भारतीय पुनरुत्थान कालीन चित्रकला | बंगाल स्कूल | Indian Renaissance Painting

बंगाल में पुनरुत्थान

19 वीं शती के अन्त में अंग्रजों ने भारतीय जनता को उसकी सास्कृतिक विरासत से विमुख करके अंग्रेजी सभ्यता सिखाने की चेष्टा की अंग्रेजों ने भारतीय कला की भी कटु आलोचना की। 

बर्डवुड नामक एक अंग्रेज अधिकारी ने प्राचीन बौद्ध प्रतिमाओं की तीखी समालोचना करते हुए कहा था कि ‘एक उबला हुआ चर्बी से बना पकवान भी आत्मा की उत्कट निर्मलता तथा स्थिरता के प्रतीक का काम दे सकता है।’ 

जिन यूरोपियनों को भारत से थोड़ी भी सहानुभूति थी उन्होंने श्रेष्ठ भारतीय मूर्तियों पर यूनानी प्रभाव बताया। 

इन परिस्थितियों को देखते हुए रवीन्द्रनाथ ठाकुर तथा देशबन्धु चित्तरंजन दास आदि ने भारतीय जनता को उद्बोधित करने का प्रयत्न किया।

सन् 1884 ई० में श्री ई० बी० हैवेल मद्रास कला विद्यालय के प्रधानाचार्य बने। भारत में कॉंग्रेस की स्थापना होने से जागृति की कुछ लहर आई । हैवेल ने भी इसमें योग दिया। 

1866 ई० में उन्होंने संसार भर का ध्यान भारत की चित्रकला की ओर आकर्षित किया। उन्होंने कहा कि यूरोपीय कला तो केवल सांसारिक वस्तुओं का ज्ञान कराती है पर भारतीय कला सर्वव्यापी, अमर तथा अपार है कुछ समय पश्चात् बे कलकत्ता कला-विद्यालय के प्रिन्सिपल भने यहाँ उनके सम्पर्क में अवनीन्द्रनाथ ठाकुर आये जिन्होंने आगे चलकर पुनरुत्थान का सूत्रपात किया अवनी बाबू की कला पर पश्चिमी (यूरोपीय), ईरानी, चीनी, जापानी, मुगल, राजपूत तथा अजन्ता का प्रभाव था। 

अतः इन सबके समन्वय से उन्होंने नयी कला का आरम्भ किया। 1905 ई० में अवनी बाबू कलकत्ता आर्ट स्कूल के प्रिंसिपल नियुक्त किये गये। 

वहाँ उन्होंने अनेक शिष्य तैयार किए जो देश के विभिन्न भागों में फैले और कला का प्रचार करने लगे। नन्दलाल बसु, असित कुमार हाल्दार, क्षितीन्द्रनाथ, मजूमदार, समरेन्द्रनाथ गुप्त, देवी प्रसाद रायचौधुरी तथा उकीलबन्धु इनमें प्रमुख थे। 

व्यक्तिगत विशेषतायें होते हुए भी सब पर अवनी बाबू का प्रभाव था। बंगाल के गवर्नर सर कारमाइकेल तथा लार्ड रोनाल्डशे ने इस आन्दोलन की सब प्रकार सहायता की। 

1907 ई० में “इण्डियन सोसाइटी आफ ओरिएण्टल आर्ट” की स्थापना हुई। लार्ड किर्चनर इसके सभापति तथा जान वुडराफ, अवनीन्द्रनाथ ठाकुर, गगनेन्द्रनाथ ठाकुर, जस्टिस रेम्पिनी, महाराजा जगदीन्द्रनाथ, सुरेन्द्रनाथ ठाकुर, समरेन्द्र नाथ ठाकुर तथा जैमिनी प्रकाश गाँगुली आदि इसके आरम्भिक सदस्य थे। 

इस सोसाइटी का मुख्य कार्य व्याख्यानों, प्रदर्शनियों तथा प्रकाशनों द्वारा पूर्वी कला का प्रचार-प्रसार करना था। 

सन् 1919 ई० में “रूपम्” नामक पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ हुआ तथा भारतीय परम्परागत कला की शिक्षा के लिये अवनीन्द्रनाथ, गगनेन्द्रनाथ, नन्दलाल बसु और क्षितीन्द्रनाथ ने इसकी कक्षाएँ चलाई। 

इस संस्था की प्रथम प्रदर्शनी में अवनीन्द्र नाथ ठाकुर, गगनेन्द्रनाथ ठाकुर, नन्दलाल बसु. सुरेन्द्र नाथ गांगुली, असित कुमार हाल्दार तथा के० वेंकटप्पा ने भाग लिया। 

धीरे-धीरे पदर्शनियों में भाग लेने वाले कलाकारों की संख्या बढ़ती चली गयी। ई० बी० हैवेल, पर्सी ब्राउन, आनन्द कॅटिश कुमारस्वामी आदि ने भी इस संस्था को भरपूर सहयोग दिया। 

अर्धेन्दुचन्द्र गांगुली (ओ०सी० गांगुली) ने ‘रूपम्’ का सम्पादन किया और कुमारस्वामी ने अपनी पैनी लेखनी से पाश्चात्य कला की कमियाँ बताते हुए पूर्वी कला की विशेषताओं का उद्घाटन किया। 

ओ० सी० गांगुली तथा थियोसोफीकल सोसाइटी के जेम्स एच० कजिन ने विश्व भर में इसके समर्थन में लेख लिखे और चल प्रदर्शनियों तथा व्याख्यानों का आयोजन किया। 

एन० सी० मेहता, आर० एम० रावल, स्टेला क्रामरिश तथा कार्ल खण्डालावाला आदि ने भी इसमें सहयोग दिया। फ्रांस, जर्मनी तथा अन्य देशों में इस शैली की प्रदर्शनियाँ आयोजित की गयीं। 

अवनीन्द्रनाथ ने भी भारत शिल्प के षडंग तथा अल्पना आदि पुस्तकें लिखकर भारतीय कला का प्रचार किया। जापान के सुप्रसिद्ध कलाविद् तथा दार्शनिक विचारक ओकाकुरा 1902 में भारत आये थे वे पूर्वी कला के विकास के पक्षपाती थे और पूर्वी देशों के उन कलाकारों के तीव्र आलोचक थे जो पश्चिमी कला की नकल कर रहे थे। 

1903 ई० में उनकी पुस्तक “आइडियल्स आफ द ईस्ट” प्रकाशित हुई। अवनी बाबू भी काउण्ट ओकाकुरा के सम्पर्क में आये और भारतीय कला के पुनरुत्थान के कार्य में प्राण-पण से लग गये। 

दो जापानी चित्रकार याकोहामा ताइक्वान और हिशिदा भी भारत आये और लगभग दो वर्ष तक अवनी बाबू के साथ रहे। 

