प्रमुख भारतीय कलाकार | Indian Painters

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तैयब मेहता (1926-)

तैयब मेहता
तैयब मेहता

तैयब मेहता का जन्म 1926 में गुजरात में कपाडवंज नामक गाँव में हुआ था। कला की उच्च शिक्षा उन्होंने 1947 से 1952 तक सर जे० जे० स्कूल आफ आर्ट बम्बई में ली। 

1959 में वे लन्दन चले गये और वहाँ कला के अध्ययन के साथ-साथ प्रदर्शनियाँ भी करते रहे। 1965 में वे भारत वापिस आये और यहाँ कई प्रदर्शनियों का आयोजन किया। 

1965 में ही उन्हें ललित कला अकादमी का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ। 1968 में भारत में आयोजित त्रिनाले प्रदर्शनी में उन्हें पुरस्कार मिला और राकफैलर फैलोशिप पर वे पुनः यूरोप चले गये। वहाँ से आने के पश्चात् वे निरन्तर प्रदर्शनियाँ आयोजित करते रहे हैं। 

वे फिल्मों में भी सक्रिय हैं और अपनी एक फिल्म ‘कुणाल’ पर 1969-70 में ‘फिल्म फेयर’ पुरस्कार भी प्राप्त कर चुके हैं। वे अमूर्त कला में रुचि न रखते हुए स्वयं को अभिव्यंजनावादी कलाकार मानते हैं। वे प्रायः बम्बई में रहते हैं।

तैयब मेहता जब यूरोप से आये थे उससे पहले वे प्रोग्रेसिव कलाकारों की भाँति तूलिकाघातों तथा पैलेट नाइफ का प्रयोग चित्र की केन्द्रीय आकृति बनाने में करते थे। 

भारत लौटकर उन्होंने इस विधि को त्याग दिया और सपाट रंग भरने लगे। तैयब मेहता के चित्रों के लोग इसी दुनियाँ के हैं। आकृतियों की मुद्रायें अत्यन्त व्यंजक और प्रभावपूर्ण हैं। 

उनकी ठोस आकृतियाँ इतनी व्यंजक नहीं हैं जितनी पानी में तैरती और हिलती-डुलती सी सपाट आकृतियाँ आकर्षित करती हैं। मानों वे हमारे मन के आलोड़न की ही प्रतिरूप हैं।

कृष्ण रेड्डी (1925 )  

कृष्ण रेड्डी
कृष्ण रेड्डी

ग्राफिक चित्रकार कृष्ण रेड्डी का जन्म दक्षिण भारत के आन्ध्र प्रदेश में हुआ था। बचपन में वे माँ के साथ घूम-घूम कर ग्रामीण क्षेत्रों के दैनिक जीवन के क्रिया-कलापों और ग्रामीण जीवन में कलाओं के अनिवार्य प्रयोग को देखा करते थे। 

इससे उनमें कला के संस्कार बनने आरम्भ हुए। छोटी आयु से ही उन्होंने पत्थरों और मिट्टी से रंग बनाना आरम्भ कर दिया था। 

बड़े होने पर 1940 में वे कला की शिक्षा के लिए शान्ति निकेतन चले गये और सात वर्ष तक वहाँ आचार्य नन्दलाल बसु जैसे आचार्यों से कला की शिक्षा ली। 

शान्ति निकेतन में अपनी शिक्षा पूर्ण कर लेने के पश्चात् वे स्लेड स्कूल आफ आर्ट लन्दन पहुँचे और उसके बाद पेरिस गये। 

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पेरिस में कलाकारों का जमघट लगा रहता था और वहाँ के बड़े-से-बड़े कलाकार के स्टुडियो में जाकर चित्रांकन सीखा जा सकता था। 

कृष्ण रेड्डी ने वहाँ अनेक आधुनिक शिल्पियों के सम्पर्क से यूरोपीय तथा भारतीय कला के सम्बन्ध में एक नयी दृष्टि प्राप्त की। 

1947 से 1950 तक वे “कला क्षेत्र” मद्रास के ललित कला महाविद्यालय में विभागाध्यक्ष रहे और 1970-1971 में केलीफोर्निया विश्वविद्यालय में कला-विभाग में विजिटिंग प्रोफेसर थे।

पेरिस में रहकर रेड्डी ने ग्राफिक तकनीक सीखा। वहाँ की प्रसिद्ध कार्यशाला एतेलिये-17 में उन्होंने 1951 ई० तक कार्य किया और अपनी योग्यता से केवल एक छात्र न रहकर वे वहाँ एक सहयोगी कलाकार बन गये। 

कृष्ण रेड्डी ने वहाँ अम्लाकन (एचिंग) में निपुणता प्राप्त की। इस विधि द्वारा निर्मित छापा चित्रों में हमें उच्च तकनीक, कल्पना की उड़ान, संगीतमय व्यवस्था आदि गुण मिलते हैं। 

उन्होंने फोटो, रेखाकंन तथा छापा- चित्र तकनीक का मिला-जुला प्रयोग भी किया है। ये किसी क्रिया के ही अमूर्त संस्करण हैं। इन चित्रों से संवेदन के पश्चात् निश्चित दिशा में ही कल्पना दौडती है। 

रेड्डी के छापा-चित्र उभरी हुई रेखाओं तथा अर्थपूर्ण रंगों द्वारा बने होते हैं। इनके विषय सार्वभौमिक है जैसे, मछली, लहर, इठलाती नदी, किसी स्थान का विहंग दृश्य, पुजारी आदि । 

रेड्डी ने इनके अतिरिक्त राजनीतिक व्यंग्य के भी चित्र बनाये हैं। इन चित्रों के सभी रूप स्वाभाविक प्रतीत होते हैं जिनमें सूक्ष्म विवरणों की प्रचुरता आश्चर्यकारक है। वे वस्तुओं के पीछे छिपे भावों की तह तक पहुँच कर ही चित्रांकन करते हैं। 

इस प्रकार वे किसी रूप अथवा घटना का बाहरी सादृश्य अंकित न करके उसे अपनी कलात्मक अन्तर्दृष्टि के अनुसार ही चित्रित करते हैं।

श्री रेड्डी ने चित्र-तल का अनेक प्रकार से पट्टियों में विभाजन किया है तथा अक्ष रेखा (दृश्य-चित्रों की क्षितिज रेखा की स्थानापन्न अन्य चित्रों की तल विभाजक मध् य रेखा) कभी ऊँची, कभी नीची, कभी बार्थी अथवा दार्यी ओर बनायी गयी है और इसी से संलग्न अनेक विवरणों सहित प्रत्येक चित्र का डिजाइन पृथक् विकसित किया गया है। 

रेड्डी की आकृतियों में काई रहस्यात्मकता अथवा उत्तेजना नहीं है। इनमें केवल सौन्दर्य है।

पेस्टोरल सिंफनी, घुटनों के बल चलती अपू, जर्मिनेशन, लहर, तीन आकृतियाँ तथा मसखरा आदि इनके कुछ प्रमुख अम्लांकन छापा-चित्र हैं।

भारत सरकार ने रेड्डी को ‘पद्म भूषण’ की उपाधि से सम्मानित किया है। 1977 से वे न्यूयार्क विश्वविद्यालय में प्रोफेसर तथा ग्राफिक्स के डाइरेक्टर के पद पर कार्य कर रहे हैं। 

उन्होंने विश्व में अनेक देशों में प्रदर्शनियाँ की हैं। संसार के 33 प्रमुख ग्राफिक चित्रकारों में उनकी गणना की गयी है। वे यदा-कदा भारत आते रहते हैं।

लक्ष्मण पै (1926 ) 

लक्ष्मण पै का जन्म गोवा के एक सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। गोवा की हरित भूमि और आनन्द प्रिय लोगों का उनके आरम्भिक जीवन पर बहुत प्रभाव पड़ा और वही उनकी प्रेरणा-स्थली रही है। 

उसे वे बार-बार अनेक रूपों में और अनेक विधियों से चित्रित करते रहे हैं। आरम्भ में अपने मामा के फोटो स्टूडियो में लेब बॉय थे। तभी कला में उनकी रुचि जाग्रत हुई। 

1943 से 1947 के मध्य सर जे० जे० स्कूल आफ आर्ट बम्बई में उन्होंने शिक्षा प्राप्त की। उसके पश्चात् उन्होंने भारतीय लघु-चित्रण की शैली में कार्य आरम्भ किया और उसके आधार पर उन्होंने सरल तकनीक तथा वाश शैली में गोवा के सीधे-सादे धार्मिक ग्रामीण जीवन को चित्रित किया। 

उन पर उस समय उनके बम्बई के शिक्षकों अहिवासी, शंकर पलसीकर तथा भोंसले का प्रभाव था। 

मोहन सामन्त तथा वासुदेव गायतोंडे उनके समकालीन थे लघु चित्रों से पे ने संवेदनशील रेखा आलंकारिक तत्व लिये संयोजन, पार्श्वगत स्पष्ट आकृतियों जो वक्र रेखाओं द्वारा गढ़ी गयी है. वृक्षों तथा वस्त्रों के अलंकृत विवरण- ये सभी तत्व पै की इस समय की कृतियों में देखे जा सकते हैं। इस समय के उनके सर्वोत्तम चित्र 1950 की प्रदर्शनी में दिखाये गये।

कुछ दिन सर जे०जे० स्कूल में अध्यापन करने के उपरान्त पे सब कुछ छोड़ कर यूरोप चले गये। 1951 से 1962 तक वे लन्दन तथा यूरोप के अनेक बड़े नगरों में घूमे, पर उन पर विदेशी प्रभाव बहुत कम, लगभग नहीं के बराबर ही पड़ा। 

चित्रों का संयोजन तो कुछ आधुनिक हुआ पर रेखा, सपाट रंग तथा अलंकरण प्रवृत्ति बनी रही। 

कुछ ज्यामितीकरण की प्रवृत्ति भी आ गयी परन्तु विषय गोवा से सम्बन्धित रहे। कुछ टैक्सचर सम्बन्धी प्रयोग भी किये वे प्रायः जल-रंगों में ही कार्य करते थे किन्तु पेरिस में उन्होंने तेल माध्यम को गम्भीरता से लिया और इस नये माध्यम में दृश्य चित्र, अपनी माँ तथा जवाहरलाल नेहरू के व्यक्ति चित्र बनाये। 

इन चित्रों में रंगों के विविधि बलों का सुन्दर प्रयोग हुआ है। इनमें उन्होंने प्रकाश तथा अँधेरे भागों के रंगों को धब्बों के रूप में प्रथम बार लगाया जो आगे चलकर उनकी शैली की विशेषता बन गयी। 

1977 में पै की नियुक्ति गोवा के स्कूल आफ आर्ट में प्रिंसिपल के पद पर हो गयी।

पेने अनेक विषयों से सम्बन्धित चित्र-श्रृंखलाओं की रचना की है। इन्हें ये प्रोजेक्ट कहते हैं। 1955-57 में गीत गोविन्द, 1958 में रामायण तथा महात्मा गान्धी, 1959- 61 में बुद्ध जीवन, 1960 में ऋतु संहार, 1964 में पर्वतीय दृश्य अंकित किये। 

बुद्ध जीवन के चित्र अम्लांकन में हैं तथा गीत गोविन्द तैल माध्यम में है।

पैने अपने आरम्भिक चित्रों में आकृतियों की वेश-भूषा का बहुत ध्यान रखा था पर बाद में यह कम होता चला गया। अलंकरण भी कम हो गये। 

नारी की आकृति के विविध अंगों को ये फलों, फूलों आदि के रूपों के द्वारा अंकित करने लगे, किन्तु इनमें परम्परागत प्रतीकता नहीं अपनायी गयी है। 

1964 में उन्होंने जिन पर्वतीय दृश्यों का अंकन किया उनमें मानवाकृतियाँ नहीं हैं, केवल प्राकृतिक आकृतियों की बनावट को महत्व दिया गया है। 

1964 के आस-पास वे बहुत अलंकारवादी और व्यंजना में विशेष शैली के प्रयोगकर्ता हो गये थे। 

ऐसा लगने लगा कि वे टेक्सटाइल डिजाइनों के स्तर तक उतर आये हैं। 1967 से पै संगीत के रागों पर चित्र बनाने लगे जिनमें रागों से उत्पन्न मनः स्थितियों का अमूर्त शैली में चित्रण किया गया है। 

दो वर्ष बाद उन्होंने नृत्यों के चित्र बनाये जिनमें मुद्रा, अंगों तथा शरीर की बदलती हुई गतिपूर्ण स्थितियों को पकड़ने का प्रयत्न किया गया। इसमें उन्होंने रेखा के स्थान पर रंगों तथा तूलिका का प्रयोग किया। 

एक दशक के उपरान्त उन्होंने तेल माध्यम में रामायण का पुनः चित्रांकन किया, किन्तु इन चित्रों में पहले जैसा आकर्षण नहीं है; यद्यपि रंगों का शक्तिशाली एवं ओजपूर्ण प्रयोग तथा तीव्र विकृति भी है। 

1981-82 में प ने राजस्थान की संस्कृति, रहन-सहन तथा सामाजिक परिवेश का अंकन किया। इन चित्रों में राजस्थान के रंगीन वस्त्रों के कारण तेज रंगों का प्रयोग हुआ है और द्विआयामी प्रभाव सुरक्षित रखा गया है।

पै अपनी रंग योजनाओं में रोमाण्टिक हैं किन्तु शास्त्रीयता के प्रति उनका कोई आग्रह नहीं है तथा रंगों के अमूर्त प्रभाव पर बल है। उनके चित्रों में आनन्दित करने वाली सुन्दरता है साथही लय, गति, आन्तरिक तनाव और अचेतन की विकृतियाँ भी हैं। 

उन्होंने वान गाग से लेकर पाल क्ली तक के शिल्प को सफलतापूर्वक आत्मसात् किया है। वे रेखाओं द्वारा विभिन्न आयामों का प्रभाव देने में समर्थ हैं। 

रागों से सम्बन्धित उनके चित्र विशेष चर्चा के विषय रहे हैं। इनका प्रस्तुतीकरण पूरी तरह अमूर्त है और गीले तैल रंगों के धब्बों पर कंघी से खुरच कर बनाये गये कम्पन के विभिन्न प्रभाव उत्पन्न किए गए हैं। 

कुछ ध्वनि-शास्त्रियों ने ध्वनियों का सम्बन्ध रंगों से बताया है। पै की कृतियों में उन्हीं का विकास देखा जा सकता है।

पै के चित्रों की प्रदर्शनियों, न्यूयार्क, लन्दन, म्यूनिख, दिल्ली, बम्बई, कलकत्ता तथा पेरिस आदि अनेक नगरों में आयोजित हो चुकी है और उन्हें अनेक पुरस्कार मिले हैं। 

1961 में उन्हें ललित कला अकादमी नई दिल्ली के राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

लक्ष्मण पै ने कला का आरम्भ उस समय किया था जब भारत में यूरोपीय प्रभाव जोरों पर था । 

पै की कला विदेशी प्रभाव से बहुत कुछ मुक्त रहकर भारतीय ढंग से विकसित हुई किन्तु यह विकास महत्वपूर्ण होते हुए भी वे आधुनिक भारतीय चित्रकला के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कलाकार नहीं बन पाये। 

उनके विकास की कोई एक निश्चित दिशा भी नहीं रही है। वे बदलती हुई मान्यताओं और तकनीकों के युग से गुजरे हैं। उन्होंने बिना किसी पूर्वाग्रह के जिसे उपयोगी समझा है उसे ग्रहण किया है।

लक्ष्मण पै के “मानव आकृतियाँ (तेल, 1972) शीर्षक चित्र में पुरुष तथा नारी ” की मुखाकृतियाँ, हाथ एवं पैर लोक कलाकी पद्धति पर संयोजित किये गये हैं जिनके साथ वास्तु एवं प्रकृति के अभिप्राय भी बीच-बीच में अंकित हैं जैसे नीचे पंचभुजाकृति तथा उसके ऊपर नुकीले महराब युक्त आला तथा नारी शिर के ऊपर मस्तक के मध्य त्रिपुष्प का अलंकरण आदि चित्र का संयोजन किसी अनुष्ठान अथवा तांत्रिक क्रिया के समान प्रतीत होता है। 

विकास के अन्तिम चरण का प्रतीक उनका ‘बिम्ब’ शीर्षक चित्र (एक्राइलिक, 1982) एलीफेण्टा की सुप्रसिद्ध त्रिमूर्ति के संयोजनके समान नारी के तीन मुखों का संयोजन है जिसमें दोनों ओर के चेहरों के एक एक नेत्र अपभ्रंश शैली की भाँति मुखाकृति के बाहर अंकित हैं। 

मछली जैसे नेत्र शास्त्रीय परम्परा का प्रभाव ध्वनित करते हैं। अलंकृत ग्रीवा, कर्णाभूषण आदि आकृति को सौन्दर्य प्रदान करने के साथ-साथ ऊँचे क्षितिज पर अंकित वृक्षावली को संतुलित करते हैं। 

केश राशि को दोनों ओर फैलाकर टीलेदार हरित भूमि का अतियथार्थवादी भ्रमात्मक प्रभाव उत्पन्न किया गया है तथा नारी आकृति का सम्पूर्ण विन्यास प्रकृति के एक अंग के रूप में ही किया गया है। 

साथ ही नारी की कल्पना प्रकृति की सृष्टि के पीछे छिपी उत्पादक शक्ति की देवी के रूप में की गयी प्रतीत होती है। इस शैली में उन्होंने अनेक चित्र अंकित किये हैं।

मोहन सामन्त (1926) 

मोहन सामन्त का जन्म 1926 में बम्बई में हुआ था। उनके घर वाले उन्हें इन्जीनियर बनाना चाहते थे। आरम्भ में उन्होंने वर्मा शैल आदि कम्पनियों में नौकरी की पर अन्त में वे चित्रकार ही बने ।

1951 में अपनी कला की शिक्षा सर जे०जे० स्कूल आफ आर्ट बम्बई में पूर्ण करके कुछ दिन चित्रकारी की। 1957 में इटली सरकार की एक छात्रवृत्ति पर दे रोम गये। 

वहाँ से रॉकफेलर फैलोशिप पर अमेरिका गये और 1959 से 1965 तक वहीं रहे। कुछ समय के लिये भारत लौटने के उपरान्त 1968 में वे अमेरिका में ही बस गये। ये न्यूयार्क में रहते हैं। 

कभी-कभी भारत आते रहते हैं पर भारतीय कला जगत से उनका विशेष सम्पर्क नहीं रहा है।

आरम्भ में वे जैन लघु चित्रों से प्रभावित हुए थे उन्होंने उनकी विशेषताओं को आधुनिक कला की विशेषताओं के साथ समन्वित किया। 

इससे उनकी कला में निखार आया और वे अन्तर्राष्ट्रीय प्रदर्शनियों में भाग लेने लगे। उन्होंने वस्तुओं की आदि प्रकृति को समझ कर चित्रण किया । 

सामन्त के अनुसार हमारे मन में प्रत्येक वस्तु अथवा पदार्थ के तीन संस्कार बनते हैं एक, उसका विचार, प्रत्यय अथवा आइडिया; दो, उसकी ध्वनि; और तीन, उसका भौतिक रूप । 

सामन्त इन तीनों के समन्वय को ही विम्बों और चाक्षुष माध्यम में प्रस्तुत करते हैं। में

चित्रकला के क्षेत्र में आगे बढ़ने की प्रेरणा सामन्त को बसौली तथा जैन लघु चित्रों से मिली। उनकी सरल आकृतियों, अपरिष्कृत शैली तथा रंगों और वातावरण की उत्फुल्लता से उन्हें बहुत प्रेरणा मिली। 

कुछ समय तक अभ्यास करने पर उन्होंने अपने व्यक्तित्व के अनुरूप शैली का विकास कर लिया। 

यूरोप के देशों में घूमते तथा प्रदर्शनियाँ, कला- बीथियाँ और संग्रहालय देखते वे लास्को की प्रागैतिहासिक गुफाएँ देखने भी गये। 

सभी जगहों पर भ्रमण करने और अनेक प्रकार की शैलियाँ देखने के उपरान्त उन्होंने अनुभव किया कि समकालीन कला जैसी वास्तव में कोई चीज नहीं है क्योंकि जो प्रवृत्ति आज हम समकालीन कला में देखते हैं वह पहले भी कहीं न कहीं रही है। 

इसके उपरान्त भारत लौटकर उन्होंने विस्तृत भ्रमण किया और प्राचीन मूर्ति-शिल्प का अध्ययन किया। वे अपनी अभिव्यक्ति की आवश्यकता के अनुसार शैली में परिवर्तन करते रहे। 

यद्यपि भारतवर्ष की पुरानी कला-परम्पराओं पर उन्हें गर्व है तथापि वे अनुभव करते हैं कि मात्र शिल्पी (कारीगर) को ही परम्परा की आवश्यकता होती है, सृजनशील कलाकार को नहीं इसके साथ ही वे यह भी मानते हैं कि नया केवल आधुनिक ही नहीं होता और ऊपर से ओढ़ी गयी आधुनिकता से मोहन सामन्त को घृणा है।

उन्होंने आरम्भ में जल रंगों में कार्य किया था। उसके पश्चात् तैल माध्यम में काम करने लगे। 

बड़े आकार के केनवास पर संगमरमर के चूर्ण तथा फेवीकोल से उभरे हुए धरातलों की रचना आरम्भ की और परियों के देश की कहानी के समान विषयों का चित्रण किया। 

इन चित्रों में तैल रंगों का पेस्टल जैसा रूप प्रतीत होता है। इसके उपरान्त उन्होंने शैली में पुनः परिवर्तन किया। 

