अतियथार्थवादी कला आन्दोलन

अतियथार्थवादी कला आन्दोलन का सूत्रपात आन्द्रे ब्रेतों नामक कवि ने 1924 ई० में पेरिस में किया था। 

इसका मुख्य उद्देश्य ऐसे अचेतन विषयों को आकार देना था जो पागलपन, स्वप्न, भ्रम, प्रयत्नहीनता अथवा अचानकता की स्थिति में उत्पन्न हो जाते हैं यह कला मन की अचेतन स्थिति से सम्बन्धित है और इसमें तर्क, सौन्दर्य-सिद्धान्त अथवा नैतिकता का बिल्कुल भी स्थान नहीं है अतियथार्थवादी कला में फ्रायड के मनोविज्ञान के सिद्धान्तों की पृष्ठभूमि है एक प्रबल आन्दोलन की दृष्टि से यूरोप में यह 1925 से 1935 के मध्य विशेष लोकप्रिय रहा है। साल्वाडर डाली, में होतों, मेस्सों, माइरो तथा क्ली आदि इसके विशेष प्रसिद्ध चित्रकार थे। 

अतियथार्थवाद दो रूपों में विकसित हुआ था एक तो स्वप्न के फोटोग्राफ के समान अर्थात् कल्पित आकृतियों को इतने यथार्थवादी तरीके से बनाना कि वे फोटोग्राफ जैसी प्रतीत हों दूसरे रूप में यह बच्चों जैसी कल्पना से सम्बन्धित है, जैसे बटन तथा दियासलाई की तीलियों से मानव आकृति की कल्पना करना। 

यह आन्दोलन अत्यन्त विचित्र रूपों तथा फन्तासी के कारण सारे संसार में लोकप्रिय हुआ।

भारतवर्ष में अतियथार्थवाद का आरम्भिक संकेत रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कृतियों में मिलता है जिन्होंने अपनी वृद्धावस्था में सहज वृत्ति से परिचालित होकर अचेतन में छिपे बिम्बों को साकार किया। 

अतियथार्थवादी कला के एक अच्छे आरम्भिक चित्रकार असम के हेमन्त मिश्र रहे हैं जिन्होनें पर्वतों, चट्टानों तथा भवनों को नष्ट होते समय की अनुभूति के साथ प्रस्तुत किया है। 

अपने अनेक चित्र-संयोजनों में हुसेन भी अतियथार्थवादी भावना के निकट पहुँच गये हैं, जैसे दौड़ते हुए अश्व के साथ भूमि पर लुढ़कता बादामी सूर्य, अथवा नारी की जंघा पर बैठा गिद्ध । 

जसवन्त सिंह के अतियथार्थवादी चित्रों में डरावनापन है लक्ष्मण पे के चित्रों में नारी आकृति तथा वनस्पति के रूपों को इस प्रकार भ्रमात्मक ढंग से संयोजित किया गया है जहाँ दोनों एक प्रतीत होते हैं

ए० रामचन्द्रन की कला में कंकाल सदृश शिर-विहीन मानवाकृतियों को असम्भाव्य मानवीय क्रिया-कलापों में सलंग्न दिखाया गया है। 

द ग्रेव डिगर्स तथा ययाति आदि चित्रों में उन्होंने आकृतियों के पंख तथा पंजे आदि पक्षियों के समान लगे हुए भी दिखाये हैं। परमजीत सिंह के चित्रों में आकाश में तैरते हुए पत्थरों में भारहीनता की अतियथार्थवादी तकनीक का प्रयोग किया गया है। 

स्वामीनाथन एवं विकास भट्टाचार्य ने इस प्रकार के रूपों का अंकन किया है कि कभी वे सजीव और कभी कृत्रिम प्रतीत होते हैं और इस प्रकार उन्हें देखकर हम यथार्थ एवं अयथार्थ के मध्य झूलने लगते हैं। 

स्वामीनाथन के चित्रों से हमें समय की अनन्तता की भी एक अजीब-सी अनुभूति होने लगती है। अनुपम सूद, रनवीरसिंह कालेका और मंजीत बाबा की कला में भी अतियथार्थवादी तत्वों का प्रचुर प्रयोग हुआ है।

उक्त समस्त यूरोपीय कला-प्रवृतियों के प्रयोग की दृष्टि से भारत में कोई भी उल्लेखनीय प्रभाववादी, घनवादी, अतियथार्थवादी या संरचनावादी चित्रकार नहीं हुआ। 

अधिकांश चित्रकार अभिव्यंजनावाद की ओर झुक गये। इनमें से किसी भी शैली में किसी भारतीय कलाकार ने कोई मौलिक योगदान नहीं दिया जिसे कि उक्त शैलियों का भारत में विकसित अगला चरण माना जा सके। 

फिर भी भारतीय कलाकार अपने-अपने स्तर पर एक नई कला-भाषा के विकास का प्रयत्न कर रहे हैं। 

इस प्रयत्न में उन्होंने अपने देश के कला-स्रोतों को भी प्रयुक्त किया है जिनमें लोक कला, आदिमकला, लघुचित्र, अजन्ता एवं तान्त्रिक कला का मुख्य रूप से प्रयोग हुआ है।

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