ईसाई चित्रकला

ईसाई चित्रकला के प्रारम्भिक चरण

पहली शताब्दी के अन्त तक ईसाई धर्म का रोमन साम्राज्य में प्रचार हो चुका था व गिरजाघरों के अध्यक्षों के सामने प्रश्न उपस्थित हुआ कि नये मूर्तिपूजा विरोधी धर्म में कला को क्या स्थान दिया जाये। 

उनके निर्णय के अनुसार धर्मनिरपेक्ष, आलंकारिकता प्रधान कला का निषेध अनावश्यक था यद्यपि मूर्तिपूजा को प्रोत्साहित करने वाली कला को ईसाई धर्म से वर्जित करना वे अनिवार्य मानते थे। इस निर्णय के कुछ विशेष कारण भी थे।

मूर्तिपूजक हो या मूर्तिविरोधी हो, प्रत्येक धर्म में सार्वजनिक धर्मविधियों व धार्मिक कार्यों को – जो मन्दिर, मस्जिद या गिरजाघर जैसे नियुक्त स्थानों पर आयोजित किये जाते हैं— असाधारण महत्त्व दिया जाता है। 

ऐसे कार्यों में विशिष्ट पोशाकों, अलंकृत बरतनों आदि को काम में लिया जाता है अर्थात् ऐसे स्थानों, पोशाकों, वर्तनों आदि के निर्माण में वास्तुकला, शिल्पकला एवं चित्रकला का व्यवहार अपरिहार्य है। 

इसके अतिरिक्त मानवीय आन्तरिक सहज प्रवृत्तियों व भावनाओं को प्रकट करना उनको सन्तुष्ट करने के लिए अमूर्त धार्मिक संकल्पनाओं को प्रतीकात्मक रूप में साकार करना आवश्यक है जो कार्य कला के द्वारा ही किया जा सकता है। 

धर्म के अनुयायियों के समान पूजनात्मक दृष्टिकोण व समान भूमिका के निर्माण के लिए अलौकिक एवं अतिमानवीय धारणाओं एवं घटनाओं को प्रत्यक्षित करना आवश्यक है।

धर्म सुधार आन्दोलन से पहले भी ईसाई धर्म में पूजा विधि को सरल व सुगम रूप देने के प्रयत्न हुए व उसी हेतु प्रतिमाओं को उचित स्थान दिया गया। 

16वीं सदी में हुए धर्म सुधार आन्दोलन के समय मुद्रण कला का आविष्कार हुआ व पुस्तकों का प्रसार होने लगा और धर्म प्रचार के विचार से प्रतिमाओं व चित्रों का बहुत-सा कार्य पुस्तकों द्वारा होने लगा। 

उससे पूर्व की सदियों में बहुसंख्य ईसाई अनपढ़ हुआ करते थे एवं हस्तलिखित ग्रंथ बहुत कीमती एवं दुर्लभ होते थे और इसी कारण से ईसाई धर्म को दृश्य कलाओं की सहायता लेनी पड़ी थी।

यह किसी विशिष्ट निर्णय के फलस्वरूप नहीं हुआ। ईसाई धर्म के विचारकों में आपस में मत भिन्नता थी। 

कुछ इसके विरोधी थे क्योंकि वे सोचते थे कि इससे पुनश्चः मूर्तिपूजा का उदय होगा किन्तु दूसरे जो इस प्रकार आशंकित नहीं थे वे दृश्य कलाओं की सहायता लेना न केवल वर्ज्य नहीं मानते थे बल्कि उन कलाओं को प्रोत्साहन देने को नहीं हिचकते थे। 

सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह थी कि सब ईसाई धर्मसंघ पूर्वविधान एवं नवविधान में उद्धत कथाओं एवं ईसा की जीवन गाथाओं को प्रत्यक्ष रूप में देखकर आत्मशान्ति व निष्ठा प्राप्त करना चाहते थे। 

इस प्रकार ईसाई धर्म के प्रसार के पश्चात् कला को वैसा ही आश्रय मिला जैसा पहले मूर्तिपूजक गैर इसाइयों से मिला था। 

जैसे हम आगे देखेंगे, आरम्भिक काल में ईसाई धर्म में कला को जो विवशता से गौण स्थान दिया गया था, अब उसका महत्त्व गिरजाघरों की शासकीय सामर्थ्य में उत्तरोत्तर बढ़ता गया व ईसाई कला ने अपने विशिष्टतापूर्ण सर्जन से कला के इतिहास में नाम अमर किया। 

ईसाई कला के आरम्भिक काल में परम्परागत गैर ईसाई कला का प्रभाव उसकी अंकन पद्धति व सौन्दर्यात्मक कल्पनाओं पर स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर है यद्यपि उसके विषय पूर्ण रूप से ईसाई धर्म से सम्बन्धित हैं। 

विशेषतया मिस्री, मध्य एशियाई एवं रोमन कलाओं में विद्यमान तत्त्वों का उसमें समावेश स्पष्ट है। 

अन्तर्भीम समाधि स्थान की चित्रकला ऊपर निर्दिष्ट कला तत्त्व सबसे प्राचीन ईसाई चित्रकला, जिसकी निर्मिति अन्तर्भीम समाधि स्थानों की दीवारों पर की गयी, उसमें दृश्य हैं। 

वहाँ पुष्पमालाओं एवं ऋतुदेवताओं का आलंकारिक चित्रण है जो न ईसाई, न गैर ईसाई धर्मों से सम्बन्ध रखता है। 

पशुओं के बीच आर्फीअस, क्युपिड व सायकी (कामदेव व रति), आरिस्टेअस जैसे गैर ईसाई पौराणिक विषयों को ईसाई धर्म सिद्धान्तान्तर्गत चित्रित किया गया है। 

इसके अतिरिक्त पूर्ण रूप से ईसाई प्रतीकों का भी चित्रण है जैसे कि क्रूस, कबूतर, मेमना, अंगूर की बेल, मछली, भावमग्न भक्त आदि। 

पूर्व विधान से लिए गए विषयों में मृतकों के लिए की गयी प्रार्थना से सम्बन्धित चित्र एवं भगवान द्वारा संकटमुक्त जोना, नोअ, आइजॅक आदि भक्तों के चित्र हैं। 

ईसा की जीवन-गाथा पर आधारित चित्र भी हैं। नव-विधान से लिए गए विषयों में ईसा के चमत्कारों को—जैसे कि कॉन का विवाह भोज, रोटियों का चमत्कार, मछलियों का चमत्कार, लाजारस का संजीवन – प्रमुख स्थान हैं। 

मारिया (माता व पुत्र) तथा मजूसियों की भक्ति के चित्र काफी तादाद में पाये जाते हैं।

कलात्मक विचार से ये कोई श्रेष्ठ दर्जे के चित्र नहीं हैं। ये चित्र अधिकतर भावुक ‘जनों द्वारा अपनी भक्ति को प्रत्यक्षित करने के उद्देश्य से कुशल कारीगरों से बनवाये गये थे। 

कारीगरों ने भी कुशलता का पूर्ण परिचय दिया है यद्यपि वे इन्हीं कृतियों के जरिये कलाकारों की श्रेणी को नहीं प्राप्त कर सके हैं। 

निर्माताओं के आत्मविश्वास, प्रसन्नता एवं भक्ति जनित आनन्द के गुण चित्रों में ओत-प्रोत दिखायी देते हैं। समाधि स्थानों की दीवारों पर बनाये गये इन चित्रों में कहीं भी अन्तिम शवसंस्कार का चित्रण नहीं है। 

सब स्थान स्वर्गीय कल्पनाओं से चित्रित हैं व कहीं भी नरक का लेशमात्र उल्लेख नहीं है।

बिजांटाइन कला का जन्म

रोमन अंतभौम समाधि स्थानों की चित्रकला उसी प्राचीन आलंकारिक भित्ति चित्रकला परम्परा का अनुयायित्व किये हुए थी जिसके उदाहरण हर्क्युलेनियम व पाम्पेइ के उत्खननों ईसाई चित्रकला में पाये गये हैं। 

किन्तु 1931 में सीरिया के ड्युरा-युरोपस नाम के कस्बे के खण्डहरों में एक ईसाई बपतिस्मा गृह की खोज हुई जिसकी दीवारों पर बनाये गये चित्र प्राप्त हुए हैं जो प्रतीकात्मक न होकर कथनात्मक हैं। 

उपर्युक्त ईसाई प्रार्थनालय से पूर्व काल का एक गैर ईसाइयों का मंदिर पाल्मिर में है जिसकी दीवारों पर दूसरी व तीसरी सदी के उसी शैली के चित्र विद्यमान हैं व एक यहूदियों का प्रार्थनागृह है जो तीसरी सदी में बनाया गया था व जो पूर्व विधान के कहानी-चित्रों से अलंकृत है। 

इन तीनों स्थानों के चित्रों से स्पष्ट है कि उस समय सीरिया में एक ऐसी ग्रीक कला से मुक्त कला शैली थी जो प्राचीन पूर्व कला शैली से विकसित हुई थी। 

इस कला शैली के सम्मुख आदर्श सौन्दर्य का ध्येय नहीं था व उसमें संयोजन, दूरदृश्य लघुता या मानवीय शरीर के स्वाभाविक अनुपात की ओर ध्यान नहीं दिया गया था। तथ्यों को स्पष्ट रूप में अंकित करने के एकमात्र उद्देश्य से उसका जन्म हुआ था।

ऐसी पाश्र्व भूमि पर बिजांटाइन कला विकसित हुई। पंचायती राज्य रावेन्ना के सॅन विताले के पच्चीकारी द्वारा चित्रित जस्टिनियन व थेओदोरा के व दरबारियों के चित्रों में वैसी रूढ़िबद्धता का अवलम्बन है जो ड्यूरा के मंदिर के पुरोहितों के चित्रों में है।

बिजांटाइन कला समान रूप से पूर्वी एवं ईसाई शैली है। यद्यपि बिजांटाइन कला को ग्रीक कला की परम्परा के अन्तर्गत माना जाता है लेकिन वह ग्रीक कला से धार्मिक, बौद्धिक, राजनीतिक एवं कलात्मक सब विचारों से काफी भिन्नता रखती है। 

केवल कुछ पाण्डुलिपि अलंकरण ग्रीक कला का प्रभाव दर्शाते हैं। विकासशील होते हुए विजांटाइन कला में कुछ ऐसी विशेषताएँ थीं जो उसके सम्पूर्ण इतिहास में उसने बनाये रखीं।

मुख्य रूप से बिजांटाइन कला धर्मप्रधान कला थी व गिरजाघर के आश्रय में पली । 

धर्मोपदेशकों द्वारा कथित या लिखित विचारों या प्रसंगों को रेखारंगों द्वारा प्रभावी दृश्य रूप देना मात्र कलाकार अपना कर्तव्य मानता था पुरोहितों के निर्देशों के अनुसार ही उसको चित्रण करना पड़ता था। 

