा चित्रावली इस प्रकार का उदाहरण है जिसका निर्माण १५६०-१५७५ ई० के मध्य अकबर ने कराया। इसी प्रकार शाहनामा की सचित्र प्रतियाँ आदि भी तैयार की गई। खमखानिजामी तथा बहारिस्तानेज़ामी पर अकबर ने विशेष रूप से चित्र बनवाये।

(२) भारतीय महाकाव्यों या कथाओं के चित्र 

इन चित्रों के विषय भारतीय काव्यों जैसे रामायण, महाभारत, नलदमयन्ती कथा, नैषधचरित्र, हरिवंश सरितसागर आदि पर आधारित हैं। (३) ऐतिहासिक चित्र – अकबर के शाही पोथीखाने में ऐतिहासिक महत्त्व की अनेक पुस्तकें थीं। इस प्रकार के ऐतिहासिक चित्र तारीखेइल्फी, तारीखेखानदाने तैमूरिया,अकबरनामा आदि की प्रतियों में बनाये गए।

(४) व्यक्ति चित्र

अकबर को व्यक्ति-चित्रों या शवीहों का बहुत शौक था। उसने अपने तथा अपने दरबारियों के व्यक्ति-चित्र बनवाये इस प्रकार राज्य के विशिष्ट और महान व्यक्तियों और पूर्व पुरुषों के चित्रों का एक बड़ा मुरक्का (एलबम ) उसने तैयार कराया। 

अकबरकालीन सचित्र पोथियाँ

अकबर ‘अमीरहम्जा’ की कहानी ‘दास्ताने अमीरहम्जा’ में विशेष रुचि लेता था। इस कथा में ३६० कहानियाँ हैं, जिनको वह कथावाचक के रूप में अन्तःपुर की बेगमों को बड़े शौक से सुनाता था। हुमायूँ के समय में ही इस विषद कथा के चित्र बनाये जाने लगे थे और इसका पर्याप्त कार्य समाप्त हो गया था ‘मतीरउल उमरा’ के अनुसार अकबर के समय में हम्ज़ानामा के चित्र बनते रहे।” 

इस प्रकार अकबर ने आदि से अन्त तक अमीरहन्जा की सचित्र प्रतिलिपि बनवाने की आज्ञा दी। अकबर ने इस कथा को बारह खण्डों में विभाजित कराया और इनमें से प्रत्येक खण्ड में एक सौ जुन थे। प्रत्येक जुज जिरा के बराबर लम्बा था और प्रत्येक जुज में दो चित्र थे। 

इस प्रकार इस प्रतिलिपि में २४०० चित्र बनाये गए थे। इन चित्रों के ऊपर सुलेखन लिपि में चित्र का विवरण लिखा जाता था। ख्वाजा अताउल्लाह लिपिक या मुंशी ने इन चित्रों पर विवरण लिखे हैं। मुगल दरबार में मुंशी को ‘काज़वीन’ के नाम से पुकारा जाता था। 

अमीरहम्ज़ा के चित्रों में फारसी शैली का प्रभाव अधिक है। ये चित्र सूती कपड़े पर अस्तर लगाकर बनाये गए हैं और इनमें से कुछ बोस्टन संग्रहालय में सुरक्षित हैं। 

ये चित्र बड़े आकार के हैं और ६८४५२ सेंटीमीटर लम्बाई तथा चौड़ाई के है कालान्तर में अकबर की चित्रशाला में फारसी प्रभाव कम होता गया और राजस्थानी, कश्मीरी या भारतीय प्रभाव बढ़ता गया। वास्तव में यहीं से मुगल शैली का पूर्ण विकसित रूप आरंभ हो जाता है। 

अकबर के समय में हम्ज़ानामा के अतिरिक्त ‘शाहनामा’, ‘चंगेज़नामा’, ‘ज़फरनामा’, ‘तवारीख खानदाने तैमूरिया’, ‘रज़्मनामा’ (महाभारत का फारसी अनुवाद), ‘वाकयाते-बावरी’ (बाबर की आत्मकथा), ‘अकरनामा’, ‘अनवारे सुहेली’ (पंचतंत्र का फारसी अनुवाद), ‘आयारदानिश’ (पंचतंत्र का फारसी अनुवाद), ‘तारीख रशीदी’ (दरायनामा), ‘खमासानिज़ामी’, ‘बहारिस्ताने जाभी’, ‘रामायण’, ‘हरिवंश’, ‘महाभारत’, ‘योगवशिष्ट’, ‘नलदमयन्ती कथा’, ‘शकुन्तला’, ‘कथा सरित सागर’, ‘दशावतार’, ‘कृष्णचरित’, ‘तृतीनामा’, ‘अजीबुलमखलूकात’, ‘आइने अकबरी’, ‘कलीला व्य-दिमनाह’ (रूदगी कवि के द्वारा किया गया महाभारत का फारसी अनुवाद) आदि ग्रंथों की सचित्र प्रतिलिपियों तैयार की गई और अकबर के पुस्तकालय में रखी गई। 

शाहनामा की प्रति में ही जामी कवि के काव्य का एक भाग संकलित है। आज इन सचित्र ग्रंथों की प्रतियाँ इधर-उधर संग्रहालयों में फुटकर पृष्ठों के रूप में या समुचित अवस्था में पहुंच गई है। 

अधिकांश कृतियाँ विदेशी संग्रहालयों में ही प्राप्त है इन प्रलिपियों में से ‘नलदमयन्ती’, ‘कलीला व्य-दिमनाद’ तथा ‘आधार दानिश’ की प्रतियाँ ब्रिटिश म्यूज़ियम इंग्लैंड तथा कुछ अन्य संग्रहालयों में प्राप्त हैं। 

ब्रिटिश म्युजियम में ‘बाबरनामा’ तथा दरावनामा की प्रतियाँ भी सुरक्षित हैं और ‘दरावनामा’ की इस प्रति में ही जामी की कविता का एक भाग है। ‘बाबरनामा’ की दो अन्य सचित्र प्रतियाँ प्राप्त हैं, जिनमें से एक प्रति के फुटकर पृष्ठ साउथ केसिंगटन संग्रहालय में तथा लुन संग्रहालय (फ्रांस) में सुरक्षित हैं।

अकबरनामा की प्रति के ११७ चित्र ‘अमीरहम्जा’ की प्रति के २५ पृष्ठ तथा ‘बाबरनामा’ प्रति के कुछ फुटकर पृष्ठ विक्टोरिया एण्ड अल्वर्ट संग्रहालय साउथ केसिंगटन में सुरक्षित हैं। वावरनामा के इन फुटकर पृष्ठों की अवस्था खराब है। ‘अमीरहम्जा’ प्रति के ६१ पृष्ठ आर्ट एण्ड इन्डस्ट्री म्युजियम वियना में हैं और कुछ अन्य फुटकर पृष्ठ पूरोप के दूसरे संग्रहालयों में सुरक्षित हैं। ‘

खम्सानिज़ामी’ के कुछ फुटकर पृष्ठ वोदलीयन लाइब्रेरी आक्सफोर्ड तथा एक प्रति मि० डायसन पेरीन्स, मेलबर्न बोरकेस्टरशायर- इंग्लैंड (Mr. Dyson Perrins of Malvern, Worcestershire) के संग्रह में हैं। 

हमज़ा चित्रावली के चौदह सौ पृष्ठ-पटचित्रों में से अब डेढ़ सौ चित्रों का ही अनुमान लगता है इनमें से दो बम्बई के श्री आर्वेशिर संग्रहालय में एक हैदराबाद निज़ाम संग्रहालय में तथा दो भारत कला भवन- काशी संग्रहालय में और एक बड़ौदा संग्रहालय में हैं।

इन सचित्र पोथियों की प्रतियों में से भारतवर्ष में केवल ‘रज्मनामा’, ‘तैमूरनामा’ तथा ‘बाबरनामा’ की प्रतियाँ ही उपलब्ध हैं। ‘रज्मनामा’ तथा ‘रामायण’ की एक-एक प्रति इस समय हिज हाइनेस महाराजा जयपुर के संग्रह में सुरक्षित है। 

‘तैमूरनामा’ की एक प्रति बांकीपुर पुस्तकालय में सुरक्षित है। बाबरनामा की प्रति राष्ट्रीय संग्रहालय-नई दिल्ली में सुरक्षित है। इस प्रति को संग्रहालय ने ‘आगरा कालेज आगरा से प्राप्त किया था। ‘तारीखे खानदाने तैमूरिया’ की एक सचित्र प्रति खुदाबख्श खाँ पुस्तकालय पटना में सुरक्षित है। अकबर के समय में सम्भवतः रसिकप्रिया नामक हिन्दी काव्य पर भी चित्र बनाये गए।

अकबर ने पोथी चित्रों के बनवाने में विशेष रुचि दिखाई। इन पोथियों के अतिरिक्त कई अन्य छिन्न-भिन्न पोथियों के पृष्ठ प्राप्त हुए हैं। जिनमें ‘तारीख-रसीदी’, ‘अनवारे- सुहेली’, ‘तारीख- अल्फी’ और हरिवंश के फारसी अनुवाद के चित्र प्राप्त हैं। 

इनमें से ‘अनवारे सुहेली’ की अकबरकालीन चार प्रतियों का पता चलता है जिनमें से एक जो लाहौर में चित्रित की गई थी, का समय १५६६ ई० है। इस प्रति का एक पृष्ठ भारत कला भवन, काशी में सुरक्षित है। दूसरी प्रति ब्रिटिश संग्रहालय, लंदन में सुरक्षित है। 

सम्भवतः यह प्रति अकबर के बाद की है। तीसरी प्रति रामपुर स्टेट लायब्रेरी, रामपुर तथा चौथी रॉयल एशियाटिक सोसायटी, लंदन में सुरक्षित है।

इन पोथियों की बहुत सी प्रतियों पर शाही मुहरें तथा मुगल बादशाहों के लेख भी प्राप्त हैं। पटना संग्रहालय वाली ‘तारीखे खानदाने तैमूरिया’ की प्रति पर शाहजहाँ की शाही मोहर तथा लेख है। शाहजहाँ को शाही पुस्तकालय की पुस्तकों पर लेख लिखने का शौक था। 

इस प्रति में दसवन्त का बनाया हुआ चित्र भी है। इस पोथी में तैमूरवंश का आरम्भ से लेकर अकबर के शासनकाल के बाइसवें वर्ष (१५७७ ई०) तक का इतिहास है। इस प्रति के निर्माण के समय सम्भवतः १८५० ईसवी से १८८५ ईसवी के मध्य रहा होगा। राजकीय संग्रहालय, लखनऊ, उत्तर प्रदेश में ‘तूतीनामा’ के कुछ चित्रित पृष्ठ सुरक्षित हैं।

महाभारत का अनुवाद ‘रज्मनामा’ एक वर्ष के परिश्रम के पश्चात् १५८२ ई० में बनकर पूरा हुआ। इसकी सचित्र प्रति बादशाह के लिये १५८८ ई० में तैयार की गई जिसकी तीन जिल्दे थीं। परन्तु नादिरशाह के आक्रमण से पूर्व मुहम्मदशाह ने इस प्रति को महाराजा जयसिंह सवाई (जयपुर) को भेंट में दे दिया था इस प्रकार यह आश्चर्यजनक पोथी नादिरशाह की बरवादी से बच गई और महाराजा जयपुर के संग्रह में सुरक्षित है। 

साउथ-केंसिंगटन वाली ‘अकबरनामा’ की प्रति पर सम्राट जहाँगीर का लेख है। यह प्रति १६०२ ईसवी तक बनकर तैयार हुई, परन्तु जहाँगीर ने इस पर अपना लेख लिख दिया है। अनुमानतः इस प्रति का कार्य अकबर के समय में ही समाप्त हो गया था। इस प्रति में एक सौ से अधिक चित्र हैं।

अकबरकालीन शबीह चित्र पोथी चित्रों के अतिरिक्त अकबर के समय में बादशाह, विदूषकों, दरबारियों, संतों, साधुओं आदि की शबीहां तैयार की गई अब्बुलफज़ल ने लिखा कि, ………. “जो लोग मर गये थे उनको इन चित्रों से नवीन जीवन और जीवित लोगों को अमरत्व प्राप्त हो गया।” बादशाह अकबर के अनेक चित्र प्राप्त हैं, जिनमें से दो बोस्टन संग्रहालय और एक इंडिया आफिस लायब्रेरी में सुरक्षित हैं।

अकबर का पोथीखाना

अकबर ने इन चित्रित तथा हस्तलिखित पुस्तकों का एक विशाल संग्रह तैयार कराया और ये पोथियाँ एक विशाल शाही पुस्तकालय में संजोयी गईं। इस पुस्तकालय में लगभग २४,००० पोधियों का संग्रह हो गया था, जिनका मूल्य साढ़े छः लाख रुपया था। 

पोथियों के एक-एक भाग (जिल्द) का मूल्य २७० रुपया था। अकबर ने इन पुस्तकों को लिखने, सजाने या अलंकृत करने के लिए तथा जिल्द तैयार करने के लिये कुशल और विख्यात कारीगरों को नियुक्त किया था। 

फैजी के निधन (१५८५ ई०) के पश्चात उसके पुस्तकालय से ४००० पुस्तकें शाही पुस्तकालय में आयीं, इस प्रकार शाही पुस्तकालय में पोथियों की संख्या ३०,००० तक पहुँच गई। आज ये पोथियाँ बहुत कम प्राप्त हैं और इनके साथ में अनेक चित्रकारों की कृतियाँ भी समाप्त हो गई हैं।

अकबर के शाही पुस्तकालय के समान ही विख्यात अब्दुल रहीम खानखाना का अपना पोथी संग्रह था जिसमें हस्तलिखित पांडुलिपियाँ तथा सचित्र पोथियाँ थीं पह विशाल पुस्तक संग्रह औरंगजेब के शासनकाल के पश्चात् आक्रमणकारियों के द्वारा लूट में तितर-बितर हो गया।

अकबरकालीन चित्रों की विशेषताएँ

अकबर के समय में अधिकांश फारसी तथा भारतीय काव्यों, कथाओं तथा ऐतिहासिक घटनाओं या दरबारी जीवन से सम्बन्धित चित्र बनाये गए।

अकबरकालीन चित्रों में रंग चमकदार हैं जो मीने के समान चमकते हैं। इस समय के चित्रों में जो रंग प्रयोग किये गए उन रंगों को तीन वर्गों के अन्तर्गत रखा जा सकता है- 

  • (१) चमकदार रंग जिनमें सिंदूर, प्योड़ी और लाजवर्दी, सामान्य धमक वाले रंग हिंगुल, गुलाली (रक्त और लाल रंग) और जंगाल (हरा) है, 
  • (२) बुझे हुए रंग जिनमें हिरौंजी, गेल, रामरज, खड़िया तथा डरा दावा और गंदे रंगों में नील तथा स्याही (काजल) हैं, 
  • (३) सफेद रंग का प्रयोग रंगों को हल्का करने के लिए या स्वतंत्र रूप से किया गया है। अकवरकालीन चित्रों में मूल रंगों का प्रयोग है और रंगों में स्याही मिलकर साये का रंग नहीं बनाया गया है, इस कारण रंग गंदे और धुंधले नहीं पड़े हैं।

