पन्द्रहवीं सदी की योरोपीय चित्रकला (आरम्भिक पुनर्जागरण )

महान् कलात्मक आन्दोलन जो पुनर्जागरण या पुनरुत्थान नाम से प्रसिद्ध है व जिसका इटली में पन्द्रहवीं सदी में आरम्भ हुआ था, के क्या कारण थे, इसका विश्लेषण करने के कई विद्वानों ने प्रयत्न किए हैं। 

किन्तु इतिहासकार बहुधा इस बात को भूल जाते हैं कि पन्द्रहवीं सदी के कलाकार बुद्धिजीवी न होकर कम शिक्षित शिल्पी मात्र थे अर्थात् कलात्मक पुनर्जागरण द्वारा कला में हुए क्रांतिकारी परिवर्तन के कारण प्रथमतः कलात्मक ही थे व प्रसंगवश उसको आर्थिक व दार्शनिक विचारों से प्रोत्साहन मिला था। 

इस विचार पर बल दिया जाता है कि पन्द्रहवीं सदी में इटली का मध्यम वर्ग समृद्ध होता जा रहा था, उसमें प्रतिष्ठा की कल्पना बढ़ती जा रही थी व व्यापारिक तथा औद्योगिक नगर धनाढ्य हो गये थे व इसी आर्थिक विकास से प्राप्त प्रोत्साहन व आश्रय पुनर्जागरण के प्रमुख कारण थे। 

यह विचार सही प्रतीत नहीं होता क्योंकि धन का प्रलोभन लालायित कलाकारों को आकर्षित कर सकता है किन्तु केवल उसी से ही वे कलाकार प्रतिभासम्पन्न नहीं बन सकते। 

देश के वैभव सम्पन्न होने से अनिवार्य नहीं है कि वहाँ श्रेष्ठ कलाकार पैदा हों। यदि ऐसे होता तो 19वीं सदी के समृद्ध इंग्लैण्ड में भी महान् कलाकारों का होना अवश्यम्भावी था ग्रीस व रोम के साहित्य तथा प्लेटो के दर्शन से प्रभावित मानवतावादी विचारों का प्रसार यह भी एक कारण बताया जाता है। 

किन्तु इसमें यह कठिनाई पैदा होती कि मानवतावादी विचारधारा के प्रमुख प्रवर्तक क्युसा के निकोलास, पिको द ला मिरांदोला, मार्सिलिओ फिचिनो व एरास्मस के प्रसृत विचारों से पन्द्रहवीं सदी के चित्रकार बिलकुल अपरिचित थे व वे अपनी कलात्मक समस्याओं को हल करने में व्यस्त थे। 

इसके अतिरिक्त ग्रीक पक्षपाती दृष्टिकोण के प्रभाव में आकर इटली के मानवतावादियों की धारणा बन गयी थी कि हस्त व्यवसाय गुलामों के ही अनुरूप है व वे कलाकारों की ओर अवहेलना की दृष्टि से देखते थे। 

ग्रीक कला के अवशेषों के सौन्दर्य से मुग्ध होकर उनके अनुकरण करने को उद्यत हुए कलाकारों के प्रयत्नों से पुनर्जागरण हुआ, ऐसा भी मत व्यक्त किया जाता है। किन्तु हमको कलाकारों के दो भिन्न वर्गों को सम्मुख रख के इस मत का सत्यापन करना पड़ता है। पहले वर्ग में आते हैं वास्तुकार व मूर्तिकार व दूसरे वर्ग में आते हैं चित्रकार ।

अतीत से प्राप्त कलापूर्ण भवनों व मूर्तियों से वास्तुकारमूर्तिकार निस्संदेह प्रेरित हुए किन्तु उन्होंने ग्रीक कला का अंधानुकरण करने के बजाय, ग्रीक कलाकारों के समान वास्तविकता के अध्ययन को प्रथम स्थान दिया। 

किन्तु चित्रकारों को उसी प्रकार प्रेरित करने के लिए कुछ अल्पसंख्य, उपेक्षणीय चित्रों को छोड़कर ग्रीक चित्रकला की निर्मिति अवशिष्ट नहीं रही थी। रोमन भवनों को देख कर कोई प्रत्यक्ष लाभ नहीं हो सकता था। 

प्राचीन ग्रीक मूर्तियों या शवपेटिकाओं के नक्काशी काम को देखकर चित्रकार वास्तविक आकारों के अनुकरण के लिए प्रेरित हुए यह कहना अनुचित प्रतीत होता है। 

बोत्तिचेली, कास्तान्यों या प्येरो देला फ्रान्चेस्का ने मानवाकार की जो विभिन्न कल्पनाएँ की हैं, जिस सूक्ष्मता व निपुणता के साथ उसका अंकन किया है उसको ग्रीक मूर्तिकला का प्रभाव नहीं माना जा सकता। 

पन्द्रहवीं सदी के इटालियन चित्रकार द्वारा नग्न मानव शरीर का किया गया चित्रण ग्रीक मूर्तिकार द्वारा किए गए मूर्तिकरण से दर्शन में स्पष्ट रूप से भिन्न है। 

समकालीन सौन्दर्य कल्पना के अनुसार इटालियन चित्रकार बहुधा आदमियों की आकृति की कमर पतली व स्नायु लघु बनाते थे जो विशेषताएँ ग्रीक मूर्तियों में नहीं मिलती। स्त्री शरीर का अनुपात भी ग्रीक मूर्तियों में प्राप्त अनुपात से भिन्न है। 

उदाहरण के लिये बोत्तिचेलि के चित्र ‘वसंत’ व ‘वीनस का जन्म’ में स्त्री आकृति को लम्बा, पतला शरीर, उतारदार गोल कंधे, छोटे वक्ष व वृत्ताकार पेट इन विशेषताओं के साथ चित्रित किया है व पुरुष आकृति के समान, इनको भी समकालीन सुवस्त्र की कल्पनाओं के अनुरूप पोशाकों में चित्रित करके अधिक आकर्षक बनाया है किन्तु प्राचीन भवनों व शव पेटिका – जिसका गिर्लान्दायो के ‘गडेरियों की अराधना’ में चित्रण है— जैसी प्राचीन स्मारकीय वस्तुओं का प्रतिबिम्ब इटालियन फ्रेस्को या चित्रों की पृष्ठभूमि के अन्तर्गत प्रायः नहीं दिखाई देता है। 

इटालियन चित्रकारों के ग्रीक विषयों के चित्रों पर जैसे कि बोत्तिचेलि के ‘वीनस का जन्म’ व ‘पालॅस’, बेनेज्जो गोज्जोलि के ‘हेलन का अपहरण’, पिन्तुरिक्कियो के ‘युलिसिस का पेनलोप के पास पुनरागमन’ – ग्रीक कला का कोई प्रभाव नहीं है। चित्रकार मोन्तेन्या जो प्राचीन रोम के अभिमानी थे, एक अपवाद मात्र चित्रकार थे।

Table of Contents

पुनर्जागरण का आरम्भ

पन्द्रहवीं सदी का इटली का निवासी बीसवीं सदी के इटालियन के समान भौतिक सौन्दर्य-मानव शरीर का हो या किसी प्राणी, फूल या अन्य वस्तु का हो— के प्रति संवेदनशील था, इस विचार को समाने रख कर ही पुनर्जागरण के वास्तविक कारणों को समझा जा सकता है। 

एक अन्य विचार को भी ध्यान में रखना होगा कि पुनर्जागरण के चित्रकार, जिनमें से बहुत से चित्रकारों ने सुवर्णकारी से व्यवसाय को आरम्भ किया था व जो मूर्तिकारवास्तुकार हुआ करते थे- साधारण वंश में जन्मे थे। 

उन्होंने पढ़ना, लिखना व गिनती से अधिक शिक्षा प्राप्त नहीं की थी। उनके संस्कृति सम्बन्धी ज्ञान के बारे में इतना ही कहा जा सकता है कि वे बहुत सी कहावतों, दंत कथाओं, हास्य कथाओं, संतों की जीवन कहानियों व प्रार्थनाओं से परिचित थे। उन्होंने बाइबल को ब्रह्म वैज्ञानिक दृष्टिकोण से या पुराणों को मानवतावादी दृष्टिकोण से नहीं देखा। 

उन्होंने रोमन देवताओं, इटली की लोककथाओं व लोक काव्य के शूरवीरों व फ्रेंच प्राचीन महाकाव्यों के वीरों को समान पूजा भाव से माना। आयु के नौवें या दसवें साल में वे गुरु की शिल्पकला में हस्तकौशल प्राप्त करने के लिये प्रवेश पाते थे। वे स्वयं को लुहार, सुतार या मोची से उच्च नहीं मानते थे। 

फ्रेस्को या चित्र के समान, बंदूक या किसान की टोकरी रंगने को वे उतने ही तत्पर थे। उनकी साधन सम्पत्ति साधारण थी। जब गिरजाघार या प्रार्थनालय को सजाने का काम मिलता तब उनको महावार या कार्य के क्षेत्रफल के अनुसार पारिश्रमिक दिया जाता। 

बाइबल या संत गाथा के प्रसंगों को चित्रित करते समय वे दृश्यों में आसपास के लोगों, पहाड़ों, जानवरों, भिन्न वृक्षों को दृश्य में सम्मिलित करते। उन्होंने केवल कुछ रसिकों के लिए नहीं बल्कि सर्वसाधारण लोगों के लिए चित्रण कार्य किया जो उनके कार्य में दिलचस्पी लेते व उसकी प्रशंसा करते।

ज्योत्तो ने चित्रकला को जो नई दिशा दिखाई थी, उस दिशा में उसका विकास करने को अगली सदी में फ्लोरेंस के चित्रकारों का दल उद्यत हुआ, जिसका शीघ्र ही उम्ब्रिया, लोम्बार्दी, सिएन्ना, पादुआ, फेरारा व वेनिस इन इटली के भागों में अनुसरण हुआ। 

ज्योत्तो की कला में दो नये महत्त्वपूर्ण तत्त्वों को मिलाया गया जो थे प्रकृति, विशेषत: मानवशरीर का अविरत निरीक्षण एवं दूरदृश्य लघुता के परिणामों का चित्रण की दृष्टि से अध्ययन । 

पन्द्रहवीं सदी में मानवशरीर रचना के अध्ययन में काफी प्रगति हुई। सब जगह चित्रकार मानव शरीर की नैसर्गिकता व उसके स्नायविक गठीलेपन को वास्तविक रूप में चित्रित करने में प्रयत्नशील थे जिसके सफल उदाहरण हैं सिन्योरेली के बहुत-से चित्र व फ्रेस्को तथा कास्तिल्योने दोलोना के बपतिस्मागृह स्थित मासोलिनो के चित्र ‘ईसा का बपतिस्मा’। 

वास्तुकार फिलिप्पो ब्रूनेलेस्कि ने दूरदृश्य लघुता के नियमों का पुनः आविष्कार किया व उस पर लिओन बात्तिस्ता आल्बर्ति ने (1435) व प्येरो देल्ला फ्रान्चेस्का ने प्रबन्ध लिखे। 

ज्योत्तो प्रारम्भिक परम्परागत दूरदृश्य लघुता की परिपाटी के आगे नहीं जा पाये थे। उनके चित्रों में भवन बहुत छोटे व गिरजाघर छोटे मकान जैसे दिखायी देते हैं। यही बात फ्रा एन्जेलिको के चित्रों में एवं 15वीं सदी के मध्य में बनाये वेतिकन के सन्त स्टीफन के जीवन- प्रसंगों के चित्रों में पायी जाती है। 

किन्तु वहीं के उसी समय के बनाये गये सन्त लारेन्स के जीवन-प्रसंगों के दो चित्रों में गिरजाघर के अन्तर्भाग को यथार्थ दूरदृश्य लघुता के साथ सफलता से अंकित किया गया है। 

ब्रूनेलेस्की ने मासाच्चो को दूरदृश्य लघुता के नियमों से अवगत कराया जिन्होंनें उसका सफलतापूर्वक प्रयोग किया। उच्चेलो, आद्रिया देल कास्तान्यो व अन्य चित्रकारों ने भी उसका परिश्रमपूर्ण अध्ययन किया। 

उस समय के चित्रों की पृष्ठभूमियों में जो इतना प्रचुर मात्रा में भवनों का समावेश किया जाता था वह बहुत- सा चित्रकारों द्वारा अपने नूतन प्राप्त परिप्रेक्ष्य के प्रदर्शन करने के उद्देश्य से ही किया गया था। 

रेखात्मक परिप्रेक्ष्य की सहायता से चित्रों को यथार्थ से अधिक निकट आते हुए देखकर फ्लोरेंस व उम्ब्रिया के चित्रकारों ने उसको उत्सुकता से स्वीकारा। 

किन्तु, वातावरणीय परिप्रेक्ष्य की तरफ उन्होंने विशेष ध्यान नहीं दिया क्योंकि आकारों के ठोसपन व स्पष्टता को वे अभिव्यक्ति के विचार से बहुत महत्त्वपूर्ण मानते थे। 

इन गुणों को उनके द्वारा इतना महत्त्व दिये जाने का दूसरा भी एक कारण हो सकता है कि उनमें से अधिकतर चित्रकारों ने अपने व्यावसायिक जीवन को स्वर्णकारी या मूर्तिकला से आरम्भ किया था ।

मानव शरीर सौन्दर्य को आकर्षक रूप में अंकित करना यह उस काल के चित्रकारों का एक प्रमुख कलात्मक ध्येय था। इसी उद्देश्य से उन्होंने ईसा, मेरी, साधुसन्तों व देवदूतों आदि को शारीरिक रूप में अधिक से अधिक आकर्षक चित्रित किया है। 

जहाँ विषय के विचार से अनिवार्य हो – जैसे कि शोकग्रस्त मंग्दालीन, रेगिस्तान में सन्त जाँन वगैरह- केवल वहीं उन्होंने मानव के यथार्थ रूप की ओर ध्यान दिया है। 

नवजात शिशु ईसा को भी उन्होंने चित्र में जो कम से कम एक वर्ष से बड़ा चित्रित किया है, उसके पीछे उनका मानव शरीर सौन्दर्य के प्रति आकर्षण ही मूल कारण है।

फ्लोरेंस चित्रकला का प्रमुख केन्द्र था जहाँ से वेनिस तक सम्पूर्ण इटली में चित्रकला का प्रसार हुआ।

फ्रा एन्जेलिको (1387-1455 ) 

ज्योवान्नि दा फिएसोल, जो फ्रा एन्जेलिको के नाम से प्रसिद्ध हैं, दोमिनिकन चित्रकारों में सर्वश्रेष्ठ थे। उनकी कला में दोमिनिकन धार्मिक आदर्शों की सच्ची प्रतिमाएँ हैं। 

अपने चित्रकारी व्यवसाय के आरम्भ में दोमिनिकन मठवासी चित्रकार फ्रा एन्जेलिको पर एक अन्य चित्रकार भिक्षु लोरेन्जो मोनाको का अनुयायित्व स्पष्ट रूप से प्रतीत होता है। 

मोनाको एक कामाल्डोलाइट भिक्षु थे व वे बहुत ही सौम्य व धार्मिक प्रभाव के चित्र अल्ट्रामारिन्स व वर्मिलियन्स रंगों का सुवर्ण के साथ प्रयोग करके चित्रित करते थे। 

फ्रा एन्जेलिको स्पष्ट रूप से भिन्न मार्ग के चित्रकार थे व यदि ऐसा कहा जाये कि उनकी तुलना किसी चित्रकार से नहीं की जा सकती तो वह अतिशयोक्ति नहीं होगी। वे आजीवन आदर्श भिक्षु रहे व उनका जीवन ईश्वर निष्ठा व धर्माचरण से ओत-प्रोत था । 

एकान्तप्रिय व गूढ़वादी भिक्षु होते हुए उन्होंने कलाक्षेत्र में हो रहे परिवर्तनों का ज्ञान कराया। परमेश्वर की उपासना में व्यस्त होते हुए ईश्वर निर्मित प्रकृति के सौन्दर्य एवं सहव्यवसायी चित्रकारों के कला सर्जन के अध्ययन में उनकी काफी दिलचस्पी थी । 

फ्रा एन्जेलिको प्रकृतिचित्रण के प्रणेता थे व बेरेन्सन के अनुसार टस्कनी के निसर्गसौन्दर्य की मनोहारिता की उनके चित्रों में झलक है, जिस बात का प्रमाण उनके चित्र ‘क्रूसारोपण’ की पृष्ठभूमि में बनाये प्रकृतिदृश्य से मिलता है। 

उनके सान मार्को में बनाये चित्र ‘क्रूसारोपण’ में उन्होंने चित्र क्षेत्र को त्रिफलक के समान तीन हिस्सों में बाँटा है व क्रूसारोपण के प्रसंग को मध्यवर्ती हिम्से में चित्रित करके एक तरफ साध्वियों व दूसरी तरफ सन्तों के चिन्तनशील किन्तु भावपूर्ण समुदायों को चित्रित किया। 

इस चित्र के बारे में जो कहा गया है कि यहाँ मस्तिष्क व हृदय के धर्म का दर्शन है वह गंतया समुचित है। सान मार्को के भिक्षुकक्षों में फ्रा एन्जेलिको व उनके शिष्यों द्वारा बनाये चित्रों से इस बात की पुष्टि होती है। 

सान मार्को में फ्रा एन्जेलिको द्वारा बनाया ‘दूत सन्देश’ चित्र सबसे श्रेष्ठ है। दैनिक कार्यक्रम के अनुसार बनाये गये उनके कोर्तोना व पेरूजिआ के चित्रों से जिनमें से ‘मेडोना देल्ला स्तेल्ला’ फलक चित्र अब फ्लोरेंस के सान मार्को महिलाश्रम में व ‘कुँवारी मेरी का राज्याभिषेक’ लुव्र संग्रहालय में हैं – वे केवल परम्परागत लघुचित्रण शैली के चित्रकार प्रतीत होते हैं। 

किन्तु धीरे-धीरे प्रकृति के निरीक्षण से व उससे प्रेरणा प्राप्त करके उनके चित्र सशक्त व सम्पन्न बनने लगे। सान मार्को के महिलाश्रम में उनके शिष्यों की सहायता लेकर बनाये गये फ्रेस्को चित्र उनकी सबसे श्रेष्ठ कृतियाँ हैं। 

सरलता, ताजगी व आश्चर्यजनक चमक इन गुणों के कारण इन फ्रेस्को चित्रों को ईसाई कला की हृदयग्राही व महान प्रभावी कृतियों में स्थान प्राप्त हुआ है। 

अपनी आयु के अन्तिम वर्षों में फ्रा एन्जेलिको ने सन्त स्तीफन व सन्त लारेन्स की कुछ जीवन कथाओं पर आधारित चित्र पोप पंचम निकोलस के निजी प्रार्थनालय में बनाये जिनसे स्पष्ट होता है कि वे अन्त तक निरीक्षणपूर्वक कार्य करते रहे व उनका आकार ज्ञान अधिकाधिक विकसित होता गया।

मासोलिनो दा पानिकाल (1383-1447 )

मासोलिनो दा पानिकाल द्वारा फ्लोरेंस के कार्माइन गिरजाघर में एवं लोम्बार्दी के कास्तिल्योने दोलोन में बनाये गये चित्र बहुत रोचक हैं। 