इसी कारण बिजांटाइन कला को रूढ़िबद्ध एवं व्यक्ति निरपेक्ष रूप प्राप्त हुआ। 

इसमें कभी जो कुछ परिवर्तन हुए उसके पीछे राजाज्ञा या सामाजिक मत कारण रहे न कि कलाकार की निजी प्रेरणा राजा ईश्वर का प्रतिनिधि माना जाता था, शासक व गिरजाघर के अलावा राजा ने बिजांटाइन कला के विकास में प्रेरक का कार्य किया।

बिजांटाइन कला की अन्य विशेषता थी उसकी पूर्वीयता जिसके कारण उसमें आकार सादृश्य से रंगों को व यथार्थ चित्रण से आलंकारित्व को प्राधान्य दिया गया था। 

इसके विपरीत ग्रीक व रोमन कलाओं में वस्तु के आकार पर सबसे अधिक ध्यान दिया जाता था व रंगों का गौण स्थान था। 

अतः उनमें वास्तुकला एवं मूर्तिकला जैसी त्रिमिति युक्त कलाओं का अधिक विकास हुआ। सदियों तक ग्रीक कलशों का रंगांकन केवल काला, भूरा व सफेद इन तीनों रंगों तक सीमित था व उनको हल्की गहरी छटाओं में लगाके भिन्न प्रभावों का निर्माण किया जाता था। 

कभी ग्रीक कलाकारों ने प्रयोग करके रंगों के स्वभाविक सौन्दर्य से परिचित होने के प्रयत्न नहीं किये। आकारों को स्पष्टता देना रंगों का मुख्य कार्य था।

ग्रीक कला के विपरीत बिजांटाइन चित्रकार पूर्वी व अतिपूर्वी देशों के चित्रकारों के समान रंगों के स्वाभाविक सौन्दर्य से मुग्ध थे व भिन्न रंग संगतियों के निर्माण में रुचि रखते थे। 

मूर्तिकला के समान घनत्व के आभास का चित्रकला में होना उन्होंने आवश्यक नहीं माना। चित्रांतर्गत वस्तु या मानवाकृति के हलके उभार से वे सन्तुष्ट थे। 

अतः पच्चीकारी, रेशम की कशीदाकारी, मृणपात्र चित्रण जैसी शिल्पविधियों – जिनमें रंगों के प्रभाव का स्वाभाविकतया विकास होता है— को वे विशेष रूप से पसन्द करते थे। 

रेखांकन व आकार संयोजन को गौण स्थान था। रंग सौन्दर्य की अधिकतम वृद्धि व आलंकारित्व के उद्देश्यों से आकारों को सरलीकृत रूप दिया जाता था। 

अतः ईसवी सन् पूर्व के पहली सदी के पाम्पेड़ के भित्ति चित्र रोमन भित्ति चित्र के जितने निकट हैं उतने बारहवीं सदी के विजांटाइन पच्चीकारी-भित्तिचित्र नहीं हैं। 

पच्चीकारी हो या फ्रेस्को दोनों प्रविधियों में घनत्व का न्यूनतम आभास, रूढ़िबद्ध सरलीकृत आकार, अनियमित दूरदृश्य लघुता व नाम मात्र गहराइयों से त्रिमिति दर्शन बिजांटाइन कला की विशेषताएँ रही हैं।

बिजांटाइन संगीत के उद्गम के बारे में जो अद्यावत प्रमाण मिले हैं वह भी इसकी ओर संकेत करते हैं कि विजांटाइन संगीत की उत्पत्ति सीरिया के गिरजाघरों के धार्मिक संगीत से हुई न कि प्राचीन ग्रीक संगीत से। 

यह गिरजाघरीय संगीत यहूदियों के प्रार्थना मंदिरों में गाये जाने वाले गणगानों से विकसित हुआ। चित्रकला के समान संगीत भी उपासना से घनिष्ठ सम्बन्ध रखे हुए था। 

डॉ. वेलेज के मतानुसार प्रत्येक कला का उपासना में महत्त्वपूर्ण योगदान होता था एवं उपासना कलाकार की प्रतिभा के द्वारा किया गया परम शक्ति का प्रकटीकरण मानी जाती थी। 

उनका यह भी मत है कि उस समय लोगों की निष्ठा थी कि गिरजाघरों में गाये जाने वाले स्तोत्र या भजन देवदूतों के गानों को प्रतिध्वनित करते हैं तथा संतों के प्रतिमाचित्रों द्वारा स्वर्गीय देवता अपना दर्शन कराते हैं। 

बिजांटाइन तथा रोमन पच्चीकारी

विजांटाइन प्रतिमा चित्रण के योगदान से ईसाई कला काफी समृद्ध हुई। गिरजाघर के प्रमुख अधिकारी कलाकारों को चित्रण के लिए विषय देते थे जो अधिकतर पूर्वविधान, नवविधान या संतगाथा में से किसी कहानी या ईसाई धर्म की किसी रूपक कथा से लिये जाते थे। 

विषय का चुनाव उसकी चित्रण योग्यता के बजाय उसके धार्मिक आनुष्ठानिक महत्त्व का विचार करके किया जाता था।

वास्तुकला की दृष्टि से बिजांटाइन गिरजाघर के भवन बहुत सादे होते थे व बाहरी ओर से मूर्तिकला द्वारा उनको आलंकारिक रूप प्रदान करने के कोई प्रयत्न नहीं किए जाते थे। 

उनके अन्तर्भागों में सुवर्णांकित पृष्ठभूमि पर पच्चीकारी का काम किया जाता था जिससे वे अधिक प्रकाशित दिखायी देते। कभी पच्चीकारी के स्थान पर भित्ति चित्रण भी होता था किन्तु वह उतना प्रभावपूर्ण दिखायी नहीं देता ।

रोमन पच्चीकारी मुख्यतया फर्श पर की जाती थी या दीवारों पर केवल छोटे टुकड़ों में ही पच्चीकारी द्वारा भित्ति चित्रण किया जाता था। इसके अलावा रोमन पच्चीकारी में रंगीन संगमरमर को प्रयोग में लेते थे। 

किन्तु बिजांटाइन कलाकारों ने संगमरमर के स्थान पर रंगीन कांच का इस्तेमाल शुरू किया जिससे वे अधिक चमकीले तथा विविध रंगों का प्रयोग कर सके व उनकी पच्चीकारी अधिक प्रभावी बनी। 

रंगीन कांचों की पृष्ठभूमि में वे सोने या चांदी के वर्ख को भी जड़ते थे। वस्तु के छायादार हिस्सों को वे भिन्न व अधिक गहरे रंग के कांच से बनाते जैसे कि हरे रंग के वस्त्र के प्रकाशित हिस्सों में पीले से हरे रंग के कांच के टुकड़े लगाये गये हैं तो छाया वाले हिस्सों में नीले से हरे रंग के कांच के टुकड़े लगाये हैं। 

इस अंकन पद्धति को उन्होंने यहाँ तक आगे बढ़ाया कि पच्चीकारी द्वारा बनाये कुछ चित्रों में मानव वर्ण को प्रकाशित हिस्से में गुलाबी रंग के कांच से अंकित किया है तो छाया वाले हिस्से में हरे रंग के कांच से। 

किन्तु पाम्पेड़ के भित्ति चित्रों के अध्ययन से स्पष्ट होता है कि वहाँ मानव वर्ण को प्रकाशित हिस्से में गुलाबी रंग से चित्रित किया है तो छाया वाले हिस्से में रंग से। 

बिजांटाइन पच्चीकारी में किया गया रंगों का उपर्युक्त निरंकुश प्रयोग आधुनिक कला के विचार से बहुत महत्त्व रखता है क्योंकि वस्तु के निजी रंग को गौण स्थान देकर रंगों के विशुद्ध सौन्दर्य प्रभावों व छटाओं पर ध्यान केन्द्रित करके चित्रण करना आधुनिक चित्रकारों का एक प्रमुख सिद्धान्त बन गया है।

सदियों पश्चात् बिजांटाइन कलाकारों की विशुद्ध रंगांकन पद्धति को, सोलहवीं सदी के वेनिस शैली के चित्रकारों ने मुख्य रूप से वेरोनीस ने अपनाया व सत्रहवीं व अठारहवीं सदियों के पट चित्रकारों ने भी उससे काफी लाभ उठाया। 

फिर से कुछ काल तक विस्मृत होने के पश्चात् उन्नीसवीं सदी में देलाक्रा, सेजान व प्रभाववादी चित्रकारों द्वारा यह पुनः प्रतिष्ठित हुई । 

भित्ति चित्रण के लिए यह पद्धति विशेष उपयुक्त सिद्ध हुई है क्योंकि इस पद्धति में वस्तुओं को ठोसपन देकर दीवार के स्वाभाविक समतलत्व को हानि नहीं पहुँचायी जाती बल्कि छाया प्रकाश के हिस्सों को भिन्न रंगों की भिन्न छटाओं में अंकित करके वस्तु के उभार को सूचित किया जाता है।

बिजांटाइन प्रतिमा चित्रण 

जो बाद में यूरोपीय प्रतिमा चित्रण के लिए प्रेरणास्पद रहा का जन्म पॅलेस्टाइन व सीरिया की कला में हुआ। 

इटली में प्रचलित दाढ़ी विहीन, घुंघराले बाल वाली ईसा की प्रतिमा के स्थान पर ईसा की पतली मुखाकृति वाली, दाढ़ी व बीच में मांग के साथ लम्बे बालों वाली प्रतिमा बनायी गयी जो पूर्ण रूप से पूर्वी कल्पना से मिलती हुई थी व जो बाद में पूरे ईसाई साम्राज्य में आदर्श मानी गयी।

पच्चीकारी व भित्ति चित्रण गिरजाघरों के पुरोहितों के निर्देशों के अनुसार किया जाता था। आकृतियों व दृश्यों का संयोजन विशिष्ट कल्पनाओं के आधार पर किया जाता। 

मध्यम भाग के ऊपरी और ईसा या परम शक्तिमान् ईश्वर की विशाल आकृति चित्रित की जाती, सु-समाचार-लेखकों की आकृतियाँ ऊपरी कोने के त्रिभुजों में व कुँवारी मेरी की आकृति गुम्बद के अर्धवृत्त में बनायी जाती। 

गिरजाघर के बारह उत्सवों का चित्रण उनके धार्मिक महत्त्व के अनुसार किया जाता न कि कालक्रमानुसार ।

राजमहलों में बनाये गये लौकिक विषयों पर आधारित पच्चीकारी चित्रों में से बहुत ही कम चित्र अवशिष्ट हैं, किन्तु निमंत्रित बिजांटाइन कलाकारों द्वारा ई.स. 715 में दमास्कस की बड़ी मस्जिद में की गयी पच्चीकारी से उनकी कल्पना की जा सकती है। 

वहाँ काल्पनिक भवनों व पेड़ों का आलंकारिक ढंग से अंकन किया गया है।

रोम के सबसे प्राचीन सांता कोस्तांजा (ई.स. 324-326) व सांता प्युदेन्द्रिआना (ई.स. 384-389) गिरजाघरों की पच्चीकारी पर बिजांटाइन शैली का नाममात्र भी प्रभाव नहीं है बल्कि उसमें ग्रीक आदर्शों की झलक है। 

