European prehistoric Art | आदिम कला (प्रागैतिहासिक )

प्रागैतिहासिक काल की पूर्व पाषाणकालीन कला के समान विद्यमान असभ्य जातियों की कला भी आदिम कला के अंतर्गत आती है क्योंकि दोनों आदिम मानसिक अवस्था की मूल सर्जन प्रवृत्ति के परिणाम हैं। दीर्घकाल के व्यतिक्रम के परिणामस्वरूप मानव की विवेक बुद्धि का विकास हो जाये यह निश्चित रूप से कहा नहीं जा सकता।

कभी उसी युग में और एक ही देश में मानव समाज सभ्यता की भिन्न अवस्थाओं को प्राप्त किये हुए दिखाई देते हैं। आदिमत्व के बारे में भी यही विचार प्रकट किया जा सकता है। उत्तरी अमेरिका की खोज होने पर वहाँ की कुछ जातियाँ पूर्व पाषाण कालीन मानव के समान, तो कुछ उत्तर पाषाणकालीन मानव के समान जीवन बिताते हुए पायी गयीं।

किन्तु दक्षिणी- अमेरिका की कुछ अन्य जातियाँ – शायद पूर्वदेशीय प्रभाव से -सभ्यता की अधिक विकसित अवस्था में थीं। अफ्रिका, मेलानेशिया, आदि प्रदेशों में असभ्य वन्य जातियाँ अभी विद्यमान हैं। इसी तथ्य के सन्दर्भ में विद्वान बी.एस. मायर्स ने लिखा है, ‘History is not always a matter of dates nor wisdom a matter of age’ – इतिहास हमेशा केवल तिथियों की कथा नहीं होती न विवेकबुद्धि युगचेतना का बोध ।

आदिमत्व एक मानसिक अवस्था है जिसका रूप भौगोलिक, धार्मिक एवं मनोवैज्ञानिक कारणों से निर्धारित किया जाता है। विद्यमान असभ्य जातियाँ सभ्य समाजों के सम्पर्क में आकर, सभ्यता की ओर आकर्षित होकर विकसित हो रही हैं, तो आदिमत्व के प्राकृतिक सरल रूप से प्रभावित होकर स्वाभाविक जीवन एवं आतंरिक शान्ति की प्राप्ति हेतु कुछ आधुनिक विचारक, साहित्यिक, तथा कलाकार चित्रकला, संगीत, नृत्य वगैरह क्षेत्रों में आदिमत्व के मूल तत्त्वों को प्रशंसा सहित अपना रहे हैं।

पूर्व पाषाणकालीन (20,000 ई. पूर्व से 10,000 ई. पूर्व तक) कला तथा अफ्रीकी बुशमैन व एस्किमो लोगों की कला में काफी सादृश्य दृष्टिगोचर होता है। उसी प्रकार उत्तर पाषाणकालीन (10,000 ई. पूर्व से 4000 ई. पूर्व तक) कला व पश्चिमी अफ्रीका, ताम्रवर्णी अमेरिकन इंडियन तथा प्रशान्त महासागरीय द्वीप समूह में लोगों की कला में भी घनिष्ठ समानता है।

यूरोपीय चित्रकला का इतिहास (प्रागैतिहासिक कला से यथार्थवाद तक) पूर्व पाषाणकालीन चित्रकला

कुछ प्राणियों जैसे कि घोंसले बनाने वाले पक्षी, चींटियाँ में अद्भुत रचनाकौशल के स्पष्ट प्रमाण मिलते हैं किन्तु मानव ही एक ऐसा प्राणी है जिसको प्रकृति ने ऐसी सर्जनशक्ति प्रदान की है जिससे वह वास्तविकता के सदृश आकृतियों का निर्माण कर सकता है।

इस प्रकार मानव निर्मित आकृतियों या चित्रों के जो सबसे प्राचीन नमूने प्राप्त हुए हैं वे करीब 30,000 वर्ष ई. पूर्व कालीन हैं। प्रतिकूल जलवायु तथा हिंस्र पशुओं से युक्त संघर्षमय वातावरण में उस युग का मानव गुफाओं में रहता था एवं शिकार करके जीवन यापन करता था।

गुफा निवासी मानवों के चित्रों एवं मूर्तियों में उनके दैनिक जीवन की घटनाएँ। यथार्थवादी ढंग से व्यक्त की हुई देखने को मिलती हैं यद्यपि विद्वानों के विचार से गुफा निवासी मानवों की चित्रकला तथा मूर्तिकला के पीछे स्पष्ट रूप से मंत्र-तंत्रीय उद्देश्य की प्रेरणा कार्यान्वित थी। यथार्थवादी कला का प्रारम्भिक चरण होते हुए भी उनकी कलाकृतियाँ असाधारण कलात्मक गुणों से परिपूर्ण हैं।