अवनी बाबू ने उनसे चीनी- जापानी चित्रकला पद्धति सीखने के साथ-साथ अन्य कलाकारों से फारसी, तिब्बती, जावा तथा स्याम की कला शैलियों का ज्ञान भी प्राप्त किया और एक नवीन तकनीक का विकास किया जिसे “बंगाल शैली” अथवा “ठाकुर शैली” कहा जाता है अवनीन्द्रनाथ ठाकुर के इन प्रयत्नों का सर्वत्र स्वागत हुआ और लन्दन की इण्डिया सोसाइटी ने अजन्ता के चित्रों के अनुकृति के लिये लेडी हेरिंघम की अध्यक्षता में जो दल भारत भेजा था उसमें अवनीन्द्रनाथ ठाकुर के शिष्यों, नन्दलाल बसु, असित कुमार हाल्दार, समरेन्द्रनाथ गुप्त तथा वेंकटप्पा को भी आमन्त्रित किया गया। 

ई० बी० हेवेल ने बंगाल की लोक पट चित्रकला के साथ-साथ भारतीय कला पर “आइडियल्स आफ इण्डियन आर्ट”, “इण्डियन पेण्टिंग एण्ड स्कल्पचर”, “दी बंगाल पट” तथा “अजन्ता फ्रेस्कोज आदि पुस्तकें लिखीं। 

सभी प्रकार के प्रयोग किये गये जिनमें नन्दलाल बसु तथा असित कुमार हाल्दार अवनी बाबू के प्रमुख सहायक थे। काष्ठ, रेशम तथा भित्ति पर भी चित्रण किया गया।

बंगाल शैली की विशेषताएँ

(1) इस शैली की प्रेरणा के प्रधान स्रोत अजन्ता, मुगल तथा राजस्थानी चित्र थे। जापान, चीन, ईरान तथा यूरोप की कला का भी अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव पड़ा था 

(2) इस शैली में सरलता, स्पष्टता तथा स्वाभविकता है। नियमों का इसमें इतना लचीलापन है कि इसका प्रत्येक चित्रकार पृथक् विशेषताओं का विकास कर सका है। 

(3) कोमल तथा गतिपूर्ण रेखांकन में इसके चित्रकारों ने भारत की प्राचीन चित्रकला तक पहुँचने का प्रयत्न किया है। 

(4) शरीर रचना के नियमों में प्राचीन सामान्य पात्र-विधान का पालन किया गया है। 

(5) रंग योजना कोमल और सामंजस्यपूर्ण है। जल-रंगों का प्रयोग हुआ है जिन्हें कुछ चित्रकारों ने वाश पद्धति से भरा है। टेम्परा रंगों का भी प्रयोग हुआ है। 

(6) प्रायः प्राचीन ऐतिहासिक, पौराणिक एवं साहित्यिक विषयों का चित्रण हुआ है तथा सामयिक भारतीय घरेलू जीवन के भी कुछ चित्र बने हैं; किन्तु तत्कालीन राजनीतिक वातावरण का इस पर तनिक भी प्रभाव नहीं है।

इस शैली का प्रादुर्भाव स्वतन्त्रता आन्दोलन के रूप में हुआ था। आरम्भ में तो इसका सर्वत्र विरोध हुआ क्योंकि लोगों ने समझा कि यूरोपीय संस्कृति की अच्छी बातों के प्रचार से भारत की उन्नति हो सकती है उसमें यह रोड़ा अटकाएगी; किन्तु आन्दोलन में भाग लेने वाले कलाकार तथा कला-आलोचक दृढ़ता से अपने मार्ग पर बढ़ते रहे और अन्त में देश भर में अपना प्रभाव फैलाने में सफल हुए। 

भारत के बाहर भी इनके चित्रों की प्रदर्शनियों आयोजित की गयीं और उनके कारण यूरोपीय आलोचकों का मत भी भारतीय कला के प्रति कुछ उदार हो गया। 

पुनरुत्थान काल के इस आन्दोलन का वास्तविक महत्व और स्वरूप जनता को समझाने में डा० जेम्स, श्री हैवेल, डा० स्टैला क्रामरिश, डा० आनन्द कुमारस्वामी, श्री एन० सी० मेहता, श्री असित कुमार हाल्दार तथा श्री ओ० सी० गांगुली आदि ने बहुत प्रयत्न किया। 

इस आन्दोलन से भारतीयों में राष्ट्रीय शैली का विचार पनपा । यद्यपि आगे चलकर इसका हास हो गया और कलाकारों ने अपने-अपने व्यक्तिगत मार्गों पर बढ़ना आरम्भ कर दिया परन्तु जैसे राजनीतिक दृष्टि से कॉंग्रेस का राष्ट्रीय महत्व है वैसे ही कला के क्षेत्र में बंगाल स्कूल का महत्व है। 

इस नव-जागृति को अग्रसर करने में अवनीन्द्रनाथ का योग कलाकार के रूप में, बल्कि मुख्यतया एक शिक्षक तथा गुरु के रूप में रहा है। 

उन्होंने अपने शिष्यों की प्रतिभा के विकास में कभी भी रुकावट नहीं डाली उनके शिष्य शान्ति निकेतन, लखनऊ, जयपुर, मद्रास तथा लाहौर आदि के कला-विद्यालयों के प्रिंसिपल बने

बंगाल शैली की कमियाँ

इस शैली में अनेक घटिया चित्रों का निर्माण हुआ। प्राचीन कला से प्रेरणा का दावा करते हुए भी यह प्राचीन परम्परा की निष्प्राण अनुकृति रह गई। 

संयोजन, रंग योजना, भावों की उदात्तत्ता तथा चित्रण-विधि आदि में किसी भी पुरानी बात को नहीं अपनाया गया। 

इस शैली में जो कुछ बनाया गया वह परिणामहीन अनुकृति मात्र था पतली बाँहें, लम्बी उँगलियाँ, अधखुली आँखें और घुले रंग- यह सब प्राचीन कला का उपहास नहीं तो क्या था? 

