यूरोप में उन्नीसवीं सदी की चित्रकला | 19th-Century Painting in Europe

आरम्भिक काल

19वीं सदी के आरम्भिक काल में दाविद् के नेतृत्व में विकसित हुए नवशास्त्रीयतावाद का फ्रांस में बोलबाला था। दाविद् के आसपास एकत्र हुए उनके अनुयायियों व शिष्यों ने अनेक विशाल तैलचित्र बनाये जिनके विषय रोम व ग्रीस के इतिहास व काव्य से लिए हुए थे व ये सब चित्रकार यथार्थ को आदर्श रूप में चित्रित करने के लिए प्राचीन शास्त्रीय मूर्तियों से प्रेरणा लेते थे।

एन लुई जिरोदे 

एन लुई जिरोदे (1767-1824) ने लुव्र संग्रहालय के ‘सोया हुआ एन्डिमियोन’ व आडम्बरपूर्ण ‘बाढ़’ चित्र बनाये जो शास्त्रीय ग्रीक कला की अपेक्षा माइकिलेन्जेलो की कला का स्मरण दिलाते हैं। उन्होंने समकालीन लोकप्रिय साहित्य से विषयों को चुनकर लुव्र संग्रहालय के ‘फ्रेंच योद्धाओं की आत्माओं को स्वीकारते हुए औसियन’ व ‘अॅटाला का दफन’ जैसे चित्र बनाये ।

पिअर ग्वेर

पिअर ग्वेर (1774-1838) ने नवशास्त्रीयतावाद के ‘आदर्श सौंदर्य’ के सिद्धान्त की अधिक कट्टरता से अनुपालना की व उनके लुन संग्रहालय के नाटकीय प्रभाव के चित्र ‘फिड़ा व हिप्पोलिटस’ व ‘मार्कस सेक्सटस की वापसी’ दाविद् की कला से काफी मिलते- जुलते हैं। जिरोदे व ग्वेरेँ ने अनेक अच्छे व्यक्ति चित्र भी बनाये जिसमें जिरोदे ने बनाया ‘म्युरा’ (कांतेस ए. द गाने संग्रह) व ग्वेरेँ ने बनया ‘चित्रकार की पुत्री’ (बुलोन्य संग्रहालय) ये व्यक्तिचित्र हैं।

फ्रान्स्वा जेरार

फ्रान्स्वा जेरार (1770-1837) का चित्र ‘कामदेव का सायकी से पहला चुंबन’ (लुव्र) भावहीन है व वे मुख्यतः लोकप्रिय व्यक्ति चित्रकार के रूप में प्रसिद्ध थे। उनके ‘कांतेस रेन्या द सेंज्यां दांजेलि’ (लुव्र) ‘कांतेस आबेल यूगो’ (मोंफिरिय संग्रह, पेरिस) ‘वारोन द पिअरलो’ (पिअरलो संग्रह, पेरिस) व अन्य व्यक्ति चित्रों में उन्होंने सफलतापूर्वक एकरसता को टाला है व व्यक्तियों को उनके यौवन व रूपाकर्षण के साथ चित्रित किया है।

आंत्वान ग्रोस

आंत्वान ग्रोस (1771-1835) दाविद के शिष्य थे किन्तु उन्होंने शीघ्र ही दाविद् के चित्रण का कार्य सौंपे जाते ही उन्होंने अपने चित्रों द्वारा गतित्व दर्शन व रंग सौंदर्य में के प्रभाव से मुक्त होकर स्वतंत्र पद्धति से चित्रण शुरू किया। नेपोलियन की विजय गाथाओं अपनी अभिरुचि को प्रकट किया। वे रुबेन्स के प्रशंसक थे व अपने आधुनिक युद्ध क्षेत्र के चित्रों में ग्रीक व रोमन योद्धाओं के समान चित्रित करने के बजाय योद्धाओं को प्रचलित

चमकीली वरदियों में चित्रित किया है जिनमें कहीं अरब, नीग्रो व कोर्सेक योद्धाओं की यथार्थदर्शी आकृतियाँ हैं। उनके चित्र ‘अनुकारी की लड़ाई’ (वर्साय संग्रहालय) जो बहुत ही अच्छी तरह संयोजित है व ‘एयलो में नेपोलियन’ (लुव्र) आडम्बर विहीन होते हुए शक्तिशाली हैं। 

बुर्बोन वंश राजगद्दी पर पुनः आरूढ़ होने पर उन्होंने 18वाँ लुई का विरो से प्रस्थान (वर्साय संग्रहालय) चित्र बनाया जो गोया के समान स्वैरकल्पना से भरा है। उन्होंने अनेक व्यक्ति चित्र भी बनाये जिनमें नारी की सहृदयता व सौंदर्य को कुशलता से अंकित किया है। इनमें ‘मादाम पुसिल्ग्यू’ (पुसिल्ग्यू संग्रह, पेरिस), ‘मादाम ब्यूए’ (आल्बी संग्रह, पेरिस) व ‘मादाम द्युरां’ (लेसेर संग्रह, पेरिस ) ये चित्र हैं। उनके जीवन का अन्त दुःखपूर्ण परिस्थिति में हुआ। 

दाविद् द्वारा उन्हें तंग कर सामान्य विषयों के चित्रण को छोड़कर शास्त्रीयतावादी स्वरूप के ऐतिहासिक चित्र बनाने के लिए उकसाते रहने से, वे अन्तिम 15 वर्ष प्राचीन शास्त्रीय विषयों को लेकर खोखली आडम्बरपूर्ण शैली के चित्र बनाते रहे। अन्त में, अपने गलत रास्ते से भटक जाने के बोध से एवं कर्कशा पत्नी के सताने से तंग आकर उन्होंने सेन नदी में कूदकर आत्महत्या की।

जहाँ फ्रेंच कला क्षेत्र में दाविद् व उनके अनुयायियों द्वारा प्रतिपादित यह सिद्धान्त प्रबल हो कर केन्द्रीय स्थान ग्रहण कर चुका था कि संजीदा कलाकार को केवल शास्त्रीय पद्धति से ऐतिहासिक चित्र बनाने चाहिएँ वहाँ कुछ ऐसे चित्रकार भी थे जो 17वीं सदी की डच शैली से प्रेरणा लेकर दैनिक प्रसंगों के चित्र बनाते थे। 

इन चित्रकारों में ब्वाली (1761-1845) थे जिनके प्रशंसनीय चित्र ‘घोड़ा गाड़ी का आगमन’ व ‘छापचित्रों के संग्राहक’ लुव्र संग्रहालय में हैं। फ्रान्स्वा ग्राने (1775-1840) ने दाविद् से कला का अध्ययन प्राप्त किया किन्तु शीघ्र ही अनुभव किया कि शास्त्रीय विषयों का बड़े आकार के पटों पर तैल चित्रण उनकी स्वाभाविक रुचि के अनुकूल नहीं है। 

17 साल तक रोम में रहने के पश्चात् उन्होंने गिरजाघरों व मठों के अन्तर्भागों के निष्ठा से चित्र बनाये जिनमें उन्होंने प्रकाश व छाया के विरोधों को यथातथ्य अंकित किया है।

पियर पौल प्यूदों

पियर पौल प्यूदों (1758-1823) दाविद् के कला सिद्धान्तों से पूर्णतः अप्रभावित रहे उनकी प्राचीन दर्शन व जीवन शैली पर आस्था थी किन्तु वे प्राचीन इतिहास की अपेक्षा करुण काव्य से विशेष प्रेरित थी। वे लिओनार्दो व कोरेजा की कला के प्रशंसक थे। 

वे चित्रित मानवाकृतियों को सूक्ष्म कुशलता से पारदर्शी क्रमबद्ध छाया से परिवेष्टित करते थे ताकि वे चंद्र प्रकाश में निमज्जित जैसी दिखायी दें। सबसे अधिक, उनको विशिष्ट शरीर सौंदर्य की मानवाकृतियाँ पसन्द थीं जिन्हें वे अपने चित्रों में सम्मिलित करते थे।