उनके शिष्य मासाच्चो (1401- 1428) (जन्म से तोम्मासो ग्विदी) एक ऐसे अल्पजीवी किन्तु मौलिक प्रतिभा के चित्रकार हुए जिन्होंने फ्लोरेंटाइन चित्रकला में अद्वितीय स्थान प्राप्त कर अपना नाम अमर किया। 

फ्लोरेंटाइन चित्रकला में मासाच्चो अन्य चित्रकारों से पृथक् से प्रतीत होते हैं क्योंकि उनके पश्चात् आये हुए सभी चित्रकारों ने कठोर बाह्यरेखा से अंकित करके वस्तुओं व मानवों के आकारों को त्रिमितीय घनत्व प्रदान करने पर अपना ध्यान केन्द्रित किया व रंगों की ताजगी व चमकीलेपन की चिन्ता नहीं की। 

उन्होंने अपारदर्शक मोटे रंगों का हल्की एवं गहरी छटाओं में प्रयोग करके आकृतियों को मूर्तिवत चित्रित किया। 

उफ्फिजी संग्रहालय स्थित उनके आरम्भिक चित्र ‘माता मेरी व सन्त अॅन’ व पिसा के बहुफलक वेदिकाचित्र से लेकर फ्लोरेंस के कार्माइन गिरजाघर के ब्रान्काच्चि प्रार्थनालय के अन्तिम फ्रेस्को चित्र तक हमें इसी कला विशेषता के परिणामस्वरूप ठोस आकृतियाँ दीखती हैं जिनमें आकारों के घनत्व में बाधा डालने वाली बारीकियों को सतर्कता से टाला है। 

भ्रामक मानव शरीर सौन्दर्य के प्रति वे आकृष्ट नहीं थे। सादगी, विशालता व भव्यता के गुणों को लिये हुए उनके चित्र अपना विशिष्ट स्थान रखते हैं। 

कला के विचार से हम उनकी तुलना केवल ज्योत्तो से ही कर सकते हैं व इस दृष्टि से हम यह भी कह सकते हैं कि मासाच्चो के रूप में ज्योत्तो ने पुनर्जन्म लिया था। 

वास्तुशास्त्रज्ञ ब्रूनेलेस्की व मूर्तिकार दोनातेल्लो के शरीर रचना – शास्त्र व परिप्रेक्ष्य के संशोधनों से फ्लोरेंस के कलाकारों को नये विचार प्राप्त हुए थे जिनसे मासाच्चो को जरूर लाभ हुआ होगा जिस कारण वे ज्योत्तो के ऋणी थे। 

उन्होंने गोथिक कला के अस्तित्व को भुलाकर कार्य किया। आयु के 25वें वर्ष में उन्होंने पिता के गिरजाघार के लिए जो बहुलफलक वेदिका चित्र बनाया उसके मध्यवर्ती चित्र ‘माता मेरी’ व ‘क्रूसारोपण’ ज्योत्तो की शैली से अधिक विकसित व मानवतापूर्ण प्रतीत होते हैं। 

ब्रूनलेस्की के आकार के घनत्व सम्बन्धी संशोधन का इन पर प्रभाव है तथा मानवाकृतियों की निक्षेपित छाया को भी अंकित किया है। 

फ्लोरेंस के कार्माइन गिरजाघर के ब्रान्काच्चि परिवार के प्रार्थनागृह में मासाच्चो को विस्तृत पैमाने पर कार्य करने का अवसर प्राप्त हुआ । 

यथार्थ चित्रण पर अब उन्होंने प्रभुत्व सम्पादित किया था जिसका उन्होंने यहाँ नियन्त्रण व योजना के साथ प्रयोग किया। ये फ्रेस्कोचित्र विचारपूर्ण चित्रण के आदर्श उदाहरण बन गये हैं व उनमें गोथिक शैली की रूढ़िबद्ध आकृतियों की निरर्थक पुनरावृत्ति का नाम ही नहीं है। 

उपहार धन’ फ्रेस्कोचित्र में शीतकालीन पृष्ठभूमि पर ईसा व उनके शिष्य समुदाय का कुशल पन्द्रहवीं सदी की चित्रकला संयोजन के साथ ठोस, सजीव व भावपूर्व चित्रण किया है। 

कहीं भी घिसी-पीटी बात या अर्थहीनता नहीं है। चित्र उदात्त धार्मिक भावनाओं से ओत-प्रोत है व गौण सांसारिक विचारों को कहीं भी स्थान नहीं दिया है। 

निकटवर्ती फ्रेस्कोचित्र ‘स्वर्ग से निष्कासन’ की विवस्त्र आकृतियों की दयनीय अवस्था ‘उपहार धन’ की ओजस्वी आकृतियों के सामने विरोधाभासी प्रतीत होती है। 

स्वर्ग का प्रवेश द्वारा केवल सूचित मात्र करके चित्रकार ने अपनी प्रतिभा को आदम व हौवा की निराशा व दीनता को अभिव्यक्त करने पर केन्द्रित की है। 

हौवा को दुःख से विलाप करती हुई व आदम आन्तरिक वेदनाओं के कारण अंध व विमूढ़ अवस्था में है। मानवीय भावनाओं का इतना प्रभावपूर्ण चित्रण यूरोपीय चित्रकार में इससे पहले नहीं हुआ था। 

ब्रान्काच्चि प्रार्थनालय के अन्य फ्रेस्कोचित्रों में ‘सन्त पीटर छाया से स्वस्थ करते हुए’ व नवशिष्यों का बपतिस्मा ये दोनों वेदिका के पीछे की दीवार पर बनाये फ्रेस्कोचित्र चित्तवेधक हैं। 

कार्माइन गिरजघार के फ्रेस्कोचित्र पूर्ण होने से पहले ही मासाच्चो रोम चले गये, जहाँ उनकी 27वें साल में असामयिक मृत्यु हुई। उनको जीवन में सम्मान प्राप्त न हो सका किन्तु उनकी मृत्यु से उनके मित्र ब्रूनेलेस्की को गहरा आघात पहुँचा। 

भविष्य के फ्लोरेंटाइन व अन्य चित्रकारों के लिये कार्माइन के फ्रेस्कोचित्र चित्रकला के अध्ययन का महत्त्वपूर्ण केन्द्र बन गया । 

लिओनार्दो, रेफिल व माइकिलेन्जेलो खुद को मासाच्चो के ऋणी मानते थे। परन्तु माइकिलेन्जेलो जिन्होंने बाल्यावस्था में ब्रान्काच्चि प्रार्थनालय में चित्रण किया – ही मासाच्चो की श्रेष्ठ मौलिकता को उचित रूप से समझ सके। 

समीक्षक बेरेन्सन ने माइकिलेन्जेलो के कार्य को देख कर लिखा ‘मासाच्चो पुनः जन्मा है। ‘

मासाच्चो के साथ कार्माइन में किये मासोलिनो के फ्रेस्कोचित्रो में भव्यता है किन्तु वह अल्पकालिक रही व मासाच्चो की मृत्यु के पश्चात् मासोलिनो फिर से अपनी पूर्ववर्ती आलंकारिक शैली में कार्य करने लगे। 

कार्माइन में ‘सन्त जेरोम व बपतिस्मादाता सन्त जान’ का चित्र मासाच्चो व मासोलिनो में से किसकी कृति है, इसके बारे में सन्देह है। मासोलिनो फ्लोरेंस के गोथिक शैली के अन्तिम चित्रकार थे।

15वीं सदी में कलाकारों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण इतना बढ़ा जितना कि पहले कभी नहीं था व अन्त में लिओनार्दो जैसे वैज्ञानिक कलाकार ने चित्रकला व विज्ञान के बीच का अन्तर पूर्ण रूप से समाप्त करने के प्रयत्न किये। 

लिओनार्दो के महान कार्य का आरम्भ उनके बहुत पहले ही फ्लोरेंस में जन्मी विज्ञान प्रभावित कला प्रवृत्ति में स्पष्ट रूप से प्रतीत होता है। 

पुनर्जागरणकालीन आचार्यों ने दृष्टिभ्रम के प्रभावोत्पादन के लिए जिन पद्धतियों को अपनाया था उनकी दिशा में मासाच्चो के पश्चात् वेनेजिआनो व प्येरो देला फ्रान्चेस्का ने अन्वेषण को आरम्भ किया था। 

दूरदृश्य लघुता की दिशा में आल्बर्ति ने प्रथम सिद्धान्त प्रतिपादित किये व फ्रान्चेस्का द्वारा संशोधित गणितीय सिद्धान्त भी महत्त्वपूर्ण रहे। 

इसके अतिरिक्त शरीर रचनाशास्त्र पर आधारित नियम जो आन्तोनिओ पोलैयुलो के मानव चित्रण में चरमसीमा तक प्रयोगान्वित किये गये – उपयुक्त रहे। 

पन्द्रहवीं सदी के फ्लोरेंटाइन चित्रकारों के वैज्ञानिक दृष्टिकोण का उत्कृष्ट परिचय आन्तोनिओ पोलैयुलो व उनके भाई प्रो द्वारा चित्रित 1475 में बनायी आदर्श चित्रकृति ‘सन्त सेबास्टियन की शहादत’ के अध्ययन से हो सकता है। 

चित्र को देखने से ऐसे लगता है कि यहाँ चित्रकारों ने अपने वैज्ञानिक संशोधन का प्रदर्शन करने का जानबूझ कर प्रयत्न किया है। 

संयोजन में ज्यामितीयता प्रधान है एवं अवकाश व पृष्ठभूमि के परिप्रेक्ष्य का निर्माण आल्बर्ति के परिप्रेक्ष्य सम्बन्धी नियमों का अक्षरशः अनुपालन करके किया है। 

मानवाकृतियों को ऐसी मुद्राओं व विवस्त्रावस्था में अंकित किया है कि चित्रकार के शरीर रचनाशास्त्र के ज्ञान का पर्याप्त मात्रा में प्रयोग किया जा सके। 

चित्रकलाजन्य वैज्ञानिक समस्याओं का भिन्न ढंग से किया हल मासाच्चो के समकालीन चित्रकारों के चित्रों में प्रमुखतया दोमेनिको वेनेजिआनोपाओलो उच्चेल्लो के चित्रों में एवं उनके उत्तरकालीन आन्द्रिया देल कास्तान्यो के कार्य में दृष्टिगोचर है।

दोमेनिको वेनेजिआनो (मृत्यु 1461) ने फ्लोरेंस में 1439 के करीब साँत एजिदिओ में फ्रेस्को चित्रण किया जो अब नष्ट हो गया है। उनकी ख्याति अब उनके एक ही प्रसिद्ध चित्र सन्त लूसी वेदिका शिल्प पर निर्भर है जो बहुत ही श्रेष्ठ दर्जे की कृति है । 

इस कृति में अन्तर्राष्ट्रीय गोथिक शैली व मासाच्चो द्वारा संशोधित नवीन शैली का मनोहर संगम है। चारों सन्तों की आकृतियों में मासाच्चो की आकृतियों की भव्यता के साथ-साथ जेन्ताइल द फाब्रिआनों की आकृतियों का मधुर आकर्षण है। 

पृष्ठभूमि में पुनर्जागरण कालीन वास्तु का व ऊपरी हिस्से में गोथिक महरावों का चित्रण है। चित्र का सम्पूर्ण परिणाम आलंकारिक होते हुए प्रसंग चित्रण सशक्त है व सन्तों में हो रहे धार्मिक संवाद का प्रभाव सुस्पष्ट है किन्तु इस वेदिका चित्र की सबसे मौलिक विशेषता है उसमें व्यापक मोतियों के समान चमकदार व विविध नयनरम्य रंगों से युक्त सौम्य प्रकाश का निर्माण। 

मनोहर रंग संगति व चित्रसंयोजन के विचार से प्येरो देलो फ्रान्चेस्का वेनेजिआनो के ऋणी थे। पाओलो उच्चेलो (1396-1475) वेनेजिआनो से तुलना करते हुए पाओलो दी दोनो जो उच्चेलो नाम से विख्यात है की कला में कई परस्पर विरोधी तत्त्वों का अन्तर्भाव दिखायी देता है। 

उनके चित्रण में वैज्ञानिक पद्धति से आकारों को अंकित करने का निश्चय व धार्मिक चमत्कारों को भावपूर्ण बनाने की आन्तरिक अभिलाषा के बीच अंतर्द्वन्द्व प्रतीत होता है। 

उनकी वैज्ञानिक अंकन पद्धति के कारण उनको शीघ्र ही परिप्रेक्ष्य व अग्रिम-लघुता के प्रणेताओं में स्थान प्राप्त हुआ व उनके चित्रांतर्गत चमत्कृति पूर्ण गगनचुम्बी कल्पना के कारण उनको उच्चेलो (पक्षी) नाम प्राप्त हुआ। 

उम्र के 10वें साल में उच्चेलो गिबर्ति की कार्यशाला में प्रविष्ट हुए जहाँ उन्होंने लगभग सात-आठ साल तक अनुभव प्राप्त किया। यहाँ के अनुभव के परिणामस्वरूप उनमें आलंकारिक बारीकियों व सरलीकृत वृत्तरेखांकित आकार निर्मिति में अभिरुचि पैदा हुई ! मासाच्चो के प्रभाव में वे किस तरह आ गये यह अज्ञात है। 

वेनिस के निवास काल में उन पर उत्तरी इटालियन गोथिक शैली का प्रभाव पड़ा होगा। विविध प्रभावों के कारण उच्चेलो की शैली में भिन्न तत्त्वों का दर्शन होता है। किन्तु मुख्य रूप से उच्चलो परिप्रेक्ष्य के विकास में किये कार्य के लिये ख्यातनाम हैं। 

परिप्रेक्ष्य के विषय में उनकी इतनी अधिक रुचि थी कि कई बार उस पर चर्चा करने के लिये वे अपनी पत्नी को मध्यरात्री के समय जगाते थे। उन्होंने उत्पत्ति-ग्रंथों के प्रसंगों को सांता मराया नोवेला के विहारों में चित्रित पन्द्रहवीं सदी की चित्रकला किया। 

चित्रण कहीं नियंत्रणपूर्ण तो कहीं कठोर बन गया है। आरम्भ के चित्र जिनमें आदम के जन्म व पतन के प्रसंग हैं 1431 में फ्लोरेंस वापस आने पर चित्रित किये होंगे। 

बाद के चित्र जो नोह की कहानी पर आधारित हैं व जिनमें अतिवृष्टि’ चित्र सबसे प्रसिद्ध है। करीब 15 साल पश्चात् बनाए गये थे। नोह की कहानी की चित्रमालिका में उच्चेलो ने नवीन आविष्कारों को पूर्णरूप से आत्मसात किया हुआ है। 

इन चित्रों में परिप्रेक्ष्य व अवकाश प्रभाव का ऐसे नाटकीय ढंग से प्रयोग किया गया है कि उससे आगामी बॅरोक शैली की पूर्वसूचना मिलती है। संघर्ष करती हुई मानवाकृतियाँ सजीव व स्नायवीय सामर्थ्य से गतिपूर्ण है। 

शरीर रचना-शास्त्र के अध्ययन का इतना परिणामकारक प्रयोग इससे पहले किसी चित्रकार ने नहीं किया था। अतः ‘अतिवृष्टि’ यह पन्द्रहवीं सदी के कलाकारों के दृष्टिकोण का एक प्रतिनिधि चित्र माना जा सकता है।

आन्द्रिया देल कास्तान्यो (1423-57)

कास्तान्यो का चित्रण उच्चेलो के काफी सदृश किन्तु अधिक यथार्थवादी है। वे अभिव्यक्तिपूर्ण कठोर रेखा पर बल देते थे, किन्तु उच्चेलो के समान उनकी कला का प्रमुख लक्ष्य ठोस आकृतियों के संयोजन द्वारा धार्मिक क्रियाओं को चित्ररूप करना ही था। 

उनका सांत अपोलोनिया में चित्रित फ्रेस्को ‘क्रूसारोपण’ बहुत ही सामर्थ्यपूर्ण है व उस पर कुछ मासाच्चो का व उससे अधिक दोनातेलो का प्रभाव है। 

वहीं उन्होंने एक अन्य फ्रेस्को ‘अन्तिम भोज’ का निर्माण किया जिसमें तीव्र प्रकाश का प्रभाव दिखा कर ईसा व उनके पट्ट शिष्यों को बहुत ही स्पष्ट व कठोर आकृतियों में चित्रित किया है।

उच्चेलो, कास्तान्यो व पौलेयुलो बंधुद्वयों ने मानवाकृतियों के शारीरिक सौन्दर्य या लावण्य की ओर ध्यान नहीं दिया किन्तु उनके बाद की पीढ़ी के चित्रकार गोज्जोलि, लिप्पि, वेरोक्किओ, बोत्तिचेली, गिलदायो मानव शरीर के नैसर्गिक आकर्षण को भूले नहीं। 

बेनोज्जो गोज्जोलि (1421-97) गिवर्ति के शिष्य थे व रोम में वे फ्रा एन्जेलिको के सहायक रहे। गोज्जोलि की शैली फ्रा एन्जेलिको से मिलती-जुलती किन्तु अधिक नैसर्गिकतावादी है यद्यपि उनके द्वारा 1450 के करीब चित्रित सन्त फ्रान्सिस के जीवनगाथा के फ्रेस्कोचित्र विषयों के लिये अनुकूल दैवी भावनाओं की तीव्रता व धार्मिक विशुद्धता से ओत-प्रोत है। 

1459 में गोज्जोलि को फ्लोरेंस के मेदिची महल का फ्रेस्को चित्रण का कार्य मिला जो मेरी की यात्रा-कथा पर आधारित था। 

फ्रेस्कोचित्रों में मूल्यवान अलंकरण की भरमार है व हो सकता है कि 40 वर्ष पूर्व जेन्ताइल दा फाब्रिआनो द्वारा चित्रित वेदिका चित्र ‘मेरी की यात्रा’ के अनुसरण का यह परिणाम हो। 

बाद में गोज्जोलि द्वारा चित्रित फ्रेस्को- चित्रमालिकाओं में पूर्व-विधान की घटनाओं के चित्र सबसे महत्त्वपूर्ण हैं जो उन्होंने 1468 व 1484 के बीच पिसा के काम्पोसान्तो में बनाये हैं। इन चित्रों की पृष्ठभूमि में समकालीन शहरी भवनों व दृश्यों को निरीक्षणपूर्वक चित्रित किया गया है। 

गोज्जोलि आकार, रंगव अभिव्यक्ति से भी कथनात्मकता व मनोरंजन पर अधिक बल देते थे एवं यौवन, मानव- शरीर सौन्दर्य, ऊँचे वस्त्र तथा अपनी जन्मभूमि टस्कनी के प्रकृति सौन्दर्य आदि विषयों का अपने चित्रों में अक्सर अन्तर्भाव करते थे।

दोमेनिको गिलदायो (1449-1494)

जो आश्रय दाता फ्लोरेंटाइन कलाकारों को अपने प्रार्थनालयों के अलंकरण-चित्रण कार्य सौंप देते थे वे प्रायः अपने-अपने परिवार व मित्र-मंडली को भी धार्मिक चित्रों के अन्तर्गत चित्रित करवाते थे। 

इस रिवाज के कारण गिलदायों के धार्मिक चित्रों से भी समकालीन फ्लोरेंस के समाज का काफी परिचय हो जाता है। 