1879 में स्पेन में अल्टामिरा गुफा की खोज हुई व इस बात का ज्ञान हुआ कि शैशवावस्था में भी मानवजाति कलाकृतियों का निर्माण करती थी। उस समय साधन के रूप में केवल वनस्पतियों की डंडिया, पत्थरों के औजार व रंगीन पत्थरों को पीस कर बनाये हुए रंग ही उपलब्ध थे व उनको ही इस्तेमाल करके कलाकृतियाँ बनायी गयी थी।

ये कलाकृतियाँ ऐसी भी दिखायी नहीं देती कि किसी अनभिज्ञ द्वारा फुर्सत के समय में मनोरंजन के हेतु बनायी गयी हों, क्योंकि इनमें जानवरों तथा मानवों की आकृतियों में सादृश्य एवं सजीवता का आभास है तथा यह भी स्पष्ट है कि ये निरीक्षण पूर्वक रचना कौशल के साथ तथा किसी विशेष उद्देश्य को लेकर बनायी गयी हैं।

अल्टामिरा गुफा की खोज संयोगवश हुई और उसका श्रेय सौत्वोला नाम के व्यक्ति को है। इस खोज के पश्चात् इस प्रकार की पाषाणकालीन गुफाओं की खोज की दिशा में और प्रयत्न हुये। स्पेन के उत्तर पूर्वी भाग में तथा फ्रांस के दक्षिण-पश्चिम भाग में लगभग 50 गुफाओं की खोज हुई, जिनमें पाषाण युगीन चित्र पाये गये।

हिमाच्छादन को चार प्रमुख कालखण्डों में विभाजित किया गया है व नवमानव की पश्चिमी यूरोप में उपस्थिति कालखण्ड में यानी 30,000 ई. पूर्व हुई। इस समय मानव, डार्विन के उत्क्रान्तिवाद के सिद्धान्त के अनुसार उस श्रेणी की अन्तिम अवस्था में था जिसका आरम्भ कई लाख वर्ष पूर्व वानर अवस्था में हो गया था।

गुफा चित्रों में कुछ ऐसे जानवरों के चित्र हैं जो उस समय भूतल पर विद्यमान थे, किन्तु जो अंतिम हिमाच्छदान के साथ विलुप्त हो गये। इस बात से गुफा चित्रों की प्राचीनता की पुष्टि होती है। इसके अतिरिक्त इस बात से भी उनकी अति प्राचीनता के प्रमाण मिलते हैं कि उनमें से कई गुफाओं के प्रवेशद्वार ऐसे पदार्थ संचय से बंद पाये गये जो अन्तिम हिमनदी की वापसी के समय वहाँ छोड़े गये थे।

जिन लोगों ने ये चित्र बनाये थे उनके बारे में विशेष ऐतिहासिक जानकारी प्राप्त नहीं है। अतः पाषाणकालीन चित्रकला को यूरोपीय कला की परम्परा में अन्तर्भूत नहीं किया जा सकता। किन्तु इन चित्रों के अध्ययन से मानवजाति की कलात्मक प्रवृत्ति पर काफी प्रकाश डाला जा सकता है।

सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि पाषाणकालीन चित्रकारों को रेखांकन रंगांकन के मूल तत्त्वों का ज्ञान था। कुछ चित्र पूर्णरूप से रेखाओं द्वारा तो कुछ चित्र पूर्णतया हल्के व गहरे रंगों की छटाओं के प्रयोग से बनाये गए हैं।

कहीं रेखा व रंगों का सम्मिश्र प्रयोग है। भिन्न अंकन पद्धतियों पर उन कलाकारों ने जो प्रभुत्व का परिचय दिया है वह आश्चर्य जनक है।

सांड के ऊबड़-खाबड़ व विशाल शरीर की उभारदार भव्य मुद्रा एवं हरिण के चिकने व लोचपूर्ण शरीर का गतित्व बहुत ही कुशलता से व्यक्त किये हैं। इस दृष्टि से उनकी तुलना जापानी व चीनी कलाकारों के प्राणी चित्रों से की जा सकती है।

हल्के व गहरे रंगों की छटाओं का क्रमबद्ध प्रयोग इतने समुचित तरीके से किया गया है कि आकृतियों में ठोसपन व स्पष्टता के गुणों का विकास बहुत ही दर्शनीय है। तूलिका के निपुण संचालन से आकृतियों की सतहों पर यथायोग्य बुनावट का प्रभाव दिखा के बारीक काम करने के परिश्रम को उन्होंने टाल दिया है।

इस विचार से उनके चित्रण की तुलना आधुनिक चित्रांकन विधियों से की जा सकती है। उनके अंकन विधियों के प्राविण्य को देखकर अनेक ख्यातनाम कला समीक्षकों ने स्पष्ट मत व्यक्त किया है कि अंकन कौशल की दृष्टि से इन चित्रकारों की किसी भी अन्य कालखण्ड के कुशल चित्रकारों से तुलना की जा सकती है।