वे उभरी हुई रेखाओं द्वारा अत्यन्त व्यंजनापूर्ण विकृत आकृतियाँ बनाने लगे जिनके अंग अजीब ढंग से मुड़े हुए हैं. शरीर की पसलियाँ स्पष्ट दिखाई दे रही हैं और एक अवसाद पूर्ण वातावरण सम्पूर्ण कृति पर छाया रहता है। 

मोहन सामन्त की आकृतियाँ आदिम, लोक तथा लघु चित्र शैली की आकृतियों से प्रभावित रही हैं। उनके आरम्भिक रंग भी मिनिएचर के ढंग के थे। 

आकृतियों के रेखांकन के उपरान्त उन्होंने उनमें वाश द्वारा रंग भरा था, साथ ही आकृतियों को विषय के अनुसार छोटा-बड़ा बनाया था यह प्रवृत्ति आदिम कला की है।

सतीश गुजराल (1925) 

सतीश गुजराल का जन्म पंजाब में झेलम नामक स्थान पर 1925 ई० में हुआ था। केवल दस वर्ष की आयु में ही उनकी श्रवण शक्ति समाप्त हो गयी थी। 

आरम्भिक शिक्षा स्थानीय संस्थाओं में प्राप्त करते समय ही आपकी कलात्मक रूचि बढ़ती चली गयी। अतः कला की शिक्षा के लिये गुजराल ने मेयो स्कूल आफ आर्ट लाहौर में 5 वर्ष (1939-44) तक अध्ययन किया। 

उसके पश्चात् तीन वर्ष सर जे० जे० स्कूल आफ आर्ट बम्बई में अध्ययन किया। भारत विभाजन के बाद 1947 में ही वे दिल्ली आ गये और कुछ समय पश्चात् शिमला आर्ट स्कूल में अध्यापक हो गये। 

भारत विभाजन से उन्हें अत्यधिक मानसिक आघात पहुँचा था जिससे उनकी कला में एक भयंकर विकृति जन्म लेने लगी थी। 

उन्हीं दिनों सन् 1950 में दिल्ली में मेक्सिकन दूतावास खुला उसमें प्रसिद्ध मेक्सिकन कवि आक्टेवियो पाज सांस्कृतिक परामर्शदाता बनकर आये जो विद्यार्थी विनिमय कार्यक्रम के अन्तर्गत मेक्सिको भेजने के लिये किसी उपयुक्त भारतीय युवा चित्रकार की तलाश में थे। 

पाज को सतीश में मेक्सिन कला की भावना के अनुरूप प्रवृति का आभास हुआ अतः 1952 में स्कालरशिप पर वे दो वर्ष के लिये कलाके विशेष अध्ययन हेतु मेक्सिको भेज दिये गये। 

वहाँ उनकी कला शैली मेक्सिकन चित्रकारों डेविड सेक्वीरोस (David Sequieros), डिएगो रिवेरा (Diego Rivera) तथा ओरोज्को (Orozco) से प्रभावित हुई। 

लौटते समय वे न्यूयार्क, लन्दन, पेरिस आदि में रूके और अपने चित्रों की प्रदर्शनियाँ करते हुए 1959 में भारत लौटे। तब से वे दिल्ली में ही हैं। 

उन्होंने पेण्टिंग, सिरेमिक, कोलाज, शीशा, लकड़ी, धातु तथा मिट्टी आदि में खूब काम किया है। म्यूरल (भित्ति चित्रण) के क्षेत्र में वे एक विशेष नाम बन गये हैं। उन्होंने देश-विदेश में अनेक प्रदर्शनियों की हैं। 

अकेले अमरीका में ही उनकी दसियों प्रदर्शनियों लग चुकी हैं। वे राष्ट्रपति के स्वर्ण पदक के भी विजेता है। आपकी कलाकृतियाँ विश्व के अनेक प्रमुख संग्रहों में देखी जा सकती है। 

आपने अनेक वास्तु-कृतियों की भी रचना की है। संसद भवन में लाला लाजपतराय का चित्र तथा अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में मौलाना अबुल कलाम आजाद तथा मिर्जा गालिब के चित्र आपकी ही रचनाएँ हैं। 

वास्तुशिल्प के क्षेत्र में बेल्जियन सरकार द्वारा उन्हें आर्डर आफ द क्राउन की उपाधि प्रदान की गयी है।

अपने आरम्भिक कला-जीवन में 1950-60 के मध्य गुजराल ने अपने चित्रों में मानवीय पीड़ा को चित्रित किया था जिस पर मेक्सिकन कला का पर्याप्त प्रभाव पड़ा था।

उन्होंने कहा था ‘दुःख शाश्वत है। मेरे चित्रों में बने भवन संकेत करते हैं कि दुनिया में क्या होता रहता है। मनुष्य दुःखों से भागना, इन भवनों से कूदना, चाहते हैं, पर उन्हें किसी दीवार (बाधा) का सामना करना पड़ता है।” 

उस समय गुजराल के प्रतीक थे कांटे, जंजीर, झोंपड़ी, सर्प, भग्न भवन, टूटे स्तम्भ और बुझे हुए ज्वालामुखी । 

उसके बाद आये वर्तमान जीवन के यथार्थ प्रतीक पुल, कोई रहस्य प्रकट करता क्षितिज, तारकोल के समान गाढ़ा पानी, अंधेरी दीवारों वाले भवन, प्रकाशयुक्त दीर्घाओं में से लेटकर देखती हुई आकृतियाँ, खम्भों तथा रस्सियों से रोक लगे स्थान जहाँ स्वतंत्र व्यक्ति कसरत कर रहे हैं, पंजे के समान मुड़े हुए सिरों वाले प्रकाश के खम्भे मानों किसी भी समय आग के समान धधक उठेंगे, और ऐसे स्थानों की ओर जाते या उनसे भाग कर आते स्त्री-पुरुष, छिपा हुआ प्रकाश खोत, गम्भीर किन्तु चमकदार रंगों से उत्पन्न तनाव और टेढ़े-मेड़े पैटर्न । 

इसी के साथ गुजराल ने धार्मिक चित्र भी बनाये और नेहरू तथा इन्दिरागांधी के व्यक्ति चित्र भी बनाये जिनमें व्यक्तिगत गुणों का बड़ा सजीव अंकन हुआ है।

प्रतिरूपात्मक कला से हटकर गुजराल ने 1960 के आस-पास कोलाज तथा म्यूरल बनाना आरम्भ किया। उन्होंने भित्ति चित्रों को जो नया रूप दिया है उसमें वे ऊँचे-नीचे तलों वाले लकड़ी के पटरों पर टेराकोटा आकृतियाँ बनाते हैं और फिर उन्हें रंग देते हैं। 

इनमें उन्होंने विभिन्न प्रकार के टाइलों, दर्पणों तथा विविध टेक्सचरों का भी भरपूर में उपयोग किया है। इनमें आदिम तथा लोक-शैलियों में प्रयुक्त होने वाले अनेक रूपों का भी प्रयोग देखा जा सकता है। 

यहीं से गुजराल तान्त्रिक जगत् की ओर मुड़े। उन्होंने प्राचीन यंत्रों (Diagrams) को आधार मानकर कलाकृतियाँ बनाना आरम्भ किया। ये तान्त्रिक कृतियाँ धातु, काष्ठ तथा प्लास्टिक आदि के द्वारा उसी प्रकार से निर्मित हैं जैसे हम घर में सजावटी फर्जीचर या शो-पीस रखते हैं। 

इससे पूर्व गुजराल ने पोपकला से प्रेरित होकर नेत्रीय भ्रम उत्पन्न करने वाली कुछ कृतियां भी बना थी पर उनमें भारतीयता नहीं थी अतः वे प्रसिद्ध नहीं हुई। 

किन्तु उनके बाद गुजराल ने जो तन्त्र से प्रेरित कलाकृतियाँ बनार्थी उनसे अमरीका में हलचल मच गयी। 

इनमें भीतर ही प्रकाश के स्रोत छिपे रहते हैं जो कृति के आवश्यक भागों को प्रकाशित करते रहते हैं। इन कृतियों के रंग, रूप तथा धरातलों के प्रभावों को देखकर दर्शक हतप्रभ सा हो जाता है। 

किन्तु इन कृतियों की व्याख्या सृजन तथा जीवनी-शक्ति के आधार पर की गयी है, धार्मिक अथवा कामाचार-परक नहीं। आज मशीन ने मानव जीवन में महत्वपूर्ण स्थाल ले लिया है और गुजराल के विचार से तन्त्र में उसी का सूक्ष्म विचार है। 

जिस प्रकार मशीन किसी वस्तु का निर्माण कर उसे बाहर निकालती है, उसी प्रकार तन्त्र में चक्र के द्वारा आन्तरिक ऊर्जा को उत्पन्न किया जाता है और फिर उससे मुक्ति प्राप्त की जाती है। 

इन कृतियों की रचना में उन्होंने बीसवीं शती की औद्योगिक सामग्री एलम्यूनियम, ताँबा, टिन, प्लेट, पाइप, प्लास्टिक, दर्पण तथा काँच आदि का उपयोग किया है। 

इनसे बनने वाले बिम्ब भी हमारे युग के अनुरूप हैं। आश्चर्य नहीं कि आगे चलकर वे इन कृतियों में ध्वनि का भी प्रयोग करने में सफल हों।

अपनी पिछले युग की आकृति मूलक कला के विषय में गुजराल ने कहा है कि में “मैं अपने चित्रों को असन्तोष और अभिशाप से आवेशित करता हूँ जिससे कि दर्शक स्वयं को अपराधी अनुभव करें। 

मैं सबमें सहृदयतापूर्ण सक्रियता चाहता हूँ मैं स्वयं भी सहृदयता से द्रवित हूँ। मनुष्य में मेरी आस्था है।” गुजराल के विचार से कला मन में हलचल उत्पन्न करती है, दुःख या प्रसन्नता नहीं। 

यह मनुष्य को ऊपर उठाती है, कोई उपदेश नहीं देती। यह दर्शक की आत्मा को सत्य के दर्शन के लिए स्वतन्त्र करती है। किन्तु गुजराल की कला में हिंसा और आतंक का भी अनुभव होता है। 

उनकी आकृतियाँ कुछ प्रतीक और कुछ अतियथार्थ हैं। देश के विभाजन के आघात से उन्होंने कला में जीवन के अन्धकारपूर्ण पक्षों को ही प्रस्तुत किया है।

जिस समय भारत के अन्य कलाकार फ्रांस तथा जर्मनी की कला से प्रभावित हो रहे थे, गुजराल एक भिन्न ढंग से कार्य कर रहे थे। 

उनके माध्यम तथा उनकी कलाकृतियों के संयोजन अन्य सभी कलाकारों से भिन्न हैं: इसी से उनकी कला लोगों को अजीब लगती है। 

उनकी कला के पात्र किसी महान आपत्ति से प्रस्त, किसी गुप्त साधना या कार्य में लगे हुए जैसे किसी मूक रहस्य से प्रेरित, अँधेरे में से प्रकाश की ओर आते अथवा प्रकाश से अँधेरे की ओर जाते, किसी स्वप्न को साकार करने की आशा में झुके-झुके से अथवा किसी अज्ञात पीड़ा से ग्रस्त आशा और निराशा के बीच झूलते हुए से दिखायी देते हैं। 

चित्रों का वातावरण निर्जन, अन्धकारपूर्ण, रहस्यमय, भयावह तथा किसी दुर्दान्त परिणाम को अपने गर्भ में छिपाये जैसा प्रतीत होता है। किन्तु आज की उनकी कला इस मनःस्थिति से निकल चुकी है। 

वे अमूर्तवाद के विरोधी नहीं हैं किन्तु आज वह अनुभूति से बिल्कुल कट गयी है और हम रेखाओं तथा रंगों की संगति खोजने का ही प्रयत्न करते रह जाते हैं। इसी से वे अमूर्त कला को अपने व्यक्तित्व के अनुरूप नहीं मानते ।

सतीश गुजरात की नई कृतियों भारत में उभरते हुए एक नये प्रतिमावाद की सूचक हैं। उन्होंने अनेक आकृतियों को नये ढंग से प्रस्तुत किया है। 

विशाल भित्ति चित्रों को स्थायित्व देने की उनकी बहुत दिन से इच्छा थी। उन्होंने एक रसायन शास्त्री के साथ मिलकर एक्राइलिक रंगों की खोज की और उन पर परीक्षण आरम्भ कर दिये। 

इसके परिणामस्वरूप उन्होंने जिन नित्ति अलंकरणों पर कार्य किया उनकी केवल भूरि-भूरि प्रशंसा ही नहीं हुई बल्कि इण्डियन इन्स्टीट्यूट ऑफ आर्कीटेक्चर ने उन्हें फैलोशिप से सम्मानित किया। 

इसके पश्चात् उन्होंने जली हुई काष्ठ का काम आरम्भ किया । इसके प्रयोग और परीक्षण भी लगभग 1978 से 1990 तक चलते रहे। 

वे काष्ठ की पट्टियों को जोड़कर धरातल तैयार करते हैं उसके सम्पूर्ण धरातल की ऊपरी सतह को जला देते हैं इसके पश्चात् उसे आवश्यकतानुसार कहीं-कहीं खुरच कर गड्ढे कर देते हैं। फिर सभी स्थानों पर सुरक्षात्मक रासायनिक घोल लगा देते हैं और ऊपर से आकृतियों के अनुसार विभिन्न रंगों से पेण्ट कर देते हैं। 

गणेश की आकृति उनके लिए बहुत अनुकूल है क्योंकि उसे जितने अंशों में पशु, मनुष्य या देवता बनाना चाहें, बना सकते हैं अतः इसमें रूप-संयोजन एवं कल्पनाशीलता की बहुत स्वतंत्रता है। 

इनमें धातु तथा चमड़े का भी प्रयोग है और सुवर्ण का भी काम है जिससे इनमें रंगों का पर्याप्त वैभव भी है। डिजाइन की नवीनता होते हुए भी विषय की प्राचीनता गुजराल की आधुनिकता पर एक प्रश्नचिन्ह के समान है ।

सतीश गुजराल ने अपनी प्रथम एकल प्रदर्शनी सन् 1952 में आयोजित की थी जिसमें दो चित्र सर्वप्रथम श्री जवाहरलाल नेहरू ने खरीदे थे वे सतीश के बड़े भाई इन्द्रकुमार गुजराल के साथ प्रदर्शनी देखने आये थे। 

तब से उनकी कला में अत्यधिक विविधता आयी है: पहले तैल चित्र केनवास, फिर कोलाज, म्यूरल, टेरोकोटा टाइल और जली हुई काष्ठ के म्यूरल आदि उन्होंने वास्तु कला के भी अनेक सुन्दर नमूने बनाये हैं जैसे बेल्जियम दूतावास, गोवा विश्वविद्यालय, भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र मारीशस तथा इस्लामिक साँस्कृतिक केन्द्र नई दिल्ली आदि के भवन । 

उनकी विविधतापूर्ण मौलिक कृतियाँ आधुनिक भारतीय कला को सबसे बड़ा योगदान है।

गुलाम रसूल सन्तोष (1929-97)

गुलाम रसूल सन्तोष का जन्म श्रीनगर (कश्मीर) में 19 जून 1929 ई० को हुआ था। इनके पिता पुलिस विभाग में थे। इन्हें बचपन से ही चित्रकला में रूचि थी और ये स्थानीय प्रसिद्ध व्यक्तियों के चित्रों की नकल किया करते थे दस वर्ष की आयु में इन्होंने अपना पहला प्राकृतिक दृश्य-चित्र बनाया था जो एक कला शिक्षक के चित्र की अनुकृति था। 

पन्द्रह वर्ष की आयु में मैट्रिक के उपरान्त गुलाम रसूल ने पढ़ाई छोड़ दी और साइनबोर्ड तथा दीवारें चित्रित करने लगे। इसके लगभग दो-ढाई वर्ष बाद वे 1947 में बम्बई के चित्रकार सैयद हैदर रजा के सम्पर्क में आये जो उन दिनों कश्मीर में थे। 

जिस प्रकार बम्बई में 1948 में प्रगतिशील कलाकारों का ग्रुप बना था उसी प्रकार रजा तथा हरि अम्बादास गाडे ने 1950 में कश्मीरी कलाकारों का प्रगतिशील ग्रुप बनाया। 

1953 में गुलाम रसूल का एक हिन्दू लड़की से प्रेम हो गया किन्तु उसका अन्यत्र विवाह हो जाने से इन्हें बहुत निराशा हुई इस घटना का इन्हें इतना गहरा आघात लगा कि वे दृश्य-चित्रण छोड़ कर आकृति-चित्रण करने लगे। 

1954 ई० में इन्हें भारत सरकार की एक छात्रवृत्ति मिली और ये एन० एस० बेन्द्रे के निर्देशन में बड़ौदा में चित्रकला की शिक्षा प्राप्त करने चले गये। वहाँ इन्होंने पहले घनवादी प्रयोग किये तथा तैल माध्यम का गम्भीर अध्ययन किया। 

साथ ही जल-रंगों में भी चित्रण करते रहे। 1957, 64 तथा 73 में इन्हें ललित कला अकादमी का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला तथा 1975 में “पद्मश्री” से विभूषित किया गया। 

1960 के आस-पास सन्तोष ने जो प्रदर्शनी की उसमें खड़ी अथवा लेटी हुई अनावृत्ताओं के तथा लगभग अमूर्त संयोजनों में ग्रामीण दृश्यों एवं जीवन के चित्र थे जिनमें घनवाद तथा अभिव्यंजनावाद का समन्वय तथा अर्द्ध-अमूर्तता की ओर कुछ झुकाव है। 

आकृतियों में विकृति होते हुए भी उनके पैटर्न समझ में आ जाते हैं। चित्रों में रंगों की रंगत कम करके लगाई गयी है जिसका निश्चित उद्देश्य भी रहा है, रेखांकन अत्यन्त शुद्ध है। कुछ प्रतीकता होते हुए भी समस्त कृतियाँसम्प्रेषणीय हैं। 

रंग-संगतियाँ संवेदनपूर्ण हैं। लयात्मक गति है। घनवाद के उपरान्त ये प्रवाहपूर्ण रेखाओं में चित्रांकन करने लगे। धीरे-धीरे इनकी कला में से रूप अदृष्य होने लगे और सम्पूर्ण चित्र का दृश्य महत्वपूर्ण हो गया। 

धीरे-धीरे इन्होंने आकृति तथा पृष्ठ- भूमि के दृश्य को छोड़ दिया और उसके केवल तात्विक साररूप-चिन्हों को ही रहने दिया। इस प्रकार ये अमूर्त शैली की ओर प्रवृत्त हुए और उसी में प्रयोग करने लगे तथा इसी के सहारे मनकी गहराइयों में प्रवेश करने का प्रयत्न किया। 

ये रेखा, रंग और अमूर्त रूप के द्वारा किसी मनः स्थिति (मूड) को प्रत्यक्ष करने का प्रयत्न करते हैं। चित्र का तल सपाट होते हुए भी एक प्रकार की तरलता का अनुभव होता है। 

केनवास पर एक विस्तृत क्षेत्र की अनुभूति होती है जिसमें से अमूर्त जैसे कुछ रूप प्रकट होते हैं। 

ये रूप प्रकाश अन्धकार की क्रीड़ा तथा रंगों के द्वारा सम्मोहक प्रभाव उत्पन्न करते हैं और चित्र में एक गम्भीर रहस्य की अनुभूति होती है जिसका विश्लेषण करना कठिन है मानों मन के किसी ज्वालामुखी में से वृत्त, त्रिभुज, आयत, अर्द्धवृत्त और अन्य अनेक ज्यामितीय रूप निकल कर बाहर आ रहे हों और किसी अज्ञात स्रोत से आने वाले प्रकाश में चमक रहे हों। 

चित्र देखने से मनमें एक विचित्र अनजाना-सा आवेश उभरता है और फिर लीन हो जाता है मन की गहराइयों में इस कला का कोई विचार, कोई रूप बाहरी दुनियाँ के नित्य प्रति के अनुभवों से कहीं भी सम्बन्धित नहीं है। 

फिर भी इन चित्रों में गुलाम रसूल के जन्म स्थान कश्मीर का प्रभाव हिमालय के नीले, भूरे बादामी तथा श्वेत रंगों में देखा जा सकता है। 

पर्वतों, ऊँचे वृक्षों और विस्तृत आकाश आदि की अनुभूति इनके मन में निरन्तर बनी रही है और यह इनकी कला को किसी-न-किसी रूप में प्रभावित करती रही है। 

हल्के नीले भूरे और श्वेत रंगों के सीमित प्रयोग के साथ ही उन्होंने पहले टेक्सचर का कोई खास ध्यान नहीं रखा था, पर बाद में इनके चित्रों में यह बहुत महत्वपूर्ण हो गया है। 

ये चित्रों को अधिक-से-अधिक व्यंजक बनाने का प्रयत्न करने और तेल- रंगों में पिघला हुआ मोम मिलाकर लगाने लगे इससे चित्रों में बहुत चमक आ गयी है। चित्र में चारों ओर का विस्तार अन्धकारपूर्ण अन्तरिक्ष का आभास देता है। 

उसी में गोलाई अथवा कोणीयता लिए अनेक आकार प्रकाशित होकर प्रकट होते हैं। गुलाम रसूल सन्तोष को तान्त्रिक कलाकारों में गिना जाता है क्योंकि इनके चित्रों में अंकित रूप प्राचीन तान्त्रिक ज्यामितीय रूपों और संयोजनों से मिलते-जुलते हैं। 

