भारतीय कला में तान्त्रिक प्रवृत्ति | Tantric Trend in Indian Art

प्राचीन भारत में गुप्त रहस्यात्मक सिद्धि की क्रिया का नाम तन्त्र था। इसके तीन अंग थे : यन्त्र, मन्त्र और तन्त्र । किसी ताम्रफलक अथवा कपड़े, कागज, ताडपत्र आदि पर रेखात्मक आकृति (Diagram) बनाकर सामने रख ली जाती थी। 

इसमें ज्यामितीय अमूर्त रूप, प्राकृतिक चिन्ह जैसे कमल, सूर्य, चन्द्र आदि मानवीय रूप जैसे मिथुन आकृति आदिः शक्ति, चामुण्डा आदि की तान्त्रिक आकृतियाँ आदि चित्रित या रेखांकित होती थीं। 

इन चित्रात्मक फलकों को यन्त्र कहा जाता था। इन्हें सामने रख कर विभिन्न प्रकार की पूजा-उपासना, मन्त्रों का उच्चारण आदि किया जाता था और इस समस्त क्रिया-कलाप से किसी कार्य की सिद्धि की जाती थी । 

इस सबको ही प्राचीन भारत में तन्त्र कहते थे भारतीय कला के अध्येताओं ने इस प्रकार की समस्त प्राचीन कला-मूर्ति, चित्र तथा अलंकरण को तान्त्रिक कला का नाम दिया है। 

प्राचीन भारतीय धर्म-साधना तथा दर्शन में भी इसका महत्व रहा है। मुख्य रूप से शैव, शाक्त तथा बौद्ध उपासना पद्धतियों में तन्त्र का पर्याप्त प्रचार रहा है। 

इससे यह स्पष्ट है कि तान्त्रिक कला कोई कलाशैली न होकर सिद्धि का एक साधन मात्र थी और अपने-अपने युगों में प्रचलित कला- शैलियों के चित्रकार एवं मूर्तिकार तान्त्रिक साधकों की आवश्यकतानुसार कला-कृतियाँ बनाते थे।

जिस प्रकार पश्चिमी देशों के कलाकार विभिन्न स्रोतों से प्रेरणा लेकर अपनी कला- शैलियों का विकास कर रहे हैं उसी प्रकार आधुनिक भारतीय चित्रकार भी देश-विदेश की विभिन्न युगों की कला शैलियों के समन्वय में लगे हुए हैं। 

अपभ्रंश शैली में फारसी तत्वों का समन्वय हुआ था। मुगल शैली ने यूरोपीय परिप्रेक्ष्य तथा छाया-प्रकाश को प्रयुक्त करने का प्रयत्न किया था। 

अवनीन्द्रनाथ ठाकुर ने चीनी- जापानी कला के तत्वों का भारतीय मुगल लघु-चित्रण शैली के साथ समन्वय किया था अमृता शेरगिल ने लघु-चित्रण तथा अजन्ता की शैली के साथ पश्चिमी आ निक कला का समन्वय किया था। 

यामिनी राय ने लोक कला से प्रेरणा ली थी और उससे प्रेरित होकर अनेक चित्रकारों ने लोक कलाओं तथा लघुचित्रों से प्रेरणा लेकर अपनी शैलियों को संजोया भारत के अधिकांश चित्रकार यूरोपीय शास्त्रीय कला, यथार्थवाद, प्रभाववाद तथा अभिव्यंजनावाद से प्रेरित हुए। 

उसके पश्चात् घनवाद की प्रेरणा का दौर आया। इसमें कलाकार अमूर्त ज्यामितीय रूपों की ओर उन्मुख हुए। 1960 के आसपास भारतीय कला के अमूर्तन की ओर बढ़ने के साथ ही तान्त्रिक दला की प्रेरणा का भी आरम्भ हुआ। 

इसकी प्रेरणा ज्यामितीय अमूर्त आकृतियों में निहित प्रतीकता से आरम्भ हुई थी किन्तु इसके साथ तान्त्रिक शब्द जुड़ते ही कई प्रकार के प्रतीकों का इस कला में प्रयोग होने लगा और यह विशुद्ध अमूर्त शैली का आन्दोलन न रह कर दार्शनिक प्रतीकात्मक रूप में अधिक विकसित हुआ कलाकृतियों में प्रयुक्त प्रतीकों की व्याख्या ही शैली की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण हो गयी। 

भारतीय कला के प्रत्येक आधुनिक आन्दोलन के साथ विदेशी प्रेरणा का बहुत बड़ा प्रश्न चिन्ह लग गया था। 

भारतीय कला के विदेशी ग्राहक अधिक है अतः विशुद्ध भारतीय आधारों से प्रेरित होने वाली कला शैली के रूप में उस नयी प्रवृत्ति का विकास हुआ जिसे आरम्भ में तांत्रिक कहा गया। 

