ग्रीक कला | Greek Art

ग्रीक कला की आरम्भावस्था (ई.स. 1600 पूर्व से ई.स. 1120 पूर्व तक)

ग्रीस के इतिहास को तीन कालखण्डों में विभाजित किया गया है। ई.स. 3000 पूर्व से ई.स. 2000 पूर्व तक के काल को आरम्भिक हेलाडिक काल माना जाता है। इस काल में ग्रीस में कुछ ग्रीक लोगों से भिन्न जातियाँ बसी हुई थीं व उनकी लिपि का अब तक अर्थ निकालना सम्भव नहीं हुआ है।

ग्रीक भाषा भाषियों का ग्रीस में आगमन ई.स. 2000 वर्ष पूर्व हुआ व ई.स. 2000 पूर्व से ई.स. 1600 पूर्व तक के काल को मध्य हेलाडिक काल मानते हैं। ई.स. 1600 पूर्व से ग्रीक लोगों का क्रीटन लोगों से सम्पर्क शुरू हुआ। ई.स. 1600 पूर्व से ई.स. 1120 पूर्व तक का काल उत्तरी हेलाडिक काल माना गया है।

ई.स. 1600 पूर्व से ग्रीस का क्रीट से सांस्कृतिक सम्पर्क था, इसके कुछ प्रमाण मिले हैं। शायद इसी समय माइसीनी नगर का पहला राजमहल बनाया गया जो बाद में नष्ट हो गया। ट्राय नगर की खोज के छह साल बाद 1876 में श्लीमान ने राजपरिवार द्वारा बनवायें दो भूमिगत कब्रिस्तानों की खोज की जिसमें आश्चर्यजनक खजाना मिला जिससे होमर ने माइसीनी शहर की अपरिमित सम्पन्नता का वर्णन करके उसको जो सुवर्ण नगरी नाम दिया है उसकी यथार्थता का प्रमाण मिलता है।

खजाने में प्राप्त वस्तुओं से तत्कालीन ग्रीस कला, क्रीटन कला से किस तरह प्रभावित थी यह स्पष्ट होता है। कब्रों में तीन प्रस्तर पट्ट मिले हैं जिन पर युद्ध व शिकार के दृश्य उत्कीर्ण किये हैं। ऐसे विषयों का चित्रण क्रीटन कला में नहीं हुआ।

एक प्रस्तर पट्ट के ऊपरी हिस्से को कुण्डलीदार रेखाओं से अलंकृत किया है व निचले हिस्से में एक रथारोही व्यक्ति का चित्र है। सोने-चांदी के शुंग सदृश प्यालों के साथ जो प्राणियों के मुखाकार बनाये हैं वे मिनोअन कला के बैल व शेर जैसे धार्मिक पशु-चित्रों से मिलते-जुलते हैं।

सोनेरी जड़ाऊ काम में मिनोअन कला के सदृश प्राकृतिक दृश्य, फूल-पत्तियों व प्राणियों की आकृतियाँ हैं। एक जगह बिल्ली को पटेरा के सरकंडा में बतख का पीछा करते हुए दिखाया है और ऐसा ही दृश्य क्रीट के राजभवन के भिति चित्रों में है।

ऐसे होते हुए यहाँ की कला में ऐसे नये विषयों को लेकर कला निर्मिति हुईहै जो मिनोअन कला में नहीं दिखायी देते क्योंकि माइसीनियन लोगों को अक्सर युद्धग्रस्त होना पड़ता था व लड़ाई के दृश्य वहाँ विशेष लोकप्रिय थे।

एक अन्य श्रृंगाकृति प्याले पर नगर की घेराबन्दी का दृश्य है। मिनोअन कलाकृतियाँ आयात की जाती थीं व उनकी नकलें भी की जाती थीं। किन्तु शवों के लिए बनाये गये सोने के नकाबों में कठोर भावदर्शन हैं व वे सम्भवतः मिस्र के परिरक्षित शवों की कल्पना को ध्यान में रख कर बनाये गये हैं।

उत्तरी हेलाडिक काल को (ई.स. 1600 पूर्व से 1120 ई.स. पूर्व तक) माइसीनियन युग कहते हैं। इस काल में माइसिनी शहर का एजियन प्रदेशों पर नियंत्रण था व इटली के साथ यातायात भी हो रहा था। मिनोअन राजमहलों के विपरीत माइसीनियन राजमहलों में विशाल मध्यवर्ती राजभवन हुआ करता था।

इसके अतिरिक्त चारों ओर से किलेबन्दी हुआ करती थी। इस प्रकार के विशाल राजमहलों का निर्माण ट्राय, माइसिनी, नेस्टर आदि नगरों में हुआ। पाइलोस के राजमहल का सिंहासन भवन इतना विशाल था कि उसमें राजा के सरदार व योद्धा एक साथ बैठते थे। सिंहासन के दोनों तरफ ग्रीक पुराणों के ग्रिफिन प्राणी की भव्य आकृतियाँ चित्रित थीं जिनके नीचे शेरों के चित्र थे। ग्रिफिन की आकृतियाँ नोसास के राजमहल की आकृतियों के सदृश हैं।

मिनोअन एवं माइसीनियन राजमहलों के चित्रों के विषयों में काफी समानता है किन्तु माइसीनियन शैली की कुछ निजी विशेषताएँ हैं। उसकी आकृतियाँ कठोर व रूढ़िबद्ध हैं व उनमें नोसास महल की आकृतियों की स्वच्छन्दता व रमणीयत्व नहीं है।

प्रकृति एवं प्राणियों के चित्रण से ऐसा प्रतीत नहीं होता कि माइसेनियन कलाकारों ने उनको निजी अभिरुचि से चित्रित किया है बल्कि ऐसे लगता है कि शिकार के दृश्यों के लिए आवश्यक पार्श्व भूमि के रूप में उनका चित्रों में अंतर्भाव किया गया है। टिरिन्स के भित्ति चित्र में रथारूढ़ महिलाएँ शिकारी कुत्तों को जंगली सूअर का पीछा करते हुए देख रही हैं।

माइसीनियन लोगों के समान मिनोअन लोगों की युद्ध सम्बन्धी विषयों के चित्रण में रुचि नहीं थी। माइसिनी के एक महल के प्रकोष्ठ में युद्ध का दृश्य चित्रित किया है एवं सैनिकों व साइसों को घोड़ों को तैयार करते हुए दिखाया है।

माइसीनियन मृणपात्रों के आकार मिनोअन मृणपात्रों से भिन्न हैं व उत्तरी माइसीनियन काल में मृणपात्रों पर कहीं मानवाकृति चित्रण भी है। ई.स. 1200 पूर्व के एक माइसीनियन मृणपात्र पर एक महिला को सशस्त्र सैनिकों को विदा देते हुए चित्रित किया है। ई.स. पूर्व की तेरहवीं शताब्दी का काल एजियन प्रदेशों के लिए बहुत ही अशान्तिपूर्ण रहा और यही कारण है कि उस काल की माइसीनियन कलाकृतियों में युद्ध सम्बन्धी विषयों का प्राचुर्य है।

युद्धजन्य परिस्थिति के कारण माइसीनियन राजमहलों की किलेबन्दी हुआ करनी थी। इसी समय माइसिनी के प्रसिद्ध सिंहद्वार का निर्माण हुआ। यहाँ की शेरों की aakritiyan ग्रीक कला की स्मारकीय प्रस्तर मूर्तियों के सबसे आरम्भ के उदाहरण हैं।

रक्षात्मक प्रबन्धों के बावजूद माइसिनी, टिरिन्स, पाइलोस आदि नगरों का पतन हुआ व माइसीनियन सभ्यता एक अन्धकार-युग में विलीन हुई।

ग्रीक कला का पुनरुत्थान (ई.स. 800 पूर्व से ई.स. 600 पूर्व तक)

था जो सब माइसीनियन साम्राज्य के ई.स. 1200 पूर्व हुए पतन के साथ ग्रीस में अन्धकार युग शुरू हुआ व उस समय ग्रीस के उत्तरी प्रदेश के ग्रीक भाषा-भाषी डोरीयन लोगों ने दक्षिणी प्रदेशों पर आक्रमण किया। ई.स. पूर्व नौवीं शताब्दी से ग्रीक सभ्यता के विकास का आरम्भ हुआ।

माइसीनियन साम्राज्य अब ऐसे छोटे-छोटे नगर राज्यों में विभाजित हुआ एक-दूसरे से एक ही भाषा से जुड़े हुए थे। इसी भाषा के आधार पर बाद में सब नगर राज्यों के विलीनीकरण से ग्रीक साम्राज्य का उदय हुआ।

इनमें स्पार्टा, उत्तरी पोलोपोनीम प्रदेशों का प्रमुख नगर राज्य था व एथेन्स दक्षिणी द्वीप समूहों का प्रमुख नगर राज्य था। बोली व उपभाषाओं की भिन्नता के बावजूद ग्रीक प्रमुख भाषा थी व जीअस देवता के सम्मान में हर चार वर्ष में ओलिम्पिया में आयोजित किये जाने वाले ओलिम्पिक खेलकूद समारोह में केवल ग्रीक भाषा-भाषी लोग ही भाग ले सकते थे व अन्य भाषा-भाषी लोग असभ्य माने जाते थे।

इस खेलकूद समारोह का ग्रीस के राष्ट्रीय जीवन में बहुत महत्त्वपूर्ण स्थान था व उसका देश की संस्कृति व कला पर काफी प्रभाव पड़ा। इसी काल में होम्म ने अपने महाकाव्य इलियड व ओडिसी को लिखा जो माइसीनियन काल के ट्रोजन युद्ध से सम्बन्धित हैं।

ग्रीक सभ्यता का माइसीनियन सभ्यता से निकट का सम्बन्ध है क्योंकि वह उसी से विकसित हुई व दोनों की प्रमुख भाषा ग्रीक थी। इस काल में ओलिम्पियन देवताओं की मूर्तियों के सामने वेदिका पर भोजन सामग्री को जलाकर उपासना की जाती थी।