आलोचकों ने यह भी कहा है कि इन चित्रकारों में कोरी भावुकता, दुर्बल रेखांकन, आधुनिक जीवन से पलायन, धूमिल रंग योजना तथापूर्व और पश्चिम की विभिन्न शैलियों की केवल एक घण्डचीथ है। 

ये सभी बातें अंशतः ठीक हैं किन्तु इस शैली की केवल घटिया कृतियों पर ही लागू होती हैं। अवनीन्द्रनाथ, गगनेन्द्रनाथ, नन्दलाल बसु, वेंकटप्पा आदि के ऐसे अनेक चित्र हैं जो विदेशों में भी सम्मानित हुए हैं। 

इस शैली में जो कमियों थीं, उनके कारणों को लक्ष्य करके अपनी बाबू ने कहा था, “हम भारत वासी वस्तुओं को केवल अपने ही भावों से चित्रित करते हैं। हम प्रसन्न नहीं हैं, क्योंकि भारत में मुस्कान नहीं। 

हमारी आत्माओं में अन्धकार है, क्योंकि हम स्वतन्त्र नहीं”। इस प्रकार इस शैली की कमजोरियों का वास्तविक कारण यही था कि भारत के पढ़े-लिखे लोग अंग्रेजी कला और संस्कृति से अत्यधिक प्रभावित थे और उनकी दृष्टि में भारत के अतीत काल के पास उन्हें प्रेरित करने के लिए कोई सन्देश नहीं रह गया था। 

ऐसी कठिन परिस्थिति में विरोधों का सामना करते हुए अवनी बाबू ने राष्ट्रीय विचारधारा को आगे बढ़ाया यह सचमुच साहस का कार्य था। 

डा० आनन्द कुमारस्वामी ने इसे आश्चर्यजनक कार्य बताया है। बंगाल कला आन्दोलन की मूल भावना प्राचीन भारतीय कला की ओर प्रत्यावर्तन की नहीं थी इसीलिये बंगाल के कलाकारों ने प्राचीन भारतीय कला की अनुकृति नहीं की। 

उन्होंने उसे एशिया के बीसवीं शताब्दी के वातावरण के अनुरूप नवीन रूप देने का प्रयत्न किया। 

उनके विचार से पुनर्जागरण का यह प्रयत्न उसी प्रकार का था जैसा कि इटली के पुनरुत्थान-कालीन कलाकारों ने पन्द्रहवीं तथा सोलहवीं शताब्दियों में किया था। 

उन्होंने भी यूनान की प्राचीन कला की अनुकृति न करके केवल उसकी मूल भावना को लिया था।’ अतः इसे बंगाल शैली न कहकर पुनरुत्थान कहना चाहिये जैसा कि इसकी विविध शैलियों से स्पष्ट है।

बंगाल स्कूल की परम्परा तीन पीढ़ियों में फैली मिलती है किन्तु समय की गति के साथ उसके आधार को ऐसी ठेस लगी कि वह संभल न सका और अवनीन्द्रनाथ ठाकुर ने उसकी छिन्नमुखी प्रवृत्ति अपने जीवन काल में ही देख ली।

पुनरुत्थान काल के प्रमुख चित्रकार

अवनीन्द्रनाथ ठाकुर (1871-1951)

अवनीन्द्रनाथ ठाकुर
अवनीन्द्रनाथ ठाकुर

आधुनिक भारतीय चित्रकला आन्दोलन के प्रथम वैतालिक श्री अवनीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म जोडासको नामक स्थान पर सन् 1871 में जन्माष्टमी के दिन हुआ था। 

आपका पूरा परिवार ही कलात्मक रुचि का था। घर में देश-विदेश के बड़े कलाकार आते-जाते रहते थे, अतः बाल्यावस्था से ही इन पर इसका प्रभाव पड़ा। 

आरम्भिक शिक्षा प्राप्त करने की अवधि में ही 1881- 1890 के मध्य आपने संस्कृत कालेज में अध्ययन किया जिससे आपके मन में प्राचीन संस्कृति एवं साहित्य के प्रति जिज्ञासा तथा श्रद्धा उत्पन्न हुई। 

तदुपरान्त आपने साहित्य, संगीत एवं चित्रकला का अध्ययन एवं अभ्यास आरम्भ कर दिया आपको भारतीयों की अपने 1 प्रति हीन भावना बुरी लगी। 

फिर भी तत्कालीन प्रचलित प्रथा के अनुसार आपको दो विदेशी कलांविदों से कला की शिक्षा लेनी पड़ी। 

इनमें एक तो इटली के प्रसिद्ध कलाकार सिनोर गिलहार्डी थे तथा दूसरे एक यूरोपीय चार्ल्स एल० पामर थे। सतत् अभ्यास करते रहने पर और यूरोपीय शैली में कुछ सुन्दर चित्र बना लेने पर भी उन्हें सन्तोष नहीं हुआ। 

उनकी इच्छा बराबर अपनी आन्तरिक अनुभूतियों को व्यक्त करने की बनी रहती थी। अवनी बाबू जब किशोर ही थे तब एक बार राजा रवि वर्मा भी उनके घर आये थे और उन्होंने बालक अवनीन्द्रनाथ द्वारा बनाये गये चित्रों की प्रशंसा की थी। 

इस प्रकार बाद में अपने अन्तिम समय में भी राजा रवि वर्मा ने अवनी बाबू के ‘शाहजहाँ के अन्तिम दिन” शीर्षक चित्र की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी मन्धन के इन्हीं दिनों में कुछ भारतीय शैली के चित्र-संग्रह उन्हें मिल गये। 

इनकी सजावट और सौन्दर्य से प्रेरित होकर उन्होंने भारतीय विषयों की खोज की और रवीन्द्रनाथ ठाकुर के परामर्श से उन्होंने विद्यापति और चण्डीदास के गीतों को चित्रित करना आरम्भ किया। 

पहले तो उन्हें असफलता मिली पर फिर एक भारतीय शैली के शिक्षक की सहायता से वे राधा-कृष्ण सम्बन्धी चित्र तैयार करने लगे। 

अभी तक वह तैल रंगों में ही चित्रण करते थे। कुछ दिन उपरान्त उन्होंने जल-रंगों में चित्रण करना आरम्भ किया। 

इसी समय ये कलकत्ता आर्ट स्कूल के प्रिंसिपल श्री ई०बी० हैवेल के सम्पर्क में आये, जिन्होंने आपको राजपूत तथा मुगल शैली के कुछ उत्तम चित्र दिखाये और उनके अध्ययन का परामर्श दिया हैवेल की देख-रेख में उन्होंने नये प्रयोग आरम्भ किये और गीतगोविन्द, बुद्ध जन्म, बुद्ध और सुजाता, ताजमहल का निर्माण तथा शाहजहाँ की मृत्यु आदि कई सफल चित्रों का निर्माण किया हैवेल साहब को भी अवनी बाबू की प्रतिभा का ज्ञान होता गया और विश्वास हो गया कि यह कलाकार भारतीय कला का अवश्य पुनरुद्धार करेगा। 

सन् 1902 के लगभग सुप्रसिद्ध जापानी विचारक तथा कला मर्मज्ञ काउण्ट ओकाकुरा उनके यहाँ आये वे पूर्वी देशों के कलाकारों द्वारा पश्चिमी शैली के अनुकरण के कटु आलोचक थे। अवनी बाबू पर उनका भी प्रभाव पड़ा । 

काउण्ट ओकाकुरा ने उनके पास जापान से तीन चित्रकार भेजे काम्पो आराइ, याकोहामा ताइक्वान तथा हिशिदा । 

इनमें से ताइक्वान तथा हिशिदा अवनी बाबू के साथ दो वर्ष तक रहे। इनसे जापानी टेक्नीक का ज्ञान प्राप्त कर आपने कुछ और चित्र बनाये जिनमें ‘भारत माता’ एवं ‘सान्ध्यदीप’ आदि प्रमुख हैं। इन पर जापानी प्रभाव है। 