कोई भी चित्रकार इनसे अधिक कुशल नहीं हो सकता, वह केवल भिन्न अंकन पद्धति को अपना सकता है। हर्बर्ट रोड ने स्वाभाविक अंकन विधि व आकारों के सरलीकरण के विचार से पाषाणकालीन कला की आधुनिक चित्रकला से समानता को ध्यान में रखते हुए मत व्यक्त किया है कि, आधुनिक चित्रकला 30,000 वर्ष प्राचीन है।

अकेले जानवर के चित्रण में इन कलाकारों ने जो सफलता दिखायी है वैसी सफलता उन्हें उनके जानवरों के संयोजन में नहीं मिली। उनमें संयोजन दृष्टि का अभाव था। जहाँ अनेक जानवरों का चित्रण हुआ है वहाँ वे सब जानवर अस्त-व्यस्त फैले हुए से प्रतीत होते हैं।

कुछ विद्वानों के अनुसार पूर्वपाषाण कालीन चित्रकला की निर्मिति उपयुक्ततावादी या धार्मिक विचारों से प्रेरित होकर की गयी थी। उस समय के मानव के लिए धर्म दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन मात्र था एवं जादू-टोने के रूप में प्रचलित था।

मानव की सबसे प्रमुख आवश्यकता थी जंगली जानवर के शिकार में सफलता जिससे उसको एक साथ भोजन, वस्त्र, ईंधन प्राप्त होते थे। अतः वह मंत्र-तंत्र की भाँति गुफाओं की दीवारों पर जानवरों के चित्र बनाया करता था व सोचता था कि चित्रित जानवर को मारने से या उसको मारे हुए दिखाने से वह प्रत्यक्ष शिकार में भी सफल होगा।

जानवर के चित्र व प्रत्यक्ष जानवर में वह कोई अन्तर नहीं मानता था। यही कारण है कि अधिकतर पूर्व पाषाणकालीन कला नैसर्गिकतावादी है। आदिम मानव का विश्वास था कि जानवर के चित्र व प्रत्यक्ष जानवर में कोई गूढ़ रहस्य जुड़ा रहता है एवं चित्रित जानवर को मारने से या मारे हुए दिखाने से प्रत्यक्ष जानवर की मृत्यु अटल हो जाती है।

इसी तरह का अंधविश्वास कारिबियन द्वीपों यूरोपीय चित्रकला का इतिहास (प्रागैतिहासिक कला से यथार्थवाद तक) के व मांत्रिकों में दिखायी देता है। शत्रु को मारने के उद्देश्य से ये तांत्रिक उसकी गुड़िया

के समान छोटी आकृति बनाते हैं व उसको नुकीले काँटे से भोंकते हैं। मानववंशशास्त्री फ्रोबेनियस ने इस सम्बन्ध में अपना मध्य अफ्रीका की एक वन्य बौनों की टोली का मनोरंजक अनुभव वर्णन किया है। उन्होंने लिखा है कि हिरण के शिकार के लिए जाने से पहले टोली ने जमीन साफ करके उस पर जानवर का चित्र बनाया।

प्रभातकालीन सूर्यकिरणों से जब चित्र तप्त हो गया तब एक स्त्री ने कुछ प्रार्थना गीत गाकर चित्र पर रक्त छिड़काया व टोली में से एक आदमी ने चित्रित जानवर की गर्दन पर तीर से निशाना लगाया। उसके पश्चात् तीनों आदमी जंगल में चले गये व कुछ समय बाद वैसे ही हिरण को मार कर ले आये जिसकी गर्दन पर उन्होंने तीर चलाया था। तब उन्होंने चित्र पर उस जानवर के बाल चढ़ाये व उसका रक्त छिड़क कर मंत्र-तंत्र का विधि-विधान पूर्ण किया।

पूर्वपाषाणकालीन चित्रों में स्पेन के अल्टामिरा तथा फ्रांस के लास्को व ल एयजी स्थानों के गुफा चित्र सबसे प्रसिद्ध हैं। इस प्रकार के कई गुफा चित्र पश्चिमी यूरोप से लेकर दक्षिणी अफ्रीका तक कई स्थानों में पाये गये हैं व उनमें कभी इतनी समानता दृष्टिगोचर होती है कि कुछ विद्वानों का मत है कि इन भिन्न प्रदेशों का कभी एक दूसरे से सम्पर्क रहा होगा। यूरोप के गुफाचित्र अधिकतर स्पेन के पूर्वी व उत्तरी प्रदेशों में व फ्रांस के दक्षिणी पश्चिमी प्रदेश में सीमित हैं।

रशियन साइबेरिया के याकुत्स व उझबेकिस्तान प्रदेशों में भी पूर्व पाषाणकालीन गुफाचित्र मिले हैं। भारत व चीन में भी इस काल खण्ड के गुफा चित्र पाये गये हैं।

