कला व आत्मानुभव | Art and Self-Experience

भौतिक जीवन को कोई नकार नहीं सकता किन्तु यह भी सच है कि अमर्यादित सुखोपभोग के बावजूद मनुष्य अतृप्त ही रहता है, यदि उसके आंतरिक जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति की ओर ध्यान नहीं दिया गया। 

कला के (और व्यापक विचार से न केवल मनुष्य के हर कर्म व चिंतन के बल्कि समस्त अस्तित्व के) दो पक्ष होते हैं- पहला भौतिक पक्ष व दूसरा आत्मिक पक्ष यदि कलासर्जन में केवल भौतिक पक्ष पर ही ध्यान दिया गया तो कला केवल ऐंद्रिय सुखोपभोग की अभिवृद्धि का साधन या केवल मनोरंजन या रूपशृंगार मात्र रह जायेगी। और केवल आत्मिक पक्ष पर ही ध्यान दिया गया तो कला द्वारा अभिव्यक्ति की आवश्यकता ही क्या है, वह समझना कठिन हो जाता है क्योंकि आत्मिक जीवन की परिपूर्ति के साधन हैं चिंतन, उपासना व सदाचरण न कि उसकी अभिव्यक्ति ।

कला जीवन के रूपसौंदर्य की वृद्धि करने व मानवीय भावनाओं की पूर्ति करने का अनुपम मनोरंजक साधन है इसमें कोई संदेह नहीं है व भौतिक जीवन की अनिवार्यता को देखते हुए, वह वैसी रहेगी भी वह निर्विवाद है, किन्तु इसके अतिरिक्त कला का क्या कोई ऐसा लक्ष्य हो सकता है जिसे हम ‘जीवन के अंतिम लक्ष्य’ के समान ‘कला का अंतिम लक्ष्य’ कह सकते हैं जिससे मानव की आंतरिक अतृप्ति का निराकरण होकर वह आत्मिक शांति को अनुभव कर सके ? 

आंतरिक जीवन को समर्पित कला साधकों की यही मान्यता है कि आत्मिक शांति की प्राप्ति के लक्ष्य के बिना कला केवल व्यवसाय मात्र है व उसे श्रेयमार्गी कला नहीं कह सकते। 

मानवजाति के आरंभ से ही कला निर्मिति होती आयी है। यह देख कर मन में विचार आना स्वाभाविक है कि इस अखण्ड कला निर्मिति का मानव जीवन से आखिर क्या आंतरिक संबंध है व क्या इसका कोई अंतिम लक्ष्य भी हो सकता है। 

इस विचार से प्रेरित होकर कुछ समझने का यहाँ अल्पमति से प्रयास किया गया है। महापुरुषों व संतों को छोड़ कर सामान्य मनुष्य भौतिक जीवन के मोह में इतना आकंठ डूबा रहता है कि वह जीवन के भौतिक पक्ष को ही अंतिम सत्य मानने लगता है व उसे संदेह होता है कि क्या आत्मा, आत्मिक शांति व अज्ञात शक्ति ये सब मानव द्वारा अतृप्त मन को रिझाने या जीवन के अनिवार्य दुःखदर्दों को भुलाने के लिये की गयीं भ्रामक कल्पनाएँ तो नहीं हैं। 

कार्ल मार्क्स ने कहा था ‘धर्म अफीम है’ और फ्रायड का प्रतिपादन है कि ‘धर्म मनोविकृति है। किन्तु इसके साथ यह भी वास्तविकता है कि समाज का लगभग हर व्यक्ति भौतिक सुखों के पीछे भगता हुआ नजर आता है। 

ईश्वर आत्मा जैसी आध्यात्मिक धारणाएँ यथावत् बनी हुई हैं और आधुनिक युग में भी, इनेगिने व्यक्तियों को छोड़ कर, उनको स्पष्टतः नकारने का साहस मानव समाज नहीं जुटा पा रहा है, बल्कि अभूतपूर्व वैज्ञानिक विकास से उपलब्ध अकल्पनीय भौतिक सुख-साधनों के बावजूद आध्यात्मिकता को समर्पित अनेक पंथों व दर्शनों का उदय हो रहा है, यद्यपि इनके प्रसार से राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं का हल करने में, अल्प-सी ही क्यों न हो, मदद हो रही है, ऐसा दिखायी नहीं देता। 

आर्यसमाज, रामकृष्ण मिशन, इस्कान आदि संस्थाओं के प्रचार कार्य एवं महर्षि अरविंद, स्वामी विवेकानंद, जे. कृष्णमूर्ति, आचार्य रजनीश आदि विचारकों के नये स्वरूप के दर्शनों के प्रसार के उपरान्त दुनिया का अन्तर्बाह्य स्वरूप बिगड़ता ही जा रहा है। 

नवीनतम उपभोक्ता संस्कृति का आकर्षण बढ़ कर स्पर्धा व संघर्ष में वृद्धि हो रही है। धर्म के विपरीत आचरण करने वालों द्वारा धर्म के लिये लड़ाई करना व हिंसक आतंकवाद को अपनाना वर्तमानकालीन विरोधाभासी सच बन गया है। 

सब तरफ अपराध प्रवृत्ति के लोगों द्वारा धर्म, न्याय, सत्य, अहिंसा, भूतदया आदि सद्विचारों को लेकर जो भाषणबाजी की जा रही है, उससे Satan quoting the Bible के मुहावरे के प्रत्यक्ष उदाहरण देखने को मिल रहे हैं। 

एक ही व्यक्ति में शैतानी आचरण व उद्धार का संदेश दे रहे प्रभु पर अविश्वसनीय आस्था के सहअस्तित्व का तर्कसंगत उत्तर नहीं मिलता। चार्वाक, नीत्शे, डार्विन, फ्रायड, मार्क्स, काम्यु आदि निरीश्वरवादी विचारकों के प्रतिपादनों के बावजूद ईश्वर व आत्मिक जीवन के प्रति आस्था को कोई संकट प्रतीत नहीं होता। 

छिछले स्वरूप के साहित्य व संकुचित दृष्टिकोण के व्यक्तियों द्वारा की गयी निंदा के बावजूद राम, कृष्ण, ईसा, तुलसीदास, महात्मा गाँधी आदि अलौकिक विभूतियों की पूजनीयता में कोई कमी नहीं आयी है। 

सब तरफ भ्रष्टाचार व असत्य आचरण फैलने के बावजूद भारत का राष्ट्रीय आदर्श वाक्य ‘सत्यमेव जयते’ सीना तान कर अपने शिखर स्थान पर अटल है। 

उसको हटा देने की भ्रष्ट व असत्याचरणी नेताओं को हिम्मत क्यों नहीं होती ? इसका एक ही कारण हो सकता है और वह यह है कि स्वयं को सन्मार्गपथ पर चलने में दुर्बल पाने के बावजूद मनुष्य की अंतरात्मा उसे आश्वस्त करती है कि ईश्वर, आत्मा व सदाचरण मानव जीवन के मूलाधार हैं और उनके समाप्त होने पर उसका संपूर्ण विनाश अवश्यंभावी है। 

इस संबंध में कार्डिनल गोन्साल्विक व नेपोलियन के बीच हुए संवाद में कार्डिनल गोन्साल्विक का सारगर्भित कथन चिंतनीय है जब नेपोलियन ने अधिकार वाणी से सूचित किया कि वह अपनी सैनिक शक्ति से धर्म को नष्ट कर सकता है तो कार्डिनल ने सस्मित कहा, “चर्च भी सदियों से इसके लिये कोशिश कर रहा है किन्तु उसे अब तक इसमें सफलता नहीं मिली है।” 

कार्डिनल के कथन का मतलब यह था कि चर्च में फैले हुए भ्रष्टाचार व धर्मविरोधी आचरण के बावजूद धर्म के अनुयायियों की संख्या व धर्म के प्रति आस्था में कोई कमी नहीं आयी है। सृष्टि की चैतन्यमय निरन्तरता में दृष्टिगोचर गणितीय नियमबद्धता के मूल कारण पर व जीव-तत्त्व के रहस्य पर प्रकाश डालने में असमर्थ रहने से विज्ञान भी मानव की ब्रह्म जिज्ञासा को तृप्त नहीं कर पाया है। 

सृष्टि में नियमबद्धता है, यह हर कोई जानता है किन्तु यह नियमबद्धता क्यों है, कहाँ से आयी व उसके पीछे कौनसी शक्ति है, यह कोई नहीं जानता। नियमबद्धता नहीं होती तो सृष्टि की उत्पत्ति नहीं होती व यदि होती तो नियमबद्धता के बिना उसका संचालन असंभव होकर वह नष्ट हो जाती, ऐसा मत भले ही कोई व्यक्त कर दे, किन्तु सृष्टि की उत्पत्ति नहीं होती तो क्या स्थिति होती व सृष्टि के नष्ट होने का अर्थ क्या है, इसका स्पष्टीकरण किसी के पास नहीं है। 

विज्ञान के अनुसार नष्ट होने की क्रिया भी नियमबद्ध होती है। आइन्स्टाइन के मतानुसार सूर्य व चन्द्रमा के समान मानव की गतिविधियाँ भी अज्ञात नियमों से नियंत्रित होती हैं व मानव की स्वतन्त्र इच्छाशक्ति जैसी कोई वस्तु नहीं है। नियतिवाद का यह मूलभूत सिद्धांत है। 

यहाँ मानव जीवन में दृष्टिगोचर विरोधाभास का उल्लेख इसलिये किया है कि किन्हीं गूढ़ शास्त्रीय संकल्पनाओं के पूर्वज्ञान के बिना या आध्यात्मिक साधना के बिना हर कोई उस पर विचार कर सकता है और उसी के समरूप विरोधाभास, कलाकारों व दार्शनिकों द्वारा कला के लक्ष्य के बारे में प्रकट किये निष्कर्षो में भी दिखायी देते हैं, जिनको समझने में उपर्युक्त विरोधाभास से तुलनात्मक अध्ययन सहायक हो सकता है। 

कला का जीवन से पृथक् रूप से विचार आधुनिक काल की देन है। कुछ अतिवादी आधुनिक कलाकार यह घोषित करते हैं किं “कला का जीवन से कोई संबंध नहीं है।” उनकी वह घोषणा यह कहने के समान है कि “कलाकार मनुष्य नहीं है।” 

यदि कला को जीवन का अविभाज्य अंग जानकर विचार किया जाये तो कला का वही अंतिम लक्ष्य होना चाहिये जो मानव जीवन का हो। 

प्राचीन कलाकारों के मन में इस बारे में कोई संदेह नहीं था जैसे उनकी कलाकृतियों से प्रमाणित होता है। किन्तु आधुनिक कलाकारों के दृष्टिकोण में आये परिवर्तन के कारण एवं वर्तमान में कला को जीवन से पृथक् अनुभव मानने की धारणा बलवत्तर होने के कारण उस पर स्वतन्त्र विचार आवश्यक हो जाता है।

प्राचीन भारतीय कला के समान प्राचीन योरपीय कला (ग्रीक, बिजांटाइन, पुनर्जागरणकालीन) धर्म को समर्पित थी व प्राक्सीटेलीस, मायरोन, माइकिलेन्जेलो, लिओनादों आदि प्राचीन कलाकारों के मन में धर्मबन्धों में उल्लिखित मानव के पारलौकिक जीवन व ईश्वरीय अस्तित्व संबंधी संदेशों के प्रति संदेह या विरोधी विचार नहीं आया। 

उन्होंने जो कला संबंधी विचार व्यक्त किये हैं वे सब कला के बाह्य भौतिक रूप व अभिव्यक्ति सामर्थ्य की अभिवृद्धि करने एवं अंकन पद्धति संबंधी अपने अनुभवजन्य ज्ञान का भविष्य के कलाकारों को लाभ पहुँचाने के उद्देश्य से किये हैं। 

प्लेटो, अॅरिस्टॉटल से लेकर आधुनिक काल के बेकन, नीत्शे, कांट, हेगेल, बर्गसां व तत्पश्चात् हेनरी जेम्स, सांतायना, मोरिस वगैरह पश्चिमी दार्शनिकों के कला संबंधी लेखन के परिशीलन से ज्ञात होता है कि सबने कला सर्जन का विश्लेषण भौतिक विज्ञान व मनोविज्ञान के निष्कर्षो की सहायता से किया है। 

