भारतीय कला के प्रमुख स्थल, प्रवृत्तियाँ और प्रमुख कलाकार ग्रुप | Indian Art Capitals, Trends and Major Artists – Group

भारतीय कला आन्दोलन

1857 के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन के समय भारत की परम्परागत राजस्थानी, मुगल तथा पहाड़ी शैलियों का हारा हो चुका था। ब्रिटिश कला पद्धति का भारत में आगमन आरम्भ हुआ और उन्नीसवीं शती के अन्त तक इसका पर्याप्त प्रसार हुआ। एक ओर भारत की साम्राज्यवादी ब्रिटिश सत्ता पश्चिमी कला को प्रोत्साहन दे रही थी तो दूसरी ओर इसकी प्रतिक्रिया भी आरम्भ हो चुकी थी। 

बंगाल का कला आन्दोलन इस प्रतिक्रिया का ही परिणाम था। किन्तु वह आन्दोलन परतन्त्र देशवासियों को कोई भविष्य का मार्ग न दिखा सका। अमृता शेरगिल, यामिनी राय और ठाकुर परिवार के कुछ अन्य कलाकारों ने भारत की भविष्य की कला-शैली के लिये पृष्ठ भूमि बनाने का कार्य किया। 

इन्हीं के समकालीन देश के अन्य भागों में फैले हुए कलाकारों ने भी अपनी-अपनी दृष्टि से कला-शैलियों में अनेक प्रयोग किये जिनके परिणाम 1940 के आस-पास दिखायी देने आरम्भ हो गये थे। ऐसे सभी कलाकार बीसवीं शती के प्रथम चरण के लगभग जन्मे थे और आधुनिक समकालीन कला की दृष्टि से वे नये कला-आन्दोलनों में छिपी प्रवृत्तियों के जनक अथवा पूर्वगामी वरिष्ठ कलाकार कहे जा सकते हैं। 

इनके उपरान्त वे कलाकार आते हैं जो 1950 के आसपास सक्रिय हुए और कई नये कलाकार दलों के रूप में सामने आये। इनमें से अनेक अपने पूर्वगामी कलाकारों के शिष्य थे 1960 से प्रत्येक दशक में नयी-नयी प्रवृत्तियों को लेकर कुछ नये कलाकार सामने आते रहे हैं।

भारत को स्वतंत्रता दिलाने वाले बीसवीं शती के पाँचवें दशक के लगभग भारतीय कला में संक्रान्ति का युग समाविष्ट हुआ। स्वतंत्रता के पूर्व तक लगभग सभी कलाकार आकृति मूलक चित्रण करते थे । 

1947 ई० के पश्चात् 1960 तक आते-आते अनेक महत्वपूर्ण कलाकार अमूर्त शैलियों में चित्र-रचना करने लगे। इनमें से अनेक | कला-विद्यालयों में अकादमी पद्धति की शिक्षा प्राप्त कर चुके थे अतः उनकी पृष्ठ भूमि परिपक्व थी। 

अमूर्त चित्रण में रामकुमार, गायतोंडे, कृष्ण खन्ना, मोहन सामन्त, सैयद हैदर रजा, केवल कृष्ण, सतीश गुजराल, अविनाश चन्द्र तथा कृष्ण रेडडी प्रमुख हैं। किन्तु कुछ कलाकारों ने अमूर्त चित्रण को अपना लक्ष्य नहीं बनाया ये हैं अकबर पदमसी, फ्रांसिस न्यूटनसूजा, मकबूल फिदा हुसैन, के० के० हैब्बार, एन० एस० बेन्द्रे, ॐ० एच० आरा, श्यावक्स चावड़ा, भवे सान्याल, शैलोज मुखर्जी, के० एस० कुलकर्णी आदि।

अमूर्तता का एक रूप धरातलों का ऐसा संयोजन है। जिसमें गहराई की अनुभूति होती है। दूसरा रूप विपरीत रंगों के विस्तृत क्षेत्रों का संयोजन और उनसे उत्पन्न होने वाला अमूर्त प्रभाव है। 

तीसरा रूप जातीकरण है। चौथा रूप जैव आकृतियों के आधार पर विकसित अमूर्त रूपों का अंकन है । ये प्राकृतिक रूपों से मिलते हैं पर निश्चित सादृश्य नहीं रखते । 

कुछ कलाकार किसी एक या कई रूपों वेगवान् मिला-जुला प्रयोग भी कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त चित्र-तल की विविधता, टेक्सास कोलाज, कलाकृतियों का आकार बड़ा होते जाना, अधिक तेज तथा वाले रंगों का प्रयोग, चित्र तल के विस्तार की बढ़ती हुई अनुभूति, पतले रग चमक, तनाव तथा उलझनों आदि के रूप में भी कला की अमूर्तता बढ़ी है।

जो कलाकार 1960 में अमूर्तता की ओर बढ़े वे सात-आठ वर्ष पश्चात् आ की ओर पुनः मुड़ गये। इसका प्रमुख कारण यह था कि वे सब किसी घटना के को ही चित्रित करना चाहते थे जो रोमाण्टिक था। यह रोमाण्टिक भावना अधिक बलवती हुई तो कलाकार पुनः आकृति-चित्रण की ओर दौड़े।

जो चित्रकार आकृति-मूलक चित्रण को ही अपना माध्यम बनाये रखकर कार्य रहे थे उनकी विशेषता थी विषयों की भारतीयता अथवा स्थानीयता । भावुकता राष्ट्रीयता से इनके विषयों का सम्बन्ध अनिवार्य नहीं था। इनके विषय भी रोमाण्टि थे और लोगों के दैनिक जीवन से लिए गये थे। 

स्थानीय अथवा ग्रामीण विषय राष्ट्र पहचान के लिए हैं। इनमें दैनिक जीवन जैसे पनघट, कुआँ, गाँव का मेला, आदि प्रमुख है। इनमें सपाट रंग, रेखात्मकता, आलंकारिकता, गहरी वर्ण योजना पर बल दिया गया है। आकृतियों के अतिरिक्त रंगों के अपने-अपने क्षेत्र स्वयं में सौन्दर्य-पूर्ण हैं। 

तैल माध्यम भी अपनाया गया और चाकू से भी रंग लगाया गया। हुन् ने इस दिशा में सर्वाधिक प्रयोग किये। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् विदेशों से सम्म होने के कारण भारतीय कलाकारों ने अनेक विदेशी प्रभावों को आत्मसात् किया वे शनैः शनै निजी शैलियों का विकास कर रहे हैं। कुछ कलाकार देश के बाहर चले गये हैं जैसे सूजा, रजा, अविनाशचन्द्र तथा सामन्त ।

आज कला के तीन प्रमुख केन्द्र हैं दिल्ली, बम्बई और कलकत्ता । इस प्रक आज की कला राजधानियों की कला बन कर रह गयी है। 1956 के पश्चात् ब भी महत्वपूर्ण हो गया है।

दिल्ली में शैलोज मुखर्जी को छोड़कर सभी वरिष्ठ कलाकार बंगाल शैली में क करते थे। शारदा चरण उकील तथा उनका कला-विद्यालय इस दिशा में अग्रगण्य शैलोज आधुनिकता को लाना चाहते थे। 

रामकुमार उनके मेधावी शिष्य हैं। विभाजन के पश्चात् पाकिस्तान स्थित पंजाब के क्षेत्रों से दिल्ली आये कलाकार सतीश गुजराल, भवेश सान्याल, प्राणनाथ मागो तथा कँवल कृष्ण प्रमुख हैं। 

ये कलाकार अपने साथ आधुनिकता की एक प्रबल प्रेरणा लेकर आये। इन्होंने दि शिल्पी-चक्र भी स्थापित किया। यहीं गायतोंडे, लक्षण पै, के० सी० आर्यन अ का प्रादुर्भाव हुआ

बम्बई के कलाकार पीठावला, धुरन्धर, लाल काका तथा लैंगहेमर से प्रभावित और पश्चिमी कला से प्रेरित थे किन्तु संक्रान्ति काल के कलाकारों ने नया मार्ग खोजने का प्रयत्न किया और गुजराती लघु चित्रों (अपभ्रंश शैली) के आधार पर एक अलग ली का विकास किया। इनकी रंग-योजनाएँ इन्हें अन्य कलाकारों से पृथक कर देती है बम्बई के इन कलाकारों का राष्ट्रीय महत्व है।

समस्त स्थानों के उक्त आधुनिकतावादी दलों ने पश्चिमी कलाकारों से बेझिझक प्रेरणा भी ली है और उसे भारतीय रूप में ढालने का प्रयत्न भी किया है। तैल माध्यम में ये यूरोप के अनुगामी हैं। जल तथा टेम्परा माध्यमों में भी कार्य हुआ है कुछ कलाकारों ने अनेक प्रकार की नवीन रचना सामग्री का भी प्रयोग किया है।

समकालीन भारतीय आधुनिक कलाकारों के विचार से आकारों तथा रंगों में भावोत्पादक गुण तात्विक रूप से छिपे हैं अतः शुद्ध अमूर्त पद्धतियों में भी चित्रण किया जा सकता है जो कलाकार की स्वयं की अनुभूति और आइडिया पर आधारित हो। 

कुछ कलाकारों ने वस्तुओं के दिखायी देने वाले बाहरी रूपों को असुन्दर और विकृत कह कर बहिष्कृत कर दिया है। उनकी कला साधारण व्यक्ति की समझ से बाहर है। किन्तु उसमें से कुछ अत्यन्त मौलिक तथा महत्वपूर्ण भी हैं।

आधुनिक कलाकारों ने अभिव्यंजनात्मक उद्देश्यों की दृष्टि से कथकलि नृत्य, आदिम मुखौटों, लोक निर्मित खिलौनों, गुजराती (अपभ्रंश) पुस्तक-चित्रों, मन्दिरों की मूर्तिकला तथा शास्त्रीय संगीत से प्रेरणा ली है, साथ ही अनेक कलाकारों ने यूरोपीय कला-आन्दोलनों जैसे अभिव्यंजनावाद, अतियथार्थवाद तथा नव-यथार्थवाद के सिद्धान्तों का भी प्रयोग किया है।

1943 में कलकत्ता ग्रुप का उदय हुआ और 1948-49 में बम्बई में प्रगतिशील कलाकार ग्रुप का 1949 में दिल्ली में शिल्पीचक्र की स्थापना हुई सांस्कृतिक तथा कलात्मक विकास की दृष्टि से विभिन्न प्रदेशों के अतिरिक्त केन्द्र में ललित कला अकादमियों की भी स्थापना हुई। 

कलाओं के साथ-साथ अन्य शिल्पों के क्षेत्र को भी अपने में समेटे हुए आल इण्डिया फाइन आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट्स सोसाइटी भी क्रियाशील रही। 1954 में जयपुर हाउस में आधुनिक कला की राष्ट्रीय वीथी की स्थापना हुई। यहाँ 21 मार्च 1955 को प्रथम राष्ट्रीय कला-प्रदर्शनी का उद्घाटन तत्कालीन राष्ट्रपति डा० राजेन्द्र प्रसाद द्वारा किया गया जिसमें हुसैन, बेन्द्रे, तथा आई०पी० गज्जर को पुरस्कार दिये गये। 

1958 से 1960 के मध्य ‘ग्रुप-7’, तथा ‘ग्रुप-9’ का निर्माण हुआ। 1961 में ‘अननोन ग्रुप’ की स्थापना हुई। 1963 का ग्रुप 1890 सर्वाधिक चर्चित और सशक्त ग्रुप रहा। फिर ‘वाल’ नामक ग्रुप सामने आया। इन ग्रुपों में अधिकतर कला के अध्यापक तथा छोटे पदों पर कार्यरत कलाकार ही सम्मिलित हुए थे। 1967 ग्राफिक कलाकारों के ‘ग्रुप 8’ की स्थापना हुई ।

इन ग्रुपों के अतिरिक्त ललित कला अकादमी तथा आल-इण्डिया फाइन आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट्स सोसाइटी द्वारा वार्षिक प्रदर्शनियों, कलाकारों की अथवा कला-संस्थाओं की प्रदर्शनियों एवं अन्तर्राष्ट्रीय प्रदर्शनियों का आयोजन एवं श्रेष्ठ चित्रों को किया जाता रहा है। चित्र-प्रदर्शन के हेतु त्रिवेणी कला संगम, कोनिका आर्ट गैलरी धूमीमल आर्ट गैलरी आदि भी निरन्तर क्रियाशील हैं। देश के अन्य भागों के कलाकार भी यहाँ आकर प्रदर्शनियाँ करते रहते हैं। 

सरकार द्वारा श्रेष्ठ चित्र क्रय भी किये जाते (कमीशन्स) हैं और अच्छे चित्रकारों को सरकारी भवनों की आन्तरिक एवं बाह्य सज्जा के लिए आमन्त्रित भी किया जाता है। सरकारी कामों के लिए जितने आमन्त्रण सतीश गुजराल को प्राप्त हुए हैं उतने अन्य किसी को नहीं । 

उन्होने नेहरू परिवार के अनेक पोर्ट्रेट बनाये जो नेहरू परिवार के संग्रह में हैं। दिल्ली, अहमदाबाद तथा मद्रास के हैण्डलूम बोर्ड के कार्यालयों, चण्डीगढ में पंजाब संग्रहालय तथा पंजार विश्वविद्यालय के भवनों, हिसार तथा हरियाणा के कृषि विश्वविद्यालयों, पालम हवाई अड्डे, अशोक होटल, होटल राजदूत, भारतीय मानक संस्थान, बडौदा हाउस, तथ शास्त्री भवन आदि में उनके बनाये म्यूरल तथा स्थापत्य डिजाइन हैं। पुरस्कृत

इस प्रकार राजकीय अनुग्रह, कुछ निश्चित विचारधारा अथवा प्रभाव से सम्बन्धित चित्रकारों के ही चित्र पुरस्कृत अथवा क्रय किये जाने और यहाँ तक कि वार्षिक राष्ट्रीय प्रदर्शनियों के हेतु चित्रों के चयन किये जाने की पद्धतियों के प्रति कलाकारों में रोष भी उमड़ा है और उन्होंने खुलकर विरोध भी प्रकट किया है। स्वामीनाथन आदि का 1970 में आरम्भ किया गया ‘आर्टिस्ट्स प्रोटेस्ट मूवमेण्ट’ इसी प्रकार का एक आन्दोलन था।

पहले पश्चिमी अकादमिक पद्धति के शास्त्रीयतावाद, फिर प्रभाववाद और उसके पश्चात् फाववाद तथा अभिव्यंजनावाद का प्रभाव भारतीय कलाकारों पर पड़ा। इसके उपरान्त घनवाद तथा अमूर्तकला का प्रभाव आया। 

कुछ कलाकारों ने घनवादी शैती में मूर्त तथा अमूर्त दोनों प्रकार की रचनाएँ की जैसे जहाँगीर साबावाला। जो कलाकार स्वतंत्रता के पूर्व तक आकृति-मूलक थे उनमें से अनेक महत्वपूर्ण कलाकार 1960 तक आते-आते अमूर्त चित्रण करने लगे जैसे रामकुमार, गायतोंडे, कृष्ण खन्ना, मोहन सामन्त, सैयद हैदर रजा, कंवल कृष्ण, सतीश गुजराल, अविनाश चन्द्र तथा कृष्ण रेड्डी आदि। हुसैन कभी अमूर्त नहीं हुए।

बड़ौदा के कलाकारों में अमूर्तता के प्रति रुझान 1956 में बेन्द्रे द्वारा कलाकार के एक ग्रुप के संगठन से हुआ । बेन्द्रे उन दिनों घनवादी प्रयोगों में उलझे हुए थे। 

अमूर्त कला के विभिन्न रूपों में प्रयोग के उदाहरण हमें बेन्द्रे के अतिरिक्त शान्ति द गुलाम रसूल सन्तोष, वीरेन दे, जे०स्वामीनाथन, जेराम पटेल आदि में मिलते हैं। दिल्ल और बम्बई के कलाकार रामकुमार, रजा, गायतोंडे, गुजराल तथा अविनाश चन्द्र आदि दृश्य-चित्रण के क्षेत्र में अमूर्त प्रयोगों के लिये प्रसिद्ध हैं।

यहाँ यह भी दृष्टव्य है कि पश्चिम के प्रभाव से भारत में दृश्य-चित्रण आरम्भ से हुआ पर भारत में कोई भी दृश्य-चित्रकार ब्रिटेन के कान्स्टेबिल या टर्नर और फ्रांस के पुसिन की टक्कर का नहीं हुआ।

यूरोप में प्रभाववादी छाया-प्रकाश के सिद्धान्तों को फॉववाद, अभिव्यंजनावाद, दादावाद तथा अतियथार्थवाद ने अप्रासंगिक कर दिया था। चित्र के धरातल को घनत्व की दृष्टि से समझने के प्रयत्न के फलस्वरूप घनवाद का उदय हुआ भविष्यवाद, निर्माणवाद तथा अमूर्तवाद का मार्ग प्रशस्त हुआ। 

भारत में इन सबका और प्रभाव द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात्, अर्थात् भारतीय स्वतंत्रता के लगभग, विशेष रूप से आया। अमूर्त कला. एक्शन पेण्टिंग आदि के जो आन्दोलन यूरोप तथा अमेरिका में चले थे उनका भी भारत में 1960 के आसपास प्रभाव अनुभव किया गया।

1960 के आसपास जो कलाकार उभर रहे थे वे पिछली पीढ़ी के कटु आलोचक थे। उन्हें लगता था कि पिछली पीढ़ी ने भारतीय कला का पश्चिमीकरण कर दिया है। 

इन नये कलाकारों में स्वदेशी प्रवृत्ति के साथ-साथ तृतीय विश्व (दुनियाँ के अविकसित तथा गरीब देशों) के मुक्ति संघर्ष की भी भावना निहित थी। इनकी प्रथम प्रदर्शनी का समर्थन मेक्सिकन कवि ओक्टेवियो पाज़ (OctavioPaz) ने भी किया था।

भारतीय आधुनिक कला के पश्चिमीकरण का एक कारण तो पश्चिमी कलाजगत्में  होने वाले परिवर्तनों के प्रति भारतीय कलाकारों की जागरूकता थी (यद्यपि यह बड़ी हास्यास्पद बात है कि यूरोपमें इस समय कुछ स्थिरता-सी आ गयी थी और 1960 के पश्चात् यूरोप के कला-विचारक यह सोचने लगे थे कि यूरोप में आधुनिक कला का युग समाप्त हो चुका है तथा आधुनिकोत्तरवादी प्रवृत्ति (Post Modernism) का आरम्भ हो चुका है) । 

इसका दूसरा कारण यह था कि पिछली पीढ़ी के (1940- 60 के मध्य काम करने वाले) कलाकारों में से, जोकि भारत की परम्परागत कला अथवा विशेष रूप से बंगाल शैली के प्रति विद्रोही थे, अधिकांश कलाकारों ने पेरिस, लन्दन तथा न्यूयार्क की राह पकड़ी और वहाँ से लौटकर भारत आने पर पश्चिमी कला- शैलियों का ही गुणगान करने लगे।

बड़ौदा कला महाविद्यालय ने इस आधुनिकता को चुनौती दी। अन्तर्राष्ट्रीय शैली के नाम पर यूरोप के पूँजीवादी देशों, अमरीका तथा जापान में प्रचलित कला के अनुकरण पर उन्होंने प्रश्न चिन्ह लगा दिया तथा आधुनिक पश्चिमी कला-आन्दोलनों के प्रति आधारभूत शंका उत्पन्न कर दी। 

इस प्रकार उनका मूल्यांकन एक नये सिरे से करने तथा भारतीयता के संदर्भ में समझने की आवश्यकता हुई। यही कारण था कि बड़ौदा में 1960 के आसपास उभरने वाले कलाकार थोड़े ही समय में राष्ट्रीय दृश्य-पटल पर छा गये। उन्होंने सर्वाधिक राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीते। 

इसी पृष्ठभूमि में 1963 में ‘ग्रुप-1890’ का भी निर्माण हुआ, यद्यपि इसके सभी कलाकार बड़ौदा के नहीं थे। बड़ौदा कला महाविद्यालय में 1960 से 1980 के दो दशकों में कला-शिक्षा की धारणा में बुनियादी परिवर्तन आया है। वहाँ कला जगत् के प्रश्नों को शंकालु दृष्टि से देखकर उनकी सत्यता की गहराई में पहुँचने का प्रयत्न किया जा रहा है।

1964-66 के मध्य की एक महत्वपूर्ण घटना मद्रास कला विद्यालय के लगभग 40 कलाकारों द्वारा चोल मण्डल ग्राम की स्थापना है। इसकी स्थापना के पीछे मद्रास कला- विद्यालय के प्रधानाचार्य के० सी० एस० पणिक्कर की मूल प्रेरणा है । 

अपनी आजीविका के लिए आज के कलाकार को या तो व्यावसायिक होना पड़ता है या फिर कहीं नौकरी करनी पड़ती है । इन परिस्थितियों में उसे स्वतंत्र होकर मौलिक कला-सृजन का अवकाश बहुत कम मिल पाता है । 

