कला व परंपरा | Art and Tradition

कला व परंपरा का आपसी संबंध एक ऐसा विषय है जिस पर अनेक कलाकारों व लेखकों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से भिन्न मत व्यक्त किये हैं। 

वर्तमान में तो भारतीय कलाक्षेत्र में उत्पन्न दिशाहीनता के कारण हो, कलाकार के व्यावसायिक महत्त्वाकांक्षा के अधीन होने के कारण हो या ईर्ष्यावश हो, इस विवाद ने अधिक तीव्र स्वरूप अपनाया है। 

पश्चिमी पॉप संगीत व रॅक का भारतीय संगीत पर बढ़ता प्रभाव, डिस्को व ब्रेक जैसे समूहनृत्यों के प्रति शहरी युवाओं का बढ़ता आकर्षण, केवल व्यापारिक दृष्टिकोण ने कलाकारों, साहित्यिकों व चलचित्र निर्माताओं के मानस पर जमाया नियंत्रण इन सब तत्त्वों ने भारतीय सांस्कृतिक चेतना पर ऐसा जबरदस्त आक्रमण किया है कि भारतीय परम्परा के अस्तित्व को जो खतरा पैदा हुआ है वह विचारकों के लिये चिंता का विषय बन गया है जिससे इस विवाद का महत्त्व और बढ़ जाता है।

परंपरा के पक्षधर, भारतीय आधुनिक कला को पश्चिमी कला का अंधानुकरण मानते हैं तो आधुनिकता के पक्षधर परंपरावादियों की कला को मृत प्राचीन कलाशैलियों को पुनर्जीवित करने के निरर्थक प्रयत्न मानते हैं। 

बंगाल पुनरुत्थान शैली के कलाकारों ने परंपरागत कला को पुनर्जीवित करने के जो प्रयत्न किये उनको अपेक्षित सफलता नहीं मिली किन्तु उससे कुछ चिंतनशील भारतीय कलाकारों व कलाप्रेमियों को भारतीय संस्कृति के संदर्भ में पश्चिमी कला के अनुसरण के औचित्य के बारे में अवश्य सशंक किया।

‘परंपरा’ एक अतिव्यापक बहुअर्थी संकल्पना है और उसकी सुनिश्चित परिभाषा संभव नहीं है। यद्यपि संदर्भ के अनुसार ‘परंपरा’ शब्द का लेखन या वक्तव्य में समुचित प्रयोग करने में व उसका अर्थ समझने में कोई कठिनाई नहीं होती। 

अतः यदि कला के संदर्भ में परंपरा कोई महत्त्व रखती हैं तो उसको जानने के लिये परंपरा के उन तत्त्वों पर ध्यान देकर विचार करना उचित होगा जो कलासर्जन से संबंधित हों। 

परंपरा के जो तत्त्व कलासर्जन में सहायक हो सकते हैं वे हैं- पारंपरिक रूप, परंपरागत अंकन पद्धतियाँ व अभिव्यक्ति के लिये आधारभूत पारंपरिक सामाजिक जीवनदर्शन। 

पारंपरिक रूप

मनुष्य के लिये रूप का दो तरह से महत्त्व है। सर्वप्रथम रूप मनुष्य की भौतिक सौंदर्य की अभिलाषा की पूर्ति करता है और उसका दूसरा कार्य है अभिव्यक्ति को सामर्थ्य प्रदान करना। 

किन्तु रूप का सौंदर्याभिलाषापूर्ति का कार्य जिसे सही अर्थ में आकर्षण कह सकते हैं- का प्रभाव अस्थायी होने से सौंदर्याभिलाषी अतृप्त मनुष्य अपनी सौंदर्याभिलाषा

की पूर्ति हेतु नितनूतन रूपों की खोज में लगा रहता है। यही कारण है कि कलाकार नये-नये रूपों के सर्जन में प्रयत्नशील रहता है व समय के साथ कला के रूप में परिवर्तन होता रहता है इसीलिए कला के इतिहास को समुचित रूप से ‘रूपपरिवर्तनों का इतिहास’ माना गया है। 