विल डयूरंट ने अपनी पुस्तक Story of Philosophy में लिखा है ‘The history of modern philosophy might be written in terms of warfare between physics and psychology’ और यह अनिवार्य भी है क्योंकि रूपनिर्मिति, रूपबोध व भावजागृति का सीधा संबंध ज्ञानेंद्रियों व अवबोधन (perception) से होने से कला संबंधी ( या किसी भी विषय संबंधी) सार्थक विवरण में ऐंद्रिय प्रभावों, सेंद्रिय गतिविधियों व मानसिक प्रतिक्रियाओं का समन्वित रूप से अध्ययन किये बिना किसी भी निष्कर्ष तक नहीं पहुँचा जा सकता। 

किन्तु इसके साथ यह भी सच है कि खानपान, विहार, विलास आदि उपभोक्ता जीवन की गतिविधियों के परे भी कला का मानव के अतृप्त आंतरिक जीवन से अधिक गहरा संबंध है। 

इस तथ्य को कोई भी विचारक नकार नहीं सकता और इस तथ्य को केन्द्रीय महत्त्व देकर भारतीय अध्यात्मविद्या ने सत्य की खोज को ऐंद्रिय ज्ञान व मनः प्रवृत्ति के आधारों तक सीमित न रख कर सूक्ष्मतम आत्मतत्त्व के अस्तित्व का अनुमान लगा कर किया है जो अतीन्द्रिय बुद्धि या प्रज्ञाचक्षु से ही संभव है। 

आइन्स्टाइन के साथ आरंभ हुई आधुनिक सैद्धांतिक भौतिकी का हम यदि परिशीलन करते हैं तो उसमें भी मूलभूत तत्त्वों के ज्ञान प्राप्ति में विशुद्ध अनुभववाद ( empiricism) की उपयुक्तता पर संदेह व रहस्यात्मक अस्तित्व की ओर झुकाव का स्पष्ट संकेत मिलता है। 

ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, रचना व गतिविधि संबंधी एवं परमाणविक रचना संबंधी भौतिक विज्ञानियों के आधुनिकतम सिद्धांत भी रहस्यपूर्ण विधानों से भरपूर हैं। विज्ञान के अनुसार पदार्थ व ऊर्जा उसी मूलतत्त्व के भिन्न रूप हैं व एक-दूसरे में परिवर्तित हैं; प्राण के बारे में विज्ञान अभी मौन है। 

भारतीय आध्यात्मिक चिंतन अधिक व्यापक है व उसके अनुसार पदार्थ, ऊर्जा व प्राण उसी ब्रह्मतत्त्व या परमात्मा से उद्भूत हैं व चराचर सृष्टि उसी का प्रकट रूप है और अनुभवजन्य आकार चैतन्य व भाव उस परमात्मा के संकल्प एकोऽहं बहु स्याम्) का फल है।

कला व ऐंद्रिय ज्ञान

कला के आत्मिक स्वरूप के बारे में प्राचीन भारतीय अध्यात्म विद्या व योग विद्या के अन्तर्गत किये गये निर्णयों पर विचार करने से पहले पश्चिमी विज्ञान यानी शरीर क्रिया विज्ञान व मनोविज्ञान के आधार पर कलाकृति के ज्ञानेंद्रियों द्वारा अवबोधन की प्रक्रिया व उसके मनोवैज्ञानिक परिणामों के बारे में विचार करना उचित होगा क्योंकि यह विषय गूढ़ विधानों से मुक्त होने से सरलता से आकलनीय है जबकि प्राचीन भारतीय कला संबंधी दार्शनिक निर्णय परमतत्त्व या ब्रह्मतत्त्व व आत्मा के अस्तित्व के विश्वास पर आधारित अर्थात् आत्मिक अनुभूति द्वारा बोधगम्य होने से गूढ़ व दीक्षणीय ( esoteric) है व उसका यथातथ्य आकलन, समूचे भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान के समान केवल किताबी अध्ययन या विवेधन से संभव नहीं है- वह केवल गुरुशिष्य संबंधों द्वारा, गुरु के सान्निध्य, मार्गदर्शन व साधना से ही संभव है।

दृश्य एवं श्रव्य कलाओं, साहित्य तथा प्राणीमात्र की हर शारीरिक व वैचारिक क्रिया का आरंभिक स्वरूप ऐंद्रिय यानी शरीर क्रिया वैज्ञानिक होता है। 

देखने, सुनने, खाने, काम करने, विचार आदि विभिन्न शारीरिक क्रियाओं में प्रकाश, ध्वनि, स्वाद, गंध, स्पर्श की ऊर्जा भिन्न ज्ञानेंद्रियों द्वारा समस्त तंत्रिका तंत्र को सचेत व कम्पित करती है। ज्ञानेंद्रियों की यह कम्पनावस्था ब्राह्यता व सहनीयता के अनुसार सुखद, दुःखद या परिणामहीन, कैसी भी हो सकती है। 

हलकी गरमाहट प्रीतिकर होती है तो तीव्र गरमी तापदायक ग्राहाता व सहनीयता शारीरिक क्षमता व बाह्य ऊर्जा की कम्पन संख्या (frequency) पर निर्भर करती है विचार क्रिया व भावनाएँ भी ज्ञानेंद्रियों से प्राप्त संवेदनों से आरंभ होकर उनके स्मृतिगत संकलन पर निर्भर होने से सम्पूर्ण मनोविज्ञान भी तंत्रिकातंत्र के अधीन होता है। 

ज्ञानेंद्रियों की ग्रहण क्षमता मर्यादित होने से मर्यादा से अधिक या कम कम्पन संख्या की ऊर्जा का ज्ञानेंद्रियों पर होने वाला प्रभाव बोधगम्य नहीं होता। किन्तु ऊर्जा का आक्रमण जारी रहता है व बोधगम्य नहीं होते हुए वह सूक्ष्म रूप से शरीर व मन को निरन्तर प्रभावित करता रहता है जिस प्रकार मनुष्य की हृदय क्रिया मृत्यु तक चलती रहती है उसी प्रकार उसकी ज्ञानेंद्रियाँ भी अहर्निश सचेत व कम्पायमान रहती हैं यद्यपि उनका निरन्तर क्रियान्वित होने का कोई बोध नहीं होता। 

बाह्य ऊर्जाओं के अतिरिक्त शरीर की भीतरी प्रक्रियाओं से निर्मित ऊर्जाओं के कारण भी ज्ञानेंद्रियाँ सक्रिय रहती हैं। श्वसनक्रिया, रुधिराभिसरण, पाचनक्रिया, भावोद्दीपन, स्वप्न, विचार क्रिया आदि शरीर की ये आंतरिक गतिविधियाँ ज्ञानेंद्रियों को सतत संवेदित रखती हैं- क्योंकि मानव शरीर की ये आंतरिक गतिविधियाँ आमरण बराबर चलती रहती हैं।

उसकी ज्ञानेंद्रियाँ भी निरन्तर संवेदनों से परिपूर्ण रहती हैं। शारीरिक या मानसिक विकृतियों में ये आंतरिक गतिविधियों से निर्मित संवेदन बोधगम्य भी हो जाते हैं। 

बुखार में शरीर का तापमान बढ़ने से मनुष्य गरमी महसूस करता है। अपचन होने पर मुँह में खट्टापन, कडुआपन आना आम अनुभव है। बाहरी दुनिया कितनी भी स्तब्ध क्यों न हो कुछ व्यक्तियों के कानों में अजीब-सी आवाजें सुनायी देती हैं, जैसे किसी चिड़िया या जानवर की आवाज या गाड़ी की सीटी आदि। 

प्रस्तुत लेखक के कान में बरसों से दिन-रात हृदयस्पंदन सुनायी देते हैं। कुछ व्यक्ति नींद में बड़बड़ाते हैं या भ्रमण करते हैं। नींद में भी विचार क्रिया व भावात्मक गतिविधियाँ जारी रहती हैं। 

आंग्ल कवि कोलरिज द्वारा नींद में रचित कविता Kubla Khan इसका प्रसिद्ध उदाहरण है। नींद में गणितीय या अन्य वैचारिक समस्याओं का समाधान किये जाने के अनेक उदाहरण हैं जिनका मनोविज्ञान ने समेकन (consolidation) के सिद्धांत के अंतर्गत स्पष्टीकरण किया है।

कुछ श्रवणगोचर या दृष्टिगोचर अनुभव ऐसे हैं जिनके ऊर्जा स्रोत के बारे में कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता। कितना भी घना अंधेरा क्यों न हो आँखें बंद करने पर हर किसी को प्रकाशपुंज दिखायी देते हैं; — उंगलियों से दोनों कानों को बंद करने पर गंभीर ध्वनि सुनायी देती है। 

इन आंतरिक प्रकाशपुंज या ध्वनि के साथ कभी स्मृतिजन्य बिम्ब दिखायी देते हैं या स्वर भी सुनायी देते हैं। इन दृश्य बिम्बों व स्वरों को उत्पन्न करने वाले ऊर्जा स्त्रोत कहाँ अवस्थित हैं या कहाँ से आते हैं इस संबंध में कोई वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। 

मनुष्य को बाह्यजगत् से मिलने वाली जानकारी एवं उसके सब सुख-दुःख तंत्रिका तंत्र के संवेदन मात्र होते हैं व उनका उद्भव बाह्यजगत् में विद्यमान ऊर्जा के ज्ञानेंद्रियों पर हुए आघातों एवं आंतरिक शारीरिक क्रियाओं या मानसिक अवस्थाओं द्वारा निर्मित ऊर्जा के आघातों के परिणाम होते हैं- यहाँ तक जानने में आधुनिक विज्ञान अवश्य सहायक होता है। 

किन्तु इनके अलावा कोई आंतरिक ऊर्जा स्रोत हो सकते हैं जो ज्ञानेंद्रियों को संवेदित करके विविध अनुभव प्रदान करते हैं, इस बारे में विज्ञान मौन है। और इस संबंध में विज्ञान द्वारा कोई प्रमाण उपलब्ध होने की अपेक्षा भी नहीं कर सकते क्योंकि विज्ञान ज्ञानेंद्रियों के अतिरिक्त किसी अतींद्रिय व्यवस्था पर ज्ञान प्राप्ति के साधन के रूप में विश्वास नहीं करता। 

इसका अर्थ यह है कि विज्ञान ने स्वयमेव ज्ञानार्जन के साधनों व ज्ञान के क्षेत्र को सीमित कर रखा है। किन्तु विश्व का स्वरूप अनन्त व रहस्यात्मक होने से इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिये कि उसके बारे में ज्ञान भी वैसा ही अमर्यादित व रहस्यात्मक होगा व केवल विज्ञान द्वारा सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्ति संभव नहीं है। 

इसी कारण प्राणशक्ति व स्मृतिजन्य या रहस्यात्मक मनोवैज्ञानिक अवस्थाओं को प्राप्त ऊजाओं के बारे में कोई निश्चित वैज्ञानिक तथ्य उपलब्ध नहीं है। 

ऊर्जा के बिना कोई संवेदनात्मक अनुभव या कार्य नहीं हो सकते, इस वैज्ञानिक सिद्धांत के अनुसार स्पष्ट है कि आंतरिक शारीरिक क्रियाओं व मानसिक अवस्थाओं के मूल में भी ऐसी ऊर्जा होगी जैसी अग्नि, प्रकाश, वायु जैसे स्रोतों से प्राप्त होती है। 

यह ऊर्जा कहाँ से आती है या किस तरह संगृहीत की जाती है, यह प्रश्न उठता है। परा मनोविज्ञान द्वारा हुए अन्वेषण, अंतर्ज्ञान, दूरबोध संतपुरुष व विशिष्ट व्यक्तियों के रहस्यपूर्ण अनुभव, अनेक जन्मजात विलक्षण प्रतिभा सम्पन्न पुरुषों का मानव जाति के आरंभ से ही जन्म लेना, इन विषयों पर प्रकाश डालने में विज्ञान असमर्थ है। प्रेम, त्याग, दया, नैतिकता आदि मानवीय मूल्यों का वैज्ञानिक आधार पर समर्थन नहीं किया जा सकता। 

“विज्ञान के बिना अध्यात्म पंगु है व अध्यात्म के बिना विज्ञान अंधा है” ऐसा मत आइन्स्टाइन ने प्रतिपादित किया है। भारतीय तत्त्वज्ञान के अनुसार ‘ज्ञान स्वयंसिद्ध है’ (त्रिपुरा रहस्य)। ऐसा नहीं होता तो मनुष्य क्या सही, क्या गलत इसका अंतिम फैसला स्वविवेक पर नहीं छोड़ता व सब तरफ हिंसा व असत्याचरण दिखायी देते हुए अहिंसा व सत्य का वह विश्वास नहीं करता। 

ज्ञान स्वयंसिद्ध होने से अप्रमाण्य है जबकि विज्ञान बुद्धिवादी होने से मूल ज्ञानप्राप्ति में सहायक नहीं हो सकता । परमात्मा व आत्मा के अस्तित्व, सदाचार व परोपकार के लिये विज्ञान के पास कोई प्रमाण नहीं है। 

बट्रांड रसेल ने लिखा है, “हम अपने लक्ष्यों व नैतिक आदर्शों के लिये कोई प्रमाण नहीं दे सकते।” शुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिकोण से मानव जीवन अर्थहीन है। दुःखांत कहानी, रहस्य कथा, युद्ध कया व अनर्गल नाटक (Absurd Play) के विलक्षण आकर्षण के कोई वैज्ञानिक कारण नहीं बताये जा सकते। 

भूकंप, बाद, आँधी, बिजली की कड़क जैसी विनाशक घटनाओं के दृश्यों से सौंदर्यात्मक अनुभव का होना तर्कसंगत नहीं है। जन्मदिन व विवाह समारोह के समान अंतिम संस्कार में गंभीर सौंदर्यात्मक बोध क्यों है? और उसमें लोग यह अनुभव क्यों करते हैं जैसे कि वे किसी उत्सव में शामिल हुए हैं ? 