किन्तु पाँचवीं सदी में ग्रीस के मूर्तिभंजकों द्वारा भगाये गये कलाकारों के इटली में आगमन होते ही विजांटाइन शैली की विशेषताओं का रोमन कला पर प्रभाव दृष्टिगोचर होने लगा जिसके उदाहरण हैं दोमेनिका के सांता एन्यिस फ्युओरी ल म्युरा, सांता मराया, त्रास्तिवेरे के सांता प्रासिदो, सांता सेसिलिया व सांता मराया की पच्चीकारी। 

पच्चीकारी चित्रण के इतिहास में रावेन्ना, वेनिस, सिसली तथा कान्स्तान्तिनोपल, सालोनिका, निकाला व डेप्नि की कलाकृतियाँ विशेष महत्त्वपूर्ण हैं।

पच्चीकारी का काम विशेष खर्चीला होने के कारण बिजांटाइन कला में कभी उसकी -जगह फ्रेस्को पद्धति में चित्रण किया जाता था। 

किन्तु बिजांटाइन फेस्को-पद्धति तेरहवीं सदी से प्रयोगान्वित फ्रेस्को-पद्धति से भिन्न थी। इटली के फ्रेस्को चित्रकार गीले प्लास्टर पर चित्रण करते थे जबकि बिजांटाइन चित्रकार उन्हीं माध्यमों का ही प्रयोग करते किन्तु रंगांकन प्लास्टर को भूमि सूखने के बाद किया करते। 

पूर्णतया बिजांटाइन अंकन पद्धति के अनुसार बनाये गये फ्रेस्को चित्र इटली में रोम के मराया आंतिक्वा गिरजाघर में, कापुआ के निकट सान एंजेलो में व लोम्बार्दी के कासलसेप्रिओ में देखने को मिलते हैं। 

कासलसेप्रिओ के फ्रेस्को चित्र सातवीं से लेकर दसवीं सदी के अंत तक के काल में बनाये गये हैं।

रोमानेस्क चित्रकला

चौथी सदी के आरम्भ से लेकर आठवीं सदी के अंत तक रोमन साम्राज्य के पश्चिमी भाग पर उत्तरी यूरोप की बर्बर टोलियों के आक्रमण जारी रहे। उससे सामाजिक शान्ति व आर्थिक विकास में अस्थिरता आ गयी एवं उसका कला पर भी परिणाम हुआ। 

कलाकृति की माँग घट गयी, कला सम्बन्धी ज्ञान व कौशल दुर्लभ हो गये। वहाँ की ग्रीक-रोमन संस्कृति में आक्रामकों की संस्कृति व विचारों का प्रवेश शुरू हुआ। 

उन्होंने अपनी कलात्मक अभिरुचियों को पराभूत जनता पर थोप दिया। पश्चिमी भाग में प्रस्थापित कॅरोलिंजियन राजसत्ता के शासनकाल में सम्मिश्रित कला का विकास हुआ जिसमें भिन्न कलाशैलियों का प्रभाव स्पष्ट है। 

बर्बर कला के अतिरिक्त रोमन-काल पूर्व की स्थानीय कला-परम्परा, पठारी मुल्कों की कला के तत्त्व उसमें समाविष्ट थे। 

मठवासियों, पुरोहितों एवं व्यापारियों द्वारा बाहर से लायी गयी विजांटाइन कृतियों के कला तत्त्वों ने भी उसमें प्रवेश किया। आयरिश पाण्डुलिपि चित्रण के तत्त्व भी उसको प्रभावित कर गये। 

किन्तु इसके बावजूद उसका प्राचीन शास्त्रीय ग्रीक कला का मूल प्रभाव पूर्णतया मिट नहीं सका क्योंकि उस काल के कलाकृतियों से युक्त ग्रीक स्मारक वहाँ विद्यमान थे।

चौथी सदी से लेकर सातवीं सदी तक पश्चिमी प्रदेश में बनाए गए गिरजाघरों को कलायुक्त कशीदों से भरपूर लटकनों व सुवर्णांकित पृष्ठभूमि पर रचायी गयी पच्चीकारी से सजाया गया था। 

तत्कालीन कुछ पाण्डुलिपियाँ अब तक सुरक्षित हैं जिन पर अंतर्ग्रथित अभिप्रायों से अलंकृत चित्रण की भरमार है व जिसमें मानवाकृतियों को ऐंठन देकर आलंकारिक आकारों में अंतर्भूत किया है। 

आठवीं व ग्यारहवीं सदियों के बीच के काल मैं निर्मित कुछ आलंकारिक भित्ति चित्र सुरक्षित हैं जिनमें स्विट्जरलैंड में म्युन्स्टर के सेंट जॉन (ई.स. 780-840) के चित्र, फ्रांस में गेर्मिन्यी-ल-प्रे (लगभग ई.स. 1100) के पच्चीकारी चित्र व सेंजमें दोक्सेर (लगभग ई.स. 859) के चित्र सबसे महत्त्वपूर्ण हैं। स्पेन में सान क्विर्स डे पेड्रेट में कुछ आलंकारिक भित्ति चित्र हैं जिनका कोई कलात्मक महत्त्व नहीं है।

ग्यारहवीं से लेकर तेरहवीं सदी के आरम्भ तक यूरोप के पश्चिमी भाग के गिरजाघरों की दीवारों पर काफी तादाद में रोमानेस्क फ्रेस्को चित्रण कराया गया जो अधिकतर दीवारों की महराबी छतों पर है। 

छतों के साथ दीवारों पर भी चारों तरफ चित्रकारों को भित्ति चित्रण के लिए स्थान मिला क्योंकि रोमानेस्क गिरजाघरों की खिड़कियाँ अक्सर संकरी व अल्प होती थीं। इटली को छोड़ पच्चीकारी को इस काल में त्याग दिया गया।

फ्रांस, जर्मनी, स्विट्जरलैंड व स्पेन सब देशों के रोमानेस्क फ्रेस्को चित्रों में कुछ सामान्य विशेषताएँ दृष्टिगोचर हैं रंगों का समतल प्रयोग, काले या भूरे रंगों की रेखाओं से आकारों का स्पष्टीकरण, रेखाओं का अनुवर्तित्व, दूरदृश्य लघुता की उपेक्षा व कभी रेखाओं की ऐंठन । 

श्रेष्ठता के विचार से फ्रेस्को चित्र भिन्न स्तरों के पाये जाते हैं। कुछ श्रेष्ठ चित्रकारों के बनाये हुए हैं तो कुछ सामान्य कारीगरों के, जिनमें अनुकरण- प्रवीणता के अतिरिक्त निजी प्रतिभा का कोई परिचय नहीं है। 

किन्तु सभी श्रेष्ठ एवं सामान्य फ्रेस्को चित्र भित्ति चित्रण के सम्यक तांत्रिकी ज्ञान के अच्छे परिचायक हैं। इनमें से कुछ फ्रेस्को चित्रों पर, जो गहरी नीली एवं हरी पृष्ठभूमियों पर चित्रित हैं (उदाहरण के लिए फ्रांस में बर्जे ला-विल व प्लुय के), बिजांटाइन प्रभाव है। 

कठपुतलियों जैसी गतिहीन आकृतियों पर चटकीले पोशाकों को स्पष्ट उभारदार सलों के साथ अंकित करके भारी रंगों में चित्रण किया है। 

ऐसे लगता है कि चित्रकारों ने पच्चीकारी या तामचीनी चित्रण के चमकीलेपन से स्पर्धा करने के विचार से सबसे चमकीले रंगों का प्रयोग किया है। 

यह बिजांटाइन प्रभाव काटालोनिया (स्पेन) के सान क्लेमेंट टाहुल व सेओ द डर्गेल के गिरजाघरों के फ्रेस्को चित्रों में इतना स्पष्ट है कि ऐसे लगता है कि उनको बनाने वाले चित्रकार बाहर से पूर्ण तांत्रिक शिक्षा प्राप्त करके आये हुए थे। 

जर्मनी में बनाये गये फ्रेस्को चित्रों पर भी बिजांटाइन शैली का कुछ कम प्रभाव नहीं पड़ जिसके कॉन्स्टन्स ताल स्थित राइशेनो द्वीप के संत बेनेडिक्ट मठ के फ्रेस्कोचित्र, ओबेत्से के संत जार्ज गिरजाघर के फ्रेस्कोचित्र (10वीं सदी) एवं उन्टरत्सेल के संत पीटर गिरजाघर के फ्रेस्कोचित्र प्रसिद्ध उदाहरण हैं। 

अज्ञात चित्रकारों द्वारा अंतिम निर्णय, ईसा के चमत्कारों एवं पूर्वविधान की गाथाओं का चित्रण हुआ है। बहुत से चित्र दुर्भाग्य से अस्पष्ट हो गये हैं व कुछ पूर्ण नष्ट हो चुके हैं जिनमें इंगेल्हेम, एक्स- ला-शापेल, मेंज गिरजाघर व सेक्सनी में श्लास मर्सबुर्ग के चित्र हैं। इनमें से कुछ भौतिक विषयों के चित्र थे।

व्युर्टेम्बर्ग में बुर्गफेल्डन के गिरजाघार के फ्रेस्कोचित्रों (11वीं सदी के) का विषय ‘अंतिम निर्णय’ था। इन पर बिजांटाइन कला शैली एवं धार्मिक रूढ़िबद्धता का प्रभाव है यद्यपि इनमें दृश्यों को यथार्थ व सजीव बनाने के कुछ अस्पष्ट प्रयत्न हैं। 

स्विट्जरलैंड के जिलोस गिरजाघर के छत के चित्र (13वीं सदी) रोमानेस्क शैली के होते हुए लकड़ी के तख्तों पर बनाये हुए हैं व उनमें ईसा के जीवन की घटनाओं, काल्पनिक जानवरों व प्रतीकात्मक आकृतियों का चित्रण है। 

चित्रों की आकृतियों को चारों ओर से जिस ढंग से अटूट काली रेखा से परिवेष्टित किया है उससे लगता है कि ये चित्र रंगीन कांच चित्र का कार्य करने वाले किसी कारीगर के बनाये हुए हों। 

अधिकतर रोमानेस्क फ्रेस्को विजाटाइन शैली के ऋणों थे किन्तु जिस अज्ञात चित्रकार ने फ्रांस के से सावँ स्युर-गातप चर्च क गुम्बदों के अंतर्भागों व दीवारों को चित्रित किया उसने उस शैली का अनुकरण नहीं किया है। 

बाइबल की कहानियों को सरल व स्पष्ट रूप में चित्रित करने व घटनाओं में यथोचित गतित्व डालने के उसके प्रयत्नों को देखकर उसको ज्योत्तो व रेफिल का पूर्वगामी चित्रकार माना जा सकता है। 

सरलता व गतित्व की दृष्टि से नोआं-विक गिरजाघर के फ्रेस्को चित्र सें-सावँ के फ्रेस्को चित्रों का स्मरण दिलाते हैं यद्यपि उनके चौखटों पर बिजांटाइन शैली का स्पष्ट प्रभाव है एवं अभिप्रायों को सीधे पाण्डुलिपि अलंकरण शैली से लिया गया है। 