यह विचार किया गया कि कलाकार सागर तट के सुरम्य वातावरण से परिवेष्टित इस ग्राम में आकर या तो रहा करेंगे या फिर नियमित रूप से तीन-चार घंटे प्रतिदिन आकर कार्य किया करेंगे। 

चोल मण्डल कलाकार ग्राम ने यद्यपि के० सी० एस० पणिक्कर के अतिरिक्त जे० सुल्तान अली तथा के० वी० हरिदासन आदि कई अच्छे कलाकारों का तो विकास किया किन्तु भारतीय चित्रकला के सम्पूर्ण वातावरण पर इसका कोई निर्णायक प्रभाव नहीं पड़ा।

इसी समय कला में व्यावसायिक अनुशासन समाप्त होने लगा और अराजकता बढ़ने लगी। कलाकार पश्चिमी तकनीकों पर आधारित कला को छोड़कर लोककला तथा आदिवासियों की कला के जादुई तत्वों की ओर मुड़ गये। इन कलाकारों ने जिनमें स्वामीनाथन प्रमुख हैं, तकनीक एवं शैली की दृष्टि से अपनी कला अतियथार्थवाद पर आधारित की तथा पाल क्ली से विशेष प्रेरणा ली। 

इसी के साथ भारतीय कला में जादुई बिम्ब-योजना, हठयोग, श्रृंगार एवं रहस्य से सम्बन्धित प्रयोग भी कई कलाकार करने लगे। नव-तांत्रिक कला को भी इससे बल मिला। 

पनिक्कर की कला में इसका प्रयोग थोड़ा-सा था। वीरेन दे ने इसे ब्रह्माण्डीय शक्ति के बीज के विस्फोट के रूप में अपनी कलाकृतियों में अंकित किया गुलाम रसूल सन्तोष ने श्रृंगारपूर्ण आसनों के बिम्ब प्रस्तुत किये। 

स्वामीनाथन के जादुई बिम्ब पदार्थों को छोड़कर केवल वायवीय रूपों में बदल गये थे, किन्तु मंजीत बाबा ने बिम्बों को सांसारिक रूपों से पृथक् नहीं किया है, केवल शारीरिक रूप परिवर्तन हो गया है। 

जेराम पटेल में यह चमगादड़ों जैसे पंखों में देखा जा सकता है। सतीश गुजराल ने ज्यामिति तथा हठयोग के रूपों को उच्च तकनीकी विकास के साथ जोड़कर अद्भुत रूप सृष्टि की है जिसमें काष्ठ, स्टील, तथा काँच का भी प्रयोग है और गुप्त प्रकाश की व्यवस्था भी है।

1970 के लगभग कुछ कलाकारों ने इस रहस्यमय वातावरण को भंग किया और अपने चारों ओर के लोगों का चित्रण किया। इसे 1950 में आरम्भ हुई लोक जीवन के विषयों के चित्रण की प्रवृत्ति की ही पुनरावृत्ति समझनी चाहिये। अन्तर यही है। कि पहले व्यक्तियों का अंकन किया जाता था, अब सामान्य रूपों (टाइप चरित्रों का अंकन किया जाने लगा। 

जोगेन चौधरी ने बंगाली मध्य-वर्गीय लोगों के अंकन में शारीरिक विकृतियों के द्वारा मानसिक स्थितियों को मार्मिकता से व्यंजित किया । भूपेन खक्खर ने अपने चित्रों में जीवन के अधिक विवरण अंकित किये हैं उनके चित्रों की दुनियाँ के पात्र मक्कार, दीन, होशियार अथवा मानवीय हैं। गुलाम शेख की कला में यथार्थ और फन्तासी का समन्वय हुआ है। 

उनके दृश्यों तथा घरों के निजी (प्राइवेट) स्थानों में लाक्षणिक आकृतियाँ अंकित है। शहरों में रहने वाले चित्रकार कृष्ण खन्ना, ए०रामचन्द्रन, विकास भट्टाचार्जी आदि की कला में कोई परम्परागत निरन्तरता नहीं हैं। 

इनकी कृतियाँ एक पहेली के समान हैं। विवान सुन्दरम्, सुधीर पटवर्धन, नलिनी मलानी तथा गीव पटेल आदि आज की परिस्थितियों को रंगों तथा मनोवैज्ञानिक स्थितियों आदि के माध्यम से व्यक्त कर रहे हैं।

के० जी० सुब्रमण्यन परम्परा में तो दक्ष हैं ही, आधुनिकता के भी वे आचार्य हैं। उनकी कला में परम्परागत तकनीक के साथ आधुनिक रूपों तथा विकृतियों का अत्यन्त कुशल समन्वय हुआ है। आधुनिकता के साथ परम्परा का ऐसा सुदृढ समन्वय उनके समान किसी भी अन्य कलाकार में नहीं है ।

आधुनिक भारतीय चित्रकला के सामने कुछ संकट भी रहे हैं। इनमें मुख्य संरक्षकों का संकट, प्रेरणा का संकट तथा कला-दृष्टि का संकट । यह दुर्भाग्य ही है कि तीनों दृष्टियों से भारत के कलाकारों को विदेशों की ओर देखना पड़ रहा है। केवल एक सौ वर्ष पूर्व विदेशी कलाकार भारत में अपना भाग्य आजमाने आते थे किन्तु आज भारत के कलाकार विदेशों में अपना भाग्य आजमाने जाते हैं। 

अंग्रेजों के आगमन के पूर्व भारत में कलाओं के संरक्षक राजा, रईस और सामन्त थे किन्तु उनकी तुलना में अंग्रेजों में कलात्मक अभिरूचि अधिक थी और कम्पनी शासन के समय से ही भारतीय चित्रकार अंग्रेज अधिकारियों और पर्यटकों को चित्र बेचकर पर्याप्त आजीविका अर्जित कर लेते थे। 

बंगाल शैली के भी अनेक चित्र अंग्रेज गर्वनर तथा अन्य अधिकारी खरीद कर अपने साथ ले गये। उन्होंने उन चित्रों के लिये उस समय भी वह मूल्य दिया था जो भारतीय संरक्षक देने में समर्थ नहीं थे। यहीं से भारतीय कला के विदेशी ग्राहकों तथा संरक्षकों का बाजार शुरू होता है। 

बंगाल शैली के चित्र तो अंग्रेजों ने ठाकुर परिवार से मित्रता के कारण खरीदें, कम्पनी शैली के चित्र भारतीय जीवन पद्धति में उत्सुकता तथा कला शैली में पश्चिमी प्रभाव के कारण खरीदे। किन्तु सरकारी कला- विद्यालयों की स्थापना के पश्चात् भारतीय कलाकार पश्चिमी अकादमिक शैली की नकल के असफल प्रयत्न में लगे प्रभाववादी पद्धति की अनुकृति का परिणाम भी निराशाजनक ही हुआ । 

द्वितीय विश्व युद्ध के समय यामिनी राय, लक्ष्मण पै, सतीश गुजराल, सूजा, पनिक्कर आदि ने ईसाई धर्म से सम्बन्धित अनेक चित्र बनाये। इनमें कोई रहस्य नहीं है । इस समय युद्ध के कारण अनेक विदेशी सैनिकों का आवागमन भारत के बड़े-बड़े नगरों में होकर चल रहा था। 

वे यहाँ की स्मृति स्वरूप जो वस्तुएँ अपने साथ ले जाते थे उनमें कला-कृतियाँ भी होती थीं। इन ग्राहकों को ही ध्यान में रखकर केवल व्यापारिक उद्देश्य से ये ईसाई कलाकृतियाँ बनायी गयी थीं। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात् यद्यपि कला अकादमियों तथा संग्रहालयों ने चित्र क्रय करना आरम्भ कर दिया है किन्तु कलाकार विदेशों में चित्र-विक्रय से जो धन अर्जित कर रहे हैं उसकी तुलना में भारत में प्राप्त होने वाला धन नगण्य है। 

यह एक विडम्बना ही है कि भारतीय कला के विदेशी ग्राहकों द्वारा ही भारतीय कलाकारों द्वारा की जा रही पश्चिम की अनुकृति पसन्द नहीं की गयी और उनके द्वारा कुछ ऐसी वस्तु जो भारतीय हो और जो उनके देशों की कला में न मिलती हो, को खरीदने की इच्छा भी आधुनिक भारतीय चित्रकला में पश्चिम के अन्धाधुन्ध अनुकरण को रोकने का एक प्रबल कारण बनी ।

आधुनिक भारतीय चित्रकला में प्रेरणा का संकट भी बहुत जबर्दस्त रहा है। प्रायः सभी बड़े-बड़े आधुनिक भारतीय चित्रकार यूरोपीय कला-आन्दोलनों की उपलब्धियों की प्रशंसा करते नहीं थकते। 

यथार्थवाद, प्रभाववाद, अभिव्यंजनावाद, फॉयवाद, घनवाद, अतियथार्थवाद, अमूर्तता एवं पॉप कला आदि सभी प्रमुख यूरोपीय कला- आन्दोलनों से हमारे कलाकार निरन्तर प्रेरित होते रहे हैं सरकारी प्रयत्नों के बावजूद भारतीय कला का सम्बन्ध परम्परा से कट गया था और स्थानीय परम्परागत तकनीकों से नये कलाकारों का कोई सम्बन्ध नहीं रह गया था। 

स्वतंत्रता के पश्चात् जो नयी परिस्थितियाँ पैदा हुई थीं उनमें पीछे मुड़कर देखना सम्भव नहीं था और प्रगति के लिये सामने देखना अनिवार्य था अतः भारतीय कलाकारों का यूरोपीय आधुनिक कला की ओर स्वाभाविक रूप से झुकाव हो गया।

कला-दृष्टि के सम्बन्ध में भी यही बात हुई । भारत के अनेक कलाकार फ्रेंच तथा अमरीकी छात्रवृत्तियाँ लेकर कला के उच्च अध्ययन के लिये विदेश गये। जब वे लौटकर आये तो उन्होंने बड़े गर्व से कहा कि भारतीय प्राचीन कला तथा मध्यकालीन लघु चित्रकला को समझने की दृष्टि उन्हें यूरोप से मिली। 

आज की भारतीय कला में भारत की लोक कला अथवा परम्परागत शैलियों आदि का जो प्रयोग किया जा रहा है, उसके संयोजनों तथा आधुनिकीकरण के पीछे यही दृष्टि कार्य कर रही है।

कलकत्ता ग्रुप

1940 के लगभग से कलकत्ता में भी पश्चिम से प्रभावित नवीन प्रवृत्तियों का उद्भव हुआ । 1943 में प्रदोष दास गुप्ता के प्रयत्नों से कलाकारों के कलकत्ता ग्रुप का उदय हुआ जिसमें गोपाल घोष, प्राण कृष्णपाल, सुनीलमाधव सेन, नीरद मजूमदार, रथीन मित्रा, परितोष सेन, हेमन्त मिश्र तथा मूर्तिकार प्रदोषदास गुप्ता आदि ने भाग लिया था। 

इनका कथन था, “व्यक्ति सर्वोपरि है, उससे ऊपर कुछ भी नहीं है।……. कला अन्तर्राष्ट्रीय और स्वयं पर आश्रित होनी चाहिये।”

जिस समय इस दल की स्थापना हुई उस समय बंगाल पर दुर्भिक्ष के काले बादल मँडरा रहे थे और जन-मन में गहन निराशा का अंधकार छाया हुआ था। श्रीमती कैसी के प्रयत्नों से 1944 में जब इनकी प्रथम प्रदर्शनी हुई तो इनकी बहुत आलोचना हुई और लोगों ने इनके चित्रों को भोंडे तथा भो कहा। किन्तु कुछ आलोचकों ने इनकी प्रशंसा भी की अमेरिकी और जर्मन कला-मर्मज्ञों ने इनकी पीठ थपथपाई। 

1948 से इन्हें सफलता मिलनी आरम्भ हुई। 1947-48 में ही बम्बई में एक “प्रगतिशील कलाकार दल” (प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स, पेग) का गठन हुआ था। 1950 में कलकत्ता और बम्बई के दोनों दलों की एक मिली-जुली प्रदर्शनी कलकत्ता में हुई तभी से कलकत्ता ग्रुप विशेष प्रसिद्ध हुआ। 

कुछ समय पश्चात् प्रदोषदास गुप्ता नेशनल आर्ट गेलरी के क्यूरेटर हो गये, रथीन मित्रा दून स्कूल में अध्यापक हो गये और प्राण कृष्णपाल नई दिल्ली के वायुसेना स्कूल में कला शिक्षक हो गये। शनैः-शनैः यह दल विघटित हो गया।

गोपाल घोष (1913-1980) 

आधुनिक भारतीय कलाकारों में रोमाण्टिक के रूप में प्रतिष्ठित कलाकार गोपाल घोष का जन्म 1913 में कलकत्ता में हुआ था। उनके पिता स्वयं एक अच्छे कलाकार थे अतः बचपन से ही गोपाल को अच्छे संस्कार प्राप्त हुए कलागुरु अवनीन्द्रनाथ ठाकुर की प्रेरणा से गोपाल को आगे बढ़ने का उत्साह मिला। 

आगे चलकर वे जयपुर स्कूल आफ आर्ट्स में प्रविष्ट हुए और 1935 में वहाँ से कला में डिप्लोमा प्राप्त किया। 1937 में दो मित्रों के साथ घूम-घूम कर देश भर के मन्दिरों तथा दृश्यों का अंकन और प्रदर्शन किया। फिर दक्षिण भारत की ओर आकर्षित हुए और मद्रास स्कूल आफ आर्ट में प्रविष्ट हो गये। 

1938 में वे यहाँ से डिप्लोमा प्राप्त कर पुनः कलकत्ता लौटे तथा कुछ समय पश्चात् गवर्नमेण्ट स्कल ऑफ आर्टस कलकत्ता में कला के प्राध्यापक हो गये। 1948 से 1954 तक वे इण्डियन सोसाइटी ऑफ ओरियण्टल आर्ट में भी कला शिक्षक रहे ।

गोपाल घोष कलकत्ता-ग्रुप के बोहीमियन कलाकार माने जाते हैं। उन्होंने विभिन्न शैलियों में कार्य किया है और पश्चिम की आधुनिक कला-प्रवृत्तियों से भी प्रभावित हुए हैं। उन्होंने प्रकृति का सुन्दर चित्रण किया है रेखाओं की सादगी और जीवन्तता उनके चित्रों की मुख्य विशेषताएँ मानी जाती हैं। 

चित्रों में अद्वितीय तूलिका प्रयोग और टेक्सचर है। वे भारतीय आधुनिक प्राकृति दृश्य-चित्रण के जन्मदाओं में से हैं। उनकी रंग योजनाएँ अत्यन्त समृद्ध है।

उनके जल रंग-चित्रों में चीनी दृश्य चित्रों के समान सौन्दर्य है। उन्होंने लोक-जीवन तथा प्रकृति के जो चित्र बनाये हैं उनमें वातावरण की सूझ-बूझ, रूपाकारों की अनुभूति का लयात्मक एवं आकर्षक संयोजन हुआ है। फिर भी उनकी कला-कृतियों में रंगों की तुलना में रेखाओं का सौन्दर्य अधिक प्रभावित करता है।

हेमन्त मिश्र (1917) 

असम के चित्रकार हेमन्त मिश्र एक मौन साधक हैं। वे कम बोलते हैं। वेश-भूषा से क्रान्तिकारी लगते है अपने रेखा-चित्रों में वे अपने मन की बेचैनी को प्रकट करना चाहते हैं, अपनी कृतियों को विद्रोही, हिंसक रूप देना चाहते हैं। किन्तु अपने रंगीन चित्रों में ये शान्त स्वभाव के दिखाई देते हैं। 1950 के लगभग वे कलकत्ता ग्रुप के सदस्य चुन लिये गये थे।

आरम्भ में उन्हें कला की शिक्षा के लिये असम में कोई सुविधा नहीं मिलीं। उन्होंने पत्राचार पाठ्‌यक्रम द्वारा इंग्लैण्ड से कला-शिक्षा में प्रगति की। इग्लैण्ड की शिक्षा-पद्धति से उन्हें ब्रिटेन की एक-एक पग आगे बढ़ने की अकादमी-पद्धति का संस्कार मिला। उनके रेखाचित्रों में यह स्पष्ट है। 

उनके रंग-चित्र प्रायः प्राकृतिक दृश्य थे अथवा कार्य करते व्यक्तियों को वातावरण के साथ मिला कर अंकित करने वाले चित्र ये जिनमें दृश्य के वृक्षों या पत्थरों आदि के समान ही मानवाकृतियों को सामंजस्यपूर्ण विधि से संयोजित किया जाता था।

कुछ कारणों से हेमन्त को व्यावसायिक कलाकार बनना पड़ा। इससे उनकी आकृतियों में अधिक निखार आ गया। चित्र अब अधिक नपे-तुले और वस्तुएँ अपने स्वभाव के अनुसार बनने लगीं; पत्थर कठोर, बादल हल्के, पानी घोल जैसा।

1952 से हेमन्त की कला में दूसरा युग आरम्भ हुआ जिसे घनवादी कहा जा सकता है पर इन रूपों में कोई आन्तरिक गढ़न नहीं दिखायी गयी थी। मिश्र ने वस्तुओं की केवल बाहरी गढन को ही अंकित किया। उन्होंने घनवादी रूपों को लयात्मक विधि से संयोजित किया। 

1959 के लगभग उन्होंने इन रूपों के साथ पृष्ठभूमि को रहस्यात्मक बनाना आरम्भ किया। वे विकृति किये अथवा तोड़े-मरोड़े गये रूपों को बारीक विवरणों सहित अंकित करने लगे। ये रूप सार्थक प्रतीक बनते चले गये। यहीं से हेमन्त की कला में ‘अतियथार्थवाद’ आरम्भ हुआ। 

उन पर यूरोपीय अतियथार्थवादी चित्रकारों डाली तथा अर्न्स्ट का भी प्रभाव पड़ा। उन्होनें पर्वतों, चट्टानों अथवा भवनों के ढाँचों को नष्ट होते हुए समय का प्रतीक माना है। वस्तुओं को शनैः शनै क्षरणशील अवस्था में चित्रित किया गया है। हेमन्त मिश्र के चित्रों में कल्पना के अनन्त रूप दिखाई देते हैं। 

चमकदार रंगों में पास-पास चित्रित वस्तुएँ विचित्र तथा कल्पनात्मक होते हुए भी अपना रूपात्मक अर्थ रखती हैं। मिश्र के रंग भी अपने अलग अस्तित्व का प्रयत्न न करके वातावरण में लीन होना चाहते हैं। वे अपनी ही संगति बनाते हैं और चित्र से एक रहस्यात्मक संदेश देते हैं। 

वस्तुओं की गहरी छाया और अति प्रकाशित किनारे भी इस रहस्यात्मकता में वृद्धि करते हैं। इससे उनकी आकृतियाँ प्रेतों की भाँति भी लगती है। इस तकनीक पर साल्वाडर डाली का प्रभाव है। जिस प्रकार डाली आदि यूरोपीय कलाकारों की उग्र विद्रोही प्रवृत्ति दादाबाद

में प्रकट हुई थी किन्तु दादावादी आन्दोलन के असफल हो जाने पर एक संयत रूप में अतियथार्थवाद में आ गई थी उसी प्रकार हेमन्त मिश्र की विद्रोही प्रवृत्ति भी पहले रेखा-चित्रों में उम्र रूप में प्रकट हुई और बाद में रंगीन चित्रों में संयत हो गयी। हेमन्त मिश्र के कुछ प्रसिद्ध चित्र हैं; प्रिमिटिव एअर, वर्स ऑन फायर, ईको ऑफ ए सौंग तथा परस्यूरिंग द फेडिंग गॉड आदि ।

हेमन्त मिश्र कलकत्ता ग्रुप से जुड़े रहे हैं और 1943 से ही इस ग्रुप के साथ अपनी प्रदर्शनियाँ लगाते रहे हैं। वे 1947 में कलकत्ता की अखिल भारतीय प्रदर्शनी के सलाहकार भी रहे थे।

नीरद मजूमदार (1916-1982)

नीरव (अथवा बंगला उच्चारण में नीरोद) को नीरद चौधरी के नाम से भी लोग जानते हैं। उनकी कला में प्राचीन भारतीय विचारधारा तथा देवी-देवताओं की आकृतियों का प्रयोग नये संयोजनों में हुआ है। प्रो०ए०एल०वाशम का विचार है कि पिछले एक सी वर्ष में इस प्रकार की कोई भी कृति नहीं बनीं। 

इण्डियन सोसाइटी ऑफ ओरिएण्टल आर्ट से कला का डिप्लोमा प्राप्त करने और वहीं अवनीन्द्रनाथ ठाकुर के शिष्य रहने पर भी मजूमदार पुनरूत्थानवादी या कट्टर परम्परावादी कलाकार नहीं थे। उन्होंने विभिन्न सभ्यताओं का अध्ययन करके जो सौन्दर्य दृष्टि प्राप्त की थी उसी के कारण वे प्राचीन भारत की शब्दावली और बिम्बों का प्रयोग करते थे।