बाघ, शेर जैसे हिंसक पशु क्यों सुंदर लगते हैं, पागल व्यक्ति क्यों आकर्षित करता है, कुरूप स्त्री भी किसी को असाधारण आकर्षक क्यों लगती है, यह कौन समझा सकता है? 

हिमाच्छादित गिरिशिखर, गरजता हुआ विशाल सागर, सूर्योदय, सूर्यास्त, घना जंगल आदि विविध निसर्ग दृश्यों में ऐसी क्या बात है जिसकी वजह से सब लोग उनसे मुग्ध होते हैं। इसके क्या कोई वैज्ञानिक कारण हैं? उपर्युक्त तथ्यों का विचार करते हैं तो प्रतीत होता है कि कला (जो

मनुष्य के आंतरिक जीवन से अधिक संबंध रखती है) विज्ञान, इतिहास, समाजशास्त्र आदि भौतिक विद्याओं की अपेक्षा अध्यात्म, धर्म, मंत्र-तंत्र आदि गूढ़ विद्याओं के अधिक निकट है। 

भौतिक विद्याएँ मुख्यतः प्रत्यक्ष ऐंद्रिय ज्ञान व शाब्दिक निष्कर्षो को लेकर विकसित हुई हैं जबकि गूढ़ विद्याओं के मूलाधार हैं श्रद्धा व आत्मिक अनुभव। विज्ञान के ज्ञान प्राप्ति की पद्धति है विश्लेषण व वर्गीकरण, जबकि अध्यात्म की पद्धति है समष्टिदर्शन व एकीकरण। 

इसलिये विज्ञान को सत्य- सौंदर्य, सुख-दुःख, लाभ-हानि, जैसे द्वंद्वों में कोई समानता नहीं नजर आती जैसी अध्यात्म में प्रतिपादित की गयी है। ‘सुखदुःखे समेकृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ’ (श्रीमद्भगवत् गीता ) । विज्ञान की सब योजनाएँ समयबद्ध व अस्थायी होती हैं क्योंकि उसमें अध्यात्म के समान शाश्वत का विश्वास ही नहीं किया जाता।

प्राचीन ऋषि-मुनियों ने आत्मज्ञान प्राप्ति के हेतु किस तरह साधना की इस पर कुछ भी लिखने या उनके प्रतिपादनों का विवेचन करने का प्रस्तुत लेखक अधिकारी नहीं है किन्तु उनके आत्मिक जीवन संबंधी निष्कर्षो को आधार रूप में लेकर प्रत्यक्ष अनुभवों द्वारा सौंदर्य व कला संबंधी कुछ मूलभूत प्रश्नों का समाधान करने में उनसे सहायता हो सकती है, इस विश्वास से प्रेरित होकर यहाँ कुछ विचार प्रस्तुत किये गये हैं। 

योगी कला व अंतस्तत्त्व (ब्रह्मतत्त्व) 

ज्ञानेश्वरी-रचयिता संत ज्ञानेश्वर पुरुष उल्लेख है :- ये व उनके निम्नलिखित अभंगों में अंतर्ध्वनि व अंतःप्रकाश का 

कार्नी घालुनिया बोटें नाद जें पाहावे । 

न दिसतां जाणायें नऊ दिवस || ||

डोळा घालुनिया बोट चक्र जें पाहावे । 

न दिसता जाणावे पाँच दिवस | ||

इन अभंगों का सारांश यह हैं कि आँखों को उंगलियों से दबाने पर एवं कानों में उंगलियों को ढूँस देने पर अंतःप्रकाश या अंतर्ध्वनि को अनुभव किया जाता है व यदि ऐसा अनुभव नहीं किया जाता तो पाँच या नौ दिन में मृत्यु हो जाती है।

मनुष्य के लिए सूर्य समेत पृथ्वी, जल, तेज, वायु व आकाश इन पंचमहाभूतों का अस्तित्व इसलिये महत्त्व रखता है कि उनसे ऊर्जा ग्रहण करके उसकी ज्ञानेंदियाँ संवेदित होती हैं व यदि ऐसे न हो तो बाह्यजगत् मनुष्य के लिये अस्तित्वहीन होगा। 

यदि उपर्युक्त बाह्य ऊर्जा स्रोतों से निर्मित बोधगम्य संवेदनों के समान आंतरिक स्रोतों से संवेदननिर्मिति होती हैं तो इन आंतरिक स्रोतों को भी बाह्य स्रोतों के समान ऊर्जस्वी मानना होगा। 

प्राचीन वैदिक ग्रंथ पुराण एवं योग व अध्यात्म संबंधी ग्रंथों में इस प्रकार के आंतरिक ऊर्जा स्रोतों के अस्तित्व के उल्लेख मिलते हैं। प्रश्नोपनिषद् के मंत्र 612 में स्पष्ट किया गया है कि जिन परमेश्वर से सोलह कलाओं का समुदाय सम्पूर्ण जगद्रूप उनका विराट शरीर (ब्रह्मांड ) उत्पन्न हुआ वे परम पुरुष हमारे शरीर के भीतर ही विराजमान हैं। शरीरस्थ पुरुष को जान लेना ही सोलह कला वाले पुरुष को जान लेना है। 

गीता में भी लिखा है (13-27 ) ” समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्…यः पश्यति स पश्यति ।” अर्थात् हर प्राणी में अंश रूप (यानी जीवात्मा रूप में) परमात्मा विद्यमान है। गीता के अध्याय 15-15 में लिखा है (सर्वस्य चाहं हृदिसंनिविष्टो….) कि हृदयस्थ परमेश्वर के कारण ही स्मृति (संस्कारज्ञान), स्वरूपज्ञान व सद्विवेक बुद्धि की उत्पत्ति होती है। 

शरीर के भीतर विराजमान बाह्य सृष्टि की समस्त ऊर्जा के स्रोत परम पुरुष के कारण मनुष्य को आंतरिक ज्ञेय अनुभवों के लिये बाह्य ऊर्जा की आवश्यकता ही नहीं होती। निद्रावस्था में एवं किसी कारण बाह्यजगत् से सम्पर्क टूटने पर भी मनुष्य दृश्य, श्रव्य, स्पर्शीय आदि ज्ञानेंद्रियगम्य अनुभव आंतरिक ऊर्जा से प्राप्त कर लेता है। 

योगविद्या संबंधी ग्रंथों में आंतरिक ऊर्जा स्रोतों, उनके प्रकारों, स्थानों, व कार्यपद्धति तथा कुण्डलिनी, सुषुम्ना आदि नाड़ियों, आधारचक्र, ब्रह्मरंध वगैरह के विवरण के साथ मनुष्य के अंतर्जीवन का शास्त्रोक्त वर्णन है। 

इससे ज्ञात होता है कि मनुष्य के आंतरिक जीवन का वैज्ञानिक पद्धति से अध्ययन प्राचीन काल में किया गया था एवं अध्यात्म व योगविद्या के अंतर्गत इस विषय का सैद्धांतिक ज्ञान व प्रायोगिक कार्य दोनों समांतर चलते रहे। भारतीय आध्यात्मिक प्रतिपादनों को केवल कपोल कल्पित बातें मानकर चलना अनुचित है। 

विचारणीय है कि भारतीय अध्यात्मविद्या केवल काल्पनिक साहित्य सर्जन मात्र होती तो उसमें इतनी सुसूत्रता कैसे दृष्टिगोचर होती एवं विरोधी आलोचना द्वारा उसे समाप्त करने के प्रयत्नों के बावजूद वह हजारों वर्षों तक सुस्थापित क्यों है ? 

सुसंस्कृत भारतीयों एवं अनेक पाश्चात्य विद्वानों व अध्येताओं के मन में उसके प्रति अपार श्रद्धाभाव क्यों है? यद्यपि अंतःप्रेरित योगी पुरुषों व संतों को छोड़ कर उसके निर्दिष्ट मार्ग के अनुसार साधना द्वारा अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करना साधारण मनुष्य के लिये दुष्कर होता है।

भारत के समान, पाश्चात्य देशों में आध्यात्मिक चेतना को सर्वोपरि महत्त्व न मिलने के कारणों की चिकित्सा भारतीय चिंतकों के मूलगामी दृष्टिकोण पर प्रकाश डालने में सहायक व उद्बोधक होगी। 

पाश्चात्य देशों में कभी व्यापक दृष्टिकोण से मानदीय सुख-दुःख का विचार करने की प्रवृत्ति नहीं रही। पाश्चात्य चिंतकों ने सदैव तात्कालिक सुख व दुःख को पृथक रूप से सत्य मानकर उसी दृष्टिकोण से मानवे जीवन की समस्याओं को सुलझाने का प्रयत्न किया और इस दृष्टिकोण का प्रभाव आधुनिक काल के अस्तित्ववाद, साम्यवाद, भौतिकवाद, पूँजीवाद आदि विचारधाराओं पर सबसे गहरा दिखायी देता है। 

भौतिक या भौतिक स्वरूप के स्वर्गीय सुख को ही अभीष्ट व जीवन का अंतिम लक्ष्य मानकर पाश्चात्य दर्शन व धर्म रवाये गये ऐहिक जीवन में भौतिक सुख व मरणोत्तर स्वर्ग प्राप्ति के अतिरिक्त मानव जीवन में कुछ प्राप्तव्य हो सकता है इसका उनमें विचार नहीं है। 

ईसा ने ‘Blessed are the sufferers’, ‘Blessed are the poor’ कह कर दुःखी व निर्धन लोगों को भले ही सांत्वना दी होगी, किन्तु उसके लिये उनको “Their’s is the kingdom of heaven’ के भौतिक सुखों के समरूप सुख से परिपूर्ण स्वर्ग प्राप्ति के आश्वासन का सहारा लेना पड़ा। 

पुनरुज्जीवन (Ressurection) की कल्पना भी सुख व दुःख को क्रमशः ग्राह्य व त्याज्य मानने पर आधारित है। सुख व दुःख अन्योन्याश्रित एवं अविभाज्य हैं, इस भारतीय अद्वैतवादी सिद्धांत की पाश्चात्य विचारक कल्पना नहीं कर सके और उसके पीछे भी उनकी भौतिकवादी प्रवृत्ति ही कारण रही। 

भौतिकवादी दृष्टिकोण से मानवीय समस्याओं का अंत नहीं होता। केवल भौतिक सुखप्राप्ति इसका लक्ष्य होता है और जब इस दृष्टिकोण से उसकी प्राप्ति के लिये कोई विशेष उपाय योजना की जाती है या व्यवस्था बिठायी जाती है तब अनपेक्षित रूप से उसके साथ नवीन रूप से दुःख उत्पन्न होते हैं व मानवीय समस्याएँ ज्यों की त्यों बनी रहती हैं। 