सांता मराया नोवेला व सान गिमिन्यानो के फ्रेस्कोचित्रों में उन्होंने बायबल के धार्मिक चित्रों एवं सान्ता फिना की जीवनगाथा के चित्रों की पृष्ठभूमि में समकालीन फ्लोरेंस को चित्रित किया है जिससे समकालीन प्रतिष्ठित व्यक्तियों के व्यक्तिचित्र एवं उनके निवास स्थानों के अन्तर्भागों के दृश्य से हम परिचित हो सकते हैं। 

फ्रेस्को चित्रण पर उनका असाधारण प्रभुत्व था व प्रत्यक्ष दृश्यों को चित्रित करने में वे विशेष रुचि लेते थे। उनकी कार्यशाला काफी बड़ी थी व उन्होंने अधिकतर सम्पन्न मध्यम वर्ग के लिये कार्य किया। 

उनके फ्रेस्को चित्र ‘अध्ययन कक्ष में सन्त जेरोम’ से, फ्लेमिश चित्रकारों की बारीकियों के साथ चित्रण करने की पद्धति से वे कितने आकर्षित थे, इसका प्रमाण मिलता है। 

उनका वेदिकाचित्र ‘चरवाहों की आराधना’ फ्लेमिश चित्रकार ह्यूगो वान डेर गोस के पोर्तिनारो के वेदिकाचित्र जो उसी समय फ्लोरेंस लाया गया था—से स्पष्ट रूप से प्रभावित है। 

गिलदायो की कथनात्मक व समाजाभिमुख चित्रकला का चरमोत्कर्ष उनके द्वारा ज्योवान्नि तोर्नाब्वानी के लिये बनाये कुँवारी मेरी व सन्त जॉन की जीवन गाथाओं के फ्रेस्को चित्रों में देखने को मिलता है। 

आसपास की पट्टियाँ प्राचीन ग्रीक अभिप्रायों से युक्त हैं जो केवल अलंकरण के उद्देश्य से बनायी गयी हैं। किन्तु फ्रेस्को चित्रों का मुख्य आकर्षण है समकालीन फ्लोरेंटाईन समाज- जीवन का सच्चा चित्रण जिसमें आकर्षक पोशाक पहने हुए महिलाओं व दौड़ धूप में लगी हुई नौकरानियों की आकृतियाँ विशेष तादात्म्य से चित्रित की गई हैं। 

इन फ्रेस्कोचित्रों के कार्यकाल के समय में ही माइकिलेन्जेलो ने उनके शिष्य के रूप में उनकी कार्यशाला में प्रवेश किया। फ्रा फिलिप्पो लिप्पि (1406-1469) फ्रा एन्जेलिका जितने धर्मनिष्ठ सिद्धान्तवादी नहीं थे। 

उनके द्वारा चित्रित स्त्री आकृतियों में स्त्री शरीर का स्वाभाविक आकर्षण है यद्यपि आकृतियाँ कुछ जकड़ी हुई प्रतीत होती हैं। राबर्ट ब्राउनिंग ने अपने साहित्य द्वारा फिलिप्पो लिप्पि के व्यक्तित्व को अमरता प्रदान की है। 

वासारी ने उल्लेख किया है कि फिलिप्पो लिप्पि के मेदिची आश्रयदाता उनके सनकी स्वभाव की तरफ उदार दृष्टिकोण से कहते थे कि ‘वे प्रकाश के समान प्रतिभा सम्पन्न हैं, भारवाही पशु नहीं’ जो पन्द्रहवीं सदी में आश्रयदाताओं के कलाकारों के प्रति दृष्टिकोण में हुए परिवर्तन का प्रमाण है। 

पुनर्जागरण कालीन चित्र-निर्मिति में आकर्षकता के विचार से फिलिप्पो के चित्रों का स्थान सर्वश्रेष्ठ चित्रों के अन्तर्गत है। 

उनके द्वारा चित्रित मेरी की आकृतियों में असाधारण सौन्दर्य से सम्पन्न कीमती वस्त्र पहने हुए युवती का आकर्षण है। बोत्तिचेलि, वेरोक्कियो व लिओनार्दो ने फिलिप्पो की इस सौन्दर्याभिरुचि से आकृष्ट होकर उनका अनुसरण किया। 

असाधारण अंकन-कौशल, मौलिक संयोजन, चंचल रेखांकन व सूक्ष्म किन्तु चमकीली रंगसंगति की योजना के कारण उनको श्रेष्ठ चित्रकार माना गया है। 

फिलिप्पो किशोरावस्था में कार्माइन के मठ में दाखिल हुए जहाँ उनको मासाच्चो को ब्रांकाच्चि प्रार्थनालय में कार्य करते हुए देखने का मौका मिला व उनके आरम्भिक चित्रों पर निश्चय ही मासाच्चो का पन्द्रहवीं सदी की चित्रकला का स्पष्ट प्रभाव है। 

इसके अतिरिक्त दोनोतैलोफ्लेमिश कला का भी उन पर प्रभाव था। उनके उत्तरकालीन चित्रों की शैली में कोमलता है, आकृतियों कुछ लम्बी हैं व शीर्ष अनुपात में छोटे हैं। फिलिप्पो लिपि अपने समय में प्रमुख फ्रेस्को चित्रकारों में गिने जाते थे व इस माध्यम के उनके चित्रों में प्रातो गिरजाघरों में बनाये चित्र सर्वश्रेष्ठ हैं। 

इनमें आरम्भिक चित्रों की भीड़भाड़ नहीं है व चित्ररचना अवकाश, प्रकाश प्रभाव व यथार्थ-दर्शन के गुणों के कारण उनमें विशालत्व आ गया है। मासाच्चो के बाद नवीन प्रयोग करने का साहस और किसी अन्य कलाकार ने नहीं दिखाया है। 

उनके पश्चात् आने वाले उनके शिष्य बोत्तिचेली व उनके अनुयायी गिलदायो व लिओनार्दो को उन्होंने जिस प्रकार भिन्न विचारों से प्रभावित किया उससे भी उनकी कला की महानता व सर्वांगीण विकास को हम समझ सकते हैं। 

फिलिप्पो लिप्पि के पुत्र फिलिप्पिनो लिप्पि (1457-1504) बोत्तिचेलि के शिष्य थे। उन्होंने मासाच्चो द्वारा आरम्भ किया ब्रान्काच्चि प्रार्थनालय का चित्रण पूर्ण किया। बाद में उन्होंने रोम व फ्लोरेंस में चित्र व फ्रेस्को बनाये जिनमें अनावश्यक जटिलता के जाल में फँस जाने से उनकी कला को हानि पहुँची है।

फिलिप्पिनो की आरम्भिक शैली को उनके गुरु बोत्तिचेलि की शैली से पृथक करना कठिन है किन्तु 1475 के करीब उनकी शैली में कुछ स्वतंत्रता आ गयी व उनके फ्लोरेंस के बादिया के लिये बनाये सुन्दर फलकचित्र में बोत्तिचेलि की रुचिरता व फ्लेमिश चित्र कला से प्रेरित अधिक वास्तवतावादी रूप का मनोहर संगम है। 

फिलिप्पिनो की शैली की मौलिकता का अध्ययन करने के लिए सांता मराया नोवेला के स्त्रॉज्जि प्रार्थनालय के ‘बपतिस्मादाता सन्त जान’ व ‘सन्त फिलिप’ के जीवन की घटनाओं के चित्र देखना आवश्यक है। 

1487 में आरम्भ किये हुए ये चित्र 1502 में पूर्ण हुए। इसी बीच फिलिप्पिनो रोम की यात्रा कर आये थे जिससे वे प्राचीन कला से काफी प्रभावित हुए। 

परिणामस्वरूप स्त्रॉज्जी प्रार्थनालय को न केवल प्राचीन उद्धरणों से अलंकृत किया है बल्कि उसमें पुरातन शैली की अतिशयोक्त चमत्कृति की भी स्थान-स्थान पर भरमार है।

सांद्रो बोत्तिचेलि (1445-1510 )  

पन्द्रहवीं सदी के चित्रकारों में फ्रा एंजेलिको पूर्वार्ध के व बोत्तिचेलि उत्तरार्ध के सर्वश्रेष्ठ चित्रकार माने जाते हैं। लिओनार्दो के लगभग समकालीन होते हुए बोत्तिचेलि पूर्ण भिन्न शैली के चित्रकारों के अन्तर्गत आते हैं। 

वे 1460 के करीब फ्रां फिलिप्पो लिप्पि के शिष्य थे व उनके साथ उन्होंने कुछ चित्रण भी किया। बोत्तिचेलि के फलक चित्र ‘ हालफर्नीज के शीर्ष के साथ ज्यूडिथ’ व फिलिप्पो के फ्रेस्को चित्र ‘हेरोद की दावत’ की तुलना करने पर स्पष्ट होगा कि बोत्तिचेलि फिलिप्पो के कितने ऋणी थे। 

फिलिप्पो से बोत्तिचेलि ने न केवल मानवाकृति चित्रण की परम्परा को अपनाया बल्कि वस्त्रों की सलवटों की चंचलता के द्वारा मानवाकृतियों में गतित्व दर्शाना एवं छटाओं के सूक्ष्म परिवर्तन को सफलता से अंकित करने के तरीके का ज्ञान प्राप्त किया। 

फिलिप्पो का प्रभाव बोत्तिचेलि के पूर्ण विकसित शैली के चित्र ‘अनार के साथ मरियम व शिशु ईसा’ व ‘महिमामंडित मरियम’ (उफ्फिजी) पर दिखायी देता है यद्यपि बोत्तिचेलि के दोनों चित्रों की पारलौकिकता का फिलिप्पो के चित्रों में अभाव है।

1475 के करीब बोत्तिचेलि मेदिची परिवार की सेवा में आ गये। इस समय के इनके चित्र ‘मजूसियों की आराधना’ में उन्होंने अपने आश्रयदाताओं को इतना अधिक महत्त्व देकर चित्रित किया है कि उनके सम्मुख ‘पवित्र परिवार’ गौण-सा प्रतीत होता है। 

यद्यपि इन चित्रों से बोत्तिचेलि की व्यक्ति चित्रण की कुशलता का प्रमाण मिलता है। 1475 में उन्होंने बरछेबाजी के लिए ध्वजा चित्रित की जिसमें ज्युलिआनो विजयी घोषित हुए थे। 

बोत्तिचेलि के चित्र ‘मार्स व वीनस’ व ‘वीनस का जन्म’ चित्रों में वीनस का चेहरा सिमोनेता वेसपुस्वी से मिलता-जुलता है। ‘मार्स व वीनस’ चित्र में उनके आश्रयदाता ज्युलिआनो मेदिची के आत्मिक प्रेम को प्रतीकात्मक ढंग से दर्शाया है। 

सोया हुआ मार्स विजयी ज्युलिआनो का प्रतीक है व वीनस की मार्स पर विजय सिमोनेता के सौंदर्य की ज्युलिआनो की वीरता पर विजय को दर्शाती है। प्रतीकात्मक कथन के अतिरिक्त कलात्मक दृष्टि से भी चित्र श्रेष्ठ दर्जे का है। 

कुशलता से संयोजित इस चित्र की प्रभावोत्पादकता सजीव, गतिपूर्ण, वक्र रेखाओं में है न कि घनत्व दर्शन में बोत्तिचेलि की कला की यही विशेषता है कि घनत्व का प्रभाव होते हुए भी प्रभुता के साथ खींची हुई सहज गति रेखाओं के सम्मुख वह निजी सामर्थ्य को पूर्ण रूप से प्रकट नहीं कर सकता। 

मार्स की सोयी हुई विवस्त्र आकृति लयबद्ध रेखा व गतित्व से अप्रतिम है। ‘वसंत की रूपक कथा’ (Primavera) चित्र संयोजन व कथन के विचार से अधिक जटिल है। यहाँ वीनस को न केवल सौन्दर्य देवी के रूप में बल्कि ज्ञान के उद्गम की देवी के रूप में चित्रित किया है। 

बोत्तिलेचि का सर्वश्रेष्ठ व सबसे प्रसिद्ध चित्र ‘वीनस का जन्म’ प्रतीकात्मक उद्देश्य से चित्रित हुआ है। आधुनिक समीक्षक इस चित्र को- जिसमें वीनस की आकृति प्राचीन ग्रीक मूर्ति पर आधारित है- नवीन मानवतावादी दृष्टिकोण व पुरातन देवतानिष्ठ कल्पना का कुशलतापूर्ण समन्वय मानते हैं। 

बोत्तिचेलि की काव्यात्मक प्रतिभा ने वीनस की आकृति को इतने सहज ढंग से रूपान्तरित किया है कि बोत्तिचेलि के ग्रीक आदर्श आकार के ज्ञान से भी गोथिक शैली सुलभ आकृति का सुलालित्य अधिक प्रभावी हो गया है। 

वीनस की विवस्त्राकृति का लयपूर्ण अंकन पोलैयुलो व वेरोक्कियों की विवस्त्र आकृतियों के सदृश है क्योंकि उनकी कला ने वोत्तिचेलि का आरम्भिक काल में काफी मार्गदर्शन किया किन्तु बोत्तिचेलि द्वारा अपनायी कठोर शास्त्रीयता इतनी विरोधपूर्ण है कि उससे बोत्तिचेलि की स्वतंत्र प्रतिभा का स्पष्ट प्रमाण मिलता है। 

मेदिची शासन के मानवतावादी दृष्टिकोण की जड़ें अभी मजबूत नहीं हुई थीं जिसकी वजह से बोत्तिचेलि की उत्तरकालीन कला में काफी परिवर्तन दृष्टिगोचर है। 1490 के पश्चात् बोत्तिचेलि की कला में जो भावात्मक खलबली व वैचारिक अनिश्चितता दिखायी पड़ती है उसके पीछे मुख्यतया सावोनारोला का धार्मिक आन्दोलन ही कारण था। 

धार्मिक अंधविश्वासों के विस्फोट में भौतिकवादी तथा गैर ईसाई मूर्तिपूजक धर्म से प्रभावित ग्रंथ व कलाकृतियाँ जलायी गयीं। सावोनारोला ने उद्घोषित किया कि कलाकार का कर्तव्य है कि वह ऐसी कृतियों का निर्माण करे जो धार्मिक विषयों से विशेष रूप से ईसा के जीवन से सम्बन्धित हों। 

परिणामस्वरूप 15वीं सदी के अन्त के आसपास क्रूसारोपण व दफन जैसे विषयों पर प्रचुर मात्रा में चित्र व मूर्तियाँ बनायी गयीं। माइकिलेन्जेलो के प्रख्यात मूर्तिशिल्प ‘शोकमग्न मेरी’ व बोत्तिचेलि के चित्र ‘ईसा का दफन’ का सर्जन इसी काल में हुआ। माना जाता पन्द्रहवीं सदी की चित्रकला है कि बोत्तिचेलि का चित्र ‘गूढ़ जन्मोत्सव’ (1500) का सर्जन सावोनारोला की भविष्यवाणी पर आधारित है। 

बोत्तिचेली की उत्तरकालीन शैली का यह एक प्रतिनिधि चित्र है। मेदिची शासनकर्ताओं की सेवा से मुक्त होने के पश्चात् उनकी शैली में जो आकस्मिक परिवर्तन आया उसका यह सबसे अधिक अभ्यसनीय चित्र है। 

जन्मोत्सव के विषय पर बनाया गया यह सबसे विषादमय चित्र है व बोत्तिचेलि के पहले चित्रों की प्रसन्नता का स्थान अब आकारान्तर्गत अनोखे विक्षोभ व अशान्ति ने ले लिया है। 

इसी प्रकार के अनेक अन्य चित्रों में ‘संत जेरोम का प्रभु प्रसाद’ (न्यूयॉर्क), ‘पवित्र दृष्टान्त’ (फॉग संग्रहालय, हार्वर्ड) ये प्रसिद्ध चित्र हैं। वैसे देखा जाये तो बोत्तिचेलि के धार्मिक तथा पौराणिक चित्रांतर्गत नारी आकृतियों पर आरम्भ से ही कुछ व्यक्तिगत अंतर्मुख उदास शांति छायी प्रतीत होती है। 

बोत्तिचेलि निःसन्देह निजी तौर पर ऐसे भावाकुल स्त्री व्यक्तित्व के प्रति विशेष आकृष्ट होंगे जो उनके चित्रण में इतना निरपवाद रूप से उभरता नजर आता है। 

उसी प्रेरणा के फलस्वरूप उन्होंने एक ऐसी आदर्श नारी आकृति का सर्जन किया जिसके लयबद्ध व नर्तनशील रेखांकित मोहक बाह्य रूप के अंतर्गत वैचारिक गाम्भीर्य का भी आकर्षण हो । बोत्तिचेलि के फ्रेस्को चित्रों की संख्या कुछ कम है। 

विला मेम्मि के लिए बनाए फ्रेस्को चित्र प्रभुत्वपूर्ण हैं किन्तु सिस्टीन प्रार्थनालय के फ्रेस्को चित्रों में पूर्व नियोजन का अभाव – विशेषरूप से बारीकियों में नजर आता है।

बोत्तिचेलि की कला की और एक विशेषता यह है कि उन्होंने ईसाई धार्मिक चित्रों के अतिरिक्त पर्याप्त मात्रा में पौराणिक चित्रों का निर्माण किया जिनमें उन्होंने देवताओं को, विशेषतया वीनस को सर्वांग सुन्दर मानव रूप में चित्रित करके उनको मानव के अधिक निकट लाये। 

बोत्तिचेलि से प्रिरेफीलाइट भ्रातृ मंडल को काफी प्रेरणा मिली यद्यपि लिओनार्दो, रेफिल व माइकिलेन्जेलो की असाधारण सफलता के कारण बोत्तिचेलि को चित्रकला के इतिहास में बहुत काल तक उचित स्थान नहीं मिला था। 

19वीं सदी से उनकी पन्द्रहवीं सदी के सर्वश्रेष्ठ चित्रकारों में मान्यता प्राप्त हुई ।

आन्द्रिया वेरोक्कियो (1435-1488)

वेरोक्कियो सुवर्णकार, मूर्तिकार एवं चित्रकार भी थे। उनके जो भी अल्पसंख्या में चित्र उपलब्ध हैं जैसे ‘ईसा का बपतिस्मा उनमें उनके घनत्वांकन एवं बाह्य रेखा द्वारा आकृतियों को ठोसपन देने के प्रयत्न स्पष्ट हैं। 

पन्द्रहवीं सदी के फ्लोरेन्टाइन चित्रकारों में प्रो दि कोसिमो (1462-1521) का उल्लेख अनिवार्य है। इन्होंने प्रायः पौराणिक विषयों को चित्रित किया जिनमें चमत्कृतियों को विशेष रुचि के साथ अन्तर्भूत किया है।

सिएन्ना के चित्रकार

पन्द्रहवीं सदी के सिएन्ना के चित्रकारों में सासेत्ता ( 1400-1450) सानो दी पिएत्रो (1406-1481), वेक्किएत्ता (1412-1480) व फ्रांचेस्को दि जोर्जिओ (1439-1502) प्रसिद्ध हैं। 

परम्परागत सिएन्ना शैली की रक्षा करते हुए फ्लोरेंटाइन शैली की नवीनताओं को यथासम्भव अपनाने का इन चित्रकारों ने प्रयत्न किया व कुछ रोचक कलाकृतियों का सर्जन किया। 