पूर्व स्पेन के लेवान्टाइन प्रदेश में पाये गये चित्रों में मानवों व जानवरों की आकृतियाँ एक से समतल रंग में चित्रित हैं व उनमें प्रत्यक्ष शिकार के दृश्य हैं जबकि उत्तरी स्पेन की अल्टामिरा गुफा में चित्रित जानवरों की आकृतियों में त्रिमिति का परिणाम दर्शाया है एवं बाह्य रेखा का प्रयोग है।

अल्टामिरा के चित्र अधिक नैसर्गिक हैं तो पूर्वी प्रदेश के चित्रों में यथार्थ संयोजन है। किन्तु दोनों स्थानों के चित्रों में मानवाकृति की अपेक्षा जानवरों की आकृतियों को अधिक नैसर्गिक बनाया गया है। मानवाकृतियों को सीधे तूलिका से बनायी आकृतियों के समान चित्रित किया है, जैसे छोटे बच्चे अक्सर करते हैं।

इसका कारण यह हो सकता है कि मंत्र-तंत्र के विचार से जानवरों को हूबहू चित्रित करने के पश्चात् आदमी को हूबहू चित्रित करने में आदिम चित्रकार को डर लग रहा हो कि शायद उससे आदमी पर मंत्र-तंत्र का असर होकर वह शिकार करते समय मारा नहीं जाये।

ऐसे ही शिकार के दृश्य अफ्रीका के बुशमैनों द्वारा बनाये पाये गये हैं जिनमें भी जानवरों को नैसर्गिक रूप में एवं आदमियों को कठपुतलियों के समान निर्धारित रूप में एक से रंग से चित्रित किया है। दोनों में आश्चर्यजनक समानता है।

अल्टामिरा के जानवरों के चित्रों में कुछ विशेषताएँ हैं। ये पर्याप्त मात्रा में नैसर्गिक हैं व गुफाओं की ऊबड़-खाबड़ छतों पर चित्रित होने से उनमें कुछ स्वाभाविक ठोसपन आ गया है। चित्रण के लिए मिट्टी के रंगों का प्रयोग किया है, जिनमें भूरा, कत्थई, पीला (पीली मिट्टी के रंग जैसा) व लाल रंग है।

ये जानवरों की चर्बी में मिलाकर लगाये गये हैं तथा काजल व कोयले का भी प्रयोग है। समकालीन मेलानेशियन जातियों की प्रथा से तुलना कर हम अनुमान लगा सकते हैं कि पूर्व पाषाणकाल में भी प्रत्येक टोली का कोई निपुण कलाकार होता होगा जिसको उसके इस चित्रकारी के दैवी सामर्थ्य के कारण धर्मपंडित के समान स्थान दिया जाता होगा।

अनेक रंगों में बनाये इन चित्रों में घनत्व के अतिरिक्त जानवरों की हलचल सजीव प्रतीत होती हैं व अल्टामिरा के चित्रों की शैली से कुछ समानता दिखायी देती है।

उत्तरी स्पेन की कुछ गुफाएँ जमीन में काफी गहराई तक पहुँची हुई हैं जिसके पीछे कोई रक्षा सम्बन्धी या धार्मिक रहस्य का उद्देश्य कारण होगा। ऐसे प्रमाण भी मिलते हैं। जिससे यह अनुमान लगा सकते हैं कि ये गुफाएँ मानव के निवास स्थान न होकर मंत्र- तंत्र युक्त धार्मिक विधियों के लिए आरक्षित थीं।

इनमें से ला पासिएगा की गुफा का प्रवेश द्वार तो एक चट्टान के बीच में कठिन स्थान पर है जहाँ से सीधे काफी नीचे तक अनेक मोड़ लिये हुए मार्ग से अन्दर जाना पड़ता है। यहाँ के चित्र स्पष्ट रूप से विशेष मंत्र विद्या के हेतु बनाये हैं।

फ्रांस के दक्षिण-पश्चिम प्रदेश में प्राप्त गुफाएँ अधिक प्राचीन हैं। ये भूमि के काफी गहराई में हैं व इनमें नैसर्गिक प्रकाश का प्रायः अभाव है। तो भी गुफा के अलंकरण में पीला, लाल, भूरा, सिन्दूरी व काला जैसे भिन्न रंगों का प्रयोग है। इसके अतिरिक्त कई भिन्न जाति के जानवरों के चित्र हैं, जितने स्पेन की गुफाओं में देखने को नहीं मिलते।

1940 में फ्रांस में प्राप्त लास्को की पूर्वपाषाणकालीन गुफा का आविष्कार अल्टामिरा की गुफा की तरह अचानक हुआ जब लड़के अपने खोए हुए कुत्ते की तलाश में जमीन के गड्ढे में घुसकर उसको खोदने का प्रयास कर रहे थे।

यहाँ के चित्रों में उन्मत्त बैल, हृष्ट- पुष्ट घोड़े, हमले के पैंतरे में खड़ा जंगली सांड, बारह सींगा आदि आकृतियाँ हैं। स्पेन के गुफा चित्रों के समान इन चित्रों में गतित्व पर विशेष जोर नहीं दिया गया है एवं चित्र के सम्पूर्ण संयोजन से व्यक्तिगत आकृति की ओर अधिक ध्यान दिया है।