उनके लिए चित्र विषय केवल अत्यधिक सुंदर नारियों व बालकों को चित्रित करने के लिए बहाना मात्र होता व उनके दुर्बोध प्रतीक कथाओं को लेकर बनाये चित्र ऐसे देहसौंदर्य से सजीव लगते हैं जिसके उदाहरण हैं चित्र ‘प्रेम निष्कपटता को बहकाता है। व पश्चाताप अनुगमन करता है’ (बिसाक्सिआ संग्रह, पेरिस) ‘सायकी का अपहरण’ (लुव्र), ‘सोयी हुई सायकी’ (म्युसे कांदे, शांतिलि)। 

उनके लुव्र संग्रहालय के दो व्यक्ति चित्र ‘महारानी जोसेफाइन’ व ‘मादाम जार अत्युत्कृष्ट हैं। दाविद के शिष्य ज्यां आग्युस्त दोमिनिक अँग्र (1780-1867) ने शीघ्र ही स्वयं को महान व समकालीन कला क्षेत्र में सबसे मौलिक प्रतिभा के कलाकार के रूप में स्थापित किया। 

लम्बे समय तक वे उपेक्षित रहे व आयु के पचासवें साल तक पहुँचने के समय वे नवशास्त्रीयतावाद के प्रणेता के रूप में मान्यता प्राप्त हुए व उन पर सम्मानों की वृष्टि होने लगी। वस्तुतः उनको उचित रूप से शास्त्रीयतावादी कलाकार नहीं मान सकते। 

वे ऐसे महान कलाकार थे जिन्होंने अनजाने अपनी कलात्मक सहज प्रवृत्तियों से प्रेरित होकर सर्जन किया भले ही उनकी कला को शास्त्रीय कला के अन्तर्गत पहचाना गया हो। दाविद् के कार्यकक्ष में शास्त्रीय सौंदर्य के सिद्धान्त को सामने रखकर शिक्षा प्राप्त अँग्र स्वाभाविकतया खुद को रेफिल व शास्त्रीय कला के प्रशंसक मानते थे व उनका दावा था कि वे नैसर्गिक रूप को प्राचीन कला का अनुसरण कर आदर्श रूप देकर चित्रण करते हैं। 

किन्तु प्रत्यक्षतः उन्होंने नैसर्गिक रूप को अपनी आंतरिक प्रवृत्तियों के अनुसार परिवर्तित कर चित्रण किया। इस वजह से उनकी चित्रित आकृतियों में कहीं-कहीं अनैसर्गिक विकृतियाँ दिखायी देती हैं जैसे कि चित्र ‘थेटिस’ (एजां प्रोवान्स संग्रहालय) में स्त्री की बाँहों में व चित्र ‘गर्वित रखैल’ (लुन) में स्त्री की पीठ व जंघाओं में शास्त्रीयतावाद के प्रमुख पुरस्कर्ता होने के बावजूद कलाकार के रूप में वे उसके प्रति अपेक्षा के अनुसार निष्ठावान नहीं रहे।

रेफिल के समान अँग्र श्रेष्ठ रेखा चित्रकार थे इसमें कोई संदेह नहीं है किन्तु साथ ही उनकी कुछ सीमाएँ थीं जिनकी ओर ध्यान देना भी आवश्यक है। उनमें कल्पनाशक्ति का अभाव था व उनकी कला से काव्यात्मक अनुभव की अपेक्षा नहीं की जा सकती। 

संयोजन कौशल न होने से, ऐसे चित्र को सफलतापूर्वक पूर्ण करने में उनको कठिनाई का सामना करना पड़ता था जिनमें बहुत-सी आकृतियों को चित्रित करना हो। एक या दो आकृतियों के चित्रों को ही वे आसानी से सुसंयोजन के साथ बना सकते थे। 

उनके चित्र ‘संत सिम्फोरिअँ’ (लुव्र) की इसी कारण कटु आलोचना हुई थी जब उन्होंने उसे प्रथम प्रदर्शित किया था। उनके कुछ चित्र उनके नारी-देह के प्रति विशेष अनुराग को प्रदर्शित करते हैं जिनमें उन्होंने प्रशंसनीय निरीक्षण के साथ किन्तु विकृत भंगिमाओं में नारियों को चित्रित किया है, उदाहरणार्थ चित्र ‘दासी के साथ रखैल’ (वाल्टर्स आर्ट गैलरी, बाल्टिमोर), ‘तुर्की हमामखाना’ (लुव्र) व ‘ज्यूपिटर व थेटिस’ (एजां प्रोवान्स संग्रहालय)। 

उनके चित्र ‘मोलियर व राजा 14वाँ लुई’ (विल्डेनस्टाइन संग्रह, न्यूयॉर्क) सूक्ष्म निरीक्षण के साथ परिश्रमपूर्वक बनाया वेशभूषा की पच्चीकारी जैसा लगता है। 

उन्होंने स्त्री-पुरुषों के अनेक व्यक्ति चित्र बनाये जिनमें हूबहू सादृश्य के साथ व्यक्तियों का स्वभाव दर्शन भी है; इनमें ‘चित्रकार ग्राने’ (आजां प्रोवान्स), ‘जोसेफ आंत्वान मोतेल्दो’ (मेट्रोपोलिटन, न्यूयॉर्क), ‘मांसिय कार्दिय’ (लुव्र), ‘ला बेल लिलि’ (रुआँ), ‘मामोसेल रिविय’ (लुव्र), ‘मादाम द सेनान’ (नान्ते) विशेष प्रसिद्ध हैं। 

उनके चित्रों में चमकीले रंगों का प्रयोग न होने से कुछ कला समीक्षक उन पर रंग सौंदर्य के प्रति असंवेदनशील होने का दोष लगाते हैं। किन्तु उनकी चिकनी व अति सावधान अंकन पद्धति व छटाओं के विरोध टालने की प्रवृत्ति के बावजूद वे परिष्कृत रूप व साहसिक मौलिकता की रंग संगतियों की योजना में कितने प्रतिभा सम्पन्न थे यह उनके चित्र ‘मादाम रिविय’ से दिखायी देता है जिसमें उन्होंने महिला के बालों, शाल की सुनहरी भिन्न सफेद छटाओं व शुद्ध नीले दीवान के विरोधों को मनोहर रंगों से चित्रित किया है एवं चित्र ‘गर्वित रखैल’ से जिसमें नीले व जामुनी रंगों की आकर्षक सुसंगति है। 

अँग्र की कला के रूप के बारे में गलतफहमियाँ भी उत्पन्न हुईं। उनकी आरम्भिक कृतियों को देखकर आदर्श सौंदर्य के पुरस्कर्ता उनको गोथिक कलाकार मानते थे जबकि फ्रांस की राजकीय कला संस्था के स्थापित कलाकार उनको रेफिल के अनुयायी व कट्टर सिद्धान्तवादी मानते थे। 

यह सही है कि उनके चित्र 13वें लुई का शपथग्रहण’ (लुव्र) की कुंआरी मरियम व शिशु की आकृतियों को देखकर व उसी तरह के अन्य चित्रों को देखकर लगता है कि उन्होंने रेफिल भक्ति को प्रोत्साहित किया किन्तु यह उनकी कला की श्रेष्ठता का एक गौण पक्ष था।

अग्र ने अपने कार्यकक्ष में अनेक शिष्यों को प्रशिक्षित किया किन्तु शासेरिओ के अलावा उनमें से सबसे प्रतिभा सम्पन्न शिष्य भी अपनी आरम्भिक सफलता को बनाये नहीं रख सके। अँग्र की कला इतनी वैयक्तिक स्वरूप की थी कि वे सफल अध्यापक नहीं बन सकते थे और वे ऐसे कुछ कला सिद्धान्तों को भी जन्म नहीं दे सकते थे जिनके आधार पर किसी शैली का उदय हो।