इस प्रकार पुरोहितों के आधिपत्य से मुक्त होकर यथार्थ रूप में चित्रण करने के प्रयत्न काटोलोनिया में टाहुल के गिरजाघर में किये हुए दिखायी देते हैं जहाँ एक स्थान पर डेविड गोलिआध की कहानी को चित्रित किया है व एक अन्य स्थान पर लाजारस व उसके जख्मों को चाटते हुए उसके कुत्ते को चित्रित किया है।

रोमानेस्क चित्रकारों में वह चित्रकार अवश्य महान होगा जिसने लावांत गिरजाघर के तहखाने (शवकक्ष) को चित्रित किया। दीवार के भिन्न टुकड़ों को प्रथम एक ही रंग से- पीला, लाल, गुलाबी आदि इनमें से एक से अंकित करने के बाद उसने उन पर मटमैले लाल रंग की जोरदार रेखा से अंकन किया है। 

आकृतियाँ ऐंठनदार, सचेत व सामर्थ्यपूर्ण बन गयी हैं। रेखओं की भावुकता व गतित्व चीनी चित्रकला व तुलुज लोत्रेक के विज्ञापन चित्रों का स्मरण दिलाते हैं।

उपरिनिर्दिष्ट जर्मन भित्ति चित्रों के पश्चात् बाहरवीं व तेरहवीं सदियों में भी महत्त्वपूर्ण चित्र निर्मिति हुई। राटिसवोन के निकट प्रयुफेनिंग के सेंट बेनेडिक्ट के मठ के फ्रेस्को चित्रों (ई.स. 1150-1170) के पुनरुद्धारण में बिजांटाइन शैली के प्रभाव की रक्षा की गयी है।

इनके अतिरिक्त पश्चिमी जर्मनी में अन्य स्थानों पर भी पुनरुद्धारित फ्रेस्को चित्र हैं जिनकी शैली के बारे में निश्चित मत प्रकट करना कठिन है। किन्तु साल्जबर्ग के नॉनबर्ग महिलाश्रम में चित्रित संतों व भविष्यवेत्ताओं की आकृतियों में बिजांटाइन प्रभाव से आरम्भिक प्रयत्न दिखायी देते हैं। कोरिथिया में गुर्क के महाविद्यालयीन गिरजाघर के मुक्त होने के चित्रों में कुँवारी मेरी को स्त्रियों के समूह में, (जो सद्गुणों के प्रतीक रूप में चित्रित की है) दर्शाया है।

गोथिक कला

रोमानेस्क कला की अपेक्षा गोथिक काल में भित्ति चित्रण बहुत कम हुआ। इसका मुख्य कारण यह था कि गोधिक वास्तुकारों ने सैद्धान्तिक दृष्टिकोण से गिरजाघरों को पत्थरों के मूल ढाँचे से बाहर से अलंकृत रूप मात्र मान कर दीवारों के क्षेत्र में विशाल कांच चित्र युक्त खिड़कियाँ रखना शुरू किया जिससे भित्ति चित्रण के लिए कोई विशेष भूमि नहीं रही। 

इसके साथ रंगीन कांचों के चमकीले प्रभाव के आकर्षण से भी भित्ति चित्रण का महत्त्व घट गया। समतल व तुलनात्मक दृष्टि से मंद प्रभाव के फ्रेस्को के रंगों से लोगों ने सबसे तेज व हौरों के समान चमकीले कांच के रंगों को तुरन्त पसन्द किया इसमें कोई आश्चर्य नहीं था।

दसवीं से लेकर चौदहवीं सदी तक यूरोप के सम्राट पवित्र रोमन साम्राज्य को सामर्थ्यवान बनाने में लगे थे। इटली में प्रवेश पाकर वे रोम में अपना राज्याभिषेक करवाते थे। 

किन्तु उनके सर्वेसर्वा होने में तीन बाधाएँ थीं। सर्वप्रथम पोप जो गिरजाघर के अधिकारों को बढ़ाने में उद्यत थे, दूसरी बाधा थी नगर जनतंत्र जो काफी तादाद में अनियंत्रित कार्य करते थे व इसके अलावा थे- सामन्त । 

इन तीनों शक्तियों ने इटली की कला के भविष्य को निर्धारित किया। बारहवीं सदी के अन्त तक इटली की कला पर बिजांटाइन प्रभाव बना रहा व फ्रेस्को के साथ उतनी ही मात्रा में पच्चीकारी चित्रण होता रहा। 

किन्तु तेरहवीं सदी के आरम्भ से बिजांटाइन प्रभाव से मुक्त होकर कला को नई दिशा में मोड़ मिलने के चिह्न नजर आने लगे।

कुछ विद्वानों के अनुसार कला को उस समय नया मोड़ मिलने का प्रमुख कारण था सन्त फ्रान्सिस द्वारा चलाया नया धार्मिक आन्दोलन व फलस्वरूप फ्रान्सिस्की धर्मसंघ की स्थापना। 

मानव जाति व निसर्ग का प्रेम संत फ्रान्सिस के उपदेशों का मुख्य तत्त्व था जिसने कलाकारों को वास्तविकता व नैसर्गिक रूप की ओर जागृत किया व वे धार्मिक विषयों को भी वास्तविक आकारों की सहायता से अभिव्यक्त करने को प्रयत्नशील हुए। 

किन्तु कुछ विद्वान इस मत के समर्थक नहीं हैं क्योंकि उनके विचार से डोमिनिकन धर्मसंघ के समान फ्रान्सिस्की धर्मसंघ के गिरजाघर भी छोटे हुआ करते थे व उनमें विशेष साज- सज्जा या अलंकरण नहीं होते थे। 

जिन चार केन्द्रों में चित्रकला के पुनरुत्थान के चिह्न दिखायी देने लगे थे वे थे ल्युका, पिसा, फ्लोरेन्स व रोम अब तक पृष्ठभूमि के रूप में दीवार का जो एक मात्र स्थान था वह समाप्त हो गया। 

तेरहवीं सदी के पूर्वार्ध में पिसा व ल्युका में लकड़ी के फलकों एवं चमड़ों पर विशाल क्रूस मूर्तियाँ चित्रित की गयीं व उनकी उच्च वेदिका की पीछे की महराब में प्रतिष्ठापना हुई। 

ईसा की आकृति के चारों और सुसमाचार की कहानियों या संत गाथाओं के दृश्यों को चित्रित किया गया। बहुत- सी क्रूस मूर्तियों के चित्रकार गुमानम हैं किन्तु उस समय बर्लिन्गेरि नाम का चित्रकार परिवार था जिसने अपने कला भवन का परिवार के नाम से प्रसिद्धिकरण किया था व जहाँ फलकों पर चित्रण किया जाता था। 

इन सुवर्णांकित पृष्ठभूमि पर अंकित फलक चित्रों पर धर्मतंत्रवाद का प्रभाव काफी अवशिष्ट है व इनमें दूर दृश्य लघुता के असफल प्रयत्न हैं। किन्तु पर्सिआ के सान फ्रान्चेस्को गिरजाघर में बोनावेन्तुरा बर्लिन्गेरि द्वारा बनाया बड़ा फलक चित्र काफी सजीव व श्रेष्ठ बन गया है। 

नीचे के हिस्से में संत फ्रान्सिस लम्बा चोला पहने हुए अपने दायें हाथ को ऊपर उठा के आशीर्वाद देते हुए बायें हाथ में किताब लिए हुए सख्त मुद्रा में खड़े हैं व पूर्ण रूप से रोमानेस्क गिरजाघरों में बनायी जाने वाली ईसा की आकृति का अनुसरण करके उनको चित्रित किया है। 

उनकी दायीं और बायीं और उनके जीवन को प्रमुख घटनाओं को छोटे आकारों में चित्रित किया है। रंगांकन एवं रेखांकन रूढ़िबद्ध हैं व हरे व लाल रंगों से चित्रित इमारतों में गहराई का अभाव है। 

पिसा शहर के चित्रकार ज्यूंता पिसानो ने अपना अधिकतर कार्य आस्सिसि में किया। गुमनाम चित्रकार, जो मास्टर ऑफ मॅग्दालीन नाम से प्रसिद्ध है, के फ्लोरेंस अॅकेडेमी में बनाये चित्र सेंट मेरी मँग्दालीन व बर्लिन्गेरि के सेंट फ्रान्सिस के चित्र में काफी समानता है। 

चित्रकार मार्गेरितोन द आरेजो ने सिएन्ना के पिनाकोतेका में संत फ्रान्सिस को उसी मुद्रा में चित्रित किया है जिस मुद्रा में बर्लिन्गरि ने संत फ्रान्सिस को चित्रित किया है। बर्लिन्गेरि के समान, मार्गेरितोन द ओरेज्जी ने संत फ्रान्सिस की आकृति को धर्म तंत्रवाद की रूढ़ियों से पृथक् होकर बनाने का काफी प्रयत्न किया है किन्तु उनकी सन्त फ्रान्सिस की आकृति अधिक आकर्षक होते हुए भी उसमें वह श्रेष्ठता नहीं है जो बर्लिन्गरि द्वारा बनायी गयी आकृति में है।

यहाँ आस्सिसि के संत फ्रान्सिस महामंदिर में बनाये गये फ्रेस्को चित्रों का उल्लेख अनिवार्य है, क्योंकि उनकी निर्मिति तेरहवीं सदी के उत्तरार्ध व चौहदवीं सदी के आरम्भ के सबसे प्रसिद्ध चित्रकारों ने की। नवें पोप ग्रेगरी द्वारा ई.स. 1228 में प्रतिष्ठापित इस महामंदिर का पवित्रीकरण 1253 ई. में हुआ जबकि संत फ्रान्सिस के अवशेषों को उसके निचले गिरजा के शवगृह में 1250 ई. में दफनाया गया। 

बार-बार कर के पन्द्रह पुनरुद्धार होने के कारण निचले एवं ऊपरी गिरजाघरों में बनाये गये फ्रेस्को चित्रों के निर्माण काल व निर्माताओं के सम्बन्ध में निश्चित मत व्यक्त करना कठिन है। ऊपरी गिरजाघर के अनुप्रस्थ भाग (Transept) व महराब के फ्रेस्कोचित्र व निचले गिरजाघर के चित्र ‘संत फ्रांसिस के साथ कुंवारी मेरी’, अधिकतर इतिहासकारों के अनुसार फ्लोरेंस के चित्रकार चिमाबु ने रोमन चित्रकार तोरिति की सहायता लेकर 1277 में आरम्भ करके पूर्ण किये। 

अवशिष्ट फ्रेस्को चित्रों के सम्बंध में अभी वाद-विवाद है यद्यपि यह निश्चित है कि उनमें से ऊपरी गिरजाघर के सन्त फ्रान्सिस के जीवन पर आधारित फ्रेस्को में प्रसिद्ध चित्रकार ज्योत्तो ने 1226 के करीब कुछ कार्य अवश्य किया है।