अवनीन्द्रनाथ ने हिन्दू, बौद्ध तथा मुगल कला के गम्भीर अध्ययन के साथ-साथ फारसी, तिब्बती, चीनी, जापानी, जावा तथा कम्बोडिया की इण्डोनेशियाई एवं स्यामी कला का भी ज्ञान प्राप्त किया। उन्होंने रंग के पतले वाश की जो तकनीक विकसित की उसकी कुछ है। 

क्षेत्रों में प्रशंसा हुई किन्तु श्री आनन्द कुमारस्वामी ने उस तकनीक की आलोचना भी की। 

इस वाश तकनीक में वातावरण तथा ऋतु सम्बन्धी प्रभाव भी दिये गये जिनमें रंग के विभिन्न बलों का बड़ा ही आकर्षक प्रयोग हुआ 1898 से 1905 तक अवनी बाबू कलकत्ता कला विद्यालय के उप-प्रधानाचार्य तथा 1905 से 1915 तक प्रधानाचार्य रहे। 

1915 में उन्होंने यहाँ से अवकाश ले लिया और 1919 तक विचित्रा क्लब की स्थापना की जहाँ बंगाल शैली के चित्रकार एकत्रित होकर कला के प्रचार-प्रसार का कार्य करते रहे। 

1919 में शान्ति निकेतन में कला भवन की स्थापना और नन्दलाल बसु के वहाँ के प्रधान शिक्षक बन जाने के उपरान्त विचित्रा क्लब की गतिविधियाँ बन्द हो गयीं। 

अवनीन्द्रनाथ ठाकुर ने कलकत्ता विश्वविद्यालय में ललित कला के “बागेश्वरी प्रोफेसर के पद पर भी कार्य किया।

देश में चल रहे राष्ट्रीय आन्दोलन से प्रभावित होकर अवनी बाबू ने कला-आन्दोलन का सूत्रपात किया और नये विचारों के प्रतिभाशाली कलाकारों को एकत्रित करके 1907 में ‘इण्डियन सोसाइटी ऑफ ओरिएन्टल आर्ट’ की भी स्थापना कर डाली। 

इस संस्था ने अनेक विदेशी कलाविदों को आमन्त्रित करके मुक्त विचार-विनिमय किये, नये-नये प्रयोग किये और देश में कला का प्रचार किया। 

बहुत से व्यक्तियों ने इस कला-आन्दोलन का विरोध किया किन्तु ये लोग अपने मार्ग पर दृढ़ता से चलते रहे। 

अन्त में लोगों को पता चला कि भारत की प्राचीन कला-परम्परा महान है और उसे नवीन ‘अनुसार विकसित भी किया जा सकता है। 

युग के प्राचीन भारतीय कला के प्रति भी अवनी बाबू को बहुत लगाव था। उन्होंने पुरानी कला कृतियाँ खरीदने में बहुत पैसा खर्च किया। 

कला विद्यालय में संस्कृत सिखाने के लिए एक पण्डित तथा परम्परागत चित्रकला के शिक्षण के लिए पटना के ईश्वरी प्रसाद को भी नियुक्त किया। 

जयपुर मिति चित्रण सिखाने के लिए भी कुछ कलाकार जयपुर से बुलवाये। सन् 1909-10 में अजन्ता के चित्रों की अनुकृति करने के लिए इंग्लैण्ड से लेडी हेरिंघम की अध्यक्षता में जो दल आया था उसकी सहायता करने के लिए अपने शिष्यों नन्दलात बसु, असित कुमार हाल्दार, समरेन्द्रनाथ गुप्त तथा वेंकटप्पा को भेजा। ये अनुकृतियाँ इण्डिया सोसाइटी लन्दन द्वारा प्रकाशित की गयीं।

अवनी बाबू के प्रोत्साहन से उनके भाई गगनेन्द्रनाथ ने कुटीर उद्योगों के लिए भी Bengal Home Industries Association खोला तथा कला विद्यालय से हट जाने पर रवीन्द्रनाथ के घर विचित्रा क्लब चलाया। 

अवनी बाबू कलकत्ता विश्वविद्यालय में भारतीय कला के पीठासन (Chair of Indian Art) पर भी आसीन रहे। 

उनके व्याख्यानों, लेखों तथा पुस्तकों ने भारतीय कला के प्रति सभी प्रबुद्धों में एक नवीन सौन्दर्य-भावना उत्पन्न की इनमें भारत शिल्प के षंडगों पर लिखी पुस्तक सर्वाधिक प्रसिद्ध हुई है और इससे भारतीय कला का मर्म समझने में पर्याप्त सहायता मिली है। 

अवनी बाबू के शिष्यों को विभिन्न कला विद्यालयों का स्वतन्त्र रूप से अधिकार दे दिया गया। यह सरकार द्वारा उनके प्रति सबसे बड़ा सम्मान था। 

संसार भर के प्रतिष्ठित लेखक और कलाकार उनसे मिलने आते रहे। लार्ड हार्डिज, लार्ड कारमाइकेल, लार्ड रोनाल्डशे, ओकाकुरा, हिशिदा, काम्पो आराइ, याकोहामा ताइक्वान, निकोलस रोरिक तथा विलियम रोथेन्स्टीन आदि इनमें से कुछ प्रमुख नाम हैं।

अवनी बाबू स्वयं कलाकार ही नहीं, कला शिक्षक भी थे। उन्होंने अपने शिष्यों की विशेषताएँ विकसित करने में पूरी सहायता की। 

वे अपनी शैली अथवा अपनी सम्मति को कभी शिष्यों पर थोपते नहीं थे। इसके अतिरिक्त वे अच्छे लेखक भी थे। चित्रकला के 6 अंगों पर उनकी लिखी हुई पुस्तक ‘षडंग’ बहुत प्रसिद्ध है। 

इस बंगला पुस्तक का अंग्रेजी तथा हिन्दी अनुवाद भी हो चुका है। धीरे-धीरे उनकी ख्याति विश्व भर में फैल गयी। 

श्री आनन्दकुमारस्वामी ने भी बंगाल स्कूल के प्रचार में अपने लेखों से बड़ी सहायता की। 1 सितम्बर 1951 को आपका देहावसान हो गया।

अवनी बाबू की कला

अवीन्द्रनाथ की कला कृतियों की भारतीयता बरावर आलोचना का विषय रही है। उनकी व्यक्तिगत प्रतिभा तो असंदिग्ध है किन्तु उनकी कला में कई शैलियों का समन्वय दिखायी देता है। 

हम यह नहीं कह सकते कि उनकी कला पश्चिमी, ईरानी, चीनी, तथा जापानी कला से प्रभावित नहीं है। सभी के सम्मिश्रण

