राजस्थानी राजपूत चित्रकला

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(शृंगारिक चित्रकला) (१६०० ई० से १८५० ईसवी तक )

उत्तर- भारत में सोलहवीं शताब्दी से बहुत से लघु चित्र प्राप्त होने लगते हैं, जो मुगलकालीन हैं। १६१६ ई० में स्व० आनन्द कुमार स्वामी ने इन चित्रों का वर्गीकरण करते हुए इनको दो भागों के अन्तर्गत रखा, एक तो मुगल शैली के चित्र’ और दूसरे ‘राजपूत शैली के चित्र’। 

राजपूत शैली के अन्तर्गत उन्होंने राजपूताना तथा हिमालय के पहाड़ी राज्यों के चित्रों को रखा। परन्तु आधुनिक खोजों के अनुसार यह सर्वथा भ्रम-मूलक आधार है क्योंकि राजस्थान क्षेत्र की चित्रकला के उदाहरणों और पहाड़ी शैली के उदाहरणों में लगभग २०० वर्षों का अंतर है। 

जब राजपूत या राजस्थानी शैली पतन को प्राप्त होती है उस समय पहाड़ी शैलियों का शैशव काल आरम्भ होता है। 

राजस्थान के राजपूत राजाओं के काल में उचित संरक्षण पाकर राजस्थानी शैली के चित्रकार अपनी मौलिकता सोलहवीं शताब्दी तक ग्रहण कर लेते हैं और अट्ठारहवीं शताब्दी के अन्त में अपनी विशेषताओं को खो देते हैं। 

पहाड़ी चित्रों का निर्माण अद्वारहवीं शताब्दी से आरम्भ होता है और लगभग ५० वर्ष पश्चात यह शैली अपना यौवन प्राप्त करती है। 

इसके अतिरिक्त राजस्थानी चित्रों का मूल स्रोत लोक चित्रकला या प्राचीन राजपूत सभ्यता से विकसित अपभ्रंश या जैन शैली है इसी कारण इस शैली में पूर्णतया भारतीय भित्ति चित्रण की आलंकारिक परम्परा दिखाई पड़ती है। 

पहाड़ी शैलियों का विकास इसके विपरीत मुगल कला से हुआ और साथ ही यह पूर्ण रूप से सूक्ष्म चित्रकला का एक अत्यधिक विकसित, परिमार्जित और सुंदर रूप है। इन दोनों शैलियों की विषय-वस्तु में भी थोड़ा अन्तर है- राजस्थानी शैलियों में राग-रागनियों की अधिकता है परन्तु पहाड़ी शैलियों में राग-रागनियों के उदाहरण कम प्राप्त होते हैं। 

इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि पहाड़ी क्षेत्रों की चित्रकला राजस्थान क्षेत्र की चित्रकला से भिन्न है। पहाड़ी तथा राजस्थान क्षेत्र की चित्रकला को पहाड़ी और राजस्थानी राज्यों में राजपूतवंशीय शासक होने के कारण राजपूत नाम से पुकारना उचित नहीं (पहाड़ी राज्यों में भी राजपूत राजा ही राज्य करते थे) अतः राजपूत संरक्षण में जन्मी और विकसित हुई राजस्थान क्षेत्र की कला को राजस्थानी राजपूत कला के नाम से पुकारना ही उपयुक्त है। 

जाति के आधार पर ‘राजपूत कला’ नाम अधिक भ्रम-मूलक सिद्ध होगा क्योंकि प्रत्येक राजपूत जाति के द्वारा शासित राज्य की कला इस नाम के अन्तर्गत रखी जा सकती है। परिणामतः राजस्थान की कला को ‘राजस्थानी शैली’ अथवा ‘राजस्थानी राजपूत शैली’ के नाम से पुकारना संगत है। इन नामों से एक निश्चित क्षेत्र की विशिष्ट कला का ही सम्बोधन होता है।

राजस्थान एक विशाल मरुस्थलीय क्षेत्र है जिसमें आठवीं शती से लेकर सोलहवीं शताब्दी तक अनेक छोटे-बड़े राज्य स्थापित हो चुके थे। इस प्रदेश के शासक राजपूत (राज-पुत्र) थे। उनकी सभ्यता की छाप आज भी समस्त उत्तरी भारत पर स्पष्ट दिखाई पड़ती है। 

आमेर (जयपुर), बीकानेर, जोधपुर तथा उदयपुर आदि राजपूतों के प्रमुख स्थानों के राजभवनों में भित्तिचित्रण के चिन्ह प्राप्त हैं। इन स्थानों में अभी भी भित्तिचित्रण की प्राचीन परम्परा विद्यमान है। यहाँ के चित्र आलंकारिक शैली के हैं। पहले बताया जा चुका है कि बुद्ध धर्म की अवनति के पश्चात् हिन्दू धर्म की उन्नति से अनेक सामाजिक तथा धार्मिक परिवर्तन हुए जिनका हिन्दू कला तथा साहित्य पर गहरा प्रभाव पड़ा। 

मंदिरों के निर्माण के कारण भवनों तथा मंदिरों के साज-सामान, धार्मिक साहित्य तथा संगीत में पुनः प्रगति हुई। बारहवीं शताब्दी में रामानुज ने एक सम्प्रदाय आरम्भ किया जिसका समस्त भारत पर प्रभाव पड़ा और सोलहवीं शताब्दी के आरम्भ तक उत्तरी भारत में इस आंदोलन ने एक विशाल रूप ग्रहण कर लिया। मथुरा तथा व्रज का समीपस्थ क्षेत्र इस आंदोलन का प्रमुख केन्द्र था। 

ब्रज- प्रदेश मुगल राज्य में रहते हुए भी राजस्थान की सीमा पर था अतः राजस्थान पर इस आंदोलन का प्रभाव पड़ना अनिवार्य था। रामानुज सम्प्रदाय के अनुयायियों में चैतन्य, बल्लभाचार्य, सूर, तुलसी, मीरा आदि प्रमुख थे रामानुज ने विष्णु के किसी भी रूप की आराधना पर बल दिया, इस कारण यह सम्प्रदाय वैष्णव सम्प्रदाय के नाम से अधिक विख्यात हुआ। 

विष्णु के अनेक रूपों में राम तथा कृष्ण की भक्ति का प्रमुख स्थान था और हिन्दू समाज कृष्ण को राम से अधिक महत्त्व देता था। इस सम्प्रदाय का उद्देश्य परमात्मा या विष्णु के किसी रूप में आत्मा की विस्मृति करना था। उपासक देव-आराधना में खोकर संसार को भूल जाता था। मीरा के भक्ति पद राजस्थान तथा ब्रज में लोकवाणी बन गए। इसी समय में कबीर, नानक, दादू आदि समाज सुधारक भी हुए।

सोलहवीं शताब्दी की चित्रकला और साहित्य पर वैष्णव सम्प्रदाय का गहरा प्रभाव पड़ा। इस आंदोलन के कारण राजस्थानी कला में काव्य की अत्यधिक नवीन, सुमधुर कल्पना, भावुकता और रहस्यात्मकता आई। समस्त हिन्दू समाज और राजस्थान में इस सामाजिक जागरण तथा अकबर की उदार नीति के कारण कलाओं में एक नवीन सूझ-बूझ और रसप्रवाह दिखाई पड़ने लगा।

पहले उल्लेख किया जा चुका है कि चौदहवीं तथा पन्द्रहवीं शताब्दी में मथुरा तथा अनेक गुजराती तथा राजस्थानी तीर्थ स्थानों के मठों में चित्रित पोथियाँ बीटने का प्रचलन हो गया था। इस प्रकार की पोथियों की चित्रकला में कुछ नवीन विशेषताएँ प्रस्फुटित होने लगी थीं। परन्तु मुगल काल के आते-आते वह कला अनेक राजस्थानी राज्यों में अपना विकासोन्नमुख रूप धारण कर लेती है। 

मुसलमानों के आक्रमणों तथा कट्टरपन के कारण चित्रकला कुछ हिन्दू राज्यों में ही शिथिल गति से जीवित रही और वही कला कालान्तर में मौलिक विशेषताएँ ग्रहण कर गई। मुगल सम्राट अकबर ने मेवाड़ को छोड़कर लगभग सम्पूर्ण राजस्थान पर अधिपत्य स्थापित कर लिया था परन्तु राजपूत राजा अपने राज्यों में स्वतंत्र और स्वाभिमानी रहे। इस प्रकार सोलहवीं शताब्दी में राजस्थानी कला पर मुगल प्रभाव भी पड़ा और परवर्ती

काल में यह शैली मुगल सम्बन्ध से बहुत परिमार्जित होती गई और मुगल-कला भी इस शैली के सम्बन्ध में परिवर्तित होकर मुगल या भारतीय बनी इस प्रकार मुगल शासन के समानान्तर राजस्थान में राजपूत राजाओं का शासन काल चलता रहा और राजस्थान के अनेक नगरों में कुछ अपनी विशिष्ट मौलिकताओं के साथ अनेक राजस्थानी शैलियाँ सोलहवीं शताब्दी तक विकसित की गई थीं।

राजस्थान के विभिन्न राज्यों में केवल मेवाड़ बहुत समय तक अपनी पूर्ण स्वतंत्रता बनाए रहा और मेवाड़ में ही सर्वप्रथम प्राचीन चित्रकला का पुनरुत्थान हुआ जान पड़ता है। 

सम्भवतः यह प्राचीन शैली बूंदी, जयपुर, जोधपुर आदि स्थानों में भी प्रचलित थी परन्तु इसके आरम्भिक उदाहरण प्राप्त नहीं होते और जो उदाहरण प्राप्त भी होते हैं वह मुगलकालीन हैं। इन राज्यों पर शनैः-शनैः मुगल अधिपत्य होने के कारण मुगल-कला का प्रभाव भी शीघ्र ही पड़ने लगा होगा। 

समस्त राजस्थानी राज्यों की चित्र शैलियाँ सत्रहवीं शताब्दी में विकास को प्राप्त हो जाती हैं और इनमें पूर्ण परिपक्वता और परिमार्जन आ जाता है। राजस्थान की चित्रकला का अध्ययन करने से इन कला शैलियों की जानकारी सुलभ होती जा रही हैं। 

फिर भी राजस्थान की प्रमुख चित्रकला शैलियों में मेवाड़ -शैली,बूंदी शैली, किशनगढ़ शैली, जयपुर शैली या आमेर शैली (अम्बर शैली) और बीकानेर शैली प्रमुख हैं। बीकानेर में मुगल प्रभुत्व हो जाने से इस स्थान की चित्रकला पर मुगल प्रभाव बहुत अधिक दिखाई पड़ता है।

आधुनिक खोजों तथा अध्ययन के द्वारा राजस्थानी कला का पुनः अवलोकन करने की आवश्यकता है, क्योंकि राजस्थानी चित्रकला में भिन्न शैलियाँ विकसित हुई हैं। इनके जन्म और विकास क्रम का जानना आवश्यक है। विभिन्न राजस्थानी राज्यों में चित्रकला ने राजपूत आँचलों की कुछ न कुछ अपनी निजी विशेषता ग्रहण की है। 

इसी प्रकार की प्रवृत्तियों ने राजस्थानी कला के विकास तथा प्रगति को नवीन मोड़ दिया है। अब तक बहुत से राजस्थानी कला-संस्थानों के इतिहास के विषय में पर्याप्त ज्ञान प्राप्त किया जा चुका है।

राजस्थान में राजपूत शासकों के चार मुख्य राजवंश थे। ये राजपूत राज्य अपनी वीरता तथा पराक्रम के लिये विख्यात थे। इन राजवंशों के राजाओं ने कला तथा संगीत के प्रति अत्यधिक प्रेम प्रदर्शित किया और चित्रकारों तथा संगीतकारों को इन राजा-महाराजाओं ने अपने राजदरबारों में संरक्षण प्रदान किया इन राजपूत महाराजाओं के प्राश्रयों में राजस्थानी आँचलों की चित्रकला खूब फली फूली ये चार राजवंश निम्न थे-

  • १. मेवाड़ का शिसोदिया राजवंश
  • २. अम्बेर (आमेर) का कछवा राजवंश
  • ३. कोटा, बूंदी तथा झालवाड़ के हाड़ा राजवंश
  • ४. मारवाड़ का राठौर राजवंश

मेवाड़ की चित्रकला

(मेवाड़ की शैली)

मेवाड़ की स्थिति मेवाड़ की राजधानी ‘उदयपुर’ अपनी सुंदरता के लिये प्रसिद्ध है। यह नगरी मनोरम झीलों के कारण विख्यात है। इन झीलों के अतिरिक्त चारों ओर के जंगल, पहाड़ियों तथा भव्य राजप्रसाद इसकी शोभा को और अधिक बढ़ा देते है झीलों के मध्य बने जलमहलों तथा किनारे पर बने दुर्गनुमा महलों के कारण ये झीलें और अधिक आकर्षक बन गई हैं। 

उदयपुर का राजदरबार सदैव संगीत तथा नृत्य की लय से गूंजता रहा और यहाँ के महाराजाओं की जीवन-पद्धति मध्यकालीन वैभव की प्रतीक थी। राजपूत सभ्यता की छाप मेवाड़ की चित्रकला में दिखाई पड़ती थी।

मेवाड़ के राजाओं का कला-प्रेम- मेवाड़ के शिसोदिया राजवंश के महाराणा अपनी आन-बान के लिये प्रसिद्ध थे मेवाड़ के इतिहास में महाराणा कुम्भा (१४३३-१४६८ ई०) का महत्त्वपूर्ण स्थान है। महाराणा कुम्भा एक संगीतज्ञ, विद्वान और कला-संरक्षक शासक था। 

महाराणा कुम्भा के पश्चात् राणा सांगा या संग्राम सिंह (१५०६-१५२८ ई०) ने मेवाड़ की सत्ता को और अधिक सुदृढ़ बनाया और उसने बाबर से भी युद्ध किया। राणा सांगा के पुत्र भोजराज का विवाह मीराबाई से सम्पन्न हुआ। मीराबाई के द्वारा गाये गए भक्ति पद आज भी गुजरात, बुन्देलखण्ड तथा राजस्थान में लोक-प्रिय गीत हैं। 

इस समय वैष्णव सम्प्रदाय अपने पूर्ण यौवन पर था और फिर जब महारानी मीराबाई ही वैष्णव भक्ति में खो गई थीं तो फिर मेवाड़ पर तो वैष्णव भक्ति का प्रभाव अवश्य ही गहरा होना चाहिए था। महाराणा उदय सिंह (१५३५-१५७२ ई०) ने अकबर के आक्रमणों का सामना किया परन्तु राणा को अपनी राजधानी चित्तौड़ को छोड़ना पड़ा और नवीन राजधानी ‘उदयपुर’ की स्थापना करनी पड़ी। 

महाराणा उदय सिंह के उत्तराधिकारी महाराणा प्रताप (१५७२-१५६७ ई०) ने मुगलों से लोहा लिया और मुगलों के दाँत खट्टे कर दिए। महाराणा ने जंगलों की शरण लेकर मुगलों से युद्ध किया। राणा ने मुगलों की अधीनता स्वीकार न की, परन्तु उसको अपनी राजधानी चावन्ड (चावण्ड) बनाना पड़ी। 

महाराणा अमर सिंह प्रथम (१५६४-१६२० ई०) को परिस्थितिवश मुगल आधिपत्य स्वीकार करना पड़ा। इस प्रकार अमर सिंह के प्रथम पुत्र कर्णसिंह (१६२० – १६२८ ई०) के समय में मेवाड़ का मुगलों से पर्याप्त सम्बन्ध स्थापित हो गया। 

कर्णसिंह के उत्तराधिकारी राणा जगत सिंह (१६२८ – १६५२ ई०) को शाहजहाँ ने अनेक भेटें और उपाधियाँ प्रदान कीं परन्तु राणा राजसिंह (१६५२-१६०० ई०) पहले मुगलों से मिला रहा परन्तु बाद में औरंगजेब की नीति से मुगलों के विरुद्ध हो गया और उसने मुगलों से युद्ध किया। 

यह युद्ध सिद्ध स्थित ‘श्रीनाथ जी’ की मूर्ति के सम्बन्ध में हुआ। बाद में इस मूर्ति की स्थापना ‘सीवाड़’ में की गई जो आगे चलकर ‘श्रीनाथ द्वारा’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ‘श्रीनाथ द्वारा’ वैष्णव कला तथा सम्प्रदाय का प्रमुख केन्द्र बन गया। राजा राजसिंह को काव्य तथा भवन में विशेष रुचि थी।

राजसिंह के पश्चात् जयसिंह (१६८० – १६६८ ई०) मेवाड़ के सिंहासन पर बैठा। वह स्वतंत्र प्रकृति का शान्तिप्रिय शासक था। उसमें राजसिंह जैसी योग्यता थी परन्तु वह निर्बल शासक सिद्ध हुआ। जयसिंह के पश्चात् अमरसिंह द्वितीय (१६६८-१७१० ई०) ने शासन व्यवस्था का सुधार किया परन्तु राणा को सुरा और सुंदरी से अधिक प्रेम हो गया।