किसी भी देश की कला के इतिहास के विभिन्न कालखण्डों की कला के रूपों के परिशीलन से यह बात स्पष्ट हो जाती है। 

जब नया रूप या रूपाभिवृद्धि कलासर्जन का एक उद्देश्य बन जाता है तब स्वाभाविक है कि कलाकार इसके लिये विदेशी एवं अन्य रूपों का भी अध्ययन करें व उनसे रूपसौंदर्यवर्धक तरीके ग्रहण करें, जिस तरह फैशन डिजाइनर विभिन्न फैशन्स का अध्ययन करके नये फैशन्स को प्रचारित करता है नयी पीढ़ी की पोशाकें पुरानी पीढ़ी की पोशाकों से अलग दिखायी देती हैं। 

किन्तु उससे हमारी परंपरा को भी विशेष ठेस पहुँची है, ऐसा तब तक नहीं माना जाता, जब तक उससे हमारे जीवनदर्शन को हानि नहीं पहुंचती हमारी पोशाक, गृहरचना, व्यवसाय पद्धति, भाषा, कुटुंबव्यवस्था वगैरह के प्रत्यक्ष रूप में परिवर्तन होने पर भी हम भारतीय परंपरा से बिछुड़ गये हैं, ऐसा नहीं माना जाता। 

इस संबंध में रवीन्द्रनाथ टैगोर के विचार चिन्तनीय हैं उन्होंने अपने निबंध ” Art and Tradition में लिखा है “प्रतिभावान व्यक्तियों की महानता का यह लक्षण है कि उनमें बाहरी प्रभावों से ग्रहण करने की अपार क्षमता होती है।… 

मैं हमारे कलाकारों को स्पष्ट रूप से अनुरोध करता हूँ कि वे प्राचीन शैलियों के अनुसार, जिसको ‘भारतीय कला’ नाम से पहचाना जा सके, ऐसी कला को निर्मित करने के उत्तरदायित्व को अस्वीकार कर दें। 

जब हम पुरानी पीढ़ी के स्वभावजनित भूले हुए संवेदनवैशिष्ट्यों से कट्टरतापूर्वक लगे रहते हैं तब हम आत्मा के विकास को रोक लेते हैं।” किन्तु इसके साथ उन्होंने यह भी चेतावनी दी है कि “यदि हम कला से परंपरा को पूर्णतया बहिष्कृत करने की बात करते हैं तो वह भी अनुचित है। 

यह अर्धसत्य है कि परंपरागत आदतें मस्तिष्क को केवल जड़ बनाती हैं। उपयुक्त परंपराएँ नहर के समान हैं जो प्रवाह का मार्ग सुगम बनाती हैं। … 

मानवजीवन में समय से प्रतिष्ठित कुछ परंपराएँ होती हैं (जो उसको चैतन्य प्रदान करती हैं)।” अजन्ता व बसौली शैलियों के अध्ययन से अमृता शेरगिल ने अपनी निजी शैली के विकास में काफी लाभ उठाया किन्तु केवल भारतीय होने के नाते उनका अंधानुकरण करने का वे कड़ा विरोध करतीं। 

उनकी कला पर पश्चिमी आधुनिक कला का भी प्रभाव है और उसमें भारतीय परंपरा व आधुनिक कला का सुंदर समन्वय है।

परंपरागत अंकन पद्धतियाँ

कला में अंकन पद्धतियों का कार्य मुख्यतः रूपनिर्मिति से संबद्ध होने से जब नवीन रूप या रूपाभिवृद्धि कलाकार का एक ध्येय बन जाता है तब स्वाभाविक है कि उसकी पूर्ति के लिये वह परंपरागत अंकन पद्धतियों का त्याग करके या उनको विकसित करके नयी पद्धति से सर्जन करें। 

नयी पद्धति को विकसित करने हेतु तैल रंग, एक्रिलिक, कोलाज, मिश्र-माध्यम आदि का प्रयोग करने के विदेशी तरीकों को अपनाये जाने का किसी भी तरह निषेध नहीं किया जा सकता। 