मूल रूप में कला प्रतीकात्मक और अनुष्ठान मूलक रही है और केवल पिछले कुछ समय से ही यह उससे अलग होकर अपवित्र हो गयी है, ऐसा वे मानते थे।

1946 में ये एक छात्रवृत्ति पर पेरिस गये और वहाँ इकोल द लून में कला का अध्ययन किया और तीन वर्ष बाद बारबिजां गैलरी में अपनी चित्र-प्रदर्शनी की। 

1950 से 1955 तक वे लन्दन में रहे और सारे इंग्लैण्ड में अनेक प्रदर्शनियाँ आयोजित की। वे पश्चिमी आधुनिक कला के आचार्यों से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपने पहले बनाये सभी चित्र नष्ट करदिये और नयी चित्र श्रृंखला “कुछ चुनी हुई प्रतिमाएँ’ बनाकर पेरिस में 1957 में प्रदर्शनी की उन्होंने इस प्रकार के 23 चित्र बनाये। इनके अतिरिक्त अनन्त का पंख के 15 चित्र, दृश्य-ऋचाओं के 13 तथा 9 अन्य प्रतीक चित्र भी उन्होंने 1964 तक अंकित किये। सभी चित्रों में एक प्रतीकात्मक ज्यामितीय आधार पर चित्र – अन्तराल को व्यवस्थित किया गया है। 

सब में एक जैसा एक केन्द्र बिन्दु है जो हृदय पुष्कर है। इसी के अनुसार चित्रों में समस्त पैटर्न वितरित किये गये हैं। यह किसी अन्तराल पर स्थित नहीं है फिर भी सम्पूर्ण अन्तराल को देखता है। यह एक चित्र का दूसरे चित्र से दृष्ट सम्बन्ध जोड़ता है।

नीरद कला को एक क्रिया मानते थे पर पश्चिमी एक्शन-पेण्टर्स की भांति नहीं। ये कला की क्रिया के द्वारा मनको शान्त करने में विश्वास करते थे प्रतीक इसमें सहायक होते हैं। प्रतीक का अंकन इस प्रकार किया जाता है कि उसका अर्थ बहुत लचीला हो जाता है और वह अन्य अनेक वस्तुओं तथा अर्थों की ओर भी संकेत कर सकताहै, से दर्शक के अनुसार । 

अतः कलाकार केवल रूप ही अंकित नहीं करता, रूप | कुछ अन्य बात भी कहता है। नीरद ने अपने चित्रों में देवनागरी लिपि का भी प्रयोग किया है और चित्र में उसे बड़ी खूबी से पिरो दिया है।

नीरद के अनुसार ज्यामितीय व्यवस्थामें ही कलाकार अभिव्यक्ति करने में सफल होता है वह जैविक रूपों को न देखकर ब्रह्माण्डीय रूप को देखता है और उसी की एकता (Unity) दिखाने का प्रयत्न करता है।

रथीन मित्रा (1926) 

रथीन मित्रा का जन्म हावड़ा में 26 जुलाई को 1926 में हुआ था। उनकी कला-शिक्षा कलकत्ता कला-विद्यालय में हुई । तत्पश्चात् वेदून स्कूल के कला-विभाग में शिक्षक नियुक्त हुए और वहाँ अध्यक्ष पद पर आसीन हुए 1959 में वे ब्रिटिश काउन्सिल एजुकेशनल एक्सचेंज स्कालरशिप कार्यक्रम के अन्तर्गत ब्रियन्स्टल पब्लिक स्कूल डोरसेट गये। 

उन्होंने कलकत्ता, दिल्ली, लखनऊ, देहरादून, सिंगापुर तथा टोक्यो में अपने चित्रों की अनेक प्रदर्शनियों आयोजित कीं। उनके चित्र राष्ट्रीय आधुनिक कला वीथी नई दिल्ली, इलाहाबाद तथा उत्तर-प्रदेश ललित कला अकादमी लखनऊ के संग्रहों में हैं।

श्री रथीन मित्रा ने अत्यन्त साधारण तथा दैनिक जीवन में दिखाई देने वाली वस्तुओं और घटनाओं का ही चित्रण कियाहै, पर वे उन्हें कलात्मक एवं नाटकीग रूप में प्रस्तुत करते हैं। सशक्त रेखा का प्रयोग उनकी मुख्य विशेषता है किन्तु कहीं-कहीं तूलिका पर उनके अधिकार में कुछ कमी भी आ गयी है।

श्री मित्रा कलकत्ता ग्रुप के तो आरम्भिक सदस्य थे ही, वे दून आर्ट सोसाइटी तथा उत्तर-प्रदेश ललित कला अकादमी के भी सदस्य हैं।

प्रगतिशील कलाकार दल

कलकत्ता की तुलना में बम्बई नया शहर है किन्तु उसका विकास बहुत अधिक और शीघ्रता से हुआ है। 1911 में अंग्रेजों ने भारत की राजधानी कलकत्ता से दिल्ली में स्थान्तरित कर दी थी। 1933-34 में बंगाल में दुर्भिक्ष पड़ा और 1947 में स्वतंत्रता के साथ ही बंगाल का विभाजन करके उसका पूर्वी भाग पाकिस्तान को दे दिया गया। 

इसके विपरीत बम्बई का बन्दरगाह के रूप में भी पर्याप्त विकास हुआ और द्वितीय विश्वयुद्ध के समय यहाँ सप्लाई डिपो होने के कारण मित्र राष्ट्रों की सेनाओं का आवागमन रहा जिससे यहाँ के आर्थिक क्रिया-कलापों में पर्याप्त गतिशीलता रही। कनु देसाई तथा अचरेकर जैसे कलाकारों ने फिल्मों में कला-निर्देशन भी किया और कलाओं को चहुँमुखी विकास का अवसर मिला। 

बम्बई कला-विद्यालय अंग्रेज शिक्षकों की परिपाटी पर ही चल रहा था बम्बई के जन-जीवन की ही भाँति कलाओं पर भी अन्तर्राष्ट्रीय प्रभाव पड़ा। बम्बई कला विद्यालय केवल वाश तकनीक का ही पक्षपाती नहीं था, वह कलामें सार्वभौमिक प्रवृत्तियों को विकसित करना चाहता था यहीं पर 1948 में प्रगतिशील कलाकार दल की स्थापना हुई। 

यद्यपि इस दल ने केवल दो प्रदर्शनियाँ ही मुख्य रूप से आयोजित की और 1952 में इसका विघटन भी हो गया। तथापि आधुनिक भारतीय चित्रकला में यह अपनी अमिट छाप छोड़ गया है। आरा, रजा, सूजा, हुसैन, गाडे, बाकरे, रायबा तथा गायतोंडे आदि के इस दल ने मुख्यतः पश्चिमी कला शैलियों से प्रेरणा ली और तेल माध्यम का प्रयोग किया। 

इन्होंने गुजराती लघु चित्रों का आधार लेकर अपनी रूप-योजना विकसित की तथा धीरे-धीरे राष्ट्रीय कला- शैलियों का विकास किया। इनकी कला में मातिस, पिकासो, गॉगिन तथा क्ली आदि पश्चिमी आधुनिक कलाकारों और भारत के कथकलि नृत्य, आदिवासी मुखौटों, लोक प्रचलित खिलौनों, गुजराती (अपभ्रंश) लघु चित्रों, कालीघाट के बाजार में बिकने वाले पट-चित्रों, मंदिरों की मूर्तिकला तथा शास्त्रीय संगीत की प्रेरणा भी है। इस दल के कलाकारों की देश-विदेश में काफी चर्चा हुई है । 

इनमें हुसैन आज भारत के सर्वाधिक प्रसिद्ध तथा अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त चित्रकार हैं। सूजा तथा रजा विदेश में रहते हैं और कभी-कभी भारत आते रहते हैं सभी कलाकारों का उद्देश्य प्रायः अभिव्यंजनात्मक है। इन्हें नव गुजराती शैली के चित्रकार भी कहा गया है।

तथा कथित नव-गुजराती स्कूल- इस स्कूल के अन्तर्गत पनपने वाली प्रवृत्ति 1940 से 1960 के मध्य ही अधिक सक्रिय रही। इनमें बम्बई के चित्रकार अधिक थे। 

चार्ल्स फाबरी ने इन्हें “नव गुजराती स्कूल” नाम दिया है। 14वीं, 15वीं तथा 16वीं शती के प्राचीन गुजराती पुस्तक-चित्रों की अत्यन्त अलंकृत पैटर्न युक्त शैली पर आधारित होते हुए भी ये उनकी नकल नहीं है। 

इनमें बहुत अधिक मौलिकता हैं और इन्होंने नये विचारों को प्रस्तुत करने के लिए ही इस कला-रूप की तात्विक विशेषताओं का उपयोग किया है ।

इनके चित्रों में पुरानी विशेषताएँ कम या अधिक मौजूद हैं किन्तु वे भारतीयता की अनुभूति कराने के लिए एक अकृत्रिम व्यंजना- माध्यम के रूप में पुनः पहचानी गयी हैं।

बड़ी-बड़ी तथा विस्तृत आँखें, कोणीय आकृतियाँ, सीधी बड़ी नासिका जिसका सिरा नुकीला है, बिना छाया-प्रकाश के खनिज रंगों का प्रयोग, धरातलों का वैपरीत्यपूर्ण अंकन, सुन्दर अलंकरण-युक्त कालीनों आदि के समान बिना छाया वाले धरातल, अलंकृत पत्र विन्यास वाले वृक्ष, अलंकृत वस्त्र, परिप्रेक्ष्य रहित दृश्य-संयोजन, आकृतियों को एक तल के ऊपर बने दूसरे तल पर अंकित करते जाना, सबका एक ही स्तर- ये सब विशेषताएँ गुजराती चित्रों में भी हैं। 

ये भारतीय स्वभाव के अनुकूल हैं और आधुनिक प्रतीत होती हैं, विशेष रूप से तब जबकि इन्हें सपाटेदार तूलिकाघातों के द्वारा चित्रित किया गया है। हुसैन तथा हैब्बर जैसे बड़े कलाकार भी इनसे प्रभावित हुए हैं।

प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप (PAG) पैग, बम्बई (1948-1952)- जिस समय कला के क्षेत्र में बंगाल शैली के साथ-साथ अमृता शेरगिल, रवीन्द्रनाथ ठाकुर तथा यामिनीराय आदि को भी मान्यता मिलने लगी थी, भारतीय कलाकार आधुनिकता की खोज में यूरोप के अनेक नये कला-आन्दोलनों का ही पिष्टपेषण कर रहे थे। किन्तु भारत की आधुनिक कला का न तो बंगाल शैली से ही उद्धार हो सकता था और न पश्चिम की थोथी अनुकृति से ही बड़े-बड़े नगरों में कला को प्रोत्साहन देने की दृष्टि से जो आर्ट सोसाइटियाँ बन गयी थीं उनमें भी खुले विचारों वाले व्यक्ति बहुत कम थे। ऐसी स्थिति में कलाकारों ने स्वयं ही मिल-जुल कर अपने लिये कार्यक्रम और घोषणा पत्र तैयार किये । इस प्रकार बनने वाले सभी दलों का इतिहास भारतीय स्वतंत्रता के आस-पास आरम्भ होता है।

सन् 1948 में बम्बई में कुछ कलाकारों ने मिलकर एक दल बनाया जिसे “प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप” कहा गया । संक्षिप्त रूप में इसे ‘पैग’ भी कहते हैं। पैग से पूर्व कलकत्ते में 1943 में भी एक दल बनाया। जिसका संकेत दिया जा चुका है। बम्बई में पैग के निर्माण की भी एक रोचक घटना है। 

बम्बई के एक कलाकार कृष्ण हावला जी आरा अपना एक विशाल केनवास प्रदर्शन के उद्देश्य से “बम्बई आर्ट सोसाइटी” में लेकर गये। वहाँ उनका चित्र अस्वीकृत कर दिया गया। आरा को इससे बड़ी खिन्नता हुई, वे तुरन्त सूजा के यहाँ पहुँचे। वहाँ उन्हें रज़ा भी मिल गये। 

सबने मिलकर एक दल बनाने का निश्चय किया और उसका नाम रखा गया “प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप” । ग्रुप में अधिक सक्रियता लाने के लिये तीन सदस्य और लिये गये हुसेन, गाडे तथा बाकरे। बम्बई की एक औषधि-निर्माता कम्पनी ने इस दल को संरक्षण दिया। 

दल की प्रारम्भिक बैठक गिरगाम में हुई । अपने घोषणा-पत्र में इन्होंने लिखा कि “प्रो का अर्थ आगे (फारवर्ड) से है, जहाँ कि हम जाना चाहते हैं।” इस दल की प्रथम प्रदर्शनी 7 जुलाई 1949 को हुई ।

इस ग्रुप को सौन्दर्य शास्त्रीय स्तर पर कलात्मक ऊँचाई और नयी दिशा देने में सूजा की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, अतः सूज़ा को “पैग” का महासचिव मनोनीत किया गया। इन सबके कार्य, ग्रुप की विचारधारा तथा उद्देश्यों के अनुसार केटेलाग तैयार किया गया। 

गाडे कोषाध्यक्ष, आरा जन सर्क अधिकारी, रजा कला के संग्रहकर्त्ताओं से तालमेल बिठाने वाले बने। शेलशिंगर के अतिरिक्त आर० वी० लीडन, हर्मन गोएत्ज तथा हार्टवेल आदि विदेशी कला-संग्रह-कर्त्ताओं तथा कला-प्रशंसकों ने भी पैग के विकास को प्रोत्साहित किया।

पैग की प्रथम प्रदर्शनी 7 जुलाई 1949 को “बम्बई आर्ट सोसाइटी” के सेलून में हुई जिसका उद्घाटन मुल्कराज आनन्द ने किया। इस प्रदर्शनी के केटेलाग में सूजा ने कहा था कि आज जिस प्रकार कलाकारों के मध्य की दूरी बहुत अधिक है। 

उसी प्रकार आम आदमी और कलाकार के मध्य की खाई भी बहुत बड़ी है और इसे पाटा नहीं जा सकता पैग के हम कलाकार अराजकता की सीमा तक स्वतंत्र होते हुए भी सौन्दर्यशस्त्र के कुछ नियमों, सामंजस्य तथा रंग-सेयाजनों के कुछ शाश्वत सिद्धान्तों से परिचालित हैं। 

हम किसी स्कूल या आन्दोलन को पुनः जीवित करने का प्रयत्न नहीं कर रहे हैं। हम विभिन्न शैलियों का अध्ययन कर चुके हैं और एक शक्तिशाली समन्वयात्मक रचना-पद्धति तक पहुँचना चाहते हैं।

पैग की इस प्रदर्शनी का संचार माध्यमों ने बहुत प्रचार किया। कला प्रेमियों तथा दर्शको ने भी इनकी प्रशंसा की और अन्य कलाकारों ने भी सराहना की। कला-समीक्षक आर०पी० लीडन ने लिखा था कि यह प्रदर्शनी संघर्ष, प्रयोगों तथा उसकी पृष्ठभूमि के परीक्षण की विचारणीय उपलब्धियों को प्रस्तुत करती है। 

कला-आलोचक श्री जगमोहन ने इसकी पर्याप्त प्रशसा की। उन्होंने लिखा कि “प्रत्येक कलाकार ने स्वयं को एक नयी दिशा में विकसित किया है। आरा जो फूलों और दृश्यों के चितेरे थे, अब वेश्याओं, जुआरियों और निखारियों को चित्रित कर रहे हैं। 

प्रभाववादी रजा अब आकर्षक ज्यामितीय और धनवादी प्रयोग कर रहे हैं। सूजा की विकृति का आधार आदिम और क्लासीकल मूर्तियाँ हैं। परिप्रेक्ष्य और संयोजन में गाडे वान गॉग के समान ” सूरत, बड़ौदा, अहमदाबाद आदि में भी इस ग्रुप की प्रदर्शनियों आयोजित की यी बम्बई की एक प्रदर्शनी में सूजा पर अश्लीलता का आरोप लगाया गया और उनके स्टुडियो पर पुलिस ने असफल छापा मारा। 

समाचार-पत्रों में भी इस घटना की चर्चा हुई। सूजा इन दिनों विदेश यात्रा की तैयारी में थे। वे चित्रों को बेच कर आर्थिक साधन जुटाकर अपनी पत्नी मारिया के साथ लन्दन चले गये। 1951 से वे विदेशों में ही हैं।

पैग तथा कलकत्ता ग्रुप के कलाकारों की एक सम्मिलित प्रदर्शनी 1950 में बम्बई में भी आयोजित की गई। इसके एक भाग को प्रेस ने कंजरवेटिव तथा दूसरे भाग को नये आन्दोलन के रूप में चर्चित किया। इस प्रदर्शनी के कुछ समय पश्चात् फ्रेंच छात्रवृत्ति मिलने के कारण रज़ा भी अक्टूबर 1950 में पेरिस चले गये और उनके बाद सदानन्द बाकरे भी अपना भाग्य आजमाने लन्दन चले गये। 

यहीं से यह ग्रुप बिखरने लगा सूजा, रजा तथा बाकरे के विदेश चले जाने के पश्चात् तैयब मेहता, कृष्ण खन्ना तथा गायतोंडे ने हुसैन, आरा तथा गाडे के साथ दल की गतिविधियों को चालू रखा। 

उन दिनों चित्रकारों के चित्रों की प्रदार्शनियाँ टाउन हाल, सर कावसजी जहाँगीर हाल तथा चेतना रेस्तरों में होती थीं। फ्रेम-निर्माताओं की दुकानों पर भी कलाकारों के चित्र प्रदर्शन एवं विक्रय हेतु रखे जाते थे। उन दिनों फ्रेम भी कलाकारों के नाम से प्रसिद्ध ये जैसे हेब्बार स्टाइल, चावड़ा स्टाइल, आलमेलकर स्टाइल आदि प्रोफेसर लेंगहॅमर आस्ट्रेलिया के एक कलाकार थे जो 1937 से भारत में आकर रह रहे थे। 

पैग कलाकारों के साथ उनके अच्छे सम्बन्ध थे अतः उनक’ कहने पर सर कावस जी जहाँगीर ने इन लोगों को प्रदर्शन हेतु एक स्थान दे दिया जहाँ २९ जनवरी १६५२ को महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री बी० जी० खेर ने जहाँगीर आर्ट गैलरी का उद्घाटन किया।

6 सितम्बर 1952 को बम्बई आर्ट सोसाइटी सेलून द्वारा पैग की दूसरी एवं अन्तिम प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। इसमें सूजा, रजा, आरा, हुसैन और गाडे के वी०एस० गायतोंडे, कृष्ण खन्ना, एम० छापर और राजोपाध्याय आदि बारह कलाकारों अतिरिक्त कुछ नये कलाकारों भानु स्मार्त, ए० ए० रायबा जी० एम० हज़ारनीस, के चित्र रखे गये। 

इस बार कृष्ण खन्ना ने पैग के लिये केटेलाग तैयार किया। हुसैन जो इस समय तक काफी प्रसिद्ध हो चुके थे, 1953 में विदेश यात्रा पर निकल पड़े।

इस प्रकार चार मूर्धन्य कलाकारों सूजा, रजा, बाकरे तथा हुसैन के बाहर चले जाने से पैग ग्रुप एक प्रकार से निष्क्रिय हो गया। कुछ समय पश्चात् बम्बई एक नये ग्रुप का भी निर्माण हुआ जिसमें पलसीकर, हैबार, बेन्द्रे, लक्ष्मण पै, मोहन सामन्त, अकबर पदमसी, तैयब मेहता तथा वी० एस० गायतोंडे थे, किन्तु यह ग्रुप अधिक सक्रिय नहीं रह सका।

प्रगतिशील कलाकारों के दल (पैग) की सबसे महत्वपूर्ण देन यह है कि इसने कला को राष्ट्रीय परिधि से बाहर निकाला और पाश्चात्य कला की तकनीक एवं अभिव्यक्ति के समान्तर भारतीय कला को अन्तर्राष्ट्रीयता से जोड़ दिया। कला को नई दिशा देने की ओर यह साहसिक कदम था।

के० एच० आरा (1914-1985)

कृष्ण जी हावला जी आरा का जन्म सिकन्दराबाद के एक छोटे से उपनगर बोलाराम में 14 अप्रैल 1914 को हुआ था। आपके पिता कार ड्राइवर थे। उन्होंने बालक को प्यारा-सा नाम दिया- किशन। तीन वर्ष की आयु में किशन की माँ की मृत्यु हो गयी। नानी ने बालक को सम्भाला। 

बोलारम में पाँचवीं कक्षा तक हिन्दी और दो कक्षा उर्दू के उत्तीर्ण किये। आरा महाराष्ट्रियन थे। स्कूल में उत्तर-प्रदेश के एक अध्यापक महादेवसिंह ने किशन को पुत्रवत् स्नेह दिया। महादेवसिंह को चित्रकला का शौक था किन्तु उन्हें छोड़कर उसे बम्बई जाना पड़ा जहाँ उसने पिताजी के बाँस के घर नोकरी कर ली। 