चित्रकार चिमाबु

वासारी के अनुसार, “चित्रकला पर वास्तविकता की प्रथम प्रकाश किरण डालने का श्रेय चेन्नो दि पेप्पी चिमाबु को दिया जाना चाहिए।” दांते के अनुसार, ” ज्योत्तो के पूर्व के चित्रकारों में से चिमाबु अपने समय के सबसे प्रख्यात थे।” विल्लनी के अनुसार “चिमाबु के साथ ही चित्रकला में निसर्ग की ओर ध्यान दिया जाने लगा।” किन्तु वासारी, दांते व विल्लनी तीनों चिमाबु के समान फ्लोरेंस निवासी थे व उनके मत कुछ पूर्वग्रह दूषित हैं जैसे कि हम आगे देखेंगे। बिजांटाइन परम्परा के विरोध में सर्वप्रथम कार्य रोमन कलाकार पिएत्रो कावालिनि ने किया।

चिमाबु (1240-1302) का जन्म फ्लोरेंस में हुआ व मृत्यु 1302 के पश्चात् शीघ्र हुई। इसके अतिरिक्त उनके जीवन एवं कला अध्ययन के बारे में विशेष जानकारी उपलब्ध नहीं है। वे 1272 में रोम गये थे व कावालिनी की कला के बारे में शायद वहाँ उनको ज्ञान प्राप्त हुआ होगा। 1301 में वे पिसा में कार्य कर रहे थे व 1302 से 1303 तक उन्होंने फ्लोरेंस में कार्य किया। 

उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं जिनमें से कुछ संदेहास्पद हैं- आरेज्जो के सान दोमेनिको गिरजाघर में चित्रित ‘क्रूस मूर्ति’, फ्लोरेंस के उफ्फिजी में बनायी ‘माता ‘मेरी’, करीबन उसी के सदृश लुन संग्रहालय स्थित ‘माता मेरी’ व पिसा के गिरजाघर का पच्चीकारी चित्र ‘संत- जान’। इन सब कृतियों में मानवाकृतियों की गतिहीन मुद्राएँ, देवदूतों के वस्त्रों पर अंकित सलवटों की समानान्तर रेखाएँ और कपड़ों पर सोने के वर्ख का प्रयोग बिजांटाइन कला के नीति नियमों के अवशिष्ट परिणाम के साक्षी हैं। 

आरेज्जो की क्रूस मूर्ति की शरीर रचना एवं सिर के उभार का नियमबद्ध अंकन पूर्ण रूप से बिजांटाइन शैली के अनुसार है। किन्तु मेरी के दोनों चित्रों में विशेषतया मेरी का चेहरा, देवदूतों की आकृतियाँ एवं लुव्र संग्रहालय के चित्र के निचले हिस्से पर अंकित छोटी आकृतियाँ यही दर्शाते हैं कि अब चित्रकारों द्वारा बाह्य रेखा से आकृतियों को स्पष्ट करने के बजाय रंगों की हल्की गहरी छटाओं से आकृतियों को ठोस रूप देने के प्रयत्न शुरू हुए थे।

आस्सिसी के निचले गिरजाघर में कुँवारी माता की सिंहासनस्थ आकृति के चारों ओर देवदूतों को चित्रित किया है व एक स्थान पर संत फ्रांसिस की आकृति भी चित्रित की गयी है। यहाँ का चित्र-संयोजन उफ्फिजी व लुव्र के ‘माता मेरी’ के चित्रों की याद दिलाते हैं यद्यपि मेरी की आकृति पुनरुद्धारित है। 

संत फ्रान्सिस की आकृति पतली-दुबली किन्तु बहुत ही भावपूर्ण है, किन्तु तेरहवीं सदी का कोई भी चित्रकार इस ढंग से हल्के हाथ से आँखें, नाक, मुँह व पतली दाढ़ी बनाके चेहरे का चित्रण नहीं किया करता था। निश्चय ही संत फ्रान्सिस की आकृति का बाद में किसी प्रतिभा सम्पन्न चित्रकार के हाथों पुनरुद्धार हुआ है।

पिएत्रो कावालिनि

बहुत काल तक पिएत्रो कावालिनि 13वीं सदी के अन्त के करीब रोम में उनके किये पच्चीकारी चित्रण के लिए प्रसिद्ध थे । किन्तु 1900 में त्रास्तेवेर के सेंट सेसिलिया में चित्रित फ्रेस्को चित्रों की खोज के बाद वे ऐसे सर्वप्रथम महान चित्रकार के रूप में प्रकाशित हुए जिन्होंने विजांटाइन कला परम्परा को अस्वीकार कर शास्त्रीय ग्रीक मूर्तिकला से प्रेरणा लेकर चित्र निर्मिति की। 

उनको मूर्तिकार तथा वास्तुकार आर्नोल्फो-दो – काम्बियो के साथ काम करने का मौका मिला था जिससे उनको कुछ कला सम्बन्धी ज्ञान अवश्य मिला होगा। संत सेसिलिया के ‘अंतिम निर्णय’ विषय पर आधारित फ्रेस्को चित्रों के दुर्भाग्य से ही हिस्से अवशिष्ट हैं जिनमें आसनस्थ ईसा के साथ बहुरंगी पंखों वाले देवदूतों, कुछ बपतिस्मा दाता संत जॉन व ईसा के पट्टशिष्यों का चित्रण है। 

यहाँ चित्रकार ने चिमाबु के चित्रण की धर्म तंत्रवादी कठोरता से आगे निकल कर प्रगति की है व आकृतियों को उभारदार बनाने के प्रयत्नों में चिमाबु के समान आत्मविश्वास का अभाव नहीं है। वस्त्रों की सलवटों में कठोर नियमितता नहीं है। आकृतियों व उनके कपड़ों में आश्चर्यजनक ठोसपन का दर्शन है। 

आकृतियाँ केवल रंगमंच की कठपुतलियों के समान दिखायी देने के बजाय स्वतंत्र व्यक्तित्व लिए हुए नजर आती हैं। ईसा के चेहरे से अविस्मरणीय गाम्भीर्य व दयालुता के भाव टपक रहे हैं व वे बिजांटाइन चित्रांतर्गत ईसा के समान सर्वशक्तिमान, न्याय निष्ठुर व रौद्र रूप लिए हुए नहीं हैं। ज्योत्तो व मास्साच्चो के पूर्वगामी इस श्रेष्ठ चित्रकार की बहुत कम कृतियाँ उपलब्ध हैं, यह एक दुर्भाग्य की बात है।

ज्योत्तो

इस महान इटालियन चित्रकार का सम्पूर्ण नाम आंजोलोत्तो या आम्ब्रोज्योतो जिसका ‘ज्योत्तो’ यह संक्षिप्त रूप है। इनके घराने का नाम बान्दोन था व इनका जन्म 1267 में फ्लोरेंस के निकट कॉले दि वेस्पिन्यानो नाम के ग्राम में हुआ। 

उम्र के 13वें साल में वे चित्रकार चिमाबु के पास नौसिखिया के रूप में कार्य करने लगे जिसमें संदेश पहुंचाना कार्यकक्ष में झाड़ू लगाना, रंगों को पीसना ये काम शामिल थे। जब रोम आकर वहाँ सांता मराया माग्योर में उन्होंने चित्रकारी की उस समय उनकी आयु 30 से कम होगी। रोम से वे आस्सिसि गये व वहाँ अपने शिष्यों के साथ उन्होंने संत फ्रान्सिस महामंदिर के ऊपरी गिरजाघर में पूर्वविधान के दृश्यों को चित्रित किया। 

दो साल पश्चात् उसी गिरजाघर में संत फ्रान्सिस की जीवन गाथाओं का चित्रण किया। इसके पश्चात् उन्होंने अपने शिष्यों के साथ भ्रमण करके रोम, फ्लोरेन्स, पिसा, पादुआ, आस्सिसि, वेरोना, फेरारा, नेपल्स, ल्यूका व मिलान में चित्रकारी की। अपने समय में भी वे श्रेष्ठ चित्रकार के रूप में ख्यातनाम थे। दांते, पीट्रार्क, बोकाच्चिओ, विल्लनि, गिबर्ति व वासारि ने उनकी भूरी-भूरी प्रशंसा की है। 1337 में आयु के 70वें साल में उनकी फ्लोरेन्स में मृत्यु हुई। ज्योत्तो के फ्रेस्को चित्रों में आस्सिसि में ऊपरी गिरजाघर के व पादुआ में स्क्रोवेनि प्रार्थनालय के ईसा के जीवन सम्बन्धी फ्रेस्कोचित्र, सांता क्रोचे में बार्दी प्रार्थनालय के संत फ्रान्सिस के जीवन सम्बन्धी फ्रेस्कोचित्र, फ्लोरेंस में सुसमाचारक संत जॉन एवं बपतिस्मादाता संत जॉन के जीवन सम्बन्धी फ्रेस्को चित्र एवं पेरुज्जि प्रार्थनालय के फ्रेस्को चित्र विशेष महत्त्वपूर्ण हैं। 

उनके द्वारा निर्मित बहुत से फ्रेस्को चित्र नष्ट हो गये जिनमें से नेपल्स के राजा के महल के एवं मिलान स्थित वायकांति महल के फ्रेस्को चित्रों की हानि विशेष रूप से शोकजनक है; उनमें उन्होंने बाइबल एवं ग्रीक पुराणों के व्यक्तियों को चित्रित किया था। यहाँ हम यह नहीं भूल सकते कि उन्होंने अल्प मात्रा में तिपायी-चित्रण भी किया था एवं उनके रेखांकन के आधार पर फ्लोरेंस के सांता रेपारात्ता गिरजाघर में उभारदार नक्काशी का निर्माण हुआ।

लगभग 40 वर्ष लम्बे कार्याविधि में की गयी ज्योत्तो की चित्र निर्मिति में ऐसी एकरसता है कि उसका सम्यक अध्ययन एक साथ किया जा सकता है। ज्योतो की कला। की उसके निकटतम पूर्ववर्ती कला से तुलना करते ही स्पष्ट हो जाता है कि ज्योत्तो की नवीन शैली से समकालीन दर्शक आश्चर्यचकित क्यों हुए एवं ज्योत्तो की चित्रित आकृतियाँ उनको पहले पहल ही इतनी सजीव क्यों दिखायी दीं। ज्योत्तो के फ्रेस्को व फलकों के साथ ही बिजांटाइन रूढ़िवाद व सुवर्णांकित पृष्ठभूमि पर चित्रण करने की प्रथा का पूर्ण लोप हुआ। 

उनकी मानावकृतियाँ जमीन पर दृढ़ता से खड़ी हैं; आकार घनत्व लिए हुए विस्तृत व सरल हैं; कहीं संकोच या रूखापन नहीं है, उन्होंने अनावश्यक आलंकारिकत्व व बारीकियों का उच्चाट किया है। किन्तु ज्योत्तो का नैसर्गिक रूप से प्रेरित होना केवल मानवाकृति तक ही सीमित है। पृष्ठभूमि के दृश्यों को उन्होंने सांकेतिक रूप में गौण महत्व देकर संक्षेप में चित्रित किया है। दृश्यांतर्गत भवनों में दूरदृश्य लघुता का अभाव है; पहाड़ो चट्टानों व वृक्षों के अंकन में कथनात्मकता का भाव है न कि वस्तु सादृश्य के प्रयत्न । 