यह तो उतना ही अनिवार्य है जितना कि समाज के भौतिक विकास व अंतरराष्ट्रीय स्पर्धा में अस्तित्व बनाये रखने के लिये आधुनिक विज्ञान को अपनाना ।

पारंपरिक सामाजिक जीवनदर्शन

अब कला में परंपरा के महत्त्व को समझने के लिये एवं रवीन्द्रनाथ टैगोर के उपर्युक्त विरोधाभासी कथन का वास्तविक अर्थ जानने के लिये पारंपरिक सामाजिक जीवनदर्शन का विचार करना होगा। 

सामाजिक जीवनदर्शन का रीतिरिवाज, पोशाक, खानपान, शिष्टाचार आदि बाह्य आडंबर से अधिक गहरा अर्थ होता है जिसे हम मानवजीवन की अंतरात्मा कह सकते हैं।

आदिवासियों व प्राचीन आदिम जातियों का जीवनदर्शन गूढ़ शक्तियों, जादू-टोना व मंत्र-तंत्र पर आधारित अंधविश्वास से प्रभावित है तो आधुनिक अमेरिका व योरोपीय देशों का जीवनदर्शन भौतिकवाद व विज्ञान पर आधारित है। 

परिणामस्वरूप आदिवासी व आदिम कला रहस्यमय है तो योरोपीय कला भौतिक सौंदर्य को समर्पित। 

जापानी कला के अध्ययन से प्रभाववादी कलाकारों ने रेखात्मकता, संयोजन व समतल आकारों के प्रयोग के महत्त्व को समझा किन्तु उससे उनकी कला में जापानी कला की काव्यात्मकता नहीं आयी बल्कि वह वैसी ही भौतिक सौंदर्य से ओतप्रोत बनी रही। 

आदिम नीग्रो कला के अनगढ़ स्वाभाविक रूप से प्रभावित होकर पिकासो व अन्य कलाकारों ने योरोपीय कला को एक नया आधुनिक रूप प्रदान किया किन्तु उससे उनकी कला में आदिम कला की रहस्यमयता आने के बजाय वह अधिक रचनात्मक व भौतिक सौंदर्य की दृष्टि से अधिक आकर्षक बन गयी। 

संक्षेप में रूपप्रभाव बढ़ाने हेतु कलाकार भले ही विदेशी कलाओं से प्रेरणा प्राप्त करें किन्तु अपने भावात्मक व्यक्तित्व से निष्ठावान रहे बिना वह स्वाभाविक, स्वतंत्र व जीवंत कलासर्जन नहीं कर सकता। 

भावात्मक व्यक्तित्व निर्माण में पारंपरिक जीवनदर्शन का बहुत बड़ा योगदान होता है। 

यह जीवनदर्शन प्राचीन काल से पवित्र व शाश्वत माने गये धर्मग्रंथों, शिलालेखों, पौराणिक कथाओं, संतवचनों, मान्यता प्राप्त साहित्यिक रचनाओं, कथाओं व सनातन विश्वासों को आधारभूत मान कर तद्नुसार प्रचलित आचरण से परिपक्वता प्राप्त करता है। 

बुद्धिवाद से हानिकारक पारंपरिक रीति-रिवाजों व अंधविश्वासों को हटाया जा सकता है किन्तु अनुभवसिद्ध पारंपरिक धार्मिक व आध्यात्मिक आस्थाओं के सम्मुख बुद्धिवाद दुर्बल सिद्ध होता है भारतीय जैसे सुक पुरातन समाज के मूलभूत जीवनदर्शन में परिवर्तन की संभावना पर सोचना भी राष्ट्रीय विपत्तियों को निमंत्रित करना है।