रोमांसवाद

तेओदोर जेरिको

यदि तेओदोर जेरिको (1791-1824) के चित्रों से उनके व्यक्तित्व के बारे में निर्णय लेना है तो हम कह सकते हैं कि वे मरदाना प्रकृति के उर्जस्वी उद्यमी व्यक्ति थे। किन्तु उनके पत्रों से एवं उनके बारे में समकालीनों द्वारा किए उल्लेखों के अनुसार लगता है कि वे ऐसे मनस्तप्त चिन्ताग्रस्त व्यक्ति थे जो शीघ्र ही निराश हो जाते हैं व अपना मन बदलते हैं। 

उनके द्वारा शुरू में बनाये लुव्र संग्रहालय के सामर्थ्यपूर्ण राजकीय रक्षकों के व घुड़सवार अधिकारी व जख्मी सिपाही के चित्रों ने लोगों का ध्यान आकर्षित किया जो उनकी घोड़ों के चित्रण व गतित्व दर्शन में रुचि को दर्शाते हैं। असफल प्रेम के कारण उनको पेरिस को छोड़ना पड़ा। 

वे रोम गये जहाँ शास्त्रीय कला व महान इटालियन कलाकारों की कृतियों को देखकर वे बहुत विभ्रमित हुए। वहाँ घुड़सवारविहीन घुड़दौड़ शीर्षक का विशाल तैलचित्र बनाने के उद्देश्य से उन्होंने अनेक अभ्यास चित्र बनाये किन्तु उस चित्र को वे कभी पूर्ण नहीं कर पाये।

1816 में मेदुसा नामक युद्धपोत सेनेगल के पास क्षतिग्रस्त होने से उसके यात्रियों को बेड़े पर उतार दिया था किन्तु यह बेड़ा किनारे तक पहुँचने से पहले ही उनमें से नब्बे प्रतिशत यात्री मर गये। 

राजनीतिक घटनाओं से उत्तेजित जनता के मन में इस दुर्घटना से आक्रोश उत्पन्न हुआ। जेरिको ने इस दुर्घटना को लेकर अपना चित्र ‘मेदुसा का बेड़ा’ बनाया व 1819 की राष्ट्रीय प्रदर्शनी में प्रदर्शित किया किन्तु डरावने विषय व कठोर अंकन पद्धति के कारण उसको दर्शकों ने नापसन्द किया। 

इससे निराश होकर जेरिको लंदन चले गये। आयु के अंतिम चार वर्षों में उन्होंने बड़े तैलचित्र बनाने की अनेक योजनाएँ तैयार क किन्तु छोटे चित्र ही बना डाले। उनकी घोड़े से गिरने से मृत्यु हुई। 

जेरिको की कला का स्वरूप उतना ही जटिल है जितना उनका व्यक्तित्व। उनके चित्रों के विषय प्रत्यक्ष जीवन से चुने जाते थे किन्तु वे उन सब बातों को चित्रों से हटा देते जिनको वे अनावश्यक मानते। उन्होंने ‘मेदुसा का बेड़ा’ चित्र समाचार पत्रों में प्रकाशित किसी विशेष दुर्घटना के विवरणों के आधार पर बनाया था फिर भी वह इस तरह चित्रित किया हैं जैसे वह किसी भी काल में घटित दुर्घटना हो या वह बाढ़ग्रस्त इलाके का एक दृश्य हो। 

वास्तविकता से जुड़ी हुई होते हुए उनको कलाकृतियाँ उनकी स्मारकीयता, अतिशयोक्तिपूर्ण आकार व नाटकीय प्रभाव में विशेष रुचि होने को प्रमाणित करती हैं और उसके साथ उनका काले व उदास रंगों का चुनाव उनको 17वीं सदी के बॅरोक कलाकार कारावाद्यो व रिबेरा के निकटवर्ती कलाकार के रूप में स्थापित करते हैं। 

18वीं सदी की आरम्भकालीन जेरिको की कला से लगता है कि उस सदी में हुए शास्त्रीयतावाद, रोमांसवाद व यथार्थवाद के बीच के संघर्ष की कहानी ने जेरिको के मन में जन्म लिया था। उनके ‘पागल अपहर्ता’ (स्प्रिंगफील्ड संग्रहालय, मेसेचुसेट्स) जैसे चित्र व शरीर रचना के रेखाचित्र उनके डरावने प्रभाव के बावजूद जिस नितान्त यथार्थता के साथ बनाये हैं उससे उनको यथार्थवाद का अग्रदूत मान सकते हैं।

ओजेन देलाक़ा

ओजेन देलाक़ा (1798-1863) को नवशास्त्रीयतावाद के समकालीन प्रणेता के खिलाफ रोमांसवाद के प्रणेता के रूप में देखना उनकी कला के सच्चे, सम्पूर्ण ज्ञान व मूल्यांकन में बाधक है। 

उनकी मोरोक्को की छह मास की यात्रा, जिसने उन पर स्थायी प्रभाव छोड़ा, के अलावा उनका जीवन किसी विशेष घटना से अप्रभावित व शांत रहा व वे आजीवन कलासर्जन में व्यस्त रहे। उत्तरी अफ्रीका के लोकजीवन व दृश्यों का स्मरण दिलाने वाले चित्रों को छोड़ उनके चित्रों के विषय शेक्सपियर, बायरन, गोटे व वाल्टर स्काट की साहित्यिक रचनाओं से लिए हुए थे। 

उनका विषयों का चुनाव केवल प्रचलित मान्यताओं को ध्यान में रखकर नहीं किया जाता था दैनंदिन प्रसंगों से भिन्न विषय हो उनको कलासर्जन के लिए प्रेरित कर सकते थे क्योंकि ऐसे विषय उनकी कल्पना शक्ति के लिए स्वच्छंद विचरण का क्षेत्र खोल देते थे। 

1830 की फ्रेंच राज्य क्रांति के समकालीन विषय पर बनाये चित्र ‘मोरचे पर स्वतंत्रता’ (लुन) में भी उन्होंने स्वतंत्रता को देवी को प्रतीक रूप में चित्रित कर वास्तविकता को काल्पनिक रूप दिया है व उसके यथार्थ प्रभाव को कमजोर किया है।

युवावस्था में वे समकालीन इंग्लिश कलाकार लारेन्स, कान्स्टेबल व बोनिंग्टन से एवं स्बेन्स व वेनेशियन शैली से प्रभावित हुए थे। इसका परिणाम उनके लुन संग्रहालय के चित्र ‘सारडानापालुस’ व ‘समुद्री झिंगा के साथ वस्तु चित्र’ में किये निर्भीक, संवेदनशील तूलिका कार्य एवं पारदर्शी रंग परत व मोटे रंगों से अंकित तीव्र प्रकाश दर्शन के विरोध में दृष्टिगोचर है। 

1840 के करीब वे छोटे प्रवाही तुलिकाघातों से सम्पूर्ण तैल चित्र पर कार्य करने लगे जिससे रंगों की विविधता व विरोध स्पष्ट दिखाये जा सकें जैसे हम उनके चित्र ‘शेर का शिकार’ (बोदों संग्रहालय) व लुब्र संग्रहालय के चित्र ‘संत जार्ज व परदार सांप’ व ‘रखैल’ में देखते हैं। 

पहले देलाक्रा चित्रोपम रमणीयता पर ध्यान देते थे किन्तु बाद में वे शास्त्रीय कला के सुयोजन, सरलता व भव्यता के गुणों को पसंद करने लगे। 

उन्होंने लिखा है, “सर्वश्रेष्ठ प्रतिभा सम्पन्न व्यक्ति विवेकपूर्ण भी होता है” जो बात उनके सभी रोमांसवादी सिद्धान्तों के विपरीत है।