सामोस द्वीप की नदी में हिरा देवी की मूर्ति आकस्मिक रूप से प्राप्त हुई जिसके लिये एक विशाल मन्दिर ई.स. 800 पूर्व के करीब बनवाया गया। यह सबसे प्राचीन ग्रीक मन्दिर माना जाता है। डोरिक पद्धति का थेर्मान का अपोलो मन्दिर ई.स. 560 पूर्व के करीब बनवाया हुआ है।

माइसीनियन मृणपात्र कला बराबर चलती रही। अन्धकार युग में भी एथेन्स के केरामैकोस कब्रिस्तान में मृतात्मा को मृण्कलश अर्पित किये जाते थे। डोरिक आक्रमण से एथेन्स शहर सुरक्षित बचने के कारण वहाँ की माइसीनियन मृणपात्र कला शैली में कोई आकस्मिक परिवर्तन नहीं हुआ।

किन्तु धीरे-धीरे ई.स. पूर्व की ग्यारहवीं सदी की अवशिष्ट माइसीनियन शैली के शिथिल आकारों को ई.स. पूर्व की दसवीं सदी में ज्यामितीय शैली के सुनिश्चित आकारों का पूर्ववर्ती रूप स्पष्टतः प्राप्त होता गया। ई.स. पूर्व की नौवीं सदी में आट्टिका में ज्यामितीय शैली पूर्ण विकसित हुई व लगभग दो सदियों तक उस शैली के मृण्पात्र बनते रहे। इस शैली में समूचा कलश ज्यामितीय आकृतियों से अलंकृत किया जाता था।

ई.स. पूर्व की आठवीं सदी में बहुत बड़े आकार के कलश बनाये जाने लगे व कैरामैकोस के कब्रिस्तान में प्राप्त मृतक क्रिया से सम्बन्धित कलश 5 फीट से भी ऊँचे हैं। इसी काल में कलशों पर मानवाकृति युक्त दृश्य बनाने की प्रथा शुरू हुई। ये कलश अंत्येष्टि संस्कार में मृतात्मा को अर्पण करने हेतु बनाये जाते थे।

अतः इन पर अधिकतर शव यात्रा का दृश्य चित्रित किया जाता था। दृश्य पूर्णतया रूढ़िबद्ध ज्यामितीय शैली में बनाया जाता था। मानव का धड़ त्रिभुजाकार व शीर्ष वृत्ताकार बनाकर पूरी मानवाकृति एक से समतल रंग में चित्रित की जाती थी व सभी मानवाकृतियाँ एक जैसी दिखायी देती थीं।

कफन वस्त्र से ढकी हुई लाश भी अन्य मानवाकृतियों के समान स्पष्ट चित्रित की जाती थी। चित्रण प्रतीकात्मक व रूढ़िबद्ध ज्यामितीयता लिये होता था व कहीं भी नैसर्गिक रूप का आभास लेशमात्र दिखायी नहीं देता था।

डोरियन आक्रामकों ने एथेन्स को कभी अपना निवास स्थान नहीं बनाया। अतः अन्धकार युग से सबसे पहले उत्थान होने वाला नगर एथेन्स ही रहा। ग्रीक कला के ज्यामितीय काल (ई.स. पूर्व की नौवीं व आठवीं सदियाँ) की एथेन्स की मृणपात्र कला सबसे महत्त्वपूर्ण थी।

ई.स. पूर्व आठवीं सदी के एथेन्स के कलशों पर मानवाकृति युक्त एवं पौराणिक विषयों पर आधारित अलंकरण विशेष प्रचलित था। ई.स. पूर्व की सातवीं सदी में एथेन्स की मृणपात्रकला हासोन्मुख हुई। इस काल के कलश स्मारकीय रूप लिये हुए एवं कलात्मक हुआ करते थे किन्तु चित्रण में अब लापरवाही बरती जा रही थी व आकृतियों में सुनियोजन व स्पष्टता के पहले के गुणों का अभाव था।

एथेन्स के निकटवर्ती नगर एल्युसिस के एक कलश के मुख पर ओडिसियस को पोलिफेमस राक्षस की आँख में भाला घोंपते हुए और कलश के चारों ओर सर्प के समान बाल वाली पिशाचिनियों को पर्सियस का पीछा करते हुए चित्रित किया है।

चित्रण अपरिपक्व व घटिया है यद्यपि निर्भीक व द्रुतगति तूलिका संचालन के कारण विषय की भयानकता यथातथ्य व्यक्त हुई है। इसके विपरीत एक समकालीन कोरिंथियन कलश पर बांसुरी वाले के साथ सेना का युद्ध भूमि की ओर प्रयाण का जो दृश्य है उसकी आकृतियाँ सुस्पष्ट, वारीकियों के साथ व कुशलता से चित्रित की हैं।

ई.स. पूर्व की सातवीं सदी में पेलोपोनीस के स्पार्टा व कोरिथ शहर निकट के पूर्वी देशों से हो रहे व्यापार के कारण बहुत सम्पन्न हुए थे व एथेन्स का महत्त्व घट गया था। कोरिथियन मृणपात्र अधिक कलापूर्ण व ख्यातनाम हुए व उनका निकटवर्ती प्रदेशों में निर्यात होने लगा। उत्तरी सीरिया के अमीना नगर में काफी तादाद में कोरिथियन मृणपात्र प्राप्त हुए हैं।

ई.स. पूर्व की आठवीं सदी से ग्रीक कला पर पूर्ववर्ती कला का प्रभाव दिखाई देने लगा। एथेन्स के केरामैकोस कब्रिस्तान में प्राप्त बालिका की हाथीदाँत की मूर्ति स्पष्टतया फिनिशियन अस्तार्ते देवी की मूर्ति का अनुसरण करके बनायी है। किन्तु उसके उत्कीर्णन में अभी कुछ हिचकिचाहट है व देवी के पुष्ट शरीर सौन्दर्य का अभाव है।

ग्रीक कला के ज्यामितीय काल में छोटे आकार की अनेक कांस्य मूर्तियाँ बनी जो आकार में कलशों पर बनायी गयीं ज्यामितीय मानवाकृतियों के सदृश प्रतीत होती हैं। किन्तु ‘शिरस्त्राण निर्माता’ की इस काल की एक ऐसी अपवाद मात्र मूर्ति है जिसमें नैसर्गिकता व क्रियाशीलता की स्पष्ट अभिव्यक्ति है।

मिस्री कला के प्रभाव से मन्दिरों व मूर्तियों के निर्माण में प्रस्तर का प्रयोग ई.स. पूर्वी सातवीं सदी की ग्रीक कला के लिए नवीनता थी। आरम्भिक ग्रीक प्रस्तर मन्दिरों में से क्रीट के प्रिनियास नगर में बनाया मन्दिर विशेष प्रसिद्ध है। मन्दिर के द्वार मंडप एवं प्रवेश द्वार के ऊपरी हिस्से को शिल्पमालिका से अलंकृत किया है जिसमें घुड़सवार व जानवरों की आकृतियाँ खोदी हुई हैं।

प्रवेश द्वार के ऊपर दो देवियों की मूर्तियाँ एक-दूसरे के अभिमुख एवं मिस्री कला के सम्मिति सिद्धान्त का कठोर अनुपालन करके बनायी है। इस काल की ग्रीक मूर्तिकला शैली डायडालस नाम के मूर्तिकार के नाम पर डायडालिक हुए शैली नाम से पहचानी जाती है।

इस काल की ग्रीक मूर्तियों में क्रीट की मूर्तियां सबसे महत्त्वपूर्ण थीं किन्तु उसके साथ अन्य द्वीपों में एवं पेलोपोनिस प्रदेश में भी ऐसी मूर्तियों का निर्माण आरम्भ हुआ जो पृष्ठभागीय स्वरूप की थी। इनमें अधिकतर चोंगा पहने व कन्धे पर शाल ओढे हुए लड़कियों की खड़ी मूर्तियाँ एवं मुट्ठियों कस कर उत्साह के साथ आगे कदम रखते हुए युवकों की विवस्त्र मूर्तियाँ हैं।

मूर्तियों को आदर्श रूप में बनाया है व उनमें व्यक्तित्व दर्शन के प्रयास नहीं हैं। जिन उद्देश्यों को लेकर मूर्तियाँ बनायी गई। थीं उनमें साम्प्रदायिक प्रतिमाओं, देवताओं के सेवकों या मृतक स्मारकों के रूप में निर्माण जैसे उद्देश्य हैं। इन मूर्तियों की मुद्राएँ प्राचीन राजवंशीय शासनकाल की मिस्री मूर्तियों की मुद्राओं से मिलती-जुलती हैं किन्तु उनमें मिस्री मूर्तिकला में दिखायी देने वाले रमणीयत्व एवं मानव शरीर रचना शास्त्र के ज्ञान का अभाव है।

पुरातन ग्रीक कला

(लगभग ई.स. 600 पूर्व से ई.स. 500 पूर्व तक ) ज्यामितीय काल में एवं उसके पश्चात के कुछ पूर्वी कला से प्रभावित काल में ग्रीक कला का विकास मन्दगति से हुआ किन्तु ई.स. पूर्व की छठी शताब्दी में सर्जनात्मक निर्माण कार्य विशेष तेजी से किया गया। नये शिल्पकार्य से परिपूर्ण पत्थर के मन्दिर बनवाये गये व भूमध्य सागरीय प्रदेशों को ग्रीक मृण्पात्रों का निर्यात होने लगा।

मन्दिर वास्तुकला में डोरिक, आयोनियन व कोरिथियन शैलियाँ विकसित हुई व विशाल मन्दिर बनवाये गये। राजनीतिक परिवर्तनों के पश्चात् ई.स. पूर्व की छठी सदी में एथेन्स शहर की उन्नति होकर शिल्पकला क्षेत्र में उसको महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त हुआ। एथेन्स की किलेबन्दी किये हुए अॅक्रोपोलिस के पहाड़ी हिस्से में कई मन्दिर बनवाये गये। इन सब मन्दिरों को ई.स. 480 पूर्व में ईरानी आक्रामकों ने नष्ट कर दिया।