पर ये कलाकार न तो प्राचीन तांत्रिकों की भाँति साधक है और न ही इनके द्वारा बनायी गयी कलाकृतियों का योग अथवा तंत्र साधना में कोई प्रयोग ही किया जा रहा है। 

अतः इसे “नव तांत्रिक” कला कहना ठीक समझा गया। ये कलाकार प्राचीन तान्त्रिक कला में प्रयुक्त होने वाले सृष्टि-प्रतीकों जैसे नाद-बिन्दु, कमल-वज्र, सूर्य-चन्द्र, ऊँकार, ही, क्लीं, श्री. सूर्य, कुण्डलिनी, पद चक्र, नेत्र, प्रभा-मण्डल, अक्षमाला, श्रीयन्त्र, त्रिशूल, मण्डल, ज्यामितीय रूप जैसे त्रिभुज, त्रिभुज-युग्म, वर्ग, शिशिरित वर्ग, पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि तथा आकाश के प्रतीक चिन्हों वृत्त आदि तथा जैव रूपों जैसे नर नारी की मिथुन आकृति, नेत्र एवं 4 लिंग योनि आदि के प्रतीक चिन्हों को विशेष विधि से संयोजित करते हैं। 

इनका लक्ष्य किसी अमूर्त शैली का विकास न रहकर केवल तांत्रिक प्रतीकों को अपने ढंग से प्रस्तुत करना मात्र रहा है।

आरम्भ में लक्ष्मण पै तथा नीरद मजूमदार आदि ने अपने चित्रों के शीर्षक तान्त्रिक पद्धति के आधार पर रखे। 

यद्यपि इनका तंत्र-साधना से कोई सम्बन्ध न था पर आकृतियों का संयोजन कुछ इस प्रकार से किया गया था कि चित्रों के तान्त्रिक होने का भ्रम होता था जैसे लक्ष्मण पै के “मानवाकृतियाँ” शीर्षक चित्र में पुरुष तथा नारी मुखाकृतियाँ पचभुज, त्रिभुज आदि के समन्वय से अंकित की गयी हैं, मस्तक पर तांत्रिक त्रिकुटी के समान त्रिपुष्प अलंकरण है। 

नीरद मजूमदार ने कला को अनुष्ठान मूलक मानते हुए 1957 के आसपास प्रतीकात्मक ज्यामिति के आधार पर चित्रों की रचना की. साथ ही दैवाकृतियों के चित्रों में देवनागरी मंत्रों को समस्त चित्र के अन्तराल में पृष्ठ भूमि के रूप में संयोजित किया। 

1960 में सूजा ने ब्रिटेन से प्रकाशित होने वाली पत्रिका “स्टूडियो में पश्चिमी अमूर्तकला और भारतीय तान्त्रिक कला के अन्तः सूत्रों की ओर संकेत किया। 

लगभग इसी समय जगदीश स्वामीनाथन ने ॐ, स्वस्तिक, कमल, लिंग, सर्प तथा हाथ की छाप को लेकर प्रतीकात्मक चित्रण आरम्भ किया और इनकी अपने ढंग से दार्शनिक व्याख्या की इसके पश्चात् वे काल्पनिक ज्यामितीय चित्रण करने लगे जिसमें बड़े-बड़े ज्यामितीय क्षेत्रों में अलग-अलग रंग भरे होते थे। 

इन्हें उन्होंने “अन्तरिक्ष की वर्ण-ज्यामिति (Colour-geometry of space) कहा है। स्वामीनाथन के इसी कलात्मक दौर को नव-तांत्रिक कला-प्रवृत्ति के संदर्भ में देखा गया है।

1960 के आस-पास वीरेन दे पहले कलाकार थे जिन्हें निःसंकोच ‘नव-तांत्रिक” कहा गया था। 

आकृति-मूलक रचनाएँ करने के उपरान्त ये ‘मण्डल’ चित्रित करते हुए अमूर्त रूपों की ओर उन्मुख हुए उन्होंने वर्गों तथा वृत्तों का ही अंकन किया है तथा उनकी ज्यामितीय आकृतियों अथवा रंगों का कोई दार्शनिक प्रतीकात्मक अर्थ नहीं है। 

वीरेन दे के चित्रों में रंगों की ऊर्जा तांत्रिक चित्रों से बहुत अधिक है और वे मानों चित्र के केन्द्र से चारों ओर फैल जाना चाहते हैं। इनमें विस्फोट अथवा विकिरण (Radiation) जैसा प्रभाव है।

के० सी० एस० पणिक्कर ने प्राचीन पाण्डुलिपियों के प्रभाव में कुछ ऐसे चित्र अंकित किये हैं जिनमें आज समझ में न आ सकने वाली किसी गुप्त प्राचीन लिपि में मानों कोई रहस्य लिखा हो। 