मेवाड़ के आरम्भिक चित्र मेवाड़ के आरम्भिक चित्रों के उदाहरण बहुत कम प्राप्त हैं। इस शैली के आरम्भिक चित्रों का एक उदाहरण ‘स्वापासनाचार्यम्’ जिसका समय १४२३ ईसवी है, श्री विजयबल्लभ सूरी स्मारक ग्रंथ, बम्बई (१६५६ ई० में प्रकाशित, पृष्ठ १७६) में प्रकाशित है। 

इस चित्र की शैली गुजराती तथा राजस्थानी शैली का सम्मिश्रण है और शैली आलंकारिक है, जो पश्चिम भारतीय शैली या अपभ्रंश शैली का ही एक प्रगतिशील रूप है। सोलहवीं शताब्दी की मेवाड़कला के विषय में विवरणों तथा प्रमाणों के प्राप्त न होने के कारण कुछ निश्चित रूप से नहीं बताया जा सकता। परन्तु यह अनुमान किया जा सकता है कि इस शैली का विकास पश्चिम भारतीय शैली या अपभ्रंश शैली के आधार पर ही होता रहा होगा। 

‘आनंद कुमार स्वामी’ ने १६२६ ई० में मेवाड़ शैली को विशेष रूप से विचित्र (भद्दे) प्रकार की ‘श्रीनाथजी’ और उनसे सम्बन्धित चित्रों तक सीमित शैली बताया है। ये चित्र सत्रहवीं तथा अट्ठारहवीं शताब्दी में ‘नाथद्वारा’ में बनाये गए और ये चित्र वैष्णव सम्प्रदाय के यात्रियों और श्री वल्लभाचार्य के अनुयायियों के लिये सम्पूर्ण राजस्थान, गुजरात तथा अन्य क्षेत्रों में धर्मप्रचार के लिये बाँटे जाते थे।”

नवीन खोजों से मेवाड़ शैली के तिथि सहित चित्र प्रकाश में आये हैं। श्रीनाथद्वारा की कला शैली धीरे-धीरे मेवाड़ के दूसरे नगरों में पहुँची और उदयपुर नगर इस कला का विशेष केन्द्र बन गया। 

इस शैली के अन्य केन्द्रों में चित्तौड़ तथा चावन्ड का विशेष स्थान है ‘श्रीनाथद्वारा’ के जो चित्र उदाहरण प्राप्त हुए हैं वे तनिक बाद के हैं कुमारस्वामी के कैटलाग ऑफ इंडियन कलेक्शन्स के मुख्य पृष्ठ के चित्र ‘कृष्ण राधा की प्रतीक्षा करते हुए’ में दक्षिणी राजस्थानी या गुजराती शैली का प्रभाव माना गया है और उन्होंने इसका समय सोलहवीं शताब्दी बताया है। 

परन्तु इस शैली के ‘गीत-गोविंद’ के चित्र जो प्रिंस आफ वेल्स म्युजियम, बम्बई में सुरक्षित हैं, के आधार पर यह चित्र उदयपुर में सत्रहवीं शताब्दी में बना हुआ होना चाहिए। अनेक तिथि सहित उदाहरणों से यह सिद्ध हो जाता है कि राजस्थानी शैलियों ने सोलहवीं शताब्दी के अन्त में पश्चिम भारत कला-शैली से भिन्न अपनी मौलिकता उत्पन्न कर ली थी और नवीन कला शैलियों के विकास-क्रम और प्रगति में मेवाड़ अग्रगण्य था।

मेवाड़ शैली का विकास-मुगल साम्राज्य के उदय तक मेवाड़ में दूसरे राज्यों के समान ही ‘पश्चिम भारतीय शैली’ या ‘अपभ्रंश शैली’ प्रचलित थी। परन्तु नवीन मुगल कला शैली के सम्पर्क से उसमें कई परिवर्तन हुए और राजस्थानी शैलियाँ सोलहवीं शताब्दी के अन्त तक विकसित होती रहीं। 

सत्रहवीं शताब्दी के आरम्भ में मेवाड़ कला परिपक्व रूप धारण कर चुकी थी। १६०३ ईसवी की एक अपूर्ण ‘रागनी चित्रमाला’, जो श्री गोपीकृष्ण कनेरिया संग्रह, कलकत्ता में सुरक्षित है, चावन्ड में चित्रित की गई थी। इस चित्रमाला में चमकीले रंग है और रेखांकन पश्चिमी भारत शैली या अपभ्रंश शैली के समान है। रेखांकन में, कोणदार रेखाओं का प्रयोग है और चेहरों की बनावट जैन पोधियों के चित्रों के समान है। 

१६०५ ईसवी से १६५० ईसवी तक की मेवाड़-कला की प्रगति ठीक प्रकार से ज्ञात नहीं, परन्तु इस समय का एक उदाहरण- नायिका चित्रमाला’ (समय अनुमानतः १६४० ई०) नेशनल म्युजियम, नई दिल्ली में सुरक्षित है।’

ऐसा प्रतीत होता है कि मेवाड़ स्कूल की उत्पत्ति १६०५ ई० से पूर्व राजस्थानी लोककला से हुई। इस प्रगतिशील कला में दाष्टिक परिप्रेक्ष्य तथा रेखांकन की सतर्कता ग्रहण करने की चेष्टा दिखाई पड़ती है। 

इन सब प्रगति के चरणों को ग्रहण करती हुई मेवाड़ शैली सत्रहवीं शताब्दी के आरम्भ में एक परिमार्जित शैली बन गई। परन्तु सत्रहवीं शताब्दी के मध्य मुगलों के सम्पर्क से यह शैली मुगल शैली की ओर झुकने लगती है और इस शैली में बहुत कुछ मुगल विशेषताएँ पुल-मिल गई। 

मुगल शैली का यह प्रभाव मेवाड़ी कला पर विशेष रूप से जगत सिंह प्रथम (१६२६-१६५२ ई०) के राज्यकाल में आया। मेवाड़ शैली के चित्रकारों में निसारदीन, साहबीन और मनोहर का नाम प्रमुख है। मेवाड़ शैली के चित्रों का विषय-मेवाड़ शैली के चित्रों का विषय प्रधानता धार्मिक है। 

धार्मिक ग्रंथों के आधार पर बहुतायत से चित्र बनाये गए। भागवत पुराण- मध्यकालीन वैष्णव सम्प्रदाय की ज्ञान ज्योति और उज्ज्वलता ने कृष्ण को अधिक महत्त्वपूर्ण देवता बना दिया और ‘भागवत पुराण’ वैष्णवों का धर्म-ग्रंथ बन गया। 

भागवत पुराण के आधार पर अनेक कवियों और कलाकारों ने अपनी रचनाएँ रचीं सत्रहवीं शताब्दी की मेवाड़ी- शैली में भी भागवत पुराण के चित्रण को महत्त्वपूर्ण स्थान मिला और इस समय की भागवत पुराण की कई सचित्र प्रतियाँ प्राप्त हैं। 

उदयपुर संग्रहालय का भागवत पुराण शाहबादी नामक चित्रकार के द्वारा १६४८ ईसवी में चित्रित किया गया। इसी प्रकार के भागवत पुराण के उदाहरण महाराजा जोधपुर संग्रह और कोटा पुस्तकालय के संग्रह में हैं। राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली में भी भागवत पुराण के कुछ फुटकर पृष्ठ प्राप्त हैं।

रामायण

यद्यपि कृष्ण भक्ति सम्प्रदाय का ज़ोर होने के कारण कृष्ण की जीवन लीलाओं पर ही, कलाकारों की दृष्टि अधिक गई, परन्तु फिर भी ‘रामायण’ के आधार पर भी चित्र बनाये गए। १६४६ ईसवी की ‘रामायण’ की एक सचित्र प्रति प्रिंस ऑफ वेल्स म्युजियम, बम्बई में और दूसरी प्रति सरस्वती भंडार, उदयपुर में सुरक्षित है। 

उदयपुर वाली प्रति १६५१ ईसवी की है जो चित्तौड़ में लिखी गई थी और सम्भवतः यहाँ पर ही चित्रित की गई। प्रिंस ऑफ वेल्स म्युजियम में सुरक्षित ‘दशरथ का लौटते हुए जुलूस एक सुंदर चित्र उदाहरण है, जिसका समय १६४६ ई० है और उस चित्र को मनोहर ने बनाया।

दरबारी जीवन तथा राग-रागनियों का चित्रण इन चित्रकारों पर दरबारी संगीत और नृत्य का निश्चित रूप से गहरा प्रभाव पड़ा और दरबार में प्रेरणा पाकर ही चित्रकार ने दरबारी जीवन और राग-रागनियों का चित्रण किया। राष्ट्रीय संग्रहालय, नई दिल्ली की ‘रागमाला चित्रावली’ सबसे सुंदर है और मेवाड़ शैली की उत्कृष्ट कृति है ।

नायिका भेद

राजस्थानी चित्रकारों ने तत्कालीन कवियों की रचनाओं पर आधारित चित्र भी बनाये जिनमें ‘नायिका भेद’ को प्रमुखता दी गई और वैष्णव धर्म के प्रभाव के कारण इन चित्रों में नायक तथा नायिका साधारण पुरुष या स्त्री न होकर कृष्ण और राधा जैसे आदर्श प्रेमी हैं नायिका भेद के अन्तर्गत अष्ट अथवा दस-नायिका का अंकन किया गया जो इस प्रकार है- 

  • 1. प्रेषितपतिका 
  • 2. खंडिता
  • 3. कलहांतरिता 
  • 4. विप्रलब्धा 
  • 5. वासक-सज्जा 
  • 6. उत्का (उत्कण्ठिता)
  • 7. अभिसारिका 
  • 8. आगतपतिका
  • 9. स्वाधीनपतिका
  • 10. प्रवत्स्यत 

केशवदास की रचना ‘रसिकप्रिया’ ने समस्त राजस्थानी चित्रकला में अत्यधिक सम्मान प्राप्त किया। 

‘रसिकप्रिया’ मेवाड़ के चित्रकारों का प्रिय विषय बनी। मेवाड़ शैली की ‘रसिकप्रिया’ की सचित्र प्रति बीकानेर के दरबार संग्रह में सुरक्षित है, परन्तु श्री गोएट्ज़ ने इस प्रति को अम्बर (आमेर) का माना और इस प्रति का समय १७५० ईसवी माना है परन्तु यह समय और स्थान डा. मोती चन्द्र के अनुसार ठीक नहीं, उन्होंने इस प्रति का समय सत्रहवीं शताब्दी माना है और इसको मेवाड़ शैली का माना है।’ 

‘गीत गोविंद’ को भी इस समय लोकप्रियता प्राप्त हुई और ‘गीत गोविंद’ की अनेक सचित्र प्रतियी तैयार की गई ‘गीत गोविंद’ के आधार पर बने कुछ चित्र उदाहरण प्रिंस ऑफ वेल्स म्युजियम, बम्बई में सुरक्षित हैं। इन चित्रों पर अंकित लेख, गुजराती और मेवाड़ी मिश्रित भाषा में हैं। मेवाड़ी शैली की दूसरी ‘गीत गोविंद’ की प्रति कुमार संग्राम सिंह संग्रह (नाभागढ़) में है।

सूरसागर मेवाड़ के महाराणा बल्लभाचार्य सम्प्रदाय के अनुयायी थे। इस कारण सूरदास के भक्ति पदों का मेवाड़ में विशेष स्थान था। सूरदास का निवास ब्रज माना जाता है और कृष्ण के कारण ब्रज हिन्दुओं का सदैव से पवित्र तीर्थ स्थल रहा है। 

ब्रज राजस्थान की पूर्वी सीमा पर स्थित है, अतः मेवाड़ पर सूरदास का प्रभाव पड़ना आवश्यक था। दूसरी ओर सूरदास के श्याम (श्रीकृष्ण), जिनका जीवन सामान्य जन का जीवन है, के प्रति जन-जन की अनन्य श्रद्धा होना स्वाभाविक भी था। 

सूरदास के श्री कृष्ण, जो ग्वाल के रूप में दिखाई पड़ते हैं, जनसाधारण के अधिक समीप आ जाते हैं। चित्रकार ने सूरदास कृत सूरसागर के पदों में रमकर श्री कृष्ण को अपने समीप पाया है, और उसने ‘सूरसागर – पदावली’ के आधार पर श्रीकृष्ण जीवन सम्बन्धी अनेक – चित्रों का सृजन किया। 

सूर-कृत सूरसागर के आधार पर बने कुछ सचित्र पृष्ठ श्री गोपी कृष्ण कनेरिया संग्रह में सुरक्षित है जिनका समय अनुमानतः १६५० ई० के लगभग होना चाहिए।

मेवाड़ी शैली की कृतियों का समय-मेवाड़ स्कूल की कलाकृतियाँ जगतसिंह की मृत्यु (१६५२ ईसवी) से जयसिंह के मृत्युकाल (१६६८ ईसवी) तक बहुत कम प्राप्त हैं। कुछ वर्ष तक जगतसिंह के काल की कला परम्परा पर मेवाड़ की चित्रकला चलती रही। 

राजसिंह (१६५२ १६८० ई०) एक वीर योद्धा और सभ्य राजकुमार था परन्तु उसका कला प्रेम ठीक प्रकार से प्रमाणित नहीं है तथापि ‘रागमाला’ चित्रावली सम्भवतः इस राजकुमार के समय में ही चित्रित की गई ‘रागनी गुमाल’ का चित्र, जो १६६० ईसवी का है और नाभागढ़ संग्रहालय में है, इसी समय का है। 

इस चित्र में वाटिका का दृश्य चित्रित किया गया है, परन्तु आज ‘रागनी गुमाल’ प्रचलित नहीं है। जयसिंह (१६८०-१६९० ई०) के समय के कुछ भागवत पुराण के सचित्र पृष्ठ प्राप्त हैं, जिनमें कृष्ण गोवर्द्धन पर्वत उठाये हुए या ‘गिरिगोवर्द्धन’ नामक चित्र कलाभवन, काशी संग्रह और ‘कृष्ण दावानल को ग्रसते हुए मोती चन्द्र के निजी संग्रह में सुरक्षित हैं। 

ये दोनों चित्र अनुमानतः १६८० ईसवी से १७०० ईसवी के मध्य के हैं। श्री गोपी कृष्ण कनेरिया संग्रह के भागवत पुराण (जिसका समय १६८८ ईसवी है) के चित्रों की तथा जयसिंहकालीन उपरोक्त चित्रों की शैली मिलती-जुलती है। डॉ० मोतीचन्द्र के संग्रह में प्राप्त एक अन्य चित्र ‘धमुना तट पर ग्वालों के साथ लीला’ (१७०० ई०) मेवाड़ स्कूल के अंतिम समय के चित्रों की झांकी है।

सत्रहवीं शताब्दी के अन्त में मेवाड़ी चित्रकला की अपनी विशेषताएं समाप्त हो गई और इन विशेषताओं का स्थान चित्रों की संख्या ने ले लिया। इस शैली की कृतियाँ राजदरबार या सामंतों तक सीमित न रहीं बल्कि वणिको, धार्मिक नेताओं, पंडितों तथा साधारण जनता में भी प्रचलित हुई। 

इस शैली में शासकों तथा सामन्तों की छवियों या अन्तःपुर के दृश्य अधिक बनाये गए, इनके अतिरिक्त आखेट दृश्य तथा जुलूस इत्यादि के चित्रों का अत्यधिक प्रचलन हो गया। परवर्ती काल में पूर्व निर्मित चित्रों की प्रतिकृतियाँ तैयार की जाने लगीं और चित्रों में यूरोपियन प्रभाव भी आने लगा। 

चित्रकारों ने कुछ बड़े आकारों की चित्रमालाएं तैयार की, जिनमें ‘भगत रत्नावली’, ‘पृथ्वीराज रासो’, ‘दुर्गा महात्म’ तथा ‘पंचतंत्र’ पर आधारित चित्रमालाएँ बड़ी संख्या में बनायी गई है। इस समय ‘नायिका-भेद’, ‘वारहमासा’ और ‘रागमाला’ चित्र बहुत प्रचलित और लोकप्रिय हुए। 

अट्ठारहवीं शताब्दी के अन्त में और उन्नीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में इस स्कूल की विशेषताएँ समाप्त हो गई और यह कला केवल समसामयिक विलासी जीवन की झाँकी मात्र रह गई। इस कला संस्थान ने १६०० ई० से १७०० ई० के मध्य आश्चर्यजनक उन्नति की और उत्तम चित्र उदाहरण प्रस्तुत किये।

मेवाड़ शैली के चित्रों की विशेषताएँ

मेवाड़-शैली ने सत्रहवीं शताब्दी तक अपनी कुछ विशेषताएँ अर्जित कर ली थीं और इन विशेषताओं के कारण इस शैली का निजी महत्त्व है। मेवाड़ शैली में वर्ण-विधान (रंग), आकार तथा संयोजन की एक अपनी प्रणाली थी जो कालान्तर में पूर्ण रूप में विकसित होती रही।

चित्रों का रंग

मेवाड़-शैली के चित्रों में चटक रंगों, जैसे-सुरा जैसा लाल, केसरिया, पीला, नीला-लेपिसलाजुली तथा नील आदि रंगों का विशेष प्रयोग है। चित्रकार अपने रंग प्रायः रासायनिक विधि से भी बनाता था। इन रासायनिक रंगों में प्यौड़ी तथा सिन्दूर विशेष विधियों से बनाये जाते थे। 