हम्ज़ा चित्रावली के पश्चात् यह शैली अपने पूर्ण योवन को प्राप्त कर लेती है और इस समय की मुगल चित्रकला में राजस्थानी, ईरानी, कश्मीरी शैली की अनेक विशेषताएँ अपना प्रभाव डालने लगती हैं और यह शैली पूर्णरूपेण एक भारतीय शैली बन जाती है। 

इस शैली के उत्कृष्ट उदाहरण जयपुर के ‘रज्मनामा’ तथा ‘अकबरनामा’ के चित्रों से मिलते हैं। इन चित्रों में रेखाएँ गोलाईयुक्त हैं तथा आकृतियों के चित्रण में डोल या गोलाई का आभास प्रतीत होता है। 

इन चित्रों में रेखांकन गतिशील है, एक चश्म चेहरे बनाये गए हैं। हस्तमुद्राओं, वस्त्रों की फरहन तथा शिकनों, वृक्षों की पत्तियों के रेखांकन में यथार्थता, वारीकी तथा स्वाभाविकता है। इन चित्रों में ईरानीपन यदि कहीं दिखाई है पड़ता है तो नक्काशी या आलंकारिक आलेखनों में, परन्तु अलंकरण को इन चित्रों में विशेष महत्त्व नहीं मिला है।

जहाँगीरकालीन चित्र

जहाँगीर के समय में पोथी चित्रों का निर्माण पहले की भाँति चलता रहा। इस समय में चित्रकार की कल्पना के लिए अधिक क्षेत्र तथा स्वतंत्रता प्राप्त हुई कलाकारों का एक दल बादशाह के साथ रहता था। 

चित्रकारों की सूची तैयार की जाती थी और प्रत्येक चित्रकार का नाम सूची में लिखा जाता था। बादशाह जहाँगीर ने तत्कालीन दरबारी जीवन और अपने जीवन को चित्रित कराने में प्रमुख दिलचस्पी ली।

जहाँगीरकालीन चित्रों पर चित्रकारों के द्वारा लिखित नाम प्राप्त नहीं होते। प्रायः यह नाम मुंशी लिखा करते थे और पोथियों के साथ चित्रकारों के नामों की सूची को भी नहीं जोड़ा जाता था। 

जहाँगीर के दरबार के प्रिय कलाकार विशनदास, फर्रुखवेग, अब्बुल हसन, मंसूर, मनोहर तथा गोवर्धन थे। अब्दुल हसन नामक चित्रकार ने ‘जहाँगीरनामा’ की प्रति का मुख्य चित्र बनाया था। ‘जहाँगीरनामा’ की यह पहली प्रति जहाँगीर के सिंहासनारोहण के चौदहवें वर्ष में बनकर तैयार हुई थी बादशाह ने यह पहली प्रति शाहजहाँ को अपने लेखों सहित भेंट की। 

पन्द्रहवें वर्ष में ‘जहाँगीरनामा’ की दूसरी प्रति बनकर तैयार हुई थी। जो जहाँगीर ने अपने दूसरे पुत्र परवेज़ के लिए भेजी परन्तु इन दोनों प्रतियों के चित्रों आदि के विषय में यह नहीं बताया जा सकता कि वे कहाँ हैं। वैसे तो ‘जहाँगीरनामा’ के अनेक फुटकर पृष्ठ इधर-उधर भारतीय संग्रहों से प्राप्त है ‘जहाँगीरनामा’ की बादशाह जहाँगीर वाली निजी प्रति जिसका कुछ भाग नष्ट हो चुका है स्टेट लायब्रेरी-रामपुर (रामपुर राज्य पुस्तकालय) में सुरक्षित है।

फुटकर चित्रों की प्रथा

जहाँगीर के समय में चित्रों की जिल्दें तैयार नहीं की गई। बल्कि चित्रों को स्वतंत्र रूप से बनाया जाता था। जहाँगीर ने अपने मनोरंजन के अतिरिक्त दया, सहृदयता, मैत्री, क्रोध आदि के संतोषार्थ भी चित्रों का निर्माण कराया जिसका उल्लेख उसने अपनी आत्मकथा में स्वयं किया है और इस प्रकार के चित्रों के अनेक उदाहरण भी प्राप्त हैं। 

जहाँगीर ने स्वयं सुल्तान अलाउद्दीन शाह (१३५१ ई० से १३८८ ई०) तथा उसके सचिव ख्वाजा हसन के चित्रों का उल्लेख किया है। ये दोनों चित्र बोस्टन संग्रहालय में सुरक्षित हैं और इन चित्रों का समय सोलहवीं शताब्दी का तीसरा चरण है। इस प्रकार का एक अन्य चित्र रामपुर राज्य पुस्तकालय में है जिसमें अमीर शाईक नोयान वली को अंकित किया गया है समय के अनुसार यह चित्र अकबरकालीन हो सकता है।

जहाँगीरकालीन शबीह चित्र-जहाँगीर ने अपने आत्म चरित्र में स्वयं लिखा है कि विशनदास शबीह लगाने में बेजोड़ है। जहाँगीर ने अपने राजदूतों को शाहअब्बास (ईरान) के दरबार में १६१७-१६१८ ई० में भेजा और उसने इनके साथ विशनदास चित्रकार को भेजा था जहाँगीर ने लिखा है कि-“विशनदास ने मेरे भाई ‘शाह अब्बास’ की ऐसी सच्ची शबीह लगाई कि मैंने जब उसे शाह के सेवकों को दिखाया तो वे मान गए।” वादशाह ने विशनदास को एक हाथी और मूल्यवान पुरस्कार दिये। 

इस चित्र की एक परवर्ती अनुकृति बोस्टन संग्रहालय में है। विशनदास के बनाये चित्र बहुत कम प्राप्त हैं। एक चित्र में उसने शेखफूल नामक एक सूफी संत का चित्रण किया है जो कला भवन-काशी में सुरक्षित है। शेखफूल अपनी कुटी के आगे अपने विचार में मस्त बैठे बनाये गए हैं और उनके दर्शनों के लिए भक्त खड़े हैं, ऊपर एक धना नीम का वृक्ष चित्रित किया गया है। 

जहाँगीर को सच्चे साधु-सन्तों के प्रति अनन्य श्रद्धा थी, वह उनके चित्र बनवाया करता था। जहाँगीर ने अपने आत्म चरित्र में एक दरवारी इनायत खाँ का वर्णन किया है जो मृत्यु के समय बहुत दुर्बल और कंकाल मात्र हो गया था। बादशाह ने सहृदयता के कारण चित्रकार से उसकी तस्वीर भी बनवाई जो अब ‘बोइलियन लायब्रेरी’ आक्सफोर्ड में सुरक्षित है। 

इस चित्र में निर्बल मरणासन्न इनायत खाँ तकियों के सहारे पलंग पर लेटा है और उसकी पसलियाँ चमक रही हैं और चेहरे पर जैसे मृत्यु की छाया ने अधिकार जमा लिया है-इस चित्र के वातावरण में स्तब्धता है। एक अन्य चित्र में जहाँगीर के क्रोध का सुंदर प्रदर्शन है, यह चित्र रामपुर स्टेट, पुस्तकालय में सुरक्षित है। इस चित्र में जहाँगीर का दरबार मंदाकर बाग में (आगरा के समीप) दिखाया गया है जहाँगीर ने इस चित्र की घटना का स्वयं रोचक शब्दों में वर्णन किया है। 

घटना इस प्रकार थी- ‘उमरखान के पुत्र कउवाव को अपवित्र लोगों की सोहबत में पाया गया। इस अपराधी के पिता उमरखान तथा दादा मीर अब्दुल लतीफ मुगल दरबार में सम्मानित अधिकारी थे, परन्तु कउवाव लज्जा से नीचे सर झुकाये खड़ा है। उसके पीछे उसके दो साथी अपराधी बने खड़े हैं, जिनमें से एक की टोपी में सींग और एक की टोपी में कान लगे हैं। जहाँगीर ऊपर की ओर क्रोधित मुद्रा में सिंहासन पर बैठा अपराधी को कारावास की आज्ञा दे रहा है।’ उत्सवों के चित्र- गोवर्धन के द्वारा बनाये गए ‘आयपासी’ या ‘गुलाबपासी’ के उत्सव के चित्र का सम्राट ने सुंदर वर्णन दिया है। ये चित्र भी ‘रामपुर स्टेट, लायब्रेरी’ में सुरक्षित है। 

जहाँगीर के सिंहासनारोहण का एक सुंदर चित्र जो मनोहर ने बनाया है रामपुर राज्य पुस्तकालय में प्राप्त है। इस चित्र में ताजपोशी (राज्याभिषेक) के उत्सव का सुंदर दृश्य दिखाया गया है। चित्र के मध्य भाग में दो हाथी हैं जो आकर्षक कपड़ों की झूलों आदि से सजे हैं, ऊपर वाला हाथी निशान या ध्वज वाला हाथी है। 

हाथियों के दोनों ओर तीन-तीन घुड़सवार हैं जो तुरही बजा रहे हैं। इन हाथियों तथा घुड़सवारों का रुख चित्र के बायीं ओर है, इन घुड़सवारों के आगे एक निशानवाज प्यादों की पंक्ति है जो निशान लिये खड़ा है। घुड़सवारों और हाथियों के पीछे एक ओर स्त्रियों और एक ओर गवैयों का दल है। 

निशान वाले हाथी पर दो झंडे हैं जिनमें से एक झंडे पर शेर तथा दूसरे पर चीनी प्रकार का फोनेक्स-पक्षी तथा ड्रेगन (गरुड़ तथा अजगर) बना है इस हाथी पर पीछे एक निशानबाज बैठा है जो मुड़कर गवैयों को देख रहा है। चित्र की पृष्ठभूमि में भवन है जो चित्र के संयोजन में विशेष महत्त्व का है। इसी प्रकार का एक चित्र जिसमें शाहजादा खुर्रम का विवाह उत्सव दिखाया गया है बहुत सुंदर है। यह चित्र इंडियन म्यूजियम कलकत्ता में सुरक्षित है।

शिकार के चित्र 

शिकार के चित्रों में बादशाह ने बहुत रुचि प्रकट की। शिकार के चित्रों में शेर के शिकार के दो चित्र इंडियन म्युज़ियम कलकत्ता में सुरक्षित हैं। इनमें से एक चित्र में बादशाह ने शेर को अपनी बन्दूक की गोली से मार दिया है और शेर को शाही दल चारों ओर से घेरे खड़ा है। 

दूसरे चित्र में बादशाह को शेर से अपनी सुरक्षा करते दिखाया गया है बन्दूक की गोली की चोट खाते ही शेर बादशाह के हाथी की पीठ पर चढ़ गया है। बादशाह खाली बन्दूक से जख्मी शेर को डरा रहा है उसके हाथी से उसका अंगरक्षक भाग रहा है, फीलवान डर से हाथी के सिर पर झुका जा रहा है, घुड़सवार सिपाही बादशाह की मदद के लिए आ गए हैं। 

इनमें से एक के पास भाला है। इस चित्र को देखने से प्रतीत होता है कि चित्रकार ने स्वयं इस घटना को देखा था इसी कारण सम्राट का भागता हुआ अंगरक्षक, शेर के झपटने की मुद्रा तथा हाथी की गति यथार्थ वन पड़ी है।

बोडलीयन पुस्तकालय के एक चित्र में मृगों का रात्रि के समय में आखेट दिखाया गया है- शिकारी झाड़ियों में छुपकर बैठे हैं और कमान संभाले हैं उनके सामने हिरन आ गए हैं। चित्र का वातावरण सुंदर है। इस चित्र की पृष्ठभूमि में एक संत अपनी कुटी के द्वार पर बैठा बनाया गया है।

संतों के चित्र

संतों के सत्संगों से सम्बन्धित अनेक चित्र भी जहाँगीर ने बनवाये इंडियन म्युज़ियम कलकत्ता में ‘रात्रि के समय साधुओं की गोष्ठी’ का चित्र बहुत सुंदर है। इसमें पाँच साधु एक कुटी के सामने बैठे हैं-वातावरण अंधकारपूर्ण है। मोमबत्ती के झीने प्रकाश में पाँचों आकृतियाँ स्पष्ट दिखाई पड़ रही हैं। इस चित्र पर यूरोपियन प्रभाव दिखाई पड़ता है।

पशु-पक्षी तथा पुष्पों के चित्र 

बादशाह जहाँगीर को पक्षियों, पशुओं तथा पुष्पों के चित्र बनवाने का भी बहुत शौक था। जब कभी वह आश्चर्यजनक पुष्प या पक्षी देखता तो उनकी अपने चित्रकारों से तस्वीर बनवाता था। जहाँगीर ने स्वयं ऐसे पक्षियों के रोचक वर्णन दिये हैं। इस प्रकार के एक तुर्की तीतर का बादशाह ने सुंदर वर्णन दिया है। इस तुर्की तीतर का चित्र कलकत्ता संग्रहालय में सुरक्षित है। 

इसी प्रकार एक मोरनी का चित्र जो मंसूर नामक चित्रकार का बनाया हुआ है, सजीव एवं सुंदर है परन्तु आज यह चित्र पेरिस में है। उस्ताद मंसूर के बनाये चित्रों में कोयल, कौआ, चील, मुर्गी, तीतर, बटेर, चीनी तोते (Parakeet), पीलू, हाथी, ऊँट, ज़ेबरा, जिराफ, बंदर, लंगूर, शेर, गैंडा, घोड़ा आदि के चित्र प्राप्त हैं। 

इसी प्रकार पहाड़ी तथा मैदानी क्षेत्रों के पुष्प, जंगली स्ट्राबेरीज़, नरगिस, गुलाब, चेरी, पोस्ता आदि पुष्पों के चित्र बनाये गए और इस प्रकार एक वनस्पति विज्ञान तथा जीवविज्ञान सम्बन्धी चित्रों का पोर्टफोलियो या संग्रह तैयार हो गया। उस्ताद मंसूर का एक चित्र ‘लालपुष्प’ जो पीली, पृष्ठभूमि पर बना है, उल्लेखनीय है। 

बादशाह जहाँगीर स्वयं लिखता है”कश्मीर की सीमा में जो पुष्प दिखाई देते हैं उनका हिसाब नहीं लगाया जा सकता और जो नादिर-उल असर उस्ताद मंसूर ने चित्रित किए हैं वे १०० से अधिक हैं।”

अब्बुल हसन 

बादशाह जहाँगीर अब्बुलहसन को बहुत चाहता था। उसकी शैली ईरानी थी। उसके विषय में बादशाह ने स्वयं लिखा है कि-“उस दिन अब्बुलहसन चित्रकार, जिनको ‘नादिर उज्जमा’ की उपाधि से सम्मानित किया जा चुका था, ने मेरी तख्तपोशी ( सिंहासन रोहण) की तस्वीर खींची, यह चित्र प्रशंसा के योग्य था, अतः उसको बहुत अधिक संरक्षण मिला” “इस समय उसका कोई प्रतिद्वन्दी या सानी नहीं है, यदि इस समय तक उस्ताद अब्दुस्समद था बिहजाद जीवित रहे होते तो उन्होंने उसके प्रति न्याय किया होता।”