चौदहवीं सदी की सिएन्ना शैली व अंतरराष्ट्रीय गोथिक शैली का समन्वय करके सासेत्ता ने ऐसी सुडौल व संवादित्वपूर्ण शैली का विकास किया जो उनकी रहस्यपूर्ण पारलौकिक कल्पना सृष्टि की अभिव्यक्ति के लिए बहुत अनुकूल सिद्ध हुई जिसका ‘संत’ फ्रान्सिस पर कलंक लगाना’ अभ्यसनीय उदाहरण है। 

वोक्किएत्ता, सासेत्ता के शिष्य थे व उनकी आलंकारिक शैली की अनोखी मनोहारिता का परिचय उनके फ्रेस्को चित्र ‘अदन वाटिका में आदम व ईव’ से किया जा सकता है। 

फ्रान्चेस्का दि ज्योर्जिओ बाद की पीढ़ी के चित्रकार होने के नाते बोत्तिचेलि, लिप्पि बन्धु व वेरोक्कियो की कला द्वारा प्रकाशित नवीन तत्त्वों से सुपरिचित थे। 

वे मूर्तिकार, अभियन्ता, वास्तुकार व शास्त्रज्ञ के रूप में भी प्रसिद्ध थे व उनसे लिओनार्दो काफी प्रभावित थे। सिएन्ना के सान दोमेनिको गिरजाघर में बनाये चित्र ‘चरवाहों की आराधना’ में उनकी शैली बोत्तिचेलि व लिप्पि के काफी समीप आ गई है। 

बोत्तिचेलि के समान पूरे दृश्य को महराब से आच्छादित किया है व दृश्य के बायें हिस्से के किनारे चित्रित देवदूत की आकृति पूर्ण रूप से बोत्तिचेलि की आकृति के सदृश है। 

वस्त्रों में अंकित गतित्व का प्रभाव लिप्पि की शैली की याद दिलाता है। उपर्युक्त प्रभावों के बावजूद ज्योर्जिओ ने इस चित्र द्वारा अपने चित्रकारी के प्रभुत्व को सिद्ध किया है। इसके अतिरिक्त इस चित्र में आलंकारित्व व भावाभिव्यक्ति जैसे गुण भी हैं जो फ्लोरेंटाइन शैली में नहीं पाये जाते।

उम्ब्रियन चित्रकार

सिएन्ना के चित्रकारों के समान उम्ब्रिया के चित्रकार बेनेदत्तो बोन्फिग्ली (1420- 1496) व फिओरोन्जो दि लोरेन्जो (1440-1522) की कला फ्लोरेंटाइन शैली से प्रभावित थी। 

किन्तु इन दोनों के अतिरिक्त उम्ब्रिया के चित्रकारों में एक ऐसे महान चित्रकार ने जन्म लिया जिनकी न केवल प्राचीन अग्रगण्य इटालियन चित्रकारों में गणना की जाती है बल्कि जिनकी कला आधुनिक चित्रकारों के लिए भी मार्गदर्शक व प्रेरणादायक रही। 

प्येरो देला फ्रान्चेस्का (1416-1492)

अपने जीवन काल में फ्रान्चेस्का ने काफी ख्याति प्राप्त की व उनकी मृत्यु के दो साल बाद प्रकाशित लुका पाच्योलि की पुस्तक में लेखक ने उनका ‘चित्रकला सम्राट’ की उपाधि के साथ वर्णन किया है, किन्तु 17वीं सदी तक कला के इतिहास में वे विस्मृत हुए। 

बीसवीं सदी में सेजान व घनवादी चित्रकारों के प्रयत्नों से कला प्रेमियों का ध्यान कलाकृति के अन्तर्गत मौलिक आकारों द्वारा की गई रचना की सामर्थ्य व सरलीकरण की श्रेष्ठता, सुनियंत्रित छटाओं द्वारा आकारों में घनत्वदर्शन आदि गुणों की ओर आकर्षित होते ही गणितीय सिद्धान्तों के अनुसार सरल व परोक्ष प्रभावकारी आकारों से युक्त फ्रान्चेस्का की कला की महानता फिर से प्रस्थापित हुई ।

फ्रान्चेस्का की कला का विस्मरण होने का कुछ सीमा तक यह भी कारण था कि उन्होंने प्राय: इटली के प्रमुख कला केन्द्रों से दूर रहकर कला सर्जन किया। 

रोम के वेतिकन (पोप का महल) में किया हुआ उनका कला कार्य शीघ्र ही नष्ट हुआ। 1439 में उन्होंने फ्लोरेंस में दोमेनिको वेनेजिआनो के सहायक के रूप में कार्य किया किन्तु अपनी आयु के अधिकतर वर्ष उन्होंने उम्ब्रिया में अपने जन्म स्थान बोर्गी सान सेपोल्क्रो में बिताये। 

यहीं पन्द्रहवीं सदी की चित्रकला उन्होंने अपनी सबसे प्रसिद्ध कृतियों में से अधिकतर कृतियाँ निर्मित की जिनमें ‘ईसा का बपतिस्मा’ व ‘पुनरुज्जीवन’ ये प्रसिद्ध कृतियाँ भी आती हैं। 

1445 में उनको प्रसिद्ध कृति ‘मेदोना देल्ला मिसेरिकोर्दिआ’ के निर्माण का काम मिला। 

इस चित्र को सरसरी निगाह से देखने पर भी उन पर फ्लोरेंस में देखी गयी मासाच्चो की कला का कितना अधिक प्रभाव था यह स्पष्ट होता है किन्तु उनके गणितीय आकारों के सरल व ठोस प्रभाव की मासाच्चो की कला से लेशमात्र तुलना नहीं की जा सकती। 

मेरी की विशाल आकृति लबादा फैला कर भक्त गणों की रक्षक के रूप में खड़ी है व भक्त गण घुटने टेक कर माता मेरी की प्रार्थना कर रहे हैं। 

सम्पूर्ण संयोजन ज्यामितीय मूल आकारों पर आधारित है। फ्रान्चेस्का ने गणितीय अध्ययन से चित्रकला में उपयुक्त ग्रंथ लिखे। 

फ्रान्चेस्का का प्रसिद्ध चित्र ‘ बपतिस्मा’ आरम्भिक काल में बनाया गया है व उसका ठंडे सौम्य प्रकाश का प्रभाव सिएन्ना शैली व वेनेजिआनो के प्रसिद्ध वेदिका चित्र ‘संत ल्युसी वेदिका चित्र’ के सदृश है जो मुदु मध्यम छटाओं को लेकर विशुद्ध श्वेत तक आकारों को स्वच्छ व पारदर्शक रूप प्रदान करते हुए अनवरुद्ध गति से चित्रभूमि पर सौम्य किन्तु चमकीले प्रकाश के समान फैला हुआ है। 

संवेदनशील व पूर्ण यथायोग्य छटाओं के प्रयोग में फ्रान्चेस्का अद्वितीय थे व उनके पश्चात् छटाओं का इतना सफल प्रयोग केवल डच चित्रकार वर्मेर ने ही किया। 

समुचित छटाओं का प्रयोग व सौम्य श्वेत प्रकाश की योजना में फ्रान्चेस्का के ज्यामिति पर आधारित आकार परस्पर पूरक व एक सूत्र में बंधे हुए नजर आते हैं। सौम्य रंग संगति में ज्यामितिनिष्ठ आकारों को छन्दशास्त्र की मंत्रमुग्ध करने की शक्ति है। 

नीचे के आयत व ऊपरी अर्धवृत्त के बीच सीमित चित्रक्षेत्र को हल्की क्षैतिज रेखाओं से विभाजित करके उन पर सोच-समझ कर क्षितिज व खड़ी रेखाओं से बंधी आकृतियों के बीच ईसा की ठीक उर्ध्वाधर भव्य स्तम्भाकार आकृति दर्शकों के आकर्षण का प्रमुख केन्द्र स्थान है। 

ईसा की आकृति के ठीक ऊपर पंख फैले हुए सफेद कबूतर की तथा आसमान में स्थिर बादलों की आड़ी रेखाओं ने को स्थैर्य एवं शान्तिभाव प्रदान किये हैं। दृश्य

फ्रान्चेस्का अपने चित्रों में परावर्तित प्रकाश का सूक्ष्म निरीक्षण के साथ प्रयोग करते थे जिससे चित्रांतर्गत प्रकाश प्रभाव अधिक व्यापक व छाया के हिस्से पारदर्शक व दीप्तिमान दिखाई देते हैं। 

इस गुण का मासाच्चो के चित्रों में अभाव है क्योंकि वे छायादार हिस्सों को गहरे रंगों से अंकित करते थे। फ्रान्चेस्का ने कई व्यक्ति चित्र भी बनाये किन्तु ये सभी एकचष्म हैं। 

इनमें ‘उर्बिनो की डचेस’ व ‘उर्बिनो के ड्यूक’ के 1465 में बनाये व्यक्ति चित्र प्रसिद्ध हैं। दोनों व्यक्ति चित्र भिन्न फलकों पर बनाये हैं। 

दोनों की पृष्ठभूमि में बनाया उर्बिनो का परिदृश्य क्रमगत है व दोनों व्यक्ति एक-दूसरे के अभिमुख चित्रित किये हैं जिससे कि दोनों चित्र एक ही चित्र के दो खण्ड जैसे प्रतीत होते हैं। 

चित्रों पर फ्लेमिश कला का प्रभाव है, विशेष रूप से पृष्ठभूमि का चित्रण वान आइक के समान सूक्ष्म बारीकियों के साथ किया है। 1452 में फ्रान्चेस्का ने आरेज्जो के सान फ्रान्सिस्को के प्रार्थनालय में फ्रेर को चित्रण आरम्भ किया जो करीब दस साल तक चलता रहा। 

इस चित्रमालिका का विष था ‘सच्चे क्रूस की कहानी’। चित्रमालिका में दस दृश्य हैं। त्रिमिति दर्शन व भित्ति चित्रो ( अनिताओं का इत ki anivaryataon ka itna ) सफलतापूर्वक सन्तोषप्रद समन्वय किसी अन्य चित्रकार ने तबतक नहीं किया था। 

उदाहरण के लिए एक दृश्य में जिसमें सच्चे क्रूस की अलौकिक शक्ति से मृत युवक पुनर्जीवित होता है। 

इसमें ऊँची इमारतों के परिप्रेक्ष्य द्वारा निर्मित गहराई के अभाव से निगाह अवकाश में भ्रमण करती हैं, किन्तु अग्रभूमि की आकृतियाँ दीवार से निकली हुई जैसी प्रतीत होती हैं। 

इसी प्रकार अवकाश का आभास व आलंकारिक वस्तु निरपेक्ष समतल आकारों के बीच का विरोध पूर्ण स्वाभाविक प्रतीत होता है।

फ्रान्चेस्का की आकृतियाँ कठपुतलियों के समान गतिहीन-सी हैं एवं मुद्राभिनय व तदनुकूल हलचल को उनके चित्रण में सीमित स्थान है। 

विशुद्ध आकारों के पारस्परिक तनावों से निर्मित निरपेक्ष कलात्मक संवाद को उनकी चित्रकला में प्रधान महत्त्व दिया गया है। 

दृश्य प्रकृति को उन्होंने अपनी सर्जनशील कल्पना द्वारा गणितीय रूपसृष्टि में परिवर्तित किया है। परिणामस्वरूप उनकी कलाकृतियों में हम प्रत्यक्ष के स्थान पर लोकोत्तर को अनुभव करते हैं।

फ्रान्चेस्का के फ्रेस्को चित्र ‘कान्स्टाटिनोपल की विजय’ व उच्चेलो के फलक चित्र ‘सान रोमानो का विध्वंस’ ये दोनों 1456 के करीब बनाये गये थे व हो सकता है कि फ्रान्चेस्का ने उच्चेलो के चित्रों की तराशी हुई आकृतियों व सफेद रंग के प्रयोग का अध्ययन किया हो किन्तु सम्पूर्ण दर्शन के विचार से दोनों चित्रों में कोई समानता नहीं है। 

जिस संयोजन कौशल से फ्रान्चेस्का ने भिन्न आकृतियों को अंतर्गत लय के द्वारा बांध कर उनमें सुसंवादित्य निर्माण किया है, उसके सामने उच्चेलो का चित्र केवल आलंकारिक प्रतीत होता है। 

वहीं के अन्य फ्रेस्को चित्र ‘कान्स्टन्टाइन का स्वप्न’ में रात की रहस्यमयता को प्रभावपूर्ण ढंग से चित्रित किया है। पश्चिमी भित्ति चित्रण कला में आरेज्जो के फ्रेस्को व चित्रमालिका का एक स्वतंत्र स्थान है।

आरेज्जो के बाहर किए हुए कार्य में उर्बिनो के मोन्तिल्यो राजदरबार में बनाये फलक चित्र ‘कोड़ों की मार’ व बोर्गे सान सेपोल्क्रो में बनाये फ्रेस्को चित्र ‘ईसा का पुनरुज्जीवन’ विशेष प्रसिद्ध हैं। 

परिप्रेक्ष्य के गहरे अध्ययन व समुचित प्रयोग का ‘ईसा का पुनरुज्जीवन’ एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसमें इमारतों की व फर्श की क्षितिजगामी रेखाएँ दर्शकों का ध्यान ईसा की शोकजनक आकृति की ओर केन्द्रित करती हैं। 

परिप्रेक्ष्य दर्शन पर आल्बर्ती का प्रभाव है। अन्य उम्ब्रियन चित्रकारों में मेलोज्जो दा फोर्लि, लुका सिन्योरेली, पेरुजिनो व पिन्तुरिक्कियो प्रसिद्ध हैं।

मेलोज्जो दा फोर्लि 

मेलोज्जो दा फोर्लि (1438-1494) के चित्रण में फ्रान्चेस्का की न तो मौलिकता है न चमकीलापन किन्तु स्वच्छगति, सुगठित मानवाकृतियाँ, रंगों की सम्पन्नता व आकर्षण के कारण उनको मान्यता प्राप्त हुई। 

उनकी बहुत कम कृतियाँ उपलब्ध हैं जिनमें ‘सिक्स्टस द्वितीय द्वारा वेतिकन पुस्तकालय की नींव डालना’ यह फ्रेस्को विशेष प्रसिद्ध है।

लुका सिन्योरेलि 

लुका सिन्योरेलि (1450-1523) ने काफी तादाद में चित्र बनाये। ओर्वितो महामंदिर के केप्पेला नुआवो में उन्होंने ‘ख्रिस्त विरोधी का विनाश’ व ‘अन्तिम निर्णय’ विषयों पर चित्र बनाये जो क्रोधावेशयुक्त व सामर्थ्यपूर्ण हैं। 

यहाँ प्रकाश के प्रभाव रंग सौन्दर्य को महत्त्व नहीं है बल्कि शरीर रचना शास्त्र का गहरा अध्ययन करके किया मानवाकृतियों का ब्योरेवार प्रस्तुतीकरण है। 

सिन्योरेलि के बनाये हुए फ्रेस्को चित्र लारेतो के किसा देल्ला कासा पन्द्रहवीं सदी की चित्रकला सांता में हैं जिनमें ईसा के पट्टशिष्यों के सूमहों व सुडौल देवदूतों का उल्लेखनीय चित्रण है। 

सिन्योरेली की तुलना में पिएत्रो वानुच्चि (1450-1523) जो पेरुजिनो नाम से प्रसिद्ध थे कुछ कम महत्त्व के चित्रकार थे यद्यपि रेखांकन पर उनका काफी प्रभुत्व था । 

उनकी संतों की आकृतियाँ अक्सर एक-सी उसी मुद्रा में व भावहीन चेहरों की चित्रित की हुई हैं।

पिन्तुरिक्कियो

पिन्तुरिक्कियो (1454-1513) की चित्रण शैली बेनोज्जो गोज्जोली की शैली से मिलती-जुलती है किन्तु उसमें गोज्जोली जितनी मौलिकता नहीं है। 

उनकी शैली में कथाचित्रण को अधिक महत्त्व है व कहीं-कहीं कथा की तफसील में फंस जाने के कारण उनकी कृतियों का दर्जा घट गया है। 

उन्होंने वेतिकन (पोप के महल) में बोर्गिआ अपार्टमेन्ट्स को एवं सिएन्ना के गिरजाघर के संग्रहालय को फ्रेस्को चित्रों से अलंकृत किया जिनमें कहीं सोने का भी प्रयोग किया गया है। मूलतः वे लघु चित्रण शैली के कलाकार थे।

फेरारा के चित्रकार

15वीं सदी के फेरारा के शासकों से दृश्य कलाओं को काफी प्रोत्साहन मिला। मान्तेन्या व फ्रान्चेस्का ने भी वहाँ कुछ कार्य किया। पंद्रहवीं सदी के फेरारा के प्रमुख चित्रकारों में से कोसिमो तुरा (1430-1495) सबसे उल्लेखनीय हैं। 

उनकी चित्रित सृष्टि में हर वस्तु व प्राणी धातु का बना हुआ जैसा प्रतीत होता है व मानवाकृतियों के चेहरे उदास लगते हैं। वस्त्रों के चित्रण जर्मन कला के समान कठोर सलवटों से युक्त हैं। 

कोसिमो तुरा के समान फ्रान्चेस्का कोसा (1436-1478) व एकल दि रोबर्ती (1450-1496) ने फेरारा के पालाज्जो स्किफेनौया में फ्रेस्को चित्रण किया जिसमें समकालीन जीवन के दृश्यों के अतिरिक्त ज्योतिषशास्त्र पर आधारित रूपक कथाओं का चित्रण है। 

आन्द्रिया मान्तेन्या (1431-1506) ने पादुआ व मांतुआ में चित्रण किया। वे स्क्वार्चिओने के शिष्य थे व आरम्भिक काल में उच्चेलो व दोनातेलो से प्रभावित थे। 

उच्चेलो से उनकी परिप्रेक्ष्य में व दोनातेलो से पुरातन कलाकृतियों व सुनिश्चित रेखांकन में अभिरुचि पैदा हुई। मान्तेन्या असाधारण प्रतिभा के चित्रकार थे व 1448 में जब वे उम्र में केवल 17वें वर्ष के थे उन्होंने स्वतंत्र रूप से चित्रकारी शुरू की। 

उसी वर्ष उन्होंने आन्तोनिओ विवारिनी, ज्योवान्नि, दालेमान्या व निकोलो पिज्जोला के साथ पादुआ के एरेमितानि गिरजाघर में चित्रकारी की। मान्तेन्या के चित्रित अधिकतर फ्रेस्कोचित्र द्वितीय विश्व युद्ध के दरम्यान नष्ट हो गये। 

नष्ट हुए चित्रों में से ‘संत जेमिक्स को मृत्यु दंड देने को ले जाते हुए’ बौद्धिक खोजबीन (अन्वेषण) व पुरातत्त्वीय उत्साह का द्योतक है। 

मान्तेन्या के चित्रों में बाह्य आकर्षण के स्थान पर दर्शक को बलपूर्वक चित्रांतर्गत अवकाश में प्रविष्ट कराकर प्राचीन वीरों से बसी हुई सृष्टि का अन्वेषण करने के लिए उद्यत करने का सामर्थ्य है। 

उनकी आकृतियों की धात्विक कठोरता दोनातेलो के ‘सान्तो वेदिका चित्र’ व आन्द्रिया देल कास्तान्यो के वेनिस के सान जाकारिया में बनाये फ्रेस्को चित्रों के प्रभाव को सूचित करते हैं। 