1. “बात अटपटी लगने का भय है, लेकिन उनकी कृतियों को बर्नीज जोन्स, बिहजाद और ओगाता कोरीन का सम्मिश्रण कहने को जी चाहता है।” ओ०सी०गांगुली । अवनीन्द्रनाथ ठाकुर के चित्रों का वर्गीकरण निम्न प्रकार से किया गया है:

(1) ब्रिटिश अकादमिक पद्धति (उदाहरण ‘जमुना’ 1926) 

(2) भारतीय मध्ययुगीन लघु-चित्रण पद्धति (उदाहरण ‘यात्रा का अन्त’ 1912)

(3) चीनी-जापानी-भारतीय-यूरोपीय मिश्रित शैली (उदाहरण ‘खिलौना’)

(4) अर्द्ध प्रभाववादी शैली के कुछ दृश्य-चित्र

(5) फुटकर चित्र

उक्त शैलियों में ब्रिटिश पद्धति के चित्र अवनी बाबू ने 1890 से, भारतीय लघु चित्रण पद्धति के 1895 से तथा चीनी- जापनी प्रभाव वाले 1903 से बनाने आरम्भ किये थे किन्तु वे सभी प्रकार के चित्र 1930 तक बनाते रहे; अतः उनकी कला विकास के अलग-अलग चरण नहीं मिलते। 

अवनी बाबू की कला पर रंग मंच, रामाण्टिक में काव्य, बाल-कथाओं, ब्रिटिश कला, प्राचीन कला, रागमाला चित्रों, जापानी कला तथा चीनी कला का प्रभाव पड़ा था। उनकी कला में इन सबका समन्वय मिलता है।

से उन्होंने जिस शैली को जन्म दिया उसका व्यापक प्रचार हुआ। अपनी व्यक्तिगत प्रतिष्ठा से उन्होंने इस शैली को भी प्रतिष्ठा दी विषयों की दृष्टि से उनकी कला पूर्ण भारतीय है और उसमें एक भावुक कलाकार का ह्रदय झाँकता है। 

शैली में ही अन्य प्रभाव लक्षित होते हैं। जागरूक कलाकार सदैव अपने युग से प्रभावित होता है। 

वह चिर-प्रगतिशील बना रहने के लिए नित्य नूतन प्रयोग करता रहता है-जब तक कि वह अपनी आविष्कृत शैली में पूर्ण परिपक्वता प्राप्त नहीं कर लेता अवनीन्द्रनाथ ठाकुर की कला का महत्व सभी आलोचकों ने एक समान नहीं माना है। 

सन् 1911 में आनन्द कुमारस्वामी ने कहा था कि इनकी रंग-योजनाएँ इतनी धुंधली हैं कि चित्र का विषय तक समझने में बड़ी कठिनाई होती है। 

यद्यपि इनके चित्र किंचित् लावण्ययुक्त हैं तथापि उनमें अतिभावुकता, दुर्बल रेखांकन एवं अन्धकारमय वर्णिका आदि दोष भी हैं।’ 

आर्चर ने कुमारस्वामी का ही अनुकरण करते हुए 1959 ई० में कहा था अपने तीस वर्ष के विकास काल में अवनी बाबू की शैली में कुछ विशेषताएँ स्थिर हो गयी थीं। निश्चयहीन रेखा, आकृतियों की अस्पष्टता, रंगों का फीकापन, नारियों जैसी कोमल आकृतियों में रुचि, रोगियों जैसे दुर्बल शरीर तथा थोथी भावुकता इनके प्रमुख लक्षण थे। 

आर्चर के विचार से इसका प्रधान कारण तकनीकी दुर्बलता थी इन सब आलोचनाओं के विपरीत कतिपय अन्य कलाविदों की दृष्टि में वे महान् कलाकार थे। 

जया अप्पासामी ने अवनीन्द्रनाथ की कल्पनाओं को व्हिसलर से श्रेष्ठ तथा रंगों एवं आकाशीय प्रभावों को टर्नर से उत्तम माना है। प्रदोष दास गुप्ता ने अवनी बाबू को विलियम ब्लेक के समान आदर्श विचारक कलाकार उद्घोषित किया है। 

ऐतिहासिक दृष्टि से अपनी बाबू राष्ट्रीय स्तर के कला के अग्रदूत रहे हैं, अन्तर्राष्ट्रीय नहीं। 

यूरोप के प्रसिद्ध आधुनिक चित्रकारों मातिस, पिकासो, कान्दिन्स्की अथवा मोन्द्रियों की भाँति किसी नवीन शैली का सृजन न करके अवनीन्द्रनाथ ने एशिया और प्रधानतः भारतीय कला को ही अपना आधार बनाया और लोगों को उसका सम्मान करने को प्रेरित किया।

अवनी बाबू के प्रसिद्ध चित्र हैं: शाहजहाँ का अन्तिम समय तिष्यरक्षिता, राधा -कृष्ण, औरंगजेब आदि। ‘औरंगजेब’ में मुगल व्यक्ति-चित्रण तकनीक का प्रयोग किया गया है। 

मुखाकृति यथार्थवादी है, शरीराकृति में गढ़नशीलता का प्रभाव है, फिर भी उसमें कलाकार की व्यक्तिगत शैली की अनुभूति है ‘राधा-कृष्ण” में संयोजन की उत्कृष्टता दर्शनीय है। 

यह जापानी ‘काकीमीनो’ (कुण्डली चित्र) पद्धति में बना है। तकनीक में चीनी प्रभाव है तथापि चित्र अजन्ता की पद्धति पर संयोजित है। 

भावाभिव्यक्ति केवल मुखाकृति में न होकर हस्तमुद्राओं तथा शारीरिक स्थितियों में है नेत्रों का भाव भ्रूचाप तथा नेत्रों की बनावट से व्यक्त किया गया है। एक चश्म मुखाकृति पहाड़ी शैली के अनुसार है। 

‘शाहजहों का अन्तिम समय में जाड़े की सुबह दूर कुहरे में झांकता ताजमहल, तथा अग्रभूमि में यास्मीन बुर्ज के वे स्तम्भ है जहाँ शाहजहाँ को बन्दी बनाकर रखा गया था। 

चित्र के मध्य में वृद्ध शाहजहाँ कारागार में असहायावस्था में पड़ा है। उसका सिर ताजमहल की ओर तिरछा उठा हुआ है। निकट ही नीची दृष्टि किये पुत्री जहानआरा बैठी है। 

आकाश की फीकी रंगत और बातावरण के सूनेपन से शोक का भाव सर्जित किया गया है। उन्होंने मुगल शैली में जो चित्र अंकित किये थे उनके उदाहरण हैं-ताज का स्वप्न, ताजमहल का निर्माण, शाहजहाँ द्वारा ताज की अन्तिम झाँकी आदि। 

पश्चिमी पद्धति में शिक्षा ग्रहण करने के पश्चात् उससे विद्रोह करके उन्होंने जो आरम्भिक चित्र बनाये थे उनके उदाहरण निर्वासित यक्ष, आकाश में सिद्धगण तथा ऋतु-संहार के चित्र हैं। 