वहाँ बालक किशन को एक अच्छा वातावरण मिला और अवकाश के समय वह चित्रांकन भी करता रहा। तीन वर्ष बाद किशन को दूसरी जगह नौकरी करनी पड़ी। वहाँ उसके अंग्रेज कर्नल बॉस ने ड्राइंग में उसकी रूचि देखकर उसे गिरगॉव के केतकर इन्स्टीटयूट में प्रवेश दिला दिया । किशन ने तीन महीने में इण्टर ग्रेड की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली।

1929 में कांग्रेस का स्वातंत्र्य आन्दोलन जोर से चला तो किशन चुपचाप उसमे सम्मिलित हो गया। वह गिरफ्तार हुआ और पाँच महीने की कैद हुई वहाँ से लौटने पर याकोहामा बैंक में 1930 से 1940 तक क्लीनर का काम किया। 18 रूपये वेतन में से 10 रूपये कला सीखने पर व्यय किया और 8 रूपये में खर्चा चलाया। गिरगाव में कला की कक्षाओं में भी जाने लगा।

1935 से कला-प्रदर्शनी में भाग लेने की तैयारी आरम्भ कर दी। राधाकृष्ण क एक चित्र बम्बई आर्ट सोसाइटी को भेजा पर वह अस्वीकृत हो गया। इससे किशन को बहुत निराशा हुई। किन्तु उसके मित्रों ने आग्रह करके 1935 की आर्ट सोसाइटी आफ इण्डिया में उसके पांच चित्र भिजवा दिये। वहाँ उसे सिल्वर मैंडिल, दो अन्य पुरस्कार तथा प्रमाण-पत्र मिले। इसके पश्चात् जहाँ भी चित्र भेजे, पुरस्कार मिले।

1939 में बम्बई आर्ट सोसाइटी का इनाम भी मिला। अब वह किशन के बजाय कृष्ण हावला जी आरा हो गया और लोग उसे आरा के नाम से जानने लगे। इन्हीं दिनों आरा को प्रो० लॅगहेमर, जे०जे० स्कूल बम्बई के प्रिंसिपल जेरार्ड तथा कलाविद् लीडन आदि से मिलने का अवसर प्राप्त हुआ। 

1940 में द्वितीय विश्व युद्ध आरम्भ हो जाने के कारण जापानी बैंक बन्द हो गया और आरा बेकार हो गये। उन्होंने एक वर्ष लेंगहेमर से कला की शिक्षा प्राप्त की। 1944 में उन्हें जल-रंग चित्र “मराठा बैटिल” पर गवर्नर का पुरस्कार मिला। 1942 से ही आरा ने एकल प्रदर्शनियाँ भी आरम्भ कर दी थीं।

1947 में एक चित्र लेकर आरा बम्बई आर्ट सोसाइटी गये तो उनका चित्र अस्वीकृत कर दिया गया। वे तुरन्त सूजा के यहाँ पहुँचे। वहीं रजा भी थे। सबने मिलकर प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप की स्थापना की।

1952 में जहाँगीर आर्ट गैलरी के उद्घाटन के समय चित्र प्रतियोगिता में आरा को स्वर्ण पदक और दो हजार रूपये का नकद पुरस्कार मिला। अब वे नियिमत रूप से एकल प्रदर्शनी करने लगे। 

1961 में आरा को बल्गारिया जाने का अवसर मिला। लौटते समय फ्रांस सरकार के भी अतिथि बने और आठ दिन स्विटजरलैण्ड भी रहे। 1963 में बम्बई में उन्होंने अनावृताओं के चित्रों की प्रदर्शनी की जिसकी बहुत चर्चा हुई।

1964 में उनके पचास वर्ष के होने पर उनकी एकल प्रदर्शनी का उद्घाटन डा० होमी जहाँगीर भाभा ने किया। तब उन्होंने अपने चित्रों का मूल्य एक सौ रूपये रखा। 61 वें जन्म दिन पर यह कीमत घटाकर 90 रुपये कर दी। वे चाहते थे कि उनके चित्र घर-घर पहुँचे। 1983 में आरा को ललित कला अकादमी का फैलो निर्वाचित किया गया। 30 जून 1985 को आरा की मृत्यु बम्बई में हृदयगति रूक जाने से हुई।

आरा ने रेखा चित्रों और वाश पेण्टिंग से अपना काम आरम्भ कियाथा। बहुत समय तक यथार्थवादी चित्र बनाये। फिर ज्यामितीय आकारों के प्रतीक चुने और अमूर्त रचना की कुछ समय तक जल-रंगों में “डाइरेक्ट पेण्टिंग” भी की। उसके पश्चात् तैल रंगों में स्टिल लाइफ तथा अनावृताओं के चित्र बनाये। 

अनेक लोगों ने उन्हें अशिक्षित, स्वयं-शिक्षित या ‘आदिम’ कलाकार भी कहा। उन्होंने नारी की अनावृत आकृति को अनेक प्रकार की पृष्ठभूमियों सहित अंकित किया जिन्हें लेकर पर्याप्त वाद-विवाद भी हुआ और चर्चा भी रही। 

फिर एक और दौर आया “कट केनवासों का, जिनमें केनवास को इच्छित स्थान पर काट दिया जाता है। ऐसा उनका एक कट-केनवास बहुत पसन्द किया गया था। उनके प्रयोग आगे भी चलते रहे हैं। ये जिया सरहदी की फिल्म ‘हम ‘लोग’ के कला-निर्देशक भी रहे थे।

आरा ने विवाह नहीं किया अतः उनकी बहुत अधिक महत्वाकांक्षाऐं नहीं रही। आरा को यूनेस्को द्वारा भी पुरस्कृत किया जा चुका है।

प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप बम्बई के संस्थापक सदस्य के अतिरिक्त आरा ललित कला अकादमी नई दिल्ली की साधारण सभा के भी सदस्य थे। वे जहाँगीर आर्ट गैलरी बम्बई के ट्रस्ट्री थे और आर्ट सोसाइटी आफ इण्डिया के उपाध्यक्ष तथा आर्टिस्ट्स सेण्टर बम्बई के मानद सचिव भी रहे।

आरा की कला में इतनी सरलता है कि एक साधारण दर्शक भी उसका आनन्द ले सकता है, पर वह कोई भोली-भाली या अज्ञानपूर्ण कृति नहीं है । उसमें पूर्ण तकनीकी सौष्ठव है। दृश्य जगत् की आकृतियाँ आरा की कला में एक नया रूप ले लेती हैं। वे एक बारमें एक ही विषय को लेकर ढेर सारी कृतियाँ बनाते चले जाते थे। 

इस कार्य में शैली और तकनीकी दृष्टि से बहुत विविधता भी रही है। उनकी चिनगारी के समान आभा से युक्त कलाकृतियों ने एक विशिष्ट स्थान बना लिया है। व्यावसायिक दृष्टि से उन्होंने जो उदारता दिखायी है उसके कारण लोगों के घरों में कैलेण्डरों की जगह उनके चित्र लगे हुए दिखाई देते हैं। 

यद्यपि वे प्रकृति से आकृतियाँ लेते हैं पर दर्शक उनके चित्रों में इन आकृतियों के साथ-साथ चित्र में दिखाये गये अन्य प्रभावों का भी आस्वादन करते हैं। उन्होंने अमूर्त चित्रण बहुत कम किया है। उनके अनावृत्ता-चित्रों में मांसलता तो है पर श्रृंगारिकता नहीं। सम्भवतः उनके फूलों और स्थिर जीवन के चित्र सबसे सुन्दर बन पड़े हैं। 

मकबूल फिदा हुसैन (1915 ) 

मकबूल फिदा हुसैन का जन्म महाराष्ट्र में शोलापुर के निकट पंढरपुर नामक गाँव में हुआ था। उनके पिता इन्दौर के एक मिल में नौकरी करते थे अतः हुसैन अपने जन्म के कुछ महीनों पश्चात् ही अपने परिवार के साथ इन्दौर ले आये गये। 

इनकी माँ मुल्ला परिवार की थीं और इन्हें उसी प्रकार की धार्मिक शिक्षा देना चाहती थी। इन्हें छः वर्ष की आयु में धार्मिक पुस्तकें पढ़ाना आरम्भ किया गया किन्तु इनकी रूचि चित्र आदि एकत्रित करने और लोगों की मुखाकृतियों के चित्र बनाने में थी। 

किसी भी व्यक्ति की मुखाकृति बनाकर ये उसे पूरे कागज पर से काट कर अलग कर लेते और अपने संग्रह में रख लेते थे।

हुसैन को बचपन से ही फिल्म देखने का शौक था। एक बार उन्होंने इन्दौर में हालैण्ड के चित्रकार रेम्ब्राँ पर आधारित एक फिल्म देखी। उसका इन पर इतना प्रभाव पड़ा कि ये प्रतिदिन मुखाकृतियाँ चित्रित करने लगे। 

सातवीं या आठवीं कक्षा तक घर के धार्मिक अनुशासन में रहने के पश्चात् इन्होंने अपने पिता से अपनी चित्रकार बनने की इच्छा स्पष्ट रूप से कह दी। पूरे घर के विरोध के बावजूद उन्होंने स्वीकृति दे दी और कुछ सामान, एक साईकिल तथा किराए पर एक कमरा दिलवा दिया। 

किशोर हुसैन ने इन्दौर कला-विद्यालय में भी प्रवेश ले लिया जहाँ देवलालीकर जी शिक्षक थे, पर इनका अधिकांश समय दृश्य-चित्रण में ही व्यतीत होता था।

उसी समय इनके पिताज की इन्दौर मिल से एकाउण्टेण्ट की नौकरी छूट गयी। पिता जी से आज्ञा लेकर 1934 में बम्बई चले आये। वहाँ इन्दौर से आये हुए एक सिनेमा होर्डिंग के पेण्टर से मिले। ये उसके पास काम करने लगे, खिचडी खाते और फुटपाथ पर सोते। 

1936-37 में स्वतन्त्र रूप से होर्डिंग पेन्टिंग करने लगे और 1941 तक बम्बई के द्वितीय सर्वोत्तम होर्डिंग पेण्टर के रूप में प्रसिद्ध हो गये। प्रथम स्थान पर मि० भिड़े थे और हुसैन ने श्री भिड़े के यहाँ भी कुछ दिनों कार्य सीखा था। किन्तु हुसैन का लक्ष्य होर्डिंग के चित्रकार बनना नहीं था अतः ये गजराती दृश्यों के प्रभाववादियों के समान शैली में चित्र बनाने लगे, यद्यपि इन्होंने प्रभाववादी चित्र देखे नहीं थे। 

इन्होंने उसी समय सुन्दर लिपि लिखना भी आरम्भ कर किया। सुन्दर अक्षरों में कोई नज्म लिखकर ये अपने किसी मित्र को भेंट कर देते थे। शाम को प्रायः फिल्म देखते किन्तु समय-समय पर बम्बई में आयोजित होने वाली चित्रकला प्रदर्शनियों को अवश्य देखते रहते थे। इन्हें अमृता शेरगिल के चित्र तो अच्छे लगे किन्तु पहली बार में पिकासो के चित्र अच्छे नहीं लगे।

1941 में विवाह हो जाने के उपरान्त हुसैन ने एक फर्नीचर डिज़ाइनर की नौकरी कर ली। 1946 तक वहाँ कार्य किया; किन्तु उन्होंने नौकरी छोड़कर केवल चित्रांकन का निश्चय किया और 1946 में जल-रंगों से दृश्य-चित्रण आरम्भ किया। 1947 में इस कार्य की उन्होंने प्रदर्शनी लगायी जिसे देखने सूजा और रजा भी आये थे। 

उन्होंने 1948 में “पैग’ में सम्मिलित होने का प्रस्ताव किया जिसे हुसैन ने स्वीकार कर लिया। उसके कुछ दिन पश्चात् हुसैन सूजा के साथ दिल्ली आये वहाँ चित्रकला और मूर्तिकला की प्रदर्शनी ने उन्हें बहुत प्रभावित किया और बम्बई लौट कर गुप्तकालीन, लावण्मयी नारी, बसौली के ओजपूर्ण चटकीले रंगों तथा लोक तत्वों के आधार पर पाँच चित्र बनाये। यहीं से उन्हें पश्चिमी कला तथा बंगाल शैली से मुक्ति मिली और उनके कला-जीवन में एक नया अध्याय आरम्भ हुआ। 

1950 में उन्होंने अपने चित्रों की प्रथम एकल प्रदर्शनी की। 1953 में उन्होंने यूरोप का भ्रमण किया और 1954 में वे ललित कला अकादमी नई दिल्ली द्वारा प्रख्यात चित्रकर (एमीनेन्ट आर्टिस्ट) के रूप में मनोनीत किये गये। इसके एक वर्ष बाद ही 1955 की प्रदर्शनी में उन्हें केन्द्रीय ललित कला अकादमी का प्रथम राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। 

इसके पश्चात् उनके चित्रों की अनेक प्रदर्शनियाँ ज्यूरिच, प्राग, टोक्यो, फ्रेंकफर्ट, रोम, न्यूयार्क आदि में आयोजित हुई। 1971 में ‘साओ पाओलो’ (ब्राजील) में उनके चित्र पिकासो के चित्रों के साथ प्रदर्शित हुए। 1968 में “थ्रू द आईज आफ ए पेण्टर” नामक उनकी लघु फिल्म को बर्लिन महोत्सव में ‘गोल्डन बियर’ पुरस्कार मिला। 1982 में उनके चित्र टेट गैलरी में प्रदर्शित हुए। भारत सरकार ने उन्हें ‘पद्म श्री’ तथा ‘पद्म भूषण’ से सम्मानित किया।

बुनियादी तौर पर हुसैन प्रतीकवादी चित्रकार हैं। उनकी मानवाकृतियों में एक विशेष प्रकार से विकृति उत्पन्न की गयी है। इसमें वे पश्चिम से प्रभावित हुए हैं। 1948 के लगभग वे यथार्थवादी थे। फिर धनवाद से आरम्भ करके सम्पूर्ण विकृति तक धीरे-धीरे पहुँचे हैं। वे आकृति को सरल और व्यंजक बनाने के लिए ही विकृति करते हैं और इसमें कम से कम प्रयत्न से यह प्रभाव उत्पन्न करना चाहते हैं। 

रंगों के चोड़े तथा बड़े पुंजों का प्रयोग भावनाओं को प्रतीक विधि से व्यंजित करने के लिए करते हैं। सरल मानवाकृतियों तथा चटख रंगों का प्रयोग लघु चित्रों की प्रेरणा से हुआ है। हुसैन का अभिव्यंजनावाद पश्चिमी अभिव्यंजनावाद से भिन्न है। 

इनकी आकृतियों कुछ अस्पष्टता लिए रहती है रूपाकारों का निर्माण रेखा और रंग के महत को ध्यान में रखकर किया गया है जहाँ रेखायें बारीक हैं वहाँ रंग भी हल्के बल में पारदर्शी प्रभाव उत्पन्न करते हैं। छाया-प्रकाश के बजाय विरोधी रंगों के चौड़े धब्बे लगाकर आकृतियों में दृढ़ता उत्पन्न की गयी है और एक ओजपूर्ण शैली का निर्माण किया गया है। रंगों को तूलिका तथा चाकू से लगाया गया है।

हुसैन के सम्पूर्ण जीवन का प्राथमिक प्रतीक भारतीय नारी है जो अनेक प्रकार की पीड़ा सहती है। यह पीड़ा, वेदना और घुटन की प्रतीक है उसमें असीम करुण तथा प्रेम है। जीवन के अन्य अन्धकारपूर्ण पक्षों के प्रतीक केक्टस, मकड़ी, शिश्न तथा पीड़ा से कराहता अश्व है। 

अश्व विभिन्न मनःस्थितियों और गति का भी प्रतीक है। वृषभ, सर्प तथा नारी की जंघा पर बैठा गिद्ध, काला चन्द्रमा तथा दौड़ते अश्व के साथ जमीन पर लुढ़कता बादामी सूर्य उनके अन्य प्रतीक हैं।

हुसैन ने कुछ सुन्दर पोर्ट्रेट्स तथा दृश्य-चित्र भी बनाये हैं। गुजरात के पश्चात् राजस्थान, फिर बनारस, उसके बाद केरल और फिर कलकत्ता तथा बंगाल उन्हें बहुत अच्छे लगे हैं। उन्होंने इन स्थानों के दृश्य- चित्रों के अतिरिक्त यहाँ के जन-जीवन, उत्सवों तथा नगरों की भीड़-भाड़ के चित्र भी अंकित किये हैं। 

प्रसन्न नार-नारी, अनावृताएँ, संगीत के राग, पक्षी, हाथी तथा विचित्र आकृतियों भी उन्होंने बड़ी संख्या में चित्रित किये हैं। वे ‘जमीन’ को अपना सबसे अच्छा चित्र मानते हैं। अब ये नवे विषय भी चित्रित कर रहे हैं जैसे- मदर टेरेसा, ताण्डव करते हुए रावण, गणेश, अकेली सीता, हिंसा का प्रतीक अमिताभ बच्चन, फूलन देवी, दुर्गा, श्वेत कैनवास पर बिखरे अक्षर, दिशाहीन उड़ते शान्ति कपोत, माधुरी दीक्षित आदि ये फिल्म निर्माण, कोलाज तथा फोटोग्राफी भी करते हैं और अंग्रेजी कविताएँ भी लिखते हैं। 1993 प्रयोग के तौर पर एक ऐसा विशाल केनवास चित्र बनाया गया जिसमें हुसैन सहित में चालीस कलाकारों ने मिलकर एक ही कृति की रचना की थी जो विश्व की एक घटना है।

हुसैन की कला में सूक्ष्म रूप से विकास हुआ है, बाहरी तौर पर उसमें एक निरन्तरता बनी रही है। 1964 की न्यूयार्क की प्रदर्शनी में एक आलोचक ने पूछा वे अब भी मूर्त रूप क्यों चित्रित करते हैं। 

हुसैन ने कहा कि उनके चित्रों को देखने | वाले 60 करोड भारतीय है, अतः ये अमूर्त कैसे हो सकते हैं भारतीय लोक-जीवन महाकाव्य और पुराण ही उनके प्रेरणा स्रोत है। उनका विचार है कि मुल्लाओं मुसलमानों को आध्यात्मिक रूप में गुमराह किया है जिसके कारण ये अच्छे चित्रकार नहीं बन सके हैं। 

हुसैन की कला में इस्लाम कभी आड़े नहीं आया। इस्लाम का इतिहास केवल 1400 वर्ष का है जबकि कला का सम्बन्ध ब्रह्माण्ड और मनुष्य की उत्पत्ति के काल से ही है। इस प्रकार हम वेदों और उपनिषदों के काल तक पहुँच जाते हैं।

हुसैन अब स्वयं को बहुत स्वतंत्र रखना चाहते हैं। उन्होंने यह भी निश्चित कर लिया है कि अब अपने चित्र बेचेंगे नहीं। वे यद्यपि किसी शैली से बंधे नहीं है और जैसा चाहें वैसा चित्रित कर सकते हैं फिर भी वे बार-बार शैली बदलना पसन्द नहीं करते। वे अपने एक निजी ढंग पर ही कार्य करते रहना चाहते हैं। वे प्रायः दिल्ली तथा बम्बई में रहते हैं।

ईराक में लड़े गये युद्ध की प्रतिक्रिया-स्वरूप हुसैन ने बम्बई में एक प्रदर्शनी लगायी जिसमें युद्ध के प्रति आक्रोश प्रकट किया गया था। 

बगदाद में हुए लोगों की मृत्यु, लौटती हई सेनाएँ अपने-अपने राज्यों को लौटते हुए स्थूलकाय शेख, पेरिस के मनोरंजन-गृहों में खुशी मनाते यूरोपीय सैनिक, चीखती हुई बगदाद की विधवाएँ, लाशों को झपटने की चेष्टा में ऊपर मँडराते हुए विशाल गिद्ध आदि के द्वारा उन्होंने युद्ध की विभीषिका का मार्मिक निरूपण ही नहीं बल्कि मित्र सेनाओं पर व्यंग भी किया है।

हुसैन ने कुछ नये प्रयोग भी किये हैं जैसे सार्वजनिक स्थानों पर लोगों के सामने चित्र बनाना; चित्र बनाते जाना और मिटाते जाना; संगीत की धुन सुनते हुए उसकी अनुभूति के आधार पर उसी समय चित्रांकन करना आदि। 

इस बारे में कलाकारों में पर्याप्त मतभेद हैं। मंजीत बाबा, रामकुमार तथा सतीश गुजराल की दृष्टि से हुसैन का सार्वजनिक स्थानों पर चित्र बनाना प्रपंच मात्र है। इसमें रिक्तता के अतिरिक्त कोई मूड नहीं होता जबकि कलाकृति की रचना के लिए मूड का होना परम आवश्यक है।”

हरि अम्बादास गाडे (1917) 

गाड़े का जन्म तेलीगाँव दशासर में 15 अगस्त सन् 1917 को हुआ था। उन्होंने कला की शिक्षा बम्बई कला विद्यालय में ग्रहण की और 1949 में ललित कला का डिप्लोमा प्राप्त किया। 1950 में उन्हें ए० एम० (कलाचार्य) का प्रमाण-पत्र मिला।

गाडे ने बम्बई, दिल्ली, हैदराबाद तथा नागपुर में अनेक एकल प्रदशनियाँ आयोजित की रूमानियाँ तथा हंगरी में भी 1970 में एकल प्रदर्शनी की तथा बम्बई आर्ट सोसाइटी, अकादमी आफ फाइन आर्ट्स कलकत्ता, आल इण्डिया आर्ट्स एण्ड क्राफ्टस सोसाइटी नई दिल्ली, हैदराबाद आर्ट सोसाइटी के अतिरिक्त 1953 की राष्ट्रीय कला प्रदर्शनी में भी भाग लिया। 

उनके चित्रों सेलों द माई पेरिस, स्टेनफोर्ड विश्वविद्यालय, वेनिस द्विवार्षिकी, पूर्वी यूरोप में भारतीय कला प्रदर्शनी, वासले टोकियो, वेनिस, आस्ट्रेलिया तथा साओ पाउलो आदि में भी प्रदर्शित हो चुके हैं। 

उन्हें 1956 में बम्बई आर्ट सोसायटी तथा 1962 में आल इण्डिया फाइन आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट्स सोसाइटी तथा सेगोन त्रिनाले के पुरस्कारों द्वारा सम्मानित किया गया है। गाडे 1948 के प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप के संस्थापक सदस्य तथा कोषाध्यक्ष भी रहे हैं। ये आकृतिमूलक चित्रकार हैं और उनकी कला में भारतीय जन-जीवन का चित्रण है ।

आदिम कला से प्रभावित सरल किन्तु सशक्त रेखा, सरलीकृत व्यंजनापूर्ण आकृतिया एवं आधुनिक संयोजनों में हुआ.