कुछ भी हो एरेमितानी के गिरजाघर के चित्रों द्वारा मान्तेन्या ने स्वयं को प्राचीन शास्त्रीय शैली के पुनरुत्थान के प्रतिपादक के रूप में प्रस्थापित किया है। 

पादुआ के कार्य के बाद वेरोना के संत जेनो गिरजाघर में बनाया वेदिका चित्र भी उन्हीं विशेषताओं से सम्पन्न है।  वेदिका चित्रांतर्गत अवकाश की गहराई का भ्रांतिजनक अभाव बॅरोक शैली के मायावाद के आगमन की पूर्व सूचना है। 

दोनातेलो के सांता वैदिका चित्र के सदृश सिंहासनारूढ़ मेरी के दोनों ओर की आठ संतों की आकृतियाँ मूर्तियत चित्रित की हैं। 

इसके अतिरिक्त मेरी के आसपास चित्रित की गयीं वादक देवदूतों की आकृतियों पर दोनातेली का ही प्रभाव स्पष्ट है। 

1459 में संत जेनो के वेदिका चित्र का कार्य पूरा होने पर मान्तेन्या मांतुआ के शासक लादोविको गोन्जागा के दरबारी चित्रकार नियुक्त हुए व अन्त तक वहीं कार्य करते रहे। उस समय का गोन्जागा शासन मानवतावादी दृष्टिकोण से प्रेरित था व उसी तरह के विचारों से प्रभावित विषयों के अध्ययन को वहाँ प्रोत्साहन मिलता था। 

वहाँ बनायी गयी कृतियों में राजमहल के अंतःपुर में ‘ज्युलियस सीजर की विजय’ विषय पर बनाये नौ फ्रेस्को चित्रों की मालिका विशेष प्रसिद्ध है। वहीं बनाये अन्य फ्रेस्को चित्रों में मांतुआ के शासक परिवार का विशाल समूह चित्र है। 

महराबों के ऊपर पौराणिक दृश्यों व रोमन सम्राटों के चित्र हैं जिससे स्पष्ट है कि अपने परिवार की प्राचीन रोमन सम्राटों से तुलना करने के उद्देश्य से लादोविको ने अपने परिवार का चित्र बनवाया था। 

रोम के पैन्थेओन (सर्वदेव मंदिर) के गुम्बद से प्रेरणा लेकर छत पर वृत्ताकार कटघरे में से दिखायी देने वाले बादलों से घिरे आसमान का भ्रान्तिजनक चित्रण है। 

कटघरे के ऊपर से नीचे झांकती हुईं महिलाओं, देवदूतों व मोर की आकृतियाँ चित्रित की हैं व इस कृति द्वारा मान्तेन्या ने प्रतिभासिक चित्रण व स्थितिजन्य लघुता पर निर्णयात्मक प्रभुत्व पाया है व इस चित्र ने भविष्य में बनाये गये छत चित्रों का काफी मार्गदर्शन किया। 

यहाँ से प्राप्त स्थितिजन्य लघुता के अनुभव से उन्होंने ‘मृत ईसा’ चित्र बनाते समय लाभ उठाकर ईसा के मृत शरीर को स्थितिजन्य लघुता से बहुत ही हृदय विदारक अवस्था में चित्रित किया है।

 वेनिस के चित्रकार

फ्लोरेंटाइन चित्रकार उच्चेलो व फ्रा फिलिप्पो लिप्पी पन्द्रहवीं सदी के पूर्वार्ध में वेनिस में कुछ समय के लिए चित्रण करने आये थे जिसका वेनिस के चित्रकार विवारिनी बंधुओं – आन्तोनिओ (1415-1480) व बार्तोलोमिओ (1432-1490) पर काफी प्रभाव पड़ा। विवारिनी बंधुओं व बेलिनी परिवार से वेनिस की स्वतंत्र शैली का उदय हुआ। 

14वीं सदी में वेनिस के चित्रकार बिजांटाइन शैली में कार्य करते थे व उसका प्रभाव फ्लोरेन्टाइन शैली से भी अधिक काल तक वेनिस पर टिका रहा। 

किन्तु पन्द्रहवीं सदी के आरम्भ में चित्रकार निकोलो दी पिएत्रो, जाकोबेल्लो देल फिओरे व ज्याम्बोनो ने अंतरराष्ट्रीय गोथिक शैली के कुछ तत्त्वों को ग्रहण किया। 

पन्द्रहवीं सदी में भी वेनिस में बिजांटाइन शैली के अनुसार कार्य होता रहा जिसके कार्लो क्रिवेलि (1430-1495) प्रतिपादक थे जो फलक चित्रों में तीव्र प्रकाश स्थानों पर सुनहरी रंग का प्रयोग किया करते थे। 

चमकीले रंगों व सुनहले या मुलम्मेदार अलंकरणों के प्रयोग से वे चित्र को अत्यधिक सजावटी रूप प्रदान करते थे। वैसे मान्तेन्या व ज्योवानि बेलिनी ने भी मेरी के वस्त्रों पर, कभी सुनहरी रंग का प्रयोग किया है। 

क्रिवेलि ने पादुआ में मान्तेन्या का कार्य देखा था व उसका उनके मानवाकृति चित्रण पर कुछ प्रभाव पड़ने से वे अतिस्पष्ट रेखा में मानव चित्रण करने लगे थे जो उनके लंदन के नेशनल गैलरी स्थित ‘मृत ईसा (Pieta)’ चित्र में देखने को मिलता पन्द्रहवीं सदी की चित्रकला है। 

इस चित्र पर दोनातेलो के सांतो वेदिका चित्र मालिका के ‘शोकमग्न मेरी’ चित्र का भी कुछ असर है। 

अन्तरराष्ट्रीय गोथिक चित्रकारों के समान वे फल, फूल के अलंकरण युक्त ऊँचे वस्त्रों व संगमरमर व पत्थरों की सतहों को परिश्रम के साथ यथातथ्य बनाने मैं विशेष रुचि लेते थे। 

उनके चित्रों के किनारों के हिस्से भी प्रायः बारीकियों की भरमार के साथ चित्रित किए हुए दिखायी देते हैं।

इसी समय सिसली के चित्रकार आन्तोनेलो दा मेसिना वेनिस में रहने आये। वासारी के उल्लेख के आधार पर बहुत समय तक माना जाता था कि वे पहले फ्लैन्डर्स रह चुके थे व वहाँ के निवास में उन्होंने प्रसिद्ध फ्लेमिश चित्रकार वान आइक की अंकन शैली के कुछ तत्त्व आत्मसात् किये। 

परन्तु इस सम्बन्ध में कोई निर्णायक प्रमाण नहीं मिले हैं व हो सकता है कि उन्होंने नेपल्स में वान आइक व अन्य फ्लेमिश चित्रकारों के चित्र देखकर अपनी शैली को मोड़ दिया हो। 

कैसे भी हो उनके चित्रण से विशेषतया उनकी अंकन पद्धति से स्पष्ट है कि वे फ्लेमिश कला से विशेष आकृष्ट थे। इस समय फ्लेमिश चित्रकारों ने टेम्परा को छोड़कर तैल रंगों में काम करना शुरू किया था व आन्तोनेलो ने उनका अनुसरण किया। 

उन्होंने धार्मिक विषयों के चित्र व छोटे आकार के व्यक्ति-चित्र बनाये जो सुस्पष्टतया, खास तौर से प्रकाश की परिशुद्धता के विचार से प्रशंसनीय हैं। 

उनके नेशनल गैलरी (लंदन) के चित्र ‘अध्ययन कक्ष में संत जेरोम’ व ‘साल्वातोर मुण्डी’ एवं ‘लुव्र’ (पेरिस) के चित्र ‘आदमी का व्यक्ति चित्र’ व पालेर्मो व म्युनिक के ‘कुंआरी मरियम व शिशु ईसा’ के चित्र, इनमें यह गुण स्पष्ट दृष्टिगोचर है। 

कलात्मक गुणों तथा अंकन पद्धति के विचार से आन्तोनेलो ने वेनिस शैली पर निश्चित रूप से प्रभाव डाला। उनके धार्मिक चित्र जैसे कि ‘सान केसिआनो के पॉल’ (विएन्ना) संतुलित संयोजन व रंग संगति के विचार से श्रेष्ठ है किन्तु वे आज तैल रंगों में चित्रित व्यक्ति चित्रों के लिए अधिक प्रसिद्ध हैं। 

व्यक्ति का चेहरा हमेशा बायीं ओर देखते हुए एवं तीन चौथाई मुखाकृति चित्रित किया है। चेहरा एवं उसके भावों का गढ़न अप्रतिम है। आन्तोनेलो के व्यक्ति चित्र उस काल के श्रेष्ठ चित्रों में गिने जाते हैं। 

उनके पालेज्जो त्रिवुल्जिओ (मिलान) में संगृहीत व्यक्ति चित्र व ‘कुलीन व्यक्ति का व्यक्ति चित्र‘ (मिलान) इन दोनों में उन्होंने कुशलता से व्यक्ति स्वभाव का जीवंत चित्रण किया है। 

मेसिना के व्यक्ति चित्र उस समय की श्रेष्ठ कृतियों में गिने जाते हैं। बेलिनी बंधु जेन्ताइल व ज्योवान्नि के पिता जाकोपो बेलिनी के जेन्ताइल दा फाब्रिआनो गुरु थे। 

जाकोपो बेलिनी (1400-1470 ) के बहुत कम चित्र शेष हैं किन्तु लुव्रब्रिटिश संग्रहालय में जो उनकी अभ्यास चित्र पुस्तिकाएँ हैं उनसे उनके कार्य की विविधता का पता चलता है। 

पादुआ के निवास में वे दोनातेलो के प्रभाव में आ गये यद्यपि उनकी शैली मुख्य रूप से अन्तरराष्ट्रीय गोथिक शैली के अन्तर्गत ही आती है। 

उनकी अभ्यास चित्र पुस्तिकाओं में वास्तु-शास्त्रीय रेखाचित्र, परिप्रेक्ष्य विषयक रेखांकन और प्राचीन मूर्तियों से किये अभ्यास चित्र भी हैं। मान्तेन्या ने ज्याकोपो की पुत्री से विवाह किया जिससे पादुआ व वेनिस की चित्रशैलियों का सम्पर्क अधिक बढ़ गया। 

ज्योवान्नि बेलिनी

ज्योवान्नि बेलिनी जो पन्द्रहवीं सदी की वेनिस शैली के सबसे श्रेष्ठ चित्रकार माने जाते हैं— के मान्तेन्या गुरु रहे। ज्याकोपो से भी उनके पुत्र जेन्ताइल (1429-1507) व ज्योवान्नि (1430-1517 ) अधिक श्रेष्ठ चित्रकार थे। 

जेन्ताइल की रुचि धार्मिक विषयों के चित्र बनाने में थी जिनकी पृष्ठभूमि में वे प्रायः यथार्थ या काल्पनिक वास्तु दृश्यों को चित्रित किया करते थे। 

रंग सौन्दर्य व काल्पनिकता के विचार से कार्पाच्चियो जेन्ताइल से श्रेष्ठ थे जिनके मानवाकृति चित्रण के सबसे अच्छे उदाहरण हैं ‘संत उर्सुला की पौराणिक कथा के प्रसंग चित्र’ (अकादमिआ वेनिस) व संत जार्ज, संत जेरोम व संत त्रायफोन की जीवन गाथाओं के फलक चित्र जी सान ज्योर्जिओ देग्ली स्किआवोनी में हैं। 

उन्होंने संतों को ऐसे वातावरणों के अन्तर्गत चित्रित किया है जिसमें वेनिस के दैनिक जीवन का यथार्थ, निष्ठा, स्पष्टता एवं विनोद व सौहार्द्र का सम्मिश्रण के साथ अंतर्भाव है। 

वेनिस के 15वीं सदी के चित्रकारों में ज्योवानि बेलिनी को न केवल उनकी कला की श्रेष्ठता के कारण सर्वश्रेष्ठ मानते हैं बल्कि उसका अन्य महत्त्वपूर्ण कारण यह भी है कि उनके बोये हुए बीजों से ही वेनिस के भावी विश्वविख्यात चित्रकार ज्योर्जिओने, तिशेन तिन्तोरेत्तो व वेरोनीस को रंग-सौन्दर्य व प्रकाश-प्रभाव का ज्ञान होकर उनकी कला फलीभूत हुई। 

ज्योवान्नि के प्रारम्भिक काल के चित्रों पर आन्तोनिओ दा मेसिना व मान्तेन्या की कला का सम्मिश्रित प्रभाव था जो उनके चित्र ‘गिरजाघर में प्रस्तुतीकरण’ (वेनिस) व ‘शोक मग्न कुंआरी मरियम’ (मिलान) चित्रों में देखने को मिलता है। 

बाद में उन्होंने अपने धार्मिक चित्रों की पृष्ठभूमियों के दृश्यों को अधिक महत्त्व देना आरम्भ किया व चित्रांतर्गत प्रकाश व गहराई के प्रभाव को बढ़ावा दिया जिसके परिणामस्वरूप ‘बगीचे में घोर व्यथा’ (Agony in the Garden) (नेशनल गैलरी, लंदन), ‘रूपान्तरण’ (Transfiguration) (नेपल्स), ‘देवताओं का भोज’ (फिलाडेल्फिया), ‘भाव समाधि में संत फ्रान्सिस’ (फ्रिक संग्रह, न्यूयॉर्क) चित्रों का निर्माण हुआ किन्तु ज्योवान्नि के चित्रों में प्रकृति का अंधानुकरण मात्र नहीं है। 

उनके प्रकृति दृश्य आश्चर्य भाव से युक्त हैं व उनमें परम शक्ति पर विश्वास जागृत करने का सामर्थ्य है। बेलिनी की मैडोना (कुंवारी मेरी) की आदर्श प्रतिमाओं को देखकर उनको ‘वेनिस के रेफिल’ उपाधि के हकदार मान सकते हैं। 

मैडोना आकृति चित्रण का चरमोत्कर्ष उनके 1480 में बनाये वैदिका चित्रों की मालिका में दिखायी देता है जिनमें ‘वृक्ष वाटिका में कुंआरी मरियम’ (अकादेमिया, वेनिस) सान ज्योब की ‘सिंहासनारूढ़ कुंआरी मरियम व संतसमूह’ (त्रिपट) ये विशेष प्रशंसनीय हैं। 

सान ज्योब का वेदिका चित्र ऐश्वर्य व सम्पन्नता की दृष्टि से आन्तोनेलो दा मेसिनो द्वारा 1475 में वेनिस के सान कासिआनो गिरजाघर चित्रित वेदिका चित्र के सदृश है। 

सान ज्योब वेदिका चित्र में मेरी के सिंहासन के अधोभाग के निकट वादक देवदूतों की मोहक आकृतियाँ चित्रित की हैं। 

वेनेशियन शैली जैसे मनोहर रंग संगति के लिए प्रसिद्ध हैं वैसे ही उसमें जगह-जगह जो संगीत कला का उल्लेख चित्ररूप में देखने को मिलता है वह भी उसकी विशेषता है।

ज्योवानि बेलिनी के शुरू के व्यक्ति चित्रों में आन्तोनेलो दा मेसिना का निष्ठापूर्वक अनुसरण है किन्तु उनके उत्तरकालीन व्यक्तिचित्र ‘दोज लिओनार्दो दोरेन्दानो’ (नेशनल, लंदन) की शैली अधिक व्यापक व व्यक्ति स्वभाव दर्शक है व उसमें आन्तोनेलो के समान बारीकियों को महत्त्व नहीं दिया है। 

1483 में बेलिनी वेनिस गणतंत्र के चित्रकार नियुक्त पन्द्रहवीं सदी की चित्रकला हुए। बेलिनी के दोज राजमहल, वेनिस के लिए बनाए चित्रों में से एक भी अवशिष्ट नहीं है किन्तु 1506 में जर्मन चित्रकार आल्ब्रेश्ट ड्यूरर के वेनिस की यात्रा के दौरान लिखे पत्र से बेलिनी की ख्याति का परिचय होता है। 

ड्यूरर ने लिखा है, "वे बहुत वृद्ध हैं, फिर भी सबसे अच्छे चित्रकार हैं।" लोम्बार्दी के चित्रकार लिओनार्दो दा विंची को छोड़कर लोम्बार्दी में पन्द्रहवीं सदी में कोई महत्त्वपूर्ण चित्रकार पैदा नहीं हुआ। 

पन्द्रहवीं सदी के मध्य में जन्मे तथा सिन्योरेली, पिन्तुरिक्कियो व कार्पाच्चियो के समकालीन चित्रकार लिओनार्दो प्रतिभा व शैली के विचार से अपने समय से इतने आगे थे कि उनकी कला का अध्ययन सोलहवीं सदी के चित्रकारों के साथ करना ही उचित रहता है। 

विन्चेंजो फोप्पा (1427-1515) बेस्चिआ के निवासी थे व उत्तरी इटली में चित्रकारी करते थे। उनके चित्रों पर बेलिनी व मांतेन्या का प्रभाव है जो चित्रोपम व मनोहर है किन्तु उनमें व्यक्तिगत विशेषता का कुछ अभाव सा प्रतीत होता है। 

यही बात बोजन्योन (1450-1523) के विषय में भी कही जा सकती है। बुतिनोन (कार्यकाल 1484-1507) व जेनाले (1436-1526) क्रिवेलि के अनुयायी थे जो बात उनके द्वारा बनाया वेदिका चित्रों से प्रमाणित होती है जिनमें तीव्र प्रकाश को सुनहरी चित्रित किया है। 

फ्लैंडर्स में गोथिक कला

पन्द्रहवीं सदी में यूरोप में दो महान् कला केन्द्र थे जिनमें से एक था इटली। दूसरा था फ्लैंडर्स जहाँ अनेक प्रतिभा सम्पन्न कलाकार पैदा हुए। उस समय फ्लेमिश शहर वाणिज्य केन्द्र थे जिनके इटली, स्पेन व पुर्तगाल से भी सम्बन्ध थे। 

इटली में चित्रकारी की दो विधियाँ प्रचलित थीं— एक थी फ्रेस्को पद्धति से भित्ति चित्रण व दूसरी थी टेम्परा रंगों से पट्टों पर चित्रण | फ्लेमिश चित्रकारों ने भित्ति चित्रण की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया व गीले प्लस्तर पर कभी चित्रण नहीं किया। 

गिरजाघरों की साज-सज्जा, वेदिका चित्र बना के की जाती थी। तैल रंगों से छोटे व्यक्ति चित्र व बड़े वेदिका चित्र बनाये जाते थे।

यान वान आइक को लम्बे समय तक तैल चित्रण का आविष्कारक माना जाता था। किन्तु अब काफी बहस के बाद माना जाता है कि वान आइक ने प्रचलित तैल चित्रण पद्धति में परिवर्तन करके उसको चमक-दमक प्रदान की एवं जल्दी सूखने के उद्देश्य से तैल रंगों में टरपेन्टाइन को मिश्रित करना शुरू किया।

आपसी भिन्नताओं के कारण फ्लेमिश चित्रकारों में से हरेक की पृथक् पहचान सम्भव है किन्तु उनमें कुछ ऐसी समानताएँ भी हैं जो उनकी इटालियन चित्रकारों से भिन्नता दर्शाती हैं। 