औद्योगिक क्रांति ने शोषक पूँजीवाद का भूत खड़ा कर दिया तो उसके प्रतिकार स्वरूप हुई श्रमिक क्रांति ने दमनकारी साम्यवाद का राक्षस उत्पन्न किया। विज्ञान के आविष्कारों ने मनोरम प्रकृति का विनाश व जल व वायु जैसी प्राथमिक आवश्यकताओं का प्रदूषण करके प्राणीमात्र के लिये जीवन अभिशाप बना दिया। 

जॉन ड्यूई ने ठीक ही कहा है, “We do not solve problems, we get over them.” उपर्युक्त कारण के अलावा पाश्चात्य ज्ञान में ध्यान, मोक्ष, निर्वाण जैसी अवस्थाओं की इसलिये उपेक्षा हुई है कि वहाँ के जिज्ञासुओं का इस तथ्य की ओर ध्यान आकृष्ट नहीं हुआ कि दृश्य संसार के पीछे विद्यमान अदृश्य शक्ति को जानने के लिये उसके रहस्यात्मक निर्गुण निरपेक्ष स्वरूप का विश्वास होना प्राथमिक आवश्यकता है। 

पाश्चात्य जिज्ञासुओं ने दृश्य कार्य (सृष्टि) पर तो ध्यान केन्द्रित किया किन्तु उसके पीछे के कारण (परमात्मा) के सत्य स्वरूप के ज्ञान के मौलिक महत्त्व को नहीं समझा। चराचरव्यापी परमात्मा मनुष्य के भीतर भी विद्यमान है (Behold the kingdom of god is within you) यह विचार ईसाई धर्म के समान अन्य विकसित धर्मों में भी प्रतिपादित किया गया है किन्तु स्वर्ग, नरक जैसी प्रतीकात्मक कल्पनाओं व चमत्कार के वर्णनों का उनसे जुड़ जाना धर्म के सही आकलन में बाधा डालता है। 

धर्म के अन्तर्गत प्रतीकात्मकता व चमत्कारों के औचित्य की चर्चा यहाँ अप्रासंगिक है किन्तु भिन्न लोकों की कल्पना एवं मंत्र-तंत्र व योग संबंधी गूढ़ विवरणों को अलग कर वेद, उपनिषद्, गीता आदि भारतीय धार्मिक ग्रंथों का अध्ययन करते हैं तो सुख व दुःख की अविभाज्य द्वंद्वात्मकता, उनका मायिक स्वरूप व सबके पीछे विद्यमान अदृश्य परमेश्वरीय शक्ति को तादात्म्यभाव से अनुभव करना ही आत्मज्ञान है व उसका सुख-दुःख, स्वर्ग-नरक, भौतिक लाभ-हानि, सिद्धि-संकट, चमत्कार आदि से कोई संबंध नहीं है। 

जब सृष्टि का स्वरूप ही भ्रामक परिवर्तनशील व क्षणभंगुर है तो सृष्टि की अपेक्षा स्रष्टा को जानना जिज्ञासु का लक्ष्य होना चाहिये। केवल परिवर्तनशील की चिकित्सा से अपरिवर्तनीय का ज्ञान संभव नहीं है। 

लहरों की चिकित्सा से पानी का ज्ञान संभव नहीं है। मिट्टी के खिलौनों के रंग, रूप व क्रियाकलापों से मिट्टी का ज्ञान नहीं हो सकता। यह वैज्ञानिक सिद्धांत है कि हर कार्य के पीछे कोई कारण (शक्ति) होती है। 

अतः निस्संदेह समस्त सृष्टि के पीछे भी कोई चिदशक्ति होगी और उस शक्ति के स्वरूप के ज्ञान के बिना विज्ञान अधूरा होगा। आध्यात्मिक चेतना के बिना केवल विज्ञान से विश्वास पैदा नहीं किया जा सकता उससे अविश्वास ही बढ़ता है। संदेह संदेह को ही जन्म देता है और विश्वास विश्वास को ।

भारतीय अध्यात्म, योगविद्या व कला संबंधी प्राचीन ग्रंथों में देहांतर्गत आत्मिक सर्जनशील शक्तियों के बारे में अनेक जगहों पर विश्वास के साथ लिखा गया है। 

इन ग्रंथों के अध्ययन से यह भी स्पष्ट होता है कि प्राचीन काल से भारतीय कला मुख्यतः आत्मिक अनुभूति से घनिष्ठ रूप से जुड़ी हुई रही। श्रेष्ठ अनुभवी गायकों द्वारा अनाहत या आंतरिक नीरव सांगीतिक अनुभूति के अस्तित्व के विश्वास के साथ किये वर्णन को केवल क्षम कह कर टाला नहीं जा सकता।

एकाग्रचित्त हो कर बैठने पर हर कोई इस प्रकार के आंतरिक नीरव संगीतमय तादात्म्य को अनुभव कर सकता है।

‘संगीत रत्नाकर’ में नाद की उत्पत्ति की चर्चा कर के लिखा गया है कि ब्रह्मांड की प्रत्येक चराचर वस्तु में नाद व्याप्त है “शिव व विष्णु का वास कैलाश व वैकुंठ में न होकर जहाँ भक्त गायन करते हैं यहाँ होता है” (रामरत्नाकर) परमेश्वर का प्रतीक ॐ मुख्यतया नादस्वरूप ही है व यथातथ्य शास्त्रोक्त उच्चारण के बिना उसका प्रतीकात्मक सामर्थ्य निष्प्रभ रहकर वह एक अर्थहीन अक्षर मात्र रह जाता है। 

प्रकट श्रव्य नाद का कार्य आंतरिक अनाहत नाद को जागृत करना होता है जिसके बिना श्रव्य नाद ‘कोलाहल’ जैसा प्रतीत होता है। वरांचेरव्यापी आनंदमय ‘अनाहत नाद’ का अनुभव प्रत्यक्ष श्रव्य शास्त्रशुद्ध संगीत सुनने के पश्चात् एवं बीच-बीच के स्तब्धता के क्षणों में विशेषरूप से होता है।

संगीत के विविध रसोत्पादक प्रभाव होते हैं। परब्रह्म परमात्मा का मूल स्वरूप आनंदमय है (रसो वै सः तैत्तिरीय, 2/7 ) । किन्तु जब वे सृष्टि के रूप में प्रकट होते हैं तब उनका विविध भावात्मक रसों में दर्शन होता है अतः आनंदमय नाद ब्रह्म के भी विविध प्रकट रूप होते हैं और श्रव्य संगीत में श्रृंगार, वीर, करुण, भयानक आदि रसों को उत्पन्न करने की सामर्थ्य होती है। 

भारतीय प्राचीन ग्रंथों में उसी संगीत को सबसे श्रेयस्कर माना गया है जिसे सुनने के पश्चात् मंत्रमुग्ध श्रोता आंतरिक संगीतमय आत्मिक शांति को यानी नाद ब्रह्म को प्राप्त करता है। 

इस आत्मिक शांति की प्राप्ति ही संगीत की सार्थकता होती है। शास्त्रीय संगीत में भी हवेली संगीत, ध्रुवपद जैसी आत्मलीन भक्तिमय गायन पद्धतियों को श्रेष्ठ माना गया है।

आत्मलीनता प्राप्त होने के पश्चात् बाह्य श्रव्य संगीत भी अपने-आप मौन होता जाता है। आत्मिक जागृति के पश्चात् बाह्य रूप अनावश्यक हो जाता है। आत्मलीनता के अनुभव के बारे में रवीन्द्रनाथ टैगोर ने लिखा है 

‘कोलाहल तो बॉरोण होलो / एबार कथा काने काने’ (बंगाली) – शोरगुल समाप्त – हो गया है; अब दो कानों के बीच वार्तालाप होगी। हम यह भी देखते हैं कि श्रेष्ठ संगीतज्ञों की कला स्वाभाविक रूप से जैसे-जैसे विकसित होती जाती है वैसे-वैसे उसमें श्रोताओं को प्रभावित करने के प्रयास घटकर संगीतज्ञ अधिकाधिक अंतर्लीन होता जाता है और अंतिम चरण में पूर्णतया मौन होता है। 

किन्तु यह बात उन संगीतज्ञों के संदर्भ में ही यथोचित है जो संगीत को आत्मिक साधना के रूप में लेते हैं और न केवल अर्थार्जन या ख्याति प्राप्ति के साधन के रूप में। अर्थार्जन या ख्याति प्राप्ति जैसे भौतिक उद्देश्य कलासाधना में दोष उत्पन्न करते हैं व कला के विशुद्ध आत्मिक रूप को हानि पहुँचाते हैं। 

प्रजापति स्मृति, मनुस्मृति आदि अनेक धर्मग्रंथों में संगीत को आजीविका का साधन बनाना निषिद्ध माना गया है यद्यपि वैदिक वाङ्मयों व पुराणों में भक्तिमय संगीत की मोक्षप्रद सामर्थ्य का भी वर्णन मिलता है। सामवेद तो विशुद्ध गायन स्वरूप ही है। यज्ञों में गायन का होना आवश्यक था। 

हेमाद्री के ‘चतुर्वर्गचिन्तामणि’ में असंख्य धार्मिक व्रतों का उल्लेख है और उनमें संगीत व नृत्य की इष्टता का भी उल्लेख है। देवताओं के पूजन के पश्चात् संगीत व नृत्य के होने के संबंध में स्मृतिग्रंथों व पुराणों में उल्लेख हैं। यज्ञकर्म में गायन आवश्यक था। 

इस तरह भारतीय धर्मग्रंथों ने जहाँ संगीत का आत्मिक विकास के लिये पोषक तत्त्व के रूप में गौरवगान किया गया है वहाँ उसके विकारोत्तेजक प्रभाव को देखते हुए यथास्थान निषेध भी किया गया है। 

भौतिकवादी जीवन के प्रभाव के अंतर्गत विकसित पश्चिमी आधुनिक संगीत की उत्तेजकता आत्मिक शांति के लिये निस्संदेह बाधक तत्त्व है भले ही वह कितना भी प्रभावोत्पादक क्यों न हो। ऐसा संगीत वासनाओं को उद्दीपित करता है। 

हर प्रकार के संगीत से आत्मिक शांति प्राप्त नहीं होती। पहले उल्लेख किया गया है कि संगीत में विविध भाव उत्पन्न करने की सामर्थ्य होती है और संगीत के कुछ प्रकार ऐसे होते हैं जो मनोविकारों को उद्दीपित कर ऐसी मानसिक व शारीरिक अवस्था पैदा करते हैं जो आत्मिक शांति की विरोधी होती है। 

वैज्ञानिक प्रमाणों से भी सिद्ध हो चुका है कि आधुनिक उद्दीपक संगीत के दुष्प्रभाव से मनुष्य की शारीरिक व मानसिक शक्तियाँ क्षीण हो जाती हैं। इस प्रकार के दुष्प्रभाव को ध्यान में रखकर ही बौद्ध ग्रंथों ने धार्मिक कार्यों के अतिरिक्त ललित कलाओं को निषिद्ध माना है। 

अनेक स्मृति ग्रंथों, धर्मसूत्रों व संहिताओं ने नृत्य, गायन व वादन को ब्रह्मचारी के लिये वर्जित माना है। वात्सायन ने ‘कामसूत्र’ में नटियों व शिल्पकारिकाओं का वेश्या वर्ग में उल्लेख किया है। (शिल्पकारिक कला में निपुण स्त्री (नाट्यशास्त्र)) देवलस्मृति ने संगीत के साथ वास्तुकला, शिल्प व चित्रकला को भी ब्रह्मचारी के लिये वर्जित माना गया है। 

नट, नर्तक, शिल्पी, वादक, गायक का अन्नग्रहण नहीं करना चाहिये इस अर्थ के वचन स्मृतियों व धर्मसूत्रों में मिलते हैं उनको शूद्र माना गया था शिल्पकर्म का उपयोग आजीविका के लिये नहीं करना चाहिये ऐसा नारदस्मृति में लिखा है। कला व उपासना विशुद्ध कर्म हैं; उनको कदापि व्यवसाय नहीं बनाया जाना चाहिये।

यदि कोई व्यक्ति जिसने संगीत का अभ्यास नहीं किया है वह भी किसी सुनी हुई धुन का मन ही मन पुनः स्मरण करे तो उसमें स्वाभाविक लयबद्धता का माधुर्य होता है जब तक उसमें कण्ठ, ओष्ठ आदि इंद्रियों की प्रकट सहभागिता नहीं होती इससे सिद्ध होता है कि प्रत्येक मनुष्य का आंतरिक जीवन स्वभावतः भावपूर्ण, लयबद्ध व कलात्मक होता है सांगीतिक कार्यक्रम का प्रयोजन केवल इसलिये होता है कि वह व्यक्ति को उसके आंतरिक नादमय भावजीवन के प्रति सचेत करता है। 