नील तथा महावर के रंग वानस्पतिक हैं। अनेक रंग जैसे गेरुई, हिरोजी तथा रामरज आदि खनिज रंग हैं। चित्रों में लाल तथा पीले रंग का प्रयोग अत्यधिक किया गया है। आकृतियों के चेहरों में सुरा के समान लालिमा युक्त रंग का प्रयोग किया गया है।

संयोजन 

चित्रों की पृष्ठभूमि को सामान्यता एक ही रंग या विरोधी रंगों के टुकड़ों में संयोजित किया गया है और इनके ऊपर चित्रों की घटनाओं को उनके महत्त्व के अनुसार संयोजित किया गया है। चित्र के प्रमुख व्यक्ति या महत्त्वपूर्ण घटना को चित्र के मुख्य भाग में रखा गया है।

आकृतियाँ 

मानव आकृतियों की नाके लम्बी बनायी गई है और चेहरे गोल, अंडाकार बनाये गए हैं, चिबुक और गरदन के बीच का भाग अधिक भारी तथा पुष्ट बनाया गया है जिससे स्त्री आकारों में अधिक गंभीरता, भारीपन और उत्साह की भावना उत्पन्न हो गई है। 

स्त्रियाँ आकार में कुछ छोटी (नाटी) बनायी गई हैं और मानवाकृतियों के नेत्र दो वक्रों के द्वारा मीनाकार ढंग के बनाये गए हैं जिनमें पुतली के स्थान पर काली बिन्दी रख दी गई हैं। अजन्ता की कला परम्परा की उत्तराधिकारिणी होने के कारण हस्त मुद्राएँ तथा अंग-भंगिमाएँ स्वाभाविक हैं।

प्रकृति 

मेवाड़ शैली के चित्रों में प्रकृति का आलंकारिक रूप चित्रित किया गया है। वृक्षों को आलंकारिक योजना में बनाने के लिए एक-एक पत्ते को स्पष्टता सफेद रंग से युक्त हल्के हरे या अन्य किसी उपयुक्त रंग से गहरी पृष्ठिका पर बनाया गया है और वृक्षों को आलेखन से सजाया गया है। 

वृक्षों को अधिकांश झुण्डों में बनाया गया है, वृक्षों के पत्तों को बनाने में आलेखन और अलंकरण को ही महत्त्व प्रदान किया गया है, पत्तों के बीच-बीच पुष्पों के गुच्छे अंकित किये गए हैं। परन्तु मुगल प्रभाव के कारण किसी-किसी स्थान पर चट्टान में यथार्थता भी दिखाई पड़ती है। 

प्रायः वृक्षों को पुष्पित बनाया गया है और पुष्पित पौधे भी बनाये गए हैं। पर्वत तथा चट्टानों में मुगल प्रभाव दिखायी पड़ने लगता है। जल को लहरदार रेखाओं और टोकरी जैसी बुनाई के रेखांकन के ढंग से बनाया गया है।

परिप्रेक्ष्य तथा संयोजन 

मेवाड़ के चित्रों में साधारण कोटि के दृष्टि-क्रम परिप्रेक्ष्य का प्रयोग किया गया है, वैसे प्राकृतिक वातावरण आदि में परिप्रेक्ष्य का प्रभाव नहीं दिखाई पड़ता है। चित्र की मुख्य घटना की ओर दृष्टि केन्द्रित करने के लिये प्रमुख घटना को प्रायः चित्र के मध्य में और गोण घटनाओं को प्रायः इधर-उधर संयोजित किया गया है। 

भावों की अभिव्यक्ति के लिए अजन्ता के कलाकार के समान ही चित्रकार ने दृश्य, रंग विधान, नाटकीयता, हस्तमुद्राओं तथा अंग-भंगिमाओं का भावाभिज्जक प्रयोग किया है।

पशु-पक्षी

पशु-पक्षियों के चित्रण में पश्चिम भारतीय शैली या अपभ्रंश शैली की ही विशेषताएं हैं और अधिकांश चित्रों में पशु-पक्षी कपड़े के बने खिलौनों के समान आलंकारिक ढंग के हैं, परन्तु मुगल सम्बन्ध और प्रभाव से हाथी कुत्तों, 7 घोड़ों के चित्रण में पर्याप्त यथार्थता आने लगी थी। मेवाड़ के चित्रकार ने पशु-पक्षियों की आत्मा में अपनी जैसी ही आत्मा का अनुभव किया है इसी कारण पशु-पक्षियों में भावुकता दिखाई पड़ती है।

रात्रि दृश्य

रात्रि के दृश्यों को दिखाने के लिये चित्रकार ने गहरी पृष्ठभूमि का प्रयोग किया है। गहरी नीली या धुएं के रंग की आकाश वाली पृष्ठभूमि में सफेद विन्दियों को लगाकर चित्रकार ने तारों से पूर्ण रात्रि के दृश्य बनाये हैं। कभी-कभी रात्रि में तारों के साथ चन्द्रमा भी बनाया गया है।

गोलाई मेवाड़ शैली वास्तव में भित्तिचित्रण की परम्परा से विकसित हुई थी परन्तु फिर भी मुगल-कला के समसामयिक प्रभाव के कारण सपाट चित्रों में गोलाई या डौल लाने के लिये चित्रकार छाया का प्रयोग करने लगा। चित्रकार ने गरदन के पास कान के नीचे तथा बगलों में भुजा को शरीर से उठा हुआ दिखाने के लिये सुकोमल छाया का प्रयोग किया है।

वेषभूषा मेवाड़ी शैली में पुरुषों को घेरदार जामा पहने तथा कमर में पटका लगाये दिखाया गया है। यह पटका लम्बा है और रंगीन पट्टियों से सजा है। कभी-कभी इस पटके में ज्यामितिक अलंकरण का प्रयोग किया गया है। पगड़ियों की बनावट सुंदर है और जहाँगीरकालीन मुगल पगड़ियों से मिलती-जुलती है। 

आरम्भिक चित्रों में ढीली पगड़िय बनायी गई हैं। पुरुषों को प्रायः घेरदार जामा पहने चित्रित किया गया है। इन चित्रों में कलिदार जाने का प्रयोग कम दिखाई पड़ता है। 

स्त्रियों को फूलदार आलेखनों से युक्त कपड़े बालियाँ तथा लहंगा पहने चित्रित किया गया है। स्त्रियाँ ऊपर से पारदर्शी आँचल या ओढ़नी ओढ़े हैं स्त्रियों को प्रीवा, कमर, भुजाओं तथा कलाइयों में काले फुंदने तथा आभूषण पहने बनाया गया है। लहंगों पर भी प्रायः सुंदर बेल-बूटे आदि बनाये गए हैं।

भवन 

चित्रों की पृष्ठभूमि या मुख्यभाग में योजना को ठोस बनाने के लिये भवन का प्रयोग भी किया गया है। इन भवनों के अंदर अकबरकालीन मुगल शैली का प्रयोग है। भवनों के शिखर गुम्बददार हैं और उनके साथ छज्जे तथा चबूतरे भी बनाये गए हैं। इन भवनों के चित्रण में दार्क्टिक परिप्रेक्ष्य का सामान्य ढंग से प्रयोग किया गया है। प्रायः चे भवन सफेद रंग से बनाये गए हैं।

हाशिये 

चित्रों के हाशियों को प्रायः लाल या पीली सादा पट्टियों से बनाया गया है। राजस्थानी चित्रकार ने मुगल चित्रों के समान हाशिये में बेल-बूटे इत्यादि नहीं बनाये हैं।

कृष्ण का स्थान मेवाड़ शैली के चित्रों में कृष्ण के चित्रण को प्रमुखता दी गई है। प्रायः नायिक भेद, राग-रागिनी चित्रावली या रागमाला चित्रों में कृष्ण और राधा को ही आदर्श प्रेमी तथा प्रेमिका का रूप दिया गया है। 

कृष्ण तथा गोपियों की लीलाओं के चित्रों में भी कृष्ण को महान प्रेमी का रूप दिया गया है। सामाजिक जीवन-पद्यपि मेवाड़ शैली के चित्रों में जीवन की झाँकी नहीं है, परन्तु भागवत् पुराण तथा रामायण के चित्रों में समसामयिक रीति-रिवाज़, पहनावा तथा ग्रामीण जीवन का पूर्ण समावेश है। 

चित्रकार के द्वारा अंकित ग्राम्य जीवन, दरवार, जुलूस, विवाह उत्सव, संगीत-नृत्य, अन्तःपुर, युद्ध तथा आखेट सम्बन्धी दृश्यों के चित्रों से तत्कालीन राजस्थानी जीवन पर पर्याप्त मात्रा में प्रकाश पड़ता है।

आरम्भिक मेवाड़ कला ने कालान्तर में पर्याप्त विकास किया, यद्यपि उसमें मुगल-कला जैसा यथार्थ रेखांकन तथा बारीकी नहीं है और रंगों में भी मुगल चित्रों के समान सोफियानापन (सुफयानापन नहीं हैं, फिर भी इस शैली में आलंकारिकता, चटक वर्ण योजना तथा संयोजनक आकर्षक हैं।

बूंदी कोटा की चित्रकला (बूंदी-कोटा शैली)

बूंदी की स्थिति एवं इतिहास

बूंदी में पहले हाड़ा वंश के राजपूत राजाओं का राज्य था। इस राज्य की सीमा उत्तर में जयपुर तथा टोंक पश्चिम में मेवाड़, दक्षिण में मालवा तथा सुदूर दक्षिण में चम्बल नदी से मिलती थी। इस राज्य की चित्रकला के उदाहरण मुगल काल के उदय के साथ प्राप्त होते हैं।

बूंदी राज्य की स्थापना सम्वत् १३६८ में राव देवाजी ने अपने बल, वैभव से की थी। बूंदी का नाम एक मीना सरदार बुन्दा के नाम पर पड़ा। 

इस राज्य का महत्त्व राओ सुरजन सिंह (१५५४-१५८५ ई०) से आरम्भ होता है राओ सुरजन सिंह ने १५५७ ई० और १५८५ ईसवी के मध्य मेवाड़ की अधीनता त्याग दी और वह मुगलों के अधीन हो गया और १६६९ ई० में उसने मुगलों के सम्मुख रणथम्भोर के दुर्ग में शस्त्र डाल दिए राओ सुरजन सिंह का पौत्र रत्न सिंह (१६०७-१६३१) जहाँगीर के दरबार में सम्मानित हुआ। 

जहाँगीर ने उसको ‘सर बुलंदराय’ और ‘रामराज’ की उपाधियाँ प्रदान की और उसको दक्षिण को चढ़ाइयों में मुगल सेना के साथ भेजा। इसी समय में बूंदी का दक्षिण से सम्बन्ध स्थापित हुआ और बूंदी कला पर दक्षिणी कला का प्रभाव पड़ने लगा।

परम्परा के आधार पर ऐसा कहा जा सकता है कि शत्रुशाल (क्षत्रशाल) (१६३१-१६५६ ई०) ने अपने दरबारी चित्रकार नियुक्त किए। 

उसके गद्दी से उतरते ही शाहजहाँ ने यह जागीर उसके भाई माधवसिंह को सौंप दी और इसमें कोटा भी सम्मिलित कर दिया और इस प्रकार अट्ठारहवीं शताब्दी में कोटा भी बूंदी शैली का केन्द्र बन गया। 

शत्रुशाल के उत्तराधिकारी भावसिंह तथा अनुरुद्ध सिंह दक्षिण के आक्रमणों में मुगलों के उन छटे हुए योद्धाओं में से थे जो दक्षिणी राज्यों के विरुद्ध सहे परन्तु कोटा के भीमसिंह (१७०५-१७२० ई०) मे १७१९ ई० में पुनः बूंदी राज्य को बुद्धसिंह से छीन लिया और बुद्धसिंह को बूंदी का राज्य छोड़कर भागना पड़ा। 

बुद्धसिंह का उत्तराधिकारी उमेद सिंह १७४८ ई० में मराठा सहायता से ही पुनः बूंदी में स्थापित हो सका। परन्तु उन्नीसवीं शताब्दी में ब्रिटिश साम्राज्य का उदय हुआ और हाड़ा राजपूतों का बूंदी राज्य भी ब्रिटिश सत्ता के अधीन हो गया। 

अंग्रेज अधिकारियों ने विष्णुसिंह (१७७३-१८२१ ४०) को बूंदी का शासक बना दिया और उमेद सिंह (१७१७-१८१६ ई०) को कोटा का शासक बना दिया।

बूंदी शैली के चित्र

बूंदी शैली के चित्रों का विकास रागनी चित्रों से होता हुआ दिखाई पड़ता है क्योंकि इस शैली के आरम्भिक चित्र उदाहरण ‘रागमाला चित्रावली’ के भाग हैं। 

आरम्भिक शैली का एक उदाहरण ‘राग दीपक’ का चित्र है जो भारत कला भवन, काशी में सुरक्षित है। दूसरा उदाहरण ‘रागनी भैरवी’ का चित्र है जो नगरपालिका म्यूज़ियम इलाहाबाद में सुरक्षित है। इस चित्र में मेवाड़ की परम्परागत शैली और मुगल शैली का प्रभाव दिखाई पड़ता है। 

अनुमानतः यह उस समय का चित्र है जब बूंदी शैली अपना निजी रूप धारण कर रही थी। इन चित्रों का रंग सरल है परन्तु चटक रंगों के कारण चित्र प्रभावपूर्ण हैं। 

इन चित्रों में चेहरे की बनावट मेवाड़ शैली के चित्रों के समान भारीपन लिए है मानवाकृतियों में नाक की बनावट नुकीली है जो अपभ्रंश शैली के चित्रों के समान है आँखों को दो चक्रों से एक कमल पंखुड़ी के समान बनाया गया है, चिबुक कुछ छोटी है परन्तु दोहरी है जिससे इन चित्रों के समय का अनुमान लगाया जा सकता है। 

यह प्रवृत्ति सत्रहवीं शताब्दी के मेवाड़ी चित्रों में भी दिखाई पड़ती है, अतः इन चित्रों का समय सत्रहवीं शताब्दी का आरम्भिक भाग होना चाहिए। ‘रागनी भैरवी’ के चित्र में जो सम्भवतः १६२५ ईसवी (राओ रत्नसिंह काल) का है कुछ विकसित शैली दिखाई पड़ती है। 

अतः निश्चित रूप से इस शैली का जन्म लगभग पचास वर्ष पूर्व हो चुका होगा। परन्तु इस समय के उदाहरण प्राप्त न होने के कारण इस शैली को सत्रहवीं शताब्दी के प्रथम चतुर्थ चरण में विकसित हुई मानना पड़ता है।

बूंदी शैली में कुछ ऐसी परम्परागत विशेषताएँ हैं जो पर्याप्त समय तक अपना प्रभाव जमाये रहती हैं।” इन विशेषताओं के आधार पर ही इन चित्रों में घने दृश्य का चित्रण और उसका ध्यानपूर्वक अंकन किया गया है। 

आकाश में लाल रंग का प्रयोग जो रागनी भैरवी के चित्र में भी है, तथा जल से उठती हुई चंचल लहरों की स्थिति चित्रित करना मेवाड़-शैली की विशेषताएँ हैं। वृक्षों तथा पुष्पों को सरल और आलंकारिक रूप में गहरी पृष्ठिका पर सफेद मिश्रित रंग से बनाया गया है। 

‘रागदीपक’ वाले चित्र में पुरुषों का पहनावा सपाट पतली पगड़ी, चक्करदार चार नोक का जामा और कमर में संकरा पटका है, जो अकबर जहाँगीरकालीन है परन्तु कार्ल खण्डालावाला के अनुसार ये चित्र १६६० ई० से १६९० ई० के मध्य के हैं, क्योंकि इनमें जो मेवाड़ी विशेषताएँ हैं वे सत्रहवीं शताब्दी के मध्य मेवाड़ी कला में प्रचलित थीं विशेषतः बूंदी चित्रशैली की आकृतियों में मेवाड़ी प्रभाव अधिक दिखाई पड़ता है।

परन्तु बूंदी शैली के चित्रों में कारीगरी बहुत उत्तम है, चेहरों में कोमलता भी है। आकृतियाँ के चेहरों में गोलाई लाने के लिए सुकोमल छाया का प्रयोग किया गया है। चेहरे अनुपात में छोटे बनाये गए हैं और आँखों के पास आँखों के गड्ढों में गहराई दिखायी गई है। 

इस समय के कुछ सुंदर चित्रों के उदाहरण प्राप्त हैं जिनमें पीठिका पर नायक और नायिका”” (१६८२ ई० श्री जी० डी० गुजराती संग्रह, बम्बई), प्रेमी और प्रेमिका द्विज का चाँद देखते हुए’ (१६६८ ई०- प्रिंस आफ वेल्स म्युजियम, बम्बई) तथा परिचारिकाओं सहित रानी’ (सत्रहवीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध, प्रिंस ऑफ वेल्स म्युजियम, बम्बई) महत्त्वपूर्ण है।

अठ्ठारहवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में बूंदी शैली का पूर्ण विकास होता है और इस समय में अधिक चित्रों का निर्माण हुआ। इस शैली में अलंकरण की प्रवृत्ति अधिक है परन्तु कम कारीगरी से ही प्रभाव सुंदर बन पड़ा है। 