ज्योतो का ध्यान मानवों व उनके क्रियाकलापों पर केन्द्रित था व अपनी इस दिलचस्पी को उन्होंने सरल अपितु श्रेष्ठ रूप में चित्रांतर्गत करने में अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। चुने गये विषय का परिणामकारक, अभिव्यक्तिपूर्ण चित्रण उनकी प्रतिभा का मुख्य लक्ष्य था। अतः उन्होंने विषय को ही सर्वस्व मानकर अन्य बातों का विशेष विचार नहीं किया। मुख्य विषय को उठाव देने के लिए आवश्यक सजावट का प्रयोग उन्होंने जरूर किया है, किन्तु उसमें आडम्बर या प्रदर्शन नहीं है। 

ऐसी सजावट को हम उनके चित्र पादुआ में ‘ईसा पर ‘कशाघात’, सान क्रोचे के बाद प्रार्थनालय में ‘सुलतान व पूर्ववासी लोग’ में देख सकते हैं। उन्होंने परिहास को ठुकराया नहीं व ‘कॉन का विवाह समारोह’ चित्र में उन्होंने जिस मर्मभेदी विनोद बुद्धि से तोंद वाले भटियारा को चित्रित किया है वह उसका उदाहरण है। इतिवृत्त-लेखकों के अनुसार अपने मित्र मंडल में ज्योत्तो जिन्दा दिल साथी थे व हमेशा प्रसंगोचित मजाक के लिए प्रयत्नशील रहते थे। (चित्र 35 )

उनके चित्रों में सिएन्ना शैली में उपलब्ध सौम्य कलात्मक माधुर्य नहीं है एवं उनके नाटकीय प्रसंगों के चित्रों में अभिनय, ओजस्विता या अतिशयोक्तिपूर्ण अभिव्यक्ति का अभाव है। उनके वक्तव्य में सौहार्द्र का संयम है। सहज तरीके से अस्वाभाविक बल दिये बिना उनकी अभिव्यक्ति दर्शकों को स्पर्श कर प्रभावित कर लेती है। 

उनके चित्र ‘लाजारस को पुनर्जीवित करना’ व ‘निरपराधों का हत्याकांड’ में ईसा के, ‘ज्यूडास का चुम्बन’ में ज्युडास के तथा ‘ईसा का जन्म’ में मेरी के मुखमंडल सौम्य किन्तु हृदयग्राही भावों से प्रकाशमान हैं। स्वयं को क्या कहना है यह ज्योत्तो यथातथ्य जानते थे व उन्होंने उसे सरल किन्तु सामर्थ्यपूर्ण ढंग से अद्वितीय कला प्रभुत्व के साथ कहा है। 

अपने कर्तव्यपरायण शिष्यों के सहयोग के कारण ज्योत्तो इतने असंख्य फ्रेस्को चित्रों को पूर्ण कर पाये। ये शिष्य कला शिक्षा प्राप्त करने के साथ उनके चित्रकार्य में सहायता भी किया करते थे। इनमें से कुछ शिष्य गुमनाम हुए जिनमें वे प्रतिभा सम्पन्न शिष्य हैं जिन्होंने ‘शुचिता’, ‘निर्धनता” आज्ञाकारिता’ व आस्सिसि के निचले गिरजाघर के ‘परमानन्दमग्न संत फ्रान्सिस’ जैसे फ्रेस्को चित्रित किये। 

बहुत समय तक इन फ्रेस्को के निर्माण का श्रेय ज्योत्तो को दिया जाता था किन्तु अब माना जाने लगा है कि निश्चय ही ये चित्र दूसरे किसी के हाथ के हैं, क्योंकि इनमें ज्योत्तो के प्रभुत्व व संयम का अभाव है एवं इनमें ऐसे रंग प्रयोग व चित्ताकर्षक कथन सम्बन्धी बारीकियाँ हैं जिनको ज्योत्तो त्याज्य मानते थे। आधुनिक शोधकार्य के फलस्वरूप ज्योत्तो के कई चित्रकार-शिष्यों के नाम उपलब्ध हो गये हैं किन्तु उनकी कलाकृतियों को स्वतंत्र रूप से पहचानना बहुत कठिन है। 

उनमें से कोई भी शिष्य सामर्थ्यपूर्ण, स्वतंत्र कलात्मक व्यक्तित्व का विकास करने में सफल नहीं हुआ यद्यपि उन्होंने अपने कलागुरु से बहुत कुछ सीखा। ज्योत्तो के शिष्य ताद्देओ गाद्दी व बर्नार्दो दाद्दी के चित्र ज्योत्तो की शैली के प्रशंसनीय अनुसरण मात्र हैं

। उनके शिष्यों में से वे सबसे प्रतिभा सम्पन्न प्रतीत होते हैं जिनको इतिहासकार अपर्याप्त आधार के कारण पहचान नहीं पाये हैं व जिनका ज्योत्तिनो या मासो दि बान्को नाम से उल्लेख किया जाता है। उनके फ्लोरेन्स के सेंट क्रोचे में चित्रित संत सिल्वेस्टर के जीवन सम्बन्धी फ्रेस्को की सुरम्यता के बारे में दो मत नहीं हो सकते।

सिएन्ना शैली

जिस समय फ्लोरेन्स के चित्रकार ज्योतो चित्रकला को नवीन जीवन संचार देने में। प्रयत्नशील थे व अपनी अद्वितीय प्रतिभा से इटली के बहुत से भागों पर कला प्रभुत्व जमाये । हुए थे, सिएन्ना में एक समान कलात्मक प्रवृत्ति के कुछ चित्रकार विशिष्ट शैली में चित्रण कर रहे थे जो शैली लगभग एक सौ पचास साल तक जीवित रही। इन चित्रकारों में अग्रणी धे दुच्चिओ दि ब्वोनिन्सेन्या (1260-1318) ज्योत्तो के समान व बिजांटाइन शैली से परावृत्त नहीं हुए।

दुच्चिओ के आरम्भकालीन चित्रों में से सिएना संग्रहालय के चित्र ‘मरियम व शिशु ईसा’, जो ‘क्रीवोल मरियम’ नाम से प्रसिद्ध है, से स्पष्ट होता है कि उन्होंने किस तरह बिजांटाइन शैली की रूढ़ियों व आकारों को ग्रहण कर व उसमें अपनी सूक्ष्म दृष्टि व व्यक्तिगत परिभाषा को सम्मिलित कर कलासर्जन का आरम्भ किया। 1285 में चित्रित ‘रुचेलाइ मरियम’ नाम से ज्ञात ‘मरियम व शिशु ईसा’ चित्र (उफ्फिजी, फ्लोरेन्स) में उन्होंने इन्हीं विशेषताओं को व्यापक पैमाने पर व जटिल रूप देकर प्रदर्शित किया है। 

इसके पश्चात करीब 20 वर्ष से अधिक काल तक व अपनी सर्वश्रेष्ठ कलाकृति ‘तख्तनशीन मेरी’ (Maesta) बनाने से पूर्व दुच्चिओ ने नेशनल गैलरी (लंदन) का त्रिपट, पेरुजिआ वीथिका (बर्न) के चित्र आदि अनेक छोटे-छोटे चित्र बना के अपनी कला को अधिक कोमल, परिचयात्मक रूप देकर व ‘क्रीवोल मरियम’ के कठोर गाम्भीर्य से मुक्त कर विकसित किया व उसको मृदु व काव्यात्मक रूप प्रदान किया जिसके उदाहरण हैं ‘फ्रान्सिस्कनों के साथ मरियम’ (पिनाकोतेका नेशनल, सिएन्ना), ‘मरियम व शिशु ईसा छः देवदूतों के साथ’ (कुटं म्युजियम, बर्न)। 

उनकी सर्वश्रेष्ठ कलाकृति ‘तख्तनशीन मरियम’ (Maesta) है। सभी कलाकृतियों में उन्होंने वास्तविकता से प्रतीकात्मकता को अधिक महत्त्व दिया है। ‘तख्तनशीन मरियम’ सिएन्ना गिरजाघर के लिए बनवाया गया विशाल (83″ x 168 ) वेदिका चित्र है जो काष्ठ फलक पर दोनों तरफ चित्रित है। 

सामने तख्तनशीन मरियम व शिशु ईसा को संतों के साथ चित्रित किया है व पीछे छोटे हिस्सों में विभाजित कर अनेक फलकचित्र बनाये हैं जिनके विषय ईसा व मरियम के जीवन की घटनाएँ हैं। सामने के बड़े फलक चित्र व पीछे के फलक चित्रों को पृथक कर अब म्युजिओ देल्लोपेरा देल द्युओमो (सिएन्ना) में संगृहीत किया गया है।

यह सर्जनशील कार्य न केवल अलंकृत चौखट से मढ़वाया हुआ सुवर्णांकित व सतेज पृष्ठभूमि पर बनाया एक अभ्यसनीय स्मरणीय वेदिकाचित्र है बल्कि पच्चीकारी या तामचीनी के समान चमकीला व नेत्रदीपक प्रभाव देकर चित्रकार ने उसका बहुमूल्य कलावस्तु रूप में निर्माण किया है। उसके पीछे के छोटे फलक चित्रों में दुच्चिओ ने बिजांटाइन धर्मतंत्रवाद से मुक्त होकर अधिक सजीव चित्रण करने का प्रयत्न किया है। 

वैसी ही के सुवर्णाकित पृष्ठभूमि, मुलम्मा किए हुए अलंकरण, चमकीले रंग व धर्मतंत्रवाद का नियंत्रण सिमोन मार्तिनी (1284-1344) के फलक चित्रों में दृष्टिगोचर है, विशेषतया उनके सिएन्ना के पार्लब्जो पब्लिकों के लिए चित्रित ‘माता मेरी’ व फ्लोरेंस के उफ्फिज संग्रहालय के चित्र ‘दूत संदेश’ चित्रों में, जिनके निर्माण में उनके बहनोई लिप्पो मेम्मी ने हाथ बंटाया था। 

चित्र ‘दूत संदेश’ में महादूत का पल्लवांकित, परी समान चेहरा इतना मोहक बन गया है कि कुंवारी मेरी के चेहरे पर कुशलता से चित्रित लज्जा व विनय के भावों की ओर दर्शकों का ध्यान शीघ्रता से नहीं पहुँचता ।

किन्तु अपने फ्रेस्को चित्रों में सिमोन मार्तिनी ने बिजांटाइन रूढ़ियों से मुक्त होकर आसपास के जीवन से प्रेरणा प्राप्त कर चित्रण करने में सफलता प्राप्त की है। उदाहरण के लिए आस्सिसि के संत फ्रान्सिस गिरजाघर के एक फ्रेस्को में उन्होंने दो पथ-गायकों को आकर्षक पोशाक पहने हुए, एक को प्रसन्नता के साथ बाँसुरी व दूसरे को तीन-तारी वाद्य यंत्र रिबेक बजाते हुए चित्रित किया है तथा संत फ्रांन्सिस को शूरवीर जैसे चित्रित किया है। मार्तिनी ने जीवन के अन्तिम पाँच वर्ष आविन्यो में बिताये। वे पीट्रार्क से परिचित थे जो उनका बहुत आदर करते थे। (चित्र 36 )