ये चित्रों में कुछ प्रकट तथा कुछ रहस्य में लीन होते-से आभासित होते हैं। 10 मार्च 1997 की 68 वर्ष की आयु में इनका दिल्ली में निधन हो गया।

शान्ति दवे (1931 ) 

शान्ति दवे का जन्म अहमदाबाद में 1931 में हुआ था। वे बड़ौदा विश्वविद्यालय के 1956 के प्रथम बैच के छात्र हैं। उनका आरम्भिक कार्य लघु चित्रों पर आधारित रहा है जिसमें घनवादी विकृति का भी कुछ अंश है। 

सम्पूर्ण रचनाएं आलंकारिक अधिक रही हैं। सम्भवतः बचपन के ग्रामीण परिवेश के प्रभाव के कारण उन्होंने अपने चित्रों में वैसा ही वातावरण अंकित करने का प्रयत्न किया है। किन्तु इनमें रोमाण्टिक भावना नहीं दिखाई देती। 

ग्रामीण विषयों जैसे पनघट, बैलगाड़ी, मछुए, किसान आदि की आकृतियों तथा झोंपड़ी, खेत आदि की पृष्ठभूमि, अलंकृत रंग-बिरंगे परिधान आदि सपाट रंगों में गहरी सीमा रेखा के साथ अत्यन्त संवेदनशील रूप में अंकित किये गये हैं। 

लम्बी आकृतियों और धनवादी तकनीक से प्रभावित विकृतियों में एक सहज सौन्दर्य उभर कर आया है जिसमें कृत्रिमता का आभास नहीं होता। चित्रों का प्रभाव मणिकुट्टिम जैसा लगता है।

1959 से दवे ने अपने चित्रों में विभिन्न सामग्री एवं तकनीक का प्रयोग आरम्भ किया पारदर्शी रंगतों, गाढ़े लेप के समान लगाये गये रंगों, चित्रित धरातल को कहीं कहीं किसी नुकीली वस्तु से खुरचने के अतिरिक्त उन्होंने बालू तथा घिसे हुए चिपटे पत्थरों के टुकड़ों (Pebbles) को भी धरातलीय प्रभावों की भिन्नता तथा प्रचुरता की दृष्टि से लगाना आरम्भ कर दिया। 

पर जब उन्होंने यह अनुभव किया कि केनवास पर केवल रंगों से ही कार्य करना चाहिए, उन्होंने इस बाहरी सामग्री का प्रयोग छोड़ दिया। गाड़े रंग के लिये उन्होंने मोम का प्रयोग आरम्भ कर दिया। इससे वे चित्र को उभरी हुई नक्काशी की भाँति बनाने में सफल हुए ।

दवे ने चित्रों में से कहानी को बिल्कुल निकाल दिया और चित्र के डिजाइन को केही प्रमुख महत्व दिया। 

अतः चित्र के धरातल का अत्यन्त कुशलतापूर्ण विभाजन और आकृतियों के अनुपातों तथा रंगों का संयोजन आदि बहुत विचारपूर्वक किया जाने लगा। 

चित्र के धरातल पर रंग कहीं-कहीं एक इंच तक उभरा हुआ या आगे को निकला हुआ है। इसके सन्तुलन तथा विरोध में चित्र के बड़े-बड़े क्षेत्र पारदर्शी रंगों में बनाये गये हैं। 

इससे उन्होंने एक विशेष प्रकार के भ्रम उत्पन्न कर दिये हैं। कहीं-कहीं उभरे हुए धरातल सामान्य प्रतीत होते हैं और उनके निकट के तल गहरे या गड्डेदार होने का अभास देते हैं। 

चित्र में रंगों के द्वारा दिया गया विस्तार या दूरी का प्रभाव इस भ्रम को और भी बढा देता है। रंगों के द्वारा धरातलीय प्रभाव पहले की ही भाँति उत्पन्न करते हैं, यद्यपि अब उनके रंगों के बलों में अधिक सूक्ष्मता आ गयी है। 

उनके कुछ नये चित्रों में सपाट रंग के धरातल शान्त सागर जैसे तथा गाढ़े रंग के धब्बे भवनों के समूह जैसे प्रतीत होते हैं। यह गाढ़ा रंग इकसार न लगाया जाकर कुछ खुरदरापन लिये लगाया गया है जो भवनों के भग्नावशेषों जैसा लगता है और चित्रों में एक रहस्यमय तथा कालातीत अनुभूति कराता है।

शान्ति दवे अपने निजी तकनीक और रंग-व्यवहार के कारण अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। उनकी रचना-प्रक्रिया एवं तकनीक श्रम-साध्य हैं। अमूर्त भाषा से जुड़े उनके चित्र नये प्रयोगों के कारण प्रभावित करते हैं। 

नये कलाकारों में वे सबसे अधिक सफल हुए हैं। उन्होंने ललित कला अकादमी के तीन तथा तोक्यो द्विवार्षिकी के अतिरिक्त अनेक पुरस्कार तथा सम्मान प्राप्त किये हैं। एयर इण्डिया तथा अन्य कई प्रमुख संस्थाओं के लिये उन्होंने सुन्दर भित्ति चित्र भी अंकित किये हैं। 

1985 में शान्ति दवे को भारत सरकार द्वारा “पद्मश्री” से विभूषित किया गया है। श्री दवे बड़ौदा ग्रुप आफ आर्टिस्ट्स के संस्थापक सदस्य हैं। 

उन्होंने भारत के अतिरिक्त मनीला, स्विटज़रलैण्ड, जर्मनी, मिस्र, इटली, पेरिस, न्यूयार्क, लन्दन, ब्राजील, जापान, काबुल, वाशिंगटन, ओहियो तथा लास एंजिल्स आदि में प्रदर्शनियाँ की हैं।

बी प्रभा (1931 ) 

नागपुर में जन्मी बी० प्रभा को बचपन से ही चित्र- रचना का शौक था। सोलह वर्ष की आयु में उन्होंने नागपुर के कला-विद्यालय में प्रवेश लिया। और फिर जे० जे० स्कूल आफ आर्ट में प्रवेश लिया। 

वहाँ कला में डिप्लोमा प्राप्त करने के उपरान्त म्यूरल में विशेष अध्ययन के साथ 1954-55 में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त की। सुप्रसिद्ध मूर्ति-शिल्पी श्री विटट्ल के साथ उनका विवाह हुआ और उन्होंने अपनी प्रथम प्रदर्शनी अपने पति के साथ 1956 में आयोजित की। 

1958 में उन्हें बम्बई आर्ट सोसाइटी का प्रथम पुरस्कार प्राप्त हुआ । तब से वे अनेक सफल प्रदर्शनियाँ आयोजित कर चुकी हैं। 

उनके चित्र बैंकाक, यूरोप तथा जापान में भी प्रदर्शित किये जा चुके हैं। आल इण्डिया फाइन आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट्स सोसाइटी ने भी उन्हें पुरस्कृत किया है।

बी० प्रभा के चित्रों में जीवन के उल्लास का ही प्रायः चित्रण हुआ है। उन पर आरम्भ में आलमेलकर, पलसीकर, बेन्द्रे तथा अमृता शेरगिल का प्रभाव था। धीरे- धीरे उन्होंने अपनी मौलिक शैली का विकास कर लिया है। 

उनके चित्र अलग से पहचाने जा सकते हैं। उन्होंने नारी आकृति को अत्यन्त मासूमियत से अंकित किया है। लम्बे चेहरे, ग्रीवा, भुजाएँ, अंगुलियाँ और पर्याप्त लम्बी देह वाली आकृतियों में एक विशेष मार्दव है जो सहज ही मन मोह लेता है। 

आकृतियों की सहज मुद्राओं को नये दृष्टिकोणों से देखा गया है। उनके रंग भी बहुत सुखद हैं। मुख्य रूप से नारंगी तथा हरे रंगों के साथ-साथ सीमित रूप में कुछ गहरे रंगों (जैसे कत्थई, काला) आदि का भी प्रयोग किया है। 

उनके द्वारा अंकित अनावृताओं नवयौवनाओं के चित्रों ने कला जगत् में एक हलचल मचा दी थी।

बांग्लादेश के युद्ध के पश्चात् उन्होंने विस्थापित बंगीय नारियों के जो चित्र अंकित किये उनमें भी अत्यन्त मार्मिकता है।

रंगास्वामी सारंगन् (1929- ) 

रंगास्वामी सारंगन का जन्म 1929 में तंजौर में हुआ था। 1952 में उन्होंने मद्रास कला-विद्यालय से ललित कला तथा व्यावसायिक कला में डिप्लोमा प्राप्त किया। 

सारंगन ने 1963 से एकल प्रदर्शनियों लगाना आरम्भ किया था दिल्ली, बम्बई, मद्रास, हैदराबाद के अतिरिक्त ब्रेडफोर्ड, सान फ्रांसिस्को आदि में भी उन्होंने कला-प्रदर्शनियों आयोजित की। 

उन्हें 1964 तथा 1971 में आइफैक्स का पुरस्कार एवं 1968 में अकादमी आफ फाइन आर्ट्स कलकत्ता का पुरस्कार प्राप्त हुआ । 

यूनाइटेड स्टेट्स इनफार्मेशन सर्विस द्वारा आयोजित स्मिथसोनियन छापा निर्माण कार्यशाला नई दिल्ली में भी उन्होंने भाग लिया था। वे दक्षिण भारत की सोसाइटी आफ पेण्टर्स तथा प्रोग्रेसिव पेन्टर्स एसोसियेशन मद्रास के भी सदस्य रहे हैं।

सारंगन धातु की चादर में गड्ढे डालकर विविध आलंकारिक आकृतियाँ बनाते हैं तथा स्थान-स्थान पर रंग भरते हैं। प्रायः पक्षी, मयूर तथा मन्दिर उनके प्रिय विषय रहे हैं। 

अपने तकनीक की आलंकारिक क्षमता का उन्होंने वैष्णव धर्म के प्रतीकों के अंकन में भरपूर उपयोग किया है जैसे, शंख, चक्र तथा पद्म

वे पहले केनवास पर कार्य करते थे किन्तु अब अल्म्यूनियम की चादर तथा काँच का प्रयोग करते हैं और उसी पर रंग तथा मारबिल का चूर्ण लगाते हैं। 

वैष्णव तिलक को उन्होंने पर्याप्त विविधता से चित्रित किया है उनकी आकृतियों में रेखाओं का लयात्मक प्रयोग है कभी-कभी वे रंगों तथा रंगीन मारबिल के चूर्ण से मणिक-कुट्टिम (मोजाइक ) के समान सुन्दर प्रभाव भी उत्पन्न कर देते हैं। उनके सभी चित्रों में एक समान पद्धति का प्रयोग है।

सारंगन के चित्र सरल लोक-शैली के समान आभासित होते हैं किन्तु हैं वे वास्तव में आधुनिक कोलाज चित्र धार्मिक वैष्णव प्रतीकों तथा आलंकारिक अभिप्रायों को वे ट्यूब में से बत्ती के समान निकाले गये रंग से धरातल पर उभरा हुआ ही रहने देते हैं। कुछ सपाट तलों को रंग से भर देते हैं और रेखाओं का भी प्रयोग सीमांकन में कर लेते हैं। 

अपने चित्रों को वे आलंकारिक पेनल से अधिक कुछ नहीं बनाते। तकनीक की विशिष्टता तथा वैष्णव प्रतीकों के प्रयोग के कारण ही उनकी कला का महत्व है। 

भूपेन खक्खर (1934)

भूपेन खक्खर का जन्म 10 मार्च 1934 को बम्बई में हुआ था। उनकी माँ के परिवार में कपडे रंगने का काम होता था। पिता की बम्बई के भूलेश्वर में कपड़े की छोटी-सी दुकान थी। भूपेन जब चार वर्ष के थे, पिता की मृत्यु हो गयी। 

भूपेन की बडी बहिन विवाहिता थीं। उनकी ससुराल वालों ने भूपेन के परिवार को अपनी फैक्ट्री में काम देकर आर्थिक सहायता की। विषम आर्थिक परिस्थितियों में भूपेन का बचपन व्यतीत हुआ । उन्हें माँ बहुत चाहती थीं।

विषम परिस्थितियों के बावजूद भूपेन की शिक्षा चलती रही। 1953 में इण्टरमीडिएट उत्तीर्ण करने के समय भूपेन जल-रंगों में चित्र बनाया करते थे और कभी-कभी इधर-उधर के दृश्यों को भी चित्रित करने चले जाते थे। 

बाद में उन्होंने जे० जे० स्कूल आफ आर्ट की सांयकालीन कक्षाओं में ग्राफिक विधि का अध्ययन किया और अपने ग्राफिक चित्रों की प्रदर्शनी की। उन्हें इन पर कुछ पुरस्कार भी मिले जिनसे भूपेन बहुत प्रोत्साहित हुए । 

अर्थशास्त्र में बी० ए० उत्तीर्ण करने के पश्चात् जे० जे० स्कूल में प्रवेश ले लिया। बी० ए० में वे तृतीय श्रेणी में उत्तीर्ण हुए थे किन्तु बी० कॉम० में उन्होंने सम्पूर्ण विश्वविद्यालय में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया। इससे भूपेन को बहुत आत्मिक बल मिला।

1958 में भूपेन की मित्रता प्रद्युम्न ताना से हुई जो बंगाल शैली में कार्य करते थे। 

वे आधुनिक कला को पसन्द नहीं करते थे। किन्तु भूपेन उनके अतिरिक्त रजा, पदमसी और सामन्त के भी प्रशंसक थे। 1960 में भूपेन रामकुमार के दृश्य-चित्रों से बहुत प्रभावित हुए जो “इलस्ट्रेटेड वीकली आफ इण्डिया’ में छपे थे। 

उनकी भेंट गुलाम मुहम्मद शेख से भी हुई जिन्होंने भूपेन को बड़ौदा जानेको कहा किन्तु पारिवारिक कारणों से यह सम्भव नहीं हो पाया।

1961 में भूपेन की एक चार्टर्ड एकाउन्टेण्ट्स की फर्म में नौकरी लग गई किन्तु 1962 में उन्होंने उसे छोड़ दिया और बड़ौदा विश्वविद्यालय के कला विभाग में प्रवेश ले लिया। वहाँ उन्होंने कला-आलोचना का द्विवर्षीय पाठ्यक्रम उत्तीर्ण किया।

1963 में भूपेन की भेंट बड़ौदा आये हुए एक अंग्रेज पॉप चित्रकार से हुई जिनका नाम जिम डोनावैन था। जिम के प्रभाव से भूपेन ने भारत में प्रचलित फ्रेंच कला परम्पराओं को छोड़ दिया और जन-जीवन के चित्र सीधी-सादी शैली में अंकित करने लगे। 

भूपेन ने बाजार में बिकने वाली प्रतिमाओं, देवताओं की छपी हुई छवियों तथा कैलेण्डरों से कोलाज बनाना आरम्भ कर दिया। एक ही वर्ष में उन्होंने बाजारू चित्रों का अच्छा संग्रह भी कर लिया। 

अपनी कलाकृतियों में भूपेन ने पोस्टकार्ड, चार्ट, कॅलेण्डर, लघु-चित्र, सिनेमा सेटिंग तथा चाय की दुकानों में टंगे रहने वाले चित्रों आदि का प्रचुर उपयोग किया है।

1965 से भूपेन ने अपनी कृतियों की प्रदर्शनी लगाना प्रारम्भ किया देश-विदेश में उनकी प्रशंसा हुई और उन्हें अच्छे ग्राहक भी मिले। 1976 में उनसे बाथ अकादमी में अध्यापन के लिये भी आग्रह किया गया था।

उन्होंने पहले अपने चित्रों में दैनिक जन-जीवन की घटनाओं का चित्रण किया, फिर निम्न मध्य वर्ग के जीवन का चित्रण करने लगे। इसके उपरान्त उन्होंने समाज के उस वर्ग का अंकन आरम्भ कर दिया है जिसे कभी-भी चित्रित नहीं किया गया। 

1968 के पश्चात् बने उनके चित्रों में वही रंग लगाये गये हैं जो वेश-भूषा अथवा भवनों की दीवारों आदि में भारतीय लोग प्रयोग में लाते हैं। 

खक्खर ने अपनी कला में लोकप्रिय छपे हुए चित्रों तथा कलैण्डरों का जो प्रयोग किया है, वह पहले किसी भी कलाकार ने नहीं किया। इनमें लोक प्रचलित देवी-देवताओं के चित्र प्रमुख हैं। 

वे इन छपी हुई. आकृतियों को काटकर केनवास के एक मुख्य अभिप्राय के आस-पास चिपका देते हैं। लाल इनामेल के रंग से पृष्ठ-भूमि को इकसार रंग देते हैं। 

यह रंग कहीं-कहीं चिपकाये हुए चित्र के किसी भाग पर बहकर भी आ जाता है. इससे चित्र को सम्पूर्ण संयोजनका ही एक भाग बनने में सहायता मिलती है। वे आकृतियों को इस प्रकार चिपकाते हैं कि उससे उनमें एक नयी विकृति और आश्चर्य कारक नया प्रभाव उत्पन्न हो जाता है। 

इनमें ये दर्पणों के टुकड़े चिपकाने तथा सुन्दर लिपि भी लिखने लगे हैं। खक्खर के इन चित्रों में सर्वाधिक प्रभावशाली श्रीनाथ जी के आधार पर बने संयोजन है। 

इनमें वे चित्र के केन्द्र में एक बड़ी आकृति तथा चारों ओर छोटी-छोटी अनेक आकृतियाँ चिपका देते हैं। कभी-कभी वे उस प्रकार के नेत्र भी चिपका देते हैं जो श्रीनाथ जी की प्रतिमा में लगाये जाते हैं। 

खाली स्थानों पर वे छोटे-बड़े आकारों में राम-राम आदि लिख देते हैं। आकृति न बनाकर अथवा विभिन्न आकृतियों को परस्पर सम्बन्धित न करके अक्षर आदि लिखने की प्रवृत्ति पेरिस में चले आकृति विरोधी “दादावादी” आन्दोलन के समान है।

खक्खर द्वारा चित्रित समाज तथा चित्रों की रंग-योजनाएँ पर्याप्त लोकप्रिय हुई हैं। वे इन विषयों को सदैव नये ढंग से प्रस्तुत करते हैं सरल संयोजनों में वे भारतीय ग्रामीण सामान्य अथवा औसत जीवन का चित्रण करते हैं जिसमें उस जीवन की त्रासदी और सौन्दर्य दोनों निहित है। 

भूपेन के चित्रों को देखकर लगता है कि उनकी नियति में एक स्थिरता आ गयी है; वह अब बदलने वाली नहीं है। उनके चित्रों में निकट की वस्तुओं के साथ-साथ दूर की वस्तुओं के कुछ विवरण इस प्रकार अंकित रहते हैं मानों वे सबसे अधिक निकट है। 

वे अपने चित्रों में इस युक्ति से दूर और पास की वस्तुओं में एक सम्बन्ध बना देते हैं जो किसी व्यंग्य अथवा विडम्बना की और इंगित करता है। 

उनके एक नये चित्र “तुम सभी को खुश नहीं रख सकते” में मुख्य पात्र चित्र के दर्शकों की ओर नग्न पीठ किये अंकित है और वह गधे के साथ खड़े दो व्यक्तियों की ओर देख रहा है। 

ऐसा करके चित्रकार ने मूर्ख लोगों द्वारा की जा रही षड्यन्त्रकारी गतिविधियों की ओर संकेत किया है। भूपेन खक्खर को साहित्य से भी लगाव है और वे एक लोकप्रिय गुजराती कन्याकार भी हैं। 

भूपेन को आधुनिक भारतीय पॉप (पापूलर) कलाकार भी कहा जाता है। भारत के कई नगरों के अतिरिक्त ब्राजील, रूस, यूगोस्लाविया, इंग्लैण्ड, आदि में उनकी अनेक प्रदर्शनियाँ हुई हैं। वे अपने पुराने व्यवसाय (चार्टर्ड एकाउण्टेन्सी) के लिये भी कुछ समय निकाल लेते हैं।

ए० रामचन्द्रन (1935- ) 

रामचन्द्रन का जन्म केरल में हुआ था। वे आकाशवाणी पर गायन के कार्यक्रम में भाग लेते थे। कुछ समय पश्चात् उन्होंने केरल विश्व विद्यालय से मलयालम में एम० ए० उत्तीर्ण किया। 

फिर चित्रकला में रुचि के कारण आप शान्ति निकेतन चले गये और वहाँ से 1961 में चित्रकला की डिप्लोमा परीक्षा उत्तीर्ण की। 

इस अवधि में 1960 में दिल्ली में उन्होंने अपनी प्रथम एकल प्रदर्शनी आयोजित की शान्ति निकेतन से लौटकर केरल के भित्तिचित्रों पर एक शोध- परियोजना के अन्तगर्त कार्य किया। 

इसके उपरान्त देश-विदेश में आपने अनेक प्रदर्शनियों आयोजित की तथा दिल्ली में दो भित्ति चित्र भी अंकित किये। वे बच्चों की पुस्तकें भी लिखते तथा चित्रित करते रहते हैं। 

आपने डाक विभाग की अनेक टिकटों को भी डिजाइन किया है और उन पर आपको पुरस्कार भी मिले हैं। आपने इंग्लैण्ड, रूस तथा जापान की यात्राएँ भी कला-प्रदर्शनियों के सिलसिले में की हैं। 

इस समय आप जामिया इस्लामिया दिल्ली में कला-विभाग के अध्यक्ष हैं। आप प्रायः बड़े आकार के केनवासों पर कार्य करना पसन्द करते हैं। 