अट्ठारहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में बने चित्रों में कारीगरी का यह स्तर गिर जाता है और कारीगरी की कुशलता और दक्षता कम होती जाती है मानवाकृतियों के शरीर में भूरे, मिश्रित लाल रंग के स्थान पर हल्के गुलाबी रंग का प्रयोग किया जाने लगता है। 

बूंदी के चित्रों में सादा पृष्ठभूमि के ऊपर भारी छायादार टीले और इन्द्रधनुषी वर्ण का आकाश जिसमें घुमड़ते हुए लाल, काले, नीले तथा सुनहरी बादल के टुकड़ों को चित्रित किया गया है। 

अनेक चित्रों में एक चश्म चेहरे की छाया को गहरे रंग से बनाया गया है जिससे चेहरा सरलता से उभर जाए। आरम्भिक चित्रों में यह छाया सुकोमल है और बारीकी तथा कारीगरी के कारण दृष्टिगोचर नहीं होती, परन्तु बाद के चित्रों में यह छाया कठोर और भद्दी हो जाती है। 

पृष्ठभूमि साधारणतः पुष्पित लताओं से आच्छादित वृक्षों के झुन्डों से बनायी गई है। इस समय के उदाहरणों में ‘राओ सुरजनसिंह के हाथी–‘भालेराओ और आनिदा’ (१७२५ ई०), जो संभवतः पहले के किसी प्राचीन चित्र की अनुकृति है तथा ‘ग्रीष्म में हाथी’ (१४५० ई०), ‘काँटा निकालती स्त्री’ तथा ‘स्नानते’ (१०७५ ई०). अारहवीं शताब्दी की बूंदी करता के सुंदर चित्र-उदाहरण है, जो प्रिंस ऑफ वेल्स म्युजियम, बम्बई में सुरक्षित हैं। 

एक चित्र ‘राधा और कृष्ण का मिलन’ (अट्ठारहवीं शताब्दी) जो देसाई संग्रह, बम्बई में हैं, भावात्मक सौन्दर्य के कारण उत्तम है। यह चित्र अठ्ठारहवी शताब्दी के मध्य का है और इसमें बूंदी शैली की पूर्ण रोचकता आ गई है। इस शैली के अंतिम अच्छे चित्र उदाहरण १७५० ई० और १७८० ई० के मध्य के हैं। इस समय के चित्र स्वतंत्र और अच्छी शैली के हैं। ये चित्र अधिक चमकदार और सुंदर है।

अट्ठारहवीं शताब्दी के कुछ भद्दे चित्र भी प्राप्त हैं जो देखने में अपूर्ण हैं, शायद ये चित्र उन संरक्षकों या चित्र प्रेमियों के लिए बनाये गए जो अधिक कारीगरीपूर्ण चित्रों का मूल्य नहीं दे सकते थे। 

इन चित्रों में सपाट रंग और कभी-कभी गहरी सपाट पृष्ठभूमि का प्रयोग है और आकृतियों में गोलाई या कारीगरी की बारीकी लाने का प्रयास नहीं दिखाई पड़ता है। सम्भवतः यह सरल चित्र साधारण जनता की माँग को पूरा करने के लिए और अपनी आजीविका कमाने के लिए चित्रकारों द्वारा बनाये गए होंगे। 

गंदी शैली में राम-रागनियो, नायिका भेद, क्रीड़ा, उद्यान दृश्यों और कृष्ण लीला चित्रों की अधिकता थी, परन्तु पशु-चित्रण भी प्रभावशाली ढंग से किया गया है, जिसमें यथार्थता और मुगल प्रभाव है।

बूंदी शैली की विशेषताएँ

बूंदी शैली के चित्रों की कुछ ऐसी विशेषताएँ हैं जिनसे इस शैली का एक अपना भिन्न रूप उभर गया है और राजस्थानी कला शैलियों में इस शैली का अपना महत्त्व है।

आकृतियाँ

बूंदी शैली के चित्रों में मानवाकृतियों के शरीर का रंग सुरा के समान लाल चित्रित किया गया है परन्तु परवर्ती चित्रों में इस रंग का स्थान गुलाबी रंग ने ले लिया स्त्रियों के चेहरे मेवाड़ शैली के चेहरों से बहुत समानता रखते हैं प्रायः चेहरे भारी हैं और लम्बी नोकदार नाक बनायी गई है, परन्तु आँख के पास कोमल छाया लगाकर गहराई दिखायी गई है। 

चिबुक दोहरी बनायी गई है और स्त्रियों के सिर शरीर के अनुपात में कुछ छोटे बनाये गए हैं। स्त्रियों के मुख पर उत्साह का बोध होता है। परन्तु मेवाड़ शैली की तुलना में स्त्री आकार अधिक कोमल तथा सुंदर है। 

मानव आकृतियों में आँखों को कमल पंखुड़ियों के समान दो वक्रों से बनाया गया है। पुरुष आकृतियाँ हृष्ट-पुष्ट बनायी गई हैं तथा उनमें वीरता का भाव है।

प्रकृति

बूंदी शैली के चित्रों में प्रकृति को उद्दीपन के रूप में प्रस्तुत किया गया है। जल की चंचल लहरों को प्रायः गहरी पृष्ठभूमि पर सफेद रंग से लहरदार रेखाओं के द्वारा बनाया गया है, परन्तु बाद में चित्रों में यह प्रवृत्ति नहीं दिखाई पड़ती है और गहरी पृष्ठभूमि के स्थान पर चाँदी के रंग का प्रयोग होने लगता है, जिस पर महीन (बारीक) लहरदार रेखाओं से उठती लहरें बनायी गई हैं। 

वृक्षों के पत्तों को सफेद मिश्रित रंगों से गहरी हरी पृष्ठभूमि पर बनाया गया है, परन्तु बाद के चित्रों में गहरी रेखाओं से हल्की पृष्ठभूमि पर पत्तियाँ बनाने की प्रवृत्ति दृष्टिगोचर होती है, फिर भी साथ-साथ पहली पद्धति न्यूनाधिक रूप से चलती रहती है। वृक्षों को सुंदर, कोमल, लाल, पीले पुष्पों से पुष्पित तथा लतिकाओं से आच्छादित बनाया गया है। 

कर्कीय प्रदेश की जलवायु वाली प्रकृति को बूंदी शैली के चित्रों में एक सुंदर और संवेगात्मक रूप प्रदान किया गया है और प्रकृति को उद्दीपन का रूप दिया गया है।

बूंदी शैली के चित्रों में इन्द्रधनुषी आकाश का वर्ण विधान चित्र योजना की एक भव्य विशेषता है। चित्रकार ने आकाश में बादलों को लाल तथा सुनहरे रंगों से चित्रित करके आकाश में इन्द्रधनुषी रंगों की आभा बिखेर दी है। कभी-कभी आकाश में घनाच्छादित संध्याकालीन प्रभाव बनाया गया है, जिसमें काले, गहरे भूरे, नीले बादल लाल और सुनहरी पृष्ठभूमि पर बिखरे बनाये गए हैं।

पृष्ठभूमि में अधिकांश वनस्पति से आच्छादित टीले संयोजित किये गए हैं। इन टीलों में छाया का प्रयोग भी किया गया है। सम्भवतः ये टीले बूंदी की स्थानीय प्रकृति का प्रभाव हो सकते हैं।

छाया तथा प्रकाश

बूंदी शैली के चित्रों में सुकोमल छाया के प्रयोग के द्वारा गोलाई लाने का सफल प्रयास किया गया है। छाया दिखाने के लिए महीन तथा पास-पास कोमल काली तिरछी रेखाओं या खत परदाज़ का प्रयोग किया गया है। 

इस छाया का प्रयोग मानव आकृतियों में प्रायः आँख के पास तथा कान के नीचे जबड़े के पास गहराई तथा गोलाई दिखाने के लिए किया गया है। कभी-कभी एक चश्म चेहरे को उभार देने के लिए चित्रकार ने आकृति की परछाई को गहरे रंग से बनाकर बाद में परछाई के किनारों को बारीकी के साथ नीचे की जमीन (पृष्ठभूमि) से मिलाकर कोमल प्रभाव उत्पन्न कर दिया है। 

इस प्रकार चेहरा पृष्ठभूमि से ऊपर उभर गया है परन्तु परवर्ती चित्रों में कारीगरी की अकुशलता और जल्दबाजी के कारण यह छाया भद्दी और कर्कश बन गई है।

पहनावा तथा आभूषण

इस शैली के चित्रों में पुरुषों को चक्करदार जामा, कमर में लम्बा संकरा पटका और सिर पर अधपट्टी पगड़ी बांधे बनाया गया है। स्त्रियों को बक्षस्थली पर चोली, नीचे के भाग में लहंगा और सिर पर औचल या ओढ़नी पहने दिखाया गया है। स्त्रियों की ग्रीवा तथा हाथों और कानों में आभूषण बनाये गए हैं। कपड़ों पर सोने के रंग की बूटियाँ भी बनायी गई हैं।

पशु-चित्रण 

इस शैली के चित्रों में अलंकरण को प्रमुखता प्रदान की गई है परन्तु बाद के चित्रों में यह प्रवृत्ति कम होती गई है। पशुओं के चित्रण में विशेषतया हाथी का चित्रण बहुत यथार्थ, सशक्त और सजीव है। पशुओं के चित्रण में पर्याप्त यथार्थता एवं सुंदरता है।

भवन, साज-सामान तथा उद्यान

बूंदी शैली के चित्रों में समसामयिक भवन-पद्धति के भवन बनाये गए हैं, जिनमें अकबर तथा जहाँगीरकालीन मुगल भवन कला का प्रभाव है और गुम्बदों से युक्त भवन बनाये गए है। भवनों के साथ चबूतरे तथा बरामदे (बारहदरी) बनाये गए हैं। 

उद्यानों में भी पीठिकाओं तथा फब्बारों इत्यादि के दृश्य बनाये गए हैं, जो सम्भवतः दक्षिणी कला का प्रभाव है। इन उद्यान दृश्यों के चित्रों की मुख्यभूमि में पौधों की पुष्पित पंक्तियों बनायी गई है। भवन सम्बन्धी साज-सामान तथा पात्रों इत्यादि में सोने-चांदी के रंगों का प्रयोग किया गया है।

पृष्ठभूमि चित्रकार ने कभी-कभी गहरी सपाट पृष्ठभूमि का प्रयोग किया है, जिससे चित्र अधिक स्पष्ट और आकर्षक बन गया है परन्तु कुछ चित्रों में कारीगरी की न्यूनता के कारण भद्दापन भी आ गया है।

रंग

बूंदी शैली के चित्रों में सोने तथा चाँदी के रंगों का अधिक प्रयोग किया गया है। वैसे सामान्यतः बूंदी शैली के चित्रों में पीले तथा लाल रंग को प्रमुखता दी गई है। चित्रकार के प्रमुख रंग पीला (प्योड़ी), लाल (सिन्दूर तथा संगरफ), हरा (जंगाल), सफेद (सफेदा), काला (काजल), नीला (नील तथा लाजवर्दी), गेरू, हिरोंजी तथा रामरज हैं।

परिप्रेक्ष्य

भवन इत्यादि के रेखांकन में साधारण दाष्टिक परिप्रेष्य दिखाई पड़ता है। वैसे आलेखन को महत्व देने के कारण दाष्टिक परिप्रेक्ष्य का स्थान गौण रहा है।

दक्षिण शैली का प्रभाव

बूंदी शैली पर दक्षिण चित्रशैली का भी प्रभाव दिखाई पड़ता है। बूंदी शैली की स्त्री आकृतियाँ कुछ छोटी बनायी गई हैं जो दक्षिणी प्रभाव है। चित्रों में पुष्पित पौधे बनाये गए हैं और रात्रि के दृश्य बनाने की प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है। रात्रि- दृश्यों के आकाश के चित्रण में सफेद बिन्दुओं से तारे तथा द्वीज का क्षीण चन्द्रमा दिखाया गया है। चित्र की मुख्य घटना का संयोजन चित्र के बायीं ओर किया गया है, जो सामान्यता दक्षिणी चित्रशैली की विशेषताएँ हैं।

चित्रों का विषय

बूंदी के चित्रकारों ने विशेष रूप से नायिका-भेद और राग-रागनियों के चित्र बनाये हैं, परन्तु नायिका भेद चित्रकार का प्रिय विषय था। जनता ने भी नायिकाभेद में अधिक रुचि ली, इस कारण भी चित्रकार ने नायिका भेद , पर आधारित चित्रों को महत्त्व दिया। 

अन्तःपुर या रनिवास के भोग-विलासपूर्ण जीवन के दृश्य भी चित्रकार के प्रिय विषय रहे। ‘भागवतपुराण’ पर आधारित कृष्णलीला के चित्र बनाने की परम्परा सामान्य रूप से राजस्थान में चल ही रही थी, अतः बूंदी का चित्रकार भी इस ओर प्रवृत्त हुआ।

बूंदी के चित्रकारों की आजीविका विशेषरूप से साधारण जनता पर निर्भर थी, अतः चित्रकार ने जनसाधारण की रुचि के चित्र अधिक बनाए । चित्रकार ने कभी-कभी कम कारीगरी तथा कम परिश्रम से अच्छा प्रभाव उत्पन्न किया है। अधिकांश चित्रों में बूंदी का तत्कालीन सामाजिक जीवन किसी न किसी रूप में झलकता है। 

बूंदी शैली लोकप्रिय थी और साधारणतः चित्रकारों को वणिकों, ठिकानेदारों, जागीरदारों, जमींदारों, पुरोहितों तथा पुजारियों आदि का संरक्षण प्राप्त था।

किशनगढ़ की चित्रकला (किशनगढ़ शैली)

किशनगढ़ की स्थिति

किशनगढ़ का एक छोटा सा राज्य था। १६०६ ईसवी में जोधपुर (मारवाड़) के महाराणा उदयसिंह ने अपने आठवें पुत्र राजकुमार किशनसिंह को अपने राज्य के एक छोटे से भाग का शासक बना दिया। 

कालान्तर में इस छोटे राज्य या जागीर का विकास हुआ और किशनसिंह के नाम पर यह राज्य किशनगढ़ के नाम से प्रसिद्ध हो गया। किशनगढ़ के शासक आरम्भ से ही मुगलों से मिल गए इस कारण उनको मुगल दरवार में अधिक सम्मान प्राप्त हुआ और उनके रहन-सहन की पद्धति, कला एवं संस्कृति पर भी यथेष्ठ मुगल प्रभाव पड़ा किशनगढ़ के शासक राठौर वंशी थे।

किशनसिंह का जन्म १५७५ ईसवी में हुआ था और उसने १६०५ – १६१५ ईसवी तक राज्य किया परन्तु बाद में वह जहाँगीर के दरबार में चला गया और मुगल दरबार में १००० पैदल तथा ५०० घुड़सवारों का मनसबदार नियुक्त हुआ जहाँगीर ने स्वयं जाकी ‘जहाँगीरनामा’ में प्रशंसा की है।

किशनगढ़ राजस्थान के मध्यभाग में स्थित है और इसकी सीमाओं पर एक ओर जयपुर तथा जोधपुर राज्य थे और दूसरी ओर अजमेर तथा शाहपुरा की सीमाएँ थीं। किशनगढ़ मुंडलियों झील के किनारे स्थित है इस झील के किनारे-किनारे सामंतों तथा शासकों के अनेक महल तथा गढ़ियाँ बनी हैं जो मध्यकालीन युग की झाँकी प्रस्तुत करती हैं। झील में कलरव करते हुए पक्षियों की चहल-पहल तथा वानस्पतिक सौन्दर्य के कारण यहाँ एक मनोरम दृश्य उत्पन्न हो जाता है।

किशनगढ़ के राजाओं का कलाप्रेम-किशनगढ़ राज्य के संस्थापक राणा मुगल दरबार में रहे, और उन्होंने मुगल चित्रकारों और चित्रशालाओं को अवश्य देखा होगा, परन्तु किशनगढ़ में जो भी चित्र प्राप्त होते हैं वह किशनसिंह के राज्यकाल से लगभग एक शताब्दी बाद के हैं। 

किशनसिंह के चार पुत्र थे और उसकी मृत्यु के पश्चात् उसका ज्येष्ठ पुत्र साहसमल (१६१५-१६१८ ई०) गद्दी पर बैठा। साहसमल का एक सुंदर चित्र मिलता है जिसमें उसके शिकरे तथा शिकरेबाज अंकित किये गए हैं। सम्भवतः यह चित्र किसी प्राचीन समसामयिक चित्र पर आधारित है। 

साहसमल के पश्चात् उसके भाई जगमल (१६१८ – १६२६ ई०) तथा हरिसिंह (१६२६-१६४० ई०) गद्दी पर बैठे। हरिसिंह का भी एक व्यक्ति चित्र मिलता है। अनुमानतः यह चित्र समसामयिक है। हरिसिंह के पश्चात् उसका भतीजा रूपसिंह (१६४३ – १६५८ ई०) गद्दी पर बैठा। 

रूपसिंह ने रूपनगर बसाया और इस नवीन नगर को उसने अपनी राजधानी बना लिया। रूपसिंह के पश्चात् मानसिंह (१६५८-१७०६ ई०) तथा राजसिंह (१७०६-१७४८ ई०) गद्दी पर बैठे। 