इन मन्दिरों के शिल्पों के भग्नावशेषों को एथेन्स के संग्रहालय में सुरक्षित रखा गया है जिनमें मन्दिर त्रिकोणिका पर बनाये तीन विशाल मूर्तिशिल्प सम्भवत: सौ फीट ऊँचे हेकाटोम्पेडोन मन्दिर की त्रिकोणिका के हैं। इन मूर्तिशिल्पों को काफी उन्नत उभार देकर बनाया है जिससे कलाकारों के त्रिमिति के अच्छे ज्ञान का परिचय होता है।

एथेन्स के शिल्पकार द्वारा बनायी शिल्पकृति मास्कोफोरोस में एक किसान को बछिये को बलि देने के लिए मन्दिर ले जाते हुए दिखाया है। आकारों में ज्यामितीय सरलीकरण के प्रयत्न हैं किन्तु किसान का चेहरा सतर्क व भावपूर्ण दिखाया है। इस समय ग्रीस के अनेक नगर अपनी विशिष्ट मूर्तिकला शैलियाँ विकसित करने में जुटे हुए थे।

डोरिक व आयोनियन शैलियाँ स्पष्ट रूप से भिन्न हैं। डोरिक शिल्प अधिक उदात्त व गम्भीर है। जबकि आयोनियन शिल्पकृतियाँ कल्पनारम्य व आलंकारिक होते हुए उनमें ओछापन है। आयोनियन मूर्तिकारों द्वारा बनायी दासियों की अनेक मूर्तियाँ अॅक्रोपोलिस के एथेना देवी के मन्दिरों को समर्पित की गई थीं।

ये सब उच्छृंखल लड़कियों की जैसी बनायी हैं जिनके लहरदार बाल कन्धों के ऊपर से नीचे फैल रहे हैं व जो अपनी पतली काया का प्रदर्शन करने के हेतु आकर्षक कसीदाकारी किये हुए पल्लों को अपने हाथों से उठाये हैं। इसके विपरीत एथेन्स की डोरियन ऊनी कुरता पहने हुए पेपलोस कोर युवती की मूर्ति मान-मर्यादा के साथ समर्पण के लिए हाथ ऊँचा किये गम्भीरता से खड़ी है।

आयोनियन मूर्ति की कृत्रिम आकर्षकता नहीं होते हुए युवती का चेहरा उल्लसित व प्रसन्न है। भाव दर्शन में युवावस्था की चुस्ती व परिपक्व विचारों के गाम्भीर्य का कलाकारों ने जो कुशलतापूर्ण समन्वय किया है उससे भविष्य की शास्त्रीय ग्रीक मूर्तिकला का पूर्वाभास मिलता है।

ई.स. पूर्व की छठी सदी में ग्रीक मूर्तिकला क्रमशः अधिक नैसर्गिकतावादी बनती गयी। कुरोस या विवस्त्र युवक की खड़ी मूर्तियाँ प्रचुरमात्रा में बनायी गयी। ये मूर्तियाँ इस वजह से लोकप्रिय थीं कि उनको अपोलो सम्प्रदाय की प्रतीकात्मक प्रतिमा तथा मन्नत के चढ़ावे का महत्त्व था।

युवक की अवस्थिति मिस्री मूर्ति के समान कठोर बनाते थे किन्तु उसके गढ़ने में मानव शरीर के यथार्थ दर्शन के प्रयास होते थे जो मिस्री मूर्तियों के सरलीकृत ज्यामितीय सूक्ष्म रूप के असदृश था। खेलकूद प्रतियोगिताओं का धार्मिक महत्त्व होने के कारण ग्रीक लोग सुगठित, बलिष्ठ एवं फुर्तीले मानव शरीर के विशेष पक्षपाती थे। उनकी आदर्श मानव शरीर सौन्दर्य की कल्पना इसी भावना पर आधारित थी।

अतः यह स्वाभाविक था कि आदर्श शारीरिक विकास से सम्पन्न मानवाकृतियों का सक्रिय चित्रण ग्रीक कला का प्रमुख ध्येय था। खेलकूद प्रतियोगिता ऑलिम्पिया में पेलोप्स के अंत्येष्टि समारोह पर उनके सम्मान में आयोजित की गई जिसका जीअस के सम्प्रदाय में अन्तर्भाव किया गया।

ई.स. 720 पूर्व के करीब एक दौड़ प्रतियोगिता के विजेता की लुंगी संयोग से गिर जाने से प्रतियोगिताएँ प्रतियोगियों को विवस्त्र करके सम्पन्न की जाने लगीं। अतः ग्रीक लोग विवस्त्र पुरुष शरीर को धार्मिक श्रद्धा व प्रशंसा की भावना से देखते थे व नग्नता को अश्लील नहीं मानते थे एवं शारीरिक क्षमता की दृष्टि से पूर्ण विकसित मानव देह समूची ग्रीक कला का आदर्श मापदण्ड बन गया था।

ई.स. 600 पूर्व के करीब बनायी पोसीडोन मन्दिर के सामने की सोयुनियन की युवक मूर्ति एवं समकालीन बहुसंख्य युवक मूर्तियाँ आकार में भव्य एवं ज्यामितीयता लिये हुए हैं। स्नायुओं के आकार केवल उत्कीर्ण रेखाओं में अंकित किये हैं तथा आँख व कान अनैसर्गिक दिखायी देते हैं।

करीब 60 वर्ष पश्चात् बनायी अनाविसोस की युवक मूर्ति उसी अवस्थिति में गढ़ी हुई है। उसके आकार में भव्यता नहीं है किन्तु इस मूर्ति से स्पष्ट होता है कि अब मूर्तिकार आँख, नाक, कान, जैसे मानव शरीर के भिन्न अंगों को निरीक्षण पूर्वक बनाने लगे थे यद्यपि बालों को आलंकारिक ढंग से उत्कीर्ण किया है।

मूर्ति की सतह पर मानव त्वचा की मृदुता का प्रभाव है। उसी सदी के अन्त के करीब ग्रीक मूर्तिकार युवक मूर्तियों में अवशिष्ट कठोरता को समाप्त करने में सफल हुए व कांसे की खोखली मूर्तियाँ भी ढालने लगे। पिराअस की युवक मूर्ति अपोलो देवता की है जिसके मुड़े हुए बायें हाथ में धनुष है।

पहले की कृत्रिम ढंग की सम्मुख एकटक निगाह के स्थान पर आँखें कुछ नीचे की ओर दृष्टिक्षेप किये हुए हैं जैसे कि देवता उपासक की ओर देख रहे हैं। देवता सहज भाव से खड़े हैं व उनके लहरदार बाल कन्धों पर बिखरे हुए हैं। शरीर का स्नायविक गठन नैसर्गिक है।

पूर्वी कलाकारों ने देवताओं की मूर्तियों को रूढ़िबद्ध अतिमानवीय रूप देकर एवं निर्धारित मुद्राओं में बनाया है जबकि ग्रीक कलाकारों ने देवी-देवताओं की मूर्तियों मुद्रा को मानव शरीर के आदर्श रूप में एवं मानव सुलभ मुद्राओं में बनाया है। डेल्फी के सिफनीयन खजाने के भवन में जो सुरासुर युद्ध का दृश्य खोदा है उसमें देवताओं व मानवों की आकृतियों में कुछ भी अन्तर नहीं है।

पुरातन ग्रीक मूर्तिकारों ने अधिकतर कठोर में स्थित खड़ी मूर्तियाँ बनायी जिनके प्रतिनिधिक उदाहरण हैं ‘सामोस की हिरा देवी’ की मूर्ति एवं न्यूयॉर्क के मेट्रोपोलिटन संग्रहालय में रखी हुई अपोलो की मूर्ति । हिरा देवी की मूर्ति में नैसर्गिकता का अभाव है यद्यपि शरीर के हाथ-पैर जैसे अंगों का प्रतीकात्मक दृष्टि से अंतभाव किया है।

मूर्ति तथा अलंकारों में अधिकतर आलंकारिक रूप प्रदर्शन है व देवी के खड़े रहने का ढंग कृत्रिम व कठोर है। आपोलो की बायाँ पाँव आगे रख कर खड़े रहने की मुद्रा, अग्रदृष्टि, पतली कमर, कसी हुई मुष्टियाँ स्पष्ट रूप से ग्रीक कला पर हुए मिश्री प्रभाव को प्रमाणित करती हैं। किन्तु ग्रीक मानव मूर्तियाँ विवस्त्र हैं व मानव शरीर रचना शास्त्र के ज्ञान के अभाव में सख्त बनी हैं।

मिस्री मूर्तियों के रूढ़िबद्ध आकार सौन्दर्य का भी इनमें अभाव है। किन्तु इसके साथ यह भी प्रतीत होता है कि ग्रीक मूर्तिकारों ने मिश्री कला की परम्परागत रूढ़ि को तोड़कर मानव शरीर का प्रत्यक्ष निरीक्षण करके नैसर्गिक रूप सौन्दर्य को प्रस्तुत करने की दिशा में प्रयत्नशील होने को आरम्भ किया है।

नैसर्गिकतावाद के आरम्भिक असफल प्रयत्नों के उदाहरण के रूप में सेलीनुंट मन्दिर का उभारदार शिल्प ‘मेदुसा में उत्पीड़न व वध’ अभ्यसनीय है। पुरातन काल के अन्तिम चरणों में ग्रीक कला ने नैसर्गिक रूपांकन पर काफी प्रभुत्व प्राप्त किया जिसके उदाहरण हैं ‘यूथिडिकोस का समर्पण’ एवं मरणोन्मुख योद्धा की मूर्तियाँ जिनमें मानव शरीर की पतनोन्मुख अवस्थिति में शरीर के भिन्न अवयवों के पारस्परिक गंत्यनुगतित्व, स्नायविक हलचल एवं भावाभिव्यक्ति का प्रभावी दर्शन है। इन मूर्तियों में भविष्य की शास्त्रीय कला के पूर्व चिह्न स्पष्टतया दृष्टिगोचर हैं।