पहले आप हाड-मांस के पंजर का प्रभाव देने वाली आकृतियाँ विशेष रूप से बनाते थे। इनमें विकृति के द्वारा अभिव्यंजनावादी पद्धति का सहारा लिया गया है। 

आईकोनोग्राफी, द ग्रेव डिगर्स तथा . एनटाम्बमेण्ट उनके इस प्रकार के प्रमुख चित्र हैं। ये वर्तमान युग के मानव की विनाशोन्मुख प्रवृत्ति को व्यंजित करते हैं। 

‘आईकोनोग्राफी’ रेखांकन अधिक है, रंगों का कोई तात्पर्य नहीं है। ‘श्रेय डिगर्स’ में कब्र में पड़ी लाश का तो चेहरा है पर कब्र खेदने वालों के केवल शरीर है, शिर नहीं है: यहाँ तक कि आकाश में देवदूत भी शिर-विहीन है; वह भी मनुष्य द्वारा मनुष्य की कब्र खोदने की क्रिया में सम्मिलित ।

ए० रामचन्द्रन ने जो म्यूरल (भित्तिचित्र) बनाये हैं उनमें ‘ययाति’ एक महाकाव्य से सम्बन्धित (एपिक म्यूरल) है जिसमें युवतियों के मांसल सौन्दर्य को आकर्षक रूपों में अंकित किया गया है। 

इस भित्तिचित्र के विषय में एक आलोचक ने लिखा है कि ययाति को रामचन्द्रन ने केवल सोचा ही नहीं हैं, बहु-पत्नी वाले एक बनजारे के अस्थायी निवास के सन्याकालीन वातावरण में देखा भी है। 

तकनीकी दृष्टि से रामचन्द्रन शरीर और उसकी बनावट, ढोंचे, पौरुष तथा धरातलों में रूचि लेते हैं इनकी कृतियों में आकार घनत्वों की भाँति अनुभव होते हैं, धरातल चोड़े तथा गहरे प्रतीत होते है और हल्के-गहरे रंगों से निर्मित शरीर का ढाँचा समृद्ध रंग दर्शाता है।

परमजीत सिंह (1935 )  

परमजीतसिंह का जन्म 23 फरवरी 1935 अमृतसर में हुआ था। आरम्भिक शिक्षा के उपरान्त वे दिल्ली पॉलीटेक्नीक के कला को विभाग में प्रविष्ट हुए जहाँ उन्होने शैलोज मुखर्जी से 1953 से 1958 तक कला की शिक्षा प्राप्त की और कला के आन्तरिक रहस्यों को समझा। 

मंसूरी के नेशनल इन्स्टीट्यूट आफ कम्यूनिटी डेवेलपमेण्ट एवं नई दिल्ली के मदर्स स्कूल में कुछ समय तक कार्य करने के उपरान्त 1963 ई० में वे जामिया मिलिया इस्लामिया विश्व विद्यालय नई दिल्ली में कला के प्रवक्ता नियुक्त हो गये और वहीं पर कायरत हैं।

1967 ई० से उन्होंने अपने कार्य की प्रदर्शनियाँ आरम्भ की। इसके पश्चात् देश-विदेश में उनकी अनेक प्रदर्शनियों हुई हैं और उनके चित्र अनेक संग्रहों में है। उन्हें अनेक पुरस्कार भी मिल चुके हैं। 1970 में उन्हें ललित कला अकादमी का राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त हुआ।

परमजीतसिंह वस्तुओं को रंगों द्वारा गढ़नशीलता प्रदान करते हैं, रेखाओं का प्रयोग नहीं करते। उनके रंगों के मूल स्त्रोत वास्तविक दृश्यों के रंगों में देखे जा सकते है, किन्तु वे प्रकृति के अगणित बदलते हुए रंगों में से अपने संयोजनों के अनुकूल रंगों का ही चयन करते हैं और चित्र के बड़े-बड़े क्षेत्रों में रंग फैला देते हैं। 

इससे रंगों की प्राकृतिकता समाप्त हो जाती है और सम्पूर्ण चित्र एक अमूर्त रंग-संगति के क्षेत्र जैसा प्रतीत होता है। ये बिम्बों को नष्ट न करके उन्हें शाश्वतता प्रदान करने का प्रयत्न करते हैं। 

चित्र में वस्तुओं पर पड़ने वाला प्रकाश प्राकृतिक स्रोतों से आता हुआ प्रतीत होता है। रंगों से वस्तुओं के भौतिक अनुभव में कोई कठिनाई नहीं होती।

परमजीत सिंह के चित्रों में वृक्ष, भूमि के टीले, धूप, जलाशय, पगडण्डी, घास, फुनगियों, सुबह, धुंधलका और रोशनी का ही अधिक चित्रण हुआ है। 

उनके चित्रों में पत्थर पहले इतने सक्रिय नहीं थे जितने बाद में होते गये वे पत्थरों को अमूर्त शिल्पी की भाँति काट-छाँट देते हैं और उन्हें अपनी जगहों से अलग करके आकाश में तैरा देते हैं, जहाँ वे अपनी अलग लयात्मक संगति उत्पन्न करते हैं। 

पत्थरों से पहले वे स्थिर जीवन के चित्र अधिक बनाते थे। अब वे स्थिर जीवन की वस्तुओं को अमूर्त प्राकृतिक दृश्य में संयोजित कर देते हैं जहाँ उनकी स्थिरता और भी बढ़ी हुई प्रतीत होती हैं।

उन्होंने अपने चित्रों में जबर्दस्ती किसी मानवाकृति को अंकित करने का प्रयत्न नहीं किया। उनके चित्र “लेण्ड स्केप नहीं हैं क्योंकि वे किसी विशेष दृश्य को देखकर नहीं अंकित किये गये हैं। 

उनके प्रत्येक चित्र में अनेक दृश्यों का सार एकत्रित है। उनमें वस्तुओं के स्थान बदले हुए हो सकते हैं। पानी अथवा पत्थर आकाश में और आकाश पगडण्डी में अंकित किया जा सकता है।

परमजीतसिंह की कला पर पश्चिमी अभिव्यंजनावादी कलाकारों का प्रभाव पड़ा है। स्थिर आकृतियाँ, प्रकाश के नाटकीय प्रयोग, आकृतियों की अमूर्त बनावट आदि में उनका कार्य शिरिको (Chirico) के समान है। 

ठोस आकार वाली वस्तुएँ शून्य में विचरण करती हैं किन्तु उन पर पड़ने वाला प्रकाश स्थिर रहता है। युगों की स्थिरता को उन्होंने वस्तुओं की स्थिरता के द्वारा व्यक्त किया है। 

इससे वे शाश्वत की अभिव्यक्ति करना चाहते हैं। इस स्थिरता के कारण उनके आकाश बहुत भारी प्रतीत होते हैं। वस्तुओं की स्थितियाँ हमें अतियथार्थवादी संयोजनों के लोक में ले जाती हैं। “परमजीतसिंह दृश्य-चित्रण ही पसन्द करते हैं। 

उनके चित्रों में लगभग एक जैसी ही पद्धति का प्रयोग होने से एकरूपता और नीरसता का अनुभव भी होता है।

बीरेश्वर भट्टाचार्जी (1935) 

श्री वीरेश्वर भट्टाचार्जी का जन्म ढाका (अब बांग्लादेश) में 25 जुलाई 1935 को हुआ था। आरम्भिक शिक्षा स्थानीय रूप से प्राप्त करने के पश्चात् तथा भारत-पाकिस्तान विभाजन के पश्चात् गवर्नमेन्ट कालेज आफ आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट्स पटना से आपने व्यावसायिक कला में डिप्लोमा प्राप्त किया। 

तदुपरान्त तुर्की सरकार की छात्रवृत्ति पर आप एकेडेमी आफ फाइन आर्ट्स, इस्तम्बूल गये। आपने इस्तम्बूल, मध्यप्रदेश, दिल्ली एवं पटना आदि में अनेक कला-प्रदर्शनियों आयोजित की तथा कई पुरस्कार भी प्राप्त किये। 

पटना में आपने ट्राइएंगिल आर्टिस्ट ग्रुप की स्थापना की बिहार प्रदेश के आधुनिक कला-आन्दोलन पर आपने लेखनी भी उठाई है। 

सम्प्रति आप गवर्नमेंट कालेज आफ आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट्स पटना में कला शिक्षण कर रहे हैं। यथार्थवादी रचनाओं के अतिरिक्त आपने अनेक अतियथार्थवादी रचनाओं का भी सृजन किया है।

गणेश पाइन (1937) गणेश पाइन का जन्म 19 जून 1937 को कलकत्ता में हुआ था। उन्होंने कलकत्ता कला महाविद्यालय से 1959 में ड्राइंग एण्ड पेण्टिंग में डिप्लोमा परीक्षा उत्तीर्ण की। 

1957 से ही वे प्रदर्शनियाँ आयोजित करने लगे थे और तब से उन्होंने देश-विदेश की अनेक महत्वपूर्ण प्रदर्शनियों में भाग लिया है। 

विभिन्न माध्यमों में प्रयोग करते हुए उन्होंने अन्त में 1967 में अपनी अभिव्यंजना-पद्धति के अनुकूल केनवास पर टेम्परा के एक तकनीक का विकास किया।

गणेश पाइन स्वातंत्र्योत्तर आधुनिक भारतीय कलाकारों की दूसरी पीढ़ी में सबसे अलग ढंग का कार्य करते हैं। उनके चित्रों की संख्या बहुत कम है तथा वे आकार में भी ज्यादा बड़े नहीं होते । 

वे सुलझी हुई चित्र-भाषा का सहारा लेकर दर्शक को फन्तासी में ले जाती हैं स्त्रियाँ, स्वप्न, रात के सौदागर, रथ, राजा-रानी, राजकुमार, नाव, परीलोक, स्वप्न लोक, हड्डियाँ, आग, प्रकाश, अन्धकार आदि । 

किन्तु इनकी सभी कल्पनाओं की जड़ें भारतीयता में खोजी जा सकती है। उनके चित्रों का संसार परीलोक अथवा जादुई दुनियाँ के समान सर्जित रहता है। उसमें बाल-कला का भी प्रभाव हैं।

माँ और बालिका, एक स्वप्न की मृत्यु, एक प्राचीन उनके प्रमुख 1 पुरुष की ‘चित्रों में से हैं। ‘हत्यारा’ शीर्षक चित्र 1979 में बनाया गया था। 

इसमें मृत्यु तथा हत्यारा पशु की भाँति झुका एक व्यक्ति (जो दानव, योद्धा, पेशेवर हत्यारा, कुछ भी हो सकता है) एक बहुत बडी तलवार म्यान से बाहर निकाल रहा है। यह तलवार प्राचीन किस्म की है।

पाइन की कला में रोमाण्टिक प्रवृत्ति भी है जिसे वे कलाकार को जीवित रखने अथवा विद्रोह के लिये प्रेरित करने में आवश्यक मानते हैं। उनके अनुसार रोमाण्टिक कलाकार जीवन और प्रकृति को अपने दृष्टिकोण से देखता है। 

जब वह खुश होता है तो उसे दुनियाँ खुश दिखायी देती है; जब वह उदास होता है तो उसे पहाड़ भी रोते हुए दिखायी देते हैं किन्तु इसे ये भावुकता नहीं मानते और भावुकता से वे मृणा करते हैं।

जोगेन चौधरी (1939 ) 

जोगेन चौधरी का जन्म पूर्वी बंगाल (अब बांग्लादेश) के फरीदपुर नामक गाँव में 19 फरवरी 1939 ई० को एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। उनकी कला-सम्बन्धी शिक्षा कालेज आफ आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट्स कलकत्ता में हुई। 

इसी अवधि में कलकत्ता में रहने के परिणाम स्वरूप कलकत्ता महानगर के विभिन्न पक्षों से उनका साक्षात्कार हुआ। 1960 में जोगने ने वहाँ से स्नातक की उपाधि प्राप्त की। 1965 से 1967 तक वे एक छात्रवृत्ति पर फ्रांस गये। 

वहाँ से लौटकर वे अपनी मौलिक शैली के विकास के प्रयत्न में लग गये आरम्भ में अपने चित्रों में वे ग्राम्य जीवन तथा कलकत्ता के विभिन्न पक्षों को चित्रित करते थे। 

उसके पश्चात् उनकी शैली में परिवर्तन आरम्भ हुआ। वे मछली, तितली, साँप आदि को व्यंजक रूपों में चित्रित करने लगे। 

वनस्पतियों को उन्होंने कहीं प्रफुल्ल और पंपल दिखाया है तो कहीं अध-सूखी, निचुडी हुई अथवा मुरझाई हुई तथा उदास स्थितियों में चित्रित किया है। 

उन्होंने गणेश के भी अनेक चित्र बनाये हैं जिनमें उन्हें दुबला-पतला दिखाया गया है और व्यंग्यात्मक पद्धति का सहारा लिया गया है। 

नारी आकृतियों के द्वारा जीवन के अन्तरंग अनुभवों को चित्रित किया है वे मांसल, सुन्दर, ऐन्द्रिय और शक्तिमती होने के साथ-साथ दुःखी भी चित्रित हुई हैं जोगेन का प्रकृति से भी घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है अतः उनके चित्रों में किसी स्त्री-पुरुष की आकृति में हाथ-पैर किसी लता की भाँति भी लग सकते हैं और अंगों के उभार फलों की भाँति भी।

जोगेन प्रायः कागज पर चित्र रचना के लिये स्याही तथा मोमी रंगों का प्रयोग करते हैं तथा कभी-कभी अन्य रंग भी प्रयोग में लाते हैं। 

तैल माध्यम में उन्होंने बहुत कम चित्रण किया है। वे एक स्वप्न के समान संसार के चित्र बनाते हैं जिसकी आकृतियाँ कभी बीभत्स और कभी सुन्दर प्रतीत होती हैं किन्तु ये अतियथार्थवादी कलाकार नहीं हैं। 

समकालीन परिवेश में आदमी के चेहरे बदल जाने की भयावह स्थिति को उन्होंने बड़ी मार्मिकता से अंकित किया है किन्तु फिर भी वे मनुष्य में कुछ अच्छाई का चित्रण करते हैं। 

वे जन सामान्य अथवा विशिष्ट जन, सभी आकृतियों को बहुत सवेदनशीलता से चित्रित करते हैं। देश-विदेश में उनकी अनेक प्रदर्शनियाँ हो चुकी हैं तथा उन्हें अनेक पुरस्कार मिल चुके हैं। 

बाल खोले स्त्री, नटी विनोदिनी, तथा चांदनी रात में चीता आदि उनके प्रसिद्धे चित्र हैं। आजकल वे नई दिल्ली में “आर्ट टुडे” के सह-सम्पादक हैं तथा राष्ट्रपति भवन के चित्र-संग्रह के क्यूरेटर हैं।

विकास भट्टाचार्जी (1940- ) 

विकास का जन्म कलकत्ता में 21 जून 1940 को हुआ था। आरम्भिक शिक्षा के बाद कला के अध्ययन के लिये कलकत्ता के इण्डियन कालेज आफ आर्ट्स एण्ड ड्राफ्टसमेनशिप में प्रवेश लिया और 1963 में अध्ययन पूर्ण करने के पश्चात् वहीं पर 1968 से 1973 तक अध्यापन भी किया। 

उसके बाद 1973 से 1982 तक गवर्नमेण्ट कालेज आफ आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट्स कलकत्ता में कला-शिक्षण किया।

विकास ने 1965 में कलकत्ता में अपनी पहली एकल प्रदर्शनी की और तब से कलकत्ता, दिल्ली तथा बम्बई में निरन्तर प्रदर्शनियाँ करते रहते हैं । 

हंगरी में 1972 में आयोजित भारत प्रदर्शनी के अतिरिक्त युगोस्लाविया, रूमानिया तथा चेकोस्लोवाकिया में भी आपके चित्रों का प्रदर्शन हुआ है। 

आपको अनेक पुरस्कार मिल चुके हैं जिनमें 1971 एवं 1972 के ललित कला अकादमी के राष्ट्रीय पुरस्कार भी सम्मिलित हैं। 

विकास भट्टाचार्य कलकत्ता के समकालीन कलाकार संघ के सक्रिय सदस्य हैं। आप कलकत्ता में ही निवास करते हैं।

कलकत्ता के अधिकांश कलाकार यथार्थ और आकृति-मूलकता को आसानी से नहीं छोड़ते । यही बात विकास के बारे में भी सच है। विकास व्यक्ति-चित्रण में पर्याप्त दक्ष रहे हैं और उनका रूझान फोटो-ग्राफिक यथार्थवाद की ओर भी पर्याप्त रहा है। 

‘वे अतियथार्थवादी धारा के एक अद्वितीय और समकालीन भारतीय कला के एक महत्वपूर्ण चित्रकार हैं। आधुनिक कला में वे अतियथार्थवादी दुनियाँ को सबसे अधिक प्रामाणिक ढंग से सामने लाते हैं। 

वे एक साधारण से व्यक्ति-चित्र को भी अनोखा आयाम देते हैं। उनका चित्र-संसार बहुत बेचैन करने वाला है। उसमें “बुरी खबर है” और जबर्दस्त तकनीकी कौशल भी है। 

फोटोग्राफी, चलचित्र, स्वप्न तथा फन्तासी के साथ विकास की कला में बचपन की खराब स्मृतियों का भी समन्वय हुआ है। 

सिनेमा की नाटकीय कल्पनाओं का प्रयोग उनकी ‘गुड़िया’ चित्र श्रृखंला में देखा जा सकता है। उन्होंने फोटो-यथार्थवाद का प्रयोग कैमरे की आँख की भाँति पूर्णरूप से किया है। उनके यथार्थवाद में तीखा व्यंग्य भी छिपा है।

विकास भटटाचार्य के ‘ट्यूबवैल का उद्घाटन’ नामक चित्र में फोटोग्राफ के समान यथार्थ चित्रण है अतः इसे हम फोटो भी मान सकते हैं। 

चित्र में एक वस्तु अंकित है जिसे हार पहनाया गया है। निकट ही ट्यूबवैल का उद्घाटन करने हैण्ड पम्प के लिये आमन्त्रित मुख्य अतिथि शानदार ढंग से अपने गले में हार पहने खड़ा है। 

जैसी उसके आस-पास बड़े, बूढ़े तथा बच्चे समूह के साथ अपना भी फोटो खिंचवाने के प्रयत्न में हैं। दीवार के पीछे से स्त्रियाँ भी झाँक रही हैं। 

इस चित्र में सामाजिक यथार्थ की एक मीठी कडवाहट दिखायी गयी है। सच के भीतर एक झूठ छिपा है; आशा के पीछे निराशा झाँक रही है।

कला-समीक्षक शान्तो दता के अनुसार ‘विकास उन आधुनिक भारतीय कलाकारों में से हैं जिनकी मानसिकता बुनियादी तौर पर नागर अथवा शहरी है। 

जीवन के प्रति उनके बौद्धिक तथा भावनात्मक दृष्टिकोण का आधार भी शहरी रहन-सहन की उनकी अपनी परिस्थितियों में है तथा उन्होंने लोक आदिवासी या ग्रामीण कला परम्पराओं . में अपनी जड़ें तलाशने की कभी कोशिश नहीं की है।

लक्ष्मा गौड (1940- ) 

लक्ष्मा गौड का जन्म निजामपुर (आन्ध्रप्रदेश) हुआ था। बचपन में आंध्र प्रदेश के ग्रामीण जीवन का जो प्रभाव उन पर पड़ा वह में उनकी कला की आधार भूमि बन गया। 

1963 में उन्होंने गवर्नमेण्ट कालेज आफ फाइन आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट्स हैदराबाद से ड्राइंग तथा पेण्टिंग में डिप्लोमा प्राप्त किया। 1963 से 1965 तक बड़ौदा में भित्ति चित्रण का अध्ययन किया। इस अवधि में वे छात्रवृत्ति भी प्राप्त करते रहे। 

इसके पश्चात् उन्होंने ग्राफिक कला का विशेष अध्ययन किया और बड़ौदा की ग्राफिक कार्यशाला का लाभ उठाया उन्होंने हैदराबाद 1965, 67, दिल्ली 1971, 76: बम्बई, 1972, टोक्यो वार्षिकी 1976, साओ पाओलो वार्षिकी 1977; वारसा, बुडापेस्ट तथा बेलग्रेड की आकृति-मूलक भारतीय चित्रकार प्रदर्शनियों 1974, सामूहिक प्रदर्शनियों लन्दन 1973 म्यूनिख 1974, हेम्बर्ग 1975 आदि में भाग लिया। उनके चित्र देश-विदेश के अनेक संग्रहों में हैं।

बड़ौदा के सांस्कृतिक वातावरण का उन पर व्यापक प्रभाव है। आकृतियों को सजीवता प्रदान करने की उनकी शैली मौलिक, नवीन तथा अनोखी है। 

उनके अंकनों में एक प्रकार का जंगलीपन है जिसके माध्यम से वे मनुष्य की आन्तरिक कुरूपता तथा भौडेपन को उजागर करते हैं उनकी कृतियाँ आघात पहुँचाने के साथ-साथ हमें आनन्दित भी करती हैं। 

उनकी कल्पनाएँ ग्रामीण तथा श्रृंगारिक पक्षों से विशेष रूप से जुड़ी रहती हैं। आन्तरिक अनुभूतियों तथा विकृतियों का वे मनोवैज्ञानिक ढंग से स्वप्न कल्पनाओं की भांति अंकन करते हैं। वे मुख्य रूप से ग्राफिक कलाकार हैं।

विवान सुन्दरम् (1943 ) 