यह विचारणीय बात हैं। कि प्रसिद्ध आंग्ल कवि जॉन कीट्स ने अपनी कविता ‘Ode on a Grecian Ur की ‘Heard melodies are sweet / But/../ pipe to the spirit ditties of no tone’ इन पंक्तियों में आंतरिक अद्भुत संगीत का उल्लेख किया गया है और स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यह ‘अश्रुत संगीत’ ‘श्रव्य संगीत से मधुर होता है। वह विचार ‘अनाहत नाद’ की धारणा का ही समर्थन करता है’। 

वस्तुतः मनुष्य के भीतर ही कला होती है नहीं तो वह न तो कलाकृति का सर्जन कर सकेगा न कलाकृति के प्रति संवेदनशील होगा भीतरी कला का स्वरूप भीतरी स्वभावों व बाहरी प्रभावों पर निर्भर होता है। संगीत श्रव्य हो या आंतरिक है तो संवेदननिर्मिति जो ऊर्जा स्रोत के बिना सम्भव नहीं है। 

और ऐसा ऊर्जा खोत शरीर में व्याप्त नहीं होता तो अनाहत नाद की अनुभूति नहीं होती। इस ऊर्जा स्रोत या चैतन्य के मूल स्रोत को ही परब्रह्म परमात्मा कहते हैं मनुष्य ईश्वर को माने या न माने, उससे कोई फरक नहीं पड़ता किन्तु चैतन्यस्रोत को तो मानना ही पड़ता है जो चराचर सृष्टि में व्याप्त है व जिसके कारण वह अंतर्बाह्य सक्रिय, भावपूर्ण व सर्जनशील है। इस तथ्य का विश्वास किये बिना न तो आत्मिक अनुभव की न वैज्ञानिक विचार की कल्पना संभव है।

संगीत के समान दृश्य कलाएँ भी इंद्रियज अनुभव होने से उपर्युक्त विचार उन पर भी लागू होते हैं। ऐतरेयोपनिषद् में इस बात का उल्लेख है कि सूर्यदेवता नेसेंद्रिय बन कर आँखों में प्रविष्ट हो गये व दिशाओं के देवता श्रोनेंद्रिय बनकर कानों में प्रविष्ट हो गये (ऐत. 1/2/4)। 

अर्थात् नेत्रों में व कर्णों में ईश्वरीय चैतन्य विद्यमान होने से हम देखते हैं व सुनते हैं अन्यथा दृश्य व श्रव्य अनुभव नहीं होते व हमारे लिये दृश्य व श्रव्य जगत् का कोई अस्तित्व ही नहीं होता। मनुष्य में जो तेजस्वी सौर पुरुष है उसे चाक्षुष नाम से संबोधित कर उसके स्थान व कार्य के बारे में शतपथ ब्राह्मण व चाक्षुष कृष्ण रहस्य में वर्णन किया गया है। 

प्रस्तुत लेख की दृष्टि से यह सब वर्णन कोई मतलब नहीं रखता किन्तु इससे यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि मनुष्य के अंतर्जगत् में अनाहत नाद के समान अंतज्योंति भी होती है जो उसे प्रकाशमान रखती है और इसी अंतर्ज्योति से प्रकाश प्राप्त कर मनुष्य आँखें बंद होने के बावजूद या निद्रावस्था में विविध दृश्यों को अनुभव कर लेता है। 

त्रिपुरारहस्य में आत्मा को ही चिति या चैतन्य माना है और कहा है कि स्वप्न में जीवात्मा इस चैतन्य के द्वारा सृष्टि को उत्पन्न कर उसका उपभोग करता है।

वस्तुतः बाह्य जगत् केवल अंतर्ज्योति से प्रकाशित अंतर्जगत् को जागृत करने के लिये होता है। यह अंतर्जगत् स्वप्नरूप होता हैं और वही वास्तविकता की सच्चाई होता है। दिन में मनुष्य जो कुछ देखता है उसे भी वह निजी कल्पना द्वारा रूपांतरित करके देखता है वास्तविकता से उपजी होते हुए भी काल्पनिक अंतःसृष्टि रूप-भाव में वास्तविकता से भिन्न होती है। 

वास्तविकता अपनी तरह बदलती जाती है व कल्पना भी बदलती जाती है, दोनों का कभी मिलन नहीं होता। इसीलिये संसार को मायाजाल कहते हैं, और मनुष्य की आत्मा मायाजाल के परे उस चिरंतन में मग्न होना चाहती है जो वास्तविकता, कल्पना व कला की पहुँच के बाहर है। 

कलाकार भी वास्तविकता या कल्पना के अनुरूप कलाकृति का निर्माण नहीं कर पाता। आँखें बंद करने के बाद सब तरफ अंधेरा छाने के बजाय आंतरिक जगत् की अंतज्योति से प्रकाश दिखायी देता है। यह प्रकाशमान जगत् अक्सर ऐसी प्रतिमाओं से सम्पूरित रहता है जो बाह्य जगत् के दृश्य अनुभवों की स्मृतियों को जगाता है। 

अतः आंतरिक शांति के लिये यह अत्यावश्यक है। कि मनुष्य ऐसे सात्त्विक वातावरण में रहे जो मन को प्रसन्न रखे, ऐसी कलाकृतियों को सम्मुख रखे जो मन में उदात्त भाव उत्पन्न करें व ऐसे नृत्य, नाटक आदि दृश्य कार्यक्रम देखे जो मंगलमय हों। भक्तिपूर्ण संगीत नृत्यादि कार्यक्रम, संतवाङ्मय व भारतीय मूर्तिकला इसके अनुपम उदाहरण हैं। 

बाह्य जगत् में प्राप्त अनुभव मनुष्य के अंतर्मन व निद्रावस्था को विविध रूप से प्रभावित करते हैं। इंद्रियातीत ध्यान (Transcendental meditation) का इस विचार से विशेष महत्त्व है व उससे मन व शरीर पर कितना स्वास्थ्यवर्धक प्रभाव पड़ता है यह आधुनिक वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा भी सिद्ध हुआ है। 

बाहा जगत् से प्राप्त अनुभवों की प्रतिमाओं को किस तरह स्मृतियों में संगृहीत किया जाता है व ऐसी प्रतिमाएँ स्मृतियाँ जागृत होने पर किस तरह अंतः पटल पर प्रकट होती हैं यह जानने हेतु पाश्चात्य वैज्ञानिक प्रयास कर रहे हैं एवं साइबरनेटिक्स (Cybernetics) में अब तक हुए आविष्कारों से प्रतीत होता है कि संभवतः मस्तिष्क की रचना जटिल कम्प्यूटर के समान हैव वैज्ञानिक आशा कर रहे हैं कि भविष्य में ऐसा कम्प्यूटर बनाया जा सकता है जो मस्तिष्क का कार्य कर सके। 

किन्तु मस्तिष्क व कम्प्यूटर की रचनाओं में समानता स्वीकारने पर भी इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिलता कि जिस तरह कम्प्यूटर में प्रतिमाओं को सन्निविष्ट करने के लिये एवं उनको पुनः प्रकाशित करने के लिये किसी व्यक्ति की संचालक के रूप में आवश्यकता होती है, उसी तरह मस्तिष्क के पीछे ऐसी कौनसी शक्ति है जो वैसा संचालन करती है। 

बाह्य संपर्क टूटने के बाद भी अंतर्मन में. जागृतावस्था में हो या स्वप्नावस्था में हो, जो बाह्य जगत् में प्राप्त अनुभवों के समान अनुभव प्राप्त होते हैं उससे लगता है कि जरूर ही मस्तिष्क से ज्ञानेंद्रियों द्वारा ज्ञान ग्रहण करने की एवं मनुष्य की तद्नुसार होने वाली गतिविधियों की प्रक्रिया कम्प्यूटरीय प्रक्रिया के समान किन्तु अधिक जटिल स्वरूप की होगी। 

फिर भी ज्ञान की इष्टानिष्टता, पसंद-नापसंद करने वाला एवं उसको उचित रूप से व्यवहार में प्रयुक्त करने वाला कोई केन्द्रीय तत्त्व तो होगा ही। कम्प्यूटर के साथ यह तत्त्व मनुष्य होता है किन्तु मानव मस्तिष्क के साथ आत्मा जैसे किसी अज्ञात तत्त्व के अस्तित्व को मानना पड़ता है। 

इस समानता के बावजूद कम्प्यूटर व मानव मस्तिष्क में महत्त्वपूर्ण अंतर है। कम्प्यूटर केवल यंत्र होने से उससे प्राप्त अनुभव आत्मिक न होकर पृथकता लिये होता है जबकि मानव मस्तिष्क द्वारा जनित अनुभव भावात्मक तादात्म्य के कारण आत्मिक स्वरुप का होता है। 

पराया द अपना में जो अन्तर है वही अंतर कम्प्यूटर निर्मित व स्वनिर्मित अनुभवों में है। मन आत्मा नहीं होता। मन अनेक प्रवृत्तियों का समुच्चय होता है। और उनमें से किस प्रवृत्ति को आत्मा कहा जाये प्रवृत्तियाँ बदलती रहती हैं। बुद्धि भी आत्मा नहीं है। निर्णय बुद्धि का स्वरूप है। किन्तु निर्णय भी बदलते जाते हैं अतः मन और बुद्धि आत्मा नहीं हैं जो निश्चयात्मक व शाश्वत है।

ऐतरेय उपनिषद् 1-2-4 में मनुष्य की ज्ञानेंद्रियों व मन के भिन्न अधिष्ठाता देवताओं का उल्लेख है अर्थात् यह उल्लेख प्रतीकात्मक स्वरूप का ही मानना चाहिये। 

शरीर विज्ञान के अंतर्गत मस्तिष्क के भिन्न केंद्रों के आविष्कार से ज्ञात हुआ है कि किस तरह ये केंद्र ज्ञानेंद्रियों व शारीरिक क्रियाओं को संचालित करते हैं व उसी के समान यह अधिष्ठाता देवताओं की वैदिक कल्पना है। स्वतन्त्र होते हुए भी ये संचालन केन्द्र किसी सार्वभौमिक सत्ता के अधीन जैसे एक-दूसरे के कार्य को सकारात्मक या नकारात्मक रूप में प्रभावित करते रहते हैं। 

बाह्य व्यवहार के समान मनुष्य के अंतर्मन की गतिविधियाँ भी समग्र रूप से होती है। अतः वह जगत् का हो या अंतर्जगत् का हो कोई सा भी बोध पूर्णतया शरीर-मन-व्यापी होता है। अतः कर्मणा मनसा वाचा सदाचार मनुष्य का ध्येय होना चाहिये। 

आत्मिक शांति की प्राप्ति के लिये सदाचार व सदविचार इसलिये अनिवार्य है कि उससे ऐहिक जीवन के प्रति आसक्ति घटती है जो निर्गुण निराकार आत्मानुभव के मार्ग में खड़ी बहुत बड़ी बाधा होती है। आत्मिक स्वरूप का त्याग नहीं किया जा सकता। जिसका त्याग किया जा सकता है, वह आत्मिक स्वरुप न होकर केवल ऐसे विषय होते हैं जिनके प्रति ममत्वभाव बढ़ा होता है किन्तु ममत्वभाव को त्यागना भी महादुष्कर है। 

उसके लिये धर्मग्रंथों ने परोपकार, भूतदया व अपरिग्रह का महत्त्व जान कर उनका उपदेश किया है। इस तरह सदाचार द्वारा ममत्वभाव से मुक्त होकर आत्म स्वरूप का ज्ञान व परम कल्याण होता है। जर्मन दार्शनिक कांट का इस संबंध में कथन है “Let us seek happiness in others, but for ourselves perfection whether it brings us happiness or pain.”