उनके अन्य मौलिक चित्र हैं: ध्यान मग्न बुद्ध, कमल पत्र पर अश्रुबिन्दु, जावा की नर्तकी, बंगाल के प्राकृतिक दृश्य तथा चैतन्य आदि । 

1940 से अपनी बाबू ने खिलौने तथा पाषाण खण्डों एवं वृक्षों की शाखाओं एवं जड़ों में सहसा पाये गये रूपों से आकृतियाँ बनाना आरम्भ कर दिया था।

नन्दलाल बसु (1882-1966 ई०) 

श्री अवनीन्द्रनाथ ठाकुर की शिष्य मण्डली के प्रमुख साधक नन्दलाल बसु थे ये कलाकार और विचारक दोनों थे। 

उनके व्यक्तित्व में कलाकार और तपस्वी का अद्भुत सम्मिश्रण था चिन्तन के क्षणों में उन्होंने जो कुछ कहा या लिखा था, उसका उतना ही महत्व है जितना उनके चित्रों का उनके व्यक्तित्व पर अवनीन्द्रनाथ ठाकुर, श्री राम कृष्ण परमहंस, महात्मा गाँधी और रवीन्द्रनाथ ठाकुर का प्रभाव पड़ा।

नन्दलाल बसु का जन्म बिहार प्रदेश के मुंगेर जिले में हवेली खड़गपुर नामक ग्राम में 3 दिसम्बर सन् 1882 ई० को हुआ था। उनके पिता पूर्णचन्द्र वसु दरभंगा राज्य में इन्जीनियर थे। 

उनकी माँ क्षेत्रमणि देवी करुणह्रदया एवं भक्त महिला थीं। माता-पिता के अकलुष और पवित्र स्वभाव का प्रभाव उन पर पड़ा। बचपन से ही उनमें कला के प्रति रुझान था। 

आरम्भिक शिक्षा अपने ग्राम में ही प्राप्त कर 1897 ई० में उन्होंने कलकत्ता के खुदीराम बसु के माध्यमिक विद्यालय में प्रवेश लिया। वहाँ अध्ययन-काल में उन्होंने अनेक रेखाचित्रों का अंकन किया। 

1902 ई० में मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण करने के उपरान्त ही वे तूलिका के जादू की ओर मुड़ गये। 1903 ई० में उनका विवाह हो गया। 

1905 ई० में उन्हें राजकीय कला-विद्यालय कलकत्ता में प्रवेश की आज्ञा मिल गई और अवनीन्द्रनाथ ठाकुर की देख-रेख में उन्होंने अपना कला अभ्यास आगे बढ़ाया। 

1910 ई० तक उन्हें 60 रु० मासिक की छात्रवृत्ति मिलती रही। इसी अवधि में उन्होंने रामायण की कथा वस्तु पर चित्र बनाना आरम्भ किया जिसमें से “सती का देहत्याग’ शीर्षक चित्र पर 1908 ई० में इण्डियन सोसाइटी ऑफ ओरियन्टल आर्ट की प्रथम प्रदर्शनी में 500 रु० का पुरस्कार प्राप्त हुआ। 

1909- 10 ई० में लेडी हेरिंघम की अध्यक्षता में अजन्ता की अनुकृतियाँ करने के लिये भी अवनी | बाबू ने उन्हें भेजा। 1914 तक नन्दलाल बसु ने अपना अध्ययन पूरा कर लिया। इसके पश्चात् पर्सी ब्राउन महोदय ने उन्हें कला विद्यालय में अध्यापन के लिये आमन्त्रित किया किन्तु नन्द बाबू ने इसे स्वीकार नहीं किया। 

अवनी बाबू ने उन्हें 60 रु० मासिक खर्चा अपनी ओर से देना जारी रखा। इस अवधि में ये अवनीन्द्रनाथ ठाकुर, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सिस्टर निवेदिता, आनन्द कुमार स्वामी तथा मुकुल दे के विभिन्न कला- सम्बन्धी क्रियाकलापों में उनकी सहायता करते रहे।

इस समय में वे ओकाकुरा तथा काम्पो आराई नामक जापानी चित्रकारों के सम्पर्क में भी आये और रवीन्द्रनाथ ठाकुर के काव्य संग्रहों तथा सर जगदीश चन्द्र बसु के विज्ञान भवन के लिये चित्रांकन किया। 

1918 में इण्डियन सोसाइटी ऑफ ओरिएण्टल आर्ट में कुछ समय तक कला शिक्षण किया। 1919 से उन्होंने रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा शान्ति निकेतन में स्थापित विश्व भारती के कला विभाग में कार्य करना प्रारम्भ किया और 1922 में कला भवन के अध्यक्ष के रूप में उनकी विधिवत् नियुक्ति हो गयी। 

1921 में उन्होंने बाघ गुफा चित्रों की भी अनुकृति की 1924 में नन्द बाबू रवीन्द्रनाथ ठाकुर के साथ वर्मा, मलाया, चीन तथा जापान की यात्रा पर गये। 1934 में वे लंका गये। 

1937 में उन्होंने फैजपुर काँग्रेस के पंडाल की सज्जा में सहयोग दिया तथा 1937- 38 की हरिपुरा कांग्रेस के पंडाल के लिये पोस्टर बनाये। 

1939 में बड़ौदा के महाराज ने उन्हें कीर्ति मन्दिर की सज्जा के लिये आमन्त्रित किया। 1944 में उनकी पुस्तक “शिल्प कथा” प्रकाशित हुई। 

1950 में बनारस हिन्दू विश्व विद्यालय ने उन्हें डी० लिट् की उपाधि से सम्मानित किया। 1951 में उन्होंने शान्ति निकेतन से अवकाश ग्रहण किया। 

इसके पश्चात् भी वे निरन्तर चित्र-सृजन करते रहे। उन्हें देश की अनेक संस्थाओं द्वारा सम्मानित किया गया। 

1952 में विश्व भारती ने “देशिकोत्तम, 1954 में भारत सरकार ने “पद्म विभूषण”, 1957 में कलकत्ता विश्व विद्यालय ने डी० लिट्, 1958 में कलकत्ता ललित कला अकादमी ने रजत जयन्ती पदक, 1963 में रवीन्द्र भारती विश्व विद्यालय ने डी० लिट् तथा 1965 में एशियाटिक सोसाइटी कलकत्ता ने रवीन्द्र-शताब्दी पदक से सम्मानित किया। कला जगत् की निरन्तर सेवा करते तथा अन्तिम क्षणों तक कला की साधना में लगे हुए उन्होंने 16 अप्रैल 1966 ई० को इस संसार से विदा ली।