सैयद हैदर रज़ा (1922 ) 

रज़ा का जन्म मध्य प्रदेश में बयरिया नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता वन-विभाग में सर्वेयर थे अतः रजा को उनके साथ भारत के अनेक भागों में भ्रमण करने तथा प्रकृति के विविध रूपों को निकट से देखने का अवसर मिला। इन संस्कारों ने उनमें प्राकृतिक दृश्य-चित्रण के प्रति असीम अनुराग उत्पन्न कर दिया यह अनुराग उनकी कला में निरन्तर दिखाई देता है। 

उनकी आरम्भिक कला-शिक्षा नागपुर में श्री अठोले के द्वारा हुई। तत्पश्चात् वे बम्बई चले गये और सर० जे० जे० स्कूल आफ आर्ट से कला का डिप्लोमा प्राप्त किया। उसके पश्चात् बम्बई में ही कलाकृतियों का सृजन और प्रदर्शन आरम्भ किया। आरा, सूजा आदि इनके मित्र थे जिनके साथ 1948 ई० में रजा ने प्रोग्रसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप की स्थापना की थी जिसने समकालीन भारतीय कला में एक सार्थक आन्दोलन आरम्भ किया था।

1948 से 1950 के मध्य रजा ने केरल, राजस्थान, मध्य-प्रदेश आदि का विस्तृत भ्रमण किया और इन प्रदेशों की भूमि, वातावरण, जन-जीवन आदि का निकट से अध्ययन किया। इस सम्पूर्ण अवधि में रजा ने शहरी हलचल, कारखानों की चिमनियों से निकलते धुएँ से मलिन वातावरण के साथ अनेक नगर- दृश्य (City-Scapes) चित्रित किये। 1950 में फ्रांस की सरकार द्वारा दी गयी एक छात्रवृत्रि के सहारे ये फ्रांस चले गये और 1950 से 1953 तक ‘इकोल नेगनाल द बोजार’ में कला का गम्भीर अध्ययन किया। पेरिस पहुँचने के समय तक रजा काफी परिपक्व हो चुके थे और अपनी कला में फ्रेंच प्रभावों के समाहार की योग्यता प्राप्त कर चुके थे। 

इटली की यात्रा से उनका सम्पर्क वहाँ की कला और कलाकारों से भी हुआ। स्पेन में वे पुराने स्थापत्य तथा एलग्रेको के “तोलेदो का दृश्य” आदि से विशेष प्रभावित हुए। स्पेन की कला में भी आधा पूर्वी प्रभाव है अतः वह उन्हें बहुत अनुकूल प्रतीत हुई। 

इस अवधि में 1952 से उन्होंने अपने भारतीय भ्रमण के अनुभवों को पेरिस के वातावरण से जोड़कर नये प्रयोग करने आरम्भ कर दिये। शनैः शनैः उन्होंने एक मौलिक शैली का विकास कर लिया। रजा ने सूजा अथवा हुसैन की भाँति आकृति-चित्रण में कभी रुचि नहीं ली। वे भारत में भी एक प्रसिद्ध उदीयमान दृश्य चित्रकार और रंगों के प्रति आरम्भ से ही संवेदनशील थे। इसी आधार पर उनके प्रयोग आगे बढ़ते गये। 

फ्रास में उन्होंने शिल्प की बारीकियों को भी गहराई से समझा। इस प्रकार जो शैली उन्होंने विकसित की उसके चित्र जब फ्रांस में 1956 में प्रदर्शित हुए तो यहाँ उनकी पर्यापत प्रशंसा हुई और उन्हें पेरिस का ‘प्री दे ल क्रितीक’ पुरस्कार मिला। इससे वे मानसिक और आर्थिक दृष्टि से बहुत प्रोत्साहित हुए। 

रजा ने फ्रांस में ही रहने का विचार किया और 1959 में एक फ्रांसीसी महिला कलाकार जानीन मॉजीला से विवाह कर लिया। वे प्रॉच कलाकारों की प्रथम पंक्ति में गिने जाने लगे। उनकी कला में पूर्व तथा पश्चिम का ऐसा समन्वय है कि उन्हें भारतीय कहने से एक कृत्रिम कला-शैली का बोध होने लगता है। 

इसके उपरान्त वे 1959, 1968, 1976, 1978 तथा 1984 में भारत आ चुके हैं। 1978 में मध्य-प्रदेश सरकार ने उन्हें पुरस्कत भी किया था। 1981 में उन्हें “पद्मश्री” से विभूषित किया गया।

रजा की रंगों के प्रति संवेदनशीलता निरन्तर बढ़ती गयी है। वे त्रुटिरहित और सभी दृष्टियों से पूर्ण संयोजनों तथा विशुद्ध रंगों के कलाकार हैं। उनकी कला में रंगों की लय अपने आरोही एवं संतुलित रूप में मिलती है जो एक प्रकार की प्रतिध्वनि उत्पन्न करती है। चमकीली तथा समृद्ध रंग-योजनाओं के उनके पैटर्न अत्यन्त सरल हैं जो उनकी अन्तर्दृष्टि के परिचायक हैं।

रजा की कला में बिन्दु एक ऊर्जात्मक पक्ष है। उसका विश्लेषण करते हुए वे कहते हैं कि जैसे रेखा, वृत, त्रिभुज, वर्ग तथा पदभुज आदि कुछ आधार भूत रूप हैं वैसे ही हमें वृहदाकार से आधारभूत तत्व बीज तक पहुँचना है, क्योंकि बीज ही प्राण है, आइडिया है। रज़ा चाहते हैं कि इस विचार को व्यक्त करने के लिए कुछ ऐसे चित्र बनें जो काले रंग से आरम्भ होकर समस्त रंगों की ओर जायें और फिर श्वेत केनवास की ओर जायें।

1970 के लगभग नव तांत्रिक कला की जो लहर उठी, रजा उससे अलग रहे। वे इसके बजाय रंगों के ही प्रभावों को समझने और पहचानने के प्रयत्न में लगे रहे है। तैल रंगों के अभ्यास ने उनकी दृष्टि को ऐसी गहराई दी है जो केवल सपाट प्रभाव वाले कला रूपों अथवा तकनीकों के प्रयोग से संम्भव नहीं थी। 

आरम्भिक पाँच वर्ष दक्षिणी फ्रांस में दृश्य-चित्रण से उन्होंने वहाँ के भवनों की शैली के प्रभाव से शास्त्रीय ढाँचा निर्मित किया जो उनके द्वारा अंकित भवनों की छतों तथा सामने के भागों के चित्रण में देखा जा सकता है। 

इनके रूपों को सरल करके प्रतीकता की सीमा तक पहुँचा दिया गया है। यह भावना भारतीय कला में भी है अतः इसके लिए इन्हें कोई प्रयत्न नहीं करना पड़ा।

रजा की आकृतियों में एक ऐसी आभा है कि वे सामान्य न रहकर रहस्यमय प्रतीत होती है। इनमें उन्होंने केनवास के धरातलीय प्रभाव का बहुत लाभ उठाया है। गहरे मखमली रंगों का ध्वन्यात्मक प्रभाव उनकी कला की विशेषता हैं। इस प्रकार वे दृश्य की अनुभूति को एक उच्च स्तर तक ले जाते हैं। 

उनके रात्रि दृश्यों में ग्रामीण घरों का टिमटिमाता प्रकाश ऐसा प्रतीत होता है मानों आकाश से चन्द्रमा के प्रकाश को ग्रहण कर कोई मणि अपने चारों ओर की भूमि पर प्रत्यावर्तन के रूप में उस प्रकाश की किरणें विकीर्ण कर रही हो। यह दृष्टि की वह गहराई है जो उन्हें भारतीय संस्कारों से मिलती है। 

प्राकृतिक दृश्य-चित्रण ही शनैः-शनै: उनकी कला में अमूर्त प्रभावों का रूप लेता गया है। ऊपर से अमूर्त दिखायी देने वाली उनकी कला के पीछे निश्चित रूपों का अनुभव किया जा सकता है।

फ्रांसिस न्यूटन सूज़ा (1924 ) 

सूजा का जन्म पुर्तगाल के अधीन गोवा में अप्रैल 1924 में कोंकणीमूल के रोमन केथोलिक ईसाई परिवार में हुआ था। जन्म के केवल तीन महीने बाद ही पिता का देहान्त हो गया। 

विधवा माँ विपत्तियाँ को सहन करती हुई अगले वर्ष बम्बई आ गयी और ड्रेस निर्माण करने लगीं। सुईकारी में पर्याप्त निपुण होने के कारण उन्होंने “इन्स्टीट्यूट आफ नीडिल क्राफ्ट एण्ड डोमेस्टिक साइंस’ खोल लिया उनकी माँ ने बालक न्यूटन के नाम से पूर्व ‘फ्रांसिस’ शब्द जोड़ लिया ताकि बच्चे पर ईश्वर की कृपा रहे और वह जीवित रहे।

सूजा बचपन में ईसाई भक्ति भावना से पूर्ण थे चर्च का उन पर बहुत प्रभाव था। वहाँ के धार्मिक उपदेशों के बजाय विशाल भवनों के स्थापत्य तथा वातावरण से वे बहुत प्रभावित थे। सुनहरी रंगों से रंगी सन्तों की काष्ठ प्रतिमाएँ, अलंकृत क्रास, रंगीन खिडकियाँ, छतें और खम्भे उन्हें बहुत आकर्षित करते थे। चर्च के सम्पर्क में धीरे-धीरे उनकी कल्पना में सन्तों को दी गयी यातनाएँ उभरने लगीं।

प्राकृतिक वातावरण की दृष्टि से गोवा के सुन्दर वातावरण से बम्बई का औद्योगिक वातावरण बहुत भिन्न था। बम्बई उन्हें एक भयंकर हिंस्र जीव जैसा अनुभव होने लगा जो दिन-रात अपने विनाशकारी कार्यों में लगा हुआ था।

बम्बई के सेण्ट जेवियर स्कूल में प्रवेश के दो वर्ष पश्चात् वे स्कूल की दीवारों पर अशोभनीय रेखाकंनों के कारण निकाल दिये गये सोलह वर्ष की आयु में उन्होंने चित्रकार बनने का निश्चय किया। 1940 में उन्होंने जे० जे० स्कूल आफ आर्ट में प्रवेश लिया। उस समय वहाँ पश्चिमी पद्धति की शिक्षा के साथ भारतीय शैली का चित्रण भी पाठ्यक्रम में शामिल कर लिया गया था। 

किन्तु सूजा ने स्कूल की शिक्षा के बजाय प्राचीन यूरोपीय कलाचार्यों के चित्रों से स्वयं सीखना आरम्भ कर दिया। वे साम्यवादी भी बन गये अतः इन दोनों आरोपों के आधार पर उन्हें 1943 में स्कूल से निकाल दिया गया। स्कूल से निकाले जाने के उपरान्त सूजा भारतीय साम्यवादी दल के सदस्य बन गये। 

उनका स्वभाव उग्र और संघर्षशील था अतः पार्टी में उनका स्वागत हुआ। सूजा ने अपने चित्रों में वर्ग संघर्ष दिखाना आरम्भ किया और श्रमिक बस्तियों के आधार पर सामाजिक यथार्थवादी चित्र बनाये।

कुछ समय के लिए सूजा साम्यवादी दल से अलग हो गये। 1948 में उन्होंने आरा, रजा, हुसैन, गाडे तथा बाकरे के साथ प्रगतिशील कलाकार दल बनाया और 1949 में इसकी प्रदर्शनी आयोजित की। सभी कलाकार अलग-अलग राजनीतिक विचारधारा के थे पर सौन्दर्य, रूपात्मक संगति तथा रंग-संयोजन आदि कलात्मक तत्वों के विषय पर सहमत होने के कारण ही एक मंच पर आ सके थे। सभी आधुनिकता के समर्थक थे।

इस प्रदर्शनी की पर्याप्त चर्चा हुई और सूजा के कुछ चित्रों को आपत्तिजनक मानकर पुलिस ने उनके घर पर असफल छापा भी मारा। कुछ समय बाद सूजा विदेश जाने की तैयारी करने लगे। बम्बई आर्ट सोसाइटी के सेलून में “आर्टिस्ट एड फण्ड” के सहयोग से उन्होंने एक प्रदर्शनी आयोजित की, अपने चित्रों को बेचकर यात्रा का खर्च एकत्र किया और 22 जुलाई 1949 को लन्दन के लिए रवाना हो गये। 

प्रदर्शनी के समय उनका परिचय मारिया के साथ हुआ और दोनों ने विवाह कर लिया। 1949 में सूजा उसे लेकर लन्दन चले गये। किन्तु वहाँ उन्हें बहुत कठिनाई हुई मारिया ने थोड़ा बहुत काम करके आर्थिक गाड़ी को खींचा। लन्दन में भारत के तत्कालीन हाई कमिश्नर कृष्ण मेनन के प्रयत्नों से उन्होंने लन्दन के इण्डियन स्टूडेण्ट्स ब्यूरो के भवन में चित्रांकन किया तथा इण्डिया हाउस में प्रदर्शनी की किन्तु उनके चित्र बहुत समय तक नहीं बिक सके। यहाँ तक कि अपने निराशाजनक भविष्य से आशंकित होकर 1954 में वे भारत लौटने की सोचने लगे। तभी एक चित्र व्यवसायी ने उन्हें पेरिस में अपने चित्रों की प्रदर्शनी के लिए आमंत्रित किया। 1955 में आयोजित इस प्रदर्शनी ने सूजा के भाग्य को रातों-रात चमका दिया। 

उसके बाद उनकी अनेक प्रदर्शनियाँ, बिक्री, साक्षात्कार तथा पत्रिकाओं में प्रदर्शनियों के पुनरीक्षण का ताँता लग गया। अनेक आलोचकों ने उनकी प्रशंसा की। लन्दन टाइम्स, गार्जियन, न्यू स्टेट्मेन तथा स्टुडियो इन्टरनेशनल ने उनकी कला के सम्बध में प्रशंसात्मक लेख छापे सूजा को पश्चिमी कलाचायों की श्रेणी में गिना जाने लगा। 1956 में एक अमेरिकन ने सूजा से लगातार चित्र खरीदने का सौदा किया। 

सूजा प्रतिमास कुछ चित्र भेजते रहे और धनी अमेरिकन कोयनर उन्हें पैसे भेजते रहे। उन्होंने लगभग 200 चित्र इस प्रकार बेचे। अच्छी आय होने पर सूजा मदिरा के व्यसनी हो गये। उनका तूलिका पर पहले जैसा अधिकार न रहा। 1960 में वे इटालियन छात्रवृत्ति पर इटली गये और वहाँ से भारत आये किन्तु भारत की परिस्थितियों को अपने अनुकूल न पाकर शीघ्र लन्दन लौट गये। वहाँ मदिरा के व्यसन की चिकित्सा कराई और मदिरा पूरी तरह छोड़ दी।

उनकी पहली पत्नी मारिया तथा दूसरी लिसोलेटक्रिश्चियन थीं। तीसरी बारबैरा जिनकैट हैं। वे तीसरी पत्नी के साथ आजकल न्यूयार्क में रहते हैं जहाँ वे 1967 में चले गये थे। किन्तु अब उनकी कला में कोई विकास नहीं हो रहा है। अमेरिका में उनका कोई प्रभाव भी नहीं रहा है। उनमें अकेलेपन का भाव बढ़ता जा रहा है।

वे कभी-कभी किसी कार्यवश भारत आते रहते हैं। सूजा ने अपनी प्रदर्शनियों के केटेलाग की भूमिका स्वयं लिखी और उनमें स्वयं को शैतान तथा दादावादियों का उत्तराधिकारी घोषित किया। राजनीतिक दृष्टि से दमित जाति का होने के कारण उन्होंने स्वयं को बहुत खतरनाक प्रदर्शित किया। सूजा ने प्रत्येक को बुरा कहा है। उन्होंने लन्दनवासियों, अमेरिकनों, रोम के पोप, स्वर्ग के ईश्वर, किसी को भी नहीं बख्शा यहाँ तक कि उन्होंने स्वदेश वासियों को भी गधा कहा है।

सूजा ने अपने विषय में बहुत कुछ लिखा भी है जिस बात को वह चित्रों में नहीं कह सके उसे लेखों में स्पष्ट किया है। अपने लेखों में सूजा ने कहीं भी विनम्रता नहीं दर्शायी है। इसमें उन्होंने अस्तित्व के संघर्ष की भावना को उजागर किया है।

बम्बई के प्रगतिशील ग्रुप में उन्होंने अपनी कला में अभिशप्त और अंधेरे संसार का चित्रण किया है। उनकी आकृतियों में एक अजनबीपन है किन्तु रेखा में शास्त्रीय ढंग का नियंत्रण है।

यद्यपि उनका बचपन गोवा में व्यतीत हुआ जो धान के खेतों और ताड़ों के वृक्षों का सुन्दर देश है जहाँ धवल गिरिजाघर और ऊँचे शिखर हैं, रंग-बिरंगी टाइलों से सजे छोटे-छोटे घर हैं; नीला सागर, लाल मिट्टी, गहरी हरित वनस्पति, आम के वृक्ष, फूल, पक्षी, साँप, मेंढक, बीसियों तरह की तितलियाँ और हजारों तरह के कीड़े हैं, प्रातःकाल मुर्गे की बॉंग और सायंकाल चर्च की घण्टियों गूंजती रहती हैं फिर भी सूजा मुख्यतः एक आकृति-चित्रकार हैं। 

उन्होंने प्रधानतः गोवा के जीवन और बम्बई के शहरी दृश्य-चित्रण को ही अपना विषय बनाया। उनके मुख्य विषय हैं स्त्रियाँ, स्थिर जीवन तथा व्यक्ति-चित्र। उन्होंने कला में सदैव लालच, अकाल, बलात्कार, युद्ध, मृत्यु तथा धर्म की आड़ में चलने वाले अनाचारों के प्रति विद्रोह का स्वर उठाया है तथा शुद्ध रूप और रंग के समस्त सिद्धान्त पीछे छोड़ दिये हैं। आज उनकी कला में यह संन्देश गूँज रहा है कि अपने ही दुष्कर्मों से मनुष्य राक्षस बनता जा रहा है।

सूजा की अन्तर्दृष्टि में एक अभौतिक दबाव है और विकृति में मन को झकझोर देने वाली शक्ति उनके लिए चित्रकला सुन्दर नहीं है बल्कि एक अजगर की भाँति 1 असुन्दर है। घास में चलने वाला अजगर, मोहक, चमकता हुआ, लहराता हुआ, जहरीला लम्बा और पतला, हरा थूथन, श्वेत उदर, पीली आंखें, लाल लपलपाती चिरी हुई जीभ सूजा सोचते हैं- सावधान ! कहीं उसपर पाँव न पड जाय……..वह शैतान की तरह धोखेबाज किन्तु ईश्वर की भाँति सुन्दर है।

सूजा एक बुद्धिवादी कलाकार हैं। उनकी आकृतियाँ एक विशेष शैली में ढली हैं और पिकासो तथा शागाल की भाँति वे मिथकों से भी प्रेरणा लेते हैं; अतः उनकी कला के दो पक्ष हैं- 1. अंग-भंग आकृतियों वाला तथा 2. चित्रात्मक प्रथम प्रकार के उदाहरण उन व्यक्ति-चित्रों में हैं जहाँ सिर तीरों से बिंधा है और मुख की सीमारेखा विकृत है। ये चित्र निराशा के द्योतक हैं और सूजा के आरम्भिक जीवन की कठिन परिस्थितियों की ओर संकेत करते हैं। 