संगीत, एवं चित्रकला व नृत्यनाटक आदि दृश्य कलाओं के समान विचार भी मूल रूप से ऐंद्रिय ज्ञान पर आधारित रचना होने से साहित्य व चिंतन भी ऐसे सशक्त माध्यम हैं जो मनुष्य की उन्नति या अवनति के कारण बन जाते हैं। अनाहत नाद व अंतर्ज्योति के समान हर मनुष्य के भीतर आत्मज्ञान अप्रत्यक्ष रूप से अंतर्निहित होता है और भौतिक संघर्ष व वैचारिक द्वयात्मक संदेहावस्था से मुक्त होकर उसे हर कोई प्राप्त कर सकता है। 

भक्तिपूर्ण संगीत व धार्मिक कलाओं के समान संतवाङ्मय य पारमार्थिक साहित्य आत्मोन्नति के मार्ग में सहायक होते हैं। ऐसे श्रेष्ठ साहित्य के पठन से मनुष्य भौतिक जगत् के सुख-दुःखों व कष्टों को भूलकर आत्माभिमुख होता है व अलौकिक आनंद को प्राप्त कर लेता है; व ऐसी स्थिति प्राप्त होते ही साहित्य का कार्य पूरा होकर उसका पठन अनावश्यक या बंधन हो जाता है। 

इस संबंध में मराठी में एक मार्मिक संतवचन है- “गुंडाळली पोथी, भीतरी लागल्या वाती” (पोथी बंद की, अब भीतर ज्ञान की ज्योति प्रकट हुई है) । दार्शनिक थोरो ने भी इसी अर्थ का विचार व्यक्त किया है, ‘When mind awakes, books are set aside as impertinent’ | 

यही आत्मिक अवस्था है- यही आत्मज्ञान है जो विचारों से पूर्णतया मुक्त होने के पश्चात् प्राप्त होता है। अतः अनाहत नाद के समान हर व्यक्ति के भीतर आत्मज्ञान भी पूर्णतया होता है किन्तु भौतिक जीवन के बहुरंगी, परिवर्तनशील व दैवाधीन स्वरूप के कारण उससे संबंधित साहित्य विविध प्रकार का होता है। 

इसके अलावा भौतिक जीवन का भ्रामक परिवर्तनशील स्वरूप व मानव स्वभाव की द्वंद्वात्मकता के कारण भौतिक जीवन से संबंधित साहित्य व ज्ञान का महत्त्व या तो मानवीय समस्याओं के अस्थायी समाधान के विचार से होता है या मनोरंजन के हेतु । 

राजनीति, अर्थशास्त्र, इतिहास, भूगोल, दर्शन, विज्ञान आदि सैद्धांतिक विषयों के ज्ञान में हुई अपूर्व वृद्धि के बावजूद युद्ध से मुक्ति व विश्वशांति के कोई चिन्ह नजर नहीं आते, आर्थिक व सामाजिक विषमता बढ़ती जा रही है, स्वार्थ, भ्रष्टाचार, अन्याय, अनीति व आतंकवाद से मानव जाति बुरी तरह ग्रस्त है। 

वैज्ञानिक प्रगति ने भयानक संहारक शस्त्र व प्रदूषण जैसी नयी विकराल समस्याओं को जन्म दिया है और यह सब दुरावस्था इसलिये है कि भौतिक विषयों के ज्ञान में मानव की विकाराधीनता को कैसे नियंत्रित किया जाये, इस मूलभूत विचार की उपेक्षा है। 

ऐसे ज्ञान से आत्मिक शांति की अपेक्षा नहीं की जा सकती जब तक ज्ञान को प्रयुक्त करने वाले मानव को सत्प्रवृत्त बनाने के लिये संस्कारों द्वारा आध्यात्मिक जीवन के प्रति उसकी रुचि पैदा नहीं की जाती। 

उपन्यास, कहानी व काव्य जैसे ललित साहित्य के रूप व भावाभिव्यक्ति के अनुसार, विविध प्रभाव होते हैं उससे आत्मिक उन्नति भी हो सकती है या अवनति भी यद्यपि बाह्यतः इसका प्रमुख सामान्य उद्देश्य मनोरंजन होता है। 

संक्षेप में अनाहत नाद, अंतज्योंति व आत्मज्ञान स्वयमेव प्रत्येक व्यक्ति के अंतर्निहित होते हैं। किन्तु बाह्य जगत् की मरीचिका से भ्रमित होकर वह शाश्वत को भूल कर अस्थायी ऐंद्रिय सुख के पीछे भागता रहता है।

नृत्य, खेल-कूद, क्रीड़ा, जिम्नास्टिक्स, कुश्ती, द्वंद्व, स्पर्धा आदि शारीरिक क्रियाओं पर निर्भर सौंदर्यपूर्ण मत्यात्मक कार्यक्रमों पर भी उपर्युक्त विचार लागू होते हैं। शरीर निर्जीव पत्थर या सूखे काष्ठ के समान नहीं होता-पूर्ण स्थिर अवस्था में भी शरीर की श्वसन, हृदयस्पंदन आदि भीतरी क्रियाएँ निरंतर लयबद्ध रूप से जारी रहती हैं। 

लय समस्त जीवन की आत्मा है। प्राणायाम करते समय श्वास रोकने पर भी आंतरिक लय अनुभव की जाती है। हृदय क्रिया पर भी नियंत्रण करने वाले योगी हैं और उनके कथनानुसार हृदयक्रिया रोकने पर भी यह आंतरिक लय (प्राण ऊर्जा) समाप्त नहीं होती क्योंकि ऊर्जा का स्वरूप ही (विज्ञान के अनुसार भी) लयात्मक है। 

समस्त विश्व में व्याप्त लयात्मक ऊर्जा शरीर के भीतर आपूर्ति होने से मनुष्य जीवित व चैतन्यपूर्ण होने का अनुभव करता है। इस निजी शरीर की लयात्मक सौंदर्यपूर्ण आंतरिक अनुभूति द्वारा ही मनुष्य विश्वव्यापी चैतन्य से एकात्मकता को प्राप्त कर ब्रह्मलीन होता है। बाह्य भौतिक जगत् सदैव अवर्णनीय लयबद्धता से गतिमान रहता है। 

बहुरंग चंचल प्रकाश किरण, किसी अनंतयात्रा पर निकले यात्री जैसे विविधाकार उतावले बादल, उछलकूद करती नदियाँ, कल-कल बहते झरने, छलांग लगाते जलप्रपात, वायु के झोंकों से दोलायमान वृक्ष, सामूहिक नृत्य करते जैसे आसमान में उड़ते पक्षी समुदाय, चारागाहों की ओर जा रहे स्वच्छंद होते हुए भी एकरूप दिखायी देनेवाले पशुओं के झुंड विद्यालय की छुट्टी की घंटी बजते ही घर की ओर भाग रहे लड़के-लड़कियाँ… हर कोई अपनी-अपनी व्यक्तिगत दिशा में गतिमान होते हुए भी समस्त प्राणीमात्र व वस्तुजगत् जैसे किसी सर्वव्यापी अज्ञात लय से अंतरसंबद्ध होकर नृत्य में लीन है सब तरफ आनंद का साम्राज्य फैला हुआ है। 

आँधी, बाढ़, भूकम्प, अग्निकांड आदि घटनाएँ भी लय से परिपूर्ण होती हैं जन्म अवस्थांतर व मृत्यु की जीवनयात्रा में भी यह लयबद्ध गतित्व दृष्टिगोचर है सुख-दुःखादि दंडों, मनः स्थितियों व विचारचक्र में भी लयबद्धता होती है कोई भी शारीरिक या मानसिक स्थिति स्थिर या लयहीन नहीं होती।

विश्व में अनुभवगम्य लयबद्धता के समरूप मनुष्य की शारीरिक गतिविधियाँ स्वाभाविक रूप से लयबद्ध होती है जब तक उनमें ‘अहं’ जनित आकांक्षा या सामाजिक मान्यता के औपचारिक प्रभाव से कृत्रिमता नहीं आती है। नन्हें शिशुओं के अवयवों की हलचल व उनके चेहरों पर दृश्य निष्कपट भाव कितने मनभावन होते हैं। 

किसी कुशल नर्तक के मुद्राविन्यास व नृत्य में भी ऐसे भाव सौंदर्य व लय की स्वाभाविक परिपूर्णता नहीं होगी। किन्तु सर्वसामान्य अनुभव होने से शिशुओं के क्रियाकलापों को कला के समान महत्त्व नहीं दिया जाता। 

मनुष्य का शरीर मोटा, दुबला, विकलांग, लम्बा, नाटय कैसा भी हो उसकी हर गतिविधि (चलना, दौड़ना, खाना, बात करना, प्यार करना, झगड़ना आदि), जब तक वह बाह्य प्रभाव से मुक्त रहती है, स्वाभाविकतया लयात्मक व सुंदर प्रतीत होगी यदि दर्शक उसे उस दृष्टि से देखेगा जैसे वह नृत्य व नाटक देखता है। 

प्रत्यक्ष जीवन के अंतर्निहित कलासदृश सौंदर्य की इस वजह से उपेक्षा होती है कि समाज उसका अभ्यस्त होता है व उसमें कोई नयापन नहीं होता। इसके अलावा यथार्थ द कल्पना में जो अंतर है उसे पार कर के प्रत्यक्ष जीवन को पृथकता भाव से विरक्त होकर देखना सामान्य व्यक्ति के लिये दुष्कर होता है।

हमारे भीतर विद्यमान लयात्मकता के कारण ही हमें नृत्य, खेलकूद, जिम्नास्टिक्स आदि गतिपूर्ण कार्यक्रमों को देखकर सौंदर्यात्मक अनुभव होता है संगीत व साहित्य के समान नृत्य भी भिन्न स्वरूप के होते हैं व आत्मोन्नति के लिये पोषक या बाधक होते हैं जहाँ भारतीय शास्त्रीय नृत्य भक्ति व आत्मिक भावना को समर्पित है वहाँ अधिकतर आधुनिक पश्चिमी नृत्य कामोत्तेजक स्वरूप के हैं। 

जिम्नास्टिक्स विशुद्ध लयात्मक सौंदर्य को समर्पित है व उसमें मानवीय भावनाओं का विचार नहीं होता। पश्चिमी उपभोगवादी संस्कृति से भारतीय नृत्यकला पर भी कामुकता, असंयम व अनर्गलता का प्रभुत्व बढ़ रहा है।

ईश्वर निर्मित शरीर तो क्या, मानव द्वारा विज्ञान की सहायता से रेलगाड़ी, हवाई जहाज, मोटरकार, पम्प, प्रेस, क्रेन आदि जो अनेक गतिशील यंत्र बनाये गये हैं वे सब लयात्मक ढंग से कार्य करते हैं और खराबी की वजह से लय टूटते ही बंद पड़ते हैं। 

भौतिक जीवन, कला व आत्मानुभव 

योगविद्या में विदेही अवस्था का वर्णन है किन्तु ऐसी अवस्था में भी जीवात्मा भौतिक जीवन से जुड़ा रहता है जब तक वह अपना नियत कर्त्तव्य पूर्ण नहीं करता। 

वैसे धार्मिक विचार से हर मनुष्य को ईश्वरीय संकल्प ‘एकोऽहं बहुस्याम’ (तैत्तिरीय) का पालन करते हुए आजीवन नियत कर्त्तव्य करते रहना चाहिये जब तक वह असमर्थ नहीं होता। इसलिये आत्महत्या करना ईश्वरीय संकल्प के विपरीत व पापकर्म माना गया है। 

जैनियों में संथारा व हिन्दुओं में देहत्याग या जलसमाधि तब धर्मसम्मत है जब मनुष्य अपना लौकिक कर्त्तव्य पूरा कर चुका होता है या ऐसा करने में असमर्थ हो जाता है। अतः महापुरुष हो, संत हो या सामान्य व्यक्ति भौतिक कर्तव्य कर्म से कोई मुक्त नहीं होता।

एक तरह से भौतिक जीवन में अनुभव कलाकार के लिये कलासर्जन की सामग्री का व समस्त प्रकृति पृष्ठभूमि का काम करते हैं। ईश्वरीय संकल्प की निर्मिति होने से भौतिक जीवन व प्रकृति सृष्टिरचना के उन्हीं नियमों से साकार, चिन्मय व परिवर्तनशील हैं जिन नियमों से सृष्टिकर्ता स्वयं प्रतिबद्ध है। 

भौतिक जीवन में दृष्टिगोचर सुख-दुःख, जन्म-मृत्यु, विविध भावनाएँ, द्वंद्वात्मकता आदि नियमों को हम प्रकृति के दिन-रात, ऋतुचक्र, उत्पत्ति-विनाश, विविध भावोत्पादक रूप, प्राणियों का संघर्ष व अन्योन्याश्रय, आदि परिवर्तनों में भी समान रूप से सक्रिय पाते हैं। 