बादशाह आगे लिखता है-"जब वह (जहाँगीर) स्वयं युवराज था तो अब्बुलहसन के पिता अकारिज़ा (हिरात निवासी) ने मेरी सेवाएं स्वीकार की और अब्बुल हसन दरवार का खानजादा था। परन्तु उसके और उसके पिता के काम की तुलना नहीं की जा सकती (पिता चित्रों की अनुकृतियाँ बनाने के कार्य में कुशल था) वह अपने पिता से कहीं अच्छा है और उन दोनों को एक श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। मेरा उससे सम्बन्ध यह है कि मैंने उसकी परवरिश (पालन-पोषण) की थी। मैंने आरम्भिक समय से आज तक उसकी देखभाल की है, तब कहीं उसकी कला इस स्तर तक पहुँच सकी है और सत्य ही यह 'युगशिरोमणि' (नादिर-उज़ जमा हो गया है।" 

उसका एक चित्र ‘जामनगर के जामजासा’ का मुखाकृति-चित्र, जो ‘इंडियन बुक पेंटिंग’ में लेखक कुहनिल तथा गोएट्ज ने प्रकाशित किया है, उत्तम है उसका एक अन्य चित्र, जिसमें एक बैलगाड़ी या रथ को हल्की पीली पृष्ठभूमि पर बनाया गया है, बहुत सुंदर है। 

इस चित्र में रथ की नक्काशी, बैलों की गति तथा फारसी रेखांकन और चमकदार रंग उसकी अपनी विशेषता है। बैलों के सिर भयानक तथा बड़े हैं जो फारसी ढंग के हैं। उनकी पूछों में बारीकी से बाल बनाये गए हैं। रथ पर सुनहरी नवकाशी का काम है तथा सवार मूंगिया वस्त्र और सारथी नीली पोशाक पहने हैं। 

रथ पर ही चित्रकार का नाम ‘राकिम अब्दुल हसन’ अर्थात् ‘चित्र का लेखक या रचयिता अब्बुल हसन’ लिखा है। इस प्रकार जहाँगीर ने जीवन सम्बन्धी चित्रों की ओर अधिक ध्यान दिया और चित्रकला के क्षेत्र को व्यापक बनाया

यूरोपियन चित्र

जहाँगीर के समय में एक अन्य दिशा में चित्रकार ने अपना ध्यान मोड़ा वह था – यूरोपियन चित्रों की अनुकृतियाँ। जहाँगीर के दरबार में यूरोपियन व्यापारियों के द्वारा चित्र भी आने लगे थे। बादशाह ने चित्रों की अनुकृतियाँ तैयार करायीं और यूरोपियन चित्रों का एक विशाल संग्रह विशनदास ने १५८८ ई० में बनाकर तैयार किया। 

जहाँगीर के आरम्भिक शासनकाल में ‘कलीलावय-दिमनाह’ की चित्रित प्रतिलिपि भी तैयार हुई। इस प्रति के पूर्ण होने का समय १६१० ई० रहा होगा। इस संग्रह में अधिकांश फारसी शैली के चित्र हैं और इस प्रतिलिपि को तैयार करने में अधिकांश फारसी चित्रकारों ने कार्य किया। 

आरम्भिक काल में जहाँगीर ने फारसी कलाकारों को बुलाया और फारसी कला को अधिक महत्त्व दिया परन्तु कालान्तर में यह बात नहीं दिखाई पड़ती है। यथार्थवादी दृष्टिकोण-जहाँगीर अनोखे ही स्वभाव का व्यक्ति था। वह एक

सुधारक, प्रकृतिवादी, आखेटक, कला संरक्षक, लेखक, इतिहासकार, सुरापान करने वाला, न्यायशील, प्रजावादी और क्रूर शासक था, परन्तु उसमें कला प्रेम प्रगाढ़ था उसके दरबार में भारतीय ही नहीं यूरोपीय कला का भी समान स्थान था और उसके चित्रकारों ने ‘देवी मरियम’ आदि के चित्रों की कई अनुकृतियाँ तैयार की इस यूरोपियन कला का भारतीय मुगल कला पर प्रभाव अवश्य पड़ा परन्तु मुगल कला ने अपनी स्वतंत्र गति और निजत्व की भावना और मौलिकता को नहीं छोड़ा। 

इस समय मुगलशैली का अत्यधिक विकास हुआ जहाँगीर एक महान प्रकृतिवादी सिद्ध हुआ उस्ताद मंसूर, मनोहर तथा मिस्किन ने पशु-पक्षी, पुष्पों, वृक्षों और पत्तों के चित्रण में कमाल कर दिखाया।

ऐतिहासिक घटनाएँ तथा स्त्री चित्र

राजनीति से सम्बन्धित ऐतिहासिक घटनाओं का भी चित्रों में सुंदर रूप में अंकन मिलता है। उस्ताद शालीवाहन का बनाया एक चित्र इस प्रकार का सुंदर उदाहरण है। यह चित्र एक लम्बी पत्री के रूप में बना है। सर्वप्रथम आगरा के इस विज्ञप्ति पत्र की खोज गुजरात के सुविख्यात इतिहासकार श्री जिनविजय ने की। 

यह चित्र लगभग १३ फुट लम्बा और १३ इंच चौड़ा है और दो भागों में विभाजित है उस्ताद शाहीवाहन जहाँगीर के दरबार का एक चित्रकार था, परन्तु वह पवित्र और धर्म श्रद्धालु व्यक्ति था। उसने स्वयं इस चित्रित पत्री को आचार्य विजयसेन सूरी, जो उस समय काठियावाड़ के देवापट्टम थे, के लिए शुभकामनाओं सहित भेंट में भेजा था। 

१६१० ईसवी में श्री विजय सेन जी के शिष्य श्री विवेक हर्ष और उदय हर्ष ने राजा रामदास के साथ जहाँगीर के दरबार (आगरा) में यह निवेदन किया कि परेशान (Paryushana) के आठ दिन के व्रतों के समय में पशु-वध निषेध कर दिया जाय। 

इस पत्रीनुमा चित्र का विषय यही ऐतिहासिक घटना है। प्रथम भाग में जहाँगीर ऊपर के भाग में एक छज्जे पर बैठा है और राजा रामदास, पं० विवेक हर्प तथा पीछे खड़े पं० उदय हर्ष का परिचय दे रहे हैं। नीचे के भाग में अनेक तुर्की, अरबी तथा एक अंग्रेज प्यावे (पगदे) और अन्य कर्मचारी यथास्थान खड़े हैं चित्र के दूसरे भाग में गुरु विजयसेन गद्दी पर बैठे हैं और विवेक हर्ष तथा उदय हर्ष पशु निषेध आज्ञा का शाही फरमान अपने गुरु को दे रहे हैं। 

इस चित्र में विजयसेन तथा अन्य पुजारियों के चित्र हैं जो सफेद वस्त्र धारण किये हुए चित्रित हैं। चित्र के नीचे के भाग में एक व्यक्ति नाच रहा है, साथ में बरायर में खड़ा व्यक्ति मंजीरा बजा रहा है। पीछे तीन श्वेत वस्त्र धारण किए स्वास्तिका चिन्ह-धारणी देव-सेविकाएँ बैठी हैं। इनके सामने साधारण स्त्रियाँ चावल डाल रही हैं और पूजा कर रही हैं।

उपरोक्त चित्रावली के रंग स्पष्ट, आकर्षक, प्रभावशाली और कोमल हैं, चित्र शैली मुगल है, परन्तु इनचित्रों को हरी, पीली, लाल तथा नीली पृष्ठभूमि पर अंकित किया गया है। इस चित्र में जनसाधारण (सामान्य वर्ग) तथा दरबार (उच्च वर्ग) दोनों का सुंदर अंकन है।

जहाँगीर के समय में निश्चित रूप से स्त्री चित्र भी बनाये गए। अकबर के समय में उसकी माँ हमीदा बानो बेगम की तथा जहाँगीर के समय में नूरजहाँ की शबीहें तैयार हुई।

जहाँगीर की स्वयं की अनेक शबीहें तैयार की गई (देखिए रेखाचित्र – सम्राट जहाँगीर) जो पर्याप्त यथार्थ रेखांकन पर आधारित है।

जहाँगीरकालीन भित्तिचित्र जहाँगीर ने भित्तिचित्र भी बनवाये और ये चित्र १६११ ई० में विलियम फिल्म ने लाहोर दुर्ग में देखे थे। इन चित्रों में नूरपुर का राजा वासु भी सभासदों के साथ चित्रित किया गया था। इसके अतिरिक्त लाहौर के महलों में भी भित्तिचित्र बनाये गए। इन चित्रों में ईसाई, यूरोपियन तथा अन्य विषय अंकित किये गए।

जहाँगीरकालीन चित्रों की विशेषताएँ-जहाँगीरकालीन चित्रकला ने एक नवीन मोड़ ग्रहण किया और उसमें परम्परा के स्थान पर यथार्थता आ गई और इस समय के चित्रकार ईरानी प्रभाव से मुक्त हो गए। जहाँगीरकालीन चित्रों में बारीकी, सफाई, शारीरिक गठनशीलता तथा वस्त्रों आदि की बनावट में बहुत परिमार्जन दिखाई पड़ने लगता है। 

वस्त्रों की बनावट में शिकनों आदि का विशेष ध्यान रखा गया है। वस्त्रों में वायु के प्रकम्पन का बोध होता है। चेहरों आदि में गोलाई लाने के लिए बारीक रेखाओं के द्वारा खतपरवाज़ या छोटे-छोटे विन्दुओं को लगाकर बिन्दु-परदाज़ लगाया गया है जिसे ‘दाना परवाज़’ कहते थे। 

अकबरकालीन चित्र सपाट है परन्तु जहाँगीरकालीन चित्रों में शारीरिक गठनशीलता पा गोलाई और उभार लाने के लिए छाया तथा प्रकाश का कोमल प्रयोग किया गया है।

पशुओं तथा पक्षियों की बनावट में अत्यधिक यथार्थता है हाथियों, घोड़ों, शिकरों, पोरों तथा अन्य पशु-पक्षियों के चित्रण में अत्यधिक स्वाभाविकता है। हाथियों के चित्रण में अजन्ता की परम्परा का आभास होता है।

जहाँगीरकालीन चित्रों में दाष्टिक परिप्रेक्ष्य का सुंदर प्रयोग है इंडियन म्यूजियम कलकत्ता में एक घुड़सवारों के दल का चित्र प्राप्त है। यह दल मुख्यभूमि से पीठ किए पृष्ठभूमि की ओर बार्थी दिशा में तिरछा चक्रीय गति से जा रहा है। 

इस चित्र की पृष्ठभूमि के घुड़सवार छोटे बनाये गए हैं और वायीं ओर मुड़ते हुए होने के कारण उनकी पीठ न होकर क्रमशः वाम अंग दिखाई पड़ने लगता है इस प्रकार न केवल दार्क्टिक परिप्रेक्ष्य वरन् स्थितिजन्य – लघुता का भी सुंदर प्रयोग दिखाई पड़ता है। 

जहाँगीरकालीन चित्रों में पृष्ठभूमि में दूर तक मरुस्थली पर्वतीय क्षेत्रों की प्रकृति बड़ी सूक्ष्मता से अंकित की गई है। यह प्राकृतिक दृश्य दिल्ली से अजमेर जाने वाले राजमार्ग के थला पर आधारित है।

इस समय के चित्रों में रेखाऍ बारीक, कोमल, लचकदार तथा प्रवाहपूर्ण और सजीव हैं हल्के गुलाबी, सफेद, सोने तथा चाँदी के रंगों का उत्तम प्रयोग है। चित्रों में संगत और हल्के रंगों का प्रयोग होने लगता है। रंग आँखों को प्रिय लगने वाले और रत्नों के समान चमकदार हैं।

शाहजहाँ कालीन चित्र

जहाँगीर काल के चित्रों की विशेषताओं तथा कारीगरी की कुशलता के कारण जहाँगीर काल मुगल चित्रकला का पूर्ण यौवन काल है और उसका पूर्ण निजत्व तथा ओज इस समय तक विकसित हो उठता है। 

शाहजहाँ के काल में चित्रकला की अवनति आरम्भ हो जाती है, यद्यपि चित्रों का निर्माण उसी प्रकार होता रहा और उनकी संख्या भी वही रही, परन्तु चित्र की लिखावट में कमजोरी आ गई। 

शाहजहाँ ने अपनी शानशौकत तथा सभासदों के अनुशासन की ओर अधिक ध्यान दिया, इस कारण ही चित्रकला की अवनति आरम्भ हो जाती है। यद्यपि चित्रों का निर्माण उसी प्रकार होता रहा और चित्रों की संख्या भी उतनी ही रही परन्तु चित्र की लिखावट तथा रंगों की प्रौढ़ता अदृश्य होने लगी।

वैभव सम्बन्धी चित्र

शाहजहाँ ने अपनी शानशौकत तथा सभासदों के अनुशासन की ओर अधिक ध्यान दिया, इस कारण चित्रकार की दृष्टि राजसी दरबारी भव्यता तथा कर्मचारियों के अदब-कायदों तक सीमित रह गई है। शाहजहाँ के समय में अधिकांश दरबारी चित्र बनाये गए। 

चित्रकार इन दरबारी अदब-कायदों में जकड़ता गया, परन्तु फिर भी दरबारी चित्रों के उत्तम उदाहरण प्राप्त हैं। इनमें से एक चित्र उदाहरण बोडोलीयन लायब्रेरी, आक्सफोर्ड में सुरक्षित है। इस चित्र में ‘शाहजहाँ एक फारसी राजदूत का दीवाने आम में स्वागत कर रहा है।’ 

सम्भवतः यह घटना १६२८ ई० में शाहजहाँ के सिंहासनारोहण के पश्चात शीघ्र ही घटी इस समय शाहजहाँ की आयु ३६ वर्ष की थी जो चित्र में भी स्पष्ट दिखाई पड़ती है। इस राजदूत को शाहजहाँ के दरबार में फारस के शाह अब्बास के पुत्र शाह सूफी ने भेजा था। 

इस दल के साथ उसने पाँच अरबी घोड़े तथा अन्य बहुमूल्य वस्तुएँ भेजी थीं। इस चित्र में शाहजहाँ दिल्ली के दीवाने आम में ऊँचे छज्जे पर बैठा है। नीचे फारसी लोगों का दल है और फारसी राजदूत माथे तक अपना दाहिना हाथ उठाकर सलाम करता हुआ चित्रित किया गया है उसके अन्य सलाहकार उसके साथ है, पीछे एक पंक्ति में कई लोग थालों में उपहार लिये खड़े चित्रित हैं, नीचे की ओर पाँच घोड़े भी चित्रित हैं। 

चित्र में मुगल अधिकारी यथास्थान पर खड़े बनाये गए हैं। मुगल तथा फारसी लोगों की पोशाकें मित्र हैं। इस चित्र में राजदूत बिना झुके सीधे खड़े होकर सलाम कर रहा है जो फारसी ढंग है जिसको भावुक सम्राट शाहजहाँ ने अपनी अवहेलना का प्रतीक माना था।”

शाहजहाँ का एक अन्य चित्र, जिसमें शाहजहाँ मयूर सिंहासन या तख्ते ताऊस पर बैठा है, बैरन म्युरिस रोयसचाइल्ड संग्रह, पेरिस में सुरक्षित है। इस चित्र में भी सम्राट को युवक रूप में दिखाया गया है। यह चित्र अनुमानतः १६३० ई० का है। 