देलाका रंग निर्धारण व रंगांकन में बहुत कुशल थे व रंगों की चटकीली छटाओं के विरोधपूर्ण प्रयोग को पसन्द करते थे। उनके चित्रों की यह रंगों से सम्बन्धित विशेषता उनके द्वारा प्रयुक्त घटिया रंगों व उनके रंगों को मिश्रित करने के अनुचित तरीकों के कारण समय से प्रभावित हुई है। 

उनके बारे में कहा गया है कि उनमें रेखांकन कौशल नहीं था; किन्तु यह सतही आकलन है। वास्तविक रूप के विचार से उनके रेखांकन में कुछ त्रुटियाँ दिखायी दे सकती हैं किन्तु इसके बावजूद उनकी रेखाएँ सजीवता व गतित्व की अभिव्यक्ति में पूर्णत: सफल हुई हैं। 

उन्होंने कभी व्यावसायिक दृष्टिकोण से यांत्रिक पद्धति से चित्रण नहीं किया व उनके चित्रों के सम्मुख दर्शक भावशून्य तटस्थ नहीं रह सकता। इसके अतिरिक्त वे अपने समय के अकेले चित्रकार थे जो विशाल भित्ति चित्र, ऐतिहासिक चित्र व मानवचित्र ऐसे श्रेष्ठतादर्शक गुणों से सम्पन्न बनाते थे जिन्हें अकुशल कलाकार का कार्य कदापि नहीं कह सकते। 

उनके द्वारा ल्युक्सेम्बुर महल व बुर्बोन महल के पुस्तकालय व लुव्र संग्रहालय की अपोलो वीथिका की छत पर की सजावट व पेरिस के सेंत स्युल्पिस गिरजाघर में बनाये चित्र प्रथम श्रेणी का सर्जन है व उसकी तुलना महान ख्यातनाम इटालियन कलाकारों की तत्सम कृतियों से की जा सकती है।

लाक्रा की कलाकृतियों का सही मूल्यांकन करने के लिए उनकी तुलना तत्कालीन कलाकारों की कृतियों से करना उचित होगा; उदाहरणार्थ पौल देलारोश (1797-1856) के चित्र ‘चौथे एडवर्ड के बच्चे’ (लुव्र) व ओजेन देवेरिया (1805-1865) का चित्र ‘चौथे हेन्री का जन्म’ (लुव्र) जो तुलना में केवल पुस्तक चित्र जैसे लगते हैं व जिनमें इसके

अतिरिक्त कोई निजी सौंदर्यात्मक विशेषता नहीं है। तेओदोर शासेरिओ (1819-1856) की कला का आरम्भ बहुत ही आश्चर्यजनक रहा। 

प्रतिभा सम्पन्न बालक के रूप में उनके बनाये लुव्र संग्रहालय के चित्र ‘एहास्वेरस व बेहोश हो रही ईस्थर’ व ‘समुद्री देवी’ देखकर समकालीन कला प्रेमी विस्मित हुए थे। 

किन्तु उनकी यह आरम्भिक सर्जनशीलता लुप्त हुई व उनके बाद में बनाये चित्र ‘रोमन हमाम’ (लुव्र) में व ‘अल्जीयर्स की यात्रा’ से प्रेरित चित्रों में उनकी आरम्भिक कला की विशेषताएँ नहीं हैं, जो हैं वह है विशिष्ट व्यक्तिगत शैली, नारी देह का एक आदर्श रूप व विदेशज तत्त्वों से युक्त दुर्ग्राह्य काव्यात्मक प्रभाव।

यथार्थवाद

ओनोरे दोमीय

ओनोरे दोमीय (1808-1879) ने लम्बे समय तक एक के बाद एक साहसी प्रभावपूर्ण अश्ममुद्र (लियोग्राफ्स) बनाकर भिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित किये व तत्कालीन अधिकारी वर्ग व रीति-रिवाजों का उपहास किया। 

वे आयु के 40 वर्ष पार कर चुके थे जब उन्होंने भूरे व मन्द लाल रंगों में छोटे आकार के तैल चित्र बनाना आरम्भ किया जिनके विषय दैनिक जीवन के प्रसंग थे या मोलियर, ला फांतेन व सर्वेटिस की साहित्यिक रचनाओं से लिए हुए थे। 

बीसवीं सदी के आरम्भ में ही उनको अपने समय के श्रेष्ठ तैल चित्रकारों में मान्यता मिली। दोमीय के पूर्व होगार्थ, शार्द व 17वीं सदी के डच चित्रकारों ने आसपास के दैनिक प्रसंगों व रीति-रिवाजों को लेकर निरीक्षणपूर्वक बारीकियों के साथ चित्र बनाये थे। किन्तु दोमीय की मौलिकता इस बात में थी कि उन्होंने अपने चित्र ईमानदार यथार्थवादी के रूप में नहीं बल्कि स्वप्नद्रष्टा ध्येयवादी की तरह बनाये थे। 

स्वभावतः वे अतिशयोक्ति के भक्त कवि हृदय व्यक्ति थे व यदि उन्होंने चित्रकला की उचित शिक्षा प्राप्त की होती तो वे बाइबल, काव्यग्रंथों व नाटकों से लिए प्रसंगों के सामर्थ्यशाली चित्र बना सकते थे.

दोमीय अपनी मर्यादित पृष्ठभूमि को जानते थे व उत्साही लोकतंत्रवादी थे; अतः उन्होंने तद्नुरूप विषयों व अंकन पद्धति को अपना कर चित्र बनाये जैसे ‘तृतीय श्रेणी का डिब्बा’ (मेट्रोपोलिटन, न्यूयॉर्क), ‘शतरंज के खिलाड़ी’ (पेति पाले, पेरिस), ‘छापचित्र संग्राहक’ (एस्नो पेल्तरी संग्रह, पेरिस), ‘क्रिस्पिन व स्केपिन’ (लुव्र), ‘डॉन क्विकजोट व सांको पांजा’ (सी.पेसन संग्रह, न्यूयॉर्क)। 

चित्रों में उन्होंने विषयों को अपने ध्येय को पोषक बनाने के उद्देश्य से रूपान्तरित किया। उन्होंने मध्यमवर्गीय व निम्नवर्गीय पेरिस निवासियों को सामर्थ्यपूर्ण आकृतियों में रूपान्तरित कर या विकृत मुखौटा पहने हुए जैसे चित्रित किया। 

सामान्यतया दैनिक प्रसंगों के चित्रकार जिन काल व स्थान निर्धारक बारीकियों को चित्र में यथातथ्य अंकित करने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं उनको दोमीय ने सहज ज्ञान से सम्पूर्णत: टाला है व आदमियों के शरीरों, चेहरे के भावों व क्रियाओं को अतिशयोक्त रूप में चित्रित किया है मानो उनके लिए विषय अपने अभिव्यंजनात्मक उद्देश्य पूर्ति के लिए बहाना मात्र था। 

दोमीय के चित्र ‘धोबन’ (लुव्र) की तुलना देगा के चित्र ‘धोबनें’ से करने पर यह बात स्पष्ट होती है। देगा ने धोबन की दुकान, उसमें सूखने के लिए टंगे हुए गीले कपड़ों व इस्तरी कर रही धोबन की सक्रियता को यथातथ्य चित्रित किया है जबकि दोमीय की सेन नदी के किनारे की सीढ़ियाँ चढ़ रही धोवन के सिर पर रखा गट्ठर कपड़ों का है या और किसी चीज का इसका पता नहीं चलता व नदी किनारे के मकान सब अतिसामान्य रूप में सरलीकृत किए हैं।

दोमीय ने मोलियर के नाटकों के प्रसंगों पर चित्र बनाये हैं जिनमें से उत्कृष्ट चित्रों में ‘नाटक’ (नाय श्टाट्स्गालेरी, म्युनिक ) एक चित्र है जिसमें कठघरे में बैठी दर्शकों की भीड़ से होकर मंच पर अभिनीत किए जा रहे नाटक के किसी गम्भीर प्रसंग को चित्रित किया गया है। 