भारतीय जीवनदर्शन के प्रमुख तत्त्व हैं घराघर में व्याप्त ईश्वरीय अस्तित्व पर निष्ठा, भूतदया, सहिष्णुता, सांसारिक कर्मों के प्रति कर्तव्यबुद्धि, भौतिक जीवन को परमार्थ प्राप्ति का साधन मात्र समझ कर भौतिक जीवन के प्रति अनासक्ति, सुख व दुःख के द्वंद्व को भ्रामक व अविच्छेद्य मानने की प्रवृत्ति, चिन्तन पर अद्वैतवाद व निरपेक्षतावाद का प्रभुत्व, सर्वधर्म समभाव, आत्मा के अमरत्व का विश्वास, आत्मिक शांति को सर्वस्व मानने की प्रवृत्ति व जीवन के अंतिम लक्ष्य के रूप में मोक्ष का स्वीकार इसके विपरीत आधुनिक पश्चिमी जीवन के प्रमुख तत्त्व हैं- सुख व दुःख का पृथक् स्वीकार होने के कारण भौतिक सुख प्राप्ति को जीवन का लक्ष्य मानने की प्रवृत्ति, चिन्तन पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण व सापेक्षतावाद का प्रभुत्त्व, व्यक्तिवाद, आध्यात्मिकता की उपेक्षा, परकीय संस्कृति के प्रति अनुदारता, लक्ष्य प्राप्ति हेतु हिंसा का स्वीकार, आत्मिक अनुभूति की अपेक्षा भौतिक सौंदर्य को महत्त्व। 

भारतीय ललित कलाओं व साहित्य की पश्चिमी ललित कलाओं व साहित्य से तुलना करने पर यह बात स्पष्ट हो जाती है।

प्राचीन काल से ही भारतीय कला मुख्यतः धर्म व आध्यात्मिक चिन्तन को समर्पित रही है और इसके साथ उसमें तत्कालीन सामाजिक जीवन का भी पर्याप्त मात्रा में चित्रण है। 

उसमें व्यक्तिवाद को कोई स्थान नहीं था। वर्तमान काल में भी उसका रूप किस शैली से (परंपरागत, यथार्थवादी, आधुनिक या किसी अन्य) प्रभावित हुआ है यह बात महत्त्व नहीं रखती बल्कि महत्त्व इस बात का है कि वह भारतीय पारंपरिक जीवनदर्शन से कहाँ तक सामंजस्य रखती है। 

अन्यथा उसके सर्जन में न स्वतंत्र स्वाभाविक चैतन्य दिखायी देगा न वह दर्शक को निजी सामर्थ्य से प्रभावित कर सकेगी या उसका पथप्रदर्शन कर सकेगी। 

यह बात स्पष्ट है कि यदि नये रूपसर्जन की महत्त्वाकांक्षा में कला का सामाजिक चेतना से सामंजस्य नहीं बिठाया गया तो वह केवल व्यवसाय या भ्रष्ट अनुकरण मात्र रह जायेगी उत्तेजक विदेशी पॉप संगीत के खिलाफ हो रही आलोचना का यही कारण है कि वह भारतीय जनमानस के विपरीत है व उससे परंपरागत जीवनदर्शन भ्रष्ट हो रहा है। उसमें आत्मिक भावनाओं के स्थान पर ऐंद्रियता को प्रमुखता दी जाती है।

प्रसंगवश यहाँ सतीश गुजराल का कहना है कि ‘हुसैन व रजा को हम अच्छे कलाकार नहीं कह सकते क्योंकि मुस्लिम होने के कारण हुसैन को दुर्गा या हनुमान के चित्र बनाने का परंपरागत अधिकार नहीं है न रजा को तंत्र-विद्या से संबंधित चित्र बनाने चाहियें इस कथन का संक्षिप्त विचार उचित होगा। 

हुसैन का रूपांकन धार्मिक विषयों के चित्रण के लिये अनुकूल नहीं होने से उनके दुर्गा तथा रामायण व महाभारत के चित्रों में अपेक्षित धार्मिक प्रभाव की कमी है। 

क्या पान-मसाला के दूकानदार के लिये पान के साथ द्रोणाचल उठाये हुए हुसैन के हनुमानजी के चित्र को हम धार्मिक चित्र कह सकते हैं? क्या यही हुसैन की धर्मभावना है? कलाकार का इससे घटिया अधार्मिक, व्यावसायिक दृष्टिकोण क्या हो सकता है ?