राजसिंह के पश्चात् उसका पुत्र सावंतसिंह गद्दी पर बैठा सावंतसिंह का जन्म १६६६ ई० में हुआ था सावंतसिंह वल्लभाचार्य सम्प्रदाय का अनुयायी था। रूपसिंह के समय में ही यह राजवंश बल्लभ सम्प्रदाय का अनुयायी हो गया था। 

रूपसिंह के धर्मगुरु श्री गोपीनाथ थे, अतः वल्लभ-सम्प्रदाय के अनुसार कल्यानराय किशनगढ़ के राजाओं के आराध्य देव बन गए। शाहजहाँ ने रूपसिंह की बल्लभाचार्य के प्रति श्रद्धा देखकर उसको बल्लभाचार्य का एक चित्र भेंट में दिया था जो अकबर के समय (१५५६-१६०५ ई०) में बना कहा जाता है।

सावंतसिंह (नागरीदास) 

सावंतसिंह का जन्म १६९९ ई० में हुआ था। वह वैष्णव धर्म का अनुयायी था। सावंतसिंह के धर्मगुरु रणचोध जी थे जो गोपीनाथ जी के पौत्र थे। 

किशनगढ़ राज्य के राजा और युवराज ही नहीं बल्कि अन्तःपुर की रानियों तथा राजकुमारियाँ भी वल्लभाचार्य मत की अनुयायी थीं राजसिंह की पुत्री राजकुमारी सुंदरीबाई ने मीरा के समान ही श्री कल्यानराय वा कृष्ण भक्ति गीतों की रचना की। 

राजसिंह के पुत्र सावंतसिंह का विवाह १७३० ई० में भांगड़ा के यशवन्त सिंह की पुत्री से हुआ था। सावंतसिंह स्वयं संस्कृत, फारसी तथा मेवाड़ी भाषाओं का पंडित था। उसने संगीत तथा चित्रकला का भी विधिवत अभ्यास किया था और वह एक अच्छा चित्रकार, कवि और लेखक था। उसने अपनी साहित्यिक रचनाएँ अपने उपनाम ‘नागरीदास’ के नाम से प्रस्तुत की हैं। 

किशनगढ़ दरबार के संग्रह में एक रेखाचित्र है, जिस पर अंकित सेव से प्रतीत होता है कि यह चित्र सावंतसिंह के युवाकाल में, जब वह चित्रकला का अभ्यास करता था, उस समय बनाया था। इससे स्पष्ट है कि उसने विधिवत चित्रकार के समान चित्रों की रचना की और केवल मनोरंजन तक ही उसका चित्रकला प्रेम सीमित न रहा। 

सावंतसिंह एक वीर योद्धा भी था। उसकी वीरता की अनेक कहानियाँ हैं। कहा जाता है। कि उसने दस वर्ष की आयु में एक मस्त हाथी पर नियंत्रण किया। यह घटना अनुमानतः लगभग १७१६ ई० में घटी।

सावंतसिंह धार्मिक विचारों का व्यक्ति था और संतों के समान सरल जीवन व्यतीत करता था। उसमें युवराज जैसा ठाट-बाट न था। वह एक अच्छा कवि था और हिन्दी कवियों में उसका स्थान उल्लेखनीय है। उसने ‘बिहारीचन्द्रिका’ लिखी और वृन्द, हरचरनदास, हीरामल, मुंशी कनीराम आदि की रचनाओं पर टीकाएँ रचीं और उसने अपना उपनाम नागरीदास रखा। 

परन्तु जहाँ एक ओर सावंतसिंह के जीवन में कृष्ण प्रेम था वहाँ शीघ्र ही एक सुंदरी आ बसी जिसका नाम वणीठणी जी (बनीठनी) था। वह ‘बणीठणी’ के रूप पर मोहित हो गया और उसका प्रेमी बन गया।” शीघ्र ही ‘बणीठणी’ उसकी पासवां या अनुचरी बन गई।” 

वणीठणी तथा नागरीदास को एक चित्र में एक साथ चित्रित किया गया। ‘नागरीदास’ ने अपनी रचनाओं में अपनी प्रेमिका का वर्णन राधा के रूप में किया परन्तु १७४६ ईसवी तक उसने वणीठणी का नाम अपनी रचनाओं में नहीं दिया। वणीठणी पर्दा नहीं करती थी सावंतसिंह की विमाता उसको दिल्ली के अन्तःपुर से लाई थीं, वह दिल्ली के अन्तःपुर में एक सेविका (लोंडी) थी।

किशनगढ़ शैली का जन्म किशनगढ़ की चित्रशैली का संस्थापक नागरीदास था। उसने ही सर्वप्रथम विधिवत रूप से किशनगढ़ में अपनी चित्रशाला स्थापित की और स्वयं उसने किशनगढ़ की चित्रकला में स्त्री आकृतियों को सुमधुर, कोमलांगी तथा मौलिक रूप प्रदान किया। वह दिल्ली के शहजादे फर्रुखसियर के पक्ष में था और इस कारण दिल्ली के दरवार में भी रहा। 

यहाँ पर उसने मुगल चित्रकला का अध्ययन किया किशनगढ़ के चित्रों में स्त्री-आकृतियों का विकास बणीठणी के रूप में हुआ और दूसरी ओर ब्रजभाषा साहित्य में प्रचलित उपमाओं के आधार पर राधा के सौन्दर्य का अंकन किया गया। यह सारा परिवर्तन नागरीदास और उसके चित्रकार निहालचन्द की कुशल बुद्धि का कार्य था। 

इस प्रकार किशनगढ़ के चित्रकारों ने सावंतसिंह के राज्यकाल में परम्परागत लोककला के मीन-नेत्र एवं गोल भारी चेहरे न बनाकर कमल और खंजन आकार के नेत्र, चाप के समान पतली भृकुटी, पतले सुकोमल अधर और लम्बी पतली नाक को लम्बे पतले चेहरे में बनाकर नारी के वीर भाव के स्थान पर माधुर्य तथा कोमलता, पंचलता तथा नारीत्व के भाव की प्रधानता को दर्शाया। 

स्त्रियाँ लतिका के समान लचकवार, छरहरे शरीर वाली और लम्बी बनायी गई है। इस प्रकार किशनगढ़ की स्त्री आकृतियाँ, राजस्थान की अन्य कला शैलियों से सर्वथा भिन्न है। किशनगढ़ शैली अट्ठारहवीं शताब्दी के अंतिम चतुर्थ भाग में आश्चर्यजनक रूप से उन्नति को प्राप्त हुई। 

यह निश्चित है कि इस शैली को सुंदरी बणीठणी के जीवित रूप से अत्यधिक प्रेरणा प्राप्त हुई और नवीन रूप विधान और कोमलांगी स्त्री आकृति की साकार कल्पना मिली। नागरीदास मुगल शहजादे फर्रुखसियर (१७१३-१६ ई०) का अतिथि बना। 

अतः उसने फर्रुखसियरकालीन मुगल चित्रकला में विकसित परिवर्तनों को भी देखा था। उसने मुगल कला की विशेषताओं को देखकर अपने राज्य किशनगढ़ में भी कला का विकास किया। उसके समय में बने किशनगढ़ शैली के चित्र उत्तम हैं।

१७४७ ईसवी में राजा राजसिंह की किशनगढ़ में मृत्यु हो गई और नागरीदास के छोटे भाई बहादुर सिंह ने गद्दी के लिए युद्ध आरम्भ कर दिया। अतः सहायता प्राप्त करने के लिए नागरीदास को दिल्ली के दरबार में जाना पड़ा। यहाँ पर मुगल बादशाह अहमदशाह ने उसका स्वागत किया और सहायता प्रदान की। 

परन्तु नागरीदास की पराजय हुई और वह ब्रजधाम की तीर्थ यात्रा के लिए चला गया। ब्रज से नागरीदास और उसके पुत्र कुमायूँ युद्ध (१७५१ ई०) में मराठों की सहायता करते रहे। मराठों की सहायता और मैत्री से नागरीदास के पुत्र सरदारसिंह ने १७५६ ई० में किशनगढ़ राज्य का आधा भाग प्राप्त कर लिया और इस प्रकार आधे राज्य का शासक बहादुर सिंह और आधे राज्य का शासक सरदारसिंह बन गया। 

नागरीदास ने संन्यास ग्रहण कर लिया और ‘बणीठणी’ के साथ नागरीदास व्रज तथा मथुरा तीर्थाटन हेतु चला गया। नागरीदास की १७५४ ई० में तीर्थाटन करते हुए मृत्यु हो गई। नागरीदास ने पुष्टिमार्ग का संस्थापन किया और इस मार्ग के संवेगात्मक दार्शनिक पक्ष का किशनगढ़ पर गहरा प्रभाव पड़ा। 

बहादुर सिंह के पश्चात् विरादसिंह, प्रताप सिंह, कल्यानसिंह, मोकामसिंह तथा अंतिम शासक पृथ्वीसिंह (१८४०-१८८० ई० तक) किशनगढ़ में राज्य करते रहे। इन सब शासकों के चित्र किशनगढ़ दरबार संग्रह में सुरक्षित हैं।

किशनगढ़ की चित्रकला

किशनगढ़ शैली मारवाड़ शैली का उन्नत और परिष्कृत रूप है। किशनगढ़ दरबार के पुराने लेखों से ज्ञात होता है कि किशनगढ़ राज्य में सत्रहवीं शताब्दी के अन्त तक एक अच्छी चित्रशाला स्थापित हो चुकी थी। इस चित्रशाला में सुयोग्य चित्रकार कार्य कर रहे थे और राजा मानसिंह के शासनकाल में सम्भवतः दरबारी चित्रकार कार्य कर रहे थे, क्योंकि एक चित्र में युवराज मानसिंह को एक घोड़े पर सवार बछे से (भाले से) एक काले हिरन का शिकार करते दिखाया गया है। 

यह चित्र राजा मानसिंह के शासनकाल का होना चाहिए, परन्तु इस चित्र में ऑकित लेख के अनुसार यह चित्र १६६४ ईसवी का है। इस चित्र की शैली मुगल-औरंगजेबकालीन शैली से साम्य रखती है। इस चित्र में युवराज की आकृति सुंदर है, परन्तु सावंतसिंहकालीन चित्रों की तुलना में यह चित्र हेय है राजा मानसिंह ने कुशल चित्रकारों की एक दरबारी चित्रशाला का वर्णन दिया है। 

यह चित्रकार सत्रहवीं शताब्दी और उससे पहले कार्य कर रहे थे। ‘दरबार संग्रह’ में राजा साहसमल (१६१५-१६१८ ई०) के चित्रों से यह स्पष्ट हो जाता है कि यह शैली अट्ठारहवीं शताब्दी के आरम्भ में सुचारु रूप से चल रही थी। इस समय की किशनगढ़ शैली पर फर्रुखसियरकालीन दिल्ली कलम का प्रभाव है। 

यह चित्र राजा मानसिंह (१७०६-१७४६ ई०) के मध्य के हैं और सम्भवतः मुसव्विर (चित्रकार) भवानीदास के बनाये हुए हैं। दरबार के लेखों से ऐसा ज्ञात होता है कि राजा ने १७२२ ई० में अपने दरबारियों के मुखाकृति चित्र बनवाये। दरबार संग्रह के एक लघुचित्र में राजसिंह को जंगली भैंसे का आखेट करते हुए दिखाया गया है। 

इस चित्र की शैली अट्ठारहवीं शताब्दी की राजस्थानी या मेवाड़ी शैली से मिलती-जुलती है। इस समय तक मुखाकृति-चित्र या आखेट-चित्र ही मिलते हैं, परन्तु शीघ्र ही सावन्त सिंह के समय से ही नवीन शक्तिशाली कला शैली का किशनगढ़ में विकास हुआ।

सावंतसिंह के समय के चित्रों में दरबार, शबीह, आखेट आदि प्रतिदिन के विषयों पर आधारित चित्र भी दिखाई पड़ने लगते हैं, परन्तु कृष्ण के चित्रों की अधिकता है। इस समय ‘बिहारीचन्द्रिका’ के आधार पर अनेक चित्र बनाये गए नागरीदास के पिता के दरबार में सूर्यध्वज निहालचन्द नामक एक कायस्थ चित्रकार कार्य कर रहा था। 

नागरीदास ने इस चित्रकार को अपनी चित्रशाला में नियुक्त कर लिया और उसने इस चित्रकार की सुकोमल, भावपूर्ण तुलिका से राधा और कृष्ण के मार्मिक प्रेम की तीक्ष्ण अभिव्यक्ति कराई। 

निहालचंद की तुलिका ने आकार और रंगों के माध्यम से एक नवीन चित्रविधान और स्त्री सौन्दर्य की कल्पना प्रस्तुत की जिसकी प्रेरणा का स्रोत वणीठणी का सजीव रूप था।

किशनगढ़ के चित्रकार

निहालचंद निहालचंद चित्रकार का दादा सूर्यध्वज मूलराज कायस्थ दिल्ली के दरबार से किशनगढ़ आया और राजा मानसिंह (१६५८-१७०६ ई०) के दरबार में दीवान (सचिव) के रूप में किशनगढ़ दरबार में सम्मानित हुआ, ऐसी अवस्था में यह नहीं कहा जा सकता कि निहालचंद ने सह-सचिव पद ग्रहण न करके चित्रकारी का व्यवसाय क्यों अपनाया ?

निहालचंद किशनगढ़ का विख्यात चित्रकार था उसके चित्र इतने सुंदर हैं कि बाद के कुछ भद्दे चित्र जो दरबार संग्रह में हैं, उसके नाम से जोड़ दिये गए हैं। नागरीदास के पश्चात्स रदारसिंह ने भी निहालचंद को अपने दरबार में सम्मान दिया।

निहालचंद को सरदारसिंह के सभासदों के साथ एक चाँदनी रात की संगीत गोष्ठी के चित्र या ‘चाँदनी रात के गवैये’ नामक चित्र में चित्रित किया गया है। इस चित्र में निहालचंद की आयु लगभग ५० वर्ष है इस चित्र में निहालचंद को राजा सरदारसिंह के सम्मुख प्रथम स्थान दिया गया है। 

इस चित्र में प्रत्येक व्यक्ति की आकृति का नाम भी अंकित है। यह चित्र अमरचंद नामक चित्रकार का बनाया हुआ है और इस चित्र का रचनाकाल १७६० ई० से १७६६ ईसवी के मध्य है। इस प्रकार निहालचंद का जन्म अनुमानतः १७०८ ई० के लगभग हुआ होगा । 

निहालचंद ने सर्वोत्तम चित्राकृतियाँ नागरीदास के सम्पर्क में आने पर १७३५-१७५७ ई० के मध्य या तनिक बाद में बनायी होंगी। सम्भवतः निहालचंद और नागरीदास में घनिष्ठ मैत्री सम्बन्ध था और नागरीदास ने ही निहालचंद को नील वर्ण के देवता कृष्ण और गौर वर्ण की राधा के चित्रण का संकेत दिया होगा जो प्रत्येक वैष्णव के लिए मोक्ष का साधन था। 

परन्तु एक विचित्र बात यह है कि दोनों ही कृष्ण के – प्रचलित चित्र विषयों से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने ‘वणीठणी’ के रूप से राधा के आदर्श रूप की कल्पना की। इस प्रकार एक नवीन नारी रूप का अंकन प्रारम्भ हुआ, जो उन्नीसवीं शताब्दी की कला में परम्परागत रूप से चलता रहा। 

चित्रकार ने इस परिवर्तन के साथ नवीन रंग योजना, संयोजन और नाटकीयता का समावेश करके चित्र को अधिक प्रभावशाली बनाया। ब्रजभाषा काव्य (साहित्य) का इस शैली पर गहरा प्रभाव पड़ा।

चित्रकार निहालचंद के कुछ चित्रों पर फारसी भाषा के लेख में अमल निहालचंद लिखा है जिसका अर्थ है निहालचंद की कृति शायद यह लेख पुस्तकालय के अध्यक्ष ने लिखा है, परन्तु निश्चित रूप से यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि कुछ चित्रों के हाशियों पर फारसी सुलिपि में निहालचंद लिखा है तो कुछ चित्रों पर हिन्दी में ‘सूर्यध्वज निहालचंद’ लिखा है।

सूर्यध्वज निहालचंद द्वारा चित्रित १७३७ ईसवी का ‘भागवतपुराण’ प्राप्त है, परन्तु इसके चित्रों की शैली में अवनति के चिन्ह दृष्टिगोचर होने लगते हैं। कहा जाता है कि सूर्यध्वज मूलराज के वंश में कई सदस्यों ने चित्रकारी का व्यवसाय आरम्भ कर दिया। 

निहालचंद ने चित्रकला का विधिवत रूप से मुगल दरबार में अभ्यास किया था और उसके प्रारम्भिक चित्रों की शैली भी मुगल थी। निहालचंद के पिता का नाम भीखचंद था। भीखचंद के पिता का नाम दरगामहल था, वे दोनों भी चित्रकार थे। ऐसा कहा जाता है कि इसी वंश में डूंगरमल का पुत्र भी चित्रकार था । 

निहालचंद के दो अन्य वंशजों ने भी आगे चलकर चित्रकला का व्यवसाय अपनाया। इन वंशजों का नाम ‘सीताराम’ और ‘वदनसिंह’ था।