अधिकतर चित्र ई. 30,000 पूर्व से ई. 10,000 पूर्व तक के भिन्न कालखण्डों के हैं। फ्रांस में ही फांद गोम, लामूत, त्र्वा फरेर, ल्युक दोधुबेर आदि अन्य स्थानों पर गुफा चित्र पाये गये हैं। ये स्थान अधिकतर पिरिनीज पर्वत श्रृंखला की तलहटी की पहाड़ियों में हैं।

इसी प्रदेश में पूर्वपाषाणकालीन प्रसिद्ध मूर्ति ‘लोसेल की सौन्दर्य देवी’ प्राप्त हुई है। इस मूर्ति के स्तन, नितम्ब आदि जनन पोषण के अवयव अतिशयोक्ति रूप में बनाये गए हैं व यह मूर्ति पूर्व मध्यकालीन मातृदेवी की कल्पना के समरूप मानी गयी है। उसके हाथ में सींग है जो शायद उस समय गुफा निवासी मानव द्वारा प्रत्यक्ष जानवर खून से भरा हुआ रखा जाता था, जिस तरह वे जानवर के चित्र पर खून छिड़काकर उसको मारा हुआ समझते थे।

सौन्दर्य-प्रेम केवल मानव तक ही सीमित नहीं है। आधुनिक मनोवैज्ञानिकों ने पशुपक्षियों के व्यवहारों के सूक्ष्म निरीक्षण एवं प्रयोगों द्वारा सिद्ध किया है कि मनुष्येतर प्राणी सुसम्बद्ध एवं सम्मितियुक्त आकृतियों को अधिक पसन्द करते हैं। किन्तु अन्य क्षेत्रों के समान सौन्दर्यानुभूति के क्षेत्र में भी मानव मस्तिष्क शीघ्र विकसित हुआ है उसकी सौन्दर्यानुभूति जटिल एवं सूक्ष्मतर होती गयी जो बात पशु-पक्षियों के सम्बन्ध में नहीं कही जा सकती।

सबसे प्राचीन सादृश्य युक्त मूर्तियों के अन्तर्गत पत्थरों में गढ़ी हुई आदमी औरत व जानवरों की छोटी मूर्तियाँ हैं, जिनमें गर्भवती स्त्री की मूर्तियाँ अधिक मात्रा में पायी गयी हैं।

दक्षिणी आस्ट्रिया में पायी गयी विश्व प्रसिद्ध मूर्ति ‘विलेनडार्फ की सौन्दर्य देवी’ 5½’ लम्बी है व चूना पत्थर की बनी हुई है जिसका काल लगभग 27,000 ई.पू. का है। वह प्रजनन एवं समृद्धि के प्रतीक के रूप में बनायी गयी हो सकती है।

इस मूर्ति को ‘सौन्दर्य देवी’ इसलिए कहा जाता है कि वह विवस्त्र है व उसकी मुद्रा ग्रीक सौन्दर्य देवी की मूर्तियों की मुद्रा से मिलती जुलती है। किन्तु इसका अनुमान लगाना कठिन है कि यह मूर्ति किसी देवी की है या किसी विशेष स्त्री की। ये सब मूर्तियाँ गुफाओं में या उनके आसपास पायी गयी हैं।

यद्यपि इस प्रकार की पूर्व पाषाणकालीन मूर्तियाँ यूरोप के विभिन्न प्रदेशों में पायी गयी हैं, उनमें से बहुसंख्य मूर्तियाँ फ्रांस व स्पेन के मध्य सीमावर्ती इलाके में मिली हैं। मानव द्वारा उपयोग में लाये गये औजारों का विचार करके पूर्व पाषाणकाल के चार प्रमुख विभाग किये गए हैं- ओरिग्नासियन काल खण्ड (ई. 30,000 पूर्व से ई. 27,000 पू. तक), ग्रावेटियन कालखण्ड (ई. 27,000 पू. से ई. 18,000 पूर्व तक), सोल्यूट्रियन कालखण्ड (ई. 18,000 पू. से ई. 15,000 पू. तक) माग्दालेनियन कालखण्ड (ई. 15,000 पू. . से ई. 10,000 पू. तक)।

मूर्तियों के काल निर्माण से गुफाओं का काल निर्णय करना अधिक कठिन है क्योंकि जिन गुफाओं में ये चित्र मिले हैं उनमें गुफा निवासियों की पारिवारिक जीवन सामग्री के अवशेष बहुत कम मिले हैं। इसके अतिरिक्त भिन्न कालखण्डों में बनाये जाने के कारण उनमें शैलियों की विविधता है। आधुनिक रेडियो कार्बन पद्धति के आधार पर किये गये संशोधन अधिकतर चित्र माग्दालेनियन कालखण्ड के प्रतीत होते हैं।