विधानसुन्दरम् का जन्म शिमला में हुआ था। अमृता शेरगिल इनकी मौसी थीं जो इनके जन्म से दो वर्ष पूर्व ही मर चुकी थीं। विवान का बचपन शिमला में ही बीता। 

अपनी स्कूली शिक्षा के समय विवान ने चित्रकला में बहुत कम रूचि ली यद्यपि उस समय सुधीर खास्तगीर दून स्कूल में ही उनके कला- शिक्षक थे। 

विवान की उन दिनों खेलकूद तथा गणित आदि में अधिक दिलचस्पी थी। 1960 में विवान ने पेण्टिंग में रूचि लेना आरम्भ किया तीन-चार महीने में ही उन्होंने सेजान, वान गॉग आदि के अनेक चित्रों की अनुकृतियाँ कर डाली। 

एक वर्ष पश्चात् 1961 में उन्होंने कला की शिक्षा के लिये बडोदा महाविद्यालय में प्रवेश लिया। उस समय वहाँ के०जी० सुब्रमण्यन तथा नारायण श्रीधर बेन्द्रे अध्यापक थे। 

1965 तक विवान ने वहाँ कला की शिक्षा ली। इस समय उन्होंने कई प्रदेशों की यात्रा की। शिमला के शीतल प्रदेश के रहने वाले विवान राजस्थान के जैसलमेर आदि के उष्ण वातावरण तथा चटख रंगों से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने इसके अनेक चित्र बनाये। 

वे बनारस भी गये और बनारस से प्रभावित होकर पॉप कला शैली में वहाँ के दृश्यों तथा कोलाजों की रचना की। 1966 में उनकी प्रदर्शनियों दिल्ली तथा बम्बई में हुई।

1966 में ही एक स्कालरशिप मिल जाने से विवान लन्दन चले गये और वहाँ स्कूल में कला के साथ-साथ हिस्ट्री आफ सिनेमा का विशेष अध्ययन लिया। 

स्लेड वहाँ उनकी भेंट किताज से हुई जो बुद्धिवादी तथा शिल्पगत श्रेष्ठतावादी विचारों के प्रतिपादक थे साथ ही ऐतिहासिक बोध के हामी थे उनसे विवान को अपनी कला में अराजकता और विकृति का एक आधार मिल गया। 

पॉप कला की ओर विवान का रुझान तो था ही, यहाँ उन्होंने उसे प्रखर सामाजिक टिप्पणियों के सशक्त माध्यम के रूप में अनुभव किया। 

विवान साम्यवादी विचारों के थे अतः लन्दन में उन्होंने ‘कम्यून’ में रहकर सार्वजनिक कामों में हिस्सा लेना आरम्भ कर दिया और वहाँ पोस्टर वर्कशाप, फिल्म-शो आदि के संगठनात्मक कामों में गहरी दिलचस्पी दिखायी।

नवम्बर 1970 में विवान भारत लौटे और 1971 के मध्य से उन्होंने फिर पेण्टिंग बनाना आरम्भ कर दिया। बांग्लादेश की फोटो प्रदर्शनी को सड़कों पर ले जाने से लेकर सक्रिय राजनीतिक विरोध के छोटे-बड़े अनेक कार्य किये।

विवान ने 1972 में चिली के विख्यात कवि पाब्लो नेरूदा की एक कविता का स्याही से रेखांकन किया। 

उन्होंने एक अन्य महत्वपूर्ण प्रदर्शनी भी की थी “मध्य वर्ग का चतुर इन्द्रजाल’ जिसमें कालीनों, गद्देदार कुर्सियों, लेसदार मेजपोशों तथा वाथटबों का आधार बनाकर पॉप कला के मुहाविरे में ही तीखी सामाजिक-राजनीतिक टिप्पणियों देने का प्रयत्न किया गया था। 

इनमें सिनेमा की शैली का भी खूब प्रयोग किया गया था।

विवान ने अमृता की कला को समझने का भी प्रयत्न किया था। 1972 में अमृता शेरगिल की एक पुनरावलोकन प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। 

मार्ग पत्रिका ने अमृता शेरगिल विशेषांक प्रकाशित किया। इस प्रकार पहली बार आधुनिक भारतीय कलाकार की समस्या के संदर्भ में अमृता शेरगिल की प्रासंगिकता पर एक ही स्थान पर गम्भीर बहस हुई ।

विवान की प्रदर्शनियों में से 1981 में आयोजित ‘प्लेस फार पीपुल’ प्रदर्शनी सर्वाधिक चर्चा का विषय रही है। छह चित्रकारों की यह प्रदर्शनी दिल्ली और बम्बई में आयोजित की गयी थी।

विवान साम्यवादी राजनीतिक विचारों के समर्थक हैं। वे हवाना में वर्ल्ड यूथ कांग्रेस में कम्यूनिस्ट विंग के सदस्य बनकर 1978 में मेक्सिको गये थे। 

उनकी प्रतिबद्धता पर्याप्त गम्भीर है और अपनी कला में राजनीतिक आग्रहों को स्पष्ट करते हुए वे समाज की त्रासदी और चीत्कार का चित्रण करते हैं

विवान सुन्दरम् उन कलाकारों में से हैं जो अपने चित्र के ढाँचे को पहले से सोचकर गढ़ते हैं। उनके चित्र बिम्ब भी जैसे पहले से निश्चित होते हैं। 

उनकी कला में अमूर्त रूप बहुत कम हैं। ये अपने चित्रों में शक्ति के दानवी रूपों तथा भयंकर दुष्परिणामों का चित्रण मार्मिकता से करते हैं। 

उनके इस प्रकार के कुछ चित्र है षडयन्त्र, संहार, तबाही तथा शोषण आदि। उनकी कृतियों में आधुनिक पश्चिमी कला रूपों का

समायोजन है। विवान कसौली में प्रतिवर्ष आर्टिस्ट कैम्प भी लगाते हैं जिसमें विदेशी कलाकार भी भाग लेते हैं विवान दिल्ली के आर्टिस्ट्स प्रोटेस्ट मूवमेण्ट के सचिव भी रहे हैं।

अनुपम सूद (1944 ) 

अनुपम सूद का जन्म होशियारपुर में 1944 में हुआ था। उन्होंने कालेज आफ आर्ट दिल्ली से 1967 में नेशनल डिप्लोमा उत्तीर्ण किया। इसके पश्चात् कुछ समय तक पेण्टिंग भी की किन्तु धीरे-धीरे ग्राफिक माध्यम में उनकी रुचि बढ़ती चली गयी। 

उन्होनें इस माध्यम में कोलोग्राफ बनाये जिनमें विभिन्न वस्तुओं की सतह से टेक्सचर उठाकर उसे कलात्मक रूप दिया जाता है। कार्ड-बोर्ड कोलोग्राफ माध्यम के उनके प्रसिद्ध चित्र हैं’ सह अस्तित्व और जीवन एक क्रान्ति । 

इसी अवधि में उन्होंने कुछ लिथोग्राफ भी बनाये। इनमें आकृतियाँ समतल हैं। अण्डा तथा तैरता अस्तित्व उनके लिथोग्राफी के उदाहरण हैं।

1971-72 में वे ब्रिटिश काउन्सिल स्कालरशिप के अन्तर्गत स्लेड स्कूल आफ आर्ट लन्दन में छापा चित्र (प्रिण्ट मेकिंग) की शिक्षा हेतु गयीं। वहाँ उन्हें इसके उच्च तकनीक को समझनेका अवसर मिला। 

विभिन्न विधियों, माध्यमों और कलासामग्रियों के साथ उन्होंने अनेक प्रयोग किये जो उनके लिये भारत में सम्भव नहीं थे। वहाँ से लौटने पर उन्होंने अनेक ग्राफिक कार्यशालाओं में भाग लिया और अनेक प्रदर्शनियों की। 

उन्हें ललित कला अकादमी का 1973 में राष्ट्रीय पुरस्कार, 1975 में राष्ट्रपति का स्वर्ण पदक, 1971 तथा 1975 में आल इण्डिया फाइन आर्ट्स सोसाइटी का पुरस्कार तथा अन्य अनेक पुरस्कार प्राप्त हुए उनकी नियुक्ति कालेज आफ आर्ट नई दिल्ली में ग्राफिक विभाग में अध्यापिका के रूप में भी हो गयी जहाँ वे कार्य कर रहीं है ।1 वे शिल्पी चक्र तथा अन्य अनेक कला-संस्थाओं की सदस्या भी हैं।

उनके कुछ प्रसिद्ध चित्र हैं : संरचना, त्रिमूर्ति, विजेता के लिये पताका, जीवन एक क्रान्ति, बायोग्राफी आफ ए क्राइम, वे टू यूटोपिया, शिफ्टिंग हालो, डार्लिंग गेट मी ए बेबी मेड, द होमेज टू मेनकाइण्ड आदि। 

अनुपम सूद के छापा – चित्रों की एक विशेष महत्वपूर्ण बात यह है कि वे अपने चित्रों में पृष्ठ भूमि को एक पर्दे की भांति प्रयोग में लाती हैं ये ग्राफिक कलाकारों के ग्रुप 8″ की संस्थापक हैं जो ग्राफिक कलाकारों का महत्वपूर्ण भारतीय दल है।

परमानन्द चोयल (1924 ) 

श्री परमानन्द चोयल का जन्म 5 जनवरी 1924 को कोटा (राजस्थान) में हुआ था। प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के उपरान्त कला में अभिरूचि होने के कारण 1946 में आपने कला तथा शिल्प महाविद्यालय जयपुर में टीचर्स ट्रेंनिग में डिप्लोमा तथा 1948 में ललित कला में डिप्लोमा प्राप्त किया। 

इसके पश्चात् 1953 में सर जे० जे० स्कूल आफ आर्ट बम्बई से चित्रकला में शासकीय उपाधि (Govt. Diploma) प्राप्त की। 

सन् 1962-63 में स्लेड स्कूल आफ फाइन आर्ट्स यूनीवर्सिटी कालेज लन्दन से पोस्ट डिप्लोमा उपाधि उपलब्ध की । 

आपने कोटा तथा उदयपुर में कला शिक्षण किया। उदयपुर विश्वविद्यालय में आप ललित कला विभाग में सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्यरत रहे ।

श्री चोयल एक प्रगतिशील कलाकार हैं। आपने आरम्भ में राजस्थानी जनजीवन तथा विभिन्न स्थलों का चित्रांकन किया था। बाद में आपके चित्रों का प्रमुख विषय नारी की व्यथा हो गया। 

आप आकृति-मूलक चित्रकार हैं जिनकी तूलिका में सशक्त अभिव्यंजना है। आपके चित्रों की कोटा, उदयपुर, जयपुर, अलवर, दिल्ली, बम्बई, मद्रास, बंगलौर तथा कलकत्ता के अतिरिक्त जापान, मास्को, ब्राजील तथा अल्जीरिया आदि में भी प्रदर्शनियाँ आयोजित की जा चुकी हैं। 

आपने आल इण्डिया फाइन आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट्स सोसाइटी नई दिल्ली: एकेडेमी आफ फाइन आर्ट्स तथा बिरला एकेडेमी आफ आर्ट कलकत्ता; ललित कला अकादमी उत्तर प्रदेश, चण्डीगढ़ राजस्थान तथा नई दिल्ली, बम्बई आर्ट सोसाइटी आदि के कार्य-कलापों तथा 1986 के छठे भारतीय त्रिनाले एवं 1987 की साओ पाओलो ब्राजील की प्रदर्शनियों और बम्बई, वनस्थली, मध्य प्रदेश तथा सार्क के कलाकार-शिविरों में भाग लिया है। 

आपको राजस्थानी ललित कला अकादमी के द्वारा 1960-61, 1963-65 तथा 1968 में अकादमी आफ फाइन आर्ट्स अमृतसर द्वारा 1978-79 में तथा आल इण्डिया फाइन आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट्स सोसाइटी नई दिल्ली द्वारा 1983 में पुरस्कृत किया गया है। आपके चित्र देश-विदेशों के अनेक संग्रहों में हैं।

सुरिन्दर के० भारद्वाज (1938) 

भारद्वाज का जन्म लाहौर में 20 अप्रैल 1938 को हुआ था। 1947 में भारत विभाजन के कारण उन्हें लाहौर छोड़ना पड़ा। कला में अभिरूचि होने के कारण उन्होंने 1955 में पंजाब स्कूल आफ आर्ट्स शिमला (अब चण्डीगढ़) में प्रवेश लिया और पांच वर्ष के उपरान्त सन् 1960 में ड्राइंग एण्ड पेण्टिंग में डिप्लोमा प्राप्त किया। 

इसके पश्चात् उन्होंने एक कलाकार बनने का लक्ष्य निर्धारित किया और कला के रहस्यों का गम्भीर अध्ययन किया। उन्होंने श्रीनगर (काश्मीर), अमृतसर, अम्बाला, नई दिल्ली, बम्बई, लन्दन तथा शरजाह में प्रदर्शनियों आयोजित की हैं तथा श्रीनगर, पटना, बंगलौर, मनाली एवं ग्वालियर के कलाकार कैम्पों में भाग लिया है। 

सन् 1988 ई० के ललित कला अकादमी नई दिल्ली के राष्ट्रीय पुरस्कार के अतिरिक्त उन्हें पंजाब ललित कला अकादमी, जम्मू तथा काश्मीर, हरियाणा तथा अम्बाला आदि में अनेक राज्य सरकारों के पुरस्कारों एवं प्रशंसा-पत्रों द्वारा सम्मानित किया गया है। 

उनके चित्र भारत पेट्रोलियम कार्पोरेशन कलकत्ता, अमर पैलेस संग्रहालय जम्मू, हरियाणा राजभवन, पंजाब विश्वविद्यालय संग्रहालय, ललित कला अकादमी नई दिल्ली आदि के संग्रह में हैं। 

सम्प्रति ये आदर्श महिला महाविद्यालय भिवानी (हरियाणा) में कला-विभाग के अध्यक्ष हैं।

सुरिन्दर भारद्वाज के तप पूर्ण जीवन का उनकी कला में भी प्रभाव आया है। उनकी प्रथम चित्र प्रदर्शनी 1960 में श्रीनगर (काश्मीर) में आयोजित हुई थी जिसमें हुसेन तथा कुलकर्णी जैसे श्रेष्ठ कलाकारों ने उनकी प्रशंसा की थी। 

सन् 1967 में ताज आर्ट गैलरी बम्बई में आयोजित उनकी प्रदर्शनी को देखकर के०एच० आरा भी अत्यन्त प्रभावित हुए थे। इस प्रकार कला जगत् में निरन्तर आगे बढ़ते हुए उन्होंने अपने लिये एक सम्मानपूर्ण स्थान बना लिया है।

आरम्भ में भारद्वाज लम्बी नारी आकृतियों के माध्यम से जीवन के हर्ष-विषाद का चित्रण करते थे। 

इन चित्रों की नारी आकर्षक और पुरुष के अवसादपूर्ण मन को सान्त्वना देने वाली शरण स्थली थी उदास तथा लम्बे पुरुष चेहरों को अपनी बाहों, कन्धों अथवा वक्ष स्थल का आश्रय प्रदान करने वाली, किन्तु स्वयं शून्य आकाश को एकटक निहारती हुई ।

इसके उपरान्त जम्मू के मन्दिरों के स्थापत्य से प्रभावित होकर उन्होंने नगर- दृश्यों का अंकन आरम्भ किया जिनमें भारतीय शैली की रेखा पर बल था। 

उनके नगर चित्रों में यह रेखा शनैःशनैः गहरी होती गयी किन्तु नवीनतम चित्रों में रेखा का स्थान वस्तु के संयोजनों ने ले लिया है। भारद्वाज के नगर-चित्र अमूर्त-संयोजन की ओर झुके हुए हैं। 

उनमें चित्र के विस्तार का विचार बहुत सोच-समझकर आकर्षक ढंग से व्यवस्थित किया गया है। उनके रंग भी प्रयाप्त प्रभावशाली हैं। 

उन्हें देखकर रामकुमार के अमूर्त नगर- दृश्यों का स्मरण हो आता है; किन्तु रामकुमार के नवीनतम दृश्यांकनों में जहाँ प्रकृति की अमूर्त शक्तिमत्ता का आभास होता है वहाँ भारद्वाज के चित्रों में उदास रंगों का प्रयोग न होते हुए भी आधुनिक शहरी जीवन की व्यस्तता, अव्यवस्था और निम्न तथा मध्यवर्गीय विषम परिस्थतियों और गरीबी का प्रतिबिम्ब भी झलकता है। 

उन्होंने चित्रों में अधिकांश खिड़कियों ही अंकित की हैं। कहीं-कहीं तो वे समाचार-पत्र के टुकड़े भी काट कर लगा देते हैं क्योंकि कई बार खिड़कियों के शीशे टूट जाने पर अक्सर कागज चिपका दिया जाता है। 

अपने चित्रों के द्वारा वे प्रायः तंग ढलवाँ गलियों का वातावरण प्रस्तुत करते हैं।

आधुनिक भारतीय चित्रकला की विविध प्रवृत्तियाँ प्रभाववाद

यूरोप की आधुनिक चित्रकला का प्रथम महत्वपूर्ण आन्दोलन प्रभाववाद है। इसका मुख्य रूप से प्रचलन 1874 से 1886 तक पेरिस में रहा है और इसके प्रधान कलाकार मोने, पिरसारो, रेनोआ, सिसले, देगा आदि रहे हैं। 

प्रभाववाद में प्रधानतः प्रकाशकी क्रीड़ा को ही प्रस्तुत किया गया है अतः इन कलाकारों ने अमिश्रित रंगों का प्रयोग किया है जिससे रंगों में अधिक से अधिक प्रकाश प्रतिबिम्बित हो सके। 

श्वेत तथा काले रंग के साथ ही इन कलाकारों ने कत्थई और भूरे रंगों का भी प्रयोग छोड़ दिया था। विषयों की दृष्टि से भी इन कलाकारों ने प्राचीन विषयों को पूर्णतः तिलांजलि दे दी थी और समकालीन जीवन की वास्तविकताओं को समझने के अभिप्राय से प्रायः प्राकृतिक दृश्यों का समय और वातावरण के अनुसार घटना स्थल पर जाकर ही चित्रण करने के अतिरिक्त स्थिर जीवन, काफी हाउस, वेश्याओं, आवारा व्यक्तियों, शरावियों, मध्य एवं निम्न वर्गीय व्यवसायियों एवं कारीगर कलाकारों को ही चित्रित किया। 

फोटोग्राफी की प्रेरणा से प्रभाववादी चित्रकारों ने जीवन के व्यस्त क्षणों को भी चित्रित करने का प्रयत्न किया। 

आगे चलकर यह आन्दोलन नव-प्रभावववाद में परिणत हो गया जिसमें रंगों के मिश्रण पूरी तरह छोड़ दिये गये और अमिश्रित रंगों को बिन्दुओं के रूप में ही चित्रों में लगाया जाने लगा। 

दिन के अलग-अलग समयों में धूपकी तेजी के अनुसार एक ही वस्तु के प्रकाश तथा छाया वाले भागों के रंगों में होने वाले परिवर्तनों का सावधानी पूर्वक अध्ययन किया गया।

विदेशी पद्धतियों का अध्ययन करने वाले भारतीय चित्रकारों ने प्रभाववादी शैली में भी चित्रांकन किया है। बंगाल के आरम्भिक कलाकारों में यामिनीराय ने अनेक दृश्य-चित्र प्रभाववादी शैली में बनाये थे। 

आधुनिक भारतीय दृश्य-चित्रकारों में अधिकांश ने प्रभाववादी पद्धति से चित्रण आरम्भ किया था। भारत के सुप्रसिद्ध चित्रकार हुसैन ने भी अपने आरम्भिक काल में प्रभाववाद से मिलती-जुलती विधि से अनेक दृश्य अंकित किये थे। 

बम्बई के ढोंढ तथा लखनऊ के रणवीर सिंह बिष्ट के प्रभाववादी पद्धति से बने जल रंग दृश्य-चित्र अद्वितीय हैं।

अभिव्यंजनावाद

यूरोप में बीसवीं शती का एक प्रमुख कला आन्दोलन “अभिव्यंजनावाद” के रूप में 1905-06 के लगभग उदय हुआ । इसका प्रधान प्रयोक्ता जर्मन कलाकार एडवर्ड मुंक था। 

लगभग उसी समय अभिव्यंजनावादी प्रवृत्ति फ्रांस में भी ‘फॉववाद’ के नाम से प्रचलित हुई जिसका प्रमुख कलाकार हेनरी मातिस था। जर्मनी कलाकार विषय-वस्तु पर अधिक बल देते थे जबकि फ्रेंच कलाकार चित्र के सम्पूर्ण रूपात्मक तत्वों को। 

महत्वपूर्ण मानते थे। मातिस ने कहा था कि अभिव्यंजना मुखाकृति से प्रकट होने वाले भावों अथवा उद्वेगपूर्ण मुद्राओं में न होकर सम्पूर्ण चित्र के व्यंजनापूर्ण संयोजन में होती है। 

जर्मन अभिव्यंजनावादी मनोवैज्ञानिक चरित्र-चित्रण एवं परिवेश के द्वारा अभिव्यंजना करने के पक्षपाती थे। उन्होंने प्रकृति को पूर्णतः व्यक्तिगत ढंग से चित्रित किया और अत्यन्त सहजता तथा तात्कालिकता पर बल दिया। 

विरोधी रंगों, सशक्त प्रभावों से युक्त रेखाओं आदि का उन्होंने प्रकृति की सुसम्बद्ध व्यवस्था, समाज में प्रचलित बुराइयों तथा मानवीयभावों के विस्फोटक स्वभाव- इन तीनों में परस्पर संघर्ष दिखाने के उद्देश्य से पूर्ण उन्मुक्त विधि से प्रयोग किया। 