बाह्यतः कला भौतिक जीवन व प्रकृति से भले ही रूप व भावाभिव्यक्ति में असमान प्रतीत होती होगी किन्तु कोई भी कलाकृति तब तक प्रभावी नहीं होती जब तक वह सृष्टि रचना के मूल तत्त्वों के आधार पर न बनायी गयी हो। 

कला प्रकृति से भिन्न इसलिये होती है कि कला कलाकार के अहं की निर्मिति होती है व उसके अहं की पूर्ति तब होती है जब निर्मित कृति प्रकृति से भिन्न प्रतीत होती है। कलाकार स्वयं सृष्टा होने की आकांक्षा करता है व केवल ईश्वर निर्मित सृष्टि की अनुकृति करने से उसे मौलिक सर्जन का आनंद नहीं मिलता। 

वैसे यह भी सही है कि प्रकृति की यथार्थ अनुकृति उसके लिये असंभव है। यदि अहं के कारण कलाकार प्रकृति से भिन्न रूप की रचना करना चाहता है तो यह भी सही है कि वह स्वयं प्रकृति का अंग व ईश्वर का अंश होने से उसी अहं के कारण ही उसे अपनी कलाकृति सफल प्रतीत नहीं होती जब तक वह प्रकृति से एकरूप होकर प्राकृतिक रचना के मूल तत्त्वों का आविष्कार कर के तद्नुसार रचना नहीं करता। 

ईश्वर निर्मित सृष्टि के कलात्मक सौंदर्य व कलाकार की कला का उससे आंतरिक संबंध के विषय में जर्मन दार्शनिक कांट के निम्नलिखित विचार मननीय हैं- “Nature is beautiful because it looks like art and art can only be called beautiful if we are, conscious of it as art while it looks like nature” ( प्रकृति सुंदर है क्योंकि वह कलाकृति जैसी दीखती है और कलाकृति को तभी सुंदर माना जा सकता है जब उसका कलाकृति जैसा बोध होते हुए वह प्रकृति जैसी प्रतीत होती है) कलाकार की दृष्टि से प्राकृतिक वातावरण, लय, सुसंवादित्व आदि रचना के मूलतत्त्वों के ज्ञान के लिये जितना उपयुक्त है उतना ही, पाखंडी मानवीय संसार से दूर होने से, चराचर के एकत्व के अनुभव के लिये व आत्मिक साधना के लिये प्रेरणादायक है जब स्वयं सृष्टिकर्ता सृष्टिनियमों से प्रतिबद्ध है तो कलाकार, जो उसी का अंश है, उन नियमों का उल्लंघन कैसे कर सकता है। 

भारतीय कल्पना के अनुसार कला के आरंभकर्ता स्वयं देवता थे शिव नृत्य के, विश्वकर्मा मूर्ति कला के व देवी सरस्वती गायन की । 

अतः चराचर सृष्टि से प्रेम व तादात्म्य के साथ किया कलासर्जन, सृष्टिरचना के मूलतत्त्वों को जानने के लिये, समस्त सृष्टि ईश्वर का साकार रूप होने से, ईश्वर के प्रति आस्था निर्माण करने के लिये की गयी साधना मात्र है। 

कलासाधना के अंतर्गत कलाकार को इस तथ्य का भी ज्ञान होता है कि भौतिक जीवन से प्रेरणा लेकर व पत्थर, मिट्टी, रंग, रेखा, शब्द, ध्वनि आदि अभिव्यंजनशील माध्यमों के जरिये निर्मित कलाकृति का केवल प्रतीकात्मक महत्व होता है कला प्रकृति व आंतरिक अनुभूति की बराबरी नहीं कर सकती। 

कला सागर के दुर्दात लहराते दृश्य रूप के समान है, संगीत उसके गर्जन के समान है तो साहित्य सागर द्वारा फेंके गये सीप मोती, समुद्री जीव व वनस्पतियों के समान है; इनसे सागर के – अस्तित्व के प्रति विश्वास तो हो जाता है किन्तु उसके वास्तविक निःशब्द, गहन व रहस्यपूर्ण अंतःस्वरूप का ज्ञान नहीं होता। 

कला, संगीत व साहित्य से जीवन के परम रहस्यात्मक सत्य के अस्तित्व के प्रति विश्वास तो पैदा किया जा सकता है किन्तु उनसे उसके आंतरिक रहस्यात्मक स्वरूप का उद्घाटन नहीं होता। 

सागर के अंतःस्वरूप के ज्ञान के लिये उसकी गहराई में प्रवेश व जीवन के रहस्यात्मक स्वरूप के ज्ञान के लिये जीवन से आत्मिक तादात्म्य अनिवार्य है। कला न केवल सगुणोपासना है बल्कि सगुण से निर्गुण को जानने के लिये की गयी भक्तिपूर्ण साधना है। भक्ति, साहित्य और कला को व्यावसायिक रूप नहीं दिया जा सकता।

भक्ति के समान, कला जब तक अंतःस्फूर्त नहीं होती तब तक वह विशुद्ध रूप में प्रकट नहीं होती। कला अर्थपूर्ण तब होती है जब उसके द्वारा साकार से निराकार का ज्ञान होता है। 

सच्चा बौद्ध बुद्ध की मूर्ति में किसी अलौकिक पुरुष का दर्शन नहीं बल्कि बुद्ध के सत्य, अहिंसा व अपरिग्रह के सारतत्त्व को पाता है व रथारूढ़ श्रीकृष्ण के चित्र में सच्चा हिन्दु निष्काम कर्मयोग की सत्यता को अनुभव करता है और श्रद्धायुक्त होता है। 

आत्मिक आनंद का एवं निर्गुण, निराकार, अनाद्यनंत, ‘अणोरणीन्महतो महीयान्’ अद्वैत- शक्ति का बोध केवल श्रद्धा व अनुभूति द्वारा हो सकता है। जड़वाद व उपभोक्ता संस्कृति से प्रभावित आधुनिक काल में कला एक व्यवसाय मात्र रह गयी है और ऐसे कलाकार इनेगिने ही होंगे जो सच्चे दिल से अपनी कला द्वारा आत्मिक जीवन के प्रति आस्था जागृत करने के लिये प्रयत्नशील होंगे ।

आत्मानुभव  

आत्मानुभव का शब्दों में वर्णन कदापि नहीं किया जा सकता किन्तु उससे संबंधित कुछ तो लिखा जा सकता है जिससे उसके अस्तित्व के प्रति विश्वास उत्पन्न किया जा सके। आत्मानुभव कोई कल्पना की उड़ान या वैज्ञानिक आविष्कार नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति प्रच्छन्न रूप में उसे अनुभव करता है, आत्मा को कोई माने या न माने। 

त्रिपुरारहस्य (ज्ञानखण्ड) में स्पष्ट रूप से लिखा है कि

  • (1) निद्रा व जागृति की मध्य अवस्था में
  • (2) चित्त का एक विषय को छोड़ कर दूसरे विषय की ओर बढ़ने से पूर्व
  • (3) व वृत्ति का किसी विषय पर ध्यान देने से पूर्व जो अवस्थाएँ होती हैं वे सब आत्मिक अवस्थाएँ होती हैं। 

तीव्र दुःख की अनपेक्षित घटना के आघात से उत्पन्न स्थिति एवं अपार आनंद के क्षण में उत्पन्न स्थिति कलासर्जन व खेलकूद में तादात्म्य, दूसरों के लिये किये त्याग व बलिदान, घनघोर युद्ध के क्षण, सब आत्मिक स्वरूप के अनुभव होते हैं जब भौतिक जीवन का विस्मरण होता है- गीता के निष्काम कर्मयोग का यही अभिप्राय है। 

जिस तरह परमाणविक रचना, चलचित्रपट की चित्रमालिका एवं हृद्स्पंदनों ब जल लहरियों के बीच-बीच अंतराल होते हैं उसी तरह विचार करना, देखना, सुनना, चलना, काम करना आदि समस्त मानसिक व शारीरिक क्रियाओं के बीच-बीच भी क्षणिक अन्तराल होते हैं और यह

अंतरालीय स्थिति आत्मिक स्वरूप की होती है। कोई भी मानसिक या शारीरिक क्रिया अखण्ड नहीं होती। समय का बोध भी इन क्रियाओं से सापेक्ष होने से समय भी निरंतर नहीं होता। संक्षेप में निरंतरता, परब्रह य आत्मानुभव सब अव्यक्त अनुभव होते हैं। 

किन्तु एक विषय के चिंतन को छोड़ कर दूसरे विषय के चिन्तन को आरंभ होने के मध्य की आत्मिक स्थिति में से गुजरने से मनुष्य विषयज् विकल्पों से मुक्त नहीं होता व उसकी आसक्ति कम नहीं होती। अर्थात् यह स्थिति संतों को उपलब्ध निर्विकल्प समाधि नहीं होती जिसके लिये अज्ञान व विषयासक्ति से मुक्त होना आवश्यक है। 

अज्ञान से देह व दैहिक विषयों के प्रति ममत्व पैदा होता है व जब तक अज्ञान का निवारण नहीं होता तब तक ज्ञानपूर्वक आत्मानुभव नहीं होता। इसलिये अन्न पुरुषों को भी अनजाने संमाधिसदृश क्षणों को भोगने के बावजूद लाभ नहीं होता व उनके मन में उन क्षणों के बाद विकल्प आते रहते हैं।

अन्य कार्यों की अपेक्षा संगीत, दृश्य कलाओं व साहित्य के सर्जन में एवं रस लेने में तादात्म्य के क्षण सुलभ होने से आत्मानुभव की प्राप्ति के लिये ये सबसे उपयुक्त साधने हैं। किन्तु इसके लिये सर्जन व रसग्रहण लक्ष्यपूर्वक होना चाहिये सामान्य अनुभव यही दर्शाता है कि सर्जन व रसास्वादन के तुरन्त बाद मन में फिर से विकल्प पैदा होते हैं व रसिक व कलाकार को तादात्म्य के सच्चे आत्मिक स्वरूप का ज्ञान नहीं होता। 

जिसे रत्नपरीक्षा का ज्ञान नहीं है उसके सामने बहुमूल्य रत्न रखने पर जैसे वह उसे नहीं पहचान पाता उसी तरह की यह बात है। उसके लिये असली व नकली रत्न एक समान होते हैं। अतः कला द्वारा आत्मानुभव के जो क्षण प्राप्त होते हैं वे टिक नहीं पाते व आस्थाहीन कलाकार आसक्ति से मुक्त नहीं होते। 

इसलिये आत्मानुभव के ध्येय को समर्पित कला ही लक्ष्य प्राप्ति में सफल हो सकती है। हर प्रकार की कला से यह संभव नहीं है। जीवन की विकृतियों के चित्रण के उद्देश्य से निर्मित अधिकतर आधुनिक कला से तो इसके विपरीत ही परिणाम नजर आयेंगे। 

अज्ञान व विषयासक्ति से मुक्त होने के साधन है सत्संग, सद्ग्रंथ, सदाचार व धर्म को समर्पित कला, और ये सब सगुणोपासना के अतर्निहित हैं। समस्त सृष्टि ईश्वर का सगुण रूप होने से सगुणोपासना को त्याज्य नहीं माना जा सकता। इतना भी नहीं, बल्कि सर्वसाधारण के लिये उपासना का आरंभ सगुणोपासना से किया जाना अनिवार्य है। 

कोई भी धर्म उससे बच नहीं पाया है। ईसा, बुद्ध व महावीर की मूर्तियों की पूजा एवं ग्रंथ साहब व कुरान जैसे धार्मिक ग्रंथों का पूजापाठ व श्रवण सगुणोपासना ही है। शब्द भी सगुण होते हैं। इस तरह साधना करने के पश्चात् ही श्रद्धा व तदुपरान्त निर्विकल्प आत्मानुभव या समाधि संभव है। 

चित्र व मूर्ति के समान शब्द भी शब्दातीत अव्यक्त सत्य का मूर्त रूप हैं- सत्य नहीं। अतः मूर्तिपूजा, संगीत, भजन, पूजापाठ व श्रवण में कोई भेद नहीं है- एक दृश्य रूप है तो दूसरा श्रव्य रूप शब्दों का भी अनुभवहीन अंधविश्वास व्यर्थ है।