लास्को गुफा की खोज 1940 में हुई व वहाँ के चित्र काफी सुरक्षित अवस्था में पाये गये, क्योंकि गुफा का मुँह किसी पाषाणकालीन प्राकृतिक उथल-पुथल के कारण बन्द होकर रह गया। इसके अलावा चित्र बनाने से पहले पृष्ठभूमि की सफेद रंग की पुताई की जाने से ऊपर के चित्र अधिक स्पष्ट दिखाई देते हैं।

अक्सर गुफा की सम्पूर्ण दीवारें चित्रों से एवं खुदाई से भरी हुई हैं, किन्तु उनके मध्यवर्ती कक्ष के – जो ‘बेलों का वृहत कक्ष’ के नाम से प्रसिद्ध है – चित्र अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। इनमें एक चित्रमालिका है जिसमें चार बड़े काले बैलों का कतार में चित्र है, जिसमें सबसे बड़ा बैल 18 फुट लम्बा बनाया गया है।

सबसे आगे लाल व काले रंगों में चित्रित छोटे घोड़ों का समूह चित्र है। मध्यवर्ती कक्ष के अतिरिक्त कुछ संकुचित मार्ग व अन्य कक्ष हैं जिनमें हिरण, गैंडा, वगैरह जानवरों के चित्र हैं। मध्यवर्ती कक्ष में बनाये गये बैलों के चित्र रंगों के उचित समतल क्षेत्र व बाह्य रेखा की स्पष्टता से आकर्षक बन गये हैं।

बैलों की आकृतियाँ बहुत नैसर्गिक बन गयी हैं व चित्रकारों ने विशेष प्रयत्नों के बिना सहज ढंग से उनमें आकार गतित्व व सजीवता को उबारा है। बैलों के सुस्थापन में संयोजन कौशल का प्राथमिक ज्ञान है तथा आकृतियाँ ठोस हैं। आकृतियाँ विभक्त हैं एवं पृष्ठभूमि के अन्तर्गत गहराई का आभास दिखाने के प्रयत्न नहीं हैं।

लास्को गुफा का चित्रण किसी उद्देश्य से किया गया इसका सीधा उत्तर नहीं मिलता। मध्यवर्ती कक्ष में बैलों की कतार में चित्रण मनोरंजन या अलंकरण के उद्देश्य से किया हो सकता है। बैलों की नैसर्गिक आकृतियों के अतिरिक्त दीवारों पर कुछ गूढ़ चिन्ह अंकित किये हैं जिनका अर्थ लगाना मुश्किल है।

गुफा चित्रण का मुख्य विषय प्रायः शिकार के जानवर था किन्तु लास्को के गुफा चित्रों में बारहसिंगे के कोई महत्त्वपूर्ण चित्र नहीं हैं, यद्यपि वहाँ के गुफा निवासियों का बाहरसिंगा मुख्य भोजन था। वहाँ बारहसिंगे का केवल एक ही चित्र है जबकि घोड़ों के 100 से अधिक तथा सांड, हिरण, भालू, चीता जैसे अन्य विविध जानवरों के एवं एक काल्पनिक जानवर एक शृंग का चित्र है।

अतः यहाँ के सभी चित्र मंत्र-तंत्र के उद्देश्य से बनाये गये, यह मानना कठिन है। मानवाकृतियाँ भी चित्रित की हैं किन्तु उनकी संख्या जानवरों की संख्या से कम है। मानवों को कठपुतलियों के समान चित्रित किया है व उनमें सजीवता व ठोसपन नहीं है। जानवरों की आकृतियों में मांत्रिक शक्ति का आभास सफलतापूर्वक प्रकट किया है। लास्को गुफाओं के चित्रण के उद्देश्य के सम्बन्ध में कोई सरल स्पष्टीकरण नहीं दिया जा सकता।

उसका अवश्य ही कोई धार्मिक कारण होगा यद्यपि हम वहाँ के निवासियों के धर्म एवं उनके मंत्र-तंत्र विधियों के सम्बन्ध में कुछ नहीं जानते। शायद वे लोग जानवरों की अलौकिक सामर्थ्य का विश्वास करते थे व सोचते थे कि उनके चित्रों के द्वारा उस सामर्थ्य को वे नियंत्रित कर सकते हैं। इस तरह हम देखते हैं कि पूर्व पाषाणकालीन कला रहस्यात्मकता से ओत-प्रोत है, क्योंकि आरम्भ से ही रहस्यवाद मानव प्रकृति की सबसे प्रबल प्रेरणा था ।

हिमयुग के साथ पूर्वपाषाणकालीन कला का अन्त हुआ । यद्यपि उसकी निश्चित व्याख्या करने में अब तक हम असफल रहे हैं उसका नैसर्गिकता लिये हुए, लयबद्ध व सरलीकृत आकार सौन्दर्य आधुनिक कलाकारों व कला प्रेमियों को मंत्रमुग्ध करता है। नवपाषाण कालीन व उत्तर पाषाणकालीन आदिम कला