पीएत्रो लोरेन्जेत्ति 

पीएत्रो लोरेन्जेत्ति ( 1305-1348) व उनके भाई आम्ब्रोजिओ (1319-1348) दोनों चित्रकार थे व दोनों की उसी वर्ष प्लेग में मृत्यु हुई। पिएत्रो लोरेन्जेत्ति की सबसे महत्त्वपूर्ण कलाकृति है आस्सिसि के निचले गिरजाघर में बनायी हुई फ्रेस्को चित्रों की मालिका। उस चित्रमालिका में हमें कलात्मक व्यक्तित्व, जिसका पूर्वगामी चित्रकारों में अभाव था, अंकन-पद्धति में अधिक स्वतंत्रता व कुछ नाटकीय प्रभाव का दर्शन होता है। 

जिनके कारण उनके चित्र ‘क्रूस के अवतरण’ को उस सदी के श्रेष्ठ चित्रों में से एक माना गया है। आम्ब्रोजिओ लोरेंजेत्ति ने भी परम्परा से एकनिष्ठ रहकर ‘माता मेरी’ व ईसाई संतों के चित्र सुवर्णांकित पृष्ठभूमि पर चमकीले रंगों का प्रयोग करके बनाये हैं। किन्तु उनके सिएन्ना के पालाज्जो पब्लिको में चित्रित फ्रेस्को ‘अच्छे व बुरे राज्य शासनों की रूपक कथाएँ’ बिलकुल भिन्न शैली के हैं। इन चित्रों में वास्तविकता के यथार्थ चित्रण के साथ रूपकात्मकता को सम्मिश्रित किया है व चित्रकार पर काल्पनिक से वास्तविक का प्रभाव बलवत्तर दिखायी पड़ता है। 

प्रचलित कला रूढ़ि के अनुसार गहरे आसमान के नीचे सिएन्ना के आसपास के दृश्यों का मनमाने ढंग से चित्रण किया है, फिर भी उतार-चढ़ावदार पहाड़ियों, किले, खेतों में काम करते हुए किसान पहचाने जाते हैं। शहरी जीवन के चित्रण में उन्होंने अपनी सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति का परिचय कराया है एवं शिकार के लिए निकले हुए अश्वारोहियों, बाजार की ओर जाते हुए किसानों व नृत्य करती हुई बालिकाओं का चित्रण उन्होंने बहुत ही दिलचस्पी से किया है। 

सिएन्ना शैली के उपर्युक्त चित्रकारों के पश्चात् आये हुए आंद्रिया वान्नी, बार्तोलो दि माएस्त्रो एवं अन्य चित्रकारों में कोई विशेष प्रतिभा सम्पन्न ऐतिहासिक महत्व के चित्रकार नहीं थे। इनके साथ ही सिएन्ना शैली समाप्त हुई। 

अपने समृद्धि के काल में इस शैली ने न केवल कुछ श्रेष्ठ कलाकृतियों का निर्माण किया बल्कि इटली, दक्षिणी फ्रान्स के प्रोवान्स क्षेत्र, जर्मनी, पोलैण्ड व स्पेन की कलाओं को प्रभावित किया। फ्रेंच चित्रकला का उदय चौदहवीं सदी में फ्रांस में काफी चित्रण होता था यद्यपि पाण्डुलिपि अलंकरण, दीवार पर्दा चित्रण व रंगीन कांच चित्रण बाहर से होकर आता था। 

इस काल की फ्रेंच यूरोपीय चित्रकला का इतिहास (प्रतिहासिक कला से बाद तक) चित्रकला की बहुत सी नोमिति नष्ट हो गई है फिर भी जो कुछ फ्रेस्को अवशिष्ट हैं उनसे पता चलता है कि विदेशी प्रभावों के अतिरिक्त वहाँ स्थानीय चित्रकला की परम्परा काफी सुद्द थी। 

रोमाने चित्रकला में उपलब्ध आकार ज्ञान व भव्यता इनमें नहीं थी। जटिलता एवं अत्यधिक परिमार्जन व सुधारता के ख्याल के कारण इन फ्रेस्को को भित्ति चित्र कहने के बजाय बड़े पैमाने पर बनाये गये पाण्डुलिपि चित्र कहना उचित होगा।

लकड़ी के फलक पर चित्रित कृतियों में सबसे प्रसिद्ध आरम्भिक चित्र हैं बानवास वेदिका चित्र जिसमें संतपौल व संत पीटर के बीच कुंवारी मेरी को बालक ईसा का लालन- पालन करते हुए दर्शाया है। इस चित्र का निर्माता इंग्लिश था या फ्रेंच इस सम्बन्ध में मतभेद है किन्तु विशेषज्ञों के मतानुसार यह चित्र तेरहवीं सदी के समय का है। फ्रांस का राजा ज्या लॉ का व्यक्तिचित्र जो 1360 के करीब चित्रित किया गया व अब लुव्र संग्रहालय में है. उस समय के दुर्लभ चित्रों में से है। 

उसका कलात्मक के बजाय ऐतिहासिक दस्तावेज के रूप में महत्त्व है। ‘नाबॉन परिधान’ नाम के प्रसिद्ध रेशमी कपड़े पर कलम व स्याही से बनाया वेदिका चित्र सुरक्षित है जिसमें मनोविकार पीड़ित दृश्यों का चित्रण है व राजा पाँचवाँ चार्ल्स व उसकी रानी को घुटने टेके हुए दर्शाया गया है, रेखांकन बारीक व कोणदार डोकर सुलेखन शैली के समान है।

नेशनल गैलरी स्थिति विल्टन द्विफलक चित्र में कुंवारी मेरी के सामने राजा, दूसरा रिचर्ड व उसकी रानी को घुटने टेके हुए दर्शाया है एवं आसपास देवदूतों को चित्रित किया है। यह चित्र 1396 के करीब का है व निस्संदेह आकर्षक है। लेकिन शैली पाण्डुलिपि चित्रण शैली के समान ही है। 

उस काल के अन्य फलक-चित्र निजी एवं सार्वजनिक संग्रहालयों में हैं किन्तु ऐतिहासिक महत्त्व के होते हुए उनका कलात्मक महत्त्व बहुत कम है। वास्तव में फ्रांस में महत्त्वपूर्ण कला निर्मिति का आरम्भ पन्द्रहवीं सदी में हुआ जब उस पर फ्लेमिश व इटालियन कलाओं का प्रभाव पड़ने लगा।

1343 में पोप छठे क्लेमंट ने सिएन्ना के चित्रकार मात्तेओ ज्योवानेत्ति-जो ‘दि- वितेबों’ नाम से पहचाने जाते थे- को आविन्यो के पोप के महल की साज-सज्जा करने को निमंत्रित किया। उन्होंने अपने शिष्यों की सहायता से जो धार्मिक फ्रेस्को चित्रित किए वे निश्चय ही इटालियन शैली से मिलते-जुलते हैं किन्तु शिकार व माहीगिरी के दृश्यों के चित्र फ्रेंच व फ्लेमिश शैलियों के समरूप हैं। यही बात सोवें के भवन में 1365 के करीब निर्मित शिकार व प्रणय के दृश्यों के फ्रेस्को के बारे में कही जा सकती है।

जर्मन चित्रकला का उदय

13वीं सदी का पूर्वार्ध जर्मन साम्राज्य के लिए बहुत फलता-फूलता रहा किन्तु उसके उत्तरार्ध में यह समृद्धि घटने लगी। इसके साथ शहरवासी जो सम्पन्न होते जा रहे थे जिनमें प्रतिष्ठा को कल्पना बढ़ती जा रही थी, कला के आश्रयदाता बन रहे थे। इस समू सदी में न्यूनाधिक मात्रा में कलाकार बिजांटाइन प्रभाव से मुक्त होने की दिशा में प्रयत्न रहे। 

बिजांटाइन प्रभाव का मुख्य केन्द्र था वेस्टफालिया का नगर, जोएट जहाँ से यह प्रभाव पूरे उत्तर जर्मनी में फैलता गया। प्रतिनिधिक उदाहरण के रूप में डोरमेंट के मारिएन किस गिरजाघर के भित्ति चित्रों का उल्लेख किया जा सकता है जिनकी शैली का अन्य क्षेत्रों के चित्रकारों ने काफी अनुसरण किया। बिजांटाइन गिरजाघर की सर्वसाधारण रूपरेखा को सम्मुख रखके इस गिरजाघर का निर्माण हुआ। हिल्डेशीम के संत माइकिल गिरजाघर के छत पर बनाये ‘जेसी का वृक्ष’ कहानी का चित्र गिरजाघर के रंगीन कांच चित्रण शैली का स्मरण दिलाता है।

कलोन के संत गेरेआन व संत क्युनिबर्ट गिरजाघरों के बपतिस्मा संस्कार के लिए निर्मित फव्वारों पर बनाए चित्र अधिक स्वच्छन्द व सजीव हैं जो शायद फ्रेंच चित्रण शैली के प्रभाव के कारण है। जर्मन चित्रकला में फलक चित्रों का निर्माण सबसे पहले वेस्ट फालिया व सॅक्सनी में हुआ। 

ये फलक चित्र वेदिकाओं को सजाने के लिए बनाए गए। आरम्भ में, धातु की पतली चादर पर उभारदार अलंकरण का चित्र (Repousse) बना के वेदिका के पुरोभाग को सजाने का रिवाज था। परन्तु बाद में उसकी जगह कम खर्चीले मुलम्मांकित पृष्ठभूमि पर बनाए चित्रों का प्रयोग किया जाने लगा। 

मुलम्मा की हुई गचकारी का भी प्रयोग होता था। वेदिका के पीछे तीन फलक एक साथ जोड़कर खड़े किये जाते थे जिससे कि दोनों तरफ के दो फलकों को बीच के फलक पर बन्द किया जा सके। 

13वीं सदी में वेदिका के अग्रभागों व वेदिका चित्रों को जोएश्ट व सॅक्सनी के निचले प्रदेश के क्वेडलिन्बुर्ग में बनाया जाता था। इनमें से जोएश्ट के वीसेन-किर्श (किर्श = चर्च) चर्च के वेदिका का अग्रभाग अनोखा है। 

इसके तीन हिस्से हैं; बीच के हिस्से में त्रियेक परमेश्वर, वायें हिस्से में माता मेरी व दायें हिस्से में सुसमाचारक संत जॉन को चित्रित किया है। आकृतियाँ अभी कुछ सख्त हैं व वस्त्रों की सलवटों में कोणिकता है, फिर भी चित्रकार ने विजांटाइन परम्परा को ठुकराकर निजी कलात्मक व्यक्तित्व का परिचय कराया है।

विजांटाइन परम्परा से मुक्त होने के आन्दोलन ने 14वीं सदी में जोर पकड़ा जिसके कलोन महामंदिर के गायक-वृंद पर्दे के एवं मनोरिटेन किर्शेर गिरजाघर के चित्र, जो बहुत भावपूर्ण ढंग से बनाये हैं, उदाहरण हैं। 

इन्हीं विशेषताओं को हम उत्तरी जर्मनी के, ल्युबेक, मारिएनबुर्ग व विस्मार तथा दक्षिणी जर्मनी में कॉन्स्टंस व टायरोल में उपलब्ध भित्ति चित्रों में देखते हैं जिन पर इंग्लिश व फ्रेंच पाण्डुलिपि चित्रण शैली का प्रभाव है। 