सीताराम सीताराम एक अच्छा चित्रकार था और उसकी कुछ कृतियाँ दरबार संग्रह में सुरक्षित हैं। ऐसा कहा जाता है कि निहालचंद वंश की सन्तति अभी भी किशनगढ़ में निवास कर रही है। 

किशनगढ़ में निहालचंद के अतिरिक्त और भी कई परिवार थे जो चित्रकारी का व्यवसाय करते थे। दरवार संग्रह में नामांकित चित्रों से बहुत से कलाकारों के नाम प्राप्त हैं जो भिन्न-भिन्न राजाओं के समय के हैं।

अमरचंद 

इन चित्रकारों में अधिक विख्यात चित्रकार अमरचंद था, जो निहालचंद का समसामयिक था। उसका बनाया एक चित्र ‘चाँदनी रात के गवैये’ जिसका पहले उल्लेख किया जा चुका है, दरबार संग्रह में प्राप्त था। इस चित्र का रचनाकाल अनुमानतः १७६० ई० से १७६६ के मध्य है। अमरचंद की शैली मुगल है। अमरचंद का पुत्र मेघराज भी प्रसिद्ध चित्रकार था।

भवानीदास 

भवानीदास नामक चित्रकार राजा राजसिंह (१७०६-१७४८ ई०) के समय में था और कहा जाता है कि उसने दरबारियों के अनेक व्यक्ति चित्र बनाये।

इसी समय में एक अन्य चित्रकार कल्यानदास का नाम भी प्राप्त होता है। अमरू तथा सूरजमल नामक चित्रकारों ने सावंतसिंह की चित्रशाला में कार्य किया। नानगराम (१७७१ ईसवी) चित्रकार ने बहादुर सिंह के समय में चित्र बनाये बाद में सूरजमल, रामनाथ, जोशी सवाईराम तथा लाड़लीदास आदि चित्रकारों के नाम प्राप्त होते हैं। 

लाड़लीदास ने कल्यानसिंह (१७८८ – १८३८ ई०) के राज्यकाल में चित्र बनाये। अमरचंद के विषय में यह कहा जाता है कि उसने दिल्ली दरबार में चित्रकला की शिक्षा ग्रहण की थी अतः उसकी शैली मुगल थी। किशनगढ़ की चित्रकला पर निहालचंद की शैली की गहरी छाप है परन्तु अमरचंद की कृतियाँ मुगल शैली की हैं।

किशनगढ़ में १८२० ई० के बाद तक सुंदर चित्र बनते रहे जिनमें ‘गीत गोविंद’ पर आधारित कृतियाँ विशेष हैं परन्तु ‘गीत-गोविंद के चित्रों में स्त्री आकृतियाँ कुछ मित्र शैली में बनायी गई हैं, फिर भी सुंदर और आकर्षक हैं, यद्यपि चित्रों में कोमलता कम है राजा पृथ्वीसिंह (१८४०-१८०० ई०) के समय में उत्तम चित्रकार कार्य कर रहे थे जो निहालचंद के स्त्री आकारों को परम्परागत रूप से चलाते रहे, परन्तु उन्नीसवीं शताब्दी में इनकी कृतियों में कोमलता के स्थान पर कठोरता आ गई और खुलाई में काली स्याही का प्रयोग होने लगता है। 

बहादुर सिंह ने १७५६ ई० के लगभग कुशल चित्रकार नियुक्त किए और उसने अपनी राजधानी में भी चित्रकला को प्रोत्साहन दिया। इस समय विशेष रूप से ‘कल्यानराय’ के चित्र बनाये गए। इस समय का एक चित्र ‘कल्यानराय की पूजा’ दरबार संग्रह, किशनगढ़ में प्राप्त है।

किशनगढ़ शैली के चित्रों का विषय

किशनगढ़ शैली का विशेष विकास राजा नागरीदास के काल में और उसके पश्चात् हुआ यद्यपि इस शैली का विकास विशेष रूप से राजदरबार में हुआ फिर भी इस शैली के चित्रों में विषयों की विविधता और तत्कालीन लोकभावनाएँ हैं। 

इस शैली के आरम्भिक चित्रों के विषय आखेट और दरबार के दृश्य हैं जिनमें राजाओं और युवराजों का जीवन है। इस समय में व्यक्ति चित्रों (छविचित्रों) को प्रमुखता मिली। ‘युवराज राजसिंह घोड़े पर सवार काले मृग का शिकार करते हुए’ (दरबार संग्रह) किशनगढ़ शैली का आरम्भिक चित्र है। 

राजा साहसमल का चित्र भी इसी प्रकार का है, उसको अपने शिकरा-बाजों के साथ खड़ा बनाया गया है। किशनगढ़ का चित्रकार आरम्भ में आखेट दृश्य, दरबार और व्यक्ति चित्रों तक सीमित रहा। नागरीदास के पश्चात् राधा और कृष्ण ही चित्रकार के प्रिय चित्रण विषय होने लगे। 

किशनगढ़ में ‘गीतगोविंद’, ‘भागवत पुराण’ तथा ‘बिहारीचन्द्रिका’ पर आधारित अत्यधिक चित्रों की रचना की गई है। कृष्ण के अतिरिक्त शिव के चित्र भी बनाये गए और चित्रकार ने अन्तःपुर, रंगमहल, स्नानागार तथा रानियों की केलि-क्रीड़ा आदि विषय के अनेक चित्र बनाये। 

नायिका भेद पर आधारित चित्रों को अधिक लोकप्रियता प्राप्त हुई। नागरीदास के समय में राधा के रूप में बनीठणी को चित्रित किया गया अन्तःपुर क्रीड़ा के दृश्य अनेक चित्र उदाहरणों में प्राप्त होते हैं और ‘चाँदनी रात में तालाब’ तथा ‘कुन्ड की पीठिका इस प्रकार के सुंदर चित्र उदाहरण हैं। 

इन चित्रों में रनिवासों की झोंकी स्पष्ट है संगीत तथा नृत्य के चित्र भी चित्रकार के प्रिय विषय थे। इस प्रकार के उदाहरण में ‘चाँदनी रात की संगीत गोष्ठी’ दरबार संग्रह का एक सुंदर चित्र है। इस चित्र में चाँदनी रात में राजा सरदारसिंह अपने मुसाहिबों के साथ महल के प्रांगण में बैठा है, पीछे पृष्ठभूमि में चाँदनी से स्निग्ध श्वेत महल के छज्जों पर ख्वाजा लोग बैठे हैं और नीचे चबूतरे पर गोष्ठी हो रही है। 

गायक राजा के सामने बैठे हैं तथा अन्य सभासदों ने यथास्थान आसन ग्रहण किया है। चबूतरे के दोनों ओर हरियाली है जिसमें केला सुंदरता से बनाया गया है और चित्र में अंकित आकृतियों का नाम भी लिखा है।

प्रेमी और प्रेमिकाओं के चित्र किशनगढ़ में अपने ही ढंग से बनाये गए हैं। प्रायः नायिका भेद पर आधारित चित्रों में नायक तथा नायिकाओं को सुंदर नौकाओं पर जलविहार करते दिखाया गया है। इस प्रकार के चित्र उदाहरणों में ‘लालबजरा’ तथा ‘प्रेम की क्रीड़ा’ चित्र सुंदर हैं। 

इस प्रकार के नौकाविहार सम्बन्धी चित्र राजस्थान में अन्यत्र प्राप्त नहीं होते हैं। चित्रकार ने प्रेमी और प्रेमिकाओं की प्रेम क्रीड़ाओं में विशेष रुचि ली है और उनके मिलन स्थलों के लिए कुंजों तथा लतिकाओं के झुरमुटों या सघन वृक्षों से आच्छादित पीठिकाओं और भवनों का चयन किया है। 

रात्रि दृश्य भी अपनी-अपनी विशेषता लिये बनाये गए हैं। इस प्रकार के रात्रि दृश्यों में ‘दीपावली और दीप’ अत्यन्त सुंदर उदाहरण हैं। चित्र में आलेखन की अपनी विशेषता है तथा रंग की योजना और विषय की अभिव्यक्ति में भी नवीनता है। यह चित्र ‘किशनगढ़ पेटिंग’ ललित कला प्रकाशन में लेखक श्री एरिक डिक्सन ने प्रकाशित किए हैं)

विशेष रूप से किशनगढ़ के चित्रकार ने कृष्णलीला के चित्र बनाये हैं। ये चित्र ब्रजभाषा के हिन्दी साहित्य पर आधारित हैं परन्तु इनमें राधा और कृष्ण का अनोखा नवीन रूप है। इस प्रकार के चित्रों में ‘साँझीलीला’, ‘कृष्ण राधा का दुपट्टा पकड़ते’ तथा ‘कृष्ण गोपियों के साथ नृत्य करते हुए आदि सुंदर चित्र उदाहरण है भागवत के आधार पर भी अनेक सुंदर चित्र जैसे ‘रुकमिणीमंगल’ आदि बनाये गए।

कृष्ण और राधा को तत्कालीन प्रेमी और प्रेमिकाओं का रूप देने की चेष्टा की गई है। इसका कारण यह भी हो सकता है कि नागरीदास ने बणीठणी के प्रति, कृष्ण और राधा के रूप में, अपने प्रेम की अभिव्यक्ति की, इसी कारण नवीन कलेवर और नवीन प्रेम-क्रीड़ाओं की कल्पना चित्र का आधार बनी किशनगढ़ शैली के चित्रों में नवीनता है और ब्रजभाषा लोक साहित्य की कल्पना है। इन चित्रों में सजीवता तथा सुंदरता है जिससे भावाभिव्यक्ति और प्रबल हो गई है।

किशनगढ़ शैली की विशेषताएँ

वर्णविधान

किशनगढ़ शैली के चित्रों में चटक रंग और आकारों की मौलिक उद्भावना है। चित्रों में अधिकांश अमिश्रित रंगों का प्रयोग है। प्रायः पीले और लाल रंग का प्रयोग अधिक किया गया है, परन्तु नीले रंग का प्रयोग अत्यधिक शान्तिपूर्ण और सुखद है। 

आवश्यकता के अनुसार रंगों में सफेद रंग के मिश्रण के द्वारा विभिन्न प्रकार के कोमल रंग बनाये गए हैं। इन रंगों में से हल्के गुलाबी रंग का प्रयोग शरीर में किया गया है। पीला (प्योड़ी), लाल (सिंदूर तथा संगरफ), हरा (जंगाल), नीला (नील), काला (काजल), सफेद (कामगार) तथा सोने के रंगों का प्रयोग किया गया है।

मानव आकृतियाँ इस शैली की मानव आकृतियाँ भी राजस्थान के अन्य कला केन्द्रों से भिन्न हैं। विशेष रूप से स्त्री आकृतियाँ बहुत कोमलांगी और लतिका के समान लचकदार, पतली, लम्बी और छरहरे शरीर वाली बनायी गई हैं। किशनगढ़ शैली के चित्रों में पशु-पक्षी मेवाड़ शैली के समान ही बनाये गए हैं।

पहनावा तथा रूप 

किशनगढ़ शैली के अधिकांश चित्रों में स्त्रियों का पहनावा, लहंगा, चोली तथा पारदर्शी आँचल है । गले, माथे, हाथों तथा कमर में आभूषण बनाये गए हैं, परन्तु सबसे अधिक महत्त्व का आभूषण बेसरि तथा (नाक का आभूषण) है जो अनोखे ढंग का है। कभी-कभी स्त्रियों को साड़ी पहने भी बनाया गया है। 

उदाहरणार्थ ‘कवि युवराज और बणीठणी’ नामक चित्र में ‘बणीठणी’ को साड़ी पहने अंकित किया गया है। पुरुषों का पहनावा लम्बा जामा तथा पायजामा समसामयिक पहनावे पर आधारित है। पुरुषों के पहनावे में कभी-कभी धोती का भी प्रयोग है और जामे के साथ कमर में पटका और सिर पर पगड़ी भी बनायी गई है। 

कृष्ण को पीताम्बर पहने चित्रांकित किया गया है। स्त्रियों के वस्त्रों में विविध सुंदर रंगों का प्रयोग है। परदों, फर्श के कालीनों तथा कपड़ों में सुंदर आलेखन बनाये गए हैं। कपड़ों तथा शरीर में गोलाई लाने के लिए छाया का प्रयोग किया गया है। 

चित्र की खुलाई शरीर से मिलने वाले भूरापन लिये किसी लाल रंग से की गई है। लम्बे बाल तथा कर्ण स्पर्शी नेत्र (काजलयुक्त) काले रंग से बनाये गए हैं। कपड़ों में शिकनों तथा वायु के स्पन्दन की भावना है। 

रेखा

किशनगढ़ शैली के चित्रों की रेखाएँ कोमल, बारीक (महीन) और भावपूर्ण हैं। रेखाओं में प्रवाह तथा गति है। भौंह तथा बालों को बारीक-बारीक रेखाओं के द्वारा बनाया गया है। बाद के चित्रों में काली रेखाओं का प्रयोग किया गया है। 

रात्रि प्रभाव 

रात्रि के दृश्यों में चित्रकार ने गहरी पृष्ठभूमि का प्रयोग किया है और दीपकों का झिलमिल प्रकाश पीले रंग के द्वारा बहुत सुंदरता से बनाया है। साधारणतया ऐसे दृश्यों में काले मिश्रित नीले रंग से आकाश बनाया गया है।

नौका विहार

किशनगढ़ शैली के चित्रों में नौका विहार तथा कुंजों से आच्छादित भवन बहुत सुंदरता से बनाये गए हैं। सम्भवतः नौकाओं का प्रयोग किशनगढ़ नगर के झील के तट पर आवासित होने के कारण किया गया है। 

प्रकृति

चित्रकार ने प्रकृति को भावुकता से देखा है और आलंकारिक योजना को अपनाया है। वृक्षों के पत्तों को सुंदरता से बनाया गया है। प्रायः आम, जामुन, केला आदि वृक्षों का प्रयोग किया गया है और पानी के रंग में चाँदी का प्रयोग किया गया है।

नारी सौन्दर्य 

किशनगढ़ शैली की सबसे प्रमुख विशेषता है ‘नारी सौन्दर्य’ स्त्रियों के चेहरे पतले और कोमल बनाये गए है और मेवाड़ शैली जैसा भारीपन नहीं है। चिबुक के नीचे गरदन तक निकला हुआ बोझिल भाग न बनाकर सिकुड़ा हुआ और भीतर धँसा हुआ भाग बनाया गया है जिससे रूप और सुंदरता की वृद्धि हुई है। 

नेत्र कमल या खंजन आकार के बनाये गए हैं और नेत्रों की काली रेखाएं कान की ओर बढ़ती बनायी गई हैं। अधर विम्बाफल के समान लाल हैं। और अधरों के किनारे ऊपर की ओर चढ़े हुए बनाये गए हैं, जो इस शैली की अपनी विशेषता है। निष्कर्षतः किशनगढ़ शैली की नारी में स्थानीय नारी सौन्दर्य की छवि है।

पुष्टि मार्ग इस शैली के चित्रों में पुष्टि मार्ग का अनुसरण किया गया है। चित्रकार ने भगवान के सौन्दर्य की भक्ति में विस्मृत होकर अपनी आत्मा और परमात्मा का प्रतीक क्रमशः राधा और कृष्ण को माना है। इस शैली के चित्र जीते-जागते हैं और उनमें आत्मा की सच्ची अभिव्यक्ति है।

जयपुर की चित्रकला (जयपुर शैली)

जयपुर का ऐतिहासिक महत्त्व-जयपुर राज्य राजस्थान के प्रमुख राज्यों में से एक था। यह राज्य अपने भव्य भवनों और शक्तिशाली नरेशों के कारण भी अधिक प्रभावशाली बना रहा। परन्तु जयपुर की चित्रकला का विकास तनिक बाद में हुआ प्रतीत होता है और अट्ठारहवीं शताब्दी के अन्तिम चरण में जयपुर में बनायी गई उत्तम कृतियों के उदाहरण प्राप्त होते हैं जयपुर राज्य का राजस्थानी राज्यों में सबसे पहले मुगलों से सम्बन्ध स्थापित हुआ और जयपुर नरेश मुगल दरबार में सम्मानित हुए।

जयपुर के कछवाहा राजवंश की प्राचीन राजधानी आमेर (अम्बर या आम्बेर) थी और सर्वप्रथम आमेर के युवराज बिहारीमल को मुगल दरबार में सम्राट हुमायूँ ने ५००० मनसबदारी के पद पर सम्मानित किया। उनके पुत्र राजा भगवानदास ने अकबर से मित्रता की और उसने १५६२ ईसवी में अपनी ज्येष्ठ पुत्री राजकुमारी जोधाबाई का विवाह सम्राट अकबर से किया। 

यह प्रथम राजपूत राजकुमारी थी जिसने मुगल, अन्तःपुर में प्रवेश किया इस राजपूत राजकुमारी ने सम्राट जहाँगीर या सलीम को जन्म दिया। राजा बिहारीमल के पुत्र राजा भगवानदास और भतीजे राजा मानसिंह ने मुगल सेना में महत्त्वपूर्ण स्थान ग्रहण किए।