वे अपनी बात को तीव्रतम रूप में कहना चाहते थे अतः उन्होंने प्रकृति के आदिम रूपों को माध्यम बनाया।

भारत में रवीन्द्रनाथ ठाकुर द्वारा देशवासियों को सभी स्रोतों से प्रेरणा लेने तथा विश्व में अर्जित ज्ञान और अनुभवों द्वारा स्वयं को समृद्ध बनाने का परामर्श देने के फलस्वरूप इण्डियन सोसाइटी आफ ओरियण्टल आर्ट द्वारा सन् 1922 में कलकत्ता में बौहौस कलाकारों की एक चित्र प्रदर्शनी लगायी गयी। 

इसका भारतीय कलाकारों पर व्यापक प्रभाव पड़ा। प्रगतिशील विचारों वाले जो कलाकार ‘केवल स्वदेशी’ अथवा केवल परम्परागत भारतीय’ के विरोधी थे उन्होंने भी इस विदेशी कला-प्रवृत्ति का स्वागत किया।

भारत में फॉव कला की प्रेरणा सर्वाधिक प्रबल रूप में शैलोज मुखर्जी की कृतियों में मिलती है। जब वे पेरिस गये थे तो हेनरी मातिस से मिले थे और उसके प्रभाव से उनक चित्रों में सपाट धरातल, लम्बी आकृतियाँ, व्ययंजनापूर्ण रेखाओं क्या रंगों का ताजगीपूर्ण प्रयोग हुआ। 

अमृता शेरगिल की कला में पर्याप्त अभिव्यंजना है किन्तु उनकी शैली पर अजन्ता का भी प्रभाव है। पश्चिम भारत के अन्य कलाकारों को जर्मन अभिव्यंजनावाद का परिचय बम्बई के माध्यम से मिला। 

बम्बई में कुछ विदेशी अभिव्यंजनावादी कलाकार सक्रिय थे जिनमें श्लेसिंगर, लीडन बन्धु (रुडीवान लीडन तथा लौलीवान लीडन) तथा वाल्टर लॅगहेमर प्रमुख थे। 

श्लेसिंगर कला-संरक्षक के समान आदरणीय समझे जाते थे। उनके द्वारा लिखी गयी कला-सम्बन्धी पुस्तकों ने उस समय यूरोप की अनेक नई बातों से भारत के कला जगत को परिचित कराया था। लीडन टाइम्स आफ इण्डिया में थे और समय-समय पर कला-विषयक लेख भी लिखते रहते थे। 

लगहेमर इलस्ट्रेटेड वीकली में कला-निर्देशक थे और उनके घर कलाकारों का जमघट लगा रहता था। अनेक कलाकरों ने उनसे कला का मर्म सीखा था और उन्हें गुरु मानते थे। इन विदेशी कलाकारों ने भारत में अभिव्यंजनावाद के प्रचार का प्रयत्न किया। 

भारतीय कलाकारों ने अभिव्यंजना की दृष्टि से रंगों के प्रयोग को महत्वपूर्ण माना और तूलिकाघातों द्वारा भी चित्र में एक प्रकार की धरातलीय (Textural) संगति उत्पन्न की जाने लगी इसकी भी अभिव्यंजनात्मक दृष्टि से रचना की जाने लगी। 

चालीस और पचास के दशकों (1941 1960) में यह प्रभाव विशेष रहा। 1940 के लगभग भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष को दबाने में अंग्रेजों ने पाशविक शक्ति का नृशंसता से प्रयोग करना आरम्भ कर दिया, बंगाल में भयंकर दुर्भिक्ष पड़ा, देश के विभाजन, साम्प्रदायिक दंगों और कई करोड़ शरणार्थियों के आगमन ने लोगों का हृदय हिला दिया। 

इन सामाजिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक परिस्थितियों ने कलाकारों को भावों का ज्वार रोकने में असमर्थ कर दिया। प्रतीकवाद और रहस्यवाद के छलावे को छोड़कर तथा सहज मानवीय सहानुभूति से प्रेरित होकर भारत के अनेक कलाकारों ने समाज की समस्याओं और इन नर्थी विकृतियों को सशक्त रूपों में चित्रित किया। 

फुटपाथों पर जीवन बिताने वाले दीन-हीनों, मानवीय पीड़ा और निराशा, राक्षसी क्रूरता, छटपटाहट तथा मानव चरित्र की उद्दाम प्रवृत्तियों आदि को व्यक्त करने वाले कलाकारों में रवीन्द्रनाथ ठाकुर ( ब्रूडिंग), रामकिंकर (मातृत्व), के० सी० एस० पनिक्कर (पेवमेण्ट ड्वेलर्स), रामकुमार (टाउन), सतीश गुजराल (डेसोलेशन), फ्रांसिस न्यूटन सूजा (बार्सीलोना), अविनाशचन्द्र (जंगल) आदि प्रमुख हैं जिन्होंने गहरे-गहरे रंगों का ही प्रयोग नहीं किया है बल्कि तनावपूर्ण रेखा आदि के द्वारा दबी हुई मन की शक्तियों को भी बन्धन-मुक्त किया है। इन चित्रों में गर्भवती महिलाओं की मार्मिक वेदना और यातना, आधुनिक शहरों के विषाक्त होते हुए वातावरण, गरीबों के अव्यवस्थित जीवन तथा सामाजिक जीवन के घृणित पक्षों आदि को दर्शकों को झकझोर देने वाले रूपों में प्रस्तुत किया गया है। 

चित्रों में रेखा, रंग, धरातलीय प्रभाव आदि की विकृतियों तथा चित्रों के सम्पूर्ण व्यंजनात्मक संयोजन की दृष्टि से नन्दलाल बसु (माँ और शिशु), शैलोज मुखर्जी (वन में श्रृंगार), अकबर पदमसी (नारंगी) अनावृता), नारायण श्रीधर बेन्द्रे (पूरक रंगों में भैस तथा सारस), तथा गुलाम रसूल सन्तोष (लेटी हुई अनावृता) आदि भी सुन्दर उदाहरण हैं। 

विषय-वस्तु की सीमा में रहकर भारतीयता को अक्षुण्ण रखने का प्रयत्न के०के० हैब्बार (महाबलेश्वर, कविता का जन्म, बाजार जाते ग्रामीण एवं मुर्गो की लड़ाई) तथा मकबूल फिदा हुसैन (सूर्योदय एवं विश्वामित्र तथा रामायण और महाभारत चित्र श्रृंखलाएँ) आदि ने किया है। इनकी शैली में भारतीय परम्परागत कलाओं तथा भारतीय साहित्य आदि का प्रभाव स्पष्ट है।

कुछ अन्य भारतीय चित्रकारों ने भारतीय अथवा ईसाई धार्मिक, पौराणिक अथवा साहित्यिक विषयों का चित्रण अभिव्यंजनावादी विधि से अथवा अभिव्यंजनात्मकता के किंचित् प्रभाव के साथ किया है। 

यामिनीराय तथा लक्ष्मण पै में रेखात्मक तथा आलंकारिक अभिव्यंजना है। के० एस० कुलकर्णी, दिनकर कौशिक, भवेश सान्याल तथा गोपाल घोष आदि में अभिव्यंजनावाद तथा शास्त्रीयतावाद के समन्वय की प्रवृत्ति है। 

सतीश गुजराल की कला में मेक्सिकन पद्धति का अभिव्यंजनावाद है जो पीड़ा, भयानकता, वीभत्सता तथा आतंक आदि की ध्वनियों से तरंगित रहता है। 

रामकुमार, कृष्ण खन्ना, ए० रामचन्दन तथा तैयव मेहता आदि की कला में रंगों तथा रेखाओं के सन्तुलित रूप में अभिव्यंजनावाद का प्रयोग हुआ है। 

इन दोनों में रंग प्रतीक के स्तर पर भी सक्रिय हैं। जेराम पटेल में दिवास्वप्न के समान अनुभूति होती है। 

कृष्ण रेड्डी, कँवल कृष्ण, देवयानी कृष्ण, जगमोहन चोपड़ा, मनु पारेा, जतीनदास, स्वामीनाथन तथा गायतोंडे भी सशक्त अभिव्यंजनाओं में समर्थ है। 

मोहन सामन्त ने भी अभिव्यंजनावादी पद्धति में अनेक चित्र बनाये है विवान सुन्दरम, सुधीर पटवर्धन, नलिनी मलानी आदि आज की परिस्थितियों को रंगों तथा मनोवैज्ञानिक स्थितियों द्वारा व्यक्त कर रहे हैं। 

गणेश पाइन ने लोककला तथा बंगला साहित्य से प्रेरणा ली है। गुलाम मुहम्मद शेख सामाजिक यथार्थवाद से जुड़ गये हैं । रामेश्वर बूटा सामाजिक व्यंग्य के लिए हिप्पी संस्कृति आदि के विषय लेते हैं। 

इस प्रकार भारतीय अभिव्यंजनावाद का मुख्य दौर गुजर जाने के बाद भी इसमें अनेक कलाकार प्रभावशाली कार्य कर रहे हैं।

घनवाद

बीसवीं शती की यूरोपीय कला में आधारभूत परिवर्तन लाने में घनवाद की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। पिकासो तथा बाक इसके प्रवर्तक थे जिन्होंने कला को साहित्यिक सन्दर्भों से पूर्णतः मुक्त किया। 

यद्यपि सेजान के प्रयोगों तथा नीग्रो मूर्तिकला की प्रेरणा से यह आरंभ हुआ था तथापि 1909 से 1914 के मध्य इसका जो विकास पिकासो तथा बाक ने किया वही महत्वपूर्ण है। 

इस युग का धनवाद ‘विश्लेषणात्मक तथा समन्वयात्मक घनवाद’ (Analytical and Synthetic Cubism) कहा जाता है। किसी निश्चित बिन्दु से खिड़की अथवा छिद्र में से दिखायी देने वाली प्रकृति के अंकन की रिनेसां युग से चली आ रही मान्यता को घनवाद ने समाप्त कर दिया। 

सपाट चित्रतल को त्रिआयामी प्रभाव देने के लिये दूर जाते तथा निकट आते परस्पर काटते हुए तलों में निकटतम और दूरस्थ स्थानों के द्वारा चित्रगत विस्तार को सीमित किया गया और एक साथ कई स्थानों से दिखाई देने वाली विभिन्न स्थितियों के अनुसार वस्तु का विश्लेषण किया गया। 

इस प्रकार वस्तु के घनत्व और विस्तार में एक नया सम्बन्ध बना। इसे विश्लेषणात्मक घनवाद कहा जाता है। समन्वयात्मक घनवाद में तल एक दूसरे के ऊपर आ जाते हैं और रंग महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

आधुनिक कला में प्रभाववादी रंग योजना के समान ही रूप निर्माण को दृष्टि से धनवाद का बहुत महत्व है। घनवाद ने वस्तुओं के आयतन की परम्परागत मान्यताओं की जड़ें हिला दीं और वस्तुओं के विभिन्न पक्षों तथा अवस्थाओं को एक साथ प्रस्तुत करने का भी प्रयत्न किया। 

ऐसा करने में इन कलाकारों को आकृतियों का अंग-भंग भी करना पड़ा जिसके कारण यूरोप के धनवादी कलाकारों को “रूप के कातिल” (Assassins) भी कहा गया है।

समझे धनवाद के प्रभाव से वस्तुओं के रूप सीधी-सीधी रेखाओं से बनाये गये अत्यन्त आवश्यक ढाँचे के समान एकदम सरल हो गये और ये सरल रूप भी सुन्दर जाने लगे। 

परस्पर आच्छादित ज्यामितीय तलों, एक साथ कई कोणों मे देखे गये संयुक्त (Composite) रूपों ने यथार्थ जगत् को एक नये ढंग से प्रस्तुत किया । 

ये विशेषताएँ मिस्र की कला, गोथिक कला, राजपूत तथा मुगल लघु चित्रों में भी थीं। भारतीय मूर्तियों में भी अतिभंग मुद्रा में आकृति का मुख, स्तन एवं नितम्ब, सब एक ही दिशा में दिखाये जाते थे।

यूरोप में धनवाद एक चुनौती के रूप में था पर भारत में इसे चुनौती के रूप में नहीं लिया गया। यही कारण है कि यहाँ यह एक सामूहिक आन्दोलन के रूप में किसी पीढ़ी में नहीं दिखायी दिया। भारतीय कलाकारों को तो इसका पूर्ण विकसित एवं परिपक्व रूप उपलब्ध हो गया था जिसकी केवल कुछ विशेषताओं को इन्होंने ले लिया। 

सर्वप्रथम गगनेन्द्रनाथ ने 1920 में अपने स्याही रेखाचित्रों में इसका प्रयोग किया। अपनी स्वप्न फन्तासी को अधिकाधिक व्यंजक बनाने में उन्होंने घनवाद का प्रयोग किया। 

उनके चित्रों के श्वेत-श्याम भाग प्रकाश छाया के साथ-साथ वस्तुओं के तलों और आयामों को भी प्रस्तुत करते हैं। वे इसके साथ-साथ अन्तराल (Space) के रहस्य को भी बढ़ा देते हैं। इसके लिये गगनेन्द्रनाथ ने सीधे ढाँचों के बजाय कर्णवत् ढाँचों का प्रयोग किया है।

जार्जकीट ने घनवाद का प्रयोग पिकासो से प्रेरित होकर 1940 में किया और भारतीय मूर्तिकला के रूपों को पिकासो के रूपों के समान केवल रेखाओं द्वारा ही बनाने का प्रयत्न किया। 

बेन्द्रे ने 1950 में समन्वयात्मक घनवाद के प्रयोग से आकृतियों बनायीं। इनमें एक प्रकार का तनाव भी है जो भारतीय शास्त्रीयता और सौन्दर्य के साथ समन्वित किया गया है। रामकिंकर ने भी 1940 के लगभग दृश्य चित्रों का घनवादी रेखांकन किया।

स्वातन्त्र्योत्तर काल में भारत के अनेक कलाकार धनवाद से प्रभावित हुए। इनमें जहाँगीर साबाबाला सर्व प्रमुख हैं। वे पेरिस में आन्द्रे ल्होते से धनवाद की शिक्षा लेने गये। 

उन्होनें भारतीय दृश्यों तथा आकृतियों को विश्लेषणात्मक घनवादी पद्धति पर आधारित किया। त्रिलोक कौल ने भी यही विधि अपनायी किन्तु उनके सम्पूर्ण कार्य, विशेषतः 1960 के आसपास के कार्य से स्पष्ट है कि उन्होंने घनवाद के सरल आरम्भिक रूप का ही प्रयोग किया है। 

रामकुमार ने बनारस के दृश्य भी घनवादी अमूर्त शैली में अंकित किये हैं पर उनमें उन्होंने अपनी एक निजी शैली विकसित कर ली है। उन्होंने भी आन्द्रे ल्होते तथा लेजे से शिक्षा ली थी।

भारत के अनेक आधुनिक चित्रकार धनवाद से प्रेरणा ले रहे हैं पर यह उनकी शेली में प्रधान विशेषता अथवा मुख्य पक्ष के रूप में नहीं है। हुसेन, शान्ति दवे, के० एस० कुलकर्णी आदि ने अपने रूपों को घनवादी शैली के आधार पर विभिन्न विधियों से विकृत किया है। ज्योति भटट तथा अकबर पदमसी आदि की कला में भी धनवादी प्रभाव है।

अतियथार्थवाद

अतियथार्थवादी कला आन्दोलन का सूत्रपात आन्द्रे ब्रेतों नामक कवि ने 1924 ई० में पेरिस में किया था। 

इसका मुख्य उद्देश्य ऐसे अचेतन विषयों को आकार देना था जो पागलपन, स्वप्न, भ्रम, प्रयत्नहीनता अथवा अचानकता की स्थिति में उत्पन्न हो जाते हैं यह कला मन की अचेतन स्थिति से सम्बन्धित है और इसमें तर्क, सौन्दर्य-सिद्धान्त अथवा नैतिकता का बिल्कुल भी स्थान नहीं है अतियथार्थवादी कला में फ्रायड के मनोविज्ञान के सिद्धान्तों की पृष्ठभूमि है एक प्रबल आन्दोलन की दृष्टि से यूरोप में यह 1925 से 1935 के मध्य विशेष लोकप्रिय रहा है। साल्वाडर डाली, में होतों, मेस्सों, माइरो तथा क्ली आदि इसके विशेष प्रसिद्ध चित्रकार थे। 

अतियथार्थवाद दो रूपों में विकसित हुआ था एक तो स्वप्न के फोटोग्राफ के समान अर्थात् कल्पित आकृतियों को इतने यथार्थवादी तरीके से बनाना कि वे फोटोग्राफ जैसी प्रतीत हों दूसरे रूप में यह बच्चों जैसी कल्पना से सम्बन्धित है, जैसे बटन तथा दियासलाई की तीलियों से मानव आकृति की कल्पना करना। 

यह आन्दोलन अत्यन्त विचित्र रूपों तथा फन्तासी के कारण सारे संसार में लोकप्रिय हुआ।

भारतवर्ष में अतियथार्थवाद का आरम्भिक संकेत रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कृतियों में मिलता है जिन्होंने अपनी वृद्धावस्था में सहज वृत्ति से परिचालित होकर अचेतन में छिपे बिम्बों को साकार किया। 

अतियथार्थवादी कला के एक अच्छे आरम्भिक चित्रकार असम के हेमन्त मिश्र रहे हैं जिन्होनें पर्वतों, चट्टानों तथा भवनों को नष्ट होते समय की अनुभूति के साथ प्रस्तुत किया है। 

अपने अनेक चित्र-संयोजनों में हुसेन भी अतियथार्थवादी भावना के निकट पहुँच गये हैं, जैसे दौड़ते हुए अश्व के साथ भूमि पर लुढ़कता बादामी सूर्य, अथवा नारी की जंघा पर बैठा गिद्ध । 

जसवन्त सिंह के अतियथार्थवादी चित्रों में डरावनापन है लक्ष्मण पे के चित्रों में नारी आकृति तथा वनस्पति के रूपों को इस प्रकार भ्रमात्मक ढंग से संयोजित किया गया है जहाँ दोनों एक प्रतीत होते हैं

ए० रामचन्द्रन की कला में कंकाल सदृश शिर-विहीन मानवाकृतियों को असम्भाव्य मानवीय क्रिया-कलापों में सलंग्न दिखाया गया है। 

द ग्रेव डिगर्स तथा ययाति आदि चित्रों में उन्होंने आकृतियों के पंख तथा पंजे आदि पक्षियों के समान लगे हुए भी दिखाये हैं। परमजीत सिंह के चित्रों में आकाश में तैरते हुए पत्थरों में भारहीनता की अतियथार्थवादी तकनीक का प्रयोग किया गया है। 

स्वामीनाथन एवं विकास भट्टाचार्य ने इस प्रकार के रूपों का अंकन किया है कि कभी वे सजीव और कभी कृत्रिम प्रतीत होते हैं और इस प्रकार उन्हें देखकर हम यथार्थ एवं अयथार्थ के मध्य झूलने लगते हैं। 

स्वामीनाथन के चित्रों से हमें समय की अनन्तता की भी एक अजीब-सी अनुभूति होने लगती है। अनुपम सूद, रनवीरसिंह कालेका और मंजीत बाबा की कला में भी अतियथार्थवादी तत्वों का प्रचुर प्रयोग हुआ है।

उक्त समस्त यूरोपीय कला-प्रवृतियों के प्रयोग की दृष्टि से भारत में कोई भी उल्लेखनीय प्रभाववादी, घनवादी, अतियथार्थवादी या संरचनावादी चित्रकार नहीं हुआ। 

अधिकांश चित्रकार अभिव्यंजनावाद की ओर झुक गये। इनमें से किसी भी शैली में किसी भारतीय कलाकार ने कोई मौलिक योगदान नहीं दिया जिसे कि उक्त शैलियों का भारत में विकसित अगला चरण माना जा सके। 

फिर भी भारतीय कलाकार अपने-अपने स्तर पर एक नई कला-भाषा के विकास का प्रयत्न कर रहे हैं। 

इस प्रयत्न में उन्होंने अपने देश के कला-स्रोतों को भी प्रयुक्त किया है जिनमें लोक कला, आदिमकला, लघुचित्र, अजन्ता एवं तान्त्रिक कला का मुख्य रूप से प्रयोग हुआ है।

लोक कला का प्रभाव

लोक कला की जिन विशेषताओं ने आधुनिक कलाकारों को प्रभावित किया है वे निम्नलिखित हैं-

1. सरल बाह्य रेखा के प्रति आग्रह । प्रतिरूपात्मकता की प्रवृत्ति ।

2. रंगों तथा घनत्व (आयामों) का सरलीकरण। छाया का अभाव । 

3. अभिव्यंजना के उद्देश्य से मुद्राओं की अतिरंजना तथा महत्व के अनुसार वस्तुओं के आकार ।

4. अभिप्रायों अथवा रूढ रूपों को आलंकारिक ढंग से विशेष रूप देने की प्रवृत्ति । 

5. रेखाओं, आकृतियों अथवा बिन्दुओं की पुनरावृत्ति द्वारा लयात्मकता की सृष्टि । लोक कला से प्रभावित आधुनिक भारतीय कलाकार-

आधुनिक भारतीय कलाकारों में यामिनी राय कालीघाट की पट-चित्र शैली से ‘प्रभावित हुए हैं। नन्दलाल बसु तथा विनोद बिहारी मुखर्जी ने लोक-जीवन के विषयों से प्रेरणा ली है। 