इसके साथ ही कुछ ज्यामितीय चिन्ह जैसे त्रिभुज, षटभुज, अर्धचन्द्र वृत्त एवं वर्ग आदि स्थान-स्थान पर रेखात्मक रीति से अथवा रंग भरे हुए भी अंकित रहते हैं। 

चित्र देखने से ऐसा लगता है मानों किसी तांत्रिक ग्रंथ हो । का कोई हस्तलिखित पृष्ठ हो। लिपि मूलक रेखीय आकृतियों में रेडप्पा नायडू ने भी पवित्र आकृतियाँ अंकित की है। 

पी०टी० रेड्डी पहले श्रृंगारपूर्ण मिथुनों का अंकन करते थे, तत्पश्चात् वे लिंग योनि का प्रतीकात्मक चित्रण करने लगे जो अमूर्त परस्पराच्छादित तत्वों के रूप में दिखायी देते हैं। 

उनके चित्रों में लोक-कला तथा ‘धार्मिक आकृतियों का संयोजन भी कुछ इस प्रकार हुआ है कि ये तांत्रिक जैसी लगती हैं। 

चित्रकार पलसीकर ने भी तांत्रिक मंत्रों, अक्षरों तथा त्रिशूल, नेत्र आदि चिन्हों को सपाट रंगों के धरातलों पर आड़ा-तिरछा संयोजित करके आधुनिक कलाकृतियाँ निर्मित की हैं। 

चित्र के किसी कोने में कोई तांत्रिक यन्त्र (Diagram) भी अंकित रहता है पर इन चित्रों में कोई रहस्य नहीं है, केवल संयोजन मात्र है।

गुलाम रसूल सन्तोष ने अपनी कला के विकास के मध्य युग में अमूर्त शैली की ओर कदम रखा। वे रेखा, रंग तथा अमूर्त रूप के द्वारा किसी अन्तरंग अनुभूति अथवा मनःस्थिति को प्रत्यक्ष करने का प्रयत्न करते हैं। 

पुरुष तथा प्रकृति को उन्होंने प्रतीकों में प्रस्तुत किया है। अनेक चित्रों में अन्धकार तथा प्रकाश युक्त अमूर्त रूपों का संयोजन कुछ इस प्रकार से हुआ है मानों मन के किसी गहरे ज्वालामुखी में से वृत्त, त्रिभुज, आयत, अर्धवृत्त और अन्य अनेक ज्यामितीय रूप निकल कर बाहर आ रहे हों और किसी अज्ञात स्रोत से आने वाले प्रकाश में चमक रहे हों।

उपर्युक्त नव तान्त्रिक कलाकारों में एक और महत्वपूर्ण नाम जुड़ गया है सतीश गुजराल का। 

1975 ई० के आरम्भ में गुजराल ने अपनी नव-तान्त्रिक कलाकृतियों की प्रदर्शनी अमेरिका में आयोजित की थी इसे नय-तान्त्रिक कला की सबसे अधिक प्रभावशाली प्रदर्शनी माना गया है। 

सतीश गुजराल की तान्त्रिक कृतियाँ आधुनिक यंत्रों से प्रभावित हैं। उनका विचार है कि तन्त्र-साधना में शक्ति के रहस्यों को समझने और अनुभव करने का साधन प्राचीन यन्त्र थे आज के औद्योगिक युग में ये यंत्र बदल गये हैं। 

अतः तान्त्रिक लक्ष्यों को हमें आज इन्हीं आधुनिक यंत्रों (मशीनों) के संदर्भ में समझना चाहिये। 

गुजराल की लीला, बिन्दु, सहस्रार, माया, मध्यमा अथवा गणेश आदि शीर्षकों से युक्त इन कला-कृतियों में (जो सुन्दर फर्नीचर अथवा शो-पीस के ढंग पर निर्मित की गयी हैं) आधुनिक मशीनी बिम्बों के माध्यम से सृष्टि के कुछ रहस्यों की व्याख्या का प्रयत्न किया गया है जिनके लिए पहले तन्त्रों में ज्यामितीय एवं मानवीय आकृतियों से युक्त यंत्रों (Diagrams) का प्रयोग किया जाता था।

भारत की नव तांन्त्रिक कला से बालकृष्ण पटेल, दीपक बनर्जी, के० बी० हरिदासन्, होमी पटेल तथा प्रभाकर बर्वे एवं सूजा आदि का नाम भी जुड़ा हुआ है। नव तांत्रिक कलाकारों में दो नाम विशेष महत्वपूर्ण हैं. गुलाम रसूल सन्तोष तथा सतीश गुजराल ।

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1 thought on “भारतीय कला में तान्त्रिक प्रवृत्ति | Tantric Trend in Indian Art”

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