जयपुर नरेशों का कला-प्रेम 

आमेर के राजा भगवानदास तथा अन्य राजाओं का कला-प्रेम प्रमाणित है। इन राजाओं ने आमेर के उद्यानों में छतरियों पर चित्रकारी कराई जिनके चिन्ह अभी भी प्राप्त हैं। इन चित्रों का समय सोलहवीं शताब्दी का अंतिम भाग माना जाता है। 

इसके पश्चात मिर्जा राजा जयसिंह (१६२५-१६६७ ई०) मुगल सेना का प्रमुख सेनापति था और उसकी अध्यक्षता में २१,००० घुड़सवार राजपूत सेना और २२ बड़े सरदार थे। मिर्जा राजा जयसिंह की १२ जुलाई १६६७ ईसवी में बुरहानपुर में मृत्यु हो गई और सवाई जयसिंह १६६३ ईसवी में सिंहासन पर बैठा सवाई जयसिंह प्रतिभा सम्पन्न ” शासक था। 

उसने शासन व्यवस्था, विद्वता तथा भवनकला में अनोखी सूझबूझ का परिचय दिया। उसने नवीन राजधानी जयपुर का निर्माण कराया और इस नगर को एक निश्चित योजना प्रदान की। उसने ज्योतिष शास्त्र में भी रुचि प्रदर्शित की और उसके समय में आश्चर्य नहीं कि चित्रकला को भी प्रोत्साहन प्राप्त हुआ हो सवाई राजा ईसरी सिंह (१७४४-५१ ई०), सवाई राजा प्रताप सिंह द्वितीय (१७७८-१८०३ ई०), सवाई राजा जगत सिंह द्वितीय (१८०३-१६ ई०), सवाई राजा जय सिंह तृतीय (१८१८-३५ ई०) तथा सवाई राजा राम सिंह (१८३५-१८८० ई०) के शासनकाल में कछवाह कलाओं तथा जयपुर | चित्रशैली का मौलिक विकास हुआ।

जयपुर के मुखाकृति चित्र  

जयपुर में मुखाकृति चित्रण पर्याप्त समय पूर्व से अपने निजी ढंग पर चल रहा था परन्तु कछवाह चित्रकला के उदाहरण स्वरूप दो भव्य मुखाकृति चित्र ही प्राप्त हैं जिनमें से एक चित्र ‘सवाई राजा जयसिंह द्वितीय’ का है तथा दूसरा ‘महाराणा प्रताप सिंह जी’ (१७७८-१८०३ ई०) का है। ये चित्र बड़े आकार के हैं और इनमें आकृति का पार्श्व भाग दिखाया गया है। इनकी शैली मुगल मुखाकृति चित्रों से सर्वथा भिन्न है। 

सम्भवतः ये दोनों चित्र अट्ठारहवीं शताब्दी के अंतिम भाग के हैं यद्यपि सवाई राजा का चित्र कुछ पहले का जान पड़ता है। इन चित्रों में सादृश्य के साथ ही आलंकारिकता है और आकृतियाँ राजस्थानी शैली की परम्परा पर बनायी गई हैं। गर्दन में मोतियों की मालाएँ अंकित की गई हैं जो वक्षस्थल पर सुरसरि के समान सुशोभित हो रही हैं। 

फूलदार रेशमी कपड़े के मोड़ विवरण सहित सतर्कता के साथ बनाये गए हैं। इन दोनों चित्रों की आकृतियों में चेहरे एकचश्म हैं परन्तु चित्रों की रेखाओं में सफाई, कोमलता और गोलाई है। सीमा रेखाओं के द्वारा चेहरे की कोमलता का प्रभाव उत्पन्न किया गया है। 

जयसिंह के चेहरे से उसकी बुद्धिमत्ता और शक्ति का आभास होता है। इस चित्र में आकृति के अंगों तथा अंग-भंगिमाओं का विधान आलंकारिक और परम्परागत है और उंगलियाँ पतली-पतली बनायी गई हैं। आलेखन के द्वारा चित्र में साज-सामान सुंदरता से भर दिया गया है।

जयपुर के चित्र  

महाराजा प्रताप सिंह जिस समय गद्दी पर बैठा तो वह अल्पवयस्क था और उसकी माता ने शासन अपने हाथों में ले लिया। रानी ने राजा खुशालीराम को अपना सलाहकार बनाया। इस समय अलवर जयपुर राज्य से अलग हो गया। राजा प्रताप सिंह का चित्र बड़ा और सुंदर है परन्तु उनके चेहरे से कोमलता का भाव मिलता है, दृढ़ता का नहीं। 

रेखांकन के द्वारा चेहरा बनाया गया है और छाया का बहुत कम प्रयोग है। राजस्थानी शैली की हिन्दू चित्रकला के मुखाकृति चित्रों में इन उदाहरणों को सर्वोत्तम समझना चाहिए क्योंकि इन चित्रों में प्राचीन भित्तिचित्रों की परम्परा या अपभ्रंश कला का ही विकसित रूप है। जयपुर राज्य ब्रजप्रदेश की सीमा पर ही था। 

अतः वैष्णव सम्प्रदाय का जयपुर पर गहरा प्रभाव पड़ा, इस कारण यहाँ पुष्टिमार्ग से सम्बन्धित अनेक सुंदर चित्रों का निर्माण किया गया जो सर्वथा भिन्न प्रकार के हैं। सम्भवतः ये चित्र महाराजा प्रताप सिंह के समय के हैं परन्तु ये चित्र जयपुर शैली की प्रतिनिधि कृतियाँ माने जा सकते हैं। 

एक चित्र में श्री कृष्ण को गोवर्द्धन धारण किये हुए अंकित किया गया है। इस चित्र में कृष्ण की मुखमुद्रा एकचश्म है और उनका छरहरा शरीर सम्मुख स्थिति में है। उनके शरीर से कोमलता का आभास होता. है परन्तु अंग-भंगिमा में पर्याप्त दृढता है। 

कृष्ण के चारों ओर गायें, गोपियाँ तथा ग्वाल-बाल हैं जो गोवर्धन पर्वत के नीचे खड़े हैं और गोवर्द्धन पर्वत को भगवान कृष्ण ने उंगली पर उठा रखा है। पर्वत छत्र का कार्य कर रहा है, ऊपर आकाश में बादलों के मध्य स्वर्ग के देवता दर्शाये गए हैं। आकाश में वर्षा का भीषण प्रभाव अंकित किया गया है। 

चित्र में यमुना का किनारा यथार्थ बनाया गया है-आकाश में ऐरावत पर सवार इन्द्र स्वयं श्री कृष्ण की पूजा करने जा रहे हैं। इस चित्र में चित्रकार ने बहुत सुंदर संयोजन विधान लिया है। चित्र की आकृतियों में गति, लय और भाव हैं इस चित्र में गरुड़, ऐरावत तथा गायें बहुत सुंदरता से बनायी गई हैं।

दूसरा चित्र ‘रासमंडल’ का है जिसके मध्य में मानव आत्मा और परमात्मा का प्रतीक भगवान कृष्ण और राधिका का युगल है। इस युगल के चारों ओर गोपियाँ कई मंडलाकारों में नृत्य कर रही हैं। इस चित्र की आकृतियों के चेहरे दिव्य युगल की ओर हैं, मुख्यभूमि की गोपिकाओं का केवल पाश्र्व भाग ही दिखाई पड़ रहा है। 

इस चित्र को आकाशीय दृष्टि (aerial view ) से बनाया गया है। चित्र में आलेखन योजना और अलंकरण को प्रधानता दी गई है। दिव्य युगल में गति है तथा मुद्राएँ लावण्यपूर्ण हैं। आकाश में देवगण पुष्पों की वृष्टि कर रहे हैं। 

इन दोनों ही चित्रों में काले रंग की प्रधानता है और रेखाएँ भी काले रंग से बनायी गई हैं। एक अन्य बड़े आकार के चित्र में गोपियों को चित्रित किया गया है। इस चित्र की मूल प्रति जयपुर पोथीखाने में सुरक्षित है।

जयपुर शैली के दो अन्य बड़े आकार के चित्र प्राप्त हैं जो छ फुट लम्बे और तीन फुट चौड़े हैं। ये सुंदर चित्र तिब्बत के थानकानामी झंडों के सामने पट पर बने हैं इन चित्रों में प्रथम चित्र ‘ग्रीष्म’ और द्वितीय ‘शरद’ है।” 

प्रथम चित्र में एक युवती राजपूत और मुगल मिश्रित परिधान में यौवन के प्रतीक फलों से लदे एक आम्न वृक्ष के नीचे खड़ी है। स्त्री का बायाँ हाथ कमर पर रखा है और दाहिने हाथ से ऊपर की ओर आम्र वृक्ष की डाली पकड़े है तथा नीचे खड़े काले हिरन को देख रही है। हिरन युवती की ओर मुँह उठाए पूँछ हिला रहा है। 

‘शरद’ वाले चित्र में हिरन के स्थान पर शरद ऋतु का प्रतीक सारस है और आम्र वृक्ष के स्थान पर चम्पक वृक्ष है और युवती के दाहिने हाथ पर सारिका बैठी बनायी गई है जिससे यह वार्तालाप कर रही है दोनों चित्रों की पृष्ठभूमि में दूर तक आमेर दुर्ग का दृश्य अंकित किया गया है। । अग्रभूमि में आलंकारिक ढंग से बनाये गए हैं, जिनमें पुष्पित सूर्यमुखी के पौधों को अंकित किया गया है।

जयपुरी सचित्र विज्ञप्ति लेख

जैन धर्म के कारण सचित्र विज्ञप्ति लेखों का भी राजस्थान की कला में पर्याप्त प्रचलन हो रहा था। चतुर्मास हेतु जैन धर्म गुरुओं को आमंत्रित करने के लिए स्थानीय जैन संघ की ओर से जो स्वागतार्थ पत्र भेजा जाता था उसे विज्ञप्ति लेख कहते हैं। 

ऐसा एक विज्ञप्ति लेख जो बीसवीं शताब्दी का है और श्री सुरपति सिंह जी इगड़ के संग्रह में हैं (अनुमानतः इस लेख का समय १६३० ईसी है), श्री रत्न विजय जी को निमंत्रित करने के लिए भेजा गया था। इसमें अंकित लेख से प्रतीत होता है कि इस लेख को जयपुर के दधीध नानूलाल ने तैयार किया था परन्तु चित्रकार का नाम लेख में प्राप्त नहीं होता। 

अनुमानतः यह चित्रपत्री बंगाल से, जयपुर में तैयार करायी गई और ग्वालियर में जैन मुनि के पास भेजी गई थी। यह विज्ञप्ति लेख १९ फुट लम्बी और ११.५ इंच चौड़ी कपड़े की पट्टी पर तैयार किया गया है। इस लम्बी पट्टी में अनेक चित्र हैं। 

सर्वप्रथम मंगलकलश तथा छत्र का चित्र है जिसके नीचे दो चमरधारी पुरुष और दो मयूर पिच्छिकाधारणी स्त्रियाँ खड़ी हैं। दूसरे तथा तीसरे चित्र में अष्टमंगलीक तथा चतुर्दश महास्वपनो, सूर्य और श्री त्रिशला माता के चित्र हैं-सूर्य के चित्र में व्याघ्र चित्रित किया गया है। 

चौथे चित्र में ‘जिनमाता तथा सिद्धार्थ राजा का महल’ बनाया गया है, साथ ही एक जिनालय का चित्र है। पाँचवें चित्र में सात श्रवक खड़े हुए प्रभु दर्शन कर रहे हैं तथा अन्य नमस्कार वंदना कर रहे हैं। 

छठे चित्र में पाँच सजे हुए हाथी हैं जिन पर पताकाएँ, अंबारी, खुला, हौदा, जनानी अंबारी तथा व्याघ्रमुखदंड हैं। सभी हाथियों पर महावत बैठे हैं परन्तु एक हाथी पर दो अन्य व्यक्ति बैठे हैं जिन पर पंचवर्णी पताका फहरा रही है। 

इसी चित्र में पहरेदार, अश्वारोही दल, निशान तथा पताकाधारी, बन्दूकधारी सांडनी-सवार, फौजी सैनिक तथा बैंड आदि हैं। 

सातवें चित्र में जुजुर्वे तोपें रखी हुई हैं, तदुपरान्त रथ, ऊँट, घुड़सवार, पालकी, रथ आदि हैं। 

आठवें चित्र में दो नर्तकियाँ तथा वाद्ययंत्रधारी एक वाटिका के अन्तर्गत महल के प्रांगण में खड़े हैं और मुनिराज के स्वागतार्थ श्रावक दल आगे बढ़ रहा है। नवें चित्र में एक महल की वाटिका में श्री रत्नविजय तख्त पर विराजमान हैं सामने श्रावक तथा श्राविकाएँ सुसज्जित वस्त्रों में बैठी हैं। इसी चित्र में गवैये आदि भी बनाये गए हैं। 

अन्तिम चित्र में जयपुर की झाँकी दिखायी गई है जिसमें जयपुर नगर की प्राचीर (परकोटा शहर) का भाग दिखाया गया है, नगर के चार दरवाजे मकान, वृक्ष, नरनारी, घोड़े, हाथी, इक्के आदि को चित्रित किया गया है। हवामहल, जौहरी बाजार, जलमहल आदि का सादृश्यपूर्ण अंकन है। 

चित्र के एक भाग में तम्बू-डेरा आदि भी दृष्टिगोचर होते हैं, साथ ही अनेक मंदिर भी दिखाई पड़ रहे हैं। इन चित्रों में जयपुरी (कछवाह) शैली का अच्छा परिचय मिल जाता है।

जयपुर के कुशल चित्रकार गणेश के बनाए अनेक सुंदर चित्र कलकत्ता के जैन श्वेताम्बर पंचायती मंदिर में लगे हैं जो कि सम्वत् १६२५ से १६३५ के मध्य के बने हुए हैं।

जयपुर शैली की विशेषताएँ

विषय 

जयपुर शैली के चित्रों में मुखाकृति चित्रों तथा व्यक्ति चित्रों का अपना विशेष स्थान है। जयपुर के राजाओं के बड़े आकार में भी व्यक्ति चित्र बनाये गए। इन चित्रों में राजस्थानी परम्परा बलवती रूप में दिखाई पड़ती है। इन चित्रों के अतिरिक्त शिकार, दरबार आदि के चित्र भी बनाये गए। 

कृष्ण से सम्बन्धित चित्रों की संख्या अधिक है और श्री कृष्ण की विभिन्न लीलाओं, रास तथा बाल क्रीड़ाओं के अनेक चित्र बनाये गए हैं। दूसरी ओर नायिका भेद पर आधारित विषयों पर भी चित्र बनाये गए। इन चित्रों में परमात्मा का प्रतीक कृष्ण को माना गया है।

विधान  

जयपुरी चित्रों का विधान सुंदर और सुकोमल है। योजनाएँ आलंकारिक और संतुलित हैं। यद्यपि यत्र-तत्र जहाँगीर तथा शाहजहाँकालीन मुगल प्रभाव है। रेखाएँ कोमल हैं और प्रवाहपूर्ण डोल लिए बनायी गई है। चित्र की सीमा रेखा से ही चित्राकृति में गोलाई लाने का सफल प्रयास दिखायी पड़ता है। 

काली रेखाओं का प्रयोग चेहरे की सीमा रेखा के किनारे हल्की गोलाई लाने के लिए किया गया है, साथ ही छाया का भी यथोचित प्रयोग किया गया है। अधिकांश चित्रों में एकचश्म चेहरे का प्रयोग किया गया है और मुद्राएँ सुंदर तथा भावपूर्ण हैं। 

कपड़ों, साज-सामान तथा आभूषणों में सुंदर आलेखन बनाये गए हैं। स्त्रियों का पहनावा कुछ चित्रों में मुगल ढंग का है परन्तु अधिकतर चित्रों में मुगल शैली के भवनों का प्रयोग किया गया है।

जयपुर शैली के चित्रों की खुलाई मुगल चित्रों के समान काले रंग या काली स्याही से की गई है। पशु-पक्षियों का बहुत स्वाभाविक और यथार्थ अंकन किया गया है। पीले, लाल, नीले, सफेद तथा काले रंगों की चित्रों में प्रधानता है।

प्रकृति

वृक्ष, पौधे, लता, पुष्प, समस्त वनस्पति तथा प्राकृतिक वातावरण और आलंकारिकता मेवाड़ शैली के समान है। अधिकांश चित्र बड़े आकार के हैं।

हाशिए  

जयपुर शैली के चित्रों में हरे रंग की प्रधानता है। अधिकांश चित्रों के हाशिए रजतवर्णी काली या हरी तथा लाल पट्टियों से बनाये गए हैं। जयपुर शैली में रेशमी कपड़े पर, दीवार पर ( भित्तिचित्र) तथा कागज पर चित्र (लघुचित्र) बनाये गए हैं।

बुन्देलखण्ड की चित्रकला (बुन्देला शैली)

बुन्देलखण्ड का ऐतिहासिक महत्त्व 

बुन्देलखण्ड की चित्रकला के इतिहास पर दृष्टिपात करते समय सर्वप्रथम बुन्देलखण्ड के शासक राजा वीरसिंह देव पर दृष्टि पड़ती है। वीरसिंह देव कला और साहित्य का संरक्षक और कला प्रेमी राजा था। सम्राट जहाँगीर ने राजा वीरसिंह देव को अपने दरबार में तीन हजारी मनसबदारी का पद प्रदान किया। 