इटालियन चित्रकारों ने शरीर सौंदर्य पर विशेष ध्यान दिया है जबकि फ्लेमिश चित्रकार यथातथ्य बारीकियों के साथ चित्रण करने में प्रयत्नशील रहे। उन्होंने फ्लोरेन्टाइन चित्रकारों के समान रेखात्मक परिप्रेक्ष्य का प्रयोग करने की अपेक्षा रंगों की छटाओं व प्रकाश के प्रभाव से यानी वातावरणीय परिप्रेक्ष्य से चित्र में गहराई दिखायी है। 

पृष्ठभूमि में यथार्थ व कल्पना से मिश्रित भू-दृश्य बनाने में उनकी विशेष रुचि दिखायी देती है, भले ही वह व्यक्ति चित्र हो या धार्मिक चित्र। इटालियन चित्रों की पृष्ठभूमि के भू-दृश्यों की तुलना में ये कठोर लगते हैं। 

सम्भवतः इटालियन चित्रकारों के समान, फ्लेमिश चित्रकारों को चित्रण के लिए भित्ति जैसा विस्तृत धरातल न मिलने से व छोटे आकार के पट्टों पर काम करने से उनकी आकृतियाँ कुछ जकड़ी हुई लगती हैं। 

उन्होंने सुन्दर व कुशलतापूर्वक रेखाओं व आकारों से चित्र को रचनात्मक बनाने की ओर विशेष ध्यान नहीं दिया, न उन्होंने गतित्व दर्शाने के विशेष प्रयत्न किये। 

संतों व दाताओं से घिरी हुई कुंआरी मरियम के चित्र विशेष रूप से सममितियुक्त संयोजन के अन्तर्गत बनाये हैं। इटालियन चित्रकारों के समान वे कला के प्रति समर्पित थे व उनमें से किसी को भी प्रदर्शन प्रवृत्ति का दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

यान वान आइक का जन्म सम्भवतः 1390 व 1400 के बीच हुआ। उन्होंने न केवल तैल चित्रण विधि को विकसित कर उसकी सम्भावनाएँ बढ़ार्थी, वे स्वयं एक महान् चित्रकार भी थे। 

वे अन्य फ्लेमिश चित्रकारों के समान ही, वास्तविकता को सूक्ष्म निरीक्षणपूर्वक व बारीकियों के साथ चित्रित करने में सन्तुष्ट नहीं हुए बल्कि नम्रता व आस्था के साथ उन्होंने उसे ऐसे रूपांतरित किया कि वह फिर भी काल्पनिक न लगे, वास्तविकता हो दिखायी दे । 

उनके गेंत के महामंदिर के वेदिका चित्र ‘मेमने की आराधना’ एवं नेशनल गैलरी, लंदन के चित्र ‘ज्योवान्नि अर्नोल्फिनी व दुलहन’ को देख कर लगता है जैसे समय ठहर गया है। 

सुपरिचित चीजें जिनकी ओर हम सामान्यतः ध्यान नहीं देते उनके चित्रों में बिलकुल नये रूप में प्रकट होती हैं जैसे कि वान आइक हमें उन चीजों के आन्तरिक सौंदर्यपूर्ण जीवन को उद्घाटित कर उनसे प्रेम करना समझा रहे हैं। 

इटालियन चित्रकारों के समान चित्र में अनुपम देह सौंदर्य को सम्मिलित किये बिना इतनी प्रभावी कला निर्मिति करना असाधारण बात है। 

उन्होंने व्यक्तियों को अतिशयोक्त रूप में सुंदर चित्रित करने की अपेक्षा उनको नैसर्गिक रूप में चित्रित करना उचित माना। यही बात उनके द्वारा पृष्ठभूमि में चित्रित भू- दृश्यों पर लागू होती है। 

यान वान आइक के बड़े भाई ह्यूबर्ट वान आइक ( 1366-1426) का कहीं चित्रकार के रूप में उल्लेख मिलता है व माना जाता है कि ‘मेमने की आराधना’ चित्र का आरम्भिक कार्य उन्हीं के द्वारा किया गया है किन्तु इस सम्बन्ध में इतिहासकारों में मतभेद है। 

कुछ तो उनके होने पर भी संदेह करते हैं। ‘क्रूसारोपण’ व ‘अंतिम निर्णय’ (मेट्रोपोलिटन, न्यूयॉर्क ) ये द्विपट के रूप में बनाये चित्र उन्हीं के माने जाते हैं। शैली यान वान आइक से मिलती-जुलती है।

पीट्स ख्रिस्टस 

पीट्स ख्रिस्टस (मृत्यु 1472) अच्छे फ्लेमिश चित्रकार थे व उनकी शैली वान आइक के समान है। उनके चित्र ‘ईसा की मृत्यु पर शोक’ का संयोजन बहुत ही आकर्षक है व चित्र भावुकतापूर्ण है। उन्होंने ‘कार्ब्युसियन’ (न्यूयॉर्क) व ‘युवती’ (बर्लिन) जैसे उत्कृष्ट व्यक्ति चित्र भी बनाये हैं। 

इस सदी के अन्य महान फ्लेमिश कलाकार थे रोजियर वान डेर वाइडन जो रोजेलेट डे ला पास्टूर (1399-1464) नाम से भी ज्ञात हैं। 

उन्होंने कला की शिक्षा सम्भवतः उनसे प्राप्त की जो फ्लेमाल के उस्ताद नाम से जाने जाते थे। व जो अब कुछ इतिहासकारों के अनुसार राबर्ट केम्पिन (1375-1444) नामक चित्रकार पन्द्रहवीं सदी की चित्रकला थे। 

केम्पिन के प्राडो (माड्रिड) संग्रहालय के दो चित्र ‘बपतिस्मा दाता जान’ व ‘सन्त बार्बारा’ शैली के विचार से वान आइक से काफी सदृश हैं। 

‘दूत-सन्देश’ (मेट्रोपोलिटन, न्यूयॉर्क) ‘क्रूसावरोहण’ (लिव्हर पुल) आदि अनेक चित्रों का श्रेय उन्हें दिया जाता है किन्तु आकार कहीं-कहीं अयथार्थ प्रतीत होते हैं व उनका छाया प्रकाश का अंकन रूढ़िबद्ध है। 

रोजियर वान डेर वाइडन, वान आइक के प्रतिस्पर्धी थे व वे ब्रूसल्ज में रहते थे। वे इटली में रोम व फेरारा में रह कर आये थे। 

जहाँ वान आइक के चित्रों में प्रशान्ति व जीवन की यथार्थता के खुले दिल से स्वीकार के भाव हैं वहाँ वान डेर वाइडन के चित्रों में जीवन की रहस्यमता के गहरे अनुभव की अभिव्यक्ति है। 

उनके सबसे हृदयस्पर्शी चित्र हैं’ क्रूसावरोहण’ जिसमें मरियम को बेहोश होते हुए व मॅग्दालिन को घोरव्यथा से छटपटाते हुए दिखाया है व दफन (उफ्फिजी) जो सादगीपूर्ण व कारुणिक है।

उन्होंने अनेक श्रेष्ठ सपक्ष वेदिकाचित्र बनाये जिनमें पिनाकोटेक (म्युनिक), डाहलेम (बर्लिन) के एवं अन्तिम निर्णय (हाटेल ड्यू, बेओने) ‘सात परम संस्कार’ (एन्टवर्प) ये चित्र हैं। उनके चित्रों में ईसाई धार्मिक जीवन के गांभीर्य का दर्शन है। 

उनके वेदिकाचित्र ‘सात परम संस्कार’ में देवदूतों व समकालीन व्यक्तियों का एक साथ किया अंकन विसंगत नहीं लगता। उन्होंने ‘बाण के साथ कुलीन पुरुष’ (ब्रसल्ज) व ‘छालटी की टोपीवाली महिला’ (नैशनल गैलरी, वाशिंगटन) जैसे उत्कृष्ट व्यक्ति चित्र बनाये हैं। 

करीब 1443 में किसी अज्ञात चित्रकार के बनाये एक्स के ‘दूत सन्देश’ में भी इसी तरह का नैसर्गिक रूप के प्रति आकर्षण एवं अन्तराल व ठोस आकारों का अंकन दृश्य है। 

15वीं सदी में उत्तरी फ्लैंडर्स (अब हालैण्ड) व दक्षिणी फ्लैंडर्स (अब बेल्जियम) की कलाशैलियों में कोई अन्तर नहीं था। कलाकारों के व्यक्तित्व में अन्तर के बावजूद कलाविषयक दृष्टिकोण एक से थे। 

डीरिक बौट्स (मृत्यु 1475) की कला में ऐसी कोई विशेषता नहीं थी जो उनको डच के रूप में पृथक् पहचान दिला दे। उनकी कला में फ्लेमिश कला की समस्त विशेषताएँ हैं जैसे रूप के यथार्थ चित्रण में सूक्ष्मता, सुस्पष्ट अंकनपद्धति, चमकीले रंग, पृष्ठभूमि में दूर स्थित भू-दृश्य में हलके कोमल नीले व सफेद रंगों से आकाश की गहराई का प्रभाव। 

बौट्स की कला की विशेषता है उनकी लम्बी छरहरी मानवाकृतियों के चेहरे की शान्त समर्पित मुद्राएँ जिसका समुचित उदाहरण है उनके लुवेन के सेंट प्येर गिरजाघर का वेदिकाचित्र जिसके मध्यवर्ती फलक के चित्र ‘अन्तिम व्यालू’ के चारों ओर चार फलक हैं जिन पर पूर्वविधान के चित्र बनाये हैं। 

एक अन्य उदाहरण है ब्रसल्ज संग्रहालय का लम्बा फलक जिस पर सम्राट ओटो तृतीय की दंतकथा को चित्रित किया है जिसमें शिरच्छेदन, अग्निपरीक्षा, व एक स्त्री को जलाना जैसे भयानक दृश्य होते हुए दर्शकों को अविचलित दर्शाया है।

आल्बर्ट वान औवाटर (1430-1460) उत्तरी फ्लैंडर्स के कलाकार थे। ऐसा एक ही चित्र है जो निश्चित रूप से उन्हीं के द्वारा बनाया कह सकते हैं और वह है ‘लाजारस को पुनर्जीवित करना’ (बर्लिन) । 

वान डेर गोएस (कार्यकाल 1467-1482) जिन्होंने 15वीं सदी के उत्तरार्ध में कार्य किया, आयु के अन्तिम वर्षों में मनोरोग से पीड़ित होने से ब्रसल्ज के निकटवर्ती मठ में जा कर रहे व वहाँ अवसाद के दौरे में उन्होंने आत्महत्या का प्रयत्न भी किया। आखिर  चित्रकारी करना ही छोड़ दिया व उसी अवस्था में उनकी मृत्यु हुई। 

उन्होंने फ्लोरेंस के उफ्फिजी संग्रहालय का वेदिकाचित्र ‘चरवाहों की आराधना’ बनाया जिसकी उस कालखण्ड के श्रेष्ठ फ्लेमिश कलाकृतियों में गणना की जाती है। 

उसके दोनों ओर के फलकों पर दानकर्ता के परिवार व उनके संरक्षक सन्तों के चित्र हैं। इस चित्र में व बर्लिन संग्रहालय के ‘मजूसियो की आराधना’‘चरवाहों की आराधना’ चित्रों में वान डेर गोएस ने पूर्ववर्ती कलाकारों के अनुसरण के अतिरिक्त निजी प्रतिभा द्वारा कुछ तत्त्वों का समावेश किया है; उन्होंने गौण आकृतियों को भी महत्त्व दिया है व अग्रभूमि में कांचित मृत्तिका – पात्र में आइलीस, लिली आदि फूलों व घासपात के गुच्छों को सावधानी से चित्रित किया है। 

उन्होंने मृत ईसा पर विलाप व कुँआरी मरियम चित्रों में जिस भावपूर्णता व ओजस्विता का प्रदर्शन किया है वह फ्लेमिश कला के लिए नयी बात थी। 

उनके मेट्रोपोलिटन संग्रहालय (न्यूयॉर्क) के चित्र ‘आदमी का व्यक्तिचित्र’ में जो एक बड़े चित्र का अंश है, एक व्यक्ति को हाथ जोड़कर प्रार्थना में मग्न मुद्रा में दर्शाया है। 

यह चित्र भावपूर्णता, छाया प्रकाश का प्रभाव व सूक्ष्म क्रमबद्ध छटांकन की दृष्टियों से अप्रतिम है। ‘वान डेर गोएस’ इतिहास में उल्लिखित असाधारण प्रतिभा के धनी ऐसे चित्रकार हैं जिनकी पागलावस्था में मृत्यु हुई।

हान्स मेमलिंक (1435-1494 ) का जन्म माइन्स में हुआ व वे ब्रूग शहर में रहते थे। उनके सेंट जेन अस्पताल के सन्त उर्सुला के समाधि-मन्दिर में बनाये चित्रों का स्वरूप पाण्डुलिपिसज्जा सदृश है किन्तु सम्भवतः ब्रूग में अनेक पर्यटक आते थे इस वजह से ये उनके सबसे प्रसिद्ध चित्र हैं। 

छत पर गोलाकार चित्र हैं जिनमें कुँआरी मरियम का राज्याभिषेक व सन्त उर्सुला के अपने साथियों व देवदूतों के साथ बनाये अनेक चित्र हैं। प्रार्थनालय के आकार के 3 फीट ऊँचे बड़े प्रसाद पात्र की लकड़ी की दीवार पर सन्त उर्सुला के जीवन के प्रसंगों का चित्रण है। 

अपनी असाधारण संयोजन – प्रतिभा से उन्होंने सभी कृतियों को सम्पूर्ण साज-सज्जा के अन्तर्गत एकत्व में बाँध लिया है जिससे स्वर्ण व रत्नों से सजा हुआ समाधि-मन्दिर अपने अलौकिक प्रभाव से दर्शकों को मंत्रमुग्ध करता है। 

1484 से उनको अधिक बड़े वेदिकाचित्र बनाने के अवसर प्राप्त हुए व उन्होंने कुँवारी मरियम व शिशु ईसा के देवदूतों व दाताओं से घिरे चित्र एवं सन्त ख्रिस्टोफर, सन्त मौर, सन्त जाइल्स के विविध प्रसंग चित्र बनाये। 

मेमलिंक धर्मनिष्ठा, शान्ति व दया के कोमलहृदय चित्रकार थे। उनके वास्तविक रूप को यथातथ्य अंकित कर बनाये धार्मिक वेदिकाचित्रों से भी स्पष्ट है कि वे अच्छे व्यक्तिचित्रकार थे। 

उन्होंने ब्रूग के सेंट जेन अस्पताल के मार्टिन वान न्यूवेनहोवेन के व्यक्तिचित्र के अलावा ‘जेन डे कान्डिडा’ (एंटवर्ष) व ‘बार्बारा ब्लान्डेर्वेध’ के व्यक्तिचित्र बनाये हैं।

हालैण्ड में जन्में घेरार्ट (गेरार्ड) डाविड ने (1460-1523) ब्रूग में रह कर कला सर्जन किया। उनकी कला में बौट्स के समान कुछ धार्मिक पवित्रता की भावना है किन्तु शैली में व्यक्तिगत विशेषता की कमी दृष्टिगोचर होती है। 

उनके ब्रूग संग्रहालय के ‘केम्बिसिस का निर्णय व सिसेम्नीस को सजा’ चित्र में पक्षपाती न्यायाधीश की जीवितावस्था में खाल उधेड़ी जाते हुए चित्रित किया है व रोने की सीमा तक पहुँचे छोटे बालक के अलावा सब लोग भावहीन हैं। 

डाविड की सबसे श्रेष्ठ कृति सम्भवतः रूआँ संग्रहालय का चित्र सन्तों के साथ मरियम व बाल ईसा चित्र है। 

पन्द्रहवीं सदी की चित्रकला

गेर्टगेन टाट सिंट यान्स जो 15वीं सदी के उत्तरार्ध के चित्रकार हैं ने लाइडन में रह कर चित्रकारी की। उनकी कोई भी कलाकृति हालैण्ड में उपलब्ध नहीं है किन्तु वे फ्लेमिश शैली के ही कलाकार हैं। 

उनके पृष्ठभूमि में चित्रित भूदृश्य यथातथ्य हैं व मानवाकृतियों व आसपास के वातावरण में पूर्ण सामन्जस्य है। उनकी ये विशेषताएँ चित्र ‘लाजारस को पुनर्जीवित करना’ (लूव्र) व ‘मृत ईसा पर विलाप’ (विएन्ना) में दृष्टिगोचर हैं। किन्तु इन विशेषताओं के बावजूद उनको सत्रहवीं सदी के डच भू-दृश्य चित्रण का अग्रदूत मानना अनुचित होगा। 

कुछ चित्रों में उन्होंने सहजता से जो नवीनता लाने की कोशिश की है व बचकानी लगती है जैसे उन्होंने कुँआरी मरियम (बेऊनिंगेन संग्रह, वायमान्स संग्रहालय, रोटरडम) चित्र में मरियम का चेहरा अंडे जैसा चिकना बनाया है व उसकी आँखें चिड़िया की जैसी लगती हैं।

यूस वान वासेन होवेन जो युस्टुस वान घेंट नाम से भी प्रसिद्ध हैं, के जीवन के विषय में कोई निश्चित जानकारी उपलब्ध नहीं है। 

वे इटली चले गये व वहाँ उर्विनों में रह कर उन्होंने कार्य किया जहाँ वे प्येरो देल्ला फ्रान्चेस्का व मेलोज्जो दा फोर्ली के सम्पर्क में आये। 

उनके अनेक आकृतियों से परिपूर्ण त्रिपट ‘क्रूसारोपण’ से प्रमाणित होता है कि वे प्रतिभाशाली चित्रकार थे। उर्विनो के ड्यूक के महल में बनाये चित्र ‘पवित्र परम प्रसाद’ से स्पष्ट कि इटालियन शैली उनको विशेष प्रभावित नहीं कर पायी।

क्वेन्टिन माट्सिस (1466-1530) जो मेटसिस या मास्सिस नाम से भी जाने जाते हैं, की कला में ऐसे प्रारिम्भक तत्त्व प्रकट हैं जिन्होंने सोलहवीं सदी की कला में स्पष्ट रूप धारण किया। 

दैनिक प्रसंगों की वास्तविकता का समावेश करने की उनकी प्रवृत्ति सभी चित्रों में स्पष्ट दिखलायी देती है जिनमें एंटवर्प संग्रहालय के ‘सन्त मेरी मॅग्दालिन’ व ‘ईसा के दफन’ जैसे धार्मिक चित्र भी हैं। फिर भी, उनके चित्र अक्सर आडम्बरपूर्ण हुए हँ विशेषतया प्राडो संग्रहालय के ‘कांटे का मुकुट पहने हुए ईसा’। 

उनके चित्रों में वान आइक, वाइडन व बौट्स के समान वास्तविकता का काल्पनिक रूपान्तरण नहीं है – वह सीधी वास्तविकता है। 

वास्तविकता के इस मोह के कारण ही उनके व्यक्तिचित्र उनका सफलतम कलाकार्य है जिसका अत्युत्कृष्ट उदाहरण है शिकागो आर्ट इन्स्टीट्यूट का चित्र ‘कार्नेशन के फूल के साथ आदमी’। 