धार्मिक विषय को लेकर हुसैन द्वारा बनाये चित्र देख कर ऐसा नहीं लगता कि ये चित्र भक्तिभाव या विषय के प्रति आत्मीयता से बनाये गये हैं व यदि यह निष्कर्ष निकाला जाये कि हुसैन ने अपनी सर्वपरिचित पदर्शन प्रवृत्ति के अनुसार, लोगों की निगाह में बने रहने के उद्देश्य से इन चित्रों के लिये लोकप्रिय धार्मिक विषयों का सहारा लिया है तो निष्कर्ष गलत नहीं होगा। 

जब पश्चिमी यथार्थवादी शैली में धार्मिक विषयों के चित्र बनाने के लिये राजा रवि वर्मा की इस वजह से कटु आलोचना हुई कि वह शैली धार्मिक चित्रण के अनुकूल नहीं है तो यह बात समझना कठिन है कि हुसैन के धार्मिक चित्रों को स्वीकृत कर उनकी प्रशंसा कैसे की जाती है? भारतीय कलाक्षेत्र पर निरा व्यावसायिक दृष्टिकोण रखने वाले व्यक्तियों ने किस तरह प्रभुत्व जमाया है, इसका यह एक उदाहरण है।

रजा के तंत्रकला के नाम पर बनाये चित्र भी किस तरह तंत्रकला के अंतर्गत आते हैं यह समझ में नहीं आता। 

जबकि वे चित्र तंत्रविद्या के नियमों का अनुपालन करके नहीं बनाये गये हैं और न उनमें तांत्रिक सामर्थ्य होने का कोई दावा कर सकता है वास्तव में तंत्रकला जो तिब्बत में विशेष रूप से प्रचलित हुई- का उद्भव सिद्धि प्राप्त करने के हेतु हुआ जो विशेष अनुष्ठान के साथ एवं तंत्रशास्त्रीय नियमों के अनुसार आचरण व कर्मकाण्ड करके बनायी जाती है। 

उसके चित्रण में विशेष प्रतीकों का प्रयोग होता है और उसके अंकन पद्धति संबंधी भी शास्त्रीय नियम होते हैं। 

आधुनिक कलाकारों द्वारा बनायी जा रही तंत्रकला का वास्तविक तंत्रकला से दूर का भी संबंध नहीं है उसमें केवल बाह्य रूप में तंत्रकला से सादृश्य दिखाने की चेष्टा की जाती है। 

समसामयिक आधुनिक कला में व्यावसायिक दृष्टिकोण के साथ-साथ भावनाओं की अपेक्षा दृश्य रूप सौंदर्य को किस तरह महत्त्व दिया जा रहा है, इसका यह उदाहरण है।

सतीश गुजराल का मत कि ‘हुसैन व रजा को इस्लामी परंपरा का चित्रण करना चाहिये’ का पूर्णतया समर्थन नहीं किया जा सकता। संत कबीर, जायसी, रसखान वगैरह का भारतीय संस्कृति को किया योगदान भुलाया नहीं जा सकता। 

मलेशिया जैसे इस्लामी देश में रामायण को सांस्कृतिक आयोजनों में जो महत्वपूर्ण स्थान मिला है यह विचारणीय है। 

रशिया से भारत आकर यहाँ के निवासी बने चित्रकार निकोलस रोरिक के चित्र प्रशंसनीय हैं। 

आत्मिक प्रेरणा से भारत आकर उसे अपनी कर्मभूमि मानने वाले फादर कामिल बुल्के के रामायण विषयक प्रामाणिक साहित्य एवं प्रा.यू. म. पठान जो मराठी साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष चुने जा चुके हैं के संत वाङ्मय पर संशोधनपरक साहित्य से यही सिद्ध होता है कि साहित्य या कला के सर्जन में चुने हुए विषय से आत्मीयता के साथ लेखक या कलाकार ने कहाँ तक तादात्म्य प्राप्त किया है, यह महत्त्व रखता है न कि यह लौकिक तथ्य कि वह किसी धर्म का अनुयायी है। 

फिर भी इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि जिस परंपरा में व्यक्ति पला व बढ़ा नहीं है उसे आत्मसात् करके उससे तादात्म्य प्राप्त करना सामान्य व्यक्ति के लिये आसान नहीं है।

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