अतिशयोक्ति की अभिरुचि के कारण ही दोमीय स्वाभाविकतया रंगमंच के चित्रण की ओर मुड़े जहाँ जीवन की हर बात को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जाता है। विक्टर ह्यूगो व आलेक्सांद्र घुमा के समान वे सरलीकरण व बढ़ाकर प्रस्तुत करने के शौकीन थे। उन्होंने कुछ ‘संग्राहक’ जैसे गृहांतर्भागों के प्रसन्न विषयों के चित्र भी बनाये। 

निरपवाद रूप से वे स्मृति चित्र बनाते थे जिसमें से उनके विचार से अनावश्यक बातों को हटा दिया जाता। इस तरह अनावश्यक को हटाकर व अतिशयोक्ति का सहारा लेकर वे सामान्य विषय को शैलीबद्ध व श्रेष्ठ रूप प्रदान करते। 

यथार्थवादी भूदृश्य चित्रण

दाविद के समय में फ्रांस में भूदृश्य चित्रण का कोई महत्त्व नहीं था जैसा इंग्लैण्ड में था। ‘आदर्श सौंदर्य’ के सिद्धान्त का प्रभुत्व होने से फ्रांस के कला क्षेत्र में भूदृश्य चित्रण को निकृष्ट माना जाता था । 

प्रचलित मान्यता के अनुसार, चित्रकार को ऐसे प्राचीन ऐतिहासिक विषयों को चुनना चाहिए जो उदात्त भावनाओं को प्रेरित करें व उनको ऐसी पृष्ठभूमि पर चित्रित करना चाहिए जिसमें प्रकृति के चुनिंदा भव्य व सौंदर्यपूर्ण दृश्य हों। 

इस विचार के अनुसार भूदश्य को राष्ट्रीय प्रदर्शनी में तभी प्रदर्शित किया जा सकता था जब वह किसी ऐतिहासिक या पौराणिक विषय की पृष्ठभूमि के रूप में व कलाकार के कार्यकक्ष में कल्पना से चित्रित किया गया हो। 

प्रत्यक्ष निसर्ग में जाकर बनाये अभ्यास चित्र पृष्ठभूमि के लिए उपयुक्त सामग्री जैसे हुआ करते व उनको कल्पना से आदर्श व उदात्त रूप देकर, पुनर्रचना किए बिना चित्र में सम्मिलित नहीं कर सकते थे।

जब फ्रांस में भूचित्रण को इस प्रकार उपेक्षा की दृष्टि से देखा जाता था तब 1822 के करीब ज्यां बातिस्त कोरो (1796-1875) ने, जो पेरिस के रूए छु सेक मार्ग के महिलाओं के टोपों के निर्माता के पुत्र थे, चित्र बनाना आरम्भ किया। 

अपवादात्मक रूप से विनम्र कोरो के पास कला के अतिरिक्त किसी अन्य कार्य में लगाने के लिए समय नहीं था। वे अत्यन्त परिश्रमी थे व युवावस्था में इटली जाने के पूर्व उन्होंने दो ख्यातनाम भूदृश्य चित्रकारों से कुछ शिक्षा प्राप्त की थी। 

उन्होंने अनेक बार इटली की यात्राएँ कीं व लम्बे समय तक वह वहाँ, मुख्यतः रोम में रहे। वे आदतन निसर्ग में जाकर अनेक छोटे अभ्यास चित्र बनाते व तत्पश्चात् उनकी सहायता से कार्य कक्ष में बड़ा चित्र बनाते व राष्ट्रीय प्रदर्शनी के लिए भेजते। 

उनके चित्र कला समीक्षकों द्वारा विरोधी आलोचना हुए बिना स्वीकृत होते गये व खेत में काम करने वाले कृषक की तरह नियमित रूप से चित्र बना के राष्ट्रीय प्रदर्शनी के लिए भेजना उनकी जीवनचर्या बन गया। 

हर बसंत ऋतु में वे फ्रांस के किसी प्रदेश में या इटली या स्विट्जरलैंड जाते व बड़े अंतिम प्रदर्शनी चित्र के लिए अनेक अभ्यास चित्र बना के लाते । अन्य चित्रकारों के समान भूदृश्य चित्रण के लिए उनकी पसन्द का कोई विशेष प्रदेश या स्थल नहीं था। अकसर उनका उपयुक्त स्थान का चुनाव वहाँ कोई मित्रमंडली या साथी मिलने की आशा से किया जाता।

उनकी आरम्भिक कृतियों में उन्होंने विषयों को निरीक्षणपूर्वक व बारीकियों के साथ चित्रित किया है। सर्जनकाल के मध्य के आसपास ही उन्होंने समय-समय पर कुहरेदार पर्णसमूहों को चित्र में सम्मिलित करना आरम्भ किया। 

एक बात जिसको उन्होंने आरम्भ से ही कलानिर्मिति में रंगों से भी अधिक व सबसे महत्त्वपूर्ण माना, व जिसका संकेत उनके लेखन व चित्रों से समान रूप से दृष्टिगोचर है, वह है छाया प्रकाश की हल्की गहरी छटाओं का यथातथ्य अंकन । 

उनके पूर्ववर्ती चित्रकार प्येरो देल्ला फ्रान्चेस्का, वेलास्केस व वर्मेर ने भी इसी बात को प्रमुख महत्त्व देकर चित्रण किया। कोरो ने अपने नोटबुक में लिखा हैं “कला में जिनका सबसे प्रथम ज्ञान आवश्यक है वे हैं आकार व छटा रंग व अंकन पद्धति चित्र को आकर्षक बनाते हैं।” 

उनके विचार से रंगों का गौण स्थान होते हुए भी उनकी रंगों के प्रति अरुचि नहीं थी। सामान्यतया वे रंगों की सौम्य झलकों की श्रेणियों (जैसे भूरे, धूसर, ओकर्स व मंद हरे) का प्रयोग करते थे किन्तु कभी उन्होंने रंगों की आकर्षकता का प्रासंगिक महत्त्व जान कर उसका कुछ चित्रों में यथास्थान प्रयोग किया है जैसे लुव्र ‘संग्रहालय के चित्र ‘सान्स का महामंदिर’ की खिड़कियों में व चित्र ‘नीले वस्त्र में महिला’ के वस्त्र में; इन दोनों चित्रों की ताजगी आश्चर्यजनक है। 

जब इस बात का विचार करते हैं कि ये दोनों चित्र उन्होंने आयु के 78वें वर्ष में बनाये थे। कोरो के भिन्न वर्ग के प्रतिनिधि चित्रों में ‘नान का पुल’ (लुव्र) व ‘रोम व त्रिनिता दी मोन्ति’ (जेनिवा संग्रहालय) में इटली के भूदृश्य हैं; ‘गेहूँ का खेत’ (लिओस संग्रहालय) व ‘शार्त्र का महामंदिर’ (लुव्र) ये फ्रांस के भूदृश्य हैं; ‘होमर व गडेरिये’ (सेंत लो संग्रहालय) ऐतिहासिक भूदृश्य है व ‘डायना का स्नान’ (बोर्दो संग्रहालय) ऐसा काव्यमय कोहरेदार भूदृश्य है जिस तरह के भूदृश्यों को उस समय उनका सबसे अच्छा कला सर्जन मानते थे। 

जब मौसम प्रतिकूल होने से कोरो को कार्यकक्ष में ही चित्रण करना पड़ता था तब वे कभी भूदृश्यों की जगह किसी व्यावसायिक स्त्री मोडल को इटालियन देहाती पोशाक पहना के उसका व्यक्ति चित्र बनाते जिससे उनको जवानी के काल का भी स्मरण होता । 

चित्रकार देगा जैसे इने-गिने दूरदर्शी व्यक्तियों को छोड़ कर उनके समकालीन लोगों ने इन छोटे व्यक्ति चित्रों को नापसन्द किया। बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में ही इन व्यक्ति चित्रों की श्रेष्ठता की ओर कला प्रेमियों का ध्यान आकर्षित हुआ । 