पुरातन ग्रीक कला व शास्त्रीय ग्रीक कला के संक्रमणावस्था काल की मूर्तियों में ‘डेल्फी का सारथी’ की मूर्ति एवं ऑलिम्पिया के जीयस मन्दिर की त्रिकोणिका पर बनाया सामूहिक मूर्तिशिल्प प्रसिद्ध है। संक्रमणावस्था काल की (480 ई.पू. से ई.स. 450 वर्ष तक) ग्रीक कला पुरातन ग्रीक कला की अपेक्षा नैसर्गिकतावाद के अधिक निकट आ गई व मानव शरीर के प्रत्यक्ष अध्ययन का महत्त्व भी बढ़ता गया।

अब नैसर्गिकतावादी ग्रीक कला को आदर्शवादी सूक्ष्म रूप देने का कार्य शेष रहा जो शास्त्रीय ग्रीक काल (ई.पू. 450 पूर्व से ई.पू. 400 तक) में पूर्ण किया गया। यह काल ग्रीक कला का सुवर्णयुग माना जाता है।

ई.स. पूर्व की छठी शताब्दी में एथेन्स की मृणपात्र कला ने उत्कर्ष का सर्वोच्च स्थान प्राप्त कर लिया था। मृण्पात्रों पर किये जाने वाले चित्रण में भी मानवाकृतियों के प्रति अभिरुचि अधिकाधिक बढ़ती गयी। एथेन्स के मृणपात्र चित्रकारों ने कृष्णाकृति शैली को कोरिंथियन कलाकारों से अपनाया व उसको निजी विशेषताओं से सम्पन्न करके स्पष्टतया भिन्न, स्मारकीय श्रेष्ठतायुक्त रूप प्रदान किया।

इस शैली के आरम्भ कालीन मुण्पात्रों में फ्रान्स्वा कलश प्रसिद्ध है। उसके नीचे मृण्पात्रकार एगोटिमोस व चित्रकार क्लेइटियास के हस्ताक्षर हैं। यह कलश अनेक ग्रीक कलशों के साथ एरिया में कियसी के कब्रिस्तान में पाया गया जिससे, ई.स. 570 पूर्व से ही एथेन्स के मृणपात्र कितने लोकप्रिय थे व उनका कितना प्रचुर निर्यात होता था, यह विदित होता है। यह पात्र शराब व पानी का मिश्रण तैयार करने के उपयोग का था व उसके हत्थे कुण्डली के आकार के थे।

इसके पृष्ठभाग को पट्टियों में विभाजित करके उन पर कोरिन्थियन प्रभाव की करीब दो सौ आकृतियाँ चित्रित हैं। आकृतियों से एथेन्स की मृणपात्र कला के विषयों की विविधता का परिचय होता है। सबसे ऊपरी पट्टी पर थेसिअस की क्रीट से वापसी व जंगली सूअर के शिकार का दृश्य है। उसके नीचे किन्नरों (Centaurs) व लापिथ्स की लड़ाई का दृश्य है।

सबसे चौड़ी प्रमुख पट्टी पर पेलियस व थेटिस के विवाह समारोह का दृश्य है। आकृतियों की भीड़-भाड़ के कारण संयोजन में त्रुटियाँ हैं किन्तु प्रत्येक आकृति का चित्रण सजीव व गतिपूर्ण है तथा दुःखद व सुखद घटनाओं को समान स्थान दिया है। कृष्णाकृति शैली का चरमोत्कर्ष एक्सेकियास की कला में दिखायी देता है।

उसने आकृतियों की संख्या को घटा दिया व कुछ ही आकृतियों को लेकर उनको सरलीकृत व स्पष्ट रूप में चित्रित किया। उसके द्वारा चित्रित वल्ची के कब्रिस्तान का दो हत्था कलश प्रसिद्ध है। कलश के एक तरफ लीडा व टिण्डारी ओस को अपने पुत्रों का स्वागत करते हुए चित्रित किया है व दूसरी तरफ आकिलीस व आजाक्स को पाँसे खेलते हुए दिखाया है।

कृष्णाकृति शैली का प्रभाव अधिकतर आलंकारिक हुआ करता था। अतः अधिक नैसर्गिक प्रभावोत्पादन के उद्देश्य से बाद के मृणपात्र कलाकारों ने काले रंग की पार्श्व भूमि पर नैसर्गिक लाल रंग में आकृतियों को चित्रित करना आरम्भ किया। रक्ताकृति शैली का आविष्कार चित्रकार एण्डोकिडीस ने किया। उसने दोनों शैलियों में काम किया।

दोनों शैलियाँ करीब समान रूप से कुछ समय तक प्रचलित रहीं। अधिक नैसर्गिकता के कारण रक्ताकृति शैली बाद में अधिक लोकप्रिय हो गयी।

ग्रीक मृणपात्रों की चित्रकला पर मूर्तिकला का गहरा प्रभाव था व उसमें भी मूर्तियों के सदृश नैसर्गिक बलिष्ठ आदर्श शरीर से सम्पन्न मानवाकृतियों को सबसे प्रमुख स्थान दिया जाता था। ओल्टोस द्वारा चित्रित रक्ताकृति शैली के प्याले के भीतरी हिस्से पर एक वृत्ताकार में एक योद्धा की आकृति है।

बाहर एक तरफ डायोनियस को चार घोड़ों के रथ पर आरूढ़ दिखाया है व दूसरी तरफ सिंहासन स्थित जीअस के आसपास देवताओं को सम्भाषण करते हुए चित्रित किया है। ई.स. पूर्व की छठी सदी के अन्त के करीब युफोनियस नाम के महान चित्रकार ने ग्रीक मृणपात्रों पर श्रेष्ठ दर्जे के चित्र बनाये।

एक्सेकियास के समान उसने चित्रण के लिये भिन्न विषयों को चुना। म्युनिख के संग्रहालय में रखे हुए प्याले पर उसके द्वारा बनाये चित्र ग्रीक मृात्र चित्रकला के श्रेष्ठ उदाहरण हैं। प्याले के बाहरी पृष्ठभाग पर हिराक्लीज के परिश्रम व कहानी का चित्र है जिसमें उसको गेरिओन के पशुओं को भगा ले जाते हुए दिखाया है।

मानवाकृतियों के स्नायुओं का चित्रण अभ्यासपूर्ण व स्पष्ट है। भीतरी हिस्से पर एक युवा घुड़सवार का वृत्ताकार में चित्र है। घुड़सवार का शरीर सौष्ठव जानवर की सुडौल आकृति व सम्पूर्ण चित्र का आलंकारिक प्रभाव इन सबका कुशलता से सामन्जस्यपूर्वक अन्तर्भाव किया है।

ग्रीक कलश चित्रों की कलात्मकता व श्रेष्ठता इस बात में है कि वे स्वयं उत्कृष्ट कलाकृतियाँ होकर उनमें कलशों के आकार-सौन्दर्य को बढ़ावा मिलता है। ग्रीक कलश चित्रांकन पद्धति नव पाषाणकालीन पद्धति का ही विकसित रूप थी किन्तु ग्रीक कलाकारों की शैली पूर्ण रूप से भिन्न थी व ग्रीक रक्ताकृति शैली के नैसर्गिक रूप पर आधारित आदर्शवादी चित्रण में भाव की शास्त्रशुद्ध कला के पूर्व चिह्न प्रतीत होते हैं।

शास्त्रीय ग्रीक कला सदी(लगभग ई.स. 500 पूर्व से ई.स. 431 पूर्व तक )

ई.स. 480 पूर्व ईरानी आक्रमणों ने ग्रीक सेना को हरा कर एथेन्स शहर नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। इसके पश्चात् कुछ समय के बाद संयुक्त ग्रीक सेना ने संघर्ष करके ईरानी आक्रमणों को ग्रीस से परास्त कर दिया। इस संघर्ष के दौरान समूचे ग्रीस में एक राष्ट्रीयत्व की भावना जागृत हुई व उसके परिणामस्वरूप ग्रीक सभ्यता ने पुराने कास्ययुगान सभ्यता के प्रभावों से ऊपर उठ कर नयी दिशा अपनायी।

ग्रीक कला में एक नया आत्मविश्वास उत्पन्न हुआ। ग्रीक मन्दिर वास्तुकला में नये परिवर्तन आ गये। नयी मूर्तिकला में राष्ट्राभिमान की भावना प्रतीत होने लगी यद्यपि मूर्तिकारों ने जगह-जगह स्थानीय संदर्भों का आश्रय लिया है।

ऑलिम्पिया के जीयस मन्दिर की शिल्पमालिका के अन्तर्गत जो बारह खण्ड हैं, उन पर हिराक्लीज के परिश्रम की स्थानीय कहानी के दृश्य उनके राष्ट्रीय महत्त्व के विचार को सम्मुख रख कर खोदे हुए हैं।

इन शिल्पों को मानव शरीर के अवयवों व स्नायुओं को गतिविधियों का चिकित्सापूर्वक मार्मिक निरीक्षण करके बनाया है। एक खण्ड में हिराक्लीज विश्व को उठाये हुए है व एटलास हेस्पिरीडीज से सोने के सेव ला रहा है। हिराक्लीज के परिश्रम को सुसह्य करने के हेतु एथेना एक हाथ से उसका बोझ उठाने में सहायता कर रही है।