मयूर सिंहासन की छत, जो आयताकार गुम्बद के आकार की है और चार स्तम्भों पर रुकी है, के ऊपर मोर पक्षी बनाये गए हैं। सारा सिंहासन बहुमूल्य रत्नों से खचित है। इस मयूर सिंहासन के सम्बन्ध में जो समसामयिक यूरोपियन यात्रियों के वर्णन प्राप्त हैं उनमें चित्र से किंचित अंतर है। यह सिंहासन उस समय के मूल्य से छः स्टलिंग पाउन्ड्स का था।

राजदूतों के चित्र एक चित्र एन० सी० मेहता ने (‘स्टडीज़ इन इंडियन पेंटिंग फलक ३९) में प्रकाशित किया है जिसमें एक यूरोपियन राजदूत को शाहजहाँ के दरबार में चित्रित किया गया है। इस चित्र में शाहजहाँ दीवाने खास में बैठा है-दो शहजादे (युवराज) उसके पीछे और दो शहजादे सामने बैठे हैं। सम्भवतः यह दारा, शुजा, मुराद और औरंगजेब हैं। 

इन शहजादों के कानों में छोटी बालियाँ हैं जिससे अनुमान होता है कि यह शाहजहाँ के आरम्भिक शासनकाल का चित्र है। यूरोपियन राजदूत अपने साथियों सहित बादशाह के सम्मुख खड़ा है। यह आश्चर्य की बात है कि इस राजदूत – दल में स्त्रियाँ तथा पुरुष दोनों ही हैं। 

शायद यह पुर्तगाली राजदूत का दल है जो दिल्ली के सम्राट से व्यापार के लिए विशेषाधिकार प्राप्त करने के लिए आया था यह चित्र सुंदर है और इसमें भी अवनति वा ह्रास के चिन्ह दृष्टिगोचर नहीं होते हैं और रंग-संगत तथा कोमल हैं।

पूर्वजों तथा सम्मानित व्यक्तियों के चित्र एक उदाहरण में अकबर का व्यक्ति चित्र है जो अपने ही ढंग का है। यह चित्र एम० कारटियर संग्रह, पेरिस में सुरक्षित है। इस चित्र में वृद्ध अकबर को दिखाया गया है। इस चित्र के ऊपर हाशिये में दो फरिश्ते तथा बायीं ओर तीन अनुचर और नीचे तीन हिरन बने हैं। 

सम्राट के पीछे प्रकाश पुंज (प्रभा मंडल) का प्रयोग किया गया है। शाहजहाँ के समय में फकीर उल्लाहखान प्रधान चित्रकार था। इस चित्रकार का एक सुंदर चित्र बैरन म्युरिस रोथ्सचाइल्ड संग्रह, पेरिस में सुरक्षित है। इस चित्र में फकीर उल्लाह खान के लिए शानदार मुगल अधिकारी के रूप में चित्रित किया गया है। 

इस चित्रकार के बनाये हुए चित्र बहुत कम प्राप्त है, सम्भवतः यह केवल निरीक्षण कार्य करता था। इस चित्र के ऊपर, नीचे तथा बायीं ओर हाशिये में सात मानवाकृतियाँ हैं जो उसके सहायकों के छवि-चित्र हैं- इनमें तीन हिन्दू हैं।

मीर हाशिम व्यक्ति चित्रण या छवि चित्रण में इस समय का कुशल और विख्यात चित्रकार था। सम्भवतः उपरोक्त चित्र मीर हाशिम और उसके सहायकों की उपलब्धियाँ हैं। उसका एक चित्र, जिसमें ‘मुगल सरदार’ चित्रित है, एम० डिमोटी संग्रह, पेरिस में प्राप्त है।

दारा शिकोह (मुगल शैली)

दारा शिकोह का चित्र प्रेम-शाहजहाँ के ज्येष्ठ पुत्र शहजादे दारा शिकोह ने भी अपने चित्रकार नियुक्त किए। यह प्रतिभा सम्पन्न शहजादा कलानुरागी तथा संग्रहकर्ता था। उसके निजी बहुमूल्य चित्रों के एलबम के चित्रों या चित्राधार से उसका कलाप्रेम स्पष्ट है। इस एलबम के चित्रों पर दारा के हस्ताक्षर हैं और आज ये चित्र संग्रह इंडिया आफिस लायब्रेरी, लंदन में सुरक्षित हैं। 

युवराज दारा शिकोह का एक सुंदर मुखाकृति चित्र जो हुनर नामक चित्रकार के द्वारा बनाया हुआ है आज प्राप्त है। (देखिए रेखाचित्र – १८ दारा शिकोह ) इस युवराज को औरंगज़ेब के षड्यन्त्र के कारण लड़ाई में हारना पड़ा और सिंध की ओर भागना पड़ा और यहीं उसको उसकी एक सबसे अधिक प्रिय बेगम के प्यास से तड़प-तड़पकर मर जाने का समाचार मिला- जिससे गुवराज अचेत होकर गिर पड़ा था। 

उसके उपरोक्त एलबम के मुख्य पृष्ठ पर सुनहले भाग में एक लेख है जो इस प्रकार है- “यह संग्रह उसकी सबसे प्रिय और निकट मित्र सम्प्रान्त महिला नादिरा बेगम को सम्राट शाहजहाँ के पुत्र युबराज मुहम्मद दारा शिकोह के द्वारा भेंट दिया गया।” 

दारा शिकोह के एलबम में अनेक सुंदर चित्र प्राप्त हैं, उनमें से एक चित्र में ‘दो बत्तों’ तथा दूसरे में ‘नाईट हिरोन’ (Night Heron ) पक्षी है। यह चित्र बहुत सुंदर है। दारा शिकोह का घुड़सवार के रूप में एक चित्र इंडियन म्युजियम, कलकत्ता में प्राप्त है जो १६२५ ई० का है। इसी एलबम में युवराज शुजा का एक रेखाचित्र है। इस चित्र में उसको १६ वर्षीय किशोर के रूप में दिखाया गया है।

शाहजहाँकालीन गोष्ठियों के चित्र 

शाहजहाँकालीन शैली का एक चित्र बाबू सीताराम साहू संग्रह, बनारस में है। इस चित्र में एक ‘पवित्र गोष्ठी’ दिखाई गई है। इसमें चार पवित्र मनुष्य किसी गूढ़ ग्रंथी में उलझे विचार-विमर्श कर रहे हैं। इस चित्र में एक छायादार वृक्ष के नीचे चाँदी जैसे रंग की सफेद दाढ़ी तथा बालों वाला एक वृद्ध बैठा है, उसके सामने एक उच्च मुगल पदाधिकारी बैंगनी जामा और ऊपर से फूलदार सफेद कोट पहने भव्य ढंग से बैठा है। 

पास ही एक युवराज कन्धे पर सरोद रखे बजा रहा है और वृद्ध की ओर देख रहा है। उसके सामने दूसरी ओर एक तपस्वी हिन्दू संन्यासी पद्मासन लगाए बैठा है जो गेरुआ धोती लपेटे है। इस चित्र के पीछे हाजी मुहम्मद करबलाई की १२१२ हिजरी की मोहर अंकित है।

इस समय के चित्रों के हाशिये में बादलों से निकलती अनेक देवदूत या पंखदार मानव आकृतियों (परियों) का आलेखन दिखाई पड़ता है।

शाहजहाँ ने अपने समय के इतिहास ‘बादशाहनामा’ की सचित्र प्रति तैयार कराई। इसमें कई सौ चित्र थे परन्तु दुर्भाग्यवश यह प्रति तितर-बितर हो गई और इसके पृष्ठ अनेक संग्रहालयों में पहुँच गए हैं। इसका एक विशेष भाग ब्रिटेन के बिडम्बसर महल के संग्रह में प्राप्त है। 

शाहजहाँ के समय से यवन सुंदरियों तथा बेगमों के चित्र भी बनाये जाने लगे, जो प्राप्त हैं। रंगमहल और कामक्रीड़ा या रति सम्बन्धी दृश्यों पर आधारित चित्र जो जहाँगीर के समय में प्रचलित हो चुके थे, अब अधिक बनाये जाने लगे।

शाहजहाँ कालीन चित्रों की विशेषताएँ

शाहजहाँ के समय के चित्रों में एक विकसित कलाशैली के रूढ़िवादी ढंग से प्रयोग की परिपाटी प्रचलित होती दिखाई पड़ने लगती है और क्रमशः मुगल विशेषताएँ समाप्त होने लगती हैं और अवनति के चिन्ह स्पष्ट दिखाई पड़ने लगते हैं।

शाहजहाँकालीन चित्रों में विशेष रूप से रेखांकन बेजान और शिथिल पड़ने लगता है तथा हाथ, पैर और शरीर की भंगिमाओं से जकड़ और कठोरता आने लगती है। चमकदार रंगों के साथ सोने और चाँदी के रंगों का प्रयोग बहुत अधिक होने लगता है जिससे चित्रकार की कमजोरी स्पष्ट पता लगती है। चित्रों की रेखाएँ काली तथा कठोर हो जाती हैं। चित्रों की खुलाई तथा साया लगाने का काम काली स्याही से किया जाने लगता है।

अधिकांश चित्रों में दरबार के दृश्यों का अंकन दिखाई पड़ता है, जिनमें दरबारियों को जकड़े हुए अदब-कायदों में खड़ा दिखाया गया है। इस प्रकार नियमों में जकड़कर चित्र निर्जीव हो गए हैं और चित्रों में यूरोपियन प्रभाव भी अधिक आने लगता है। 

चित्रों में दाष्टिक परिप्रेक्ष्य तथा त्रिआयामी प्रभाव दिखाई पड़ने लगता है। चित्रों के हाशियों में जहाँगीरकालीन आलेखनों का प्रयोग दिखाई पड़ता है, लेकिन कहीं-कहीं देवदूत या पंखदार आकृतियों का प्रयोग मिलने लगता है। 

चित्रों में विवरणों की अधिकता है और रंगों में विशेषतया मीनाकारी आदि पर अधिक ध्यान दिया जाने लगता है, परन्तु शाही रौब के कारण चित्र में भावना का अभाव रहता है और कृत्रिमता झलकने लगती है।

यूरोपियन विषय जैसे मरियम तथा शिशु ईसा आदि के चित्रों में विदेशी भावना दिखाई पड़ती है। शाहजहाँ के समय से सपाट स्याह कलम रेखाचित्रों का प्रचलन भी होने लगा था।

औरंगज़ेब कालीन चित्र तथा उनकी विशेषताएँ

यद्यपि औरंगजेब एक कट्टर मुसलमान और चित्रकला विरोधी शासक था परन्तु उसके भी युवराज काल से लेकर वृद्धावस्था तक के चित्र प्राप्त हैं। औरंगजेब के युवराज काल का एक मुखाकृति चित्र ब्रिटिश संग्रहालय में प्राप्त है। राज्य पुस्तकालय, रामपुर में सुरक्षित एक चित्र में औरंगजेब को वृद्धावस्था में अंकित किया गया है। 

बीजापुर का घेरा १६८६ ई० में आरम्भ हुआ था और कठिन संघर्ष के पश्चात् औरंगजेब को विजय प्राप्त हुई। इस चित्र में औरंगजेब के मुख के चारों ओर सुनहरा प्रताप पुंज बनाया गया है। औरंगजेब का एक चित्र ‘रोस संग्रह’ बोस्टन में भी सुरक्षित है। इस चित्र में मुगल शासक औरंगजेब को सोने के तख्त पर हरी गद्दी पर बैठा बनाया गया है। 

परन्तु इन चित्रों में मुगल की विशेषताएं नहीं दिखाई पड़ती हैं ब्यौरे की लिखाई में कठोरता तथा कमज़ोरी है और शैली स्याही का अत्यधिक प्रयोग है। इन चित्रों में रेखांकन भी दुर्बल है। इन चित्रों में केवल कारीगरी ही दिखाई पड़ती है और सजीवता के स्थान पर स्तब्धता आ गई है।

परवर्ती मुगल शासकों के समय के चित्र तथा उनकी विशेषताएँ

अट्ठारहवीं शताब्दी में मुगल चित्रकला में एक नवीन जागरण होता दिखाई पड़ता है और औरंगजेब के पश्चात् एक बार पुनः चित्रों की गिनती तथा चित्रों की विशेषताओं में उन्नति हुई। औरंगजेब का उत्तराधिकारी उसका पुत्र शाहआलम (बाद में वहादुरशाह के नाम से विख्यात १७०७ ई० से १७१२ ई० तक) विलासी था उसने कलाओं के प्रति प्रेम प्रदर्शित किया। 

शाह आलम के पश्चात् उसका पुत्र जहांदार (१७१२ ई०) और फिर मोहम्मदशाह (१७१२ ई०) से बाद के शासक, जो १७५२ ई० तक दिल्ली के राजसिंहासन पर बैठे, सब ही विलासी और निर्बल शासक थे परन्तु इनके कला प्रेम में संदेह नहीं। फर्रुखसियर (१७१३-१७१९ ई०) के समय में चित्रकला का पुनः विकास हुआ और मुगल शैली में पुनः कुछ रंग की विशेषताएँ तथा कारीगरी दिखाई पड़ने लगी। 

विषय में अधिकांश भोग-विलास या रति-सम्बन्धी चित्रों का विशेष महत्त्व बढ़ने लगा। इस प्रकार मोहम्मद शाह तक (१७४८ ई०) यह शैली मुगल विशेषताओं को अपनाए रही। इन शासकों के व्यक्ति चित्र या दरबार के चित्र अनेक संग्रहों में प्राप्त हैं। 

फर्रुखसियर के समय का एक सुंदर चित्र उदाहरण काओसजी जहाँगीर संग्रह बम्बई में प्राप्त है। इस चित्र पर राजस्थानी तथा दक्षिणी कला का गहरा प्रभाव है। इस चित्र में एक आखेटकों का दल दिखाया गया है। जहाँदार शाह का एक दरवार चित्र रोस संग्रह में है इस चित्र में सुनहरे रंग की अधिकता है तथा हल्के रंगों का प्रयोग है। दरबारियों के नाम उनके ऊपर लिखे हुए हैं। इसी प्रकार मोहम्मद शाह के अनेक चित्र भी रोस संग्रह बोस्टन संग्रहालय में प्राप्त हैं

मुगल शैली का अथपतन

मुगलों का रहा-सहा यश सम्राट आलमगीर द्वितीय (१७५४ ई० से १७५६ ई०) तक समाप्त हो जाता है। उसके पश्चात शाह आलम द्वितीय (१७५९ ई० से १८०६ ई०), अकबर द्वितीय (१८०६ ई० से १८३७ ई०) तथा बहादुर शाह द्वितीय (१८३७ ई० से १८५७ ई०) दिल्ली के सिंहासन पर बैठे परन्तु इनकी शक्ति समाप्त हो चुकी थी और वे केवल नाममात्र के शासक थे। 

अंतिम शासक बहादुरशाह ‘ज़फर’ को अंग्रेज़ों ने अंडमान द्वीप में आजीवन कारावास में भेज दिया। शाह आलम द्वितीय के समय में चित्रकार प्रायः बाजारू हो चुके थे और खानदानी चित्रकार पुराने चर्बी से अकबर, जहाँगीर, शाहजहाँ तथा औरंगजेब आदि के अनुकृति चित्र बनाने लगे जिन पर जाली मोडरें लगा दी गयीं। 