फलक चित्रों पर इस शैली का प्रभाव विशेष स्पष्ट है। ये चित्र बहुत ही अभिव्यक्तिपूर्ण हैं यद्यपि इनकी आकृतियाँ तन्वांगी हैं व रेखांकन सुलेखन शैली के समान है। विशेष दर्शनीय चित्रों में वैबेन होसेन वेदिका चित्र, जो श्टुटगार्ट के संग्रहालय में है व क्लोश्टनायबुर्ग का वेदिका चित्र (1325) हैं।

1347 में लुक्सेम्बुर्ग का चौथा चार्ल्स सम्राट चुना गया जिसने प्राग को कला केन्द्र बनाया व वहाँ चित्रकार काफी सक्रिय हुए। दक्षिणी बोहेमिया में वाइसी ब्रॉड के मठ मे उपलब्ध नौ फलक चित्रों पर कुछ विद्वानों के अनुसार सिएन्ना शैली का प्रभाव हैं। 

ये ही विशेषताएँ प्राग-संग्रहालय-स्थित ट्रियोन के उस्ताद द्वारा बनाये (लगभग 1390) फलक चित्रों में दृष्टिगोचर हैं। 

लम्बी व पतली आकृतियाँ जीवात्माओं के समान दिखायी देती हैं। 14वीं सदी के अंत के करीब, बोहेमिया में बिजांटाइन प्रतिमा चित्रों के स्मरण दिलाने वाले मेरी व बालक ईसा के कछ चित्र बनाय गये। इस प्रकार के चित्र स्लाव लोगों के प्रदेशों यूरोपीय चित्रकला का इतिहास (प्रागैतिहासिक कला से यथार्थवाद तक)

में जैसे कि पूर्वी प्रशिया, शिलेशिया में प्रचलित थे। ऐसे चित्र काफी तादाद में नुरेम्बर्ग शैली में उपलब्ध हैं। यह शैली 15वीं सदी में काफी लोकप्रिय हुई। किन्तु बाम्बर्ग के फ्रान्सिस्कन चर्च के सुन्दर त्रिपट वेदिका चित्र पर इटालियन कला का प्रभाव है। 

दक्षिणी टाइरोल के भित्ति चित्र, जिनमें भौतिक जीवन का चित्रण है, इसी इटालियन शैली से प्रभावित हैं। आल्टम्युल्डोर्फ का ‘क्रूसारोपण’ जो 1420 में चित्रित किया गया, उस पर ज्योत्तो का प्रभाव है, जैसे कुछ आस्ट्रियन चित्रों पर भी है किन्तु अन्य चित्रों में बोहेमियन शैली की की गयी है। सुरक्षा

स्पेन में व्यापार से काफी समृद्ध हुए कॅटलोनिया प्रदेश में प्रचुर कलानिर्मिति हो रही थी किन्तु वहाँ कला का आरम्भिक काल होने से किसी मौलिक प्रतिभा का उदय नहीं हुआ।

फेरेर बासा

(जन्म 1285-1290 के लगभग व मृत्यु 1348 ) नाम के स्पेनिश चित्रकार ने सिएन्ना के चित्रकार सिमोन मार्तिनी व लोरेंजेत्ति का कुछ अकुशल व आत्मविश्वासहीन अनुकरण किया। 

यही विचार चित्रकार सेरा बंधुओं (जेनेई जन्म 1395, पेड्रो 1347-1403) की कला को लागू होता है। किन्तु 14वीं सदी के अंतिम वर्षों में एवं पन्द्रहवीं सदी के आरम्भिक काल में उत्तरी फ्रांस, फ्लैन्डर्स व बर्गन्डी में रोचक कला निर्मिति हुई। 

चित्रकला के साथ यहाँ के कलाकारों ने प्रचुर मात्रा में पाण्डुलिपि चित्रण किया जबकि विगत डेढ़ सौ साल तक पाण्डुलिपि चित्रण को गौण, अतिरिक्त कार्य माना जाता था। अब ऐसे प्रतीत होता है कि यहाँ के कलाकार मुख्य रूप से पाण्डुलिपि चित्रकार थे व जब उन्होंने चर्म पत्र पर पाण्डुलिपि चित्रण करने के अतिरिक्त फलकों पर चित्रण किया तब उस पर पाण्डुलिपि चित्रण शैली का प्रभाव मौजूद रहा।

छुक -द-बेरी, जिनकी सुन्दर चित्रित ग्रंथों में उत्कट अभिरुचि थी, के लिए चित्रण करने वालों में जाकमार द एस्दै व पॉल एवं लॅम्बुर के एनेक्वँ व एम थे जिन्होंने लगभग 1402 व 1416 के बीच कार्य किया। 

पुस्तक ‘लत्रे रिशे और छु द बेरी’ का पाण्डुलिपि चित्रण प्रसिद्ध है जिसमें प्रकाश का प्रभाव, प्रकृति चित्रण एवं काम करते हुए किसानों व खेल में व्यस्त प्रतिष्ठित स्त्री-पुरुषों का आकर्षक चित्रण है। पुस्तक ‘ओर द रोओं’ का चित्रण किसी निपुण व मौलिक प्रतिभा के अज्ञात चित्रकार द्वारा पन्द्रहवीं सदी के मध्य किया गया। उपर्युक्त गुणों का चित्रकार मेल्सिओ ब्रोदरलाम, ज्यां मालुएल व आंरी बेलशोस द्वारा सुवर्णांकित पृष्ठभूमि पर बनाये गये फलक चित्रों में अभाव है। 

ब्रोदरलाम इप्र के निवासी थे व उन्होंने 14वीं सदी के अन्त के करीब कार्य किया। उनके चित्रण में कोमलता व संवेदनशीलत्व है। मालुएल की मृत्यु 1415 में हुई। उनका चित्र ‘शोकग्रस्त मेरी’ लुन संग्रहालय में है जिसके अंकन में सामर्थ्य का अभाव है। उन्होंने बेलशोस के साथ एक चित्र बनाया जिसके चित्रण का आदेश नार्मन्दी के ड्यूक फिलिप ने 1398 में किया था। 

क्रूसारोपित ईसा के ऊपर परमेश्वर व पवित्र आत्मा का चित्रण है, दायें व बायें हिस्सों में दो दृश्यों का चित्रण है जिनमें संत डेनिस के बलिदान व संत को कारावास में दिए ईसा के दर्शन को चित्रित किया है। चित्रण निस्संदेह कुशलताहीन है व भिन्न आकृतियों में मनमाना अनुपात है किन्तु कुल्हाड़ी से संत का शिरच्छेद करने वाले जल्लाद का चित्रण सामर्थ्यपूर्ण है व दर्शकों के चेहरों से जो करुणा के भाव टपक रहे हैं उनको काफी यथार्थ चित्रित किया है।

पन्द्रहवीं सदी की पूर्व संध्या में इटालियन चित्रकला पन्द्रहवीं सदी की पूर्व संध्या में उत्तरी इटली में ज्योत्तो व सिएन्ना के चित्रकारों से प्रेरणा प्राप्त करके प्रान्तवार चित्रण शैलियाँ विकसित हुईं। अपनी निजी शैली का क्रमशः विकास करते समय वहाँ के कलाकारों ने जर्मन एव फ्रेंन्को फ्लेमिश शैलियों का भी अध्ययन किया। 

वेनेशिया क्षेत्र में सबसे अधिक प्रतिभा प्रकट हुई। वेरोना व पादुआ में आल्तिकिएरो (कार्यकाल 1369-1384) व उनके सहयोगी आवान्जो (1350-1400 ई.) ने चित्रकारी की। जिस ढंग से उन्होंने मानवाकृतियों का समूहीकरण किया है उससे प्रमाणित होता है कि उन्होंने स्क्रोवेन्यी प्रार्थनालय में ज्योत्तो के बनाये हुए चित्रों का अध्ययन किया होगा। वेनिस में बिजांटाइन शैली की कुछ रूढ़ प्रथाओं से सम्मिश्रित अंतरराष्ट्रीय गोथिक नाम से प्रसिद्ध हुई शैली का उदय हुआ जिसके जाकोबल्लो देल फिओर (मृत्यु 1439 ) व मिकेल ज्याम्बोनो (मृत्यु 1462) की कलाकृतियाँ उदाहरण हैं। 

आल्तिकिएरो का शिष्य स्तेफान दा जेवियो द्वारा बनाये कुछ फलक चित्र उपलब्ध हैं जिनमें रीतिवादी कृत्रिमता होते हुए भी आकर्षकता है किन्तु वे बहुत ही आलंकारिक बन गये हैं। मुख्य रूप से पाण्डुलिपि चित्रकार होते हुए जेन्ताइल दा फाब्रिआनो (1360-1427) ने रंग-संगति में मनोहर चित्र बनाये हैं जिनमें कहीं सोने का भी प्रयोग किया है। किन्तु आन्तोनिओ दि पुच्चिओ दि चेरितो (1395-1405 ई.) जो पिसानेलो नाम से प्रसिद्ध हुए सबसे असाधारण थे। 

वे असाधारण प्रतिभा के पदक कलाकार, उत्कृष्ट रेखांकनकार एवं चित्रकार थे व उनकी शैली में कुछ मौलिक विशेषताएँ थीं। दुर्भाग्य से उनके बहुत कम रंगीन चित्र उपलब्ध हैं किन्तु उनके रेखाचित्रों का उत्कृष्ट संग्रह लुव्र संग्रहालय में सुरक्षित है जिसमें जानवरों व पक्षियों के रेखाचित्र विशेष प्रभावशाली हैं। परिचित तथा अपरिचित विदेशी जैसे गोल्डफिंच पक्षी, चीता आदि जानवरों का उन्होंने असाधारण प्रभुत्व से रेखांकन किया है। 

समकालीन चित्रकारों की कृतियों का वे गहराई से निरीक्षण किया करते थे। उनके वेरोना के सान्त अनास्तासिआ व सान फर्मों में बनाये फ्रेस्को से भी उनके जानवरों के प्रति स्नेह का परिचय मिलता है। पहले स्थान के ‘संत जार्ज व ड्रैगन फ्रेस्को’ में संत जार्ज को 

मजबूत घोड़े पर सवार हुए, अपने कुत्तों के साथ राजकन्या की मुक्तता करते हुए काल्पनिक नगरी की पृष्ठभूमि पर चित्रित किया है। सान फर्मों के एक फ्रेस्को में सुसमाचारक गाब्रियल को आगे झुककर कुंवारी मेरी को सुसमाचार बताते हुए चित्रण किया है व मौका देखकर चित्रकार ने एक छोटे कुत्ते व कुछ कबूतरों का भी चित्र में समोवश किया है। उनका एस्ते घराने की राजकन्या का व्यक्ति चित्र, जिसमें तितलियों व पुष्पयुक्त पौधों की पृष्ठभूमि पर पाश्र्व मुखाकृति चित्रण है, कड़ाई से वास्तविकता व बारीकियों के साथ पूर्ण किया गया है।

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