नन्दलाल बसु की कला

बसु महोदय ने लगभग दस सहस्र चित्रों की सृष्टि की है। आधुनिक कलाकारों में वे ही अजन्ता के सर्वाधिक निकट हैं किन्तु उनकी मौलिकता उन्हें अजन्ता से पृथक भी कर देती है। 

उनकी चित्रकारी के विषय अधिकांशतः पौराणिक तथा धार्मिक कथानकों एवं बुद्ध जीवन से लिए गए हैं। आरम्भ में कुछ कृतियाँ जल-रंगों में बनाई जिनमें हल्का- गहरा प्रभाव भी उत्पन्न किया गया। बाद में उन्होंने टैम्परा विधि से चित्रांकन किया। 

बसु विज्ञान मन्दिर, शान्ति निकेतन के पुरातन पुस्तकालय भवन एवं चीना भवन तथा बड़ौदा के कीर्ति मन्दिर में भित्ति चित्रण टेकनीक का प्रयोग किया। 

1928 में इटालियन भित्ति-लेप पद्धति से भी “दूल्हे की सवारी” नामक एक विशाल भित्ति चित्र बनाया। चीन जापान आदि की यात्रा से उनकी कला पर वहाँ का प्रभाव भी पड़ा जिसने उन्हें कला के मूल तत्वों की खोज के लिये प्रेरित किया। 

इसी के आधार पर उन्होंने कहा था कि हम प्राणों के पुजारी है। आगे चलकर उन पर दीन-हीन श्रमिकों और महात्मा गांधी का बहुत प्रभाव पड़ा। 

उन्होंने इनके आधार पर चित्रांकन किया और कांग्रेस अधिवेशनों के पण्डालों के लिये पोस्टर बनाये। इनके अतिरिक्त उन्होंने कीट पतंगों, पक्षियों, जन्तुओं, पशुओं, पौधों, पुष्पो, पर्वतों, कोहरे, वर्षा, बादल आदि का भी बड़ा ही मार्मिक अंकन किया है। 

उनकी कला कार्डों के रूप में भारत के कोने-कोने में बिखरी हुई है। उनकी तूलिका स्पर्श (टच) अंकन की पद्धति में वस्तु की आकृति, भाव, मुद्रा के सूक्ष्म अध्ययन और तूलिका पर अधिकार का अद्भुत समन्वय है। 

टच पद्धति के विषय में उनका कथन था कि टेम्परा विलम्बित है, टच द्रुत है। पर यह उस्ताद का काम है। वे ‘टच’ वर्क करते थे पर शिष्यों को मना करते थे क्योंकि इसके लिये ‘फार्म’ तथा ड्राइंग का सूक्ष्य ज्ञान आवश्यक है। 

“पाण्डवों का हिमालय आरोहण’ नामक पन्द्रह फुट लम्बा चित्र उन्होंने एक घण्टे में बनाया था। उसमें उन्हें कहीं भी कुछ बदलना या सुधारना नहीं पड़ा। 

उनका विलक्षण रेखांकन देखकर उनका नया छात्र कह उठता था कि ‘मास्टर महाशय, मुझे मालूम नहीं था कि गधा भी इतना सुन्दर होता है। 

किन्तु कहीं-कहीं वे अलंकरणात्मक विवरणों में खो गये हैं जैसे “गंगावतरण” नामक चित्र में जो बड़ौदा के कीर्ति मन्दिर में अंकित है, अन्यथा उनकी रेखाओं में अत्यधिक जीवन प्रवाह है और कार्य में विविधता मानव शरीर की भंगिमाओं के जितने विविध रूप बसु महोदय में दिखाई पड़ते हैं उतने किसी अन्य कलाकार में नहीं। 

एक सच्चे साधक के रूप में एक ओर वे कला के द्वारा परमानन्द की प्राप्ति मानते हैं तो दूसरी ओर कला को जन-साधारण के निम्न स्तर पर उतारने के बजाय जन साधारण को कला के उच्च स्तर तक उठाने तथा उनमें सौन्दर्य-दृष्टि उत्पन्न करने के पक्षपाती थे; जिसके अभाव में न भावात्मक उन्नयन हो सकता है। और न आनन्द की प्राप्ति ही हो सकती है; बल्कि जिसके अभाव में शारीरिक और मानसिक विकार भी उत्पन्न हो सकते हैं।

अपने छात्रों के प्रति भी बसु महोदय का व्यवहार अत्यन्त स्नेहपूर्ण था। वे उनको अपनी मौलिकता का विकास करने हेतु ही प्रोत्साहित करते थे। 

उनका विचार था कि चित्रकला प्रकृति की अनुकृति नहीं हैं नकल का न कोई अर्थ होता है और न कोई प्रयोजन कला एक सृजनात्मक क्रिया है जो चित्रकार के अपने स्वभाव तथा अर्न्तदृष्टि पर निर्भर करती है। 

कला में वे सरलता और लयात्मकता का गुण परमावश्यक मानते थे। छात्रो के लिए लिखी गयी सचित्र पुस्तक रूपावलि की भूमिका में भी नन्द बाबू ने छन्द योजना पर बहुत बल दिया है।

सती का देह त्याग, भीष्म प्रतिज्ञा, धृतराष्ट्र और गांधारी, मीराबाई, कृष्ण और अर्जुन, उमा का तप, बसन्त, डांडी मार्च, गंगावतरण, महाभारत, युधिष्ठिर की अन्तिम यात्रा, चण्डालिका, शतरंज खेलते हुए कौरव पाण्डव तथा पर्वत का कोहरा आदि उनके कुछ प्रमुख चित्र हैं। नन्द बाबू की कला के विकास का निम्नलिखित स्वरूप है-

नन्द बाबू अवनीन्द्रनाथ के शिष्य थे। उनका सम्पर्क ई० बी० हैवेल, सिस्टर निवेदिता तथा आनन्द कुमारस्वामी से भी था। 

उन्होंने रवीन्द्र नाथ ठाकुर के साथ पद्मा नदी की यात्रा की थी और बंगाल की प्राकृतिक सुषमा के दर्शन किये थे। उन्हें जापानी स्याही चित्रों की तकनीक का भी ज्ञान था। 

आरम्भ में नन्दलाल ने अपने गुरु अवनीन्द्रनाथ ठाकुर की वाश शैली का अनुकरण किया। 1920 से 1930 तक उन्होंने टेम्परा में आकृतियां बनाईं जिनके पीछे दृश्यों की पृष्ठभूमि भी चित्रित की। 

इसके उपरान्त (1940) से उन्होंने आकृति चित्रण छोड़ दिया और प्रकृति-चित्रण में रम गये।

उनके आरम्भिक चित्रों में अजन्ता का प्रभाव है। श्रीकृष्ण-अर्जुन चित्र इसका अच्छा उदाहरण है। इसके पश्चात् उन्होंने अजन्ता की आकृति रचना एवं जापानी तकनीक मिला दिया। “उमा का दुःख” इस प्रकार का सुन्दर चित्र है।

