विकास भट्टाचार्जी | Vikas Bhattacharjee

विकास का जन्म कलकत्ता में 21 जून 1940 को हुआ था। आरम्भिक शिक्षा के बाद कला के अध्ययन के लिये कलकत्ता के इण्डियन कालेज आफ आर्ट्स एण्ड ड्राफ्टसमेनशिप में प्रवेश लिया और 1963 में अध्ययन पूर्ण करने के पश्चात् वहीं पर 1968 से 1973 तक अध्यापन भी किया। 

उसके बाद 1973 से 1982 तक गवर्नमेण्ट कालेज आफ आर्ट्स एण्ड क्राफ्ट्स कलकत्ता में कला-शिक्षण किया।

विकास ने 1965 में कलकत्ता में अपनी पहली एकल प्रदर्शनी की और तब से कलकत्ता, दिल्ली तथा बम्बई में निरन्तर प्रदर्शनियाँ करते रहते हैं । 

हंगरी में 1972 में आयोजित भारत प्रदर्शनी के अतिरिक्त युगोस्लाविया, रूमानिया तथा चेकोस्लोवाकिया में भी आपके चित्रों का प्रदर्शन हुआ है। 

आपको अनेक पुरस्कार मिल चुके हैं जिनमें 1971 एवं 1972 के ललित कला अकादमी के राष्ट्रीय पुरस्कार भी सम्मिलित हैं। 

विकास भट्टाचार्य कलकत्ता के समकालीन कलाकार संघ के सक्रिय सदस्य हैं। आप कलकत्ता में ही निवास करते हैं।

कलकत्ता के अधिकांश कलाकार यथार्थ और आकृति-मूलकता को आसानी से नहीं छोड़ते । यही बात विकास के बारे में भी सच है। विकास व्यक्ति-चित्रण में पर्याप्त दक्ष रहे हैं और उनका रूझान फोटो-ग्राफिक यथार्थवाद की ओर भी पर्याप्त रहा है। 

‘वे अतियथार्थवादी धारा के एक अद्वितीय और समकालीन भारतीय कला के एक महत्वपूर्ण चित्रकार हैं। आधुनिक कला में वे अतियथार्थवादी दुनियाँ को सबसे अधिक प्रामाणिक ढंग से सामने लाते हैं। 

वे एक साधारण से व्यक्ति-चित्र को भी अनोखा आयाम देते हैं। उनका चित्र-संसार बहुत बेचैन करने वाला है। उसमें “बुरी खबर है” और जबर्दस्त तकनीकी कौशल भी है। 

फोटोग्राफी, चलचित्र, स्वप्न तथा फन्तासी के साथ विकास की कला में बचपन की खराब स्मृतियों का भी समन्वय हुआ है। 

सिनेमा की नाटकीय कल्पनाओं का प्रयोग उनकी ‘गुड़िया’ चित्र श्रृखंला में देखा जा सकता है। उन्होंने फोटो-यथार्थवाद का प्रयोग कैमरे की आँख की भाँति पूर्णरूप से किया है। उनके यथार्थवाद में तीखा व्यंग्य भी छिपा है।

विकास भटटाचार्य के ‘ट्यूबवैल का उद्घाटन’ नामक चित्र में फोटोग्राफ के समान यथार्थ चित्रण है अतः इसे हम फोटो भी मान सकते हैं। 

चित्र में एक वस्तु अंकित है जिसे हार पहनाया गया है। निकट ही ट्यूबवैल का उद्घाटन करने हैण्ड पम्प के लिये आमन्त्रित मुख्य अतिथि शानदार ढंग से अपने गले में हार पहने खड़ा है। 

जैसी उसके आस-पास बड़े, बूढ़े तथा बच्चे समूह के साथ अपना भी फोटो खिंचवाने के प्रयत्न में हैं। दीवार के पीछे से स्त्रियाँ भी झाँक रही हैं। 

इस चित्र में सामाजिक यथार्थ की एक मीठी कडवाहट दिखायी गयी है। सच के भीतर एक झूठ छिपा है; आशा के पीछे निराशा झाँक रही है।

कला-समीक्षक शान्तो दता के अनुसार ‘विकास उन आधुनिक भारतीय कलाकारों में से हैं जिनकी मानसिकता बुनियादी तौर पर नागर अथवा शहरी है। 

जीवन के प्रति उनके बौद्धिक तथा भावनात्मक दृष्टिकोण का आधार भी शहरी रहन-सहन की उनकी अपनी परिस्थितियों में है तथा उन्होंने लोक आदिवासी या ग्रामीण कला परम्पराओं . में अपनी जड़ें तलाशने की कभी कोशिश नहीं की है।

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