कभी-कभी इन चित्रों में चित्रांकित व्यक्ति का नाम गलत है, क्योंकि यह धोखा देकर चित्र बेचा करते थे। कुछ चित्र संभवतः शाहआलम ने भी अपने लिए सत्य प्रतिलिपियों के रूप में बनाये और संभवतः ये मोहरें उसने ही चित्र की पूर्णरूपेण अनुकृति कराने के लिए लगवाई हो परन्तु यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता। 

अन्ततः यह स्पष्ट है कि चित्रकार केवल चर्चे से चित्र बनाने तक सीमित रह गए थे और मुगलकाल की रेखांकन-कोमलता, सजीवता और रंगों का पौढ़ापन समाप्त हो गया। 

शाहआलम के समय का जहाँगीर का एक सुंदर चित्र, जो विचित्तर के द्वारा बनाये हुए चित्र की अनुकृति है, श्री शान्ति कुमार मुरारजी बम्बई के निजी संग्रह में प्राप्त है इस समय के चित्रों में काली स्याही का प्रयोग अधिक है, चित्रों की आकृतियों में गोलाई दर्शाने तथा खुलाई का काम स्याह कलम से ही किया गया है। फर्रुखसियर के समय से पृष्ठभूमि में भी काले रंग का प्रयोग किया जाने लगा।

औरंगजेब के शासनकाल से ही चित्रकार मुगल दरबार छोड़कर भागने लगे थे। इस प्रकार के उदाहरणों में गढ़वाल के चित्रकार मोलाराम के पूर्वजों का मुगल दरबार छोड़कर शहजादा सुलेमान शिकोह के साथ भागना प्रमाणित है। 

इसी प्रकार अन्य राज्यों में भी कई चित्रकारों के दल पहुँचे जहाँ उन्होंने स्थानीय कला शैलियों विकसित की चित्रकारों के कई वंश दूसरे मुसलमान तथा हिन्दू दरबारों जैसे हैदराबाद, अवध, राजस्थान, और पंजाब में चले गये।

मुगल शैली के चित्रों की विशेषताएँ

जिस प्रकार मुगल साम्राज्य भव्यता, ऐश्वर्य और राजसी वैभव के साथ उदित हुआ उसी प्रकार मुगल चित्र – शैली ने भी अपनी भव्य विशेषताओं के कारण भारतीय चित्रकला की शैलियों में अपना पृथक महत्त्व तथा स्थान ग्रहण कर लिया। 

मुगलों में चित्रकला धर्म निषिद्ध है, परन्तु फारस के तुर्क बादशाहों ने अपनी कला-प्रियता का परिचय दिया और ईरान से उन्होंने कला प्रेरणा ग्रहण की। इस प्रकार ईरानी कला भारत की कला बन गई।

फारस की चित्रकला वास्तव में लघुचित्रों और पोथियों की चित्रकला थी। कवियों की रचनाएँ दरबार की झाँकियाँ, शहजादों तथा बादशाहों की शबीहों, लड़ाइयों तथा प्रीतिभोजों के दृश्य इस चित्रशैली के प्रिय विषय थे, परन्तु चित्रकला धर्म निषिद्ध होने के कारण कभी धर्म के क्षेत्र में पदार्पण न कर सकी सोलहवीं शताब्दी में जब फारस की चित्रकला भारतीय मुगल सम्राटों के संरक्षण में भारतीय कला की विशेषताओं को ग्रहण कर गई तो उसमें अनेक नवीन विशेषताएँ प्रस्फुटित होने लगीं और यह मुगल चित्रकला भारत की एक महान चित्र-शैली बन गई।

जिस प्रकार भारतवर्ष एक धर्म प्रधान देश रहा है उसी प्रकार चित्रकला भी कई शताब्दियों तक धर्म प्रधान बनी रही। 

अजन्ता की चित्रकारी, पाल तथा जैन शैली के पोथी चित्र और राजस्थानी शैली की कृतियाँ विशेष रूप से धर्म से सम्बन्धित थीं और चित्रकला धर्म का एक अंग बनी रही इस्लाम धर्म में चित्रकला धर्म निषिद्ध थी और क्योंकि मुसलमानों की ऐसी धारणा है कि किसी व्यक्ति की आकृति अथवा चित्र बनाने पर उसमें जान डालना चाहिए अन्यथा यह पाप है इस कारण ही इस्लाम धर्म की जन्मभूमि अरब में जो मस्जिदें बनवाई हैं उनमें अलंकरण हेतु ज्यामितिक आकारों के आलेखनों तथा कुफिका सुलिपि (खते तौहरा) का ही केवल प्रयोग किया गया है। 

धीरे-धीरे ज्यामितिक आलेखनों का स्थान अंगूर की बेल तथा तितली आदि ने ले लिया, परन्तु भारत में मुगल शासकों ने अधिक उदारता दिखाई। इस उदारता के उपरान्त भी चित्रकला को धार्मिक स्थान प्राप्त नहीं हुआ, इसी कारण मुगल कृतियों में आध्यात्मिक पक्ष प्रबल न हो सका। 

मुगल चित्रकार बाह्य वैभव-रूप तथा सांसारिक उपकरणों तक सीमित रह गया। यद्यपि शबीह लिखते समय चित्रकार ने व्यक्ति के चरित्र को सच्चाई के साथ अंकित कर दिया है, परन्तु आत्मा का पक्ष कलाकार की कृतियों में नहीं आ सका। चित्रकार बादशाह के चारों ओर के जीवन तक या दरबारी इतिहास तक सीमित रहा और जनसाधारण की ओर उसकी दृष्टि न जा सकी।

चित्रों का विषय 

मुगल बादशाहों को पुस्तकालयों तथा पुस्तक संग्रह में अत्यधिक रुचि थी इन बादशाहों ने शाही पुस्तकालयों में सुंदर सचित्र पुस्तकों को जुटाने के लिए उत्तम से उत्तम कलाकारों को आश्रय प्रदान किया। पुस्तकों या पोथियों से सम्बन्धित चित्रों की रचना होने के कारण कविता तथा कथाओं पर आधारित चित्र अधिक बनाये गये। 

मुगल चित्रकार केवल फारसी साहित्य पर आधारित चित्रों तक सीमित न रहा बल्कि उसने भारतीय कवियों की रचनाओं पर भी चित्र बनाए। परन्तु भारतीय काव्य तथा कथाओं से सम्बन्धित चित्रों में भारतीय आत्मा उतनी प्रबल नहीं है जैसी कि भारतीय चित्रों में है, उदाहरणार्थ- महाभारत और नल-दमयन्ती के चित्र लिये जा सकते हैं। 

इन चित्रों पर बहुत अधिक मुगल प्रभाव है। सचित्र ग्रंथों की परम्परा से सुलिपि लेखन-कला का भी विकास हुआ क्योंकि चित्रों के साथ काव्य कथा को भी सुलिपि के हाशियों या चित्र के पीछे लिखा जाता था।

मुगल बादशाह अपनी शान-शौकत पर बहुत अधिक ध्यान देते थे, यही कारण है कि मुगल बादशाहों ने अपने तथा अपने दरबारियों के छवि चित्र तथा विभिन्न दरवारों के चित्र बनवाए। अकबर, जहाँगीर (रेखाचित्र – ‘सम्राट जहाँगीर’), शाहजहाँ आदि सभी मुगल शासकों के चित्र प्राप्त हैं। 

इन दरबारी चित्रों से दरबारी अदब-कायदे, मुजरे तथा मुगल , अनुशासन का पूर्ण आभास होता है दरबार के दृश्यों में बादशाह को अधिकांशतः छज्जे पर या छतदार तख्त पर बैठा चित्रित किया गया है। दरबार के दृश्यों में एक गंभीरता है। जिससे मुगल सम्राट का रौब और दबदबा स्पष्ट प्रतीत होता है।

मुगल दरबार में यूरोपियन तथा फारसी राजदूत तथा समय-समय पर हिन्दू राजा और धार्मिक नेता आते रहते थे अनेक चित्रों में इन राजाओं या राजदूतों के आगमन के दृश्य अंकित किये गए हैं। 

इस प्रकार के चित्र उदाहरणों में ‘कैदी सुल्तान वैवीजाद तैमूर के सामने जिसके पीछे मीर अली का लेख है तथा ‘यूरोपियन राजदूत’ जिसमें बादशाह शाहजहाँ का दीवाने खास दर्शाया गया है और ‘जहाँगीर के दरबार में विवेक हर्ष तथा पं० उदय हर्ष’ के चित्र सुंदर हैं। 

इन दरबारी दृश्यों में हैं। मंत्री, सरदार, मुंशी या काजवीन, सेवक, चोबदार आदि सब दरबारी नियमानुकूल अपने-अपने स्थानों पर अंकित किये गए मुगल कलाकार का प्रधान लक्ष्य अपने बादशाह का दिल बहलाव करना और उसकी इच्छा पूर्ति करना था। 

अतः कलाकार ने समय-समय पर बादशाहों के शबीह चित्र बनाए। इस कारण मुगल शैली में अनेक बादशाहों की यौवनकाल से वृद्धावस्था तक की शबीहां प्राप्त हो जाती हैं बादशाह अपने छवि चित्र अनेक निकट सम्बन्धियों, सामंतों तथा अधीन राजाओं को भी बाँटता था। 

इस कारण बादशाहों के शबीह चित्र अत्यधिक बनाये गए। मुगल चित्रकारों ने बादशाहों के ही नहीं, बल्कि मलिकाओं, बेगमों, शहजादों (रेखाचित्र – ‘दारा शिकोह’), सरदारों, मंत्रियों, अमीरों, विद्वानों तथा विदूषकों आदि के छवि चित्र खूब बनाये। 

आरम्भिक मुगल मुखाकृति चित्र निःसन्देह विदेशी शैली, सम्भवतः दक्षिणी फारस की शैली के हैं इनकी शैली सुल्तान मोहम्मद तथा उसके समसामयिक चित्रकारों की रचना होने के कारण फारसी शैली के बहुत निकट प्रतीत होने लगती है। सुल्तान मोहम्मद, विहज़ाद का शिष्य था उसकी और उसके स्कूल की कृतियाँ भारतवर्ष में बहुत कम प्राप्त हैं।

मुगल शैली

मुगल दरबार के अनेक विवरणों से यह प्रमाणित हो गया कि अधिकांश प्रमुख मुगल मुखाकृति चित्रकार हिन्दू थे, उदाहरणार्थ हुनर ( होनहार ) तथा भगवती हिन्दू थे। इस प्रकार भारतीय हिन्दू तथा विदेशी मुसलमान चित्रकारों की फारसी ईरानी मिश्रित शैली से मुगल मुखाकृति चित्रण की कला विकसित हुई जो सत्रहवीं शताब्दी में समोन्नति को प्राप्त हुई।

मुखाकृतियाँ, व्यक्तिचित्र या छवि चित्र 

मुखाकृति या व्यक्ति चित्रों के अध्ययन से यह स्पष्ट हो जाता है कि चित्रकार में शिल्प कुशलता और मुखाकृति चित्रण के प्रति एक स्वाभाविक देन या प्रतिभा थी। केवल मुगल सम्राटों के मिच्या अभिमान के कारण ही मुखाकृति चित्रण का विकास नहीं हुआ बल्कि व्यक्तिगत रूप से भी इन सम्राटों ने मुखाकृति चित्रण में दिलचस्पी दिखाई। 

साधारणतः सभी मुखाकृति चित्र बहुत उत्तम नहीं है परन्तु मुगल शासकों के चित्र उत्तम हैं। राजसी पुरुषों के मुख के चारों ओर एक सुनहरा प्रभा मंडल अंकित किया गया है, जिससे उनका उच्च पद तथा वैभव स्पष्ट हो जाता है। कभी-कभी एक ही चित्र में कई पीढ़ियों के बादशाहों को भी एक साथ बैठा बनाया गया है, यद्यपि एक ही प्रकार के चित्र कालक्रम तथा ऐतिहासिक दृष्टिकोण से ठीक नहीं हैं। 

अधिकांश चित्रों में अकेली खड़ी हुई आकृतियाँ ही छविचित्रों में बनायी गई हैं। चित्र के व्यक्ति को हरी मखमली कोमल घास पर खड़ा बनाया गया है और घास पर छोटे-छोटे फूल भी बनाये गए हैं जिससे दुर्वाच्छादित भूमि कालीन के समान दिखाई पड़ती है।

पृष्ठभूमि

मुगल शैली के चित्रों की पृष्ठभूमि में प्रायः धुंधले (उदासीन तथा शीतल) रंगों का प्रयोग किया गया है। पृष्ठभूमि के रंग प्रायः आँखों को प्रिय लगने वाले रंग जैसे काहिया (गहरा हरा या टेरावर्ट) या हल्के हरे या काले रंग का प्रयोग है। चित्रकार ने रंगों को मोज़ाइक के समान चमकदार योजना में रखा है।

वस्त्र तथा साज

सामान कपड़ों, पदों, कालीनों तथा अन्य साज-सामान में जटिल या पेचीदे आलेखन बनाये गए हैं और इनमें सोने के रंग का भी प्रयोग किया गया है। प्रायः आकृतियों को ग्रीष्मकालीन महीन वस्त्र पहने बनाया गया है जिनके पारदर्शी झीने ताने से आकृति का सुकोमल शरीर झलकता दिखाई पड़ता है। 

अधिकांश आकृतियों को चिकन, मलमल या डोरिया आदि के बने बारीक (महीन) वस्त्रों को पहने बनाया गया है। इन वस्त्रों में कहीं-कहीं पर बूटियाँ बनाई गई हैं। अधिकांश चित्रों में पृष्ठभूमि हल्के रंग से बनायी गई हैं परन्तु कालान्तर में गहरे रंग का प्रयोग होने लगता है। 

कुछ चित्रों में साधारण प्रकाश तथा छाया या साया नहीं दिखाया गया है और केवल कोमल छाया के प्रयोग से डौल उत्पन्न कर आकृति को उभार प्रदान किया गया है।

चरित्र चित्रण

मुगल चित्रों में मोती जैसी चमक ही नहीं दिखाई पड़ती वरन् चित्र के व्यक्ति का चरित्र ही लिख दिया गया है। चित्रकार ने चित्रांकन करने में बादशाह की खुशामद नहीं की है बल्कि उसने व्यक्ति की क्रूरता तथा सहृदयता आदि भी चित्र में अंकित कर दी है। इन चित्रकारों को मानव प्रकृति का ज्ञान था। 

चित्रकार ने केवल रेखा तथा सुकोमल छाया से ही सादृश्य के साथ-साथ चित्रांकित व्यक्ति के चरित्र तथा स्वभाव का निरूपण कर दिया है। व्यक्ति के चरित्र या स्वभाव का इतनी सफलता से अंकन किया है कि जैसे चित्रकार ने चित्र के व्यक्ति के हृदय में झोंककर ही देख लिया हो। 

यह हो सकता है कि समसामयिक इतिहासकारों तथा लेखकों ने बादशाह को खुश करने के लिये उसके विषय में बढ़ा-चढ़ाकर लिख दिया हो, परन्तु चित्रकार ने निडर होकर अपनी अभिव्यक्ति की है। उसने अचेतन रूप से ही व्यक्ति के कृत्यों के अनुसार ही उसको रूप और आकार प्रदान कर सुंदर, क्रूर, निर्दयी, दयालु, सच्चा, झूठा, निर्बल या सशक्त बनाया है। हाथों की बनावट तथा आँख से चित्र के भाव प्रकट हो जाते हैं।