हिमयुग के पश्चात् पृथ्वी के जलवायु, वनस्पति व प्राणी जीवन में परिवर्तन आ गया। पूर्वपाषाणकाल में मानव भोजन के लिए पूर्ण रूप से शिकार पर निर्भर था। परन्तु हिमयुग के अन्त के पश्चात् जैसे ही जलवायु में तापमान बढ़ता गया मानव का सामाजिक जीवन अधिक घनिष्ठ बनता गया तथा वह पशुपालन और कृषि पर निर्भर होता गया। नवपाषाणकाल में मानव समाज कृक समाज बन गया था।

पूर्व पाषाणकाल व नवपाषाणकाल के बीच एक संक्रमणावस्था का काल रहा जो मध्य पाषाणकाल कहलाता है। इस काल में कृषि का आविष्कार नहीं हुआ था व मानव गुफाओं में ही रहता था।

जलवायु परिवर्तन के कारण बैल, हिरण, घोड़े वगैरह जानवरों ने उत्तरी प्रदेश की ओर स्थानान्तरण किया था व मानव, कुत्तों की सहायता लेकर छोटे जानवरों का शिकार करता था व जाल में मछली पकड़ना शुरू किया था। पहले की तरह गुफाओं में जानवरों का एवं आलंकारिक चित्रण होता रहा परन्तु शैली व चित्र विषयों में कुछ अन्तर आ गया। चित्रों में पूर्वगामी शैली की सजीवता नहीं थी व आकारों को कुछ

पूर्व निर्धारित रूप प्राप्त हुआ। अलग-अलग पत्थरों पर प्रतीकात्मक या यांत्रिक चिन्ह बनाये जाते थे जो आस्ट्रेलिया के समकालीन वन्य टोलियों की धार्मिक बूटियों (चूरिंगा) के समान दिखाई देते हैं। मध्यपाषाणकालीन रूढ़िबद्ध व प्रतीकात्मक कला से नवपाषाणकालीन वस्तुनिरपेक्ष कला के समरूपी कला का स्वाभाविक व क्रमशः विकास हुआ।

यह विकास प्रशान्त महासागरीय द्वीप समूह, अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका आदि प्रदेशों में भिन्न काल खण्डों में हुआ व शैली के विचार से भिन्न स्थानों की कला शैलियों में काफी असमानता है। कृषि का आविष्कार मिस्र व पूर्वी एशिया में हुआ जहाँ से उसका यूरोप में प्रसार हुआ।

कृषि के आविष्कार के परिणमास्वरूप मानव समाज अधिक सुसंगठित व स्थायी हुआ व उसके साथ ही मानव के धर्म, सामाजिक व्यवहार व हस्तकलाओं में तदनुकूल अन्तर आ गया। मानव विश्वास करने लगा कि कृषि उत्पादन, पशुओं तथा परिवार के सदस्यों की खुशहाली कुछ प्राकृतिक, अज्ञात, दयालु एवं दुष्ट शक्तियों की इच्छाओं पर निर्भर करते हैं व उसके धर्म को जादू टोने के स्थान पर जड़ात्मवाद का रूप प्राप्त हुआ।

वह जीवन की भिन्न अवस्थाओं को निर्धारित करने वाले देवताओं को पूजने लगा क्योंकि उसकी भावना थी कि मानव प्राणी तथा वनस्पति जीवन के भौतिक रूपों के पीछे गूढ़ अन्तर्गत शक्तियाँ संचालन का कार्य करती हैं। अप्रकट शक्तियों का विश्वास होने से उसकी कला में दृश्य नैसर्गिक आकार- विशेषों के स्थान पर प्रतीकात्मक व सर्वमान्य आकारों का महत्त्व बढ़ गया।

वह वास्तविकता से कल्पना तथा भावनाओं पर अधिक बल देने लगा। इसी कारण उसने अपनी नयी धर्म निष्ठाओं की पूर्ति हेतु नकाब, जाति चिन्ह व अज्ञात शक्तियों की प्रतीक रूप मूर्तियों की निर्मिति शुरू की। नवपाषाणकालीन मानव टोलियों के समान अफ्रीका व प्रशान्त महासागरीय द्वीपों की समकालीन वन्य जातियों में भी इसी तरह की धार्मिक वस्तुओं की निर्मिति की जाती रही है।

नवपाषाणकालीन चित्रकारों ने अल्टामिरा व लास्को के चित्रकारों के समान घोड़ा, सांड आदि जानवरों के वास्तविक रूपों की ओर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने मानव व प्राणियों के चित्रण में काल्पनिक व प्रतीकात्मक आकारों का प्रयोग किया जिससे उनके चित्र आलंकारिक एवं वस्तु निरपेक्षत्व की ओर अभिमुख हो गये।