उनके व्यक्ति चित्रों की तुलना वर्मेर के चित्रों से की जाती है और निश्चय ही उनके चित्र ‘मोतियों से सजी महिला’ (लुव्र), ‘लेटी हुई परी’ (जेनिवा संग्रहालय) व ‘कलाकार का कार्यकक्ष’ (लिओंस संग्रहालय) वर्मेर के चित्रों से समानता रखते हैं। किसी समय उनसे अधिक ख्यातनाम माने गये अनेक चित्रकारों से कोरो श्रेष्ठ माने जाते हैं व उनके सामने वे चित्रकार आडम्बरपूर्ण व बोझिल प्रतीत होते हैं। 

इसके प्रमुख कारण हैं कोरो की तथ्यात्मक दृष्टि, प्रकाश व रंग के प्रति सूक्ष्म संवेदनशील व सरल अंकन पद्धति। इनके अलावा जो कारण थे वे थे उनके चित्रों का काव्यपूर्ण वातावरण व देहाती अक्षुण्ण सौंदर्य जिन पर वे विशेष आत्मीयता से अनुरक्त थे। कोरो जो चित्रकारी के अलावा और कुछ भी करने के अनिच्छुक थे बहुत ही काव्यात्मक प्रकृति के सहृदय व्यक्ति थे।

म्युस्ताव कुर्बे

म्युस्ताव कुर्बे (1819-1877) फ्रान्श-कान्ते प्रदेश के ओर्ना ग्राम के छोटे भूस्वामी थे व युवावस्था में पेरिस जाकर उन्होंने चित्रकारी आरम्भ की। 

उनके बिना सोचे के पुत्र समझे बनाये आरम्भिक चित्र रोमांसवादी प्रभाव के थे किन्तु उन्होंने शीघ्र ही स्पष्ट अनुभव किया कि उनका व्यावसायिक ध्येय आसपास के दृश्यों व घटनाओं, जैसे ओन के किसानों व मूल प्रदेश जूरा के पहाड़ी दृश्यों को चित्रित करना ही हो सकता था। 

उनके राष्ट्रीय प्रदर्शनी में प्रदर्शित आरम्भिक चित्रों ने उनके लिए विरोधी उत्पन्न किए किन्तु साथ ही उनको कुछ मित्र भी मिले। विरोधियों से हुए नेक झगड़ों में उन्हें उनके असामान्य किन्तु बचकाने ‘अहंकार ने अपने कलात्मक ध्येय के प्रति एकनिष्ठ व सम्भाले रखा। 

1855 व 1867 की पेरिस की प्रदर्शनियों में वे अपने चुनिंदा चित्रों के सिंहावलोकन के हेतु स्वतंत्र मण्डप आरक्षित करवाने में सफल हुए। 1871 में उन्होंने वांदोम स्थित नेपोलियन की विजय के स्मारक को लोकतंत्रवादियों द्वारा गिराने का समर्थन किया। 

इसके बाद स्मारक के ध्वंस के लिए कुर्बे को व्यक्तिगत रूप से जिम्मेवार ठहरा कर जुर्माने की सजा सुनायी गयी। थके हुए कुर्वे स्वित्जरलैंड भाग गये जहाँ उनकी मृत्यु हुई।

जेरिको से प्रेरित हो कर कुर्बे ने खुद को यथार्थवादी के रूप में घोषित किया व देहाती जीवन के बड़े आकार के तैल चित्र बनाये। उनके अधूरे चित्र ‘आग’ को छोड़कर उन्होंने पेरिस के दृश्यों को कभी चित्रित नहीं किया यद्यपि वे हर वर्ष का बहुत-सा काल पेरिस में बिताते थे। 

उनके चित्र ‘सेन नदी के किनारे युवतियों’ (पेति पाले, पेरिस) की दोनों युवतियाँ, पेरिस निवासी नहीं बल्कि स्थिरमति देहाती स्त्रियाँ लगती हैं। उन्होंने श्रम की गरिमा की प्रशंसा में सीधे-सादे देहाती लोगों को परिश्रम करते हुए चित्रित कर उनके स्वाभाविक बड़प्पन को सबके सामने रखा जिसके उदाहरण हैं उनके चित्र ‘संगतराश’ (ड्रेस्डेन वीथिका), ‘गेहूँ छानने वालियाँ” (नांते), ‘दोपहर का आराम’ (पेति पाले)। 

वे स्वयं उत्साही शिकारी थे व उन्होंने ‘लाली’ (L’allali) (बोस्टन संग्रहालय) जैसे शिकार के दृश्य चित्रित किये। उन्होंने मांसल देह की विवस्व नारियों के अनेक चित्र बनाये जिनमें से सबसे आकर्षक नारी वह है जो उन्होंने अपने प्रसिद्ध विशाल चित्र ‘चित्रकार का कार्यकक्ष’ (लुव्र) में चित्रित की है। 

उनके चित्र ‘ओनी का दफन संस्कार’ (लुव्र) में शास्त्रीय नक्काशी कार्य की श्रेष्ठता व गांभीर्य है। उन्होंने उत्कृष्ट आत्मचित्र, अपने परिवार के चित्र व समकालीनों के व्यक्ति चित्र बनाये जिनमें ‘पाइपवाला आदमी’ (मोपेलिय संग्रहालय), ‘मादाम बोरो’ (पॉल रोसेनबर्ग संग्रह, पेरिस ) ये चित्र हैं। 

उन्होंने जूरा के पहाड़ी दृश्यों व ‘एत्रेता’ (राकफेलर संग्रह, न्यूयॉर्क) जैसे समुद्री दृश्यों को चित्रित किया व ‘फूलदान’ (हैम्बुर्ग कुन्स्टाले) जैसे रचना प्रचुर पुष्यचित्र बनाये तूलिका की जगह से कई बार रंग पट्टिका चाकू से रंगांकन करते और चित्र की सतह को सघन, चिकना या संगमरमर की तरह धारीदार रूप देते। प्रारम्भ में ही उन्होंने अंकनविधियों पर प्रभुत्व प्राप्त किया था व उसमें बाद में विकास के कोई चिह्न दृष्टिगोचार नहीं हैं जिससे प्रतीत होता है कि यथार्थवादी कला की यह कमजोरी या मर्यादा है कि उसमें विकास की सम्भावना नहीं होती किन्तु यह बात सही नहीं है। 

यथार्थवादी कलाकार भी केवल अपने सम्मुख के दृश्य को यथातथ्य चित्रित नहीं करता बल्कि यथार्थवादी कलाकृति का रूपांकन भी कलाकार के चयन व अर्थनिर्णय की प्रक्रिया से गुजर कर अपना अंतिम रूप प्राप्त करता है जिससे भिन्न यथार्थवादी चित्रकारों की कृतियाँ भिन्न रूप व प्रभाव की होती हैं। 

कुर्वे के चित्र देखकर दर्शक आसानी से पहचान लेता है कि यह कुर्वे का चित्र है और किसी का नहीं हो सकता, इतनी उत्कृष्ट विशेषता लिए हुई थी उनकी अंकन पद्धतियाँ।

ज्यां फ्रान्स्वा मिले

ज्यां फ्रान्स्वा मिले (1814-1875) कुर्वे के समान भूस्वामी की संतान नहीं थे बल्कि कांतेतां प्रायद्वीप के गरीब किसान के पुत्र थे व बचपन में उन्होंने केवल फावड़ा व दरांती चलाना सीखा था। शेरबुर्ग की नगर परिषद द्वारा प्रदत्त अनुदान से अध्ययन के लिए पेरिस गये मिले को कठिन परिस्थितियों में से गुजरना पड़ा। 