सृष्टि की उत्पत्ति व संचालन के लिये ईश्वर विधाता, रक्षक व संहारक शक्तियों के साथ पंचमहाभूतों के रूप में प्रकट हुआ है। अतः बहुदेववाद के अंतर्गत ईश्वर की तीनों शक्तियों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) व उसके प्रकट विविध प्राकृतिक रूपों की प्रतीकात्मक उपासना ग्रहणीय कैसे मान सकते हैं। 

भोजन व जीवन में भी हम किसी एक ही रस से कहाँ तृप्त होते हैं। एकेश्वरवाद केवल उपासना की अंतिम परिणति के एकात्म स्वरूप का स्मरण दिलाने के लिये है। ईश्वर की तीनों शक्तियों को हम जब तक समान रूप से स्वीकार नहीं कर सकते तब तक उसके एकात्म परमानंद स्वरूप का बोध नहीं हो सकता। 

वैसे समस्त जीवन ही सगुणोपासना हो जाता है यदि उसे आस्था के साथ व्यतीत किया जाये। अतः मनुष्य का हर कर्म (कलासर्जन हो या और कोई) आस्था को जागृत करने के उद्देश्य से किया जाना चाहिये ।

उपर्युक्त दृष्टि से वर्तमान सामाजिक परिस्थिति नितान्त निराशाजनक है आस्थाहीनता, कामोत्तेजक कला, अश्लील साहित्य, आधुनिक विज्ञान द्वारा आविष्कृत उपभोग के साधनों का सम्मोहक आकर्षण, व्यक्तिगत स्वार्थ, भ्रष्टाचार आदि तत्त्वों ने सामाजिक वातावरण व मानसिकता में अनेक विकृतियाँ पैदा की है।

कला का मूल व्यापक अर्थ

आजकल जिस अर्थ से कला (art) व कारीगरी (craft) शब्दों का प्रयोग किया जाता है उसी अर्थ से वेदों, ब्राह्मणों, स्मृतियों व धर्मसूत्रों आदि प्राचीन ग्रंथों में ‘कारु’ शब्द का प्रयोग किया गया है। कलाकारों, कारीगरों व कवियों को कारु या कारुक कहते थे। 

बृहस्पति स्मृति व मनुस्मृति में काराक के अलावा शिल्पी शब्द का भी समानार्थी प्रयोग है। यजुर्वेद य तैत्तिरीय ब्राह्मण में अनेक कारीगरों का उल्लेख है जिससे स्पष्ट होता है कि उस काल में कुशलता से किये जाने वाले हर कार्य को कारु मानते थे। पाणिनी के काल तक ‘कारु’ व शिल्प पर्यायवाची शब्द थे। 

तत्कालीन ग्रंथों में कला शब्द का प्रयोग ‘समय का एक माप’ इस अर्थ से भी किया है किन्तु ललितकला के लिये नहीं कला शब्द का प्रयोग शिल्प (art) अर्थ से प्रथमतः कौटल्येय अर्थशास्त्र में किया गया है किन्तु साथ में कारीगरी अर्थ से भी इसका प्रयोग किया गया है। 

शुक्रनीतिसार में वाणी से किये जाने वाले कर्म को विद्या व गूँगा भी जो कर सकता है उसे कला संज्ञा दी है- ‘शक्तो मूकोऽपि यत्कर्तुं कलासंज्ञं तु तत्स्मृतम्’ । शुक्रनीतिसार, भागवतपुराण, महाभारत, कामसूत्र आदि ग्रंथों में कलाओं की जो सूचियाँ दी गयी हैं उनसे स्पष्ट है कि उस काल में कुशलतापूर्वक किये जाने वाले हर कार्य को कला मानते थे यानी मनुष्य द्वारा की गयी हर कृति कला थी यदि वह कुशलता का प्रमाण थी। 

तैत्तिरीय ब्राह्मण पर की गयी टीका में सायणाचार्य ने ‘कारु’ का स्पष्टीकरण किया है ‘कारू स्वयं कर्तारौ (स्वयं काम करनेवाले)। उन्होंने यह भी लिखा है ‘शिल्पं कर्म कौशलम्’। पूजा में पढ़े जाने वाले शंसनात्मक गायन को भी शिल्प कहते थे। 

कौटल्ये य अर्थशास्त्र में स्तोत्र, नृत्य, गीत, वादन को भी शिल्प कहा गया है। विश्वकर्मा शिल्पियों का आदर्श है ऐसा रामायण में उल्लेख है- ‘विश्वकर्माणं शिल्पिनां वरमव्ययम्’ । कुट्टनीमत में कलाकारों को उपदेश किया है- ‘ दर्शयितु निजशिल्पं वर्णकमिव विश्वकर्मणा विहितम्’ (विश्वकर्मा का अपनी कृति में अनुसरण करो ) ।

उपर्युक्त अनुच्छेद में उल्लिखित अधिकतर संदर्भ संस्कृत के विद्वान प्रो. डॉ. रा. शं. वाळिंबे के ग्रंथ ‘प्राचीन भारतीय कला’ से लिये गये हैं। इनसे भारतीय दार्शनिक का कला के प्रति अतिव्यापक व सूक्ष्म दृष्टिकोण स्पष्ट होता है- उनकी मान्यता के अनुसार हर व्यक्ति कलाकार है। 

इसके साथ उनका उपदेश ‘कलाकर्म में विश्वकर्मा का अनुसरण करो’ से प्रतीत होता है कि उनकी मान्यता थी कि सृष्टि रचना के अंतर्गत मूलतत्त्वों के अनुसार तादात्म्य के साथ की गयी रचना ही कला के स्तर को प्राप्त करती है। तादात्म्य से निर्मित कृति सत्य, सुंदर व शिव होती है तो बिना तादात्म्य के निर्मित कृति भ्रामक, असुंदर व अहितकर।

किन्तु प्रश्नोपनिषद् (6/ 2-3-4 ) में परमेश्वर के प्रकट स्वरूप सृष्टि रचना के सोलह मूलतत्त्वों का उल्लेख किया गया है उनको सोलह कलाएँ कहा गया है। इस प्रकार पाणिनी के पूर्वकाल में उपनिषद् में भी व्यापक अर्थ से कला शब्द का प्रयोग हुआ है। 

उपनिषद् के अनुसार सृष्टिरचना की ये कलाएँ हैं- प्राण (आत्मा), श्रद्धा (आस्तिक बुद्धि), 5 पंचमहाभूत (शरीर), मन, इन्द्रियाँ (5 ज्ञानेंद्रियाँ व 5 कर्मेद्रियाँ), अन्न (संधारण), तप (संयम), दीर्य (बल), मंत्र ( आचार संहिता), कर्म (कर्तव्य), लोक (समाज), नाम ( ॐ मूर्तरूप ) ।

सृष्टिरचना की उपर्युक्त वैदिक व्याख्या व सृष्टिरचना से कलाकर्म की समरूपता की ओर ध्यान आकर्षित होकर ही भारतीय पण्डितों ने मानवनिर्मित कौशलपूर्ण कार्य को कला कहना आरंभ किया होगा कुछ भी हो, प्रश्नोपनिषद् में उद्धृत रचना के मूलतत्त्वों की चिकित्सा की पाश्चात्य विद्वानों द्वारा की गयी सर्जन क्रिया संबंधी चिकित्सा से तुलना करते हैं तो प्राचीन भारतीय चिंतकों की स्थिरबुद्धि व अंतर्भेदी सूक्ष्मदृष्टि के प्रति सादर आश्चर्य होता है। 

प्रश्नोपनिषद् (62) की पंक्ति “इहैवान्तः शरीरे सोम्य स पुरुषो यस्मिन्नेताः षोडशः कलाः प्रभवन्तीति” (इस शरीर के भीतर ही वह परमपुरुष हैं जिनसे सोलह कलाएँ मूलतत्त्व-प्रकट होती हैं) से पूर्वोक्त धारणा की पुष्टि होती है कि “कला मनुष्य के भीतर ही विद्यमान होती है द हर कोई कलाकार होता है” प्रश्नोपनिषद् का मंत्र (6/5) विशेष उल्लेखनीय है- स यथेमा नद्यः… एषोऽकलोऽमृतो भवति तदेष श्लोकः’। 

इसमें प्रतिपादित किया गया है कि जिस तरह नदियाँ अन्त में सागर में विलीन होती हैं उस तरह प्रलयकाल में यानी जब मानवजाति का विनाश निकट आता है तब श्रद्धा, तप मंत्र, कर्म, नाम वगैरह कलाएँ परमपुरुष के स्वरूप में तदाकार (विलीन) होती हैं व परमपुरुष का कोई संकल्प शेष नहीं रहता और वह अपनी मूल अकल (कलाविहीन) अमर अवस्था को प्राप्त कर लेता है।

वर्तमान मानव जीवन व कला के संदर्भ में प्रलयकाल के उपर्युक्त लक्षणों का विचार करते हैं तो मन आशंकित होता कि क्या अब मानवजाति विनाशकाल की ओर अग्रसर तो नहीं हो रही है। 

मानव का हर कार्य कला है इस तथ्य को सम्मुख रखकर, मानव जीवन के संदर्भ में विचार करते हैं तो हम देखते हैं कि अब न तो आत्मिक जीवन के प्रति विश्वास रहा है न ईश्वरीय अस्तित्व में संयम, सदाचरण व निस्स्वार्थ समाजसेवा की भावना का पूर्णतया लोप हो गया है व व्यक्तिगत स्वार्थ व उपभोगवाद मानव जीवन के ध्येय बन गये हैं। 

कला के संदर्भ में विचार करते हैं तो आधुनिक कला -के अध्येताओं को हैरत में डालने वाली समान बात सामने आती है कि उपर्युक्त कारण समुच्चय से ही 20वीं सदी की आधुनिक कला की विकासयात्रा भी जड़ सौंदर्य को समर्पित पाववाद धनवाद व वस्तुनिरपेक्षवाद (abstract art) से आरंभ होकर अब अकलात्मक (anti-art) कार्यक्रमों तक पहुंची है। यानी कला को नष्ट करने के उद्देश्य से आयोजित कार्यक्रमों ने कला को अकला बना दिया है।

सचमुच, वैदिक चिंतक महान ज्ञाता व भविष्यवेत्ता थे जिन्हों ने अंतःप्रज्ञा से शाश्वत सत्य के नियमों को खोज कर प्रतिपादित किया जो वर्तमान परिस्थिति में ठीक से लागू होता है।

आधुनिक कला के अंतर्गत प्रत्ययवाद के कुछ विचार प्राचीन भारतीय चिंतकों के कला के प्रति दृष्टिकोण से मिलते-जुलते हैं, जैसे “समस्त जीवन कलात्मकता से परिपूर्ण है”, ‘कलाकृतियों का उस तरह निर्माण होना चाहिये जिस तरह हम दैनंदिन जीवन में दुनिया को रूप देते हैं’, ‘कला आंतरिक अनुभूति मात्र है।’ 

कला के संबंध में महात्मा गाँधी के विचार भी चिंतनीय है- ‘जो कला आत्मा को आत्मदर्शन करने की शिक्षा नहीं देती वह कला ही नहीं है’, ‘मेरा जीवन पर्याप्त मात्रा में कलात्मक है यद्यपि आपको मेरे आसपास कोई कलाकृति नहीं दिखायी देगी’, ‘सच्ची कला कलाकार के अंतरंग की पवित्रता व सुख-शांति का प्रमाण होना चाहिये’।

अन्त में, मानव जीवन यज्ञकर्म के समान व कला अर्पण के समान है जिसका अन्तिम लक्ष्य है, आत्मानुभव और इस लक्ष्य प्राप्ति के लिये शरीर का क्षेत्र के रूप में होना जितना आवश्यक है, उतना ही कला का कर्तव्य कर्म के रूप में होना अनिवार्य है, क्योंकि कला वस्तुतः एक जीवन पद्धति मात्र है।

Note: 

उल्लेखनीय है कि संत कबीर ने अपने भजनों में ‘अश्रव्य नाद ब्रह्म’ के लिए ‘अनहद’ शब्द का प्रयोग किया है व यह शब्द भी प्राकृत हिंदी के रूप में प्रचलित है।

‘अनाहत’ शब्द संस्कृत भाषा का शब्द है व इसका प्रयोग विद्वान संगीतज्ञ स्व. पंडित विष्णु नारायण भातखण्डे व कुछ अन्य संगीतज्ञों ने अपने संगीत के सैद्धांतिक स्वरूप के लेखन में किया है।

Leave a Comment

15 Best Heart Touching Quotes 5 best ever jokes