एथेना के वस्त्रों की सलवटें उसकी शारीरिक हलचल की लयबद्धता से समन्वित व सरलीकृत बनायी हैं। मन्दिर की पूर्वी त्रिकोणिका पर रथारोही पेलोप्स व आइनोमाओस की दौड़ प्रतियोगिता का दृश्य शिल्पांकित किया है व पश्चिमी हिस्से पर पिरिथुस के विवाह |

समारोह पर लापिथ्स व सेन्टार्स (किन्नर) के बीच हुए संघर्ष का दृश्य है। संघर्ष का निर्देशन | करने वाले मध्यवर्ती अपोलो की अविचलित विश्वासपूर्ण मुद्रा एवं संघर्ष करने वालों की आवेशपूर्ण मुद्राएँ प्रभावी ढंग से व्यक्त की हैं। इस समय तक की ग्रीक मूर्तिकला मानव शरीर व उसकी गतिविधियों का यथार्थ दर्शन एवं मानवीय भावनाओं की सफल अभिव्यक्ति के विचार से काफी विकसित हो चुकी थी।

ई.स. पूर्व पाँचवीं सदी के ग्रीक मूर्तिकारों ने अपना ध्यान मुख्य रूप से क्रियाशील मानव शरीर की गतिविधियों के यथातथ्य दर्शन पर केन्द्रित किया था व यह काल ग्रीक शास्त्रीय कला का स्वर्णयुग माना जाता है। उन्होंने देवताओं व मानवों के शरीर सौष्ठव में कोई अन्तर नहीं रखा।

त्रिशूल परीक्षण करते हुए दिखायी गई देवता पोसैडोन की मूर्ति भाला फेंकने वाले कसरती व्यक्ति के सदृश प्रतीत होती है। पोसैडोन की लक्ष्य की ओर एकाग्रदृष्टि बाँया पाँव आगे रख के कुछ पछि झुक कर दृढ़तापूर्वक खड़े होने का ढंग, बलिष्ठ भुजाओ की त्रिशूल प्रक्षेपण की शास्त्रशुद्ध गतिविधि, सब कुछ यथातथ्य अंकित किया है।

इतिहासकार प्लिनी के अनुसार इ.स. पूर्व पाँचवीं सदी की आरम्भकालीन मूर्तियों की मुद्राओं से कठोरता को हटाकर उनको लयबद्ध बनाने का श्रेय मूर्तिकार मायरोन को दिया जाना चाहिये। उसकी सबसे प्रसिद्ध मूर्ति चक्का फेंकने वाला नष्ट हो गयी किन्तु उसकी रोमन मूर्तिकारों द्वारा की गयी कुछ प्रतिकृतियाँ उपलब्ध हैं। चक्का फेंकने के पहले शरीर की तनावपूर्ण केन्द्रित अवस्थिति को मायरोन ने विषय के रूप में चुना है।

चक्का पकड़े हुए स्थिति, पीछे की ओर उठाकर बलपूर्वक कसा हुआ कसरती दायां हाथ, उसको सन्तुलित करने के लिए घुटने के सहारे मुड़ा हुआ बायां हाथ व उन दोनों के बीच गतित्व की आरम्भिक स्थिति में भूमि पर दबाव देकर कुछ पृथक रखी हुई टाँगों पर कसरती का शरीर कुल मिलाकर धनुष से निकलने की अवस्था में तीर जैसा लगता है।

इस विश्व विख्यात मूर्ति के द्वारा कलाकार ने बल व गति के बीच की आरम्भिक तनावपूर्ण विस्फोटक चैतन्यपूर्ण लयबद्ध स्थिति को साकार किया है। कसरती के नैसर्गिक रूप सौष्ठव का सम्पूर्ण प्रभाव अत्यधिक अमूर्त है।

मायरोन ने जानवरों की भी मूर्तियाँ बनायी व उनमें से उसकी एथेन्स की गाय की मूर्ति सबसे लोकप्रिय थी। इस काल का एक अन्य विख्यात मूर्तिकार था पोलिक्लेटास जो अधिकतर काँसे की मूर्तियाँ बनाता था। उसकी सबसे श्रेष्ठ कृति थी डोरिफोरोस की काँस्यमूर्ति जिसकी अनेक रोमन प्रतिकृतियाँ उपलब्ध हैं।

यह मूर्ति भालाधारी नाम से प्रसिद्ध है। यह एक युवक की मूर्ति है जो अपने बायें हाथ से कन्धे पर भाला रखे हुए है। बायां पैर उंगलियों पर जमीन से कुछ उठा हुआ है व शरीर का भार जमीन पर टिके हुए दायें पैर पर है व उसके कारण कमर, कन्धा व गर्दन शरीर का स्वाभाविक सन्तुलन सम्भालने के लिये एक-दूसरे के विपरीत यथोचित झुके हुए हैं व युवक की खड़ी मुद्रा नितान्त वास्तविक प्रतीत होती है।

इस मूर्ति की उसके करीब 40 वर्ष पूर्व बनायी गयी संगमरमर की मूर्ति ‘क्रीटन लड़का’ से तुलना करने पर स्पष्ट होता है कि पोलिक्लेटास ने डोरिफोरोस की मूर्ति को मानव शरीर की नैसर्गिकता व मुद्रा की स्वाभाविकता प्रदान करने में कितना असाधारण प्रभुत्व व्यक्त किया है।

मूर्ति के भिन्न अंगों को बनाते समय पोलिक्लेटास ने अवश्य ही उनके आपसी अनुपात का गहरा अध्ययन किया होगा। उसी प्रकार उसने शरीर की प्रत्येक क्रिया में भिन्न अवयवों का एक दूसरे पर होने वाला परिणाम, स्नायविक गतिविधियों का पारस्परिक सम्बन्ध, इनका अच्छा निरीक्षण किया होगा।

पोलिक्लेटास ने ‘अनुपात के सिद्धान्त’ नाम की पुस्तक लिखी थी व अपने सिद्धान्तों को समझाने के लिये अपनी एक मूर्ति – सम्भवतः डोरिफोरोस – का उदाहरण के रूप में 1 विवरण किया था। यह पुस्तक कहीं उपलब्ध नहीं है किन्तु उस पुस्तक में प्रतिपादित सिद्धान्तों की रूपरेखा रोमन पुस्तकों की सहायता से अवगत की गई है।

इन पुस्तकों से ऐसा प्रतीत होता है कि पोलिक्लेटास का यह प्रतिपादन था कि आकृति का पूर्णत्व करीब बहुअनुपातिक है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि सम्भवतः उसका यह सिद्धान्त था कि ज्यामिति पर आधारित होते हुए भी सर्वोच्च पूर्णत्व के लिये मानवाकृति का उदात्तीकरण अनिवार्य है।

ई.स. पूर्व की पाँचवीं सदी की ग्रीक मूर्तिकला का ध्यान प्राय: एक ही विषय ^पर केन्द्रित था जो था आदर्श मानव शरीर ऑलिम्पिया की देवताओं की मूर्तियाँ भी आदर्श मानव शरीर व मानवीय भावनाओं से सम्पन्न बनायी गई हैं। ग्रीक विचारधारा के अनुसार हिराक्लीज जैसे असाधारण मानवों में ऐसी क्षमता थी जिससे वे देवता का स्थान ग्रहण कर सकते थे।

एथेन्स के दार्शनिक प्रोटागोरास ने मत व्यक्त किया है कि “मानव में अवश्य ही दैवी अंश होगा क्योंकि वही एक ऐसा प्राणी है जो ईश्वर का विश्वास करता है”। उसने निर्णायक रूप में प्रतिपादित किया है कि ‘मानव ही सबका मापदण्ड है (Man is the measure of all things)।’ ग्रीक कलाकारों की अभिरुचि मानवता व मानव शरीर रचना में थी न कि व्यक्तिगत मानव में।

प्रमुख ग्रीक कलाकारों ने कला सम्बन्धी सिद्धान्तों पर ग्रंथ लिखे थे जो अब उपलब्ध नहीं हैं। उन सिद्धान्तों ने प्लेटो व आरिस्टाटल के कला सम्बन्धी विचारों को जरूर प्रभावित किया होगा। दोनों ने कला को अनुकरण माना है किन्तु उन्होंने अनुकरण शब्द का प्रयोग सादृश्य के अर्थ में नहीं किया है।

दोनों का विश्वास था कि केवल सादृश्य के बल पर ही शिल्पकृति को कलात्मक मूल्य प्राप्त नहीं हो सकता। परिवर्तनशील दृश्य रूप के पीछे अपरिवर्तनशील आकार सौन्दर्य के कुछ मूल तत्त्व होते हैं जिनका ज्ञान बाह्येद्रियों को नहीं होता बल्कि उनको बौद्धिक चिन्तन से आत्मसात करके कलाकृति की निर्मिति की जानी चाहिए।

सच्चा कलाकार दृश्यरूप का प्रतिकृति नहीं करता बल्कि वह आदर्श आकार सौन्दर्य का निर्माता होता है। अतः ग्रीक कलाकार व्यक्तिगत मानव के सादृश्य की जगह पूर्ण विकसित मानव तथा आदर्श मानव शरीर से सम्पन्न देवता के रूपांकन में अभिरुचि क्यों रखते थे इसका प्लेटो व आरिस्टाटल के सौन्दर्यशास्त्र में स्पष्टीकरण मिलता है।

साक्रेटिस ने चित्रकार पारासिओस से कहा था कि यदि तुम सौन्दर्य को प्रतिमित करना चाहते हो तो उसके लिये आदर्श शरीर से सम्पन्न एक ही व्यक्ति का मिलना इतना असम्भव है कि तुम्हें अनेक व्यक्तियों को देखकर उनसे सौन्दर्य के भिन्न मानकों को चुन कर उनको समन्वित करके प्रतिमा निर्माण करना होगा।