अनावृताओं तथा स्थिर जीवन के चित्रों में भी यही शैली अपनाई गई है। दूसरी चित्रात्मक शैली उनके दृश्य चित्रों के संयोजनों, राजाओं तथा रानियों के चित्रों की श्रृंखला तथा विकृत रूपों वाले स्त्री-पुरुषों के चित्रों में मिलती है। इनमें लयात्मक प्रवाह, रंगों के विभिन्न बल तथा छाया-प्रकाश के द्वारा गढ़न का प्रभाव तथा रूप की अनुभूति प्रस्तुत की गई है। दृश्यों में अंकित भवन कहीं-कहीं डिजाइनों से बहुत अलंकृत बनाये गये हैं। 

“दार्शनिक और प्रेमी” शीर्षक चित्र-श्रृंखला के विचार से मनुष्य ने प्रगति का झूठा आवरण ओढ़ लिया है किन्तु उसके में सूजा के विचार से भीतर आदिम बर्बर मनुष्य अभी भी छिपा हुआ है।

सूजा ने ‘ब्लैक आर्ट’ के भी कुछ प्रयोग किये हैं जिनमें सम्पूर्ण चित्र काले रंग से पुता रहता है और कहीं-कहीं कुछ गाढे रंग के उमरे किनारे तिरछे प्रकाश में चमकते हुए आकृतियों का आभास देते हैं किन्तु यह कला दर्शकों पर कोई प्रभाव नहीं छोड़ पायी है।

सूजा ने आधुनिक शैली में कुछ मिनिएचर्स भी बनाये हैं जिनमें कोमलता और सजीवता है। इनमें आधुनिकता भी है और नवीनता भी इनमें विकसित मुगल तकनीक है किन्तु रूप आधुनिक हैं ये चित्र उदयपुर के कलाकार मोहन शर्मा के साथ मिलकर बनाये गये हैं। सूजा का मत है कि आप इन्हें “सूजा कलम” कह सकते हैं।

सूजा ने नारी का चित्रण एक कोमल युवती अथवा माँ के रूप में बहुत कम किया है। उन्होंने नारी को एक मक्कार तथा दुःशीला स्त्री के रूप में ही अधिक दिखाया है। उनके नर-नारी के श्रृंगार विषयक चित्रों में श्रृंगार-शास्त्रीय अथवा तांत्रिक दृष्टि बिल्कुल नहीं है। विशुद्ध यौन स्थितियों का चित्रण उन्होंने अशोभनीय रूपों में केवल दर्शकों को हतप्रभ करने तथा विशिष्ट समाजों पर प्रहार करने की दृष्टि से किया है। 

सूजा की नारी आकृतियाँ मथुरा तथा खजुराहो के शिल्प से प्रेरित हैं पर उनमें से शालीनता बिल्कुल निकाल दी गई है और वे दुराचारिणियों जैसी लगती हैं। 

उन्हें ईसा के प्रति भी सम्मान नहीं हैं ईश्वर के पुत्र होते हुए भी ईसा ने एक कष्टपूर्ण मनुष्य का जीवन व्यतीत किया अतः सूजा की दृष्टि में वे भक्ति-भावना के बजाय अपराध भावना के आधार बन जाते हैं। उनका ईसा को शूली का चित्र मन में न दया की भावना उत्पन्न करता है न भय की सूजा ने चर्च के पाखण्डपूर्ण दिखावे को भी बहुत चित्रित किया है। 

चर्च से सम्बन्धित पुरोहित, पैगम्बर, कार्डीनल तथा पोप को उन्होंने पूँजीपतियों से भी अधिक क्रूर अनुभव किया है, क्योंकि वह दैवीय अधिकार का भी दावा करते हैं और ईश्वर के नाम पर दण्ड का विधान भी करते हैं। सूजा के धार्मिक पात्र यथार्थ और प्रतीक, दोनों अर्थ लेकर चित्रित किये गये हैं।

स्थिर जीवन के चित्रों में सूजा ने पवित्र धार्मिक उपकरणों के अतिरिक्त खाद्य वस्तुओं के ढेर भी चित्रित किये हैं। व्यक्ति चित्रों में पवित्र अथवा उच्च सत्ताधिकारी व्यक्तियों की व्यंग-युक्त आकृतियाँ बनाई हैं। 1960 के पश्चात् बनाये नगर दृश्यों में भी विनाश के चिन्ह छिपे हैं। इनमें चलते फिरते नर-नारी किसी पागलपन से प्रतीत होते हैं। युक्त

सूजा ने कुछ रसायनिक चित्र भी बनाये हैं। पत्र-पत्रिकाओं में छपे चिकने कागज ने के सुन्दर चित्रों को काटकर उनके कुछ भाग का रंग रासायनिक घोल से धो कर उस भाग पर स्वयं कुछ चित्रकारी कर देते हैं। वे यह क्रिया प्रायः सुन्दर अनावृताओं तथा भोज्य पदार्थों के छपे चित्रों पर ही करते हैं। आलोचकों के विचार से यह उनकी कलात्मक प्रतिभा में दुर्बलता आने का संकेत है। उन्होंने भारतीय देवी-देवताओं के आधार पर भी चित्र बनाये थे पर उनमें अपेक्षित गहराई नहीं आ पाई। उनके चित्रों की पृष्ठभूमि प्रायः रिक्त होती है अतः आकृतियों का पूर्ण प्रभुत्व रहता है।

सूजा को भेड-चाल से चिढ़ है इसीलिए उन्होंने अमूर्त चित्रण नहीं किया। वे अपनी कला पर किसी का प्रभाव भी नहीं मानते। किन्तु वे चित्र को ‘कहानी’ नहीं मानते। उनके अनुसार आधुनिक चित्रकार दर्शक को अपनी मान्यताओं तथा सौन्दर्य-दृष्टि में जकड़ लेता है, विषय-वस्तु में नहीं। जिन्हें कला में वास्तविक रुचि है, वे इसे समझते हैं। वे आधुनिक भारतीय चित्रकला के पाँच-सात दिग्गजों में से एक हैं।

वी० एस० गायतोंडे (1924- )  

गायतोंडे का जन्म महाराष्ट्र के नागपुर शहर में 1924 ई० में हुआ था। नागपुर में कला के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ न मिलने के कारण गायतोंडे बम्बई के सर जे० जे० स्कूल आफ आर्ट में प्रविष्ट हो गये। और वहाँ से 1948 में कला में डिप्लोमा प्राप्त किया। बम्बई में काम करते हुए उनकी भेंट प्रगतिशील कलाकार ग्रुप के सदस्य कलाकारों से हुई और वे भी इस ग्रुप के सदस्य बन गये तथा बाद की प्रदर्शनियों में भाग लिया। 

1959 से वे निरन्तर अपनी प्रदर्शनियाँ आयोजित करते रहे हैं और उन्हें अनेक पुरस्कार एवं सम्मान मिले हैं। सन् 1971 ई० में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री की उपाधि से सम्मानित किया है। श्री गायतोंडे की चित्रकारी के अतिरिक्त संगीत, फिल्म तथा दर्शन-शास्त्र में भी रुचि हैं। वे दिल्ली में रहते हैं।

गायतोंडे की कला के विकास के विभिन्न चरण हैं। वे आरम्भ में आकृति-मूलक रचना करते थे, फिर धीरे-धीरे अमूर्त चित्रण करने लगे। किन्तु उनकी आकृतिमूलक अथवा ऐकेडेमिक कला का अमूर्त शैली से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह शैली उनकी पूर्ववर्ती शैलियों से पूर्णतः भिन्न है।

गायतोंडे की अमूर्त शैली के चित्र प्रायः सूर्यास्त के दृश्यों से सम्बन्धित हैं। इनका एक बड़ा भाग बम्बई के सागरीय क्षितिज पर सूर्य के अस्त होने से सम्बन्धित है। उन्होंने पहले से निश्चय करके चित्र नहीं बनाये और उनके चित्र पूर्व-निर्धारित नियमों और आस्थाओं के निरूपण मात्र नहीं हैं।

बम्बई के क्षितिज पर सूर्यास्त के समय रंगों की जो क्रीडा होती है, क्षितिज रेखा पर जो आकार बनते हैं, उस वातावरण में रंगी का हल्कापन और गहराई, सूर्य के अस्त होने और प्रकाश के शनैः-शनैः कम होने का अवसाद और उसके कारण आरम्भ होने वाला अन्तर्मुखी चिन्तन गायतोंडे के चित्र में इसी का अंकन हुआ है। 

पर यह सब अंकन उनके व्यक्तित्व में इन तत्वों के आत्मसात् होने के पश्चात् ही हुआ है। उनके चित्रों के बीचों-बीच क्षितिज का आभास देने वाली एक अदृश्य रेखा रहती है जिसका स्थान चित्र-संयोजन के अनुरूप बदलता रहता है।

इसके आसपास विभिन्न आकारों का चित्रण किया गया है जो प्रायः विभिन्न रंगों के अमूर्त आकार वाले धब्बे जैसे दिखाई देते हैं। चित्र का सम्पूर्ण धरातल ऊपर से नीचे तक एक ही रंग के प्रभाव वाला होता है जो आकाश तथा नीचे जल में पढने वाले आकाश के ही प्रतिबिम्ब का आभास देता है। यह सम्पूर्ण धरातल हरे, लाल, नीले, श्वेत, सुनहले अथवा मिश्रित रंगों में चित्रित रहता है।

अपने चित्रों में अमूर्त शैली का प्रयोग होते हुए भी वे स्वयं को अमूर्त शैली का कलाकार कहलाना पसन्द नहीं करते। ऐकेडेमिक कला को छोड़कर वे पैटर्न तथा रंगो के व्यक्तिगत अनुभव एवम् चित्र की डिजाइन के सम्पूर्ण प्रभाव पर ध्यान देने लगे हैं। ये गुण उनकी पूर्व कलाकृतियों में नहीं थे। 

आकृति-चित्रण करते समय इन गुणों का विचार करने में बाधा आ जाती है: इसी से गायतोंडे आकृतियों के बजाय चित्र के अन्तराल का सबसे अधिक विचार करते हैं।

किसी घटना अथवा दृश्य को देखकर मन में जो भाव उठता है उसका स्वरूप स्थायी नहीं होता। इसी प्रकार प्रेम, उत्साह, साहस आदि की अमूर्त अनुभूति भी स्थायी और सदैव के लिए नहीं हो सकतीः अतः मन में उठे भाव के आधार पर कलाकार को त्वरित गति से चित्रण करना चाहिये। 

गायतोंडे भी इसीलिये अपने चित्रों को अब शीघ्रता से पूर्ण करने लगे हैं। वे मन के अनुभव को एकाग्रता के साथ तुरन्त चित्र में उतारने का प्रयत्न करते हैं। इस पद्धति की एकाग्रता के सन्दर्भ में गायतोंडे बौद्ध दर्शन की ‘जेन’ शाखा से बहुत प्रभावित हुए हैं।

गायतोंडे में किसी भी प्रकार की प्रतिबद्धता नहीं है। वे पूर्ण स्वतंत्र कलाकार हैं, किसी विचारधारा के भी वे पक्षधर या प्रचारक नहीं है। ये व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर ही चित्र-रचना करते हैं अतः अपने चित्रों के शीर्षक नहीं रखते चित्र में अंकित रंगों के धब्बों के अमूर्त संयोजन के द्वारा ही दर्शकों को वे किसी विशेष मनः स्थिति की अनुभूति कराना चाहते हैं अपने चित्रों में वे स्वयं अपने ही द्वारा पूर्व में प्रयुक्त पद्धति की पुनरावृत्ति नहीं करना चाहते, अतः उनके संयोजनों में नवीनता बनी रहती है। गायतोंडे सुलिपि डिजाइन (Calligraphic design) के भी चित्रकार हैं। 

अकबर पदमसी 

अकबर पदमसी का जन्म 1928 में बम्बई में हुआ था। उन्होंने कला की शिक्षा पर जे०जे० स्कूल ऑफ आर्ट बम्बई से ली और 1951 में वहाँ का डिप्लोमा प्राप्त किया। उसके पश्चात् मे लन्दन तथा पेरिस चले गये और पन्द्रह वर्ष यहीं रहे। बीच-बीच में भारत में भी प्रदर्शनियों करते रहे। 

1965 में एक आर्थिक सहायता कार्यक्रम के अन्तर्गत एक वर्ष के लिये अमेरिका गये। 1967 में व अमेरिका में आर्टिस्ट-इन-रेजिडेन्स के रूप में रहे। भारत वापस आने पर पुनः प्रदर्शनियों की। 1969-70 में पदमसी को नेहरू फैलोशिप प्रदान की गयी। तबसे वे कला, फिल्म एवं कम्प्यूटर आदि के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण कार्य कर रहे हैं। उन्होंने मूर्ति-शिल्प में भी प्रतिभा का अच्छा प्रदर्शन किया है। 

यद्यपि वे अमूर्त कलाकार नहीं हैं पर उन्होंने अमूर्त चित्रकला के उदाहरण-स्वरूप कुछ चित्रों की रचना की है जिन्हें वे “मेटास्केप’ कहते हैं। उनकी कला में अत्यधिक संवेदनशीलता है।

1954 में पदमसी ने एक अनावृता का चित्र प्रदर्शित किया था जिसे अश्लील कहकर पुलिस ने पदमसी पर मुकदमा चलाया। अन्त में निचले तथा उच्च, दोनों न्यायालयों में पदमसी की जीत हुई। 

पदमसी के चित्र द्वैवार्थिकियों की येनिस, साओ पाओलो टोक्यो तथा पेरिस प्रदर्शनियों के लिये चुने गये थे। उन्होंने भारत की प्रथम त्रिवार्षिकी में भी भाग लिया था। 1987 में रूस में आयोजित भारत महोत्सव में उनके चित्र प्रदर्शित किये गये थे।

पदमसी ने अपने चित्रों में अलग-अलग तूलिकाघातों अथवा चाकू से रंग लगा कर एक विशेष धरातलीय टेक्सचर उत्पन्न किया है, साथ ही ऐसी रंग योजनाओं का प्रयोग किया है जिनसे उनके अनेक चित्रों को “जलती हुई झाड़ी के समान बताया गया है।

शिल्पी चक्र (स्थापित 25 मार्च 1949)

स्वतन्त्रता प्राप्ति के समय भारत में ‘आल इण्डिया फाइन आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट्स सोसाइटी’ नई दिल्ली ही कला सम्बन्धी गतिविधियों की एकमात्र सरकारी संस्था थी। दिल्ली का शारदा उकील स्कूल आफ आर्ट बंगाल-शैली में शिक्षा देने वाली संस्था थी। किन्तु सरकारी कला-संस्था की कार्य-पद्धति तथा उकील विद्यालय की कला शैली से अधिकांश उभरते हुए कलाकार असन्तुष्ट थे।

इसी समय भारत-विभाजनके परिणाम स्वरूप पश्चिमी पंजाब (अब पाकिस्तान) के लाहौर आदि प्रसिद्ध कला केन्द्रों से भागकर अनेक कलाकार दिल्ली आ गये जिन्होंने शिल्पी चक्र नामक संस्था का सूत्रपात किया । 

यामिनीराय भी उस समय लाहौर से दिल्ली आये थे। उनके अतिरिक्त यहाँ आने वाले प्रमुख कलाकार थे भवेश सान्याल, – धनराज भगत, प्राणनाथ मागो तथा कँवल कृष्णआदि कँवल कृष्ण का विवाह देवयानी से हुआ और वे भी शिल्पी चक्र की सदस्या बन गयीं। इनके अतिरिक्त के० एस० कुलकर्णी, जया अप्पासामी, रामकुमार तथा रामेश्वर बूटा आदि स्थानीय कलाकारों ने भी इस संस्था में सक्रिय भूमिका निभाई।

भवेश सान्याल (1902- )

सान्याल का जन्म 22 अप्रैल सन् 1902 को डिब्रूगढ़ (आसाम) में हुआ था। आरम्भिक शिक्षा स्थानीय स्कूल में प्राप्त करने के उपरान्त 1920 में उन्होंने सीरमपुर कालेज में प्रवेश लिया और कलकत्ता विश्वविद्यालय की इण्टर परीक्षा उत्तीर्ण की। गाँधी जी के असहयोग आन्दोलन के कारण उन्होंने पढ़ाई छोड़ दी। 

1923 में कलकत्ता कला-विद्यालय में प्रवेश लिया। 1929 में वे लाला लाजपत राय का एक पोट्रेट बनाने लाहौर गये और वहीं रह गये। उन्हें वहाँ मेयो स्कूल आफ आर्ट्स में उप-प्रधानाचार्य बना दिया गया। 1936 में उन्होंने अपना एक अलग कला-विद्यालय लाहौर में खोला जो बहुत प्रसिद्ध हुआ। 

विभाजन के पश्चात् वे दिल्ली आ गये और अन्य कलाकारों के साथ मिलकर दिल्ली शिल्पी चक्र की स्थापना की वे उसके चेयरमैन चुने गये। 1952 में यहाँ पालीटेक्नीक के कला-विभाग के अध्यक्ष के रूप में उनकी नियुक्ति हो गयी। 1955 में वे नेपाल सरकार के कला-शिक्षा सलाहकार बनाये गये। 1955-56 में उन्होंने यूरोप के अनेक देशों की यात्रा की तथा 1959 में कनाडा एवं यूरोप गये। 

1960 में ललित कला अकादमी नई दिल्ली के निर्माण के समय से ही थे उसके सदस्य रहे और उसके सचिव पद पर भी कार्य किया। 1963 से उन्होंने अनेक देशों की यात्रा की और अनेक प्रदर्शनियाँ कीं। उनके चित्र एवं मूर्तियों पर्याप्त प्रख्यात है। 1992 में केन्द्रीय ललित कला अकादमी ने उनका अभिनन्दन किया।

आधुनिक भारतीय कला-आन्दोलन के प्रारम्भ में सान्याल तथा उनके समकालीन बंगाली कलाकार अग्रणी रहे हैं। बंगाल कला आन्दोलन से जुड़े रहने के कारण उन्होने एक युग तक समूचे उत्तर भारत को प्रभावित किया था और कला की जन-साधारण से पहचान करायी थी। 

उन्होंने आकारों अथवा विषयों के सम्बन्ध में अधिक प्रयोग नहीं किये हैं। उनका आरम्भिक कार्य अकादमी पद्धति का है। कुछ कृतियों में हास्य का पुट भी है जिनमें कुछ चित्र उन्होंने स्वयं से सम्बन्धित भी अंकित किये हैं। गाँधी जी का चित्र उनकी सर्वोत्तम कृतियों में से है। 

सान्याल ने नारी – आकृति का निराशा तथा व्यथा के संदर्भ में ही अधिक अंकन किया है। कुछ श्रृंगार पूर्ण आकृतियाँ भी अंकित की हैं। जाति-बहिष्कृत, बाल-वधू, नारी और पक्षी, माँ और शिशु, निजामुद्दीन के मेले में तथा भारी मन उनकी उदास नारी से सम्बन्धित चित्र हैं। कलाकार की पुत्री और केश संवारती अनावृता जीवन के प्रफुल्लतादायक पक्षों के चित्र हैं।

सान्याल के दृश्य-चित्रों में देहात की ताजगी तथा रंगों में वातावरण की सचाई है। उनका माध्यम तैल तथा जल-रंग हैं। उन्होंने प्रकृति की विभिन्न मनःस्थतियों को अपने चित्रों में उतारा है। उनके चित्रों में रंग सबसे महत्वपूर्ण रहे हैं जो उनके लिए शान्ति के प्रतीक हैं, न कि संघर्ष के। उन्हें धौलाधार पर्वत श्रृखंला से आध्यात्मिक लगाव रहा है। 

उसके उन्होंने अनेक चित्र अंकित किये हैं जिनमें वनस्पतियों की हरीतिमा तथा प्रकाश की आभा को चित्रित किया गया है । आधुनिक कला की अराजकता से अप्रसन्न होकर उन्होंने प्रतीक शैली में भी कुछ चित्र अंकित किये हैं जैसे शि की मुखाकृति के चित्र में उनके केशों के घुमाव संहारके तत्व को छिपाये दिखाई दे रहे हैं। 

सान्याल को पशुओं के अध्ययन-चित्रों में भी कमाल हासिल है। इस श्रृंखला के सभी चित्रों में बड़ी सहजता है और ये बड़ी सादगी से पूर्ण किये गये हैं। सान्याल की घूँघट या परदे से ढकी नारी आकृतियों के चित्र निराशा तथा फटी

आँखों से किसी अज्ञात व्यथा अथवा रहस्य की ओर संकत करते हैं। सान्याल के सभी चित्र मानववादी भावना के उदाहरण हैं और उनमें मानवीय करूणा, सहानुभूति तथा संवेदनशीलता के दर्शन होते हैं। ग्रामीण लोगों के सरल जीवन में उन्हें आकर्षण लगता है।