उनकी कला को सरलीकृत ज्यामितीय रूप प्राप्त हो गया। प्राणियों के ज्यामितीय आकारों से अलंकृत नवपाषाणकालीन मिट्टी के बर्तन व मूर्तियाँ प्रचुर मात्रा में प्राप्त हुई हैं। नवपाषाणकालीन ज्यामितीय वस्तुनिरपेक्षत्व का पुनर्दर्शन हमें दक्षिणी अमेरिका के पेरू देश के एवं उत्तरी अमेरिका के आदिम लोगों के मिट्टी के बर्तनों व वस्त्रालंकरण में मिलता है। उसी के समान ज्यामितीय वस्तुनिरपेक्षत्व का प्रभाव अफ्रीका व ओशिआनिआ के नकाबों में भी दृष्टिगोचर है।

उत्तर पाषाणकालीन आश्चर्यजनक नैसर्गिकतावादी कला के सम्मुख नवपाषाणकालीन कला अपक्व-सी प्रतीत होती है। किन्तु उसके कला विषयों में अब विविधता आ गयी व कलाकार व्यक्ति चित्रण के नजदीक आ गया। जेरिको नगर के उत्खनन में मानवशीर्षों की कुछ मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं।

ये मूर्तियाँ मानव की प्रत्यक्ष खोपड़ी पर प्लास्टर लगाकर बनायी गयी हैं व उनमें नैसर्गिक व्यक्ति शिल्पांकन का आभास है व शायद ये मूर्तियाँ उन लोगों के पूर्वजों की प्रति कृतियाँ होंगी।

जेरिको नगर मध्य पूर्वी एशिया में था जो मध्यपाषाणकालीन शिकारी मानव टोली द्वारा बसाया गया था व उसके चारों ओर विशाल संरक्षण दीवारें थी। कृषि का शीघ्र ही टर्की के अनाटोलिया प्रान्त में प्रसार हुआ व वहाँ ई. 6500 पूर्व कालीन सबसे बड़े नगर साताल ह्युयुक का विकास हुआ।

यहाँ के लोग जौ की खेती करते थे व कच्ची ईंटों के मकान बनाते थे। उनके मंदिरों में दीवारों पर प्लास्टर से गढ़ी हुई मातृदेवी की मूर्तियाँ मिली हैं। ये लोग मातृदेवी को जीवन, मृत्यु, कृषि व पशुओं की नियंत्रक शक्ति मानते थे। साताल ह्युयुक में सबसे प्राचीन वस्त्र प्राप्त हुए हैं।

उन वस्त्रों पर अंकित डिजाइन्स का अनुकरण अभी भी टर्की में बनाये जाने वाले कालीनों पर किया जाता है। जानवरों का शिकार वहाँ के लोगों का मुख्य व्यवसाय था । वहाँ के मंदिरों की दीवारों पर बैलों व हिरणों के शिकार के दृश्य अंकित हैं जो करीब ई. 5750 पूर्व प्राचीन हैं। बैलों की आकृतियों में लास्को एवं अल्ामिरा के बैलों की आकृतियों की स्वाभाविक सामर्थ्य व सजीवता का आभास है।

नवपाषाणकाल में ई. 7000 पूर्व से मिट्टी के बर्तन बनने लगे। बर्तनों पर ज्यामितीय अलंकरण व ज्यामितीय ढंग से बनायी मानवाकृतियाँ चित्रित की हैं। ऐसे सबसे प्राचीन चित्रित बर्तन दक्षिण पश्चिमी टर्की के सिसिलिया नगर में प्राप्त हुए हैं, जिन पर लाल मिट्टी से चित्रण किया गया है।

यहाँ की कला को ग्रीस के विश्वविख्यात, शास्त्र शुद्ध काले व लाल रंगों की आकृतियों में किये गये कलश चित्रण का उद्गम मानते हैं। बाद में प्रचलित हुए रंगीन – पॉलिश कार्य का इस समय प्रयोग शुरू नहीं हुआ था। अलंकरण लाल व काले रंगों की पतली परतों में किया जाता था।

टर्की के ही हाचीलार गाँव में प्राप्त मिट्टी के बरतनों पर बनायी आकृतियाँ (ई. स. 5500 पूर्व) अत्यधिक ज्यामितीय हैं व अलंकरण के अन्तर्गत चित्रित मानवाकृतियों को पृथक रूप से सरलता से नहीं पहचाना जा सकता।

वस्तु निरपेक्षत्व व ज्यामितीय नवपाषाणकाल की कला की प्रमुख विशेषताएँ थीं, क्योंकि इस कला का जन्म मुख्यतया मकानों की दीवारों को सजाने के उद्देश्य से हो गया था। लयबद्धता व पुनरावृत्ति इन दो प्रमुख कला तत्त्वों का आविष्कार अलंकरण प्रधान नवपाषाणकालीन कला की देन है।

Leave a Comment

15 Best Heart Touching Quotes 5 best ever jokes