प्लेटो ने भी सौन्दर्य के बारे में अपना निश्चित विचार प्रकट किया है कि “मात्रा व अनुपात के औचित्य व उत्कृष्टता से निश्चय ही श्रेष्ठ सौन्दर्य का जन्म होता है”। प्लाटिनस ने इस विचार को निम्न शब्दों में दोहराया है “दृश्य वस्तुओं में जो वस्तु सम्मितियुक्त व अनुपातबद्ध है वह है सुन्दर होती है”। संक्षेप में, सम्पूर्ण शास्त्रीय ग्रीक कला ज्यामितिनिष्ठ थी, जिसके कारण वह स्फटिकीय स्पष्टता लिये हुए निर्दोष आकार सौन्दर्य को जन्म दे सकी।

उपलब्ध साहित्यिक आधारों पर ऐसे प्रतीत होता है कि प्राचीन कर्ला-मर्मज्ञों के मतानुसार ग्रीस का सर्वश्रेष्ठ कलाकार फिडियास था। फिडियास द्वारा बनायी एथेना पार्थेनास की मूर्ति—जिसके लिये पार्थेनान मन्दिर का निर्माण हुआ व ऑलिम्पिया के जीयस-मन्दिर की आसनस्थ जीयस की मूर्ति के कारण वह विशेष ख्यातनाम हुआ।

दोनों मूर्तियाँ विशाल व लगभग चालीस फीट ऊँची थी व उनमें सोने व हाथीदाँत का इस्तेमाल हुआ था। कहीं कीमती हीरे व मणियों का जड़ाऊ काम था। पौसानियास ने अपनी पुस्तक ‘ग्रीस का वर्णन’ में एथेना की मूर्ति का वर्णन दिया है। उसी प्रकार प्लिनी व प्ल्यूटार्क की पुस्तकों में भी एथेना की विशेष जानकारी मिलती है।

यह मूर्ति ई.स. की पाँचवीं सदी में घटित अग्निकाण्ड में नष्ट फिडियास की अन्य प्रसिद्ध मूर्तियों में एथेना लेम्निया की काँसे की मूर्ति थी जो अक्रोपोलिस की पहाड़ी पर रखी गयी थी। सुन्दर युवती की आकर्षक मुखाकृति को आदर्श रूप देकर इस मूर्ति का निर्माण किया गया था। पौसानियास के मतानुसार फिडियास की यह सर्वोत्कृष्ट कलाकृति थी।

प्लुसियन ने भी स्पष्ट किया था कि फिडियास की कृतियों में से उसको एथेना लेम्निया की मूर्ति सबसे अधिक पसन्द है। कुछ कलामर्मज्ञों ने लेम्निया की मूर्ति को प्राक्सीटेलीस की प्रसिद्ध मूर्ति अफ्रोडाइट से भी श्रेष्ठ माना है। जो कुछ भी हो यह मूर्ति एक साक्षात् काव्य था व उसमें चिन्तनशील गाम्भीर्य व अलौकिक आकर्षण का सुन्दर मिलाप था।

इस मूर्ति को नैसर्गिकतावाद के सिद्धान्तों के अन्तर्गत यथोचित रूप से नहीं बिठाया जा सकता इतना उसका रूप दिव्यत्व से ओत-प्रोत था।

ई.स. 480 पूर्व में ईरानी आक्रामकों ने अक्रोपोलिस व एथेन्स को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया। एक वर्ष पश्चात् ईरानी आक्रामकों को पराभूत करके ग्रीस ने अपने पुनरुत्थान कार्य को आरम्भ किया। अक्रोपोलिस में नये मन्दिरों का जो निर्माण हुआ उसमें आकर्षकता के साथ संयम व सादगी के विचार को अधिक महत्त्व दिया गया।

अक्रोपोलिस के पुनर्निर्माण का उत्तरदायित्व प्रसिद्ध मूर्तिकार फिडियास को सौंपा गया। उसने एथेना पार्थोनोस देवी की मूर्ति के मन्दिर की पुनर्रचना के लिए रूपरेखा बनायी। नया पार्थेनोन मन्दिर करीब पुराने मन्दिर की नींव पर ही बनाया गया यद्यपि उसमें कई परिवर्तनों को समाविष्ट किया गया के दृश्य था।

फिडियास द्वारा निर्मित साम्प्रदायिक देवता मूर्तियों के आदर्श सौन्दर्य की कल्पना ने ग्रीस व रोम की देवता मूर्ति निर्माण पर अमिट प्रभाव छोड़ा। किन्तु यह भी एक विरोधाभास युक्त सत्य है कि फिडियास ने कहीं-कहीं अपनी शिल्प कृतियों में व्यक्ति चित्रण का भी सहारा लिया है।

एथेना देवी की मूर्ति की ढाल पर अंकित वीरांगनाओं के युद्ध में जो एक वृद्ध की आकृति थी वह उसका स्वयं का व्यक्ति चित्र था, ऐसा मानते हैं। इसकी प्रतिकृति ब्रिटिश संग्रहालय में सुरक्षित है, यद्यपि फिडियास की सब मूल कृतियाँ नष्ट हो चुकी हैं।

फिडियास मुख्यतया काँसे की मूर्तियाँ बनाता था व पार्थेनान की मूर्तिकला की निर्मिति सब उसी के निर्देशन में हुई। सबसे प्रथम 92 मूर्ति दृश्यों की निर्मिति हुई जो पौराणिक देवता, दानव, वीरांगना, सेंटार्स आदि के बीच के युद्ध सम्बन्धी विषयों पर आधारित है। बाहर की दीवारों पर आयोनिक पद्धति के मूर्तिशिल्पों की मालिका है।

जिसमें समकालीन दृश्यों को अंकित किया है। प्रवेश मंडप में बारह ऑलिम्पियन देवताओं की आसनस्थ मूर्तियों को भिन्न मुद्राओं में तथा भिन्न भावों को दर्शाते हुए अंकित किया है जिनमें पोसैडोन, अपोलो व आर्टेसिस की मूर्तियाँ हैं।

ई.स. पूर्व की छठी सदी के ग्रीक कलाकार रेखात्मक पद्धति से वस्त्रों की सलवटों का प्रभाव दर्शाते थे जबकि ई.स. पूर्व की पाँचवीं सदी के पार्थेनान के कलाकारों ने अधिक निरीक्षणपूर्वक वस्त्रों का नैसर्गिक प्रभाव दर्शाने में सफलता प्राप्त की।

पार्थेनान की त्रिकोणिका (Pediment) में बनाये मूर्तिशिल्प या तो नष्ट हुए या काफी क्षतिग्रस्त हुए। किन्तु रोमन प्रतिकृतियों तथा जाक कारे (फ्रांसीसी जोकि 1674 में यहाँ आया था) द्वारा बनाये रेखाचित्रों से उनके बारे में पर्याप्त कल्पना मिलती है। उसके पूर्वी त्रिकोणिका पर एथेना देवी के जन्म का दृश्य था ।

मध्यवर्ती हिस्से में बनायी मूर्तिशिल्प का एक हिस्सा ब्रिटिश संग्रहालय में है जिसमें डेमिटर, पर्सिफोन व एक संदेश वाहक की मूर्तियाँ हैं। पश्चिमी त्रिकोणिका पर पोसैडोन के अट्टिका प्रदेश के लिए हुए संघर्ष के दृश्य का संयोजन है। आकृतियों में सौम्यता व गतित्व है जिनके सामने पोलिक्लेटस की आकृतियाँ कुछ सख्त प्रतीत होती हैं।

शारीरिक गति का वस्त्रों की हलचल पर हुए प्रभाव का भी कुशलता से अंकन किया है। वस्त्रों की हलचल व रचना के, शारीरिक गति, आकार व भाव मुद्रा के यथार्थ दर्शन के विचार से महत्त्व को प्रथम फिडियास ने पहचाना। प्रत्येक

त्रिकोणक (Pediment) का मध्यवर्ती हिस्सा चैतन्य का विस्फोटक उद्गम जैसा प्रतीत होना है जैसे कि वहाँ से प्रसारित गति लहरियों से हर आकृति सचेत हुई है व एक ही लय में बंधी हुई सभी आकृतियाँ पूरे दृश्य में एकात्म रूप से संयोजित हुई हैं।

ई.स. पूर्व चौथी सदी की ग्रीक कला ई.स. पूर्व चौथी सदी की ग्रीक कला में व उसके पहले की ग्रीक कला में मौलिक अन्तर है। पेलोपोनेशियन युद्ध (431-404 ई.पू.) से ग्रीस में अशान्ति का साम्राज्य फैल गया। राजनीतिक अस्थिरता बनी रही। ग्रीस पर स्पाटों का आधिपत्य, स्पार्टा के विरोध में एथेन्स की जनता का संगठन, कुछ समय तक थीब्ज का शासन व अन्त में मासिडोनियन साम्राज्य का उदय इस सदी के ग्रीस का ऐतिहासिक घटनाक्रम था।

उपर्युक्त परिस्थिति के कारण आयोनिआ को छोड़कर विशाल सार्वजनिक भवनों का निर्माण कहीं नहीं हुआ। किन्तु, इस काल के ग्रीस में प्रतिभा का अभाव नहीं था। प्लेटो ॲरिस्टॉटल जैसे दार्शनिक हुए। कुछ श्रेष्ठ कलाकारों ने भी कलानिर्मिति की किन्तु वह शैली में भिन्न व अधिक अन्तर्मुखी व व्यक्तिवादी थी।

मन्दिरों का निर्माण नहीं होने के कारण भव्य साम्प्रदायिक मूर्तियाँ बनायी नहीं गयीं व कला के विषयों में कुछ स्पष्ट परिवर्तन आ गया। ई.स. पूर्व की पाँचवीं सदी की ग्रीक कला का प्रमुख विषय था देवता मूर्तियों का निर्माण। किन्तु ई.स. पूर्व की चौथी सदी में जो कुछ देवताओं की मूर्तियाँ बनायी गई उनमें वीरोचित दिव्यत्व का अभाव है व वे अधिक सौम्य व मानव सदृश हैं।