15वीं सदी के अन्त के करीब फ्लैंडर्स में एक तीव्र अनोखी प्रवृत्ति के व मौलिक प्रतिभा के कलाकार प्रकाश में आये। उनका नाम था हिरोनिमस येरोम वान एकेन व वे उनके जन्म स्थान के नाम पर बॉस नाम से ख्यातनाम हैं। 

उनका जन्म सम्भवतः 1450 के आसपास हुआ और उनकी मृत्यु 1516 में हुई। उनके बारे में बहुत ही कम जानकारी उपलब्ध है। वे अर्धपुरोहिती, अर्धनाटकीय मंडली में थे जो धार्मिक रहस्यपूर्ण नाटकों का मंचन करती थी। 

इस बात की भी जानकारी है कि स्पेन के राजा फिलिप द्वितीय ने उनके अनेक चित्र खरीदे थे। दीर्घकाल तक बॉस को मनोरंजक नटखटी मात्र माना गया था और बीसवीं सदी में ही उनकी कला की अनोखी प्रतीकात्मकता का दार्शनिक या मनोविश्लेषणात्मक अर्थ निकालने के प्रयत्न हुए। 

लगता है जर्मन विशेषज्ञ विल्हेल्म फ्रान्गेर उनके चित्रों का अर्थ निकालने में वस्तुतः सफल हुए हैं। उनके अनुसार बॉस के अनेक चित्र परम्परानिष्ठ व प्रामाणिक हैं किन्तु अन्य चित्र विधर्मी सम्प्रदाय ‘मुक्त आत्मा के भाई-बहन’ (Brothers and Sisters of the Free Spirit) के लिये बनाये गए हैं। 

इस सम्प्रदाय के सदस्य स्वयं को देहधारी ‘पवित्र आत्मा’ (Holy Ghost) मानते थे. अत: सब तरह के दैहिक भोगविलास में लिप्त होने पर भी स्वयं को पूर्णतः पवित्र मानते थे। 

उनके द्वारा चित्रित अगणित प्रसंग इस कारण अनूठे हैं कि उन्होंने अपने काल्पनिक प्राणियों का सर्जन न केवल प्रत्यक्ष सृष्टि में दृष्टिगोचर जीवों व वनस्पतियों के आकारों के आधार पर किया है बल्कि उसके लिये रसोई में दृश्य व उद्योगनिर्मित वस्तुओं के आकारों से भी सहायता ली है। 

उनके विरूप प्राणी विकृत आकार के चम्मच, कटोरे, हथौड़े आदि जैसे लगते हैं। उनकी कला की रोचक प्रतीकात्मकता के सामने उनकी कुशल चित्रकार के रूप में श्रेष्ठता को भुलाया नहीं जा सकता। उनके काल्पनिक चित्रण में भी उनका वास्तविकता का सूक्ष्म निरीक्षण प्रशंसनीय है। 

उनका पृष्ठभूमि के भू-दृश्यों का यथातथ्य चित्रण आश्चर्यजनक है और वे ऐसे सर्वप्रथम चित्रकार हैं जिन्होंने विशाल चित्रों के क्षितिजों को काफी ऊपर बनाया ताकि अनेक आकृतियों व उनकी विविध गतिविधियों का चित्र की अग्रभूमि में अन्तर्भाव किया जा सके। 

उनकी विचक्षण स्वैर कल्पना के भुलावे में हम उनकी अंकन पद्धति की निपुणता व आकर्षक रंगयोजना की उपेक्षा नहीं कर सकते। 

लघुचित्रकारों की इन विशेषताओं को प्रदर्शित करने के साथ उन्होंने चित्रण कार्य में जो निर्भयता से नवीन प्रयोग किये हैं उससे 16वीं सदी की महान डच कला का पूर्वाभास होता है। 

उनके चित्र ‘मजूसियों की आराधना’ (प्राडो माड्रिड) जो उचित रूप से उनकी श्रेष्ठ कलाकृति माना जाता है, में उन्होंने भावपूर्ण प्रसंग की प्रभावी अभिव्यक्ति भू-दृश्य चित्रण व यथोचित रंगयोजना में अपना प्रभुत्व प्रदर्शित किया है। 

गेंत संग्रहालय का चित्र ‘क्रूस ले जाते हुए ईसा’ उनकी कला की ओजस्विता का सबसे अच्छा प्रमाण है। ये चित्र उनकी कला के दो ध्रुवों, अन्तःप्रेरणा व प्रवीणता, को स्पष्ट रूप से प्रकट करते हैं।

हिरोनीमस बॉस, न केवल उनके द्वारा निर्मित श्रेष्ठ कृतियों के लिये बल्कि उनके अन्य कलाकारों पर हुए प्रभाव के कारण भी महत्त्वपूर्ण हैं।

पीटर ब्यूगेल ने ज्येष्ठ बॉस की कला के यथार्थ दर्शन का अनुसरण किया किन्तु यथार्थ के कुरूप पक्ष को टाला; उसी तरह पाटिनिर ने विस्तृत भूदृश्यों को संयाजित करने की बॉस की पद्धति को अपनाया। 

इसके प्रमाण के रूप में ब्यूगेल के चित्र ‘दानार्थ मेला’ (Kermis) (नैशनल गैलरी, लंदन) ‘निरपराधों का संहार’ (विएन्ना), ‘क्रूस ले जाते हुए ईसा’ (विएन्ना) एवं पाटिनिर के ‘स्वर्ग व नरक’ (प्राडो) ‘मिस्र में पलायन’ (प्राडो) देखे जा सकते हैं।

स्पेन व पोर्तुगाल की कला

पन्द्रहवीं सदी की स्पेनिश कला इटालियन व फ्लेमिश कला से प्रभावित थी जिनमें से फ्लेमिश प्रभाव अधिक प्रबल था। लुइस बोरास्सा मृत्यु (1424 के पश्चात्) सिएनीज व अन्तरराष्ट्रीय गोथिक शैली से मिश्रित शैली में तारासा, वेनिस व सेवा के सांता मराया गिरजाघरों में वेदिका चित्र बनाये। 

केटलोनिया के बर्नार्डो मार्टोरेल (मृत्यु 1445 के ने पश्चात्) विशेष प्रतिभा सम्पन्न नहीं होते हुए उनकी कला पिसानेलो का स्मरण दिलाती पन्द्रहवीं सदी को चित्रकला है। 1428 में वान आइक बर्गडी के डयूक के राजदूत के साथ स्पेन गये थे। 

परिणामस्वरूप, तीन साल बाद अरागोन के राजा ने वालेन्शिया के चित्रकार लुई डालमौ को अध्ययन के लिये ब्रूग भेजा। 

सम्भवतः इस अध्ययन के फलस्वरूप उनका बार्सिलोना का वेदिकाचित्र ‘कुँआरी मरियम की सामूहिक प्रार्थना’ पूर्णतया फ्लेमिश शैली का है। 

फिर भी, केटालोनिया के चित्रकार हैम ह्यूग्वेट (मृत्यु 1492) की कला स्थानीय परम्परा के अनुसार है। उन्होंने तैलचित्रण का परित्याग कर फिर से टेम्पराचित्रण व तीव्र प्रकाश का स्वर्ण में अंकन शुरू किया। 

उनकी मानवाकृतियाँ ओजस्वी हैं जिसके ‘सन्त जार्ज’ (बार्सिलोना संग्रहालय) यह चित्र व सर्राया व तारासा गिरजाघरों के वेदिकाचित्र उदाहरण हैं। 

फ्लेमिश कला का प्रभाव बार्टोलोमे डे कार्डेनास (या बार्टोलोमे बर्मेहो) (मृत्यु 1498 के बाद) व फर्नांडो गालेगोस (मृत्यु 1507 के बाद) पर भी दृष्टिगोचर है। इनमें से वार्टोलोमे बर्महो समकालीन स्पेनिश कला में सबसे प्रभावशाली थे। 

उनकी सबसे महत्त्वपूर्ण कलाकृति है बार्सेलोना महामन्दिर का चित्र ‘मेरी का पुत्रशोक’ (Luis Despla Pieta)। सामर्थ्य व शोक के असहायता दर्शन से यह विशाल चित्र समकालीन महान् इटालियन कलाकृतियों के समतुल्य बन गया है। 

नारंगी सूर्यास्त की किरणों से प्रकाशित काल्पनिक रूप के शहर व तूफानी बादलों से भरे आकाश से युक्त विस्तृत भूदृश्य हिरोनीमस बॉस की कला का स्मरण दिलाता है।

फर्नांडो गालेगोस के चित्रों का अभिव्यंजनावादी स्वरूप व उनकी वस्त्रों की तहों को कोणात्मक बनाने की पद्धति के कारण उनकी कला फ्लेमिश से भी जर्मन कला के अधिक सुदश है। 

यह अन्तिम रूप से सिद्ध हुआ है कि बार्सेलोना संग्रहालय का प्रसिद्ध चित्र ‘सन्त कुकुफा का शिरच्छेदन’ हान्स (या हाइनरिक) ब्यून द्वारा बनाया गया है जिनका नाम स्पेनिश लोगों ने परिवर्तित कर एन्ये ब्यू रखा था। 

यह चित्र पहले सान क्यूगाट डे वालेस मठ में था व इस चित्र की सबसे प्रमुख विशेषता है इसमें चित्रित दो दर्शकों की अविस्मरणीय मुद्राएँ।

वान आइक के पोर्तुगाल के निवास का वहाँ की कला पर काफी प्रभाव पड़ा होगा किन्तु कलाकार नुनो गोन्साल्वेज (कार्यकाल 1450-1480) ने स्वयं को वान आइक के नम्र अनुयायित्व तक सीमित नहीं रखा। 

वान आइक ने उनको निसर्ग को यतातथ्य चित्रित करने को प्रेरित किया होगा किन्तु गोन्साल्वेज ने फ्लेमिश सूक्ष्म अंकनपद्धति को कभी नहीं स्वीकारा। 

उनके लिस्बन संग्रहालय के सेंट विसेंट वेदिकाचित्रों में भिन्न वर्गों के लोग- पादरी, कुलीन व्यक्ति, दण्डाधिकारी, नाविक, मछुआरे आदि-नौशास्त्री हेन्री के आसपास एकत्र होकर सन्त को घुटने टेक कर अभिवादन कर रहे हैं और अंकनपद्धति दृढ़ता के साथ विस्तृत व संतुलित है एवं पारदर्शी परतों की जगह मोटे रंगों का प्रयोग है। 

यह चित्र गोन्साल्वेज का नाम सदी के महान चित्रकारों की सूची में अंकित करने के लिये पर्याप्त है। उस काल का कोई भी पोर्तुगीज चित्रकार गोन्साल्वेज के स्तर तक नहीं पहुँच सका। 

लिस्बन संग्रहालय का आकर्षक चित्र ‘काँटे का मुकुट’ किसने बनाया यह अज्ञात है। इस चित्र में ईसा की गर्दन रस्सी से लपेटी हुई है व उनका आधा चेहरा वस्त्र से ढंका हुआ है। 

यह भी माना जाता है कि चित्र सोलहवीं सदी में की गयी नकल है। क्रिस्टोवाओं डे फिग्वेरेडो एक अन्य कलाकार हैं जिनका कार्यकाल 1515-1540 होते हुए जिनका यहाँ उल्लेख आवश्यक है। 

उनके ‘ईसा का दफन संस्कार’ चित्र में अंकित दो दानकर्ताओं की आकृतियाँ गोन्साल्वेज की परम्परा की हैं किन्तु उनका विस्तार व आत्मविश्वासपूर्ण अंकन पुनर्जागरण की नवीन प्रवृत्ति को प्रकट करता है।

जर्मन कला का द्वितीय कालखण्ड

वाणिज्य व औद्योगिक विकास से समृद्ध हुए 15वीं सदी के जर्मनी में शहरों का विकास हो कर सम्पन्न हुए मध्यवर्गीयों में कलाभिरुचि बढ़ी आर्थिक लेनदेन में व्यस्त कालोन, हेम्बुर्ग व नुरेम्बर्ग कला के महत्त्वपूर्ण केन्द्र बने। 

गिरजाघरों की साज-सज्जा में भित्तिचित्रों की जगह विशाल वेदिकाचित्रों को पसन्द किया जाने लगा जिनमें चित्रों के साथ चमकीले रंगों की स्वर्णाकित मूर्तियों को भी समन्वित कर बिठाया जा सकता था। 

इस काल की जर्मन कला पर जो कुछ भी प्रभाव पड़ा वह मुख्यतः फ्लेमिश था व कभी बगडी का या इटालियन । पाश्चात्यकालीन स्वच्छंदता के प्रेमी लेखकों ने कलोन शैली की खूब प्रशंसा की है किन्तु उसमें ऐसी प्रवृत्ति नजर नहीं आती जो तीव्र अभिव्यंजनावाद का प्रेरक हो सकती है जो जर्मन कला का प्रमुख लक्षण है। 

इसके विपरीत कलोन शैली काफी परिष्कृत व कोमल है। इस शैली के प्रमुख कलाकार हैं श्टेफान लाक्नेर (मृ. 1451) जिनकी श्रेष्ठ कृतियाँ हैं ‘मंजूसियों की अराधना’, ‘महामन्दिर’ व ‘लतामंडप में कुँवारी मरियम’। 

इन चित्रों के समान उनके डार्मश्टाट संग्रहालय के चित्र ‘मन्दिर में प्रस्तुतीकरण’ में सौम्य रहस्यवाद व नैसर्गिक रूप-सादृश्य का समन्वित दर्शन है।

इस कालखण्ड में फ्लेमिश कलाकार वान डेर वाइडन के चित्र ‘मंजूसियों की ‘वेदिका’ व डीरिक बौट्स का एक वेदिकाचित्र कलोन में थे व उनसे कई स्थानीय अज्ञात कलाकार प्रभावित हुए थे। 

उनमें से ‘कुँआरी मरियम के जीवन के श्रेष्ठ चित्रकार’ (Master of the Life of the Virgin) नाम से ज्ञात चित्रकार के ‘ईसा का जन्म’ चित्र (पिनाकोटेक, म्युनिक) में समकालीन जीवन का सहृदयता से परिचयात्मक कोमल चित्रण है। 

जर्मन शहरों में से नुरेम्बर्ग में कला सबसे अधिक समृद्ध हुई। वहाँ के कलाकार मास्टर फ्रान्के के बारे में बहुत कम जानकारी उपलब्ध है। वे 15वीं सदी के प्रथम तीस या चालीस वर्ष कार्यरत रहे थे। 

उनकी कला की तुलना पेरिस की लघुचित्रण शैली से की जाती है। किन्तु उन्होंने कभी ‘दुःखी आदमी’ (लाइत्सिक संग्रहालय) जैसे नाटकीय अभिव्यक्ति के चित्र भी बनाये हैं।

15वीं सदी के उत्तरार्ध में नुरेम्बर्ग में प्रचुर कलासर्जन हुआ। इस काल के प्रमुख कलाकार थे हान्स प्लेडेनवुर्फ व मिशा एल वोल्गेमुट (1434-1519)। प्लेडेनवुर्फ के ‘काउन्ट मिशाएल लोवेनश्टाइन का व्यक्तिचित्र’ (नुरेम्बर्ग संग्रहालय) व ‘क्रूसारोपण’ (पिनाकोटेक) चित्रों पर फ्लेमिश कलाकार वान डेर वाइडन व बौट्स का प्रभाव है। 

वोल्गेमुट की कला के साथ भी यही बात है किन्तु यह प्रभाव शीघ्र ही उनके अंकनपद्धति की कोणात्मकता व कठोर रंगयोजना के कारण समाप्त हुआ।

वेस्ट फलिया के कोनराड फान जोएश्ट की कला के सरल सपाट यथार्थवाद व संयमित रमणीयता से प्रतीत होता है कि उन्होंने जर्मनी से बाहर जा कर बगडी में कला पन्द्रहवीं सदी की चित्रकला का अध्ययन किया होगा। 

बगडी शैली का प्रभाव स्वाबिया के लुकास मोसेर की कला पर भी प्रतीत होता है जिसका उदाहरण उनका टिफेनब्रोन का वेदिकाचित्र है जिसमें सन्त मेरी मॅग्दालिन के जीवन के प्रसंगों का चित्रण है। चित्र में स्वाभाविक सौन्दर्य होते हुए परिप्रेक्ष्य अनिश्चित है व कुछ बेतुकी बातें हैं। 

चित्र पर हस्ताक्षर व दिनांक अंकित करने के बाद चित्रकार ने लिखा है- “बोलो, कलाओ, बोलो और शिकायत करो क्योंकि आजकल लोग आपसे तंग आये हैं”। उनके इस कथन के भिन्न अर्थ निकाले गये हैं। मोसेर 15वीं सदी के पूर्वार्ध के कलाकार हैं। उनके एक वेदिकाचित्र में उत्कृष्ट समुद्री दृश्य चित्रित है जो बहुधा कान्स्टन्स झील से प्रेरित होगा। 

ऐसा ही एक अधिक सूक्ष्मता से चित्रित झील का दृश्य कोनराड वित्स के सर्वोत्कृष्ट चित्र में है। कोनराड वित्स स्वाबिया के सर्वश्रेष्ठ चित्रकार (1390-1447) थे। 

उनका अधिकतर जीवनकाल स्वित्जरलैंड में बीता। समीक्षकों के अनुसार उनकी कला पर फ्लेमिश शैली का प्रभाव है किन्तु जो विशेषता उनकी कला का भिन्नत्व दर्शाती है व उसे महत्त्व प्रदान करती है, वह है आकारों का सरलीकरण व मानवाकृतियों को काष्ठमूर्ति के समान ठोस अंकित करने की कुशलता। 

इसी वजह से स्वाबिया व फ्लोरेन्स की कलाओं की भिन्नता के बावजूद कोनराड वित्स की तुलना मासाच्चो से की जाती है। स्ट्रासबर्ग संग्रहालय के फलकचित्र में उन्होंने न केवल गिरजाघर के अंतर्भागों व गलियारों को परिप्रेक्ष्य के साथ यथातथ्य चित्रित किया है बल्कि सन्त मॅग्दालिन व सन्त कैथरीन के आसपास के रिक्त स्थान में गहराई का आभास सफलतापूर्वक अंकित किया है। 

उनके चित्र ‘मछलियों का आश्चर्यजनक शिकार’ (जेनिवा) में उन्होंने झील के किनारे के दृश्य को सेवाय की पहाड़ियों की असाधारण वास्तविकता के साथ चित्रित किया है, किन्तु मानवाकृतियाँ अनुपातहीन हैं एवं दूरवर्ती आल्प्स व मोंट ब्लांक का दृश्य वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं रखता। (चित्र 47 )

आल्सात्से के कलाकार कास्पर ईसेनमन (कार्यकाल 1436-1447) कोनराड वित्स व शोनगौर के बीच की श्रेणी में आते हैं। उनकी कला में वित्स के समान व्याप्ति व अपरिष्कृत सामर्थ्य नहीं है किन्तु उनके चित्र ‘ईसा का दफन’ (शोनगौर संग्रहालय कोल्मार) प्रशान्ति व त्याग की भावनाओं से परिपूर्ण व प्रशंसनीय है। 

कोल्मार में जन्मे मार्टिन शोनगौर (1445-1491) ने फ्लैंडर्स की यात्रा की होगी ऐसा उनकी कला पर दृष्टिगोचर फ्लेमिश प्रभाव से प्रतीत होता है। उन्होंने चित्रण की अपेक्षा उत्कीर्णन का कार्य अधिक किया।