एकचश्म चेहरे 

अधिकांश मुगल व्यक्तिचित्र एक चश्म हैं परन्तु आरम्भिक ईरानी- शैली में बने चित्रों में चेहरे डेढ़ चश्म है। मुगल चित्रकारों के व्यक्तिचित्र कुछ नियमों में बंधे हुए तथा किसी सीमा तक आलंकारिक हैं। ये चित्र यदि किसी साधारण चित्रकार के द्वारा बनाये जाते तो वह नियमों से जकड़कर निर्जीव हो जाते। 

कुछ शबीह चित्रों को स्याह रेखांकन और हल्के रंगों के प्रयोग से ही बनाया गया है (इन चित्रों को रंगीन रेखाकृति कहा जा सकता है)। 

मुगल चित्रकारों ने ऐतिहासिक पुरुषों के चित्र भी बनाये ये चित्र प्रायः प्राचीन परम्परागत चित्रों पर आधारित हैं परन्तु कभी-कभी चित्रकार ने मृत व्यक्ति हैं के गुणों के आधार पर उसके काल्पनिक रूप को चित्रित कर दिया है, और उसका चित्र बना दिया। इस प्रकार के उदाहरणों में सिकंदर महान आदि के चित्र हैं।

हाशिये तथा लेख

मुगल चित्रों के हाशियों पर या चित्र पर जिस व्यक्ति का चित्र है उसका नाम लिखा रहता है। यह नाम या लेख काली स्याही से कुफिका लिपि के समान सुंदर सुलिपि (खतेतोहरा) में लिखा गया है। 

जब कई आकृतियों के दल का चित्र हो तो चित्र पर उसका नाम लिखना उचित न था इस कारण प्रायः चित्र की पृष्ठिका पर नाम लिख दिये गए है परन्तु अधिकांश नाम विश्वसनीय नहीं है, क्योंकि कभी-कभी औरंगजेब के स्थान पर जहाँगीर लिखा है चेहरा देखते ही यह गलती ज्ञात हो जाती है क्योंकि इन दोनों सम्राटों के नाक-नक्श में बहुत अंतर था। 

शायद यह गलत नाम बाद में किसी ने चित्रों पर लिख दिए हैं, जिससे चित्र का महत्त्व बढ़ जाय। अतः इन चित्रों के नामों को बहुत सतर्क होकर देखना चाहिए। कभी-कभी ये नाम व्यक्तियों के चेहरों के सम्मुख या उसके कपड़ों में लिख दिये गए हैं।

सन्तों की शबीहें

मुगल बादशाहों ने समसामयिक साधुओं, संतों आदि के चित्र भी बनवाये। अकबर की तो विशेष श्रद्धा ही साधुओं, संतों और धार्मिक पुरुषों के प्रति थी। वह उनके सत्संगों में भाग लेता था और ‘दीन इलाही’ धर्म इसी प्रकार के हिन्दू, जैन, ईसाई तथा मुसलमान धर्मों का सारांश था। 

इस समय तुलसीदास, कबीर, शेखफूल, शेख सलीम चिश्ती आदि के कई चित्र बनाये गए जिससे मुगल शासकों की साधुओं के प्रति आस्था प्रकट होती है। मुसलमान साधुओं के अतिरिक्त कई हिन्दू संतों जैसे बल्लभाचार्य, सूर, तुलसी, मीरा, कबीर आदि की अनेक शबीहें बनायी गई।

स्त्री चित्रण

मुगल काल में स्त्रियों का चित्रण कम किया गया है स्त्रियों का चित्रण भारतीय परम्परा पर किया गया है।

उत्सव 

ऐतिहासिक घटनाएँ तथा उत्सवों के चित्रों में भी मुगल चित्रकार ने विशेष उत्साह दर्शाया। मुगल दरबार में आये विभिन्न राजदूतों के चित्र, युद्ध तथा संधियों और दरवारों के अनेक सजीव चित्र प्राप्त है। मुगल हरण या अन्तःपुर में सदैव ही उत्सवों की चहल-पहल दिखाई पड़ती थी कभी युवराजों के जन्म पर कभी ताजपोशी (राज्याभिषेक) पर इस प्रकार के समारोह बराबर होते रहते थे, इस प्रकार के अनेक चित्र प्राप्त हैं। 

इनमें से एक चित्र जिसमें ‘सलीम का जन्म’ दिखाया गया है, विशेष उल्लेखनीय है। यह चित्र विक्टोरिया एण्ड अलबर्ट म्युज़ियम लंदन में सुरक्षित है। इस चित्र के चार भाग हैं-एक ही भाग में इतनी आकृतियाँ और चहल-पहल है कि मुगल कलाकार की कलादक्षता का पूर्ण परिचय प्राप्त हो जाता है। 

‘शाहजहाँ का जनाज़ा’, ‘अलीमरदान खाँ का मुजरा’, ‘शाहजहाँ का जन्म’ इस प्रकार के ऐतिहासिक चित्रों के सुंदर उदहारण हैं। उत्सवों में ‘आवपासी’ या ‘नौरोज’ के जहाँगीरकालीन सुंदर चित्र प्राप्त है।

आखेट तथा यात्रा चित्र

जहाँगीर काल में अनेक यात्राओं के अन्य मार्ग में देखे गए मनोरम स्थलों के चित्र बनाये गए। जहाँगीर ने इस प्रकार के चित्रों का उल्लेख भी किया है परन्तु इनके उदाहरण प्राप्त नहीं। इस समय कलाकारों ने युद्ध चित्र तथा परेडों और घुड़सवारों के दस्तों के अनेक चित्र बनाये। आखेट के चित्र जहाँगीर काल से मुगल-चित्रकार के प्रिय चित्रण विषय बन गए थे। 

निःसन्देह ये चित्र शासकों की आज्ञाओं पर बनाये गए होंगे। मुगल शासक आखेट और युद्ध की स्मृति को प्रमाण स्वरूप सुरक्षित रखना चाहते होंगे, अतः इन सम्राटों ने आखेट की साहसिक घटनाओं और पशु को घेरने के अनेक दृश्य बनवाये। शेर का शिकार तथा मृग आखेट चित्रकार का प्रिय चित्रण विषय थे। 

एक शेर के शिकार के चित्र में जहाँगीर को मौत के मुख से बचते दिखाया गया है। बादशाह खाली बन्दूक से अपने हाथी पर सवार बाघ को डरा रहा हैं। इस चित्र का पहले उल्लेख किया जा चुका है। ऐसे शिकार के दृश्यों में प्राकृतिक दृश्य सुंदर है। 

प्रायः दूर पर पृष्ठभूमि में पहाड़ियाँ दिखायी गई हैं तथा अनेक प्रकार के वृक्ष और ऊँची-नीची पथरीली भूमि या घाटियों का अंकन है।

प्रकृति तथा पशु

मुगल चित्रों में प्रकृति का पूर्ण ज्ञान तथा रोमानी भावना दिखायी पड़ती है।” प्रकृति का अंकन आगरा, दिल्ली तथा राजस्थान की पहाड़ी भूमि के आधार पर किया गया है जिधर से मुगल काफिले गुजरते थे। दरारदार दूरी पर दर्शाये गए राजस्थानी सूखे पर्वत, झीने बादल, स्वच्छ आकाश तथा खुला मैदान मुगल चित्रों की विशेषता है। 

ऊँचा ताड़ का वृक्ष या बैंगनी फूल से झुका हुआ कदली वृक्ष, आम, वट, पीपल तथा अन्य वृक्ष इस प्रकार के प्रमाण हैं कि चित्रकार ने कोमलता से वृक्षों को बनाया है। मुगल शैली में वृक्ष यथार्थ बनाये गए हैं। पत्तियों में साया बनाया गया है। 

वृक्षों को खण्ड में विभाजित करके उनमें पत्तियों के गुच्छे बनाये जाते थे। पत्तियों को बारीकी से अनेक दशाओं में जैसे-उल्टी या सीधी पत्ती भी बनाते थे फूलों की पंखुड़ियाँ बारीकी से बनायी जाती थीं। मुगल चित्रों में जल को अंकित करने के लिए भूरे धरातल पर लहरदार या टेढ़ी रेखाओं से लहरें बनायी जाती थीं या झाग भी दर्शाये जाते थे। 

जल में चाँदी के रंग का प्रयोग भी किया गया है। मुगल बादशाहों की दृष्टि दरबार या जंगल के बाह्य रूप तक ही सीमित न रही बल्कि जहाँगीर जैसे सूक्ष्म दृष्टि वाले सम्राट ने जंगली तथा पालतू पशु- -पक्षियों और पुष्पों को भी चित्रण का प्रधान विषय माना। 

मुगल बादशाहों को पशु-पक्षियों की लड़ाइयाँ देखने तथा शिकरा या बाजु पालने का शौक था। शिकरे को ये बादशाह अपनी कलाई पर पट्टी बाँधकर बिठाते थे, इस प्रकार के अनेक चित्र प्राप्त हैं। अकबर को हाथियों की लड़ाई में बहुत दिलचस्पी थी उसका इस प्रकार का एक चित्र प्राप्त है जिसमें वह हाथियों की लड़ाई एक नाव पर बैठा देख रहा है और ये मस्त हाथी लड़ते हुए नावों के पुल पर दौड़ रहे हैं। 

झील के चारों ओर हलचल मच गई है, झील की दूसरी ओर से किले के प्यादे भाले लिए दौड़ रहे हैं। इन चित्रों में हाथियों की बनावट बहुत स्वाभाविक और यथार्थ है। मुगल चित्रों में कम मिलने वाले या अनोखे पशु जैसे-ज़ेबरा, जिराफ, हाथी, घोड़ा, शेर, मेड़ा, ऊँट, बकरे आदि का अंकन मिलता है। 

पशुओं के चित्रण में यथार्थता और जीवन है। जहाँगीर ने पशुओं के अतिरिक्त कम मिलने वाले पक्षियों तथा पुष्पों का चित्रण भी कराया। इस प्रकार के पक्षियों में मोर मोरनी, सुनहरा कबूतर (पीजेन्ट), शिकरा, काक्तुआ (एक प्रकार का बड़ा तोता), पीलू, तुर्की तीतर, बटेर, बुलबुल, कोयल, सारस, मुर्गा, बत्तख आदि अनेक प्रकार के पक्षी तथा पुष्पों में नरगिस, अनार, घेरी, पोस्त, वाटर- बेरीज आदि का सुंदरता से अंकन किया गया है। मुगल चित्रों में हाथी का अंकन भारतीय परम्परा पर आधारित है।

इन पुष्पों के चित्रों में प्रायः पुष्पों के ऊपर मंडराते हुए भौरे, तितलियों तथा अन्य कीड़ों आदि को भी अंकित किया गया है। पुष्पों के रंग चमकदार, सजीव और सुंदर हैं और उनका वर्ण-विधान तथा रेखांकन आलंकारिक है। प्रायः पृष्ठभूमि सपाट, हल्की पीली, नीली या हरी है। 

कभी-कभी दूरी पर क्षितिज के पास का दृश्य भी दिखाया गया है। इस प्रकार जीव तथा वनस्पति विज्ञान सम्बन्धी विषय मुगल चित्रकार की एक नवीनता है। कम मिलने वाले या अनोखे पशुओं में ज़ेबरा, जिराफ, गैंडा, मेढ़ा, हाथी, ऊँट आदि के सुंदर चित्र प्राप्त हैं।

मुगल चित्रों का विधान तथा साज-सज्जा

मुगल चित्र भित्तियों (दीवारों) पर या सूती कपड़े या कागज़ पर बनाये गए हैं और अधिकांश लघु चित्र हैं। उनका विधान अपनी एक विशेषता है। अधिकांश मुगल चित्रों को कागज़ पर ही बनाया गया है। चित्रकार दे तीन या चार कागज़ों को सटाकर और चिपकाकर एक मोटा कागज़ तैयार करके उन पर गेरू के रंग से या कत्थई रंग से वृत बांधकर चित्र की सीमारेखा को बनाया है। 

उस पहली रेखा को जिसे ‘टिपाई’ कहते थे, के पश्चात् पारदर्शी सफेद रंग दो या तीन बार पोत दिया जाता था जिसके ऊपर पुनः रेखांकन करते थे जिसे ‘सच्ची टिपाई’ कहते थे फिर चित्र में सपाट रंग दो या तीन बार भर दिये जाते थे जिसे ‘रंगमेजी’ कहते थे, इसके बाद चित्र को एक चिकनी शिला पर कागज़ के ऊपर उल्टा रखकर पीठ की तरफ ऊपर से घोटा जाता जिससे ओप आ जाता था, साथ-साथ जहाँ जिस रंग की कमी मालूम पड़ती उसको फिर से लगा दिया जाता था, इसे ‘गदकारी’ कहा जाता था। 

इस प्रकार घोटने से रंग दबकर मीनाकारी के समान प्रतीत होने लगते थे तब पुनः अंत में सीमारेखा के अंकन (सरहद के ख़त) से आकृति और चित्र के प्रत्येक भाग पर काम करते थे, इसे ‘खुलाई” कहते थे। 

इस समय जहाँ पर छाया या किसी रंग को लगाने की आवश्यकता होती तो उसे लगा देते थे, जैसे अधरों की लाली, आँख की पलक तथा कानों की लाली आदि लगा देते थे स्त्री चित्रों में आभूषण, मेहदी, महावर इत्यादि इसी समय लगाई जाती थी जिसे ‘मोती-महावर’ कहते थे और पुनः चित्र को घोटकर चमक पैदा की जाती थी। 

अन्त में बारीकियों को पूरा किया जाता था, आँख की सफेदी को उभारा जाता था इसे ‘मीनाकारी’ या ‘सुईकारी’ कहते थे। शरीर के रंग भरने को ‘चेहराई’ कहा जाता था। इस प्रकार चित्र पूर्ण होकर बसली बनाने वाले के पास तथा खत-साज़ के पास जाता था। 

बसली बनाने वाला चित्र को कई कागज़ चिपकाकर बनायी गई मोटी बसली पर चिपकाता था और ‘ख़त साज’ या ‘नक्काश’ उसके चारों ओर सुंदर बेल-बूटों, खतों या लेखों आदि से उसकी सज्जा करता था। जिल्दसाज उसे यथास्थान मुरक्कों में लगा देता था।

हाशिये मुगल चित्रों के हाशिये भी एक कुशल कलाकार के द्वारा बनाये जाते थे जो कारीगरी के उत्तम उदाहरण है। इन हाशियों में बेल-बूटों के अतिरिक्त आखेट स्थल या चित्र के प्रसंग से सम्बन्धित या मेल खाते पशु, पक्षी, पुष्प या मानवाकृतियों पर आधारित आलेखन बनाये जाते थे। 

कभी-कभी ये हाशिये चित्र से भी सुंदर बन गए हैं और इनके कारण ही चित्र- विशेष का महत्त्व है। प्रायः हाशिये में सोने तथा चाँदी के तबक को भी छिटक दिया गया है।

बसली के पीछे अधिकांश फारसी सुलेख के उत्तम उदाहरण मिले हैं। इस प्रकार मुगल चित्र अनेक चित्रकारों के हाथों में से निकलकर तैयार होता और तब बसली (माउंट) पर चढ़ता और फिर अच्छे कारीगरों के द्वारा उसका हाशिया तथा लेख तैयार किया जाता था। मुगल चित्रों के रंग-मुगल चित्रकार के रंग मीने के समान चमकदार साफ तथा स्थायी हैं। 