ई.स. पूर्व की पाँचवीं सदी की कला वीरगाथाओं से सम्बन्धित थी जबकि ई.स. पूर्व की चौथी सदी की कला काव्यात्मक व रमणीय थी। इस समय की देवियों की मूर्तियाँ कोई काल्पनिक अलौकिक शक्ति की प्रतीक नहीं लगती बल्कि आकर्षक रमणीय युवतियाँ जैसी लगती हैं।

व्यक्ति मूर्तियाँ जो पहले बहुत ही कम व केवल सार्वजनिक भवनों के लिये बनायी जाती थी अब कलाकार के व्यवसाय का प्रमुख भाग बन गयीं। मूल व्यक्ति मूर्तियाँ उपलब्ध नहीं हैं किन्तु अन्य प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि व्यक्ति सादृश्य उनका प्रमुख लक्ष्य था। ॲरिस्टाटल ने पुस्तक पोएटिक्स में स्पष्ट किया है कि “अब आदर्शवादी कला लोकप्रिय नहीं रही है।

अच्छे व्यक्ति चित्रकार व्यक्तिगत विशेषताओं का अध्ययन करके सादृश्य निर्माण की कोशिश करते हैं एवं व्यक्ति को अधिक आकर्षक बनाते हैं।” रूपक कथा भी दृश्य कलाओं का एक लोकप्रिय विषय बन गया था जिसका लिसिपस द्वारा बनायी मूर्ति ‘सुअवसर’ अभ्यसनीय उदाहरण है।

ई.स. पूर्व की चौथी सदी का सबसे महान कलाकार प्राक्सिटेलिस था। इस काल की सबसे विख्यात मूर्ति थी अफ्रोडाइट जो प्राक्सिटेलिस ने बनायी थी व निडोस के नगरवासियों ने खरीद कर गोलाकार मन्दिर में रखी थी जिससे उसको चारों तरफ से देख सकते थे।

यह मूर्ति किसी भी तरफ से देखने पर आकर्षक दिखायी देती थी जिससे प्रमाणित होता है कि प्राक्सिटेलिस ने त्रिमिति दर्शन का कितना गहरा अध्ययन किया था। अफ्रोडाइट को स्नान की पूर्व तैयारी में वस्त्र को उतार कर कलश पर रखते हुए दिखाया है।

मूल मूर्ति नष्ट हो गयी है और उसकी केवल भाँडी रोमन प्रतिकृतियाँ ही उपलब्ध हैं जिनसे मूल मूर्ति के सच्चे सौन्दर्य की शायद ही कल्पना की जा सकती है। प्लिनी ने यहाँ तक दावा किया है कि अफ्रोडाइट संसार की सर्वश्रेष्ठ मूर्ति थी। पौसानियस से निर्दिष्ट स्थान पर आलिम्पिया के हिरादेवी के मन्दिर में पायी गयी हर्मिस व शिशु डायोनिसोस की संयुक्त मूर्तियाँ शायद ग्रीस के महान मूर्तिकार प्राक्सिटेलिस की एकमेव मूल कृति अवशिष्ट है।

मूर्तियों पर जो चिकनी पालिश दिखायी देती है वह शायद बाद में मन्दिरों के परिचारकों ने उनकी शोभा बढ़ाने के उद्देश्य से की होगी। हलके एवं सूक्ष्मतर मोड़ देकर हर्मिस की खड़े रहने की अवस्थिति को अतिस्वाभाविक बनाया है जो प्राक्सिटेलिस की अध्ययन निष्ठा व संवेदनशीलत्व का परिचायक है।

यद्यपि हर्मिस एक पौराणिक ग्रीक देवता था उसको आकर्षक युवक के समान बनाया है। वह वृक्ष के तने के सहारे खड़ा है व उसकी दाय भुजा से नीचे की ओर वस्त्र फैल रहा है जो बहुत ही नैसर्गिक दिखायी देता है। शिशु डायोनिसोस को अपनी दायीं भुजा में उठाकर हार्मिस उसको अंगूर का गुच्छा दिखाकर चिढ़ा रहा है।

प्राक्सिटेलिस की मूर्तियों के सौम्य मनोहारित्व के सामने स्कोपास की मूर्तियाँ अधिक ओजस्वी व भावुकतापूर्ण प्रतीत होती हैं। कुछ विद्वानों के मतानुसार हालिकार्नासोस के मकबरे की पूर्वी शिल्प मालिका उसी ने बनायी है। उसके एक फलक में एक वीरांगना को ग्रीक सैनिक पर आक्रमण करके पीछे हटाते हुए अंकित किया है।

वीरांगना का आवेशपूर्ण हमला तथा भयग्रस्त सैनिक का बचाव के प्रयत्नों में पीछे हटना आदि गतिविधियों का सम्पूर्ण प्रभाव नाटकीय है व उससे कलाकार की मनोवैज्ञानिक सूक्ष्मदृष्टि का प्रमाण मिलता है। मूर्तिकार ने मानव शरीरों को आकर्षक बनाने के मोह को टाल कर कलाकृति की मूलभूत अभिव्यक्ति को हानिकारक तत्त्व से बचाया है।

प्लिनी के मतानुसार, एफेसोस के आर्टेमिस मन्दिर का मूर्तिकाम भी स्कोपास ने ही किया था जिसका एक हिस्सा ब्रिटिश संग्रहालय में है। इसमें अल्सेस्टिस के अपने पति एडमेटस के प्राण रक्षार्थ मृत्यु के देवताओं के सामने स्वयं को अर्पण करने के दृश्य को शिल्प रूप दिया है।

मृत्यु व जीवन के बीच के संकटकालीन निर्णायक क्षण की भावनाओं के यथातथ्य दर्शन एवं तादात्म्य के परिणामस्वरूप हुए मानवाकृतियों के सहज स्वाभाविक गतिविधियों के यथोचित अंकन के कारण मूर्तिशिल्प प्रभावपूर्ण बन गया है। मृत्यु देवता के पंखों एवं वस्त्रों की सलवटों का अंकन समूचे दृश्य की लयबद्धता के परिणाम के लिए पर्याप्त सहायक हुआ है।

परिवर्तित शैली का प्रभाव कब्रों के प्रस्तर-पट्टों पर किये जाने वाले मूर्ति शिल्प पर भी हुआ। ई.स. पूर्व की पाँचवीं सदी के प्रस्तर-पट्ट लम्बे व चौड़ाई में कम होते थे व उन पर एकाध खड़ी कठोर आकार की मानवाकृति खोदी जाती थी। अब अधिक चौड़े प्रस्तर- पट्ट लेकर उन पर किसी भावपूर्ण प्रतीकात्मक दृश्य को खोदा जाने लगा।

अधिकतर पट्टों पर पति-पत्नी के वियोग के दुःखपूर्ण प्रसंगों को खोदा गया है। इलिसोस नदी के तल से प्राप्त ई.स. 340 पूर्व के करीब खोदे गये प्रस्तर-पट्ट पर एक मृत युवा की वीर सदृश विवस्त्र आकृति दर्शकों की ओर विरक्तभाव से देखते हुए अंकित की है व उसके सम्मुख उसके वृद्ध पिता की खड़ी आकृति दाढ़ी पर हाथ रख कर व्याकुलता के साथ मृत्यु के रहस्य पर चिन्तन करते हुए अंकित की है; नीचे उसका कुत्ता जैसे कि अपने मृत मालिक की खोज में जमीन को सूंघ रहा है व एक गुलाम-लड़का घुटनों पर सिर रख कर शोक कर रहा है। दृश्य बहुत ही भावपूर्ण व नैसर्गिक बन गया है।

हालिकानोंसोस के मकबरे में राजा मौसोलोस की संगमरमर की व्यक्ति-मूर्ति मिल्ने है जिससे ई.स. पूर्व की चौथी सदी की कला में व्यक्ति सादृश्य का महत्त्व कितना बहु गया था इसका प्रमाण मिलता है। ग्रीक पद्धति की वेशभूषा, लम्बे बाल व छोटी दाढ़ी में युक्त इस मूर्ति की मुद्रा व चेहरे का भाव स्पष्टतया राजोचित है किन्तु कहीं भी आदर्शक के प्रयत्न नहीं हैं।

इस सदी की कला में व्यक्ति सादृश्य के समान गतिविधियों की नैसर्गिक पर भी बल दिया जाता था जिसका उचित उदाहरण है एन्टिसिथेरा में (350 ई.पू.) मिली अनुसार गेंद फेंकने वाले कसरती की कांस्य मूर्ति। इस काल का एक महान मूर्तिकार था लिखिफोस । यह लम्बी उम्र तक जीवित रहा व उसने बहुसंख्य कांस्य मूर्तियाँ बनायीं।

प्लिनी के उसने लगभग 1500 मूर्तियाँ बनायीं। लिसिफोस ने अपनी मूर्ति अपोक्सियोमेनोस के लिए अत्यन्त सामान्य विषय को चुनकर अपनी अलौकिक प्रतिभा से उसको बहुत ही सजीव व स्वाभाविक बनाया है। प्लिनी के बेचारानुसार लिसिफोस ने मूर्तियों के शीर्षों को अधिक छोटे व शरीरों को अधिक पतले बना र प्राचीन ग्रीक मूर्तिकारों के मानव शरीर के आनुपातिक सिद्धान्तों में काफी परिवर्तन किया था जिससे उसकी मानव मूर्तियाँ अधिक लम्बी प्रतीत होती हैं।

लिसिफोस की मूर्ति कृतियों में कुछ दृश्यांकन भी हैं जिनमें से ‘सिकन्दर का शेर का शिकार’ प्रसिद्ध है जो उसने क्राटेरोस के लिए बनाया था। शिल्प की खोदाई काफी गहरी है व अध्यारोपण पद्धति के अवलम्बन से आकृतियों की संख्या भी बढ़ायी है।