सपाट द्वि-आयामी आकृति तलों को रेखा द्वारा सीमित करने की प्रवृत्ति हैब्बार, चावड़ा तथा शैलोज मुखर्जी में मिलती हैं। रथीन मैत्रा तथा नीरद मजूमदार लोक शैलियों से प्रेरित हुए हैं। इन्होंने तैल माध्यम भी अपनाया है। 

1940- 50 ई0 के मध्य दक्षिण के कुछ कलाकार आलपेलकर, राजय्य, श्रीनिवासुलु तथा पैडीराजू भी लोक कला की आकृतियों से प्रभावित हुए हैं। 

अन्य कलाकार जिनमें लोक कला की खिलौनों के समान मुद्राओं तथा आकृतियों का प्रयोग हुआ है वे हैं – जे०सुल्तान अली, लक्ष्मण पै, डी० बद्री, ज्योति भट्ट, भगवान कपूर, शीला औडेन, सतीश गुजराल, देवयानी कृष्ण, सुनील माधव सेन, ब्रदी नारायण, मकबूल फिदा हुसैन, जैराम पटेल, पी० खेमराज, निवेदिता परमानन्द, कमला मित्तल, परितोष सेन, सीतेश दास गुप्ता तथ गौतम वाघेला आदि ।

आधुनिक भारतीय कला में मिथक-चेतना

कथकलि आदि लोक-नृत्यों, खिलौनों, अपभ्रंश पुस्तक-चित्रों, तथा मन्दिरों की कला के अनेक विषय प्राचीन कथानकों से सम्बन्धित हैं अतः आधुनिक कलाकारों ने प्राचीन मिथकों को आधुनिक सन्दर्भों में प्रयुक्त किया है। 

आधुनिक भारतीय कला में मिथक चेतना उत्तरोत्तर रूपान्तरित होती गयी है। सभी कलाकारों ने मिथकों का उपयोग नहीं किया है।

पौराणिक मिथकों में गणेश मंगल के और दुर्गा शक्ति की प्रतीक है। अन्य देवी-देवताओं जैसे सरस्वती, इन्द्र, हनुमान आदि का भी चित्रकारों ने प्रसंगानुसार अपनी रचनाओं में प्रयोग किया है। संहारक के रूप में शिव का भी अंकन हुआ है। 

अश्व, वृषभ, गरुड, सिंह, जटायु कपोत, मयूर एवं अन्य पक्षी आदि नियक नये युग की आवश्यकतानुरूप व्याख्या के साथ प्रयुक्त किये गये हैं। 

कृष्णाख्यान, रामायण तथा महाभारत के प्रसंगों का भी आधुनिक कलाकार नये अर्थों में चित्रण कर रहे हैं। नये तकनीक भी प्रयुक्त किये जा रहे हैं।

रामायण, महाभारत तथा भागवत के आधार पर नये दृष्टिकोण से चित्र बनाये जा रहे हैं। हुसैन का भीष्न की शर-शैय्या, शैल चोयल का जरासन्धवध एवं अर्जुन जाना का गोवर्धन-धारण इस दृष्टि से उल्लेखनीय चित्र हैं। 

माधव घोष ने द्यूत में हारे पांडवों को क्रूसीकृत चित्रित किया है। पी० जयरामन ने पूतना वध का चित्रण वडे ही अद्भुत तरीके से किया है। 

सृष्टि के आरम्भ में सागर के आलोड़न से उत्पन्न विष, (समुद्र मन्थन से उत्पन्न विष) को शिव द्वारा पी जाने और पूतना के विष को कृष्ण द्वारा पी जाने के पौराणिक मिथकों का समन्वय करने वाले इस चित्र स्तन के में अन्धकार से घिरे जल में विशाल गुब्बारों की भाँति उठे पूतना के स्तन इतने फूल गये हैं कि ये फटने ही वाले हैं उनमें आन्तरिक उद्वेग की कम्पन युक्त लहरें तथा विष चूसते हुए बालकृष्ण का अत्यन्त प्रभावपूर्ण अंकन है ।

आधुनिक कला में धार्मिक प्रवृत्ति अभी भी विद्यमान है। रंगास्वामी सांरगन तथा रेडप्पा नायडू आज भी गरूड़, विष्णु, रावण का कैलास उठाना आदि विषयों का अंकन करते हैं। 

मधु गुप्ता ने कृष्ण के श्रृंगारिक पक्ष के साथ-साथ गीता के गम्भीर पक्ष को भी लिया है।

कला को किसी-न-किसी मिथक की आवश्यकता होती है यूरोप की कला शताब्दियों तक ईसा के मिथक पर आधारित रही।

भारतीय कला भी प्राचीन युगों में जैन, बौद्ध, शैव तथा वैष्णव मिथकों से अनुप्राणित होकर महान् और अद्भुत रूपों को जन्म दे सकी। 

किन्तु आज मिथक-विश्वास समाप्त होते जा रहे हैं। पुराने मिथकों में यंत्र-युग की समस्याएँ प्रस्तुत नहीं की जा सकतीं। सम्भवतः आज की आवश्यकता के अनुरूप नये मिथकों को जन्म लेना होगा। 

आधुनिक भारतीय कला में मिनिएचर तत्व

मिनिएचर (लघु-चित्रण) मध्यकालीन भारतीय चित्रकला का एक मनोरम सोपान है। 

पहले ताडपत्रीय पोथियों और फिर कागज पर जो चित्र रचना आरम्भ हुई उसमें एक ओर वर्णाढ्यता तथा दूसरी ओर रेखा प्रवाह का अप्रतिम सौन्दर्य है भारतीय लघु-चित्रण के विकास के तीन चरण हैं पहला अपभ्रंश, दूसरा राजस्थानी और तीसरा मुगल-पहाड़ी। 

यहाँ हम केवल तकनीकी दृष्टि से विचार कर रहे हैं अतः विषयवस्तु, कलाकार की भावना अथवा हिन्दू-मुस्लिम दरबारी आश्रय आदि का हमारे सम्मुख कोई प्रश्न नहीं है।

लघु चित्रण का पहला रूप अपभ्रंश शैली में अपने समस्त सौन्दर्य के साथ प्रस्फुटित हुआ था। 

रंगों के बलों की दृष्टि से इसमें कोई प्रयोग नहीं किये गये केवल उपलब्ध आधारभूत रंग सामग्री- गेरु, प्योड़ी, गुलाली, सिंगरफ, काजल, नील, सुवर्ण रजत तथा सफेदा से ही प्रायः चित्र बनाये गये और सपाट रंग भरे गये। 

इनकी वर्णादयता देखते ही बनती है। आकृतियों में अत्यन्त सरलीकृत विवरण तथा मुद्राएँ और सपाटेदार रेखांकन, जिसमें कलाकार का स्नायविक व्यवहार (Nervous behavior) स्वतः ही व्यंजित होता है, इस कला की अन्य महत्वपूर्ण विशेषता है। 

इस कला की मिथ्या-विश्वास (Make Believe) की स्थिति आधुनिक कला के पर्याप्त निकट है।

लघु-चित्रण का दूसरा रूप राजस्थानी शैली में प्रकट हुआ । इसमें रंग-योजनाएँ कुछ अधिक विस्तृत हुई और लोक शैलियों का प्रभाव भी आया। 

किन्तु अपभ्रंश शैली की तुलना में इसमें परिष्कार हुआ। फिर भी इसकी रंग-योजनाओं में पर्याप्त आकर्षण और रेखांकन में यथेष्ट सप्राणता है। 

अपभ्रंश शैली की तुलना में इसकी शैली के ओज में कमी आयी है। मुगल कला के प्रभाव से इसके कई ठिकानों में अभ्यासपूर्ण बारीकी बहुत बढ़ गयी है। 

चित्र-तल का ज्यामितीय विभाजन भी राजस्थानी शैली की एक प्रमुख विशेषता है।

मुगल शैली का तकनीक पर्याप्त श्रम-साध्य था। सांस रोक कर रेखांकन करना, कलाकार के मस्तिष्क पर मुगल आश्रयदाता के मानसिक दबाव के कारण कृत्रिम उपायों जैसे बारीक रेखांकन, रंगों के बहुत से बल निर्मित करना, सादृश्य, प्राकृतिक परिप्रेक्ष्य के अनुसार यथार्थतापूर्ण अंकन आदि पर पर्याप्त ध्यान दिया गया। 

साथ ही आश्रयदाता की रूचि भी कला-शैली के विकास पर हावी रही। 

चित्रों में इतनी सूक्ष्मता से कारीगरी की गयी है कि कभी-कभी कोरी आँख से वह दिखाई नहीं देती भाव को अत्यन्त संयत ढंग से दिखाया गया है जिससे आकृतियों की स्वतंत्रता समाप्त हो गयी है। 

संक्षेप में, मुगल कला में से ओज निकल गया है, वह उत्साह निकल गया है जो आकृतियों को सप्राण रेखांकन और ओजपूर्ण चित्रण देता है।

तकनीकी दृष्टि से पहाड़ी शैली में भी यही दुर्बलता है चाहे विषय कुछ व्यापक हो गये हों, चाहे मुद्राओं और चेष्टाओं में कुछ स्वतंत्रता आ गयी हो पर हल्के रंग और बारीक सधा हुआ रेखांकन यहाँ भी मुगल शैली के समान ही है। 

रंगों की दृष्टि से तो कुछ आलोचकों ने इसे रंगे हुए रेखाचित्रों (Coloured Drawings) की श्रेणी में रखा है।

आधुनिक भारतीय चित्रकला के पुनरुत्थानकालीन युग में हैवेल तथा अवनीबाबू मुगल शैली से विशेष प्रभावित हुए, यद्यपि राजपूत शैली के भी कुछ चित्र उनके पास थे चीन, जापान के सम्पर्क से कोमल रंगों और सधी हुई महीन रेखाओं की ओर ही बंगाल शैली का विकास हुआ जिसकी पर्याप्त आलोचना भी हुई जिन चित्रकारों के सामने अपने शासक की इच्छा ही सर्वोपरि थी और शासकों का आतंक उनके मन पर छाया रहता था ऐसी मुगल कला की प्रेरणा भारत के स्वतंत्रता संग्राम को क्या सन्देश दे सकती थी। 

फिर भी मिनिएचर कला की कुछ तकनीकी विशेषताएँ बंगाल शैली के कई कलाकारों में महत्वपूर्ण है जैसे टेम्परा रंगों का प्रयोग, कांगज पर लघु आकार के चित्रों की रचना, चित्रांकन में आकृतियों तथा वस्तुओं के विवरणों का आवश्यकतानुसार महत्व आदि। 

इन विशेषताओं का महत्व हमारी समझ में तब अधिक आता है जब हम ब्रिटिश सरकार द्वारा स्थापित कला-विद्यालयों और यूरोपीय कलाकारों द्वारा भारत में केनवास पर तैल-चित्रण के प्रचार-प्रसार का प्रयत्न और उसकी बढ़ती हुई लोकप्रियता को देखते हैं। 

बंगाल शैली के कलाकारों का लघुचित्रण की ओर यह कदम मूलतः पश्चिमी कला तकनीक के विरोध स्वरूप था। बंगाल शैली के अनेक चित्रकारों में चमकदार रंग-योजना, लयात्मक रेखा तथा चित्र-तल का ज्यामितीय विभाजन मिल जाता है।

बंगाल शैली के पश्चात् यामिनी राम आदि ने लोक कलाओं से प्रेरणा ली और उनके ओज एवं सरलता को अपनी शैली में गुम्फित किया। 

पश्चिम भारत के कलाकारों के सामने अपने क्षेत्र की प्राचीन कलाओं का भण्डार था यूरोप के चित्रकार अपनी शैलियों के विकास के लिए अफ्रीका तथा ताहिती आदि भूमध्य सागरीय द्वीपों के आदिवासियों की कला से प्रेरणा ले रहे थे। 

पिकासो आदि प्राचीन यूनानी रोमन शास्त्रीय कला तथा अफ्रीकन नीग्रो कला का समन्वय करते हुए अपनी शैलयों का विकास कर रहे थे। 

ऐसे युग में भारतीय कलाकारों ने भी अपने देश के प्राचीन स्रोतों को देखा मुगल कला की तुलना में उन्हें राजस्थानी शैली और अपभ्रंश शैली अधिक सप्राण लग और उन्होंने इन्हीं से प्रेरणा लेना आरम्भ कर दिया। 

पश्चिम भारत में प्रचलित अपभ्रंश शैली को गुजराती शैली भी कहा जाता था अतः आरम्भ में कुछ चित्रकारों को “नव गजराती शैली” के चित्रकार भी कहा गया। 

लघु-चित्रण के शैलीगत तत्वों, वर्णादयता. ओजपूर्ण सपाटेदार रेखांकन, चित्रतल का ज्यामितीय विभाजन तथा आवश्यकतानुसार विवरणों का बारीकी से अंकन को, “आधुनिक” अनुभूति के रूप में ग्रहण किया गया है। 

अप्रभंश तथा आरम्भिक राजस्थानी शैली के समान कहीं-कहीं छाया-प्रकाश और गढ़न-शीलता को भी छोड़कर सपाट रंगों में चित्रण किया गया है। 

इन विशेषताओं को भारतीय चित्रकला में प्राप्त “आधुनिक” अनुभूति के रूप में लेने से ये परम्परा के अनुकरण से मुक्त हो गयी हैं। 

इस प्रकार की प्रवृत्ति के प्रमुख कलाकार है हुसन, हेब्बार, सामन्त, लक्ष्मण पै. गुलाम मुहम्मद शेख, शैल चोयल आदि, जिनकी कला में प्रायः सपाट रंग, छाया का अभाव, सशक्त रेखांकन, चमकदार वर्ण योजना तथा टेम्परा माध्यम की प्रधानता है। 

कहीं-कहीं लघु चित्रों जैसी आकृति योजना तथा अलंकरण प्रवृत्ति भी मिलती है। तेल माध्यम में भी इस पद्धति से कार्य हुआ है। हुसन ने रामायण और महाभारत के चित्रों में विशेष रूप से लघु-चित्र शैली से प्रेरणा ली है मोहन सामन्त की आकृतियाँ तथा रंग सभी मिनिएचर ढंग के हैं। 

रेखांकन के उपरान्त वे वाश द्वारा रंग भरते हैं। राजस्थान के चरण शर्मा, शैल चोयल और प्रभा शाह आदि ने मिनिएचर शैली की वास्तुशिल्पीय पृष्ठ भूमि को अपने चित्रों में नये संयोजनों में अंकित किया है किन्तु उनमें आधुनिक भाव नहीं है।

भूपेन खक्खर के चित्रों में स्वचालित वाहनों (मोटरों, बसों, स्कूटरों, साइकिलों), शहरी भवनों तथा बिजली के खम्भों आदि का लघुचित्रों के समान सरलीकरण तथा अंकन हुआ है; किन्तु वे आकृतियों के विवरणों के बजाय प्रभाव पर अधिक ध्यान देते हैं और केवल चित्र के विषय के अनुसार महत्वपूर्ण आकृतियों के ही आवश्यक विवरण अंकित करते हैं, समस्त विवरणों को नहीं। चित्र के केन्द्रीय भाग में अधिक प्रकाश दिखाकर वे दर्शक का ध्यान उधर ले जाते हैं। मिनिएचर कला में यह कार्य रंगों द्वारा किया जाता था।

गुलाम मोहम्मद शेख भी इसी प्रवृत्ति के एक अन्य कलाकार हैं जिनके चित्र मिनिएचर ढंग के हैं ये भी आकृतियों के सरलीकरण तथा केवल आवश्यक विवरण अंकित करने में दिलचस्पी रखते हैं। 

इनके तैल माध्यम में अंकित चित्रों के भवनों में जहाँ विभिन्न रंगों द्वारा तलों को पृथक् किया गया है वहीं आकृतिगत विवरणों में रेखात्मकता का आश्रय लिया गया है।

फन्तासी | Fantasy

भारत की आधुनिक कला में फन्तासी (Fantasy) का प्रयोग भी बढ़ चला है। इसमें यथार्थ और कल्पना की मिली-जुली स्थितियाँ जैसे लटकती गुड़िया, तैरते पत्थर, अत्यन्त चमकीले रंग, स्वप्निल दृश्य, भयानक आकृतियाँ और भयानक वातावरण, परीलोक, गाड़ी और कुर्सियों, वृक्ष और पुष्प, अण्डों के सिर सहित मानव तथा रहस्यमय सीढियाँ आदि चित्रित की जा रही हैं

इन चित्रों में नेत्र अनुरंजनकारी प्रभाव तो है ही, साथ ही मन को झकझोर देने वाला तत्व भी है जिसमें रोमांस तथा दिवास्वप्न जैसे अनुभव हैं। इसकी बिम्ब-योजना सांकेतिक होती है। 

इस प्रकार के चित्रों में अंकित मनःस्थिति वास्तव में होती नहीं है पर हम ऐसी मनःस्थिति की इच्छा करने लगते हैं। 

विकास भट्टाचार्य, परमजीतसिंह, गणेश पाइन, लक्ष्मा गौड, रामानुजम्, जोगेन चौधरी तथा अर्पिता सिंह में इस प्रवृत्ति की प्रमुखता देखी जा सकती है।

रचना – सामग्री की विविधता

आधुनिक कला में माध्यमों तथा रचना सामग्री की दृष्टि से भी बहुत विविधता है। जल, टेम्परा, वाश, तैल, पेण्टल आदि के अतिरिक्त विभिन्न वस्तुओं को चिपका कर कोलाज बनाये जा रहे हैं। 

कहीं-कहीं बहुत गाढ़ा रंग थोपा जा रहा है। प्लास्टर, मिट्टी, मोम, लुगदी आदि से आकृतियों को उभार देकर रंगा जा रहा है। थर्मोकोल पर भी उभारदार चित्र बनाये जा रहे हैं। 

लकड़ी के धरातल पर विविध प्रकार की धातुओं, प्लास्टिक के टुकडों तथा टेराकोटा टाइलों को लगाकर भी चित्र का रूप दिया जा रहा है। 

धातुओं को पीटकर रिलीफ का प्रभाव उत्पन्न किया जा रहा है। इस प्रकार सामग्री प्रयोग की दृष्टि से आधुनिक भारतीय कला में कोई बँधी बँधाई परिपाटी नहीं रह गयी है। 

जैराम पटेल लेमिनेटेड लकड़ी को स्थान-स्थान पर ब्लो-टार्च से जला कर चित्र बनाते हैं। सतीश गुजराल ने काष्ठ की पतली-लम्बी पट्टियों को जोड़कर चित्र तल बनाकर उसे जलाकर विशेष प्रकार के प्रभाव उत्पन्न करने की एक अन्य विधि भी विकसित की है। 

वे इसे रासायनिक घोल से सुरक्षित करके रंग ही नहीं लगाते बल्कि इसे सुवर्ण-पत्रों आदि से भी अलंकृत करते हैं। हुसैन विभिन्न मोतियों तथा माणिक्यों आदि को चारों ओर किसी विशेष कलात्मक आकार में अलंकृत करते हैं। 

रंगों के साथ-साथ केनवास पर धागे भी चिपकाये जा रहे हैं। कागज की लुगदी तथा रेशम के चिथड़ों से भी चित्र बनाये जा रहे हैं। 

ग्राफिक माध्यमों में लिनो, बुडकट, ड्राई पाइण्ट, अम्लांकन, उत्कीर्णन, छापा तथा मेजोरिण्ट आदि विधियों के साथ-साथ बंधेज एवं बाटिक की रंगाई, लेस वर्क, टेपेस्ट्री आदि का मुक्त प्रयोग हो रहा है। 

कला के तत्वों तथा सामग्री का महत्व बढ़ जाने से कलाकार नई-नई सामग्री के परीक्षण और प्रयोग की ओर प्रोत्साहित हुए हैं। 

तान्त्रिक प्रवृत्ति

प्राचीन भारत में गुप्त रहस्यात्मक सिद्धि की क्रिया का नाम तन्त्र था। इसके तीन अंग थे : यन्त्र, मन्त्र और तन्त्र । किसी ताम्रफलक अथवा कपड़े, कागज, ताडपत्र आदि पर रेखात्मक आकृति (Diagram) बनाकर सामने रख ली जाती थी। 

इसमें ज्यामितीय अमूर्त रूप, प्राकृतिक चिन्ह जैसे कमल, सूर्य, चन्द्र आदि मानवीय रूप जैसे मिथुन आकृति आदिः शक्ति, चामुण्डा आदि की तान्त्रिक आकृतियाँ आदि चित्रित या रेखांकित होती थीं। 

इन चित्रात्मक फलकों को यन्त्र कहा जाता था। इन्हें सामने रख कर विभिन्न प्रकार की पूजा-उपासना, मन्त्रों का उच्चारण आदि किया जाता था और इस समस्त क्रिया-कलाप से किसी कार्य की सिद्धि की जाती थी । 

इस सबको ही प्राचीन भारत में तन्त्र कहते थे भारतीय कला के अध्येताओं ने इस प्रकार की समस्त प्राचीन कला-मूर्ति, चित्र तथा अलंकरण को तान्त्रिक कला का नाम दिया है। 

प्राचीन भारतीय धर्म-साधना तथा दर्शन में भी इसका महत्व रहा है। मुख्य रूप से शैव, शाक्त तथा बौद्ध उपासना पद्धतियों में तन्त्र का पर्याप्त प्रचार रहा है। 

इससे यह स्पष्ट है कि तान्त्रिक कला कोई कलाशैली न होकर सिद्धि का एक साधन मात्र थी और अपने-अपने युगों में प्रचलित कला- शैलियों के चित्रकार एवं मूर्तिकार तान्त्रिक साधकों की आवश्यकतानुसार कला-कृतियाँ बनाते थे।