कलाकार इन रंगों को अन्य सामग्री के समान ही अपनी देख-रेख में सतर्कता से तैयार कराते थे। मुगल चित्रों में प्रयुक्त रंग तीन वर्गों में रखे जा सके हैं 

जो इस प्रकार हैं-

  • (१) वानस्पतिक
  • (२) रासायनिक 
  • (३) खनिज

इन रंगों में वानस्पतिक रंगों में काला – काजल (सरसों के तेल से भरे दीपक में कपूर जलाकर काजल बनाया जाता था) महावर का रंग (लाख से बना वानस्पतिक रंग), नीला (नील के पौधे का रस), पीला (नकली प्यौड़ी तथा ढाक आदि फूलों का रंग) है। 

रासायनिक रंगों में सफेद (सफेदा कासगार जस्ते को फूंककर बनाया गया रंग), लाल सिंदूर (पारे का भस्म) तथा हिंगुल (संगरफ-रासायनिक रंग), पीला-प्योड़ी (रासायनिक) आदि है। खनिज रंगों में लाल-हिरोजी तथा गेरू (खनिज), नीला-लेपिसलाजुली, पीला-चमकदार हरतल, पीला गंदा-रामरज, हल्का पीला मटमैला-मुलतानी मिट्टी, सफेद-खड़िया, हरा-जंगाल या संगसब्ज (टेरावर्ट) आदि हैं। इन रंगों के सम्मिश्रण से बने बैंगनी (नीला तथा सिंदूर या हिंगुल का सम्मिश्रण), गहरे चमकदार हरे (नील तथा प्यौड़ी का मिश्रण) आदि रंग हैं। इन रंगों के अतिरिक्त, शंख की भस्म, अभ्रक एवं सफेद पत्थर को घिसकर बनाये गए महीन चूर्ण तथा सोने-चांदी के वर्क से बने रंग का प्रयोग विशेष है।

मुगल चित्रों में संगत तथा शीतल, जैसे-गुलाबी (सफेद+लाल), हरे, फाखतई, हल्के नीले धुआँयेले (प्रे) तथा सफेद रंगों का प्रयोग अधिक है। इन रंगों के अतिरिक्त सोने तथा चौदी की हिलकारी बनाकर इनके रंगों का प्रयोग किया गया है जिससे चित्र अधिक ओजपूर्ण बन गए हैं। 

रात्रि अथवा वर्षा का वातावरण दर्शाने के लिए प्रत्येक रंग में काला रंग मिला दिया जाता था, ऐसे रंग को ‘बुता रंग’ कहते थे चमकदार रंगों को ‘चुचुडा’ रंग कहा जाता था।

रेखांकन विधि

चित्रों की सीमारेखा को प्रायः चरवे से बनाया गया है। ये चरवे ( ट्रेसिंग पेपर के समान बनायी गई हिरन की महीन खाल) हिरन की खाल पर बारीक छेद करके बनाये जाते थे और इन छेदों पर आक के पौधों को जलाकर बनायी गई बारीक राख की पोटरी को फिरा दिया जाता था, जिससे चित्र की सीमारेखा नीचे बन जाती थी। इसप्रकार के अनेक चरवे प्राप्त हैं।

रात्रि के दृश्य

मुगल चित्रकार ने चाँदनी रात या दो प्रकार के प्रकाशों को दिखाने में कमाल कर दिया है। ऐसे चित्रों में कागज़ पर सबसे पहले चाँदी का अस्तर या पृष्ठिका लगा दी जाती थी जिससे चाँदनी या पानी का प्रभाव दिखाई पड़ने लगता था कभी-कभी रात्रि में मशालों को सोने के रंग से बनाकर चाँदनी के प्रकाश को चाँदी के रंग से भी दिखाया गया है इस प्रकार दो प्रकार के प्रकाश दिखाये गए हैं।

मुगल चित्रों की रेखा मुगल चित्रों की रेखाएँ साफ, महीन और लिपि की रेखाओं के समान हैं। रेखाओं में शक्ति और गति होने के कारण मुगल चित्र निखर उठे हैं। सीमारेखाओं के किनारों पर आवश्यक स्थानों पर डौल या गोलाई लाने के लिये सुकोमल छाया का प्रयोग किया गया है। मुगल रेखाओं में चरित्र चित्रण की अपूर्व शक्ति है।

छाया या परवाज़ मुगल चित्रों में सादृश्य और यथार्थता लाने के लिये आकृतियों में आवश्यकतानुसार छाया का प्रयोग किया गया है, जिससे गहराई और प्रकाश का उठा हुआ भाग चित्र में स्पष्ट दिखायी पड़ने लगता है। 

यह छाया प्रायः बगलों तथा चेहरे में कान तथा जबड़े के नीचे और आँख के पास लगायी गई है। इस छाया को महीन तूलिका (केवल एक-दो बाल वाली तूलिका) से काली स्वाही या किसी काले मिश्रित उपयुक्त रंग से. पास-पास महीन तथा छोटी रेखाओं को खींचकर ‘यत् परदाज़’ या पास-पास बारीक बिन्दु लगाकर ‘दाना परदाज़’ के द्वारा बनाया जाता था।

मुगल चित्रों की योजना तथा संयोजन-मुगल चित्रों की योजनाएँ सरल तथा चित्ताकर्षक हैं। अधिकांश चित्रों में लम्बवत् या क्षैतिज योजनाओं का प्रयोग है। व्यक्ति चित्रों में प्रायः त्रिभुजाकार उदग्र लम्बवत् योजनाएं ली गई हैं।

चित्रों के तीनों भाग अर्थात् पृष्ठभूमि मध्यभूमि और मुख्यभूमि या अग्रभूमि को समान कुशलता और परिश्रम तथा सावधानी से बनाया गया है। मुगल चित्रों में अत्यधिक स्थानान्तर या दूरी दिखाने के लिये क्षैतिज रेखा को चित्र के ऊपरी भाग में रखा गया है। 

क्षितिज के पास पृष्ठभूमि के भाग में प्रायः फारसी ढंग के साफ पहाड़ बने हैं जिनमें दरारें सुकोमल रंगों के द्वारा बनायी गई हैं। मध्य भाग में मैदान का भाग है जिसमें अनेक वृक्ष आदि बनाये गए हैं। मध्यभूमि या अग्रभूमि में प्रायः चित्र की प्रमुख आकृतियाँ बनायी गई। हैं। 

चित्र के प्रमुख व्यक्ति को केन्द्रत्व प्रदान किया गया है। अग्रभूमि में पानी या पुष्पित पौधों को भी बनाया गया है। चित्र के अनेक व्यक्तियों को उनके पद या महत्त्व के अनुसार ही किसी उपयुक्त स्थान पर रखा गया है।

अधिकांश मुगल चित्रों में उद्यान, राजप्रासाद, दुर्ग, बारहदरी ( बरामदा ), दीवाने आम तथा दीवानेखास, शामियाने तथा कनातें या प्राकृतिक दृश्य बनाये गए हैं जिनमें भारतीय वृक्ष तथा वातावरण हैं। भारतीय वृक्षों में वट, ताड़, आम, जामुन, केला इत्यादि अनेक प्रकार के वृक्षों का संयोजन है।

भवन

मुगल चित्रों में भवन का अत्यधिक प्रयोग किया गया है। ये भवन सफेद संगमरमर के हैं या चूने से पुते बनाये गए हैं। कभी-कभी भवन लाल रंगों के हैं जो आगरा तथा दिल्ली के लाल पत्थर से बने दुर्गों तथा भवनों की याद दिलाते हैं। ये भवन समसामयिक मुगल भवन-शैली में बनाये गए हैं। 

इनमें गुम्बदों, बारहदरियों, महराबों, चबूतरों, छज्जों तथा जालियों को सुंदरता से बनाया गया है। भवन के साथ उद्यान भी बनाये गए हैं। मुगल दरबार- मंडपों की महरावें घुमावदार वक्रों से बनायी गई हैं और स्तम्भों पर सुंदर सजावट है। 

भवन में मोज़ाइक के आलेखन भी बनाये गए हैं। मुगल चित्रों में दुर्गों का चित्रण भी किया गया है। दुर्गों के चित्रों में विशाल द्वार, परकोटे तथा कंगूरे और बुर्जियाँ जो मुगल दुर्गों की विशेषताएं थीं, को यथोचित रूप से दर्शाया गया है।

परिप्रेक्ष्य (Perspective) तथा स्थितिजन्य-लघुता (Fore shortening)- मुगल शैली के चित्रों को देखने से स्पष्ट दिखाई पड़ता है चित्रकार को दाष्टिक परिप्रेक्ष्य का पूर्ण ज्ञान था परन्तु फिर भी कहीं-कहीं पर परिप्रेक्ष्य के नियमों का पालन इसलिए नहीं किया गया है कि आलेखन का प्रवाह न टूट जाय या आलेखन का प्रभाव समाप्त न हो जाय इस प्रकार अलंकरण और आलेखन को परिप्रेक्ष्य की तुलना में अधिक महत्त्व दिया गया है। 

सामान्यतः भवनों आदि के बनाने में तथा परेडों आदि के दृश्यों में परिप्रेक्ष्य का प्रयोग किया गया है। कलकत्ता म्युज़ियम में घुड़सवारों के एक दस्ते का दृश्य है, जिसमें सैनिक दस्ते को मुख्यभूमि से पृष्ठभूमि में तिरछा जाते हुए दिखाया गया है। 

इस चित्र में पृष्ठभूमि के सवार छोटे ही नहीं बनाये गए हैं वरन् अपनी स्थिति के अनुसार सवारों की आकृतियाँ अपनी स्थितियों में बदलती भी दिखायी पड़ती हैं मुख्यभूमि के सवारों की पीठ ही दिखायी पड़ रही है परन्तु पृष्ठभूमि में क्रमिक रूप से छोटे होते हुए और बायीं ओर घूमते सवारों का बाय अंग भी दिखाई देने लगता है। इस प्रकार इस चित्र में दाष्टिक परिप्रेक्ष्य के साथ स्थितिजन्यलपुता का सुंदरता से समावेश किया गया है।

आलेखन 

मुगल कलाकारों ने हाशिये में ही नहीं बल्कि फर्श, कालीन, परदों, छतों, स्तम्भों, दीवारों तथा वस्त्रों आदि के चित्रण में भी आवश्यकतानुसार आलेखनों का प्रयोग किया है। भवन सम्बन्धी आलेखन प्रायः ज्यामितिक हैं। परन्तु अन्य स्थानों पर पुष्प और पत्तों आदि से सुंदर बेलें तथा बूटियाँ बनायी गई हैं। कपड़ों में ये आलेखन प्रायः सुनहरे रंग से बनाये गए हैं।

वस्त्र तथा आभूषण 

मुगल चित्रों में प्रायः जामा, चुस्त पाजामा, कमर में पटका और पगड़ी पुरुषों का पहनावा है। ये जामे बहुत कुछ राजपूत बाने का परिष्कृत रूप हैं। स्त्रियों के पहनावे में झीना आँचल, कुर्ता या चोली आस्तीनदार, पायजामा तथा लहंगा • सामान्यतः प्रयोग किया गया है। 

पैरों में नोकदार देशी जूतियाँ बनायी गई हैं। मुगल चित्रों में बादशाहों, योद्धाओं, सामान्य व्यक्तियों आदि के जूते भिन्न-भिन्न प्रकार के हैं जिनसे उनको पहचानना सरल हो जाता है। बादशाहों की पगड़ियों में कीमती मोतियों की कलगियों बनायी गई हैं। 

उनके गले में कीमती मोतियों की अनेक मालाएँ बनायी गई हैं, जिनसे उनका वक्षस्थल ढका रहता है। मालाओं के अतिरिक्त युवराजों के कानों में प्रायः कुंडल भी बनाये गए हैं स्त्रियों के आभूषणों में मोतियों की मालाएँ, बेदी, बाजूबंद, दस्तबंद, कड़े, झुमके, शुमड़ तथा पेटियाँ बनायी गई हैं।

हस्त मुद्राएँ तथा अंग-भंगिमाएँ

मुगल चित्रों में यथार्थता का अधिक समावेश है। इसी कारण अधिकांश हस्तमुद्राएँ तथा अंग-भंगिमाएँ स्वाभाविक और यथार्थ है। हस्तमुद्राओं में सजीवता और भावाभिव्यक्ति की क्षमता है। हस्तमुद्राओं तथा अंग-भंगिमाओं से चित्रकार ने चित्र की योजना में एक नाटकीयता उत्पन्न कर दी है। 

मुगल व्यक्ति-चित्रों में आकृति अधिकांश खड़ी मुद्रा में बनायी गई हैं। सामान्यता खड़ी, बैठी, झुकी, सलाम या मुजरा आदि करती अनेक प्रकार की अंग-भंगिमाओं में मानवाकृतियों को चित्रांकित किया गया है। हाथों, उंगलियों तथा पैरों आदि की बनावट सुंदर और सजीव है।

मुगल दरबार में यूरोपियन कला का प्रभाव बढ़ रहा था परन्तु फिर भी मुगल का अपना निजी अस्तित्व बनाए रही और उसने अपनी आलंकारिक योजना, संगत रंगों की शीतलता तथा सुमधुर कोमलता, सीमारेखा के साथ गोलाई, उभार या डौल की विशेषता को न जाने दिया । अन्ततः पाश्चात्य प्रभाव मुगल कला की गति को न मोड़ सका।

मुगल चित्रों पर दृष्टिपात करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह बादशाहों और उनके मुसाहियों की कला थी। इसमें जन-जीवन और समाज की झाँकी नहीं है, केवल राज्य अधिकारियों, समाज के नियंत्रकों और देश के भाग्य निर्णायकों की जीवन-चर्या ही मुख्य है। 

मुगल चित्रकला जनता से सर्वथा छिन्न-भिन्न रही और कभी भी उसका सम्बन्ध जनसाधारण या लोक भावना से न हो सका। मुगल कला राजसी वैभव, विलास और ठाठ-बाट में खोई रही। अधिकांश चित्र इतने मूल्यवान थे कि साधारण जनता इनको ग्रहण करने के लिये इतना व्यय भी नहीं कर सकती थी।

दक्षिण शैली

दक्षिण में विजयनगर के राजाओं के समसामयिक बहमनी सुल्तानों का शासन था। इन सुल्तानों का साम्राज्य १४वीं शताब्दी से १६वीं शताब्दी के मध्य सुदृढ़ रूप से स्थापित हो गया था। सुल्तान अहमदशाह वली बहमनी ने कला-प्रेम का परिचय दिया। 

उसने १४३२ ई० में निर्मित बीदर दुर्ग के रंगमहल के कक्षों में चित्र बनवाये। किसी समय इस महल के तीन कक्षों में सुंदर पुष्पलताओं के चित्र थे अहमदशाह वली का मकबरा ईरानी ढंग की फूल-पत्तियों की नक्काशी से सुसज्जित था बहमनी शासकों के कलानुरागी होते हुए भी दक्षिण में कला का विकास न हो सका।

१४६० ई० से १५१२ के मध्य बहमनी साम्राज्य के पतन के पश्चात् दक्षिण में पाँच राजवंश स्थापित हुए जो निम्न हैं