शेर के घोड़े पर हमलावर रुख से आरम्भ करके कलाकार ने सम्पूर्ण दृश्य की गतिविधियों को विस्फोटक बनाया है। ग्रीक मूर्तिकला में नैसर्गिकता व गतित्व के प्रति यह जो अभिरुचि बढ़ गयी थी उसका परिणाम समकालीन ग्रीक चित्रांकन पर भी हुए बिना नहीं रहा। एरिट्रिया के चित्रकार फिलोक्सेनोस के चित्र का अनुकरण करके पच्चीकारी में बनायी पाम्पेई में प्राप्त प्रसिद्ध कृति ‘सिकन्दर व डोरियस का युद्ध’ से इस बात की पुष्टि होती है।

हेलेनिस्टिक प्रभाव

ग्रीक आदर्शवादी कला के अन्य देशों की कला पर हुए प्रभाव को “हेलेनिस्टिक प्रभाव” कहते हैं। सिकन्दर महान के विदेश-विजय के पश्चात् यह प्रभाव बढ़ता गया। यह प्रभाव विशेष रूप से एटुस्कन कला, रोमन कला व भारतीय गांधार कला में दृष्टिगोचर है।

एडुस्कन कला

रोमन साम्राज्य में विलीन होने से पूर्व के इटली के पश्चिमी किनारे के प्रदेश, जो ‘एटुरिया’ नाम से जाना जाता था, की ई.स. पूर्व पाँचवीं व छठी सदी की कला को “एटुस्कन कला” कहते हैं। एटुस्कन लोग, मिस्र के लोगों के समान मृत्युपरान्त जीवन का विश्वास करते थे।

इस वजह से एटुस्कन कला, मिस्र की कला के समान, अधिकांश मृतात्माओं की आवश्यकताओं व सुख-सुविधाओं की पूर्ति के हेतु मकबरों की दीवारों पर अंकित है। किन्तु उसमें मिस्र की कला का रूढ़िवादी थायित्यभाव नहीं है। वह क्रीटन व ग्रीक कला के समान ओजस्वी व गतित्व लिये है।

टाक्विंनिया के मकबरा चित्र वादक वृंद (ई.स. पूर्व 480) से विनष्ट हुई ग्रीक भित्ति चित्रकला की श्रेष्ठता व विशेषताओं की उचित रूप से कल्पना की जा सकती है। एटस्कन लोग ग्रीक कला की प्रतिभा सम्पन्नता के विशेष प्रशंसक थे व ग्रीक कलाकृतियाँ काफी मात्रा में आयात करते थे और एटुस्कन मकबरों में अनेक उत्कृष्ट चित्रों से अलंकृत ग्रीक कलश प्राप्त हुए हैं।

एटुस्कन भित्ति चित्रों से प्रतीत होता है कि वहाँ के लोग मृत्युपरान्त जीवन में स्वर्गीय सुखों के समान भयानक पिशाचों द्वारा दी गयीं नारकीय यातनाओं का भी विश्वास करते थे।

रोमन कला

ई.स. पूर्व पाँचवीं सदी में रोम एथेन्स के समान छोटा नगर राज्य था। किन्तु प्रशासन कौशल व राजनीतिक बुद्धिमानी से रोमन लोगों ने अपने को प्रभुता सम्पन्न राष्ट्र के रूप में प्रस्थापित किया व समय के साथ अपने साम्राज्य को इंग्लैण्ड, स्पेन, इजिप्त व दक्षिणी रशिया तक फैलाया।

ई.स. पूर्व दूसरी सदी में ग्रीस को अधीन करने के बाद रोमन चित्रकला, मूर्तिकला व वास्तुकला पर ग्रीक कला का प्रभाव बढ़ गया। रोमन बृहदाकार भित्ति चित्रों की ग्रीक कलशों पर अंकित लघु चित्रों से तुलना करने पर विनष्ट हुए ग्रीक भित्ति चित्रों के कलात्मक सौंदर्य की उचित कल्पना की जा सकती है।

ऐसा ही एक ई.स. पूर्व पहली सदी का रोमन भित्ति चित्र ‘महिला संगीतकार व युवती’ बोस्कोरियल कस्बे में प्राप्त हुआ जिसमें आदमकद मानवाकृतियाँ चित्रित की हैं जो रूप में ग्रीक कलशों पर चित्रित लघु मानवाकृतियों से मिलती-जुलती हैं यद्यपि रोमन मानवाकृतियों में वह ग्रीक आदर्श सौन्दर्य नहीं है व वे कुछ छाया प्रभाव दर्शाते हुए अधिक यथार्थवादी चित्रित की हैं।

रोमन कला में आदर्श सौंदर्य व यथार्थवाद का सम्मिश्रित स्वरूप देखने को मिलता है। इस दृष्टि से पाम्पेई के रहस्यमय भवन (Villa of Mysteries) में प्राप्त भित्ति चित्र श्रृंखला (ई.स. पूर्व पहली सदी) व हर्क्युलेनियम में प्राप्त पहली सदी का भित्ति चित्र ‘अभिनेता व मुखौटा’ अभ्यसनीय हैं।

पाम्पेई के भित्ति चित्रों में ‘आडू व सुराही’ को भी एक स्थान पर चित्रित किया है जिसे वस्तुचित्रण का आरम्भिक नमूना मान सकते हैं। इसमें आले की गहराई अंकित की है और घनत्व दर्शन की ओर कदम बढ़ाया है।

रोमन कला के साथ ही वस्तु चित्रण के समान स्वतंत्र रूप से व्यक्ति चित्रण करने का आरम्भ हुआ जिसके इजिप्त पर रोमन शासन के समय (ई.स. द्वितीय व तृतीय सदी में) फय्यूम की शव पेटिकाओं पर बने व्यक्ति चित्र उदाहरण हैं। व्यक्ति चित्रों का रंगांकन रंगों को मोम में मिश्रित करके किया है यद्यपि भित्ति चित्रण के लिए चित्रकारों की प्रिय पद्धति थी फ्रेस्को ।

आँख, नाक, होंठ व समस्त मुखाकृति को छाया प्रकाश का प्रभाव दर्शात हुए इतना यथार्थवादी चित्रित किया है कि विश्वास नहीं होता कि ये व्यक्ति चित्र इतने प्राचीन काल में बनाये गये हैं। रोमन व मिस्री शैलियों के सम्मिश्रण से बने इन व्यक्ति चित्रों के अलावा विशुद्ध रोमन शैली का कांच पर बना एक व्यक्ति चित्र इटली के आरेज्जो संग्रहालय में है। यह लघुचित्र होते हुए उसमें यथार्थवादी व्यक्ति चित्रण शैली बारीकियों के साथ सर्वथा विकसित हुई दिखायी देती है।

उत्खननों में प्राप्त अनेक भित्ति चित्रों से स्पष्ट है कि रोमन कलाकार फ्रेस्को पद्धति से चित्रण करने में विशेष निपुण थे। प्रिमापोर्ता के भवन की दीवार पर चित्रित ‘बगीचे का दृश्य’ आधुनिक विशुद्ध प्रकृति चित्रण का प्राचीनतम उदाहरण है।

ई.स. पूर्व पहली सदी में बनाये इस प्रकृति चित्र में पेड़, पौधे, फूल, फल, पहाड़, भूमि, दीवार आदि प्रकृति के अंगों को बारीकियों के साथ इतने यथार्थ रूप में चित्रित किया है जो आश्चर्य की बात है। क्योंकि उस जैसा उत्कृष्ट प्रकृति चित्र आगामी चौदह सदियों में नहीं बनाया गया।

रोमन कलाकारों ने पच्चीकारी से भी दीवारों व फर्श पर अनेक कलाकृतियाँ बनायीं। पाम्पेई के उत्खनन में प्राप्त पच्चीकारी कृति ‘इसस का युद्ध’ (ई.स. पूर्व 100) विशेष प्रसिद्ध है। यह ग्रीक चित्र की प्रतिकृति है व इसमें सिकन्दर की ईरान के राजा दारियस पर विजय का दृश्य है। किन्तु अधिकतर रोमन पच्चीकारी में ग्रीक कला की अपेक्षा यथार्थता व आलंकारिकता की ओर विशेष ध्यान दिया है। पशु-पक्षी, तलवारिया व कसरती आदमी पच्चीकारी के प्रिय विषय थे।

ऐतिहासिक दृष्टि से रोमन कला का इस वजह से विशेष महत्त्व है कि यथार्थवाद की ओर प्रवृत्त होते हुए उस पर स्पष्टतया दृष्टिगोचर ग्रीक प्रभाव के द्वारा हम विनष्ट ग्रीक कला का मूल्यांकन कर पाते हैं।

इसी प्रभाव ने ग्रीक कला के आदर्शों को जीवित रखकर आगामी यूरोपीय कला को समय-समय पर प्रेरित किया। रोमन कला में जीवित ग्रीक प्रभाव ने प्रथम सोलहवीं सदी की पुनर्जागरणकालीन कला को और बाद में अठारहवीं सदी की नवशास्त्रीयतावादी कला को प्रेरित किया जिसका विचार हम और आगे करेंगे।

गांधार कलासिकन्दर के भारत पर हुए आक्रमण व विजय के बाद ग्रीक कला का भारतीय मूर्तिकला पर प्रभाव पड़ा व भारत के उत्तर-पश्चिमी प्रदेश गांधार में (वर्तमान अफगानिस्तान) सम्मिश्रित स्वरूप की शैली विकसित हुई जो गांधार कला नाम से जानी जाती है।

गांधार कला में बुद्ध की अनेक पद्मासनस्थ व खड़ी मूर्तियाँ बनी हैं एवं पत्थरों में खुदाई करके बुद्ध के जीवन के प्रसंगों के अनेक उभारदार शिल्पों का निर्माण हुआ है। इसके अलावा कुछ अज्ञात पुरुषों की शीर्षमूर्तियाँ भी बनी हुई हैं। सभी मूर्तियों में भारतीय व ग्रीक कला का सम्मिश्र स्वरूप स्पष्टतः दृष्टिगोचर है।

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