जिस प्रकार पश्चिमी देशों के कलाकार विभिन्न स्रोतों से प्रेरणा लेकर अपनी कला- शैलियों का विकास कर रहे हैं उसी प्रकार आधुनिक भारतीय चित्रकार भी देश-विदेश की विभिन्न युगों की कला शैलियों के समन्वय में लगे हुए हैं। 

अपभ्रंश शैली में फारसी तत्वों का समन्वय हुआ था। मुगल शैली ने यूरोपीय परिप्रेक्ष्य तथा छाया-प्रकाश को प्रयुक्त करने का प्रयत्न किया था। 

अवनीन्द्रनाथ ठाकुर ने चीनी- जापानी कला के तत्वों का भारतीय मुगल लघु-चित्रण शैली के साथ समन्वय किया था अमृता शेरगिल ने लघु-चित्रण तथा अजन्ता की शैली के साथ पश्चिमी आ निक कला का समन्वय किया था। 

यामिनी राय ने लोक कला से प्रेरणा ली थी और उससे प्रेरित होकर अनेक चित्रकारों ने लोक कलाओं तथा लघुचित्रों से प्रेरणा लेकर अपनी शैलियों को संजोया भारत के अधिकांश चित्रकार यूरोपीय शास्त्रीय कला, यथार्थवाद, प्रभाववाद तथा अभिव्यंजनावाद से प्रेरित हुए। 

उसके पश्चात् घनवाद की प्रेरणा का दौर आया। इसमें कलाकार अमूर्त ज्यामितीय रूपों की ओर उन्मुख हुए। 1960 के आसपास भारतीय कला के अमूर्तन की ओर बढ़ने के साथ ही तान्त्रिक दला की प्रेरणा का भी आरम्भ हुआ। 

इसकी प्रेरणा ज्यामितीय अमूर्त आकृतियों में निहित प्रतीकता से आरम्भ हुई थी किन्तु इसके साथ तान्त्रिक शब्द जुड़ते ही कई प्रकार के प्रतीकों का इस कला में प्रयोग होने लगा और यह विशुद्ध अमूर्त शैली का आन्दोलन न रह कर दार्शनिक प्रतीकात्मक रूप में अधिक विकसित हुआ कलाकृतियों में प्रयुक्त प्रतीकों की व्याख्या ही शैली की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हो गयी। 

भारतीय कला के प्रत्येक आधुनिक आन्दोलन के साथ विदेशी प्रेरणा का बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह लग गया था। 

भारतीय कला के विदेशी ग्राहक अधिक है अतः विशुद्ध भारतीय आधारों से प्रेरित होने वाली कला शैली के रूप में उस नयी प्रवृत्ति का विकास हुआ जिसे आरम्भ में तांत्रिक कहा गया। 

पर ये कलाकार न तो प्राचीन तांत्रिकों की भाँति साधक है और न ही इनके द्वारा बनायी गयी कलाकृतियों का योग अथवा तंत्र साधना में कोई प्रयोग ही किया जा रहा है। 

अतः इसे “नव तांत्रिक” कला कहना ठीक समझा गया। ये कलाकार प्राचीन तान्त्रिक कला में प्रयुक्त होने वाले सृष्टि-प्रतीकों जैसे नाद-बिन्दु, कमल-वज्र, सूर्य-चन्द्र, ऊँकार, ही, क्लीं, श्री. सूर्य, कुण्डलिनी, पद चक्र, नेत्र, प्रभा-मण्डल, अक्षमाला, श्रीयन्त्र, त्रिशूल, मण्डल, ज्यामितीय रूप जैसे त्रिभुज, त्रिभुज-युग्म, वर्ग, शिशिरित वर्ग, पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि तथा आकाश के प्रतीक चिन्हों वृत्त आदि तथा जैव रूपों जैसे नर नारी की मिथुन आकृति, नेत्र एवं 4 लिंग योनि आदि के प्रतीक चिन्हों को विशेष विधि से संयोजित करते हैं। 

इनका लक्ष्य किसी अमूर्त शैली का विकास न रहकर केवल तांत्रिक प्रतीकों को अपने ढंग से प्रस्तुत करना मात्र रहा है।

आरम्भ में लक्ष्मण पै तथा नीरद मजूमदार आदि ने अपने चित्रों के शीर्षक तान्त्रिक पद्धति के आधार पर रखे। 

यद्यपि इनका तंत्र-साधना से कोई सम्बन्ध न था पर आकृतियों का संयोजन कुछ इस प्रकार से किया गया था कि चित्रों के तान्त्रिक होने का भ्रम होता था जैसे लक्ष्मण पै के “मानवाकृतियाँ” शीर्षक चित्र में पुरुष तथा नारी मुखाकृतियाँ पचभुज, त्रिभुज आदि के समन्वय से अंकित की गयी हैं, मस्तक पर तांत्रिक त्रिकुटी के समान त्रिपुष्प अलंकरण है। 

नीरद मजूमदार ने कला को अनुष्ठान मूलक मानते हुए 1957 के आसपास प्रतीकात्मक ज्यामिति के आधार पर चित्रों की रचना की. साथ ही दैवाकृतियों के चित्रों में देवनागरी मंत्रों को समस्त चित्र के अन्तराल में पृष्ठ भूमि के रूप में संयोजित किया। 

1960 में सूजा ने ब्रिटेन से प्रकाशित होने वाली पत्रिका “स्टूडियो में पश्चिमी अमूर्तकला और भारतीय तान्त्रिक कला के अन्तः सूत्रों की ओर संकेत किया। 

लगभग इसी समय जगदीश स्वामीनाथन ने ॐ, स्वस्तिक, कमल, लिंग, सर्प तथा हाथ की छाप को लेकर प्रतीकात्मक चित्रण आरम्भ किया और इनकी अपने ढंग से दार्शनिक व्याख्या की इसके पश्चात् वे काल्पनिक ज्यामितीय चित्रण करने लगे जिसमें बड़े-बड़े ज्यामितीय क्षेत्रों में अलग-अलग रंग भरे होते थे। 

इन्हें उन्होंने “अन्तरिक्ष की वर्ण-ज्यामिति (Colour-geometry of space) कहा है। स्वामीनाथन के इसी कलात्मक दौर को नव-तांत्रिक कला-प्रवृत्ति के संदर्भ में देखा गया है।

1960 के आस-पास वीरेन दे पहले कलाकार थे जिन्हें निःसंकोच ‘नव-तांत्रिक” कहा गया था। 

आकृति-मूलक रचनाएँ करने के उपरान्त ये ‘मण्डल’ चित्रित करते हुए अमूर्त रूपों की ओर उन्मुख हुए उन्होंने वर्गों तथा वृत्तों का ही अंकन किया है तथा उनकी ज्यामितीय आकृतियों अथवा रंगों का कोई दार्शनिक प्रतीकात्मक अर्थ नहीं है। 

वीरेन दे के चित्रों में रंगों की ऊर्जा तांत्रिक चित्रों से बहुत अधिक है और वे मानों चित्र के केन्द्र से चारों ओर फैल जाना चाहते हैं। इनमें विस्फोट अथवा विकिरण (Radiation) जैसा प्रभाव है।

के० सी० एस० पणिक्कर ने प्राचीन पाण्डुलिपियों के प्रभाव में कुछ ऐसे चित्र अंकित किये हैं जिनमें आज समझ में न आ सकने वाली किसी गुप्त प्राचीन लिपि में मानों कोई रहस्य लिखा हो। 

इसके साथ ही कुछ ज्यामितीय चिन्ह जैसे त्रिभुज, षटभुज, अर्धचन्द्र वृत्त एवं वर्ग आदि स्थान-स्थान पर रेखात्मक रीति से अथवा रंग भरे हुए भी अंकित रहते हैं। 

चित्र देखने से ऐसा लगता है मानों किसी तांत्रिक ग्रंथ हो । का कोई हस्तलिखित पृष्ठ हो। लिपि मूलक रेखीय आकृतियों में रेडप्पा नायडू ने भी पवित्र आकृतियाँ अंकित की है। 

पी०टी० रेड्डी पहले श्रृंगारपूर्ण मिथुनों का अंकन करते थे, तत्पश्चात् वे लिंग योनि का प्रतीकात्मक चित्रण करने लगे जो अमूर्त परस्पराच्छादित तत्वों के रूप में दिखायी देते हैं। 

उनके चित्रों में लोक-कला तथा ‘धार्मिक आकृतियों का संयोजन भी कुछ इस प्रकार हुआ है कि ये तांत्रिक जैसी लगती हैं। 

चित्रकार पलसीकर ने भी तांत्रिक मंत्रों, अक्षरों तथा त्रिशूल, नेत्र आदि चिन्हों को सपाट रंगों के धरातलों पर आड़ा-तिरछा संयोजित करके आधुनिक कलाकृतियाँ निर्मित की हैं। 

चित्र के किसी कोने में कोई तांत्रिक यन्त्र (Diagram) भी अंकित रहता है पर इन चित्रों में कोई रहस्य नहीं है, केवल संयोजन मात्र है।

गुलाम रसूल सन्तोष ने अपनी कला के विकास के मध्य युग में अमूर्त शैली की ओर कदम रखा। वे रेखा, रंग तथा अमूर्त रूप के द्वारा किसी अन्तरंग अनुभूति अथवा मनःस्थिति को प्रत्यक्ष करने का प्रयत्न करते हैं। 

पुरुष तथा प्रकृति को उन्होंने प्रतीकों में प्रस्तुत किया है। अनेक चित्रों में अन्धकार तथा प्रकाश युक्त अमूर्त रूपों का संयोजन कुछ इस प्रकार से हुआ है मानों मन के किसी गहरे ज्वालामुखी में से वृत्त, त्रिभुज, आयत, अर्धवृत्त और अन्य अनेक ज्यामितीय रूप निकल कर बाहर आ रहे हों और किसी अज्ञात स्रोत से आने वाले प्रकाश में चमक रहे हों।

उपर्युक्त नव तान्त्रिक कलाकारों में एक और महत्वपूर्ण नाम जुड़ गया है सतीश गुजराल का। 

1975 ई० के आरम्भ में गुजराल ने अपनी नव-तान्त्रिक कलाकृतियों की प्रदर्शनी अमेरिका में आयोजित की थी इसे नय-तान्त्रिक कला की सबसे अधिक प्रभावशाली प्रदर्शनी माना गया है। 

सतीश गुजराल की तान्त्रिक कृतियाँ आधुनिक यंत्रों से प्रभावित हैं। उनका विचार है कि तन्त्र-साधना में शक्ति के रहस्यों को समझने और अनुभव करने का साधन प्राचीन यन्त्र थे आज के औद्योगिक युग में ये यंत्र बदल गये हैं। 

अतः तान्त्रिक लक्ष्यों को हमें आज इन्हीं आधुनिक यंत्रों (मशीनों) के संदर्भ में समझना चाहिये। 

गुजराल की लीला, बिन्दु, सहस्रार, माया, मध्यमा अथवा गणेश आदि शीर्षकों से युक्त इन कला-कृतियों में (जो सुन्दर फर्नीचर अथवा शो-पीस के ढंग पर निर्मित की गयी हैं) आधुनिक मशीनी बिम्बों के माध्यम से सृष्टि के कुछ रहस्यों की व्याख्या का प्रयत्न किया गया है जिनके लिए पहले तन्त्रों में ज्यामितीय एवं मानवीय आकृतियों से युक्त यंत्रों (Diagrams) का प्रयोग किया जाता था।

भारत की नव तांन्त्रिक कला से बालकृष्ण पटेल, दीपक बनर्जी, के० बी० हरिदासन्, होमी पटेल तथा प्रभाकर बर्वे एवं सूजा आदि का नाम भी जुड़ा हुआ है। नव तांत्रिक कलाकारों में दो नाम विशेष महत्वपूर्ण हैं. गुलाम रसूल सन्तोष तथा सतीश गुजराल ।

ग्राफिक कलाएं

ग्राफिक कलाएँ उन छापा-चित्रों (प्रिण्ट्स) से सम्बन्धित हैं जिनमें किसी ‘वस्तु’ की ‘छाप’ के द्वारा एक जैसे कई छापा-चित्र प्राप्त कर लिये जाते हैं। 

प्रागैतिहासिक युग में मनुष्य ने गुफाओं में अपने हाथ के छापे अंकित किये थे। तब से छापा- चित्रों के तकनीक में उल्लेखनीय विकास हो चुका है। 

आज के छापा-चित्रों का सीधा सम्बन्ध यान्त्रिक उपकरणों से है जिनकी सहायता से किसी आकृति की एक जैसी कई प्रतिकृतियाँ प्राप्त की जाती है। 

मशीनी आविष्कार से पूर्व यह कार्य मुहरों एवं सिक्कों आदि से किया जाता था जिनके आरम्भिक उदाहरण सिन्धु सभ्यता के हैं। इनमें आकृति तथा लिपि, दोनों ही, अंकित दृश्य के अभिन्न अंग हैं।

भारत में धार्मिक तथा तांन्त्रिक आकृतियों, चिन्हों एवं अक्षरों आदि से युक्त प्रतीक कई विधियों से छाप कर प्रयोग में लाये जाते थे; पर इनका प्रयोग सीमित ही रहा । 

छपाई का प्रथम आविष्कार चीन में 868 ई० में “हीरक सूत्र” की सचित्र पुस्तक के रूप में माना जाता है। 

आठवीं-नवीं शताब्दियों में चीन से बगदाद होता हुआ कागज का प्रयोग यूरोप एवं भारत की ओर बढ़ा जिससे आगे चलकर मुद्रण कला का अभूतपूर्व विकास हुआ। 

मध्य युगीन यूरोप में काठ के ठप्पों के द्वारा पुस्तकों को “सचित्र बनाने का प्रयत्न किया गया। रिनेसाँ युग में जर्मनी आदि में छापा-कला में विशेष रूचि ली गयी। 

हालैण्ड में सत्रहवीं शताब्दी में रेम्ब्रों के समय छापा कला को चित्रकला (पेण्टिंग) की बराबरी का दर्जा प्राप्त हुआ। तब तक एनग्रेविंग (उत्कीर्णन) तथा एचिंग (अम्लांकन) विधियाँ ही विकसित हुई थीं स्पेन में गोया ने ‘एक्चाटिंट” का आविष्कार किया। 

आधुनिक युग में इन सभी विधियों में परिष्कार के अतिरिक्त अमरीका में रोरीग्राफी (सिल्क स्क्रीन) प्रिंटिंग का 1930-40 के मध्य विकास हुआ है। 

पत्थर की शिला से छापने की विधि भी प्राचीन काल से ही प्रयुक्त होती रही है। भारत में राजा भोज परमार के समय के इसके उदाहरण मिले हैं।

भारत में 1556 ई० में गोवा में पहली छपाई मशीन लगने के साथ छापा कला का विकास आरम्भ हुआ । किन्तु इसका समुचित विकास आधुनिक काल में ही हो सका है। 

पिछली शताब्दी में ब्रिटिश सरकार द्वारा खोले गये कला-विद्यालयों में शिलामुद्रण, उत्कीर्णन तथा अम्लांकन की विधियों का शिक्षण प्रारम्भ हुआ। उन्नीसवीं शती के आरम्भ में पुस्तकों की माँग बढ़ जाने से इसकी उन्नति हुई। 

कुछ ब्रिटिश चित्रकारों ने भी भारत में इस विधि से चित्र छापे । तत्पश्चात् मुद्रण उद्योग का भारतीयकरण हुआ और अनेक मुद्रणालय स्थापित हुए कलकत्ता आर्ट स्टुडियो, हुए। 

कन्सीपारा आर्ट स्टुडियो, कनक कोहिनूर फैक्ट्री ढाका, राजा रवि वर्मा प्रेस पूना, बोल्टन फाइन आर्ट लिथो वर्क्स बम्बई, चित्रशाला प्रेस पूना, मुन्शी नवल किशोर प्रेस लखनऊ तथा चश्मेनूर प्रेस अमृतसर आदि इनमें प्रमुख थे। 

इसके पशचत् कुछ अन्य व्यवसाइयों ने छापाखाने लगाये किन्तु छापाखाने द्वारा मुद्रित छापा-चित्रों की तुलना में कलाकार द्वारा प्रिंटिंग के लिये बनायी गयी विशेष मशीन से छपे चित्र भिन्न प्रकार के होते हैं। 

कला विद्यालयों के छापा चित्रों का सम्बन्ध इस भिन्न प्रकार से ही था। राजा रवि वर्मा ने छापाखाने की मशीनों द्वारा अपने चित्र (ओलियोग्राफ विधि से) छपवाये थे। 

कलात्मक विधि के छापा-चित्रों के पहले सफल कलाकार गगनेन्द्रनाथ ठाकुर थे जिन्होंने इसके तकनीक को मौलिकता के लिये स्वतंत्र किया । 

शान्ति निकेतन के अन्य कलाचार्यो नन्दलाल बसु तथा विनोद बिहारी मुखर्जी आदि ने भी उत्कीर्णन एवं अम्लांकन विधियों का प्रयोग किया। 

इन विधियों के कलकत्ता के अन्य कलाकार थे मुकुल दे, रमेन्दनाथ चक्रवर्ती एवं मधुभूषण गुप्त, हरेनदास एवं चित्तप्रसाद आदि । 

स्वतंत्रता के पश्चात् के कलकत्ता के ग्राफिक कलाकारों में सोमनाथ होरे का अद्वितीय स्थान है जिन्होंने कलकत्ता कला महाविद्यालय में शिक्षा प्राप्त कर दिल्ली, बड़ौदा तथा शान्ति निकेतन में ग्राफिक कलाओं का प्रशिक्षण दिया और अनेक मेधावी शिष्यों (जगमोहन चोपड़ा, जयकृष्ण आदि) को नये मार्गो की ओर प्रोत्साहित किया।

आधुनिक भारतीय प्रिण्ट बनाने का वास्तविक विकास सन् 1950 के बाद ही हो पाया है। 

1946 में बड़ौदा में नारायण बालाजी जोगलेकर के प्रयत्नों से प्राफिक कार्यशाला का आरम्भ हुआ जहाँ जयकृष्ण, लक्ष्मागौड़, गौरीशंकर एवं देवराज जैसे भारत के अन्य राज्यों के कलाकारों के अतिरिक्त शान्तिदवे, विनोदराय पटेल, जयन्त पारीख, नैना दलाल, मगन परमार, ज्योति भटट एवं रजनी कान्त पांचाल आदि अच्छे ग्राफिक कलाकार प्रकाश में आये हैं। 

सोमनाथ होरे 1958 में दिल्ली पालीटेक्नीक में प्राध्यापक बनकर आये। 

जगमोहन चौपड़ा आदि उनके शिष्यों ने 1967 में दिल्ली में एक अच्छी ग्राफिक कार्यशाला स्थापित की और ग्राफिक कलाकारों के एक दल “ग्रुप-8” का सूत्रपात किया अकबर पदमसी ने बम्बई में एक कार्यशाला स्थापित की। 

1975 में ललित कला अकादमी की गढ़ी कार्यशाला दिल्ली में बनी जिसमें सेरीग्राफी (सिल्क स्क्रीन) की सुविधा भी उपलब्ध हैं। मद्रास के चोल-मण्डल और हैदराबाद में भी ग्राफिक कार्यशालाएँ बनीं। 

बम्बई में वाई० के० शुक्ल 1940 से ही ग्राफिक कलाओं में कार्य कर रहे थे जिसकी शिक्षा के इटली से लेकर आये थे।

आधुनिक ग्राफिक कलाकारों की सूची बहुत बड़ी है फिर भी भारत में अपेक्षित स्तर का कार्य बहुत कम हो रहा है। 

ऊपर उल्लिखित कलाकारों के अतिरिक्त वर्तमान ग्राफिक चित्रकारों में देवयानी कृष्ण, अनुपम सूद, श्यामलदत्त रे, सनत कर, प्रेमजीत सिंह, सतीशगुप्त, जरीना, सुहास राय, आर० वरदराजन बढीनारायण, मनहर मकवाना, रंगास्वामी सारंगन, गुनेन गाँगुली, जीवन अदल्जा, भूपेन्द्र कारिया, लक्ष्मण पै, गुलाम शेख, रिनी धूमल, मनजीत बाबा, रामेश्वर ब्रूटा, जगदीश स्वामीनाथन, गुलाम रसूल सन्तोष, भवेश सान्याल, अमिताभदास तथा भवानीशंकर शर्मा आदि प्रमुख हैं। 

ग्राफिक प्रिण्ट अन्य प्रकार के चित्रों से सस्ता होता है अतः यह अब पर्याप्त लोकप्रिय होता जा रहा है। चित्र छापने में प्रिंटिंग प्रेस के आविष्कार के कारण कलाकार को हाथ से अच्छा प्रिण्ट तैयार करने में नई चुनौतियों का सामना भी करना पड़ रहा है। 

ग्राफिक कलाएँ मशीनी सभ्यता की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हैं जिनमें कलाकार मशीन का दास न रहकर मशीन पर पूर्ण प्रभुत्व जमाये रखता है। 

सभ्यताओं के विकास के साथ-साथ ग्राफिक कलाओं के उपकरणों, सामग्री तथा छापने की विधियों में भी निरन्तर विकास होता रहा है। 

आज इसकी अनेक विधियों प्रचलित हैं जैसे काष्ठ अथवा धातु पर उत्कीर्णन, अम्लांकन, सिल्क स्क्रीन, शिला-मुद्रण अथवा अश्म-मुद्रण, लिनोकट आदि।

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