राजा वीरसिंह देव ने मथुरा ओरछा तथा अन्य स्थानों में अनेक मंदिर बनवाये वह एक योग्य शासक था और उसने ओरछा राज्य की सीमाओं का विस्तार किया। उसने अपने राजकोष में धन का भी पर्याप्त संचय किया १६२७ ई० में उसकी मृत्यु हो गई। वह एक वीर योद्धा, कला और भवन प्रेमी शासक था। उसने ओरछा तथा दत्तिया में सुंदर भवनों तथा दुर्गों का निर्माण कराया। 

‘हाफिज़-ए-दीवान’ की एक प्रति जो वीरसिंह देव (१६०५-१६२७ई०) के समय की है और दत्तिया राजमहल पुस्तकालय की निधि है, राजा के कला प्रेम का उत्तम उदाहरण है। इस प्रति के कुछ चित्र चमड़े पर बनाये गए हैं।

१६२६ ईसवी में बीरसिंह देव ने दतिया की जागीर अपने पुत्र भगवानराव को सौंप दी और उस समय से दत्तिया ओरछा से अलग हो गया परन्तु ओरछा राज्य दत्तिया का सम्मान करता रहा। राओ शत्रुजीत (१७६२-१८०१ ई०) दत्तिया का छठा शासक था। वह एक सुयोग्य युवराज था। उसने जाट और मराठों से युद्ध किया और राज्य का विस्तार किया। राओ शत्रुजीत के पश्चात् उसका पुत्र राजा परिछत्त सिंहासन पर बैठा।

बुन्देला चित्र  

शत्रुजीत अवश्य ही एक सुंदर युवराज रहा होगा क्योंकि उसका घोड़े पर सवार जो व्यक्ति-चित्र प्राप्त है, बहुत भव्य है। इस चित्र को देखकर ऐसा अनुमान ६ होता है कि वह अपना चित्र बनवाने का बहुत शौकीन था उसके और भी चित्र दत्तिया संग्रह में प्राप्त हैं जिनसे यह बात प्रमाणित होती है। 

एक चित्र में शत्रुजीत को अपने प्रिय अश्व हयराज पर बैठे हुए अंकित किया गया है और उसके हाथ में लम्बी तलवार है जो वह दाहिने कन्धे पर रखे है।” मुगलशैली में फर्रुखसियर के समय में इस प्रकार के चित्र बनाये गए थे, परन्तु दत्तिया के चित्रों से उनकी तुलना नहीं की जा सकती। 

दत्तिया संग्रह के एक चित्र में भव्य बुन्देला सरदार राओ शत्रुजीत को खड़ा हुआ चित्रित किया गया है। इस चित्र में आकृति का चेहरा एक चश्म है, माथे तथा पलकों पर सम्भवतः चंदन के चिन्ह हैं। 

यद्यपि इन चित्रों में माथे छोटे पीछे की ओर धंसे हुए हैं और नाक तथा माथा एक ही सपाट प्रभावपूर्ण रेखा से बनाये गए हैं, आकृतियों के नेत्र छोटे-छोटे बनाये गए हैं और सिर पर्याप्त चपटे तथा अनुपात में छोटे बनाये गए है जिससे सिर अस्वाभाविक प्रतीत होते हैं। 

बुन्देला शैली के चित्रों में मुगल शैली जैसे वस्त्रों का प्रयोग किया गया है। अङ्कारहवीं शताब्दी के इन चित्रों में राजस्थान की परम्परा है। इन चित्रों के विधान तथा रंग भित्तिचित्रों के विधान जैसे सरल और सपाट है और अलंकरण की ओर चित्रकार की विशेष रुचि दिखाई पड़ती है।

बुन्देला चित्रों के विषय 

बुन्देला शैली में व्यक्ति चित्रों के अतिरिक्त बड़ी संख्या में अन्य विषयों पर आधारित चित्र भी बनाये गए इन चित्रों की शैली विभिन्न राजस्थानी शैलियों तथा मुगल शैली से सर्वथा भिन्न है और उसमें अपना निजत्व है। इस शैली में ‘रागमाला चित्रावली’, ‘रसराज (मतिराम कृत १६४३ ई०), ‘बिहारी सतसई’ तथा कृष्ण लीला पर आधारित चित्र प्राप्त होते हैं जिनमें दत्तिया-शैली की अपनी विशेषताएँ हैं इस शैली के अनेक चित्र- उदाहरण उत्तरी भारत के प्रमुख संग्रहालयों में सुरक्षित हैं। 

ये चित्र अपनी एक निश्चित परम्परागत चित्रण प्रणाली के कारण सरलता से पहचाने जा सकते हैं। इनके रंग सरल, सपाट और चमकदार हैं। 

इस शैली के चित्रों में भाव का अधिक महत्त्व है, क्योंकि चित्रों के ऊपरी भाग में पीली पट्टी पर लिखी काव्य पंक्तियों में वर्णित भाव के आधार पर ही चित्र में भाव दर्शाया गया है इन चित्रों में रेखा, रूप तथा रंग की भाषा में केशव, बिहारी तथा मतिराम आदि कवियों की कविता को चित्रमय लिपि प्रदान की गई है। अधिकांश चित्र मध्यकालीन हिन्दी साहित्य और नायिका भेद सम्बन्धी विषयों पर आधारित हैं। 

बुन्देला शैली में अनेक प्रकार की अष्ट या दश नायिकाओं को चित्रित किया गया है, परन्तु नायिका भेद सम्बन्धी चित्रों में नायक और नायिका को सामान्य मनुष्य के रूप में न बनाकर कृष्ण और राधा का रूप दिया गया है।

मतिराम लिखित ‘रसराज’ पर आधारित एक चित्र में श्री कृष्ण एक कुंज में बैठे हैं और राधिका मुख्यभूमि में एक आम के वृक्ष के सहारे खड़ी है और यह सोच-विचार कर रही है कि प्रीतम कृष्ण के पास जाकर अपना विरह शान्त करना चाहिए या विरह की पीड़ा को सहन करना चाहिए और अपने मान को बनाये रखना चाहिए। 

इस चित्र में आलंकारिक प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है और चित्र विधान वर्णात्मक है। इस चित्र के ऊपर पीली पट्टी पर कवि मतिराम का छन्द लिया है। चित्र में एक ओर दो सखियाँ खड़ी हैं जिनमें से एक दूसरी को राधा की विरह कथा सुना रही है।

‘रागिनी-गौरी’ के एक चित्र में दत्तिया स्कूल की मुखाकृति चित्रण की दक्षता का प्रमाण मिलता है। सम्भवतः राग और रागनियों का चित्रण पन्द्रहवीं और सोलहवीं शताब्दी के मध्य में आरम्भ हुआ होगा और सत्रहवीं और अट्ठारहवीं शताब्दी में रागनी चित्र अधिक बनाये गए। रागमाला चित्रों के सूक्ष्म भावों को रूढ़िवादी आलंकारिक अभिप्रायों के आधार पर बनाया गया है।

भारतीय चित्रकारों ने चराचर में दिव्य अनुभूति, तन्मयता और प्रकृति से तादात्म्य प्रदर्शित किया है। इस दृष्टिकोण से रागनी तथा बारहमासा’ के चित्र केवल चित्रात्मक कल्पना ही नहीं है बल्कि इन चित्रों में चित्रकार ने शक्तिशाली रेखांकन और घटक रंगों के द्वारा प्रकृति में अपनी आत्म विस्मृति का परिचय दिया है।

बुन्देला स्कूल के चित्रों की तुलना यदि राजस्थानी शैली के चित्रों से की जाए तो स्पष्ट प्रतीत होता है कि यह शैली राजस्थानी चित्रों की शैली के समान प्रौढ़ नहीं है परन्तु मूल रूप में यह शैली राजस्थानी शैली की ही एक शाखा है। 

दतिया शैली के चित्र ओरछा के चित्रों से निश्चित रूप से उत्तम हैं। बुन्देला चित्रकार रेखांकन में निर्बल था और उसकी आलेखन योजना साधारण है, कल्पना शक्ति सामान्य है। चित्रकार ने स्त्री, पुरुष या नायक-नायिकाओं की जो आकृतियाँ बनायी हैं, उनमें कल्पना का अधिक विकास नहीं है। चित्रों के रंग साधारण हैं।

बुन्देला शैली के चित्रों की विशेषताएँ

बुन्देला कला का विकास सत्रहवीं शताब्दी में होता दिखाई पड़ता है। वैसे यह शैली विशेष रूप से अट्ठारहवीं तथा उन्नीसवीं शताब्दी में फली फूली इस शैली के आरम्भिक चित्रों में व्यक्ति-चित्र अधिक हैं परन्तु इनकी शैली परम्परागत राजस्थानी शैली है जिस पर यथोचित मुगल प्रभाव है। 

इन व्यक्तिचित्रों में सिर चपटे छोटे तथा अपने ढंग के हैं। माचा छोटा है और नाक और माथा दोनों की एक ही सपाट रेखा से रचना की गई है। हाथ अंग-भंगिमाएँ तथा अन्य साज-सामान परम्परागत या राजस्थानी मुगल शैली में बनाया गया है, पगड़ी, जामे इत्यादि में डिज़ाइनों का प्रयोग है और वस्त्रों को आलंकारिक योजना पर बनाया गया है। 

जामा प्रायः पारदर्शी बनाया गया है जिससे नीचे का आधा भाग झलकता दिखाया गया है। प्रायः चित्रों में व्यक्ति के खड़े होने का ढंग मुगल शैली के चित्रों जैसा है, परन्तु रंग सरल और रेखांकन राजस्थानी परम्परा का प्रतीक है।

परवर्ती रागनी चित्रों या काव्य पर आधारित चित्रों में अलंकरण की अधिकता है और सम्पूर्ण चित्र को एक आलंकारिक योजना के आधार पर बनाया गया है। वृक्षों की पत्तियों को अलग-अलग आलंकारिक योजना में सफेद मिश्रित रंग से गहरी पृष्ठभूमि पर बनाया गया है। 

पृष्ठभूमि में प्रायः टीले बनाये गए हैं जो सपाट हैं और स्थानान्तर का पूर्ण अभाव है। दूर तथा पास की आकृतियाँ सब एक माप की बनायी गई हैं और दाष्टिक परिप्रेक्ष्य का अभाव है। अधिकांश चित्रों की रंग योजना सरल है, लाल तथा पीले रंगों के प्रयोग से कर्कशता आ गई आकृतियों की सीमारेखाएँ बारीक बनायी गई हैं। 

प्रायः चित्रों में गोलाई लाने के लिए हल्की छाया का प्रयोग किया गया है। चित्रों में कारीगरी और परिश्रम का अभाव है। पशु-पक्षियों को फिर भी भावनाशील और अन्य आकृतियों की तुलना में सुंदर बनाया गया है, परन्तु चित्र को देखने से ऐसा प्रतीत होता है कि चित्रकार ने एकात्मकता (Unity ) स्थापित करने की चेष्टा नहीं की है। कुछ चित्रों में उर्दू लिपि में भी चित्र का शीर्षक लिखा है। 

बीकानेर की चित्रकला ( बीकानेर शैली)

बीकानेर का ऐतिहासिक महत्व

बीकानेर में सत्रहवीं शताब्दी के उपरान्त एक रोचक मारवाड़ी राजस्थानी शैली का विकास हुआ प्रतीत होता है। बीकानेर का राजा रायसिंह (१५७१-१६११ ई०) एक कला प्रेमी और संग्रहकर्ता शासक था, परन्तु उसके समय की एक ही सचित्र पाण्डुलिपि प्राप्त होती है। यह पाण्डुलिपि ‘मेघदूत’ नामक रचना की प्रतिलिपि है और सटीक है। परन्तु कला-दृष्टि से ये चित्र अपभ्रंश राजपूत शैली के उदाहरण हैं। 

इन चित्रों से प्रतीत होता है कि बीकानेर शैली सत्रहवीं शताब्दी तक उन्नति को प्राप्त नहीं कर पायी थी। राजा करनसिंह (१६३१-१६५२ ई०) के समय में बीकानेर पर जहाँगीर तथा शाहजहाँकालीन मुगल दरबारी सभ्यता का गहरा प्रभाव पड़ा। इसी समय में मुगल शैली के चित्रों का निर्माण बीकानेर में आरम्भ हुआ। 

इस समय के चित्रों में सुनहरे रंग का अत्यधिक प्रयोग है। बीकानेर शैली पर दक्षिण की बीजापुर शैली का प्रभाव स्पष्ट है। अनूपसिंह (१६७४-१६६८ ई०) के समय में मुगल दरबार से निराश्रित होकर अनेक चित्रकार बीकानेर आ बसे इस समय की कृतियों में पूर्ण बीकानेरी छाप है। 

इस समय के रूकनुद्दीन नामक चित्रकार के द्वारा चित्रित ‘भागवत’ तथा ‘रसिकप्रिया’ की प्रतियाँ उपलब्ध हैं। बीकानेर पर मुगल शैली का सार्वभौम प्रभाव जहाँगीर और शाहजहाँ के शासन काल में ही स्थापित हो गया था।

राजा अनूपसिंह (१६७४ – १६६६ ई०) के पश्चात् राजा गजसिंह (१७६५-१७८७ ई०), राजा सूरतसिंह (१७८७-१८६२६ ई०) और राजा रतनसिंह (१८२८-१८५१ ई०) के समय में बीकानेर चित्रकला की अपेक्षा भवन निर्माण में अधिक उन्नति हुई। राजा गज सिंह ने शाही महल के दरवाजों को कृष्ण-लीला पर आधारित धार्मिक चित्रों से सुसज्जित कराया।

बीकानेरी कला

राजा सूरतसिंह ने शीशमहल का बीकानेर में निर्माण कराया और अनूपमहल को उसने नवीन रूप प्रदान किया। इस समय में बीकानेर के शाही महलों की भित्तियों पर राम-सीता, उमा-महेश, राधा-कृष्ण आदि के धार्मिक चित्र बनाये गए। 

अट्ठारहवीं शताब्दी के आरम्भ में बीकानेर शैली में हिन्दू देवी-देवताओं की आकृतियों के चित्रण की प्रथा चल पड़ी। इस प्रकार के चित्र सुजान महल के दरवाजों पर प्राप्त हैं जो अट्ठारहवीं शताब्दी के मध्य बनाये गए। 

बीकानेर में महाराज सुजानसिंह के समय में रनिवास के कक्ष तथा द्वारों को स्त्री चित्रों से अलंकृत करने की परम्परा चल पड़ी। राजा गजसिंह, सूरतसिंह तथा रतनसिंह के समय की बीकानेरी कला में मारवाड़ी, मुगल तथा जोधपुरी प्रभाव बढ़ गया।

बीकानेरी कला शैली का प्रौढ़ रूप अनूपमहल, फूलमहल की साज-सज्जा तथा चन्द्रमहल और सुजानमहल के दरवाजों की चित्रकारी में दिखाई पड़ता है। इन महलों में रागमाला तथा बारहमासा सम्बन्धी सुंदर चित्र बनाये गए।

मालवा, गुजरात, जोधपुर और मारवाड़ की शैलियाँ

गुजराती स्कूल की अनेक कलाकृतियाँ प्राप्त हैं। इन कलाकृतियों में जैन पोथी चित्र तथा वसन्तविलास आदि के चित्र प्रमुख है। इस शैली का प्रमुख केन्द्र पाटन था, जो जैन धर्म का विशेष केन्द्र था। मालवा तथा गुजरात में अपभ्रंश शैली अपने मूल रूप में मुगल विशेषताओं को ग्रहण कर चलती रही।

१४वीं शताब्दी में जोधपुर राज दरबार में कुशल शिल्पी कार्य कर रहे थे। इन चित्रकारों ने अनेक राजाओं के व्यक्ति-चित्र बनाये इन चित्रों का संविधान मुगल है इन है। जोधपुरी शैली के चित्रों में अंकित बड़ी पगड़ी, लम्बे जामे, हृष्ट-पुष्ट मोटा शरीर, लम्बी मानवाकृतियों को लम्बी कलमों तथा बड़ी लम्बी मूछों के कारण सरलता से पहचाना जा सकता है।

मारवाड़ के राजा कालदेव तथा चन्द्रसेन अम्बेर (आमेर) के शासकों से युद्ध में उलझे रहे अतः मारवाड़ी कला का विकास अधिक न हो सका, सम्भवतः इस समय अनेक चित्र युद्ध आदि में भी नष्ट हो गए। 

इस शैली की जो कृतियाँ प्राप्त हैं मूलतः अपभ्रंश शैली से सम्बन्धित हैं। इन चित्रों में अपभ्रंश परम्परा के समान लोक-कला जैसी आकृतियों, सरल सपाटेदार रेखांकन और चटक विरोधी रंग लगाये गए हैं। 

ये चित्र प्रायः चौखानों या पहियों में चित्रित किये गए हैं मारवाड़ी शैली की आकृतियाँ कद में छोटी और स्थूलकाय बनायी गई हैं और आकृतियों के सिर गोल हैं। मारवाड़ी शैलियों में आकृतियों में माया पीछे की ओर पैसा हुआ है और नेत्र बड़े-बड़े परवल के समान बनाये गए हैं।

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