कोल्मार के सन्त स्टीफन गिरजाघर का ‘गुलाब वाटिका में कुँआरी मरियम’ यह एक ही चित्र निश्चित रूप से उनका माना जा सकता है। इसमें उनके छापचित्रों की विशेषताएँ, ऐंठनदार आकृति सौन्दर्य व वस्त्रों की तहों का कोणात्मक अंकन मौजूद है।

वास्तविक नाम था माटिस गोटार्ट नायटार्ट 1450 व 1460 के बीच जन्में ग्यूनेवाल्ट की जर्मनी के उस काल के अतिविशिष्ट कलाकार थे माटिआस ग्यूनेवाल्ट जिनका चित्रों के अतिरिक्त उनकी सबसे प्रमुख कलानिर्मिति है ईसेनहाइम वेदिका के चित्र जो अब मृत्यु 1528 में हुई। 

पिनाकोटेक संग्रहालय के ‘सन्त एरास्मस’ व ‘सन्त मोरिस’ जैसे अनेक कोल्मार संग्रहालय में हैं। केवल इन्हीं चित्रों के आधार पर उनकी प्रथम श्रेणी के कलाकारों में गणना की जा सकती है। 

इनमें दो बड़े फलक, छ: छोटे फलक व वेदीमंच के चित्र हैं। इन पर ईसा व मरियम के जीवन के प्रसंगों के व सन्तों के, विशेषतया सन्त एंटनी के चित्र हैं। 

ग्यूनेवाल्ट ने अपने चित्रों में जर्मन अभिव्यंजनावादी प्रवृत्ति को आत्यंतिक रूप में प्रकट किया है। लगता है जैसे उन्होंने दर्शकों के मानसिक सन्तुलन को बिगाड़ने का निश्चय कर चित्रों में घृणास्पद या भयानक तत्त्वों का अन्तर्भाव किया है। 

क्रूस पर लटक रहे ईस के घावों से भरे शरीर, संन्यासी पर हमला कर रहे शैतानों की क्रूर मुद्राएँ व क्रियाएँ, काँटेदार हानिकर वनस्पतियाँ आदि से निर्मित भयानकता का अनुभव अविस्मरणीय है। इसके अलावा ग्यूनेवाल्ट ने यथार्थता की अवहेलना कर तीव्र रंगों का जो निरंकुश प्रयोग किया है वह भी अपना स्वतंत्र सीधा प्रभाव दर्शकों के मन पर डालता है।

गाब्रिल मास्किशेर के चित्र ‘क्रूसारोपण’ (जर्मनिक संग्रहालय, रेम्बर्ग) में जर्मन अभिव्यंजनवादी प्रवृत्ति का तीव्र दर्शन है। इस चित्र में मानवाकृतियाँ इतनी बदसूरत बनाई हैं कि वे व्यंग्य चित्र जैसी लगती हैं। इसी तरह की प्रवृत्ति उल्म के कलाकार हान्स मुल्ट्शेर (1400-1467) की कला में दृश्य है। 

उनके बर्लिन संग्रहालय के ‘कुँआरी मरियम का जीवन व दुःख भोग’ विषय को लेकर बनाये 8 भावोत्कट फलक चित्रों में उन्होंने ज्यू लोगों के व जल्लादों के चेहरों को अत्यधिक विकराल व क्रोधित दिखाया है। उनके चित्र ‘ईसा का जन्म’ में गड़रियों के चेहरों पर आनन्द की जगह कहीं उदासी तो कहीं विरोध के भाव दिखायी देते हैं।

आस्ट्रिया में रुएलांट फुयोफ ज्येष्ठ कला पर फ्लेमिश व इटालियन कला का प्रभाव है। ये साल्जबर्ग व पासो में 1478 व 1507 के मध्य कार्यरत थे। 

उनके पुत्र रुएलांट फुयोफ कनिष्ठ (1507-1545) ने पूर्ववर्ती पीढ़ी का अनुसरण कर स्वाभाविक पद्धति से आकर्षक लघुफलक चित्रित किये। 

टायरोल के कलाकार मिशाएल पाशेर (1435-1498) की कला 115 टालियन प्रभाव विशेषतया मान्तेन्या का स्पष्ट है जिससे उनको कला अन्य जर्मन कलाकारों से पृथक् प्रतीत होती है। 

उनके सन्त वोल्फगांग वेदिका कार्य में उन्होंने मध्य म कार्य किया है व दोनों पक्षों एवं मंच को चित्रों से सजाया है और कहीं भी जर्मन अभिव्यंजनावाद की कुरूपता नहीं है। 

उनके चित्र ‘लाजारस को पुनर्जीवित करना’ में उन्होंने परिप्रेक्ष्य का कुशलता से प्रयोग कर चित्र को संयोजनपूर्ण बनाया है व उनके चित्र ‘सुन्नत’ की प्रशान्ति किसी अन्य जर्मन चित्रकार की कृति में दृष्टिगोचर नहीं है। 

अभिव्यंजनावाद व चारुता को टालकर उन्होंने इटालियन कला के जिन गुणों को ग्रहण किया वे थे व्यापक सरल आकारों का महत्त्व, चमक, उदात्तता व सौन्दर्य।

आन्तरिक संघर्ष के कारण स्वित्जरलैंड में 15वीं सदी में कोई विशेष उल्लेखनीय कलाकार नहीं हुए। फिर भी वहाँ कुछ इने-गिने कलाकार कार्यरत थे जिनमें एक कलाकार समूह था जो अपनी कृतियों को कार्नेशल फूल की आकृति से चिह्नित करता था। उनमें दो कलाकार कुछ ख्याति प्राप्त हैं। 

एक हैं जूनिक के कार्नेशन उस्ताद व दूसरे हैं बर्ग के कार्नेशन – उस्ताद । उनके चित्र समकालीन जर्मन कला से मिलते-जुलते हैं व केवल दस्तावेजी महत्त्व के हैं। 

पन्द्रहवीं सदी की चित्रकला (आरम्भिक पुनर्जागरण

पन्द्रहवीं सदी की फ्रेन्च कला

फ्रांस में 15वीं सदी के आरम्भ से अस्थिरता का दौर शुरू हुआ। पागल छठे शार्ल राजा की पदच्युति से पुश्तैनी झगड़ों का जन्म हुआ। अंग्रेजों के आक्रमण से अराजकता उत्पन्न हुई व सब तरफ दारिद्र, अकाल व महामारी फैलने से जनता त्रस्त हुई। 

जोन आफ आर्क के नेतृत्व ने 30 साल के भीतर परिस्थिति को कुछ संवारा। फिर शार्ल सप्तम ने अंग्रेजों के आक्रमण को क्रमशः हटाया। 1495 में शार्ल अष्टम द्वारा इटली पर किये आक्रमण के परिणामस्वरूप इटालियन कला का फ्रेन्च कला पर विशेष प्रभाव पड़ने लगा। 

पन्द्रहवीं सदी में फ्रांस में भित्तिचित्रण नगण्य हुआ जिसके बुर्ज के ओतेल दे जाक कोर के प्रार्थनालय के मेहराबी छतों पर 1443 व 1453 के मध्य बनाये देवदूतों के चित्र उदाहरण हैं। इससे भिन्न स्थिति फलक चित्रण की थी जो फ्रांस के भिन्न प्रदेशों में विपुलता से हुआ। 

सदी के मध्य में अज्ञात कलाकार द्वारा क्षात्रधर्म की रोमांसकथा ‘ल कोर दामुर एत्रि’ का किया पाण्डुलिपि सज्जा कार्य विशेष उल्लेखनीय है जो अब राष्ट्रीय पुस्तकालय, विएन्ना में है। उन्होंने समकालीन पाण्डुलिपि सज्जाकारों के समान घुमावदार आकारों का प्रयोग नहीं किया बल्कि नैसर्गिक आकारों का यथातथ्य प्रयोग किया है जिससे लगता है कि वे कलाकार फुके के सम्पर्क में आये होंगे। 

उनके दो पाण्डुलिपि के चित्र – एक कमरे में कृत्रिम प्रकाश में बैठे लोगों का व दूसरा सूर्योदय का उस कालखण्ड की कला में अपवादात्मक हैं।

  • ज्यां फुके 

ज्यां फुके (1420-1480) लघुचित्रकार व चित्रकार भी थे। वे फ्लेमिश कला से परिचित थे व उन्होंने इटली की यात्रा में फ्लोरेन्स व उम्ब्रिया के कलाकारों की कृतियाँ देखी थीं। साहित्यिक रचनाओं ‘ओर देतिएन शेवालिय’ व ‘आंतिक्विते ज्युदेक्वे’ के लघुचित्रों की कोमल व सुसंगतिपूर्ण योजना से उन्होंने लघुचित्रकार के रूप में अपनी असाधारण योग्यता को सिद्ध किया और उसके पश्चात् काष्ठ फलक पर चित्रण कर उन्होंने दिखा दिया कि वे इस विधा में भी उतने ही श्रेष्ठ हैं। 

उनके चित्र ‘कुंआरी मरियम व शिशु ईसा ‘ (राजकीय संग्रहालय, अँटवर्प) में एवं व्यक्तिचित्र ‘एतिएन शेवालिय’ व ‘ज्यूवेनाल दे युस’ में उन्होंने मानव शरीर को विस्तृत सरल आकारों में प्रभावपूर्ण अंकित करने का कौशल प्रकट किया है जो भविष्य के जार्ज द ला तूर, अँग्र व कोरो की कला में दृश्य है। 

नुआन्स का प्रसिद्ध चित्र ‘मेरी का पुत्रशोक’ जो संयमित भावभिव्यक्ति की विशेषता के कारण हृदयस्पर्शी है फुके ने ही बनाया होगा क्योंकि उस कालखण्ड में और कोई कलाकार इतना प्रतिभा सम्पन्न नहीं था जो भावनाओं का इतना सूक्ष्म प्रभाव चित्रित कर सके।

अपने समय के ख्याति प्राप्त कलाकार होते हुए बाद की सदियों में उपेक्षित होने से उनके जीवन व कार्य सम्बन्धी विशेष जानकारी की रक्षा करने के प्रयास उन्नीसवीं सदी तक नहीं किये गये। अब विद्वानों के प्रयासों से उनकी श्रेष्ठता पुनः स्थापित हुई है। 

19वीं सदी के आरम्भ में जार्ज ब्रेंतानो ने साहित्यिक रचना ‘ओर देतिएन शेवालिय’ के अन्तर्गत बनाये 40 लघुचित्र खोज निकाले हैं जो अब शान्तिली में हैं। उसके बाद उपलब्ध हुए हैं ‘एतियन शेवालिय प्रेसान्ते पार सेन्त एतिएन’ व ‘आन्तिक्विते ज्यूदेक्वे’ के लघुचित्र जो अब बिब्लि औतेक नाशनाल में हैं। 

उसके बाद उनके जीवन सम्बन्धी जानकारी प्राप्त कराने,  की कोशिश हुई जिससे लगता है कि सम्भवतः उनका जन्म तूर में हुआ, उन्होंने पेरिस में कला का प्रशिक्षण किसी के कार्यकक्ष में प्राप्त किया, तत्पश्चात् वे इटली में 3-4 साल तक रहे और वहाँ से लौटने पर राजचित्रकार नियुक्त हुए उस नियुक्ति के बाद उनको न केवल लघुचित्र व फलक चित्र बनाने पड़ते थे बल्कि उन पर स्मारकों के निर्माण व समारोहों के आयोजन का उत्तरदायित्व भी था। उनकी मृत्यु सम्भवतः 1481 से पहले हुई। 

इसी काल में प्रोवान्स में समान विशेषताओं व श्रेष्ठता की कलानिर्मिति में व्यस्त एक कलाकार समूह था । इस समूह की प्रोवान्स शैली की सबसे श्रेष्ठ व इतिहास में विश्वविख्यात कृति है ‘मेरी का पुत्रशोक (Pieta)’ जो आविन्यों की शैली का होने से ‘आविन्यों पिएता’ नाम से ज्ञात है व अब सुन संग्रहालय में है। 

इसके कलाकार का नाम ज्ञात नहीं है व यह सम्भवतः 1460 के बाद चित्रित की गयी है। 

नुआन्स के ‘मेरी के पुत्रशोक’ के समान इसमें तीव्र अंगसंचालन नहीं है किन्तु भावाभिव्यक्ति संकेन्द्रित, तीव्र व सारदर्शक है इस श्रेष्ठ कृति द्वारा आडम्बरपूर्णता के प्रति अविश्वास प्रकट किया है जो अकसर फ्रेन्च कला की एक विशेषता रही है जो उसे जर्मन कला से पृथक् पहचान दिलाती है। 

प्रोवान्स के किसी अज्ञात कलाकार का चित्र ‘रेताब्ल द बुल्बों’ (बुल्बो वेदिकाचित्र) जो लुब्र में है, भी इसी प्रवृत्ति का किन्तु कुछ कम तीव्र प्रभाव का है। 

इस चित्र में कोणात्मक चेहरे के दाता व धर्माध्यक्ष के वस्त्र पहने हुए सन्त एग्रिकोला की उपस्थिति में ईसा कब्र से बाहर आ रहे हैं। 

पृष्ठभूमि में परमपिता ईश्वर का शीर्ष है व त्रयी (ईश्वर, पुत्र ईसा व पवित्र आत्मा) में से तीसरी पवित्र आत्मा फाखता के रूप में ऊपर उड़ रही है। 

प्रोवान्स शैली के चित्रकारों में से एक का नाम था अँग्वेरां क्वार्तो या लाओं के शारोंतों जो एक्स, आर्ल व आविन्यों में 1444 व 1466 के बीच कार्यरत थे। 

उनका चित्र ‘कुँआरी मेरी का राज्याभिषेक’ जो विलँनोव ले आविन्यो के आश्रम में है, एक श्रेष्ठ दर्जे की आलंकारिकता से प्रचुर कृति है व उसमें सौम्य प्रकाश का प्रभाव कुशलता से अंकित किया है। 

चित्र के नीचे कल्पना व यथार्थ से सम्मिश्रित भूदृश्य है जो कोरो के भूदृश्य का स्मरण दिलाता है। अँग्वेरां क्वार्तो ने ‘दया की मूर्ति कुँआरी मरियम व शिशु ईसा यह कोमल भावनाओं से परिपूर्ण चित्र बनाया है जो शान्तिली के म्युसे कोन्दे में है।

एक्सां प्रोवान्स के से सोवो महामन्दिर का त्रिपट ‘त्रिप्तिक द्यु ब्वीसों आर्दा (Burning Bush)’ नैसर्गिक रूप का व कथनात्मक शैली का है व उसमें उत्पत्ति ग्रंथ (Genesis) के एक प्रसंग का चित्र है जो ‘दूत सन्देश’ की पूर्व कल्पना माना गया है। 

उसके ऊपर वृत्ताकार वाटिका में मरियम का चित्र है, सन्तों व दाताओं को दो पक्षों पर चित्रित किया है व लगता है कि जैसे चित्रकार ने प्रत्यक्ष देखे हुए दृश्य को यथातथ्य तथा उत्साह व आनन्द के साथ चित्रित किया है। 

और एक अज्ञात कलाकार ‘सन्त सेबास्तिओं के उस्ताद’ नाम से जाने जाते हैं क्योंकि माना जाता है कि फिलाडेल्फिया के जानसन संग्रह के सन्त सेवास्तिओं के जीवन के प्रसंगों पर बनाये फलकचित्र उन्हीं के द्वारा बनाये हैं। सम्भवतः वे एनो के पन्द्रहवीं सदी की चित्रकला (आरम्भिक पुनर्जागरण )/99

मूलनिवासी जोसे लिफरिक्स होंगे जिन्होंने आविन्यों व मार्साय में रह कर चित्रण किया। मार्साय में उनका सन्त सेबास्तिओं के जीवन प्रसंग पर 1497 में बनाया वेदिकाचित्र है। बेल्जियम के मूलनिवासी होते हुए उनकी कला पूर्णतया प्रोवान्स शैली की है।

नीस के लुई ब्रेआ को भी प्रोवान्स शैली के कलाकार मानते हैं। उनका 1475 में बनाया चित्र ‘सन्त कैथरिन व सन्त मार्टिन के बीच कुँआरी मरियम व शिशु ईसा’ जो नीस के निकट सिमित्ज के गिरजाघर में है बहुत ही सुन्दर व हृदयस्पर्शी है। 

उनकी कला पर निकटवर्ती इटालियन कला का विशेष प्रभाव नहीं है यद्यपि उनके उत्तरकालीन चित्रों पर वह प्रभाव प्रबल हुआ था। 

15वीं सदी के अन्तिम काल में बुध के डयूक व वाल्वा की राजकुमारी ग्यारहवें लुई की पुत्री आन द बोजो के प्रोत्साहन से मुल नगर कलाकेन्द्र बना। 1480 व 1500 के मध्य वहाँ एक अज्ञात कलाकार कार्यरत थे जो ‘मुल के उस्ताद’ नाम से जाने जाते थे। 

उनका मुल के महामन्दिर का त्रिपट दर्शाता है कि वे फ्लेमिश कला से, विशेषतया वान डेर वाइडन की कला से परिचित थे। 

मध्य फलक पर देवदूतों से घिरी हुई महिमामंडित कुँआरी मरियम को चित्रित किया है और दोनों तरफ के फलकों पर बुबन के ड्यूक व डचेस को प्रस्तुत करते हुए उनके संरक्षक सन्तों सेन्ट पीटर व सेन्ट एन को चित्रित किया है। 

यह त्रिपट एवं ओत्युं संग्रहालय का ‘ईसा का जन्म’ व लुन का ‘दाता के साथ मेरी मॅग्दालिन’ दर्शाते हैं कि चित्रकार उत्कृष्ट यथार्थवादी व्यक्ति चित्रकार थे व बच्चों से बहुत प्यार करते थे। 

मरियम के प्रभामंडल के विविध रंग देवदूतों के चेहरों पर उनके स्थान के अनुसार चमक रहे हैं। देवदूतों को छोटी बच्चियों के रूप में यथातथ्य चित्रित किया है फिर भी वे देवदूत जैसे लगते हैं। 

जहाँ फुके ने अपने चित्र ‘कुँआरी मरियम’ (एंटवर्प) में शिशु ईसा को परम्परागत रूप में चित्रित किया है वहाँ ‘मुल के उस्ताद’ ने अपने चित्र ‘कुँआरी मरियम’ ब्रसल्ज में शिशु ईसा को नवजात शिशु के समान यथातथ्य चित्रित किया है। 

सम्भव है कि चित्रकार का नाम ज्यां परेआल था जिनका जन्म 1452 के करीब पेरिस में हुआ था व जो राजा 8वाँ शार्ल व राजा 12वाँ लुई के साथ इटली गये थे जहाँ वे लिओनार्दो से परिचित हुए थे।

पादटिप्पणी – Masaccio, Duccio जैसे इटालियन नामों का उच्चारण शब्द कोशानुसार Masatcho, Dutchio होता है। संस्कृत व हिन्दी सन्धि-नियमानुसार त् + च् का संयुक्ताक्षर च्च होता है (उदाहरणार्थ सत् + चरित्र – सच्चरित्र) । अतः उपर्युक्त जैसे नामों को मासाच्चो, दुच्चिओं आदि लिखा है।

More Like This:

Leave a Comment

15 Best Heart Touching Quotes 5 best ever jokes