  • (१) बीदर का बरीदशाही वंश
  • (२) अहमदनगर का निज़ामशाही वंश
  • (३) विरार का इमादशाही वंश
  • (४) वीजापुर का आदिलशाही वंश
  • (५) गोलकुण्डा का कुतुबशाही वंश

इन पाँचों राज्यों ने १५६५ ई० में संधि करके विजयनगर के हिन्दू राज्य को तालीकोटा युद्ध में हराकर विजयनगर राजधानी को लूटा, विध्वंस किया और जलाया। इस राजधानी के विध्वंसावशेष तुंगभद्रा के दक्षिणी तट पर आज भी स्थित हैं।

इन राज्यों ने प्रारम्भ में बहमनी राज्य की परम्परा को बनाये रखा परन्तु कालान्तर में केवल तीन राज्यों की कला परम्पराएँ ही आगे विकसित हुयीं। इन पाँच राज्यों में से केवल बीजापुर, गोलकुण्डा तथा अहमदनगर राज्यों ने चित्रकला की परम्परा को बनाये रखा। 

लगभग १७वीं तथा १८वीं शताब्दी में दक्षिण की ये चित्रशालाएँ पूना, हैदराबाद, कुडप्पा, कुर्नूल और शेरापुर आदि नगरों में विकसित हुई। दक्षिण के ये शासक युद्ध के समय में अपना पराक्रम तथा वीरता दिखाते थे परन्तु शान्ति के समय में सारा राजकार्य अपने मंत्रियों पर छोड़ अपना समय भोग-विलास में व्यतीत करते थे। 

जिस प्रकार दिल्ली की मुगल सल्तनत में चित्रकार को राजकीय सम्मान प्राप्त था उसी प्रकार दक्षिण से रजवाड़ों में संगीतज्ञ, चित्रकार, कवि तथा कलाविद् सम्मानित होते थे। परन्तु दक्षिणी सुल्तान शासक अकबर की कलाओं के प्रति उदार नीति से अनभिज्ञ थे। 

दक्षिण में १६५० ई० से लेकर १७५० ई० तक कलाओं की अच्छी प्रगति हुई। सोलहवीं शताब्दी के अंतिम चरण में मुगल सम्राट अकबर ने दक्खिनी राज्यों पर विजय प्राप्त करने का अभियान प्रारम्भ कर दिया।

बीजापुर

बीजापुर का आदिलशाही राजवंश कला प्रेमी वंश था। इस वंश के प्रतिष्ठापक सुल्तान यूसुफ आदिलशाह (१४६०-१५१० ई०) ने कला प्रेम प्रदर्शित किया। उसने ईरानी तथा तुर्की साहित्यकारों को अपने दरबार में निमंत्रित किया। उसका पुत्र इस्माईल अली आदिलशाह (१५५८-१५८० ई०) तथा उसकी पत्नी चाँद सुल्ताना कला पारखी और महान कला संरक्षक थे। 

‘नुजूम-अल-उलूम’ नामक प्रसिद्ध ग्रंथ इन्हीं आदिलशाह के राज्यकाल (१५७० ई०) में चित्रित होकर तैयार हुआ था। इस सचित्र ग्रंथ में दक्षिण शैली की भव्यता और प्राचीन फारसी भारतीय शैली की परम्पराएँ दिखाई पड़ती हैं। इस पोथी में ८७६ चित्र हैं। 

इन चित्रों में मानवाकृतियों, पशुओं, पक्षियों आदि के चित्र बनाये गए हैं और इनका विषय ज्योतिष, तंत्र-मंत्र शास्त्रविद्या तथा हस्तिशास्त्र आदि हैं। इन चित्रों में फारसी ईरानी तथा भारतीय अपभ्रंश शैली का सम्मिश्रण है। इब्राहीम आदिलशाह द्वितीय (१५८०-१६२७ ई०) के समय बीजापुर कला की अत्यधिक उन्नति हुई। 

उसके समय में व्यक्ति चित्र तथा भित्तिचित्र बनाये गए। उसके पुत्र मुहम्मद आदिल शाह (१६२७- १६५७ ई०) ने भी कला के प्रति प्रेम प्रदर्शित किया। आगे चलकर इस वंश में अली आदिलशाह द्वितीय १६५७ – १६७२ ई० में तथा सिकंदर अली शाह (१६७२-१६८७ ई०) ने बीजापुर शैली की उन्नति के लिये प्रयत्न किए। 

इन शासकों के समय में राजपूत, बुन्देला तथा पश्चिमी कला शैलियों का भी बीजापुर की कला पर प्रभाव पड़ा और ‘रागमाला’ चित्रावली अंकित की गई। १६८७ ई० में औरंगज़ेब ने बीजापुर को परास्त कर आदिलशाही राज्य का अन्त कर दिया।

अहमदनगर

दक्षिण में अहमदनगर शासकों के संरक्षण में ‘तारीफेहुसेनशाही’ (१५६१-६५ ई०) की सचित्र पांडुलिपि तैयार की गई। यह पांडुलिपि पूना में तैयार की गई थी। 

इसके चित्र फारसी शैली के हैं और आलंकारिक तथा भव्य हैं। अहमदनगर में रागमाला पर आधारित चित्र भी बनाये गए। इन चित्रों में सुनहरी पृष्ठभूमि है और कठपुतलियों जैसी आकृतियाँ नहीं हैं तथा चित्रों का आलंकारिक विधान है।

गोलकुण्डा 

१५५० ई० से १५८० ई० के मध्य इब्राहीम कुतुबशाह (तुर्क) का गोलकुण्डा में शासन स्थापित हुआ। उसके पुत्र मुहम्मद कुली कुतुबशाह (१५८०-१६११ ई०) ने साम्राज्य का विकास किया। इसी काल में विजयनगर के अनेक शिल्पी, जुलाहे, कलाकार तथा स्वर्णकार गोलकुण्डा में काम करने लगे। 

गोलकुण्डा के बंदरगाह मसुलीपट्टम में मुहम्मद कुली के समय कलाओं की उन्नति हुई। बादशाह कलाओं में रुचि लेता था और उसने हैदराबाद नगर भी बसाया जहाँ उसने प्रसिद्ध चारमीनार की इमारत बनवाई। 

इस समय का एक चित्र ‘नारी ओर मैना’ (चेस्टर वेट्टी संग्रह में) प्राप्त है-इस चित्र की पृष्ठभूमि सुनहरी है-पर्वतों का चित्रण ईरानी शैली में दरारदार और गुलाबी रंग में हुआ है। 

अग्रभूमि में पुष्पित पौधे चित्रित है। मध्यभूमि में वृक्ष अंकित हैं जो चीनी ढंग के हैं। नारी का सांवला वर्ण, लम्बे केश, लाल रंग का जामा, बैंगनी पाजामा, सुनहरा दुपट्टा तथा कीमती आभूषण आदि के कारण यह चित्र सुंदर प्रतीत होता है।

मुहम्मद कुली कुतुबशाह के पश्चात् उसका भतीजा मुहम्मद कुतुबशाह (१६११-१६२६ ई०) गद्दी पर बैठा। उसके समय में चित्र बनाये गए। उसके दरबार के एक चित्र में हल्के नीले आकाश में गहरे नीले रंग से गोल रेखाएँ बनायी गई हैं, भवन में सुनहरे स्तम्भों के ऊपर श्वेत मुंडेर एवं जालीदार गवाक्ष बनाये गए हैं, रिक्त दरवाजों में बैंगनी रंग लगाकर सुनहरी बूटे बनाये गए हैं। 

शरीर का वर्ण गुलाबी है (चेहराई गुलाबी है) और मानवाकृतियों के परिधान नीले, हरे एवं श्वेत चित्रित किये गए हैं। सेवक तथा साईस आदि की आकृतियों पौने दो चश्म बनायी गई हैं। महत्त्वपूर्ण आकृतियों सादृश्यपूर्ण है और उनके चेहरे एक चश्म बनाये गए हैं। 

सेवकों की कमर में पटका तथा बगल में फुंदनेदार कपड़ा बंधा बनाया गया है। १६१० से १६२० ई० के मध्य गोलकुण्डा में ‘दीवान-ए-हाफिज’ की सचित्र पोथी चित्रित की गई।

यह कला परम्परा अब्बुल हसन तानाशाह (१६७२-८७ ई०) तक प्रचलित रही १६८७ ई० में औरंगज़ेब की सेना ने गोलकुण्डा पर घेरा डाल दिया। १६८० ई० में औरंगजेब ने इन राज्यों को हराकर इनके ऊपर हैदराबाद में मुगल सूबेदार नियुक्त कर दिया।

दक्षिण शैली की विशेषता

दक्षिणी शैली के चित्र दृष्टांत चित्रों तथा स्फुट – चित्रों दोनों रूपों में प्राप्त हैं। इस शैली का अच्छा-खासा संग्रह हैदराबाद म्युजियम में संगृहीत है। १७वीं शताब्दी की दक्षिण शैली के अनेक चित्र गोलकुण्डा तथा शालारजंग म्युजियम (हैदराबाद) के संग्रहालयों में सुरक्षित हैं। 

उस समय के दक्षिणी चित्रकारों में मीरहाशिम तथा रहीम आदि का नाम महत्त्वपूर्ण है। प्रिंस आफ वेल्स म्युजियम, बम्बई में कपड़े पर चित्रित बीजापुर के सुल्तानों का विशाल पटचित्र प्राप्त है।

दक्षिणी शैली के इन चित्रों में अत्यधिक परम्परागत फारसी ढंग की आकृतियाँ बनायी गई हैं। चित्रों में चमकदार लाल, नीले तथा पीले और सफेद रंग की प्रधानता है और सोने तथा चाँदी के रंग का अत्यधिक प्रयोग है।

हैदराबाद

हैदराबाद का शासक आसफशाह (१७२४-४६ ई०) कलाकारों का आश्रयदाता था। औरंगज़ेब के कट्टरपन के कारण कुछ चित्रकार दिल्ली दरबार से हैदराबाद आकर रहने लगे। 

आसफशाह अधिकांश औरंगाबाद में रहता था अतः हैदराबाद और औरंगाबाद दोनों स्थानों में चित्रकला फली फूली इस कला में मुगलकला के अतिरिक्त स्थानीय कला की विशेषताएँ तथा गोलकुण्डा की चित्रकला का प्रभाव आ मिला। गोलकुण्डा शैली का प्रभाव हैदराबाद तथा अन्य दक्षिणी शैलियों पर १७२० ई० तक बना रहा। अट्ठारहवीं शताब्दी में पुनः मुगल चित्रकार यहाँ आये और इस कला धारा में मिल गए।

हैदराबाद की चित्रकला में चित्र के विषय, वस्त्र, आभूषण, वर्ण-विधान, आकृति रचना, पुष्प तथा पशु मौलिक हैं आश्रयदाताओं, स्त्रियों, सामंतों, दरवेशों तथा राग-रागनियों के चित्र इस कला के प्रधान विषय हैं। तानाशाह के समय के चित्रों में चटकीले रंगों तथा सुनहरे रंग का प्रयोग है परन्तु यह विशेषता हैदराबाद के परवर्ती चित्रों में नहीं है। 

परवर्ती चित्रों में फीके बेजान रंगों का प्रयोग है और संयोजन रूढ़िवादी है। अनेक चित्रों में आम, नारियल, पुष्पित चम्पा, ताड़ आदि के वृक्ष पृष्ठभूमि में अंकित हैं और मयूर आदि पक्षी बनाये गए हैं। 

चमकदार नीले आकाश में सुनहरी रेखाएँ तथा उड़ते पक्षी भी बनाये गए हैं। इन चित्रों में आलेखनयुक्त कालीन तकिये तथा वस्त्र आदि दक्षिणी आलंकारिक प्रवृत्ति या रुचि के परिचायक हैं।

इस काल में जो रागमाला के चित्र बनाये गए वे उत्तम हैं। आश्रयदाताओं या जागीरदारों के चित्र अच्छे हैं परन्तु सन्तों या दरवेशों के चित्र भद्दे हैं।

आसफशाह के पश्चात् उसका बेटा नासिर जंग दो वर्ष तक शासक रहा। वह चित्रकार भी था। उसके उपरान्त मुजफ्फर जंग, सलावत जंग और १७६२ ई० में निज़ाम अली खाँ आसफशाह द्वितीय शासक बने। उनके राज्यकाल में चित्रकला फली फूली १७६३ ई० में ‘तुजुक ए-आसफी’ ग्रंथ का लेखन तथा चित्रण कार्य हुआ। 

निज़ाम स्वयं चित्रकार था और वेंकटचलम उसके दरवार का चित्रकार था जिसको बारह हजार रुपए वार्षिक आय की जागीर निजाम ने प्रदान की।

हैदराबादी शैली में दरबारी दृश्य, रनिवास, रागमाला, चकई-क्रीड़ा, दूती द्वारा वधू का मार्ग-दर्शन आदि के चित्र बनाये गए। आखेट के चित्र हैदराबादी कला में बहुत कम प्राप्त हैं। चित्रों में प्रायः हल्की पीली अथवा नीली पृष्ठभूमि पर आकृतियों की रचना गई है। 

आकाश में रंग-बिरंगे बादल बनाये गए हैं-अग्रभूमि में पुष्पित क्यारियाँ चित्रित की गई हैं। जनजीवन के चित्रों पर स्थानीय प्रभाव है।

अट्ठारहवी शताब्दी के अन्त से उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य तक कपड़े पर भी बड़े-बड़े चित्र बनाये गए इनमें जुलूसों आदि का उसी शैली में चित्रण किया गया।

हैदराबाद कला की विशेषताएँ

  • १. समस्त चित्रों में संयोजन व्यवस्था आदि परम्परागत और एक ही प्रकार की हैं।
  • २. आकाश का चित्रण गहरे नीले बुते हुए रंग से किया गया है। 
  • ३. मानवाकृतियों की शारीरिक रचना लम्बोत्तर है।
  • ४. श्वेत मीनारों में बारीक पच्चीकारी का चित्रण किया गया है।
  • ५. स्त्रियों के पीछे की ओर ढलवां तथा छोटे माथे, एक चश्म, प्रफुल्ल चेहरे बनाये गए हैं और लम्बे तरंग केश बनाये गए हैं।
  • ६. मोतियों वाले आभूषण जैसे-सतलड़ी या पंचलड़ी हार, कण्ठी, माला, धुकधुकी, बाजूबंद, कंकन, कर्णफूल आदि बनाये गए हैं। स्त्रियों का पहनावा लम्बी चोली, सूथन दुपट्टा तथा पेशवाज़ है।
  • ७. पुरुषों का पहनावा घेरदार जामा, पगड़ी, कमरबंद तथा सरपंच है और उनको हार, माला, बाजूबंद पहने दर्शाया गया है।
  • ८. भवनों, विलास सामग्री जैसे कालीनों, चीनी के पुष्पपात्रों तथा वस्त्रों में टोंच कसीदाकारी आदि दर्शायी गई है।
  • १. पृष्ठभूमि में दक्षिणी शैली के भवन या मुगल शैली की पृष्ठभूमि अंकित है।
  • १०. हाशिये सुनहरी अथवा सिंगरफी रंग से नक्काशीदार बनाये गए हैं।
  • ११. मयूर का अधिक चित्रण है।
  • १२. आसफशाह चतुर्थ तथा पंचम (१८२६-६१ ई०) के समय में यहाँ की चित्रकला का पतन हो गया।

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