कँवल कृष्ण 

श्री कँवल कृष्ण का जन्म (1910- ) मांटगुमरी में 3 जनवरी 1910 को हुआ था। कला की उच्च शिक्षा के लिये आपने कलकत्ता कला – विद्यालय में 1933 में प्रवेश लिया और 1939 तक वहाँ रहकर डिप्लोमा प्राप्त किया तथा जलरंगों तथा ग्राफिक्स में विशेष कुशलता प्राप्त की। 

ललित कला अकादमी की फैलोशिप द्वारा आपने पेरिस में हैटर के निर्देशन में एतेलिये-17 में ग्राफिक तकनीक का विशेष अध्ययन किया। आप मार्डन स्कूल नई दिल्ली में कला शिक्षक के पद पर कार्यरत हैं। आप कुछ समय तक शिल्पी चक्र के चेयरमेन भी रहे। 

आपने 1951 से भारत के अतिरिक्त रोम, नार्वे, स्टाकहोम, कोपेनहेगेन, लन्दन, रूमानियाँ, हेग, पं० जर्मनी आदि में भी निरन्तर प्रदर्शनियों आयोजित की हैं। आपको अनेक पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं जिनमें चार स्वर्ण पदक तथा साओ पाओलो पुरस्कार भी सम्मिलित हैं।

आपके चित्रों में किसी गहरी अनुभूति अथवा प्रकृति के किसी पक्ष का चित्रण रहता है। आपने तिब्बत, सिक्किम तथा हिमालय के पर्वतीय क्षेत्रों का विस्तृत भ्रमण किया. है और वहाँ के अनेक स्केच एवं चित्र बनाये हैं। 

आप अन्धकार में से चमकते प्रकाश के द्वारा रूपों का चित्रण विभिन्न रंग-योजनाओं में करते हैं जिनमें अद्भुत गतिशीलता रहती है। कश्मीर युद्ध के समय आपने युद्ध-रत भारतीय सेना के चित्र भी अंकित किये थे। ऐसे 60 चित्र रक्षा मंत्रालय ने 1948 में आपसे क्रय किये थे।

के० एस० कुलकर्णी 

जया अप्पासामी 

रामकुमार (1924 )

कृष्ण खन्ना 

कृष्ण खन्ना का जन्म 5 जुलाई 1925 को पंजाब के लायलपुर नामक नगर में हुआ था। गवर्नमेण्ट कालेज लाहौर से अंग्रेजी में पोस्टग्रेजुएट होने के पश्चात् उन्होने अपना जीवन एक बैंक की नौकरी से आरम्भ किया। 

तेरह वर्ष तक बैंक में नौकरी करने के पश्चात् चित्रकला सीखी और 1948 से इसमें मनोयोग से लग गये। उन्होंने किसी कला-विद्यालय में विधिवत शिक्षा प्राप्त नहीं की है। लाहौर के मेयो स्कूल की सायंकालीन कक्षाओं में अवश्य जाया करते थे। 

1952 की प्रगतिशील कलाकार दल की प्रदर्शनी में भी वे सम्मिलित हुए थे और उसका केटेलाग भी तैयार किया था। सीखने के पश्चात् 1961 से चित्रकला के प्रति पूरी तरह समर्पित हो गये। 1962 में रॉकफेलर छात्रवृत्ति पर उन्होंने सम्पूर्ण विश्व का भ्रमण किया और अगले वर्ष अमेरिकन यूनिवर्सिटी वाशिंगटन में रेजीडेन्ट कलाकार के रूप में आमन्त्रित किए गए। 

उन्होंने अनेक प्रदर्शनियों कीं और 1968 की प्रथम त्रैवार्षिकी में उन्हें पुरस्कृत किया गया ये आर्टिस्ट्स प्रोटेस्ट भूयमेण्ट के भी सदस्य रहे हैं। उन्होंने कला जगत् में अच्छी प्रतिष्ठा प्राप्त कर ली है। आजकल वे दिल्ली में कलाकारों के लिए विशेष रूप से निर्मित साधना स्थली गढ़ी में कार्य करते हैं।

कृष्ण खन्ना की कला की शैली परिमार्जित है। अतः उनकी कला की भाषा को साधारण दर्शक नहीं समझ पाते। उसमें शुद्ध डिजाइन मौलिक विधि से सांयोजित किये गये हैं जो अन्यत्र उपलब्ध नहीं है।

कृष्ण खन्ना चित्र-रचना के पूर्व की क्रिया को मनमें अनुमानित कर लेते हैं। उनके विचार से तैल बहुत भारी माध्यम है फिर भी सावधानी पूर्वक इसमें रंगों की आभा को सुरक्षित रखा जा सकता है। तैल माध्यम के चित्र स्थायी होते हैं, यह कोई तर्क नहीं है खराब कलाकृतियों के स्थायित्व से कोई लाभ नहीं है। 

जो लाग कला को पूँजी निवेश मानते हैं, वे ही ऐसा सोचते हैं कला का एक अनुभव है और जो कला-कृति हमें कोई नया अनुभव दे, वही श्रेष्ठ है। श्री खन्ना के विचार से संस्कृति अथवा परम्पराओं का एक सीमित और सावधानी पूर्ण उपयोग केवल आज के संदर्भ में ही होना चाहिए। ऐसा न हो कि अतीत हम पर हावी हो जाय। हमें भविष्य की चिन्ता करनी चाहिये।

उन्होंने कला के मूलाधारों का अध्ययन करके तकनीक का ध्यान रखते हुए एक आकृतिमूलक चित्रकार के रूप में कार्य आरम्भ किया था। एक बार जब वे मद्रास में एक वीणा वादक का चित्र बना रहे थे तो उन्होंने अनुभव किया कि वीणा के तारों की मार्जना (ट्यूनिंग) भी राग की प्रस्तुति का एक अनिवार्य अंग है। 

मार्जना, संगीतज्ञ, वीणा- सब राग के ही अंग है। उन्हें अलग-अलग अनुभव करके राग का अनुभव नहीं किया जा सकता। इसी प्रकार यदि एक बँधी परिपाटी पर काम किया जाये तो चित्र की सम्पूर्णता का अनुभव नहीं किया जा सकता। 

परम्परागत रीति से तो एक वीणावादक को हाथ में वीणा लिये चित्रित करना मात्र पर्याप्त है पर उससे चित्र की रागात्मक अनुभूति प्राप्त नहीं की जा सकती। 

अतः श्री कृष्ण खन्ना ने किसी भी स्थान से चित्रांकन आरम्भ करके उसे सम्पूर्ण केनवास पर बढ़ाते जाने की विधि अपनाई यह परिवर्तन 1953 में हुआ । इस विधि से उन्होनें एक पूरी रागमाला का चित्रण किया।

इसके उपरान्त वे सहज रूप से चित्रकारी करने लगे। किसी भी चित्र में विषय अथवा थीम का विचार भी त्याग दिया। वे पतले रंगों से द्रुत चित्रांकन करने लगे। किन्तु तैल चित्रण में रंग सूखने का डर नहीं रहता अतः बीच-बीच में बैठकर विचार करने से मूल प्रेरणा में भी अन्तर आने लगा। 

इसका परिणाम यह हुआ कि कभी-कभी चित्र पूरी तरह परिवर्तित होने लगा। अतः श्री खन्ना ने तैल माध्यम छोड़ दिया और राइस पेपर पर चाइनीज़ स्याही से चित्र बनाने लगे। इसमें बहुत शीघ्र काम करना पड़ता है और सुधार भी नहीं किया जा सकता। वे इसे बहुत अच्छा माध्यम मानते हैं।

कृष्ण खन्ना की कृतियाँ स्मृति चित्र हैं। ये दृश्य न होकर अन्तर्दृष्टि है। इनमें वस्तुओं की आन्तरिक प्रकृति को पकड़ने का प्रयत्न है। 

अतः इनकी आकृतियाँ प्रस्तुति-मूलक नहीं हैं। उनके चित्रण का भी अपना ढंग है। लिपि के समान रेखाएँ, मनः स्थिति को व्यक्त करने वाले रंग, एक अजीब सी विकृति जो भयावहता का आभास देती है और जिसे सुन्दरता नहीं कहा जा सकता। 

वृक्ष की शाखा, उल्लू, चिड़िया के पैरों के चिन्ह, घोंघे के रेंगने से बनी रेखा, पानी का बहाव, परछाइयाँ, मेघों के विचित्र आकार, सूर्यास्त, क्षितिज की ओर उड़ते पक्षी तथा मानवाकृतियाँ आदि उनके चित्रों में बदले हुए रूपों में प्रकट होती हैं, रूप जो स्मृति में अस्पष्ट से चिन्ह बनकर 171 रहे गये हैं। कटी-फटी रेखाओं द्वारा वे उनमें एक विशेष टेक्सचर उत्पन्न कर देते हैं।

कृष्ण खन्ना ने दो-तीन वर्ष अमूर्त कार्य करने के अतिरिक्त सदैव आकृति मूलक कार्य किया है जिसमें आज के जीवन पर करारा प्रहार है। 1971 के बांग्लादेश मुक्ति आन्दोलन के समय उन्होनें नर कंकालों के ऊपर रखी मेज पर खेलते हुए कुछ शक्तिशाली लोगों का और 1979 में एक चित्र में नोटों का हार पहने एवं हाथ जोड़े सड़े हुए एक नेता को चित्रित किया था।

रामेश्वर ब्रूटा  

रामेश्वर बूटा का जन्म दिल्ली में 21 फरवरी 1941 को हुआ था। जब वे केवल चार वर्ष के थे तब कक्षा में एक छात्र ने ब्लेक-बोर्ड पर चाक से एक वृत बनाकर उसमें आँखें, नाक, बाल, गर्दन, तिलक, मुकुट आदि बनाये। उन पर उसका जादू जैसा प्रभाव पड़ा। 

उन्हें लगा कि चाक से जिस प्रकार लिखा जाता है वैसे ही चित्र भी बनाया जा सकता है अतः घर जाकर एक प्याले की सहातया से वृत्त बनाया और फिर उसे मुखाकृति का रूप दे दिया। उन्होंने इस प्रकार अनेक चित्र दीवारों पर बना डाले। उसके बाद तो हर समय चित्र बनाने का भूत सवार होने लगा। 

चोरी छिपे घर पर तथा कक्षा में पीछे बैठ कर कार्टून आदि बनाते रहते। अन्त में यह प्रवृत्ति उन्हें कला-विद्यालय खींच ले गयी और वहीं से उनका कलाकार जीवन आरम्भ हो गया।

1964 में उन्होनें दिल्ली कला महाविद्यालय से डिप्लोमा प्राप्त किया और प्रदर्शनियाँ आयोजित करना आरम्भ कर दिया। नई दिल्ली की तृतीय तथा चतुर्थ त्रै वार्षिकी (1975,78) के अतिरिक्त यूगोस्लाविया, बुलगारिया, पोलेण्ड, बेल्जियम, सान फ्रांसिस्को तथा मेनचेस्टर आदि में भी उनके चित्र प्रदर्शित किये गये। 

उनके चित्र अनेक संग्रहों में हैं। वे दिल्ली शिल्पी चक्र के 1968 से 1970 तक सम्मानित सचिव भी रहे हैं। सांस्कृतिक आदान-प्रदान के एक कार्यक्रम के अन्तर्गत 1976 में वे फ्रांस भी गये थे। 1967 से वे त्रिवेणी कला संगम के कला-विभाग के पद पर कार्यरत हैं। प्रमुख के

ब्रूटा सफल चित्रकार तथा ग्राफिक कलाकार हैं। उन्होंने मानव-मन के विभिन्न पक्षों को उजागर करने के अभिप्राय से ‘एप’ सदृश मानवाकृति का माध्यम अपनाया है। इससे वे उसके मौलिक तथा आदिम रूप को चित्रों की पृष्ठभूमि में अंकित आधुनिक परिवेश से जोड़ने का प्रयत्न करते हैं। 

वे इनके द्वारा मार्मिक व्यंग्य प्रस्तुत करते हैं। उनके अनुसार हजारों साल के बाद भी मनुष्य में अन्तर नहीं आया है। अतः उनकी मानवाकृतियों में चौड़े कन्धे पर्याप्त मांसलता किन्तु पसलियों का स्पष्ट आभास, आन्तरिक शक्ति और आदिम युग से निरन्तर चल रहे किसी संघर्ष की अनुभूति होती है। 

वे उन्हें नग्न ही अंकित करते हैं और केवल पुरुष आकृतियाँ ही बनाते हैं. नारी नहीं उनका विचार है कि वे जिस अनुभूति को व्यक्त करना चाहते हैं यह केवल पुरुष आकृति द्वारा ही सम्भव हो पाती है ‘एप’ अथवा गुरिल्ला के समान आकृति के माध्यम से वे मनुष्य की पाशविक प्रवृत्तियों तथा अशोभनीयताओं को प्रकट करते हैं, जो सामाजिक व्यंग्य का ही एक रूप है। 

1970 से 1980 तक की अवधि में उन्होंने इस प्रकार के चित्र अधिक बनाये हैं। शरीर पर बाल दिखाने के लिये तूलिका के बजाय ब्लेड के टुकड़े से केनवास खुरच कर इच्छित प्रभाव उत्पन्न करते हैं। 1980 के पश्चात् कुछ वर्षो तक नये प्रयोग किये और फिर गुरिल्ला के स्थान पर मनुष्य का अंकन करने लगे। 

बूटा कलाकार के लिये सामाजिक प्रतिबद्धता के बजाय दबाव, प्रवृत्तियों आजादी तथा अन्तर्दृष्टि को अधिक महत्वपूर्ण एवं आवश्यक समझते हैं।

देवयानी कृष्ण 

देवयानी कृष्ण का जन्म मध्य प्रदेश में हुआ था। उनकी कला- शिक्षा श्री देवलालीकर की शिष्य परम्परा में तथा हुसैन, बेन्द्रे, जोशी, राजपूत एवं चिंचालकर आदि की पंक्ति में इन्दौर में हुई। उन्होनें प्रसिद्ध चित्रकार कँवल कृष्ण से विवाह किया और दिल्ली को ही अपनी गतिविधियों का केन्द्र बनाया। 1944- 45 से वे दिल्ली में रह रही हैं। ये दिल्ली शिल्पी चक्र की संस्थापक सदस्या भी है।

देवयानी ने अनेक माध्यमों तथा तकनीकों में काम किया है किन्तु कहीं भी उनमें पुनरावृत्ति नहीं है अतः उनकी कला सृष्टि विविध है। खिलौनों, मुखौटों तथा अन्य लोक-कला-रूपों ने उनकी कृतियों को प्रेरणा दी है। उन्होने इन्हें अपनी संवेदना का एक अंग बनाकर मौलिक तथा सुन्दर कल्पनाशील आकृतियों की रचना की है। 

उन पर अभिव्यंजनावादी कलाकार पाल-क्ली का भी प्रभाव है किन्तु उनकी अधिकांश कलाकृतियों नव-आदिमवादी शैली की हैं। उनकी ये कृतियाँ अपरिष्कृत प्रतीत होने के कारण सन्तुलन तथा व्यवस्था से रहित दिखायी देती हैं किन्तु उन्होंने प्रभावी डिजाइन तथा लयात्मकता का सदैव ध्यान रखा है। 

पिशाच नृत्य (Devil Dance) पर आधारित उनके मुखाकृति अध्ययन चित्र वर्णनात्मक हैं पर इनमें भी कलाकार का हृदय झांकता है। देवयानी के कार्य में निश्चित विचार, भावावेश और कलात्मक सौन्दर्य की प्रचुरता है।

देवयानी ने बालिक भी बनाये हैं। उन्होनें बातिक के रूप तथा तकनीक में अनेक परिवर्तन भी किये हैं। ये इन कलाकृतियों को मुख्यतः बालकों के लिए बनाती है। उनकी आकृतियाँ सरल, भोली, सहज, स्पष्ट प्रतीकों पर आधारित किन्तु संयोजनों में आधुनिक होती हैं। उन्होंने ने छायाचित्रांकन में भी आरम्भ में महत्वपूर्ण योग दिया था।

1960 के आस-पास के उनके चित्र ब्रिटिश मँवरवाद (Vorticism) के ही रूपान्तर हैं जिनमें घनवाद तथा अभिव्यंजनावाद का सम्मिश्रण है। 

अमूर्त डिजाइन अचेतन के आधार पर कल्पित किये गये हैं। कुंडली के समान मैवरदार तूलिकाघात, रंगों की परिवर्तित रंगते, तरलगति तथा जटिल संयोजनों के साथ अंकित आकृतियाँ तथा रूप धन्यों के समान अलग-अलग प्रतीत होते हैं। 

रंगों में संगीतात्मक संगतियाँ है। देवयानी ने सर जे०जे० स्कूल आफ आर्ट बम्बई से कला में डिप्लोमा प्राप्त किया है। उन्होंने देश- विदेश में अनेक प्रदर्शनियों की हैं तथा तिब्बती कला, सिक्किम के

मुखौटों एवं भारतीय लोक-कला के अभिप्रायों पर शोध कार्य किया है। 1946 में उन्हें एशियाई कला का अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार एवं 1968 में भारत में आयोजित प्रथम त्रिवार्षिकी में पुरस्कार प्राप्त हुआ है।

“ग्रुप 1890”

क्षेत्रीय ललित कला अकादमियों की स्थापना के पश्चात् भारतीय कला में क्षेत्रीयतावाद उभरने लगा था। इस प्रवृत्ति से छुटकारा प्राप्त करने के लिये कुछ कलाकार विदेशों को चले गये थे और वहाँ उन्होंने स्वयं को विदेशी कला जगत में स्थापित कर अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने का प्रयत्न किया था। 

इसका सीधा-सा अर्थ यह था कि भारत के अन्य सभी कलाकार विदेशों में जाकर रह रहे भारतीय कलाकारों को अपने से श्रेष्ठ मान लेते । भारत के कुछ कलाकारों ने इसका विरोध किया। 1963 में इस विरोध का परिणाम दिल्ली में एक कलाकार ग्रुप की स्थापना के रूप में सामने आया जिसे ‘ग्रुप 1890’ नाम दिया गया। 

स्थापना के समय इस दल की अपनी कोई विचारधारा नहीं थी; पर इतना अवश्य था कि इसके सदस्य कलाकार न तो पश्चिमी कला- शैलियों की अनुकृति के पक्षपाती थे और न ही विदेशी आधुनिक प्रवृत्तियों के द्वारा परम्परागत भारतीय कला-शैली में ‘सुधार’ के पक्षपाती थे। 

ये कलाकार आधुनिक कला और परम्परा दोनों को ही भार समझते थे और अपनी बात अपने ढंग से कहना चाहते थे। ये सब कलाकार ‘शैली’ और ‘रूप’ की दृष्टि से एक-दूसरे से पूर्णतः भिन्न पद्धतियों में काम कर रहे थे। इनकी प्रदर्शनियों का उद्घाटन जवाहरलाल नेहरू ने किया था। 

आखिरकार ये कलाकार एक ऐसी सच्चाई – कलाकारों द्वारा मुक्त रूप से व्यक्तिगत स्तर पर विकसित की गयी कला शैली गढ़ने में सफल हुए जो विदेशों में जाकर बसने वाले भारतीय कलाकारों की कला के समान ही सत्य थी। इस ग्रुप के सदस्य ऐरिक बोवेन, जगदीश स्वामीनाथन, गुलाम मुहम्मद शेख, जेराम पटेल, ज्योति भट्ट, हिम्मतशाह तथा के० अम्बादास आदि थे। 

ग्रुप की स्थापना से पहले अम्बादास, गुलाम शेख, स्वामीनाथन और हिम्मतशाह विचार-विमर्श के लिए भावनगर (गुजरात) में इकट्ठे हुए थे। इनके सूचीपत्र का आमुख भारत में मेक्सिको के राजदूत ओक्टेवियो पाज द्वारा लिखा गया था जो प्रसिद्ध अतियथार्थवादी कवि और तीसरे विश्व के बुद्धिजीवियों के आदर्श थे। 

इन कलाकारों की केवल एक आधारभूत मान्यता थी वह थी अचेतन मन का महत्व और परिणाम स्वरूप कला की स्वतः प्रवृत्ति। इस प्रकार अतियथार्थवादी सिद्धान्त ने एक महत्वपूर्ण और प्रमुख स्थान ग्रहण कर लिया लेकिन इसके अन्तर्गत पाल क्ली के विनोदपूर्ण रूप को तरजीह दी गयी क्योंकि इसी रूप ने कलाकारों को इनकी अपनी जन्मजात स्वदेशी कला की ओर प्रवृत्त किया था।

जगदीश स्वामीनाथन (1928-94)

स्वामी का जन्म शिमला में 21 जून 1928 को दक्षिण के अय्यर परिवार के माता-पिता के घर में हुआ था। उनके पिता उच्च सरकारी अधिकारी थे। 

बचपन में स्वामी बहुत चतुर और जिद्दी थे। चित्रकला में रूचि होते हुए भी उन्होंने कला-विद्यालय में प्रवेश नहीं लिया हाईस्कूल के पश्चात उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय की प्री-मेडिकल कक्षा में भर्ती किया गया किन्तु वहाँ उनका मन न लगा। धीरे-धीरे उन पर राजनीतिक प्रभाव भी पड़ने लगा।