वे कला-विक्रेताओं के लिए दैनिक प्रसंगों के छोटे चित्र बनाने से धीरे-धीरे कब गये और उन्होंने पेरिस के आसपास के देहाती प्रदेशों के भ्रमण के दृश्यमान कृषकों के जीवन से चित्र विषय चुनना आरम्भ किया। 

1849 में महामारी के प्रकोप के कारण उन्होंने पेरिस छोड़कर फतिब्लो वन के किनारे बसे बाबिजां ग्राम को अपना निवास बनाया जहाँ कलाकार भूदृश्य चित्रण के लिए आया करते थे। 

यहाँ का वातावरण वैसा ही था जिसमें उन्होंने अपना बचपन व युवावस्था का आरम्भिक काल बिताया था और उसने उनको भविष्य की कला का दिशा निर्धारण किया। अब अग्रिम करीब पच्चीस वर्ष तक उन्होंने कृषक जीवन के इतिवृत्तकार के रूप में चित्रण किया।

अब तक, जिन चित्रकारों ने कृषक जीवन के चित्र बनाये थे उन्होंने इस विषय को आकर्षक कला निर्मिति के लिए अवसर के रूप में चुना था। लुई ल ने ने कृषकों को आराम के समय में खाते हुए, पीते हुए चित्रित किया था तो वान ओस्टेड ने उनको मौज उड़ाते या झगड़ते चित्रित किया था। 

किन्तु मिले का उद्देश्य कृषकों को बीज बोते, फसल काटते, पेड़ काटते हुए आदि कार्यों में परिश्रमरत चित्रित करना था व उनके परिश्रमी जीवन की वास्तविक सच्चाई को सबके सामने उजागर करना था। 

उन्होंने ब्यूगेल के समान कृषकों को मेलों व त्योहारों में आनन्दोत्सव मनाते हुए चित्रित नहीं किया। वे स्वानुभव से जानते थे कि कृषकों को खेतों में कितने कड़े परिश्रम करने पड़ते हैं व इस अनुभव ने ही उनको कृषक जीवन की इस अन्तरंग वास्तविकता को प्रकाशित करने को कृतसंकल्पित किया था। 

उस समय, वास्तविकता को बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत करने व कृषकों को केवल बंधुआ मजदूर जैसे चित्रित करने के दोष लगाकर उनकी आलोचना भी हुई व इसमें कुछ सच्चाई भी है। किन्तु इस बात को नकार नहीं सकते कि उनके ‘सिल्ला बीनने वाले’ (लुव्र), ‘सूत कात रही लड़की’ (लुव्र), ‘आलू इकट्ठा करने वाले’ (बोस्टन संग्रहालय), ‘खेत से वापसी’ (डोल्फस संग्रह) चित्रों में उन्होंने क्षितिज तक फैले खेतों का सुनसान एकाकीपन, जिन्दगीभर के कठोर परिश्रम से सख्त हुए जोड़ों के कारण धीमी हुईं कृषकों के शरीरों की गतिविधियाँ बहुत ही प्रभावी रूप से अंकित की हैं। 

बाइबल के निष्ठावान पाठक होने से वे अनुभव करते थे कि सदियों से देहाती परिश्रमी जीवन में शायद ही कोई परिवर्तन हो गया हो। 

दोमीय के समान वे स्मृति से चित्रण करते थे व सामान्य सरलीकृत रूप देने के उद्देश्य से परिश्रम करते थे। रंगों के प्रति उनकी स्वाभाविक रुचि नहीं थी व उनके चित्रों के रंग अकसर मैले व अनिश्चित हैं। उनके अंतिम वर्षों में उन्होंने ‘बसंत’ (लुव्र) जैसे अनेक पेस्टल रंगों से चित्र बनाये। 

19वीं सदी के पूर्वार्ध की जर्मन कला 1810 में पीटर कोर्नेलियस (1785-1867) व फ्रीडरिश ओवेरवेक (1789-1869) के नेतृत्व में जर्मन कलाकारों का एक समूह कला को पुनर्जीवित करने व ईश्वर की आस्था में जीवन व्यतीत करने के उद्देश्य से एकत्र हुआ। 

शास्त्रीय मूर्तिकला का अनुसरण करने या प्रत्यक्ष देखकर चित्रण करने के बजाय उन्होंने पेरुजिनो व 15वीं सदी के महान इटालियन कलाकारों की कलाकृतियों का अध्ययन कर चित्रण करना आरम्भ किया। उन्होंने रोम के सात इसादोरो के मठ को अपना निवास स्थान बनाया जहाँ उनको वाणिज्यदूत बार्थोल्दी के भवन में संत जोसेफ के आख्यान पर भित्ति चित्र बनाने का कार्य सौंपा गया। 

कुछ वर्ष बाद उनको केसिनो मास्सिमी में इटालियन कवियों के सम्मान में चित्रमाला बनाने का कार्य सौंपा गया, किन्तु यह चित्रमाला पूर्ण नहीं हो सकी क्योंकि समूह में विभाजन हुआ व कोर्नेलियस वापस बर्लिन आ गये। बार्थोल्दी के भित्ति चित्रों को स्थानान्तरित कर बर्लिन ले जाया गया। ये चित्र घिसेपिटे रूप के व प्रभावहीन हैं।

कोर्नेलियस के एक शिष्य विल्हेल्स फान कौलबाख (1805-1874) ने ड्यूसेल डोर्फ शैली नाम से ज्ञात कला शैली विकसित की व बड़े आकार के ‘हूणों की पराजय’ के चित्र (बर्लिन व म्यूनिक संग्रहालय), व उन्हीं संग्रहालयों में ‘दार्शनिक’ चित्र बनाये। ये सब चित्र दोषपूर्ण व खोखले लगते हैं। 

ड्यूसेल डोर्फ शैली के कलाकारों में केवल एक ही सुयोग्य कलाकार थे आल्फ्रेड रेथेल (1816-1859) जिनके एक्स ला शापेल के नगर भवन में राजा शार्लमेन की जीवनगाथा पर बनाये भित्ति चित्र गम्भीर व श्रेष्ठ हैं। 

कास्पर डाविड फ्रीडरिश

कास्पर डाविड फ्रीडरिश (1774-1840) ने इटली के ऐतिहासिक स्वरूप के भूदृश्यों के समान चित्र बनाने की प्रथा से हटकर उत्तरी जर्मनी के सौंदर्य से सम्पन्न भूदृश्यों को चित्रित करना शुरू किया। किन्तु उन्होंने निसर्ग को यथातथ्य चित्रित करने के बजाय अपने ध्यानपूर्वक बनाये भूदृश्यों में ऐसे तत्त्वों का अंतर्भाव किया जिससे दर्शकों के मन में गहरी उदासी, चिंता या बेचैनी की भावना जागृत हो। 

उन्होंने ‘इंद्रधनुष के साथ भूदृश्य’ (वाइमार संग्रहालय), ‘कार्यकक्ष की खिड़की’ (बर्लिन), ‘पहाड़ पर क्रूस’ (गेमास्डेगालेरी, ड्रेस्डेन) जैसे अनेक सूक्ष्म काव्य से सम्पूरित भूदृश्य चित्रित किये।

कार्ल स्पित्स्वेग

कार्ल स्पित्स्वेग (1808-1885) विशेष प्रतिभा सम्पन्न कलाकार नहीं होते हुए उनकी कला की उपेक्षा नहीं की जा सकती। उनके चित्रों की कहानी शैली व थोपे हुए विनोद के बावजूद उनमें अंकित सम्मोहक छाया-प्रकाश का प्रभाव व रंगांकित सतह की आनन्दप्रद स्पर्शीयता का गुण उनकी आकर्षकता में कमी नहीं होने देते। 

इंग्लिश भूदृश्य-चित्रकार

19वीं सदी की इंग्लिश कला की विशेषता थी उसके कलाकारों का भूदृश्य-चित्रण, विशेषतया जलरंगीय, को किया योगदान। 