शान्ति निकेतन के उनके चित्र बंगाल के पट चित्रों की भाँति सपाट हैं। “राधा का विरह” इसी प्रकार का चित्र है। अवनी बाबू के काम में जहाँ नाजुकपन था वहाँ नन्दबाबू के काम में ओज तथा भारीपन है।

इसी समय उन्होंने कुछ आलंकारिक ढंग के चित्र बनाये महिषासुर मर्दिनी में यह विशेषता देखी जा सकती है। ऐसे चित्र उन्होंने अधिक नहीं बनाये गंगावतरण भी ऐसा ही है। 

अन्तिम युग में उन्होंने रंगीन चित्र अधिक नहीं बनाये। इनमें ‘टच वर्क” अधिक है। फैज़पुर तथा हरिपुरा अधिवेशनो के पोस्टरों में बंगाल की पट चित्रकला तथा गुजरात की सचित्र पाण्डुलिपियों का प्रभाव है।

वे वस्तुओं के बाह्य स्वरूप के बजाय उनके आन्तरिक गुणों पर अधिक बल देते थे।

उनके चित्रों के विषयों को निम्न प्रकार रखा जा सकता है- 

1. रामायण तथा महाभारत- श्री रामचन्द्र परिणय, सती का देह त्याग, उमा का तप, अहिल्योद्धार, भीष्म प्रतिज्ञा, शतरंज खेलते हुए कौरव-पांडव, कृष्ण और अर्जुन, कुरुक्षेत्र, धृतराष्ट्र और गान्धारी आदि। 2- धार्मिक पौराणिक बुद्ध और मेमना, शिव का विषपान, वीणा वादिनी, गंगावतरण, महिषासुर मर्दिनी, दुर्गा, मछुआरों के मध्य ईसा आदि ।

3- ऐतिहासिक पद्मिनी और भीमसिंह, मीराबाई का जीवन, राजगृह आदि ।

4- ऋतुएँ, पर्व तथा उत्सव- शीत काल में पद्मा पर, ग्रीष्म, सन्ध्या, बसन्त, रात्रि, बसन्तोत्सव, तूफान, पर्वत का कोहरा, नटीर पूजा आदि। 5- राजनीतिक- (भारतीय स्वतंत्रता आन्दोलन से सम्बन्धित) डौंडी मार्च – गाँधी की डांडी यात्रा आदि।

6- जन-जीवन- ग्राम्य कुटी, संथाल युवती, चण्डालिका, दो महिलायें, सारंगी वादन, सपेरा आदि।

7. जीव-जन्तु तथा वृक्ष वनस्पति- जावा पुष्प, जलता हुआ चीड़ का वृक्ष सिंह, ऊँट, लोमड़ी, टिड्डा, गुलदाऊदी और स्लेटी पक्षी, भैंसों का झुण्ड, अरहर का पौधा, एक गधा आदि।

8- व्यक्ति चित्र- सी०एफ० एण्ड्रयूज के० एन० मजमूदार, वीरेन गोस्वामी, हीरे मुखर्जी, अब्दुल गफ्फार खाँ आदि।

9- वन्य प्रकृति- हरमुख गंगोत्री, पारसनाथ पहाड़ी आदि ।

10- जलीय दृश्य जलाशय, गंगा नदी में नाव, जलधारा में मछलियाँ आदि। श्री रतन परिमू का विचार है कि नन्द बाबू को उनके द्वारा किये गये कार्यों की अपेक्षा बहुत अधिक सम्मान मिल गया। उनकी कला का आधुनिक भारत पर कोई उल्लेखनीय प्रभाव नहीं है उनका अधिकांश कार्य वर्णनात्मक है।

समरेन्द्रनाथ गुप्त (1887-1964)

अवनी बाबू के शिष्यों में आपका भी प्रमुख स्थान है। आपने ठाकुर शैली का लाहौर में प्रचार किया।

जोगीमारा गुफा के चित्रों की अनुकृतियाँ तैयार करने में श्री हाल्दार के साथ आप भी गये थे। आप भारतीयता को ही अधिक महत्व देते थे। आपके भाव-चित्र बड़े सुन्दर हैं।

शैलेन्द्रनाथ दे 

श्री शैलेन्द्रनाथ दे ठाकुर शैली के कुशल कलाकार थे। आपने अवनीन्द्रनाथ ठाकुर का शिष्यत्व 1909 ई० में ग्रहण किया और अपनी कला शिक्षा पूर्ण कर महाराजा स्कूल ऑफ आर्ट जयपुर में उप-प्रधानाचार्य हो गये। 

यहां श्री के० के० मुकर्जी प्रधानाचार्य थे। जयपुर में श्री दे ने अनेक सुन्दर चित्रों की रचना की तथा चित्रकला के प्रति विशेष जन चेतना जाग्रत की। भारतीय चित्रकला का तकनीक जन-जन तक पहुंचाने की दृष्टि से और विशेषकर चित्रकला के विद्यार्थियों के लिये आपने “भारतीय चित्रकला-पद्धति शीर्षक एक पुस्तक भी लिखी जो पर्याप्त लोकप्रिय हुई। इस पुस्तक में चित्रकला के सभी पक्षों पर प्रकाश डाला गया है तथा रंग निर्माण ओर तूलिका प्रयोग पर भी विचार किया गया है। –

जयपुर में रहकर आपने जिन योग्य शिष्यों को कला की शिक्षा दी उनमें श्री रामगोपाल विजयवर्गीय श्री मोहनलाल, श्री शम्भूनाथ मिश्र, श्री अविनाश चन्द्र गौतम तथा श्री देवकीनन्दन मिश्र के नाम प्रमुख हैं ।

अन्य स्थानों के परम्परावादी चित्रकार

आधुनिक भारतीय कला में पुनरूस्थान का सूत्रपात बंगाल से हुआ था किन्तु पुनरुत्थान काल के सभी कलाकारों ने (जिनमें कि अवनी बाबू तथा नन्दबाबू के शिष्य भी सम्मिलित है ) बंगाल शैली का ही अनुकरण न करके स्वतंत्र शैलियां भी विकसित की थीं जैसा कि देवीप्रसाद रायचौधुरी, विनोदबिहारी मुखर्जी तथा रामकिंकर बैज की कला से पूर्णतः स्पष्ट है बंगाल के अतिरिक्त बम्बई तथा अहमदाबाद आदि में भी कुछ कलाकार बंगाल शैली से प्रेरित होकर अपने स्वतंत्र ढंग से या फिर परम्परागत कला का तत्व लेकर भावपूर्ण आकृति चित्रण कर रहे थे। जल रंग, वाश तथा टेम्परा, इनके प्रधान माध्यम थे इनमें निम्नलिखित कलाकार प्रमुख थे-

  • रविशंकर रावल 
  • जगन्नाथ मुरलीधर अहिवासी 
  • सोमालाल शाह 
  • यज्ञेश्वर शुक्ल

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