1943 की प्री-मेडिकल परीक्षा में अनुत्तीर्ण हो जाने से स्वामी घर छोड़कर कलकत्ता भाग गये । वहाँ वे ब्लैक में सिनेमा के टिकट बेचते तथा फुटपाथ पर सिले. हुए अण्डरवीयर बेचने लगे। वहीं वे क्रान्तिकारी समाजवादी दल के सदस्य बने। उन्होंने समाजवादी साहित्य तथा विचारधारा का गम्भीर अनुशीलन किया। 

डेढ़ वर्ष के पश्चात् वे दिल्ली लौटे और कांग्रेस समाजवादी दल के सदस्य बन गये। वहाँ उन्होंने ‘मजदूर आवाज’ का सम्पादन किया। वे दल के विद्वान् प्रवक्ता बन गये।

1947 में स्वामी पार्टी में मतभेद होने पर जयप्रकाश नारायण के समर्थक न बन कर अरुणा आसफ अली आदि उग्रवादियों के अनुयायी हो गये। उनके ऊपर साम्यवादी होने का आरोप लगाया गया। स्वामी ने समाजवादी दल छोड़ दिया और साम्यवादी दल के सदस्य बन गये। वे सक्रिय रूप से सामाजिक कार्यों में भाग लेने लगे। 

1953 तक राजनीतिक परिवर्तनों तथा पार्टी की विचारधारा में विभिन्नताओं के कारण स्वामीनाथन 1954 तक उससे पूर्णतः पृथक् हो गये। इसी समय उन्होंने विवाह किया। वे कुछ समय बाद करौल बाग स्थित अपने माता-पिता के पास रहने लगे और आजीविका के लिये दैनिक हिन्दुस्तान तथा सरिता में बच्चों की कहानियाँ लिखने लगे। 

1956- 57 तक उनका सम्पर्क पीपुल्स पब्लिशिंग हाउस से हो गया और उन्होनें साम्यवादी लेखन में पर्याप्त योगदान किया।

इस सम्पूर्ण अवधि में समय मिलने पर स्वामी चित्रांकन करते रहते थे और दिल्ली के कला जगत् की गतिविधियों के भी सम्पर्क में रहते थे। 1958 में उन्हें वारसा (पौलैण्ड) की एक छात्रवृत्ति तीन वर्ष की अवधि के लिये ग्राफिक कलाओं के अध्ययन हेतु मिली, किन्तु वे छः महीने बाद ही लौट आये और शैलोज से कला सीखने लगे। 

दिल्ली के चित्रकला जगत् में उनकी प्रसिद्धि होने लगी। वे चित्र बनाने के साथ-साथ कला पर अच्छी बहस भी कर लेते थे। वे अपनी कला को राजनीतिक रंग देने में भी कुशल थे।

अपनी कला के लिए स्वामीनाथन ने एक मंच तैयार किया और 1963 में उन्होंने समान विचारधारा वाले कुछ साथियों के सहयोग से ग्रुप ‘1890’ की स्थापना कर डाली। इसकी प्रदर्शनी का उद्घाटन जवाहरलाल नेहरू ने किया। दल के अन्य सदस्य थे जेराम पटेल, राजेश मेहरा, गुलाम शेख, राघव कानेरिया, हिम्मतशाह, ज्योति भटट, अम्बादास, रेडप्पा नायडू, बालकृष्ण पटेल, एस० जी० निकम तथा एरिक बोवेन किन्तु इनके आदर्श अथवा सिद्धान्त एक समान नहीं थे। 

यह एक प्रकार से अन्य दलों के प्रहार से कलाकारों को बचाने का तथा दूसरों को रोकने का तरीका था। स्वामी ने 1966 में दल के प्रचार के लिए “कांट्रा” पत्रिका का प्रकाशन भी किया । 

अपनी कला में वे भारतीय विचारधारा की वैचारिक पृष्ठभूमि के साथ-साथ आधुनिक, अन्तर्राष्ट्रीय तथा स्वतंत्र शैली के विकास का प्रयत्न करने लगे। वे अपने चित्रों की प्रदर्शनी भारत तथा विदेशों में करने लगे। 1968 में भारत में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय त्रिनाले में उनका सम्मानित उल्लेख किया गया। 

उन्हें ‘नेहरू फैलोशिप’ प्रदान की गयी जिसमें देश में भ्रमण तथा शोध कार्य करने का प्रावधान था। 1969 में वे साओ पाओलो (ब्राजील) की द्विवार्षिक प्रदर्शनी में अन्तर्राष्ट्रीय जूरी के सदस्य बनाये गये। वे लिंक पत्रिका के संस्थापकों में से एक थे।

1970 में स्वामी ने ललित कला अकादमी के गठन और कार्यों का विरोध करना प्रारम्भ किया और “आर्टिस्ट्स प्रोटेस्ट मूवमेण्ट’ के सचिव रहे। धीरे-धीरे उन्हें उसमें सफलता मिली और उनका भारतीय कला की गतिविधियों में महत्वपूर्ण सहयोग माना जाने लगा। उन्हें भोपाल में रूपंकर (भारत भवन) का प्रथम निर्देशक नियुक्त किया गया जिसका उद्घाटन 13 फरवरी 1982 को हुआ था।’

स्वामीनाथ की कला का प्रथम चरण 1959 के लगभग आरम्भ हुआ जब वे प्रागैतिहासिक कला की बिम्ब योजना तथा आदिम सभ्यता के टोटम चिन्हों का प्रयोग करते थे। उस समय वे कला के जादुई प्रभावों का ही विचार करते थे। दूसरे चरण

भारत भवन  

यह दृश्य कलाओं, काव्य तथा मंचीय कलाओं का ऐसा घर है जहाँ चिन्तन और सृजन निरन्तर चलते रहते हैं। वास्तव में यह भवन न होकर अभवन (Non Building) है जिसमें खुले वातावरण में कार्यक्रम अधिक होते हैं। 

यह ललित कलाओं के परिरक्षण का भी राष्ट्रीय केन्द्र है जहाँ आदिवासी और शास्त्रीय संगीत के 2500 से भी अधिक रिकार्ड हैं: दो हजार आदिवासी कला-कृतियाँ तथा सात सौ नागर कृतियाँ हैं। 

1990 तक 50 अखिल भारतीय, 19 अन्तर्राष्ट्रीय प्रदर्शनियाँ तथा 33 सेमिनार आयोजित हो चुके हैं तथा ग्राफिक्स एवं सिरेमिक्स कार्यशालायें निरन्तर कार्य करती रहती हैं। 

1989 में यहाँ “वागर्थ” विश्व कविता समारोह हुआ था जिसमें 21 देशों के 25 भाषाओं के 26 कवियों ने भाग लिया था। यहाँ दस हजार से अधिक काव्य पुस्तकें संग्रहीत हैं। 42 नाटकों के 900 से अधिक प्रदर्शन हो चुके हैं तथा रंगमंच से सम्बन्धित एक समृद्ध संग्रहालय के अतिरिक्त कार्यशालाएँ भी निरन्तर आयोजित होती रहती हैं। 13 फरवरी 1995 को भारत भवन के एक समारोह में स्वामीनाथन को मरणोत्तर ‘कालिदास सम्मान प्रदान किया गया।

में उनका ध्यान भारत की लोक तथा आदिवासी संस्कृतियों की ओर गया जिनके प्रतीकों तथा प्रतिमाओं को उन्होंने जादुई भावना से देखा। 1960 के पश्चात् वे भारतीय मिथकों का अधिकाधिक प्रयोग करने लगे। इनमें ॐ स्वस्तिक, कमल, लिंग, सर्प तथा हाथ की छाप प्रमुख थे। 

इनमें बड़े आकारों तथा गहरे तीखे रंगों का गाढ़ा प्रयोग किया गया। स्वयं उन्हीं के शब्दों में आरम्भिक चित्रों में “पैलेटनाइफ का बहुत इस्तेमाल” हुआ है। ये प्रतीक ग्राम्य संस्कृतियों से निकल कर शहरी वातावरण में पहले ही अपना बहुत कुछ महत्व खो चुके हैं। स्वामीनाथन ने इन्हें अपने अनुकूल चित्रित करके इन्हें और भी अधिक दुर्बल बना दिया है। इनके माध्यम से स्वामी ने किसी निश्चित शैली का विकास नहीं किया है।

इसके पश्चात् स्वामीनाथन काल्पनिक ज्यामितीय चित्रण करने लगे। इन चित्रों को उन्होनें “अन्तरिक्ष की रंग-ज्यामिति” (Colour Geometry of Space) कहा है। इन आकृतियों के पीछे निश्चित रूप से तांत्रिक प्रभाव है। रंग-योजनायें हल्की और पारदर्शी हैं तथा चित्र केवल रंगों के संयोजन की दृष्टि से ही बनाये गये हैं। रंगों में न कहीं वैपरीत्य है, न उभार है, न गहराई ।

धीरे-धीरे स्वामीनाथन भवनों आदि को ज्यामितीय रूपों में ढालने लगे और आकार भी छोटे होने लगे। इस प्रकार एक नयी बिम्ब-योजना का उदय हुआ । अपने विकास के अन्तिम चरण में स्वामीनाथन ने प्रकृति से प्रतीकों का चयन

करके आड़े-तिरछे, कोमल, पारदर्शी तथ विशाल आकार के पर्वतों का चित्रण किया हैं जिन्हें गुरुत्वाकर्षण से मुक्त होकर आकाश में बड़े सहज भाव से विचरण करते दिखाया गया है। कभी-कभी इन पर कोई पक्षी बैठा अंकित किया गया है। पर्वत के नीचे या पहाड़ी के शिखर पर एक पुष्पित झाड़ी का अंकन रहता है, अपने प्रथम बसन्त को प्रदर्शित करता कोई पौधा : तुलसी, चेरी या गुलमोहर । 

कभी-कभी आकाश में उपजा कोई वृक्ष भी चित्रित होता है जिसकी जड़ें तथा शाखाएँ आकाश में ही फैली रहती हैं। आकाश अत्यधिक प्रकाश युक्त होता है; कभी पीले वृत्त अथवा चन्द्राकार चिन्हों द्वारा आच्छादित पहाड़ियों से । आकाश में पक्षी जैसी कोई वस्तु जो उड़ती-सी भी है और स्थिर-सी भी है। 

चित्र का सम्पूर्ण प्रभाव अतीन्द्रिय लोक में ले जाता है। इससे वे ब्रह्माण्ड के अभी तक अननुभूत पक्षों का अनुभव करना चाहते हैं। चित्रों में अंकित वस्तुएँ केवल रंग के चमकदार धब्बे हैं अतः चित्र देखते-देखते हमारे सामने से वस्तुओं का रूप अदृश्य हो जाता है और केवल रंग का धब्बा शेष रह जाता है, बिम्ब छिप जाता है, प्रतिबिम्बं रह जाता है।

जेराम पटेल  

जेराम पटेल का जन्म (1930) गुजरात में सोजीतरा – नामक गाँव में हुआ था। इनकी कला-शिक्षा सर जे०जे० स्कूल आफ आर्ट बम्बई में हुई। 1957 से 59 तक ये सेण्ट्रल स्कूल लन्दन में रहे जहाँ टाइपोग्राफी तथा पब्लिसिटी डिजाइन में डिप्लोमा प्राप्त किया। भारत लौटकर इन्होंने चित्रांकन और प्रदर्शन आरम्भ कर दिया। 

1963 में कुछ अन्य कलाकारों के साथ ‘ग्रुप 1890’ की स्थापना की। काफी समय तक नेशनल इन्स्टीट्यूट आफ डिजाइन (NID) अहमदाबाद तथा कई स्थानों पर आल इण्डिया हैण्डलूम बोर्ड एवं स्कूल आफ आर्कीटेक्चर अहमदाबाद में डिजाइन कन्सल्टेण्ट रहे। वे 1966 से बड़ौदा विश्वविद्यालय की फेकल्टी आफ फाइन आर्ट्स में एप्लाईड आर्ट्स के प्रोफेसर तथा डीन के पद पर कार्यरत है।

कला जगत में जेराम पटेल की पहचान कागज पर रेखाकंनों और धातु की चादरों तथा काष्ठ पर रिलीफ के काम के कारण बनी। वे एक सशक्त आधुनिक कलाकार हैं। काले रंग के उनके 1961 से 1975 तक के रेखाकंन ऐसे लगते हैं मानों ट्यूमर या प्रोटोप्लाज्मा हों जिनका आकार निरन्तर बढ़ता जा रहा हो। 

उनमें कहीं-कहीं खोपड़ियों और आँखों के छिद्र जैसे भी अनुभव होते हैं जो उनमें छिपी जीवनी शक्ति का आभास देते हैं। ये ऐसे लगते हैं मानों किसी चिकित्सालय में बैठकर बनाये गये अध्ययन-चित्र हों। इनमें विचित्र पशुओं, पक्षियों तथा रेंगने वाले जीवों की आकृतियाँ विकसित हुई हैं और चित्र की पृष्ठभूमि किसी बंजर वा सुनसान भूमि के समान प्रतीत होती है। 

इनमें एक विचित्र चुप्पी तथा गति हीनता अथवा जड़ता का भी अनुभव होता है। उनके बाद के रेखाकंनों में लटकते हुए लम्बे-लम्बे गुब्बारों जैसी शिश्नाकृतियों बहुत अधिक अंकित होने लगी हैं।

रेखा चित्रों के अतिरिक्त जेराम पटेल ने काष्ठ चित्र भी बनाये हैं। किन्तु उन्होंने काष्ठ का उपयोग केवल आधार के रूप में ही नहीं किया है बल्कि लकड़ी के धरातल को जलाकर तथा खुरचकर और फिर कहीं-कहीं उस पर थोड़ा सा रंग लगाकर काष्ठतल को ही चित्र में परिवर्तित कर दिया गया है। 

जलाकर लकड़ी में कहीं-कहीं कई इंच गहरे गड्डे भी कर दिये हैं। कहीं उसे खुरच भी दिया गया है, कहीं उस पर टीन लगा दी गई है और कहीं कहीं उस टीन में छिद्र भी कर दिये गये हैं। इस सबसे जो प्रभाव उत्पन्न होता है उससे कहीं-कहीं रंग लगाकर और भी बढ़ा दिया गया है। 

रंगों के अतिरिक्त लकड़ी का अपना रंग और धरातल, ऊपरी सतह का लेमीनेटेड स्वरूप, जले हुए भागों की कालिमा अथवा भूरापन, उभरे हुए भागों की तुलना में गड्डों का अंधेरा- इन सभी का जेराम पटेल ने अत्यन्त कुशलतापूर्वक प्रयोग किया है जो सम्मोहात्मक एवं रहस्यात्मक लगता है। इस कार्य के लिए वह लेमीनेटेड लकड़ी की सतह का प्रयोग करते हैं और उसे ब्लो टार्च से स्थान स्थान पर जलाते हैं।

 इन कृतियों में परिप्रेक्ष्य का आभास होता है जिससे सम्पूर्ण चित्र एक दृश्य के समान प्रतीत होता है। उभरी और गोदार धरातलों वाली आकृतियों तथा जगह-जगह लगाये गये टिन आदि के टुकड़े और रंग कोलाज का आभास देते हैं।

ये अनेक प्रदर्शनियाँ कर चुके हैं। 1963 में उन्होंने टोकियो (जापान) तथा साओ पाओलो (ब्राजील) की हैवार्षिकियों में भी भाग लिया था। जेराम पटेल को कई बार ललित कला अकादमी का राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका है। भारतीय कला जगत में उनकी सबसे अलग और विशिष्ट पहचान है।

हिम्मतशाह (1933- )

हिम्मतशाह का जन्म गुजरात के एक गाँव लोथल में हुआ था। वे सर जे० जे० स्कूल ऑफ आर्ट बम्बई से ड्राइंग टीचर के प्रारम्भिक प्रशिक्षण पाठ्यक्रम को पूर्ण कर कला के उच्च अध्ययन हेतु बड़ौदा गये। 1967 में ये एक फ्रेंच छात्रवृत्ति पर फ्रांस गये और वहाँ एतेलिऐ-17 में अध्ययन किया। 

इसके पूर्व 1963 में स्थापित तथा बहुचर्चित कलाकारों के प्रभावशाली दल “ग्रुप 1890” के संस्थापक सदस्यों में से थे। फ्रांस में अपना अध्ययन पूर्ण कर भारत लौटकर उन्होंने अहमदाबाद में सेंट ज़ेवियर स्कूल के तीन भवनों को डिजाइन किया।

हिम्मतशाह न मूर्त हैं और न अमूर्त न ही ये धरातलीय डिजाइन की चिन्ता करते हैं। उनके रेखाकंनों में अभूर्तपूर्व सृजनात्मकता है। स्याही की कटी-फटी रेखाओं तथा टोन से उन्होंने महान विप्लवकारी रूप बनाये हैं। विकृत तथा विरूपित शिर भयानक राक्षसों के समान दर्शकों को हिला देते हैं। 

हिम्मतशाह अपने अचेतन के संघषों और विदीर्णता को इन चित्रों में प्रतिबिम्बित करते हैं। उनके ये चित्र पश्चिमी चित्रकार पिकासो के “गर्निका” की याद दिलाते हैं।

आधुनिक चित्रकला में हिम्मतशाह अलग ढंग के चित्रकार हैं। पेटिंग, मूर्ति शिल्प, रेखाकंन, भिति-चित्रण, ग्राफिक, फोटोग्राफी, मिट्टी का काम, टेराकोटा, सिरेमिक, चाँदी तथा सोने के पत्र आदि के शिल्प, सभी में उन्हें कुशलता प्राप्त है। टेराकोटा में उन्होंने महत्वपूर्ण कार्य किया है। 

ये चाँदी के कार्य की बहुत प्रशंसा करते हैं और उसका रंग उन्हें बहुत पसन्द है जिसकी रंगत “धूसर” (ग्रे) से भिन्न और बहुत प्रभावशाली तथा मृदु है।

चित्रों में हिम्मतशाह तेज और चमकीले रंग पसंद करते हैं। उनकी कला के मूल स्रोत भारतीय लोक कला और जीवन है गुजरात में बिताये गये बचपन के अनुभवों ‘को भी वे अपनी कला के रुझान से जोड़ते हैं। वे ग्रेटर कैलाश (नई दिल्ली) में रहते हैं और गढ़ी में काम करते हैं। उन्होंने अनेक प्रदर्शनियाँ की हैं और वे आज के सफल कलाकारों में से हैं। 

ज्योति भट्ट (1934 ) 

ज्योति भट्ट का जन्म भावनगर (गुजरात) में 12 मार्च 1934 को हुआ था। 1954 में उन्होंने बड़ौदा विश्वविद्यालय से चित्रकला में डिप्लोमा परीक्षा तथा 1956 में पोस्ट डिप्लोमा परीक्षा उत्तीर्ण की। 1957 से 1959 तक उन्हें भारत सरकार द्वारा कला विषय की राष्ट्रीय सांस्कृतिक छात्रवृति प्रदान की गयी। 

1961-62 में उन्हें इटली सरकार की छात्रवृति प्राप्त हुई जिसके अन्तर्गत उन्होने वहां प्रिन्ट बनाने की पद्धति का गम्भीर अध्ययन किया। वे 1964-65 में फुल- ब्राइट स्कालरशिप के अन्तर्गत न्यूयार्क गये। 1965 में उन्हें राकफैलर फाउण्डेशन ट्रेविल ग्राण्ट मिली ओर 1965-66 में जे० सी० आर० थर्ड फाउण्डेशन एवार्ड प्राप्त हुआ।

उन्होने बम्बई, अहमदाबाद, दिल्ली, न्यूयार्क, मॉण्ट्रियल, टोक्यो, फ्लोरेन्स आदि अनेक स्थानों पर चित्रों की प्रदर्शनियों की और अनेक पुरस्कार प्राप्त किए। ये चित्रकार के साथ-साथ श्रेष्ठ ग्राफिक कलाकार भी हैं और बड़ौदा की ग्राफिक कार्यशाला से भी सम्बद्ध रहे हैं। सम्प्रति वे बड़ौदा विश्वविद्यालय के चित्रकला विभाग में रीडर के पद पर आसीन हैं।

ज्याति भट्ट ने ग्राफिक चित्रों के साथ-साथ ग्राफिक कलाओं पर लेख भी लिखे हैं जो गुजराती, हिन्दी तथा अंग्रेजी पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। फोटोग्राफी में उनकी विशेष रूचि रही है और 1974 में पश्चात् उनकी कला में फोटोग्राफिक आकृति रचना का विशेष प्रभाव आया है। 

उन्होंने ग्रामीण कला तथा आदिवासी कला का “फोटोग्राफिक डाक्यूमेण्टेशन” भी किया है। अनेक नए ग्राफिक कलाकारों के ये शिक्षक तथा मार्ग-दर्शक रहें है। वे बड़ौदा ग्रुप तथा ग्रुप 1890 के संस्थापक सदस्यों में से हैं।

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