जलरंगीय भूदृश्य चित्रण के सबसे प्रमुख प्रतिनिधि चित्रकार थे टामस गर्टिन (1775-1802) व जान सेल काटमन (1782–1842)। उनसे पहले जलरंग चित्रकार सेपिया रंग से या काली स्याही से तूलिका से रेखांकित चित्र बनाते व बाद में उनको पारदर्शी जलरंगों से पूर्ण करते। 

गर्टिन व काटमन सबसे पहले चित्रकार थे, जिन्होंने आरम्भिक एकवर्ण रेखांकित आधारचित्र बनाने की पद्धति को त्याग कर सीधे सम्पूर्ण चित्र को आरम्भ से ही भिन्न जलरंगों से बनाना शुरू किया। फिर भी, इस कालखण्ड के सबसे मौलिक व श्रेष्ठ प्रतिभा के भूदृश्य चित्रकार थे जोसफ मेलाई विल्यम टर्नर (1775-1851)। 

वे क्लोद लोरँ के प्रशंसक थे व उन्होंने लोरँ के समान ऐतिहासिक स्थलों के भूदृश्य चित्र बनाये किन्तु रंगों की मोहकता की ओर विशेष ध्यान देकर व चित्रित वातावरण को रोमांचक बना कर उन्होंने भूदृश्यों को नया जीवन प्रदान किया। 

क्लोद लोरें के प्रशंसक होने के बावजूद, उनके सागरी दृश्यों के चित्रों पर 17वीं सदी के सागरी दृश्यों के डच चित्रकारों का प्रभाव है जैसा उनके चित्र ‘कैले पोतघाट’ (नेशनल गैलरी, लंदन) में दृष्टिगोचर है। 

आजकल, उनके सोच-समझकर संयोजनपूर्वक बनाये बड़े भूदृश्यों की अपेक्षा उनके निसर्ग को प्रत्यक्ष देखकर बनाये अभ्यास चित्रों की अधिक प्रशंसा होती है। जैसे उनके चित्र ‘वाल्टन पुल के निकट टेम्स नदी’ (टेट वीथिका), ‘गायों के साथ भूदृश्य’ (टेट वीथिका)। 

पेशे के उत्तरकाल में उन्होंने वेनिस, स्वित्जरलैंड के पर्वतीय आल्प्स प्रदेश व अन्य स्थलों के जलरंग चित्र बनाये जो परिष्कृत रंगयोजना व सरल संक्षिप्त रूप के कारण असाधारण प्रभाव के हैं जिसके उनके चित्र ‘पार्लियामेन्ट भवन का अग्निकांड’ (ब्रिटिश संग्रहालय) व रिंगी के अनेक भूदृश्य उदाहरण हैं। 

अपनी जलरंग चित्रण पद्धति को तैल चित्रण में प्रयुक्त करके उन्होंने अपनी रंगयोजना को अधिक प्रभावी व अंकन पद्धति को अधिक स्वच्छंद बनाया। जान कान्स्टेबल (1776-1837) अपने मूल प्रदेश को छोड़कर और कहीं नहीं गये व आसपास के परिचित देहाती दृश्यों को निष्ठा से चित्रित करने में आजीवन लगे रहे। 

कोरो के समान वे पहले बाहर जाकर स्थान पर अभ्यास चित्र बनाते व फिर कार्यकक्ष में बड़े चित्र बनाते। शुरू में उनके चित्र कुछ भावहीन व अत्यलंकृत थे किन्तु शीघ्र ही उन्होंने इस कृत्रिमता से मुक्ति प्राप्त की व उनके भूदृश्य तथ्यात्मक, छाया प्रकाश के प्रभाव से जगमगाते व अत्यधिक संवेदनशील अंकन पद्धति से पूर्ण किये दिखायी देने लगे जिसके उदाहरण के रूप में उनके विक्टोरिया व अल्बर्ट संग्रहालय के भूदृश्य ‘ब्राइटन किनारे कोयलावाही’ व ‘हैम्पस्टेड का बंजर’ को देखा जा सकता है। 

छोटे तूलिकाघात, विविधता व कभी रंग पट्टिका चाकू के प्रयोग से वे अपने रंगांकन को अत्यन्त परिष्कृत व जाली सदृश आकर्षक रूप प्रदान करते जो इंग्लैण्ड के बहुवर्णभासी देहाती प्रदेश के प्रकाश व आसमान के अनुरूप था। 

कान्स्टेबल के विश्वविख्यात भूदृश्य ‘चारे की गाड़ी’ (नेशनल गैलरी, लंदन) को फ्रेंच राष्ट्रीय प्रदर्शनी के लिए आये हुए चित्रों में देलाका ने जब देखा तो उसमें चित्रित वातावरण व भूमि की जगमगाहट से वे इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपना चित्र ‘किओस में नरसंहार’ वापस लेकर परिवर्तित कर फिर प्रदर्शित किया। 

1870 में जब प्रभाववादी चित्रकार मोने व पिसोरो लंदन आये थे तब उन्होंने कान्स्टेबल व टर्नर के चित्रों का अध्ययन किया था व वे उनसे प्रभावित हुए थे जो अनुभव प्रभाववाद के विकास में कुछ हद तक सहायक रहा।

इंग्लिश चित्रकार रिचर्ड पार्केस बोनिंग्टन (1802-1828) ने अपना संक्षिप्त कार्यकाल फ्रांस में व्यतीत किया। उन्होंने लुव्र संग्रहालय के रिशल्यु व आस्ट्रिया की एन जैसे छोटे ऐतिहासिक चित्र बनाये जिनमें चमकीले रंगों का प्रयोग है। 

इसके अलावा उन्होंने ‘वर्साय’ (लुव्र) व ‘घाटों से इन्स्टिट्यूट’ (ब्रिटिश संग्रहालय) आदि भूदृश्य बनाये जो उनके सूक्ष्म निरीक्षण व स्वच्छंद अंकन पद्धति के विस्मयकारक उदाहरण हैं।

प्रिरेफिलाइट्स भ्रातृमंडल

1848 के करीब कुछ युवा कलाकारों ने स्थापित नियमबद्ध अकादमिक कला से असंतुष्ट होकर ‘प्रिरेफिलाइट्स भ्रातृमंडल’ नाम के कला समूह की स्थापना की। प्रस्थापित यथार्थवादी शैली के नैसर्गिक छाया प्रकाश, अनुपात, दृश्य के नेत्रीय प्रभाव के प्रति निष्ठा, काल्पनिकता का बहिष्कार, वातावरणीय प्रभाव व परिप्रेक्ष्य की अपेक्षा वास्तविकता के मस्तिष्क पर होने वाले प्रभाव को ध्यान में रखकर विचारपूर्वक बारीकियों के साथ चित्रण करना उनका ध्येय था। 

दृश्य रूप की अपेक्षा नैसर्गिक आकार व रंग को वे प्रमुख महत्त्व देते थे । अतः उनकी कला गद्य साहित्य के अधिक निकट है। भ्रातृमंडल के प्रणेता थे दांते गाब्रियल रोसेत्ति (1828-1882), जान एवरेट मिले (1829-1896) व विल्यम हाल्मन हंट (1827-1910)।

प्रभाववाद

19वीं सदी के उत्तरार्ध में प्रभाववाद नाम से विख्यात आत्यन्तिक क्रान्तिकारी कला आन्दोलन का फ्रांस में उदय हुआ जिससे आरम्भ होकर प्रथम समस्त यूरोप में व तत्पश्चात् अमेरिका व विश्व के अन्य सम्बद्ध देशों में आधुनिक कला, उसके अंतर्विष्ट भिन्न कलाप्रवाहों के साथ विकसित हुई व उसने सब पूर्ववर्ती शैलियों को पीछे छोड़ कर सम्पूर्ण बीसवीं सदी में अपना आधिपत्य स्थापित किया। अतः इस आन्दोलन का विस्तार से अध्ययन आवश्यक है जो आधुनिक कला के इतिहास के अन्तर्